अरे यह क्या? भगवान जगन्नाथ चोरी के लिए निकल पड़े। पूरी में उस रात
मंदिर के पुजारी कांप रहे थे। दरवाजे खुले थे। भोग गायब था और मंदिर के बाहर नंगे
पांव एक छोटा सा बच्चा रोता हुआ बैठा था। लोग चिल्ला रहे थे। भगवान नाराज हो गए।
भगवान नाराज हो गए। भगवान नाराज हो गए। लेकिन किसी ने नहीं देखा कि उस बच्चे ने
कांपती आवाज में बस इतना कहा। आज मेरे दोस्त को भूख लगी थी। और तभी किसी ने
फुसफुसा कर कहा यह बालक भगवान जगन्नाथ का दोस्त कैसे हो सकता है? हां यह असंभव लगता है।
कुछ तो गड़बड़ है। पूरी के उसी विशाल मंदिर के पीछे जहां रोज घंटियां बजती थी, जहां फूलों की खुशबू रहती
थी, वहां एक छोटा सा
कमरा था। वो कमरा किसी पुजारी का नहीं था।
किसी राजा का नहीं
था। वो था नीलू का। नीलू की उम्र कोई ठीक-ठीक नहीं जानता था। कुछ कहते थे 5 साल, कुछ कहते थे सात। नीलू
अनाथ था। ना मां, ना बाप, ना कोई घर। जब लोग पूछते
तू कहां रहता है? तो वह मुस्कुरा
कर कहता यहीं बाबा के घर। लोग हंसते थे। पर नीलू सच कह रहा था। हर सुबह जब मंदिर
के कपाट खुलते नीलू सबसे पहले पहुंच जाता। वो झाड़ू नहीं लगाता था। वो फूल नहीं
चढ़ाता था। वो बस जगन्नाथ जी के सामने बैठकर धीरे से कहता आज आप जल्दी मत जाना।
जैसे कोई दोस्त दूसरे दोस्त से बात करता है। कभी-कभी वह शिकायत करता कल आपने मुझे
सपने में भी नहीं बुलाया। कभी हंसता आज आपके लिए नई कहानी लाया हूं। पुजारी देखते
थे पर अनदेखा कर देते थे। उनके लिए नीलू बस एक अनाथ बच्चा था। पर नीलू के लिए
जगन्नाथ ही सब कुछ थे। वो दिन जब सब कुछ बदलने वाला था। उस दिन बारिश बहुत जोर से
हो रही थी। भोग की तैयारी देर से हुई। पुजारी परेशान थे। भीड़ ज्यादा थी। नीलू को
उस दिन प्रसाद नहीं मिला। वो मंदिर के कोने में चुपचाप बैठा रहा। आंखें नीचे, पेट खाली। रात होने लगी।
मंदिर बंद होने से पहले नीलू धीरे-धीरे उठा और जगन्नाथ जी के सामने गया।
उसकी आवाज कांप रही
थी। आज आप खाना मत खाना क्योंकि आज मेरे दोस्त को खूब छी है। एक पुजारी गुस्से में
बोला, "चल हट यह भगवान
है। नीलू ने सिर झुका लिया। पर जाते-जाते धीरे से फुसफुसाया। अगर आप नहीं आए तो आज
मैं सो नहीं पाऊंगा। वो रात जब चोरी हुई आधी रात मंदिर शांत था। अचानक शोर मचा भोग
गायब है। लड्डू फल मिठाई सब नहीं थे। पुजारी दौड़े दरवाजे बंद थे। ताले सही थे। कोई
बाहर से नहीं आ सकता था। तो फिर तभी किसी ने देखा मंदिर के बाहर नीलू बैठा था।
उसके हाथ में आधा लड्डू था और आंखों में डर। भीड़ इकट्ठा हो गई। कोई चिल्लाया
भगवान चोरी करने निकल पड़े। कोई बोला यह बच्चा चोर है। नीलू कांपने लगा। उसने बस
इतना कहा। उन्होंने खुद दिया। पुजारी गुस्से में बोले भगवान खाना नहीं देते तू
चोरी करता है। नीलू रो पड़ा। उसने जमीन पर बैठकर जोर से कहा आप लोग नहीं समझते।
भीड़ शांत हो गई। नीलू बोला जब मुझे डर लगता है वो आते हैं।
जब भूख लगती है वो
हंसते हैं। आज उन्होंने कहा तुम सो जाओ मैं देख लूंगा। सन्नाटा लेकिन यहीं कहानी
खत्म नहीं होती। उसी पल मंदिर के अंदर से घंटी अपने आप बज उठी और जगन्नाथ जी की
आंखों से जैसे चमक निकल पड़ी। पुजारी पीछे हट गए। किसी ने कांपते हुए कहा अगर
बच्चा झूठ नहीं बोल रहा तो इसका मतलब भगवान सच में किसी की मनोकामना पूरा करने
निकल पड़े थे। लेकिन सवाल अब भी था। भगवान किसी की सुन लेते हैं और किसी की नहीं।
ऐसा क्यों? क्या अगला दिन
नीलू के लिए चमत्कार लाएगा या सबसे बड़ी सजा जब लोगों ने सोचा अब अच्छा होगा।
लेकिन भगवान ने सबसे कठिन रास्ता चुना। अगली सुबह जब सबको लगा अब चमत्कार होगा।
पूरी में सुबह होते ही खबर फैल गई। रात भगवान ने भोग खुद बाहर भेजा। एक बच्चे के
लिए भगवान चले आए। अब तो इस बच्चे की किस्मत बदल जाएगी। मंदिर के बाहर भीड़ थी।
लोग नीलू को देखने आए।
कोई सिक्का दे रहा
था, कोई मिठाई, कोई सिर पर हाथ फेर रहा
था। नीलू बस चुप था। वो बार-बार मंदिर के दरवाजे की तरफ देख रहा था। जैसे किसी का
इंतजार हो। नीलू की एक ही ज़िद। एक पुजारी ने पूछा, बोल बेटा, "क्या चाहिए?" नीलू ने सिर हिलाया, कुछ नहीं।" नीलू
बोला, "बस, आज रात भी वो आएंगे
ना"।" पुजारी चुप हो गया क्योंकि वो नहीं जानता था कि भगवान हर रात किसी
के लिए आते हैं या नहीं। पहला झटका जब सब उल्टा हो गया। दोपहर होते-होते मंदिर
समिति की बैठक हुई। कुछ बुजुर्ग पुजारी बोले, यह बच्चा गलत परंपरा बना रहा है। लोग भगवान से दोस्ती समझने
लगेंगे। भक्ति डर से नहीं नियम से चलती है और फिर फैसला हुआ। नीलू को मंदिर से
निकाल दिया जाएगा। शाम होते ही एक पुजारी नीलू के पास आया। अब तुम यहां नहीं रह
सकते। नीलू ने धीरे से पूछा। तो वो मुझे कहां मिलेंगे? पुजारी ने जवाब नहीं
दिया। वो पल जब सबको लगा अब अच्छा होगा। लोगों ने सोचा अब बच्चा बाहर जाएगा। कोई
सेठ उसे गोद ले लेगा। अब इसका जीवन सुधरेगा।
लेकिन किसी ने नहीं
देखा कि नीलू मंदिर के बाहर पत्थर पर बैठकर खामोशी से रो रहा था। वो रोते हुए नहीं
बोला। वो डरा हुआ था। रात जब भगवान नहीं आए। पहली बार नीलू मंदिर के अंदर नहीं था।
वो बाहर बरामदे में लेटा था। आसमान में बादल थे। हवा ठंडी थी। नीलू ने आंखें बंद
की और धीरे से कहा, आज आप आओगे ना? कोई जवाब नहीं। घंटियां
नहीं बजी, कोई आहट नहीं।
नीलू ने फिर कहा, अगर मैंने कुछ
गलत कहा हो तो माफ कर देना। लेकिन उस रात भगवान नहीं आए। दूसरा झटका जब लोग डर गए।
अगली सुबह मंदिर में कुछ अजीब हुआ। भोग बना लेकिन स्वाद कड़वा था। पुजारी हैरान।
फिर दूसरे दिन फूल मुरझा गए। तीसरे दिन घंटियां अपने आप बीच में रुक गई। लोग
फुसफुसाने लगे। बाबा नाराज है। बच्चे को निकालना ठीक नहीं हुआ। लेकिन तब तक नीलू
कहीं और जा चुका था। नीलू का नया रास्ता जहां सबको लगा अब अच्छा होगा। एक सेठ ने
नीलू को अपने घर ले लिया। बड़ा घर, नरम बिस्तर, भरपेट खाना। लोग बोले, देखो भगवान ने दे दिया। अब सब ठीक है।
लेकिन पहली रात नीलू बिस्तर पर बैठा रहा। खाना नहीं खाया।
सेठ की पत्नी बोली, क्या हुआ? नीलू बोला, यहां वो नहीं आते। सब हंस
पड़े। सबसे बड़ा ट्विस्ट जहां सब गलत साबित हुआ। तीसरी रात नीलू तेज बुखार में
कांप रहा था। डॉक्टर आए दवा दी। लेकिन नीलू बार-बार बड़बड़ा रहा था। मैं मैं गलत
जगह आ गया। वो मुझे यहां नहीं ढूंढ पाएंगे। सेठ डर गया। उसी रात मंदिर में घंटी
अपने आप जोर से बज उठी और मुख्य पुजारी बेचैन होकर उठ बैठे। उन्हें सपना आया।
जगन्नाथ जी बोले जिसे तुमने बाहर किया वो मेरा है। सुबह होते ही सेठ नीलू को लेकर
मंदिर भागा। लेकिन सवाल यह था क्या नीलू जीवित रहेगा? क्या भगवान वापस आएंगे? या अब बहुत देर हो चुकी
है? और सबसे बड़ा
सवाल क्या हर बार भगवान जल्दी सुनते हैं तो वह अच्छा ही होता है? जब भगवान समय पर नहीं आए
और सब ने मान लिया कि अब बहुत देर हो चुकी है। वह सुबह जो किसी की जिंदगी बदल देती
है। सुबह का सूरज निकला लेकिन पूरी की हवा में वो शांति नहीं थी। मंदिर के बाहर
लोग चुप थे। कोई घंटी नहीं कोई मंत्र नहीं।
सेठ की गाड़ी मंदिर
के सामने रुकी। नीलू अंदर था। कमजोर तपता हुआ आंखें अध खुली। मुख्य पुजारी आगे
बढ़े। जल्दी करो। डॉक्टर घुसफुसाए। बच्चे की हालत बिगड़ रही है। नीलू ने अचानक
आंखें खोली। उसकी आवाज बहुत धीमी थी। आज वो आएंगे। किसी के पास जवाब नहीं था।
मंदिर के अंदर जहां सब कुछ गलत लग रहा था। नीलू को गर्भगृह के पास लाया गया। वो
जगह जहां आम लोगों को जाने की इजाजत नहीं होती। पुजारी कांप रहे थे। ऐसा पहले कभी
नहीं हुआ था। नीलू ने आंखें बंद की और बहुत धीरे से बोला नहीं आए अगर आप नहीं आए
तो मैं सो जाऊंगा। यह सुनकर एक बुजुर्ग सेवायत रो पड़े। जब लोगों ने पहली बार
भगवान से सवाल किया भीड़ के बीच एक आदमी चिल्लाया। अगर भगवान दोस्त हैं तो अब कहां
है? किसी और ने कहा, क्या भगवान बंदों से भी
देर कर सकते हैं? पहली बार पूरी
में लोग भगवान से सवाल कर रहे थे और भगवान अब भी चुप थे। वो क्षण जब सबको लगा अब
अंत है। नीलू की सांसे तेज हो गई। हाथ ठंडे पड़ने लगे। डॉक्टर ने सिर हिलाया। कुछ
नहीं कर सकते। सेठ की पत्नी फूट-फूट कर रो पड़ी। पुजारी ने आंखें बंद कर ली। अगर
भगवान दोद थे तो उन्होंने इसे नैन क्यों दिया? और उसी पल नीलू ने मुस्कुरा दिया। बहुत हल्की मुस्कान।
उसने फुसफुसा कर कहा। वो आ गए। सब चौंक गए। कहां? किसी ने पूछा नीलू बोला
पीछे उसी पल मंदिर के भीतर तेज हवा चली दिए कांपने लगे घंटी अपने आप बज उठी लेकिन
जगन्नाथ जी की मूर्ति हिली नहीं कोई चमत्कार नहीं कोई रोशनी नहीं लोग भ्रम में थे
अगर भगवान आए हैं तो दिख क्यों नहीं रहे सबसे दर्दनाक मोड़ नीलू की सांस अचानक थम
गई डॉक्टर ने कलाई छोड़ी धीमी आवाज में बोला अब नहीं मंदिर में एक साथ कई चीखें
उठी। सेठ घुटनों पर गिर पड़ा। पुजारी फूट-फूट कर रोने लगे। और उसी पल एक पुजारी ने
कांपती आवाज में कहा,
"अगर भगवान दोस्त थे, तो उन्होंने इसे
मरने क्यों दिया?" चुप्पी जो जवाब
से ज्यादा भारी थी। नीलू का शरीर शांत था। चेहरे पर डर नहीं था। बस एक अजीब सी
शांति। मंदिर के बाहर लोग बैठ गए। कोई बोल नहीं रहा था। पूरी ने पहली बार भगवान की
चुप्पी को इतना भारी महसूस किया। सवाल जो अब सबके थे। क्या भगवान देर कर गए? क्या दोस्ती भी नियमों से
हार गई? क्या भगवान सिर्फ
देने आते हैं या कभी लेने भी? और सबसे डरावना सवाल अगर भगवान ना आए तो विश्वास का क्या? रात होते ही मुख्य पुजारी
को एक और सपना आया।
लेकिन इस बार भगवान मुस्कुरा नहीं रहे थे। उन्होंने बस इतना
कहा तुम सब ने सोचा मैं देर कर गया लेकिन तुम नहीं जानते मैं उसे लेने नहीं छोड़ने
आया था। मैं उसे लेने नहीं छोड़ने आया था। वही रात जब सपना सिर्फ सपना नहीं था।
नीलू के जाने के बाद पूरी उस रात सो नहीं पाई। मंदिर के आंगन में अजीब सी ठंडक थी।
दिए बुझ चुके थे। लेकिन हवा में अगरबत्ती की खुशबू अब भी थी। मुख्य पुजारी अपने
कमरे में बैठे थे। आंखें खुली थी लेकिन मन कहीं और था। उन्होंने पहली बार अपने
जीवन में भगवान से कुछ नहीं मांगा। बस पूछा अगर वो आपका था तो आपने उसे हमसे क्यों
छोड़ लिया? उसी क्षण उनकी
आंख लग गई और उन्होंने खुद को मंदिर के गर्भ गृह में देखा। सब कुछ वैसा ही था जैसा
रोज होता है। मूर्ति वही,
दिए वही, फूल वही लेकिन एक फर्क
था। जगन्नाथ जी आज सिंहासन पर नहीं थे। वो नीचे खड़े थे और उनके पास नीलू बैठा था।
नीलू वैसा नहीं जैसा सबने देखा था। नीलू अब बीमार नहीं था। कमजोर नहीं था। उसके
कपड़े साफ थे। चेहरा शांत था। वो हंस रहा था और जगन्नाथ जी उसके बाल सहला रहे थे।
पुजारी कांप गए। उन्होंने पूछा अगर नीलू आपके पास है तो उसका शरीर। अगर नीलू आपके
पास है तो उसका शरीर भगवान ने उनकी तरफ देखा।
उनकी आंखों में ना
गुस्सा था ना करुणा। बस सच्चाई भगवान बोले तुम सब ने समझा मैं देर कर गया लेकिन
नीलू को कभी देर नहीं लगी पुजारी रो पड़े तो फिर वो क्यों गया प्रू भगवान जगन्नाथ
ने धीरे से कहा क्योंकि वह रुकने नहीं आया था भगवान बोले नीलू इस जीवन में कुछ
पाने नहीं आया था वो भेजा गया था ताकि तुम सब भक्ति और डर में फर्क समझ सको पुजारी
ने कांपते हुए पूछा पर उसने तो बहुत सहा भगवान की आवाज और गहरी हो गई जिसे मेरा
मित्र बनना हो उसे मेरा अकेलापन भी समझना पड़ता है। पुजारी ने वही सवाल दोहराया जो
सबके मन में था। आपने कहा था आप उसे लेने नहीं छोड़ने आए थे। भगवान जगन्नाथ
मुस्कुराए। हां नीलू को इस दुनिया से नहीं तुम्हारे भ्रम से छोड़ा। नीलू की आखिरी
इच्छा। भगवान ने नीलू की तरफ देखा। नीलू बोला अब वो मुझे भूलेंगे ना? अब वो मुझे भूलेंगे ना? भगवान ने सिर हिलाया।
नहीं लेकिन वो मुझे ढूंढेंगे गलत जगहों पर। नीलू मुस्कुराया कोई बात नहीं जब कोई
बच्चा रोएगा तो आप वहां रहना। भगवान की आंखें पहली बार नम हुई। पुजारी की आंख खुली
सुबह हो चुकी थी। लेकिन मन अब वैसा नहीं था। उन्होंने तुरंत मंदिर के सभी सेवायातों
को बुलाया और कहा आज से मंदिर में कोई बच्चा बाहर नहीं सोएगा। आज से भक्ति डर से
नहीं चलेगी। उसी दिन एक अनाथ बच्ची मंदिर के बाहर मिली। वह रो रही थी।
पुजारी ने उसे गोद
में उठाया और पहली बार जगन्नाथ मंदिर में एक छोटा सा कमरा बच्चों के लिए खोला गया।
लोग बोले नीलू चला गया लेकिन सच्चाई यह थी नीलू अब हर जगह था। कहानी अब सवाल नहीं
पूछती। वो चुप करा देती है। लेकिन अभी भी एक चीज बाकी है। अगर नीलू सिर्फ संदेश था
तो असली बदलाव कब आएगा? क्या भगवान सच
में किसी की मनोकामना जल्दी और किसी की देर से पूरी करते हैं? चमत्कार जो दिखा नहीं
लेकिन सबको बदल गया। उस सुबह पूरी में कुछ भी अलग नहीं दिख रहा था। सूरज वैसे ही
निकला। घंटियां वैसे ही बजी, भीड़ वैसे ही आई। लेकिन जिनकी आंखें खुल चुकी थी, उन्हें सब कुछ अलग लग रहा
था। मुख्य पुजारी पहली बार भीड़ से पहले मंदिर के बाहर खड़े थे। वहां जहां नीलू
बैठा करता था। नीलू की जगह पर आज एक छोटा सा कपड़ा रखा था। उस पर फूल नहीं थे।
दिया भी नहीं था। बस एक साधारण सी चटाई। एक सेवायत ने पूछा यह किसके लिए है? पुजारी ने कहा उसके लिए
जो आ जाएगा धीरे-धीरे फैलती बात। पहले दिन एक बच्चा आया।
दूसरे दिन दो तीसरे
दिन चार। कोई नहीं जानता था कि खबर कैसे फैली। बस इतना हुआ कि अब मंदिर के बाहर
कोई बच्चा अकेला नहीं बैठता था। पहला बदलाव पूजा में। एक दिन भोग की थाली आई।
पुजारी ने हाथ जोड़े और पहली बार यह शब्द बोले। अगर किसी बच्चे को आज भूख है तो
पहले उसे सेवायक चौंक गए पर किसी ने विरोध नहीं किया। लोगों के भीतर शुरू हुई
हलचल। भीड़ में एक आदमी फुसफुसाया। पहले भगवान से डर लगता था। अब थोड़ा अपना सा
लगता है। किसी ने कहा नीलू मर गया और किसी ने जवाब दिया, नहीं, नीलू समझ आ गया। जहां लोग
कुछ और चाहते थे। कुछ लोग नाराज भी थे। एक व्यापारी बोला, "हम सालों से चढ़ावा दे
रहे हैं। फिर भी हमारी मनोकामना नहीं पूरी होती।" दूसरा बोला, एक बच्चा आया और सब बदल
गया। पुजारी ने शांत स्वर में कहा, शायद बदलाव मंदिर में नहीं। हम में होना था। एक दिन बारिश
वे में एक शाम। तेज बारिश हो रही थी। मंदिर के बाहर एक बच्ची खड़ी थी। वो कुछ नहीं
बोली। बस देखती रही। पुजारी बाहर आए।
पूछा, किसे ढूंढ रही हो? बच्ची ने कहा, "मेरे दोस्त को।"
पुजारी की आंखें भर आई। नीलू की मौजूदगी बिना दिखे कई लोगों ने एक ही बात कही जब
भी किसी बच्चे को खाना मिलता है मुझे लगता है कोई मुस्कुरा रहा है। जब मंदिर शांत
होता है लगता है कोई बैठा सुन रहा है। कोई नाम नहीं लेता था पर सब जानते थे। मनोकामना
का सच धीरे-धीरे खुलता। एक दिन एक महिला आई रोते हुए बोली मैंने सालों से मांगा
कुछ नहीं मिला। पुजारी ने पूछा आज क्या चाहती हो? वो बोली बस समझना चाहती हूं देरी क्यों? पुजारी ने कहा क्योंकि
कुछ लोग मांगने आते हैं और कुछ तैयार होने। वो शाम जब मंदिर सबसे शांत था। उस शाम
कोई विशेष पूजा नहीं थी। कोई घोषणा नहीं। बस दिए जल रहे थे और गर्भगृह के पास एक
छोटा सा बच्चा धीरे से बोला। आज वो आए थे। किसी ने पूछा कहां? बच्चा मुस्कुराया जब मुझे
डर लगा। तब अब सवाल बदल चुके थे। अगर चमत्कार शोर नहीं करता तो हम उसे पहचाने कैसे? और अगर भगवान जल्दी नहीं
देते तो क्या वो मना कर रहे होते हैं? कुछ प्रार्थनाएं तुरंत क्यों सुनी जाती है? और कुछ को सालों इंतजार
क्यों करना पड़ता है? समय बीतता है पर
सवाल नहीं।
नीलू गए हुए अब कई
महीने हो चुके थे। मंदिर वैसा ही था लेकिन लोग वैसे नहीं रहे। अब लोग मंदिर आते थे
पर पहले जैसे नहीं। पहले लोग पूछते थे मुझे यह चाहिए। मेरा यह कर दो। अब लोग पूछते
थे मैं क्यों मांग रहा हूं। पहला सच जिसे कोई सुनना नहीं चाहता। एक दिन एक बूढ़ा
व्यक्ति आया। उसकी पीठ झुकी थी। आवाज थकी हुई। उसने पुजारी से कहा, "मैं 30 साल से पूजा कर रहा हूं।
फिर भी मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई।" पुजारी ने पहली बार सीधा जवाब दिया
क्योंकि आप भगवान से नहीं डर से जुड़े हुए थे। बूढ़ा आदमी चौंक गया और डर और भक्ति
का फर्क। पुजारी बोले जब कोई बच्चा रोता है वो डर से नहीं रोता। वो भरोसे से रोता
है। नीलू इसलिए सुना गया क्योंकि उसे खोने का डर नहीं था। भीड़ में सन्नाटा छा
गया। समय का रहस्य एक और आदमी बोला तो क्या भगवान समय देखकर देते हैं? पुजारी मुस्कुराए नहीं।
भगवान देख कर देते हैं कि तुम संभाल पाओगे या नहीं। भारी हाथ खाली हाथ। पुजारी ने
जमीन से एक पत्थर उठाया। फिर एक फूल और कहा भरा हुआ हाथ फूल नहीं पकड़ सकता और भरा
हुआ मन भगवान नहीं। भीड़ में कई लोग आंखें झुका गए।
जब देर असल में दया
होती है। एक महिला रोते हुए बोली मैंने मांगा था कि मेरा बेटा बच जाए भगवान ने
नहीं सुना। पुजारी ने धीरे से कहा। शायद उन्होंने सुना। पर वो दर्द आपके लिए जरूरी
था। यह सुनकर कुछ लोग उठकर चले गए। सच हर किसी के लिए नहीं होता। नीलू की याद फिर
से। उसी समय एक छोटा बच्चा मंदिर के बाहर बैठा था। उसने बिना किसी कारण कहा। वो
कहते थे अगर अभी नहीं मिला तो मतलब अभी उठाने लायक नहीं हूं। सब ठिठक गए। तीसरा सच
बच्चा ही क्यों चुना गया?
एक सेवायत ने
पूछा भगवान ने बच्चा ही क्यों चुना? पुजारी बोले क्योंकि बच्चे हिसाब नहीं रखते। वह दोस्ती करते
हैं। जब लोग टूटते हैं तब भगवान काम करते हैं। पुजारी ने आखिरी बात कही। भगवान
देने से पहले इंसान को तोड़ते नहीं खाली करते हैं और जो खाली होना स्वीकार कर ले
उसे इंतजार नहीं लगता। अब कहानी अपने आखिरी मोड़ पर है। सिर्फ एक सवाल बचा है।
क्या नीलू का असर सिर्फ मंदिर तक था या उससे बाहर भी? क्या भगवान आखिरी बार कोई
संकेत देंगे? आखिरी संकेत जो
भगवान ने शब्दों में नहीं दिया। वह सुबह जो किसी ने नोटिस नहीं की। उस सुबह पूरी
में कुछ भी अलग नहीं दिख रहा था। ना कोई चमत्कार, ना कोई घोषणा, ना कोई आवाज। लेकिन मंदिर के बाहर एक छोटा सा
दृश्य था जिसे ज्यादातर लोगों ने देखकर भी अनदेखा कर गए।
एक बच्चा मंदिर की
सीढ़ियों पर बैठा था। उसके पैरों में चप्पल नहीं थी। हाथ में कोई कटोरा नहीं था।
वो बस दिए की लौ को देख रहा था। एक सवाल जो कहानी को पूरा करता है। एक आदमी रुका।
पूछा तू यहां क्यों बैठा है? बच्चे ने ऊपर देखा और वही जवाब दिया जो कभी नीलू देता था।
अपने दोस्त का इंतजार कर रहा हूं। आदमी ठिठक गया। बिना दिखे हुआ चमत्कार। उसी पल
हवा हल्की सी चली। दिए की लौ सीधी खड़ी हो गई। घंटी नहीं बजी। मूर्ति नहीं हिली।
लेकिन जो वहां खड़े थे उन्हें ऐसा लगा कोई सुन रहा है। नीलू की कहानी अब किसी एक
की नहीं। धीरे-धीरे मंदिर के बाहर और बच्चे आने लगे। कोई रो नहीं रहा था। कोई मांग
नहीं कर रहा था। बस बैठे थे और मंदिर पहली बार इतना शांत था। आखिरी समझ जो देर से
आती है। मुख्य पुजारी सीढ़ियों पर बैठ गए और बोले हम भगवान को अपने समय में बांधना
चाहते थे। पर भगवान इंसान को समय के लायक बनाते हैं। सबसे भारी पंक्ति पुजारी ने
आंखें बंद की और बहुत धीरे से कहा। नीलू को भगवान ने नहीं छोड़ा। भगवान ने हमें
छोड़ा था। हमारी शर्तों के साथ जहां कहानी आपसे जुड़ती है। शाम को एक मां अपने
बच्चे का हाथ पकड़ कर मंदिर से बाहर निकली। बच्चे ने पूछा मां भगवान कहां रहते हैं? मां रुकी।
फिर बोली जहां डर नहीं होता। बच्चा मुस्कुराया। अंतिम शब्द लोग कहते हैं भगवान कुछ लोगों की प्रार्थना तुरंत सुन लेते हैं और कुछ को इंतजार करवाते हैं। लेकिन सच यह है भगवान कभी देर नहीं करते। वो बस तय करते हैं कि कौन मांग रहा है और कौन भरोसा कर रहा है। अंतिम पंक्ति आफ्टर साइलेंस। अगर आज भगवान चुप है तो समझ लेना वो काम कर रहे हैं और शायद तुम्हारे भीतर।
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