यह पूरी है जहां कण-कण में भगवान जगन्नाथ बसते हैं। उनकी महिमा, उनके चमत्कार, उनकी लीलाएं कोई क्या जाने। लेकिन कभी-कभी उनकी सबसे अनोखी लीलाएं सबसे साधारण इंसानों के जीवन से बुनी जाती हैं। वह रात जब सब कुछ शुरू हुआ। कुटिया के भीतर प्रभुदास अपनी छोटी सी दुकान पर पान बना रहे हैं। उनके चेहरे पर संतोष है। पर आंखों में कुछ अधूरापन। आठ बार भोग लगता है। दिन में आठ बार छप्पन भोग क्या-क्या नहीं चढ़ता मेरे प्रभु को।
मीठे पकवान, नमकीन पकवान, फल,
दूध सब कुछ। मेरा
मन हर बार एक ही सवाल पूछता है। इतना सब कुछ पर पान क्यों नहीं? भोजन के बाद एक पान आ हा
कितना संपूर्ण हो जाता मेरा प्रभु का भोग। यह कहानी सिर्फ एक पान वाले की नहीं है।
यह उस रहस्य की है जिसमें स्वयं भगवान ने भाग लिया। और हां, वीडियो के अंत में आपके
लिए एक रोचक कुछ भी है। जरूर अंत तक देखिएगा। उस रात जब पूरी सो रही थी, प्रभुदास की यह अनकही
प्रार्थना भगवान तक पहुंच गई थी और भगवान की लीला तो अपरंपार है। वो ऐसे रास्ते
ढूंढ लेते हैं जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।
प्रभुदास अपनी
कुटिया के किवाड़ बंद करके सोने की तैयारी करते हैं। तभी बाहर से हल्की खटखटाहट
होती है। इतनी रात को कौन होगा? वह दरवाजा खोलते हैं। सामने दो बेहद खूबसूरत नौजवान खड़े
हैं। उनके घुंघराले बाल कंधों तक फैले हैं। कानों में चमकते कुंडल हैं और वस्त्र
भी असाधारण रूप से सुंदर हैं। उनकी आंखों में एक दिव्य चमक है। नमस्ते प्रभुदास
जी। क्या थोड़ा पान मिल सकता है? बहुत देर से चल रहे हैं। थकान हो रही है। अरे अरे हां हां
जरूर। आप दोनों इतनी रात को पहले कभी देखा नहीं? जी हम बस ऐसे ही भटकते हुए यहां आ गए। प्रभुदास
तुरंत उनके लिए दो पान बनाते हैं। उनकी सुंदरता और विनम्रता से वह इतने मोहित हो
जाते हैं कि कुछ और पूछना भूल जाते हैं।
लीजिए ताजाताज़ा
पान। दोनों युवक पान लेते हैं। एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं और पान खाते हैं।
आ लाजवाब। ऐसा पान तो हमने कभी नहीं खाया। हां, सच में मन तृप्त हो गया। बहुत-बहुत धन्यवाद प्रभुदासी। क्या
आपको भी लगता है कि वो युवक भगवान ही थे? अगर हां, तो वीडियो को एक लाइक जरूर दीजिए और कमेंट में लिखिए जय
जगन्नाथ। पान का पैसा? अरे मुझे तो याद
ही नहीं रहा। कोई बात नहीं। कल आ जाएंगे तो ले लूंगा। और फिर ऐसा ही होने लगा। हर
रात वही दो रहस्यमय नौजवान आते पान खाते और बिना कुछ कहे बिना कुछ दिए चले जाते
प्रभुदास के लिए तो जैसे वे ईश्वर का ही कोई वरदान थे जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी
भवा तुम अरे यह कौन है यह दोनों बालक इतनी रात को प्रभुदास की कुटिया से निकल रहे
हैं मैंने इन्हें कभी मंदिर में देखा नहीं युवक तेजी से गली में मुड़ उड़ जाते हैं
और आंखों से ओझल हो जाते हैं। अजीब बात है। रोज रात को देखता हूं बस रात को ही।
प्रभुदास की कुटिया
से कुछ तो गड़बड़ है। अगले कुछ दिन बलराम दास उन पर नजर रखने लगा। बलरामदास के मन
में सवाल उठते रहे। एक और रात बलरामदास एक खंभे के पीछे छिपे हैं। युवक प्रभुदास
की कुटिया से निकलते हैं। आज तो जरूर पूछूंगा प्रभुदास से। कहीं कोई गलत काम तो
नहीं हो रहा? प्रभुदास जरा एक
बात सुनिए। अरे बलराम दास जी आइए आइए बैठिए। सुबह-सुबह कैसे आना हुआ? क्या पान बनाऊं? नहीं पान नहीं। मैं कुछ
पूछने आया हूं और आपसे सच-सच जानना चाहता हूं। पूछिए पूछिए। मैं भला आपसे क्या
छुपाऊंगा? प्रभुदास मैं कुछ
दिनों से देख रहा हूं। हर रात दो नौजवान बालक आपकी कुटिया से निकलते हैं। इतनी रात
को यह कौन बालक हैं? और यहां क्या कर
रहे थे? मुझे नहीं पता
बलराम दास जी कि वो कौन है। पर हां वे प्रतिदिन मेरे घर आते हैं और मुझसे पान लेकर
जाते हैं। और बिना मूल्य दिए चले जाते हैं। है ना? मैंने देखा है उन्हें निकलते हुए। जब भी मैं
उन्हें देखता हूं ना तो उनसे इतना मोहित हो जाता हूं कि मैं पान की कीमत मांगना ही
भूल जाता हूं।
अब इसमें मेरा क्या
दोष है? बताइए। अगर ऐसा
ही चलता रहा तो आपका घर कैसे चलेगा? बताइए जब भी वे दोनों बालक आपके पास आएंगे तो आप उनसे पान
की कीमत मांगना और अगर वह आपको पान की कीमत ना दें तो उनसे कहना कि वे दोनों बंधक
के रूप में अपनी-अपनी चादर आपके पास छोड़ जाए। प्रभुदास अपनी दुकान बंद करने वाले
हैं। तभी दोनों युवक फिर से आते हैं। नमस्ते प्रभुदास जी। क्या आज भी आपका बेहतरीन
पान मिल पाएगा? प्रभुदास उन्हें
देखकर फिर से मोहित हो जाते हैं। पर बलरामदास की बात याद आती है। वह थोड़ा संकोच
करते हैं। पान देने के बाद आप दोनों इतने दिनों से पान खा रहे हैं। पर मैंने आपसे
कभी दाम नहीं लिया। पर आज आपको पान के बदले में दाम देना होगा। अरे आप तो कभी हमसे
दाम मांगते ही नहीं है। हमने तो सोचा इसलिए हम आज कोई धन लेकर नहीं आए। हमारे पास
अभी देने को कुछ नहीं है। कल आएंगे तो दे देंगे।
वादा रहा। नहीं नहीं बहाना बनाने से नहीं चलेगा। बलराम दास
जी ने मुझे समझाया है। आज ही देना होगा। बिना दाम दिए मैं तुम दोनों को नहीं जाने
दूंगा। लेकिन हमारा आज जाना अति आवश्यक है। प्रभुदास जी। हम पर विश्वास रखिए। कल
हम बहुत सारा धन लाकर देंगे। तो ठीक है। बिना दाम दिए जा सकते हो। लेकिन अपनी यह
चादर मेरे पास रखनी होगी। कल जब दाम लाओगे तो चादर वापस ले जाना या बंधक के तौर पर
रहेगी। युवक विवश होकर अपनी-अपनी चादरें उतारते हैं। दोनों युवक बिना चादरों के ही
तेजी से वहां से निकल जाते हैं। प्रभुदास ने अपनी नादानी में भगवान की लीला का एक
और अध्याय लिख दिया था। उस रात पूरी में किसी को अंदाजा नहीं था कि मंदिर में एक
अजीब सा तूफान आने वाला है। मुख्य पुजारी भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के विग्रहों के
पास पहुंचते हैं ताकि उन्हें सुबह की पूजा के लिए तैयार कर सकें। वह भगवान जगन्नाथ
को ओढ़ाई गई श्वेत चादर को हटाते हैं।
फिर बलभद्र जी की
ओर बढ़ते हैं। पर अरे यह क्या? बलभद्र जी की चादर कहां गई? जगन्नाथ जी की भी नहीं है। रात को तो मैंने खुद
अपने हाथों से उन्हें चादर ओढ़ाई थी। यह कैसे गायब हो गई? अरे सुनिए। सब यहां आइए
जल्दी। क्या हुआ महाराज? दोनों विग्रहों
पर से श्वेत चादरें नहीं है। किसने चुराई हैं? चोरी? पर यहां? अगर कोई चोर आया होता तो प्रभु के कीमती आभूषण, रत्नजित मुकुट चुराता। श्वेत चादर कोई क्यों
चुराएगा? अपशगुन भगवान
कहीं नाराज तो नहीं है? शांत सब शांत हो
जाओ। यह खबर फैलनी नहीं चाहिए। पहले ढूंढो मंदिर के हर कोने में देखो। लेकिन यह
खबर आग की तरह फैल गई। पूरी पूरी में हाहाकार मच गया। लोगों के मन में डर था और यह
बात राजा प्रताप रुद्रदेव तक भी पहुंची। यह क्या हो रहा है? प्रभु जगन्नाथ की चादरें
गायब हो गई हैं। क्या मेरे सेवक सो रहे थे? महाराज पुजारियों का कहना है कि उन्होंने खुद रात में
चादरें ओढ़ाई थी। कोई निशान नहीं है चोरी का।
यह मेरे राज्य पर
कलंक है। यह सब मेरे मंदिर के सेवकों की लापरवाही है। बुलाओ उन सबको। मैं उन्हें
कड़ी से कड़ी सजा दूंगा। महाराज पर कोई परवर नहीं। जिसने भी लापरवाही की है, उसे दंड भुगतना पड़ेगा।
राजा का क्रोध स्वाभाविक था। सब डर गए थे। पर जब भगवान स्वयं अपनी लीला कर रहे हो
तो भला कोई भक्त दंड क्यों पाए? भगवान अपने भक्तों को कैसे दंड मिलने दे सकते थे? बलराम दास गहरी नींद में
हैं। अचानक उनके स्वप्न में एक अद्भुत प्रकाश फैलता है। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र
उनके सामने प्रकट होते हैं। उनका दिव्य रूप बलराम दास को विस्मय में डाल देता है।
प्रभु मेरे प्रभु जगन्नाथ बलभद्र जी आप आप यहां उठो बलराम दास डरो नहीं। मैं
तुम्हें एक रहस्य बताने आया हूं। आज्ञा दीजिए प्रभु। जो चादरें मंदिर से गायब हुई
है वे किसी ने चुराई नहीं है। क्या? पर पर कैसे? तुम्हें याद है वह भोला प्रभुदास पान वाला जिसने तुम्हें
बताया था कि दो बालक उससे बिना मूल्य के पान लेते हैं। हां प्रभु याद है।
मैंने ही उसे कहा
था कि उन बालकों से दाम मांगे या बंधक के रूप में उनकी चादर रखवा ले। वही बालक मैं
और बलभद्र थे। हम प्रभुदास की उस छोटी सी इच्छा को जानते थे कि हमें भोजन के बाद
पान अर्पित किया जाए। हम खुद को रोक नहीं पाए। हम रोज रात उसके पास पान खाने जाते
थे। प्रभु यह क्या लीला है आपकी? मैं कितना मूर्ख था कि मैंने उन्हें चोर समझा। मैंने तो
मैंने तो प्रभुदास को कहा कि वह आपसे चादरें रखवा ले। हां। और जब प्रभुदास ने हमसे
दाम मांगे तो हम नहीं दे पाए। क्योंकि हम जानते थे कि उसके मन में क्या है और जब
उसने चादरें मांगी तो हमने सहर्ष अपनी चादरें उसे दे दी क्योंकि वह उसकी भक्ति का
प्रतिफल था। वह चादरें अब प्रभुदास के पास है। ये ये तो अद्भुत है प्रभु। सुबह
होते ही राजा प्रताप रुद्रदेव के पास जाओ और उन्हें यह सब बताओ। उन्हें कहना कि वे
प्रभुदास के पास जाए और उन्हें यह भी बताना कि आज से मेरे भोजन के बाद पान चढ़ाने
की परंपरा शुरू की जाए। यह प्रभुदास की भक्ति का सम्मान होगा। स्वप्न टूट जाता है।
बलरामदास हड़बड़ा
कर उठ बैठते हैं। उनके माथे पर पसीना है और आंखें खुली की खुली हैं। वह चारों ओर
देखते हैं। ये ये सपना था?
नहीं। यह तो सच
था। मेरे प्रभु ने मुझे दर्शन दिए। मुझे राजा के पास जाना होगा। अगर आप ऐसी
भक्तिपूर्ण कहानियां देखना चाहते हैं जहां भगवान स्वयं अपने भक्तों की पुकार सुनते
हैं तो इस प्लेलिस्ट में जाएं। महाराज रुकिए दंड मत दीजिए। मुझे कुछ कहना है बहुत
जरूरी। बलराम दास क्या है यह सब? क्षमा करें महाराज। पर यह दंड रुकना चाहिए। चादरें किसी ने
चुराई नहीं है। स्वयं भगवान जगन्नाथ ने मुझे स्वप्न में सब कुछ बताया है। स्वप्न
तुम होश में तो हो? मेरे प्रभु के
वस्त्रों की चोरी हुई है। और तुम स्वप्न की बात कर रहे हो? हां महाराज यह सत्य है।
वो चादरें प्रभुदास के पास हैं। वो पान वाला वही दो बालक जो उससे रोज पान लेते थे।
वह स्वयं प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र थे। मैंने ही प्रभुदास को कहा था कि वह उनसे दाम
मांगे या चादर बंधक रखवा ले। क्या कह रहे हो तुम? प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र स्वयं एक पान वाले से
पान लेने आते थे। हां महाराज भगवान ने अपनी लीला मुझे बताई है। उन्होंने कहा है कि
वे प्रभुदास की उस छोटी सी इच्छा को पूरा करना चाहते थे कि उन्हें भोजन के बाद पान
अर्पित किया जाए।
प्रभुदास की भक्ति
इतनी पवित्र थी कि भगवान स्वयं उसके पास चले आए। राजा प्रताप रुद्रदेव अपनी कुर्सी
से उठ खड़े होते हैं। उनके चेहरे पर पहले अविश्वास, फिर आश्चर्य और फिर गहरी श्रद्धा के भाव आते
हैं। महाराज अगर यह सत्य है तो यह प्रभु की महान लीला है। तो फिर हमें तुरंत प्रभु
दास के पास चलना चाहिए। यह देखना होगा। यह जानना होगा। यदि यह सत्य है तो प्रभु
दास को मैं अपने सिर आंखों पर बैठाऊंगा। महाराजा प्रताप रुद्रदेव, बलराम दास और उनके साथ
मंत्री, सेनापति तथा कुछ
लोग प्रभुदास की छोटी सी कुटिया के पास पहुंचते हैं। महाराज आप आप यहां मुझसे क्या
गलती हो गई? शांत हो जाओ
प्रभुदास। हम तुमसे कुछ पूछने आए हैं। क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी श्वेत चादरें हैं
जो तुम्हें दो नौजवान बालकों ने दी हो? प्रभुदास पहले घबराते हैं। वो कांपते हाथों से अपनी दुकान
के कोने में रखी उन दोनों श्वेत चादरों को निकालते हैं। जी महाराज यह रही वो
चादरें। कल रात उन बालकों ने इन्हें बंधक के तौर पर मेरे पास रखा था। राजा प्रताप, रुद्रदेव और बलराम दास
चादरों को देखते हैं।
वे हूबहू वैसी ही
हैं जैसी मंदिर में भगवान को ओढ़ाई जाती थी। यह वही चादरें हैं। प्रभुदास क्या तुम
जानते हो यह किसकी चादरें अपने पास रखी हैं? प्रभुदास वो दोनों बालक स्वयं भगवान जगन्नाथ और बलभद्र थे।
तुमने स्वयं प्रभु को अपने हाथों से पान खिलाया है। जैसे ही प्रभुदास यह बात सुनते
हैं, उनके चेहरे का
रंग बदल जाता है। उनकी आंखों में आंसू भर आते हैं। वह अपनी ही नादानी पर अवाक रह
जाते हैं। उन्होंने जिनसे दाम मांगे, जिनसे चादर रखवाई, वे स्वयं भगवान थे। प्रभु मेरे प्रभु मैंने मैंने आपको
पहचाना नहीं। मैंने तो आपसे चादर रखवा ली। यह कैसा पाप किया मैंने? नहीं प्रभुदास यह पाप
नहीं है। यह तो प्रभु की लीला है और तुम्हारी महान भक्ति का प्रमाण। तुमने अपनी
शुद्ध भक्ति से प्रभु को साक्षात अपने पास बुला लिया। धन्य हो तुम। धन्य है
तुम्हारा जीवन। उस दिन प्रभुदास के जीवन का अर्थ बदल गया। एक छोटा सा पान वाला
जिसे भगवान ने स्वयं अपने दर्शन दिए। उसकी भक्ति की कहानी सदियों के लिए अमर हो
गई। प्रभुदास की अटूट भक्ति के कारण स्वयं भगवान ने इच्छा व्यक्त की है कि भोजन के
बाद उन्हें पान अर्पित किया जाए।
उस दिन से भगवान
जगन्नाथ के मंदिर में भोजन के बाद पान खिलाने की परंपरा शुरू हो गई। प्रभुदास ने
अपना सारा जीवन मंदिर की सेवा में लगा दिया। वह एक उदाहरण बन गए कि भक्ति प्रेम
पूर्वक की जाए तो ईश्वर तक अवश्य पहुंचती है। प्रभु जगन्नाथ के चमत्कारों का जितना
वर्णन करें उतना ही कम है।
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