लालच की नींव
गंगा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा-सा गाँव था—सूरजपुर। यह गाँव अपने शांत
वातावरण, सादे लोगों और आपसी प्रेम के लिए जाना जाता था। गाँव में कच्चे-पक्के मकान थे,
सुबह-शाम मंदिर
की घंटी बजती थी और बच्चे नंगे पाँव गलियों में खेलते फिरते थे। सूरजपुर में एक ही
सरकारी स्कूल था, जो देखने में भले ही साधारण लगता था, लेकिन वही गाँव के बच्चों
की शिक्षा का एकमात्र सहारा था। इसी स्कूल में पढ़ाते थे मास्टर हरिदत्त शर्मा,
जिन्हें लोग
सम्मान से “शर्मा जी मास्टर” कहते थे।
मास्टर हरिदत्त शर्मा पढ़े-लिखे और बुद्धिमान व्यक्ति थे। उनकी उम्र लगभग
पैंतालीस वर्ष थी, सिर पर हल्की सफेदी और आँखों पर मोटे शीशों का चश्मा। बाहर
से देखने पर वे एक आदर्श शिक्षक लगते थे—सफेद धोती-कुर्ता, हाथ में किताबें और मुँह पर
गंभीर भाव। गाँव के लोग उन्हें ईमानदार और सख्त शिक्षक मानते थे, लेकिन उनके मन
के भीतर छिपा हुआ लालच किसी को दिखाई नहीं देता था। वे मानते थे कि दुनिया में
बिना पैसे के कोई इज्जत नहीं होती और शिक्षक की तनख्वाह में कभी सुख नहीं मिल
सकता।
शुरुआत में हरिदत्त शर्मा भी बाकी शिक्षकों की तरह ईमानदारी से पढ़ाते थे।
लेकिन समय के साथ उनके मन में असंतोष बढ़ने लगा। जब वे देखते कि गाँव के प्रधान,
पटवारी या
व्यापारी अच्छे कपड़े पहनते हैं और सम्मान से जीते हैं, तब उनके दिल में जलन पैदा
होती थी। वे सोचते, “मैं बच्चों को ज्ञान देता हूँ, समाज को बनाता हूँ, फिर भी मेरी
हालत इनसे खराब क्यों है?” यही सोच धीरे-धीरे उनके मन में लालच का बीज बोने लगी।
एक दिन स्कूल में नया सत्र शुरू हुआ। गरीब किसान, मजदूर और छोटे दुकानदार
अपने बच्चों को दाख़िला दिलाने आए। मास्टर हरिदत्त ने वहीं से अपने लालच को अमल
में लाना शुरू किया। वे बच्चों के माता-पिता से कहते कि सरकारी नियमों के अनुसार
कुछ “अतिरिक्त खर्च” देना होगा, तभी दाख़िला संभव है। भोले-भाले ग्रामीण नियम नहीं जानते थे,
इसलिए डर के
मारे जो थोड़ा-बहुत उनके पास था, वही दे देते। किसी ने मुर्गी दी, किसी ने अनाज, किसी ने
पाँच-दस रुपये—और मास्टर हरिदत्त सब स्वीकार करते गए।
धीरे-धीरे यह बात पूरे गाँव में फैलने लगी, लेकिन कोई खुलकर विरोध नहीं
कर पाया। लोग सोचते थे कि अगर मास्टर नाराज़ हो गए तो बच्चों का भविष्य खराब हो
जाएगा। मास्टर हरिदत्त इस डर का फायदा उठाते थे। वे कमजोर छात्रों को जानबूझकर कम
अंक देते और फिर कहते कि अगर ट्यूशन रख लो या “थोड़ी मदद” कर दो, तो नंबर बढ़
सकते हैं। इस तरह उन्होंने स्कूल को अपनी कमाई का साधन बना लिया।
स्कूल में एक बच्चा था—रामू। वह बेहद गरीब परिवार से आता था, लेकिन पढ़ने
में बहुत होशियार था। रामू के पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के
घरों में बर्तन माँजती थी। रामू दिन-रात मेहनत करता, लेकिन परीक्षा में उसे
हमेशा उम्मीद से कम अंक मिलते। एक दिन उसने साहस करके मास्टर हरिदत्त से पूछा कि
उसकी कॉपी में इतनी गलतियाँ कहाँ हैं। मास्टर ने गुस्से में उसे डाँट दिया और कहा
कि बिना “मेहनत” के कुछ नहीं मिलता। रामू समझ गया कि मास्टर की मेहनत का मतलब पढ़ाई
नहीं, बल्कि पैसा है।
रामू का मन टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह जानता था कि उसका परिवार पैसे
नहीं दे सकता, इसलिए उसने और ज्यादा मेहनत शुरू कर दी। दूसरी ओर मास्टर
हरिदत्त का लालच बढ़ता ही जा रहा था। उन्होंने अपने लिए नया रेडियो खरीदा, अच्छे कपड़े
सिलवाए और गाँव में अपनी हैसियत दिखाने लगे। वे लोगों से कहते, “शिक्षक होना
आसान नहीं, हम ही बच्चों को इंसान बनाते हैं।” लेकिन भीतर ही भीतर उनका ज़मीर उन्हें
कचोटता था, जिसे वे पैसे के शोर में दबा देते थे।
एक दिन स्कूल में निरीक्षण की सूचना आई। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी आने वाले थे।
मास्टर हरिदत्त घबरा गए। उन्होंने स्कूल की साफ-सफाई करवाई, बच्चों को रटा-रटाया जवाब
सिखाया और कुछ गरीब बच्चों को उस दिन स्कूल न आने का आदेश दिया, ताकि उनकी
कमजोर हालत किसी को न दिखे। निरीक्षण ठीक-ठाक रहा और मास्टर ने राहत की साँस ली।
इस घटना के बाद उनका हौसला और बढ़ गया। उन्हें लगने लगा कि वे सब कुछ संभाल सकते
हैं।
समय बीतता गया और मास्टर हरिदत्त के भीतर का लालच अब आदत बन चुका था। वे हर
चीज़ को पैसों से तौलने लगे—अंक, दाख़िला, प्रशंसा, यहाँ तक कि बच्चों का भविष्य भी। गाँव का स्कूल शिक्षा का
मंदिर कम और सौदेबाज़ी का अड्डा ज़्यादा बन गया। कुछ बच्चे स्कूल छोड़ने लगे,
कुछ चुपचाप
अन्याय सहते रहे। गाँव वालों के मन में डर और नाराज़गी दोनों थे, लेकिन कोई
आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
इसी बीच गाँव में एक नया व्यक्ति आया—शिवनारायण वर्मा, जो शहर में पढ़े-लिखे थे और
अपने पुश्तैनी घर की देखभाल के लिए सूरजपुर आए थे। उन्होंने स्कूल की हालत देखी और
बच्चों से बातें कीं। उन्हें कुछ गड़बड़ महसूस हुई, लेकिन अभी उन्होंने कुछ कहा
नहीं। मास्टर हरिदत्त को इस नए आदमी से अनजानी-सी बेचैनी होने लगी, मानो उनका राज
धीरे-धीरे उजागर होने वाला हो।
लालच की इस नींव पर खड़ी कहानी अब एक मोड़ की ओर बढ़ रही थी, जहाँ मास्टर
हरिदत्त के कर्मों का हिसाब होना तय था, लेकिन अभी उन्हें इसका एहसास नहीं था।
डर, दबाव और विद्रोह की चिंगारी
शिवनारायण वर्मा के गाँव में आने के बाद सूरजपुर के माहौल में एक अजीब-सी हलचल
महसूस होने लगी थी। वे रोज़ सुबह स्कूल के सामने से गुजरते, बच्चों को ध्यान से देखते
और कभी-कभी उनसे हालचाल पूछ लेते। बच्चे शुरू में उनसे झिझकते थे, लेकिन उनके
स्नेहभरे व्यवहार ने धीरे-धीरे बच्चों का भरोसा जीत लिया। कई बच्चों ने पहली बार
किसी बड़े को बिना डाँट के, बिना डर के बात करते देखा था। शिवनारायण को बच्चों की आँखों
में छिपा डर और असंतोष साफ़ दिखाई देता था।
उधर मास्टर हरिदत्त शर्मा की नज़र भी शिवनारायण पर बनी रहती थी। उन्हें डर था
कि कहीं यह नया आदमी उनकी पोल न खोल दे। इसलिए वे और सख्त हो गए। स्कूल में
ज़रा-सी गलती पर बच्चों को दंड दिया जाने लगा। जो बच्चे पैसे या तोहफ़े नहीं लाते
थे, उन्हें कक्षा में अपमानित किया जाता। मास्टर कहते, “बिना अनुशासन के शिक्षा
नहीं मिलती,” लेकिन उनका अनुशासन सिर्फ़ गरीबों के लिए था।
रामू अब आठवीं कक्षा में पहुँच चुका था। उसकी समझ बढ़ चुकी थी। वह जानता था कि
मास्टर की नीयत गलत है, लेकिन उसके भीतर डर भी था। एक दिन गणित की परीक्षा में उसने
लगभग सभी सवाल सही किए थे, फिर भी उसे औसत अंक मिले। जब उसने कॉपी देखी, तो पाया कि सही
उत्तरों पर भी लाल निशान लगे थे। उसका दिल बैठ गया। उस दिन घर आकर वह देर तक चुप
बैठा रहा। माँ ने पूछा तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले। पहली बार उसने अपने
माता-पिता को स्कूल की सच्चाई बताई।
रामू के पिता ने गहरी साँस ली। वे बोले, “बेटा, हम गरीब लोग
हैं। मास्टर से दुश्मनी मोल लेंगे तो पढ़ाई बंद हो जाएगी।” यह बात रामू को चुभ गई।
उसे लगा जैसे गरीबी ही सबसे बड़ा अपराध हो। उसी रात उसने मन ही मन ठान लिया कि वह
चुप नहीं बैठेगा।
अगले दिन स्कूल में मास्टर हरिदत्त ने सबके सामने रामू को खड़ा किया और कहा कि
वह अनुशासनहीन है। बच्चों के सामने उसे नीचा दिखाया गया। लेकिन इस बार रामू की
आँखों में डर नहीं था। उसने सिर झुकाने के बजाय मास्टर की आँखों में देखा। यह
देखकर मास्टर को गुस्सा आ गया। उन्होंने रामू को कक्षा से बाहर निकाल दिया। यह
घटना कई बच्चों ने देखी और उनके मन में भी सवाल उठने लगे।
धीरे-धीरे रामू अकेला नहीं रहा। कुछ और बच्चे—सीता, मोहन, गीता—भी उसके
पास आने लगे। सबकी कहानी एक जैसी थी। किसी से पैसे माँगे गए, किसी को
जानबूझकर फेल किया गया। ये बच्चे डरते थे, लेकिन अब उनके डर से बड़ा हो चुका था उनका
गुस्सा। रामू ने उन्हें शिवनारायण वर्मा के बारे में बताया। सबने तय किया कि वे
उनसे बात करेंगे।
एक शाम सभी बच्चे शिवनारायण के घर पहुँचे। पहले तो वे चुप रहे, फिर रामू ने
हिम्मत जुटाकर सारी बात कह दी। बच्चों की बातें सुनकर शिवनारायण का चेहरा गंभीर हो
गया। उन्हें यकीन हो गया कि स्कूल में कुछ बहुत गलत चल रहा है। उन्होंने बच्चों को
भरोसा दिलाया कि सच का साथ देने वालों को कोई नुकसान नहीं होने देंगे। पहली बार
बच्चों को लगा कि कोई बड़ा उनके साथ खड़ा है।
इधर मास्टर हरिदत्त का लालच अब और बढ़ गया था। उन्होंने सोचा कि अगर थोड़े और
पैसे इकट्ठा कर लिए जाएँ, तो वे शहर में ज़मीन खरीद सकते हैं। वे बच्चों पर और दबाव
डालने लगे। यहाँ तक कि उन्होंने परीक्षा में पास करने के बदले खुलेआम पैसे माँगने
शुरू कर दिए। कुछ माता-पिता मजबूरी में दे देते, लेकिन कुछ के पास देने को
कुछ भी नहीं था। ऐसे घरों में बच्चों की पढ़ाई खतरे में पड़ गई।
गाँव में धीरे-धीरे फुसफुसाहट शुरू हो गई। लोग एक-दूसरे से कहते, “मास्टर ठीक
नहीं हैं,” लेकिन सामने बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी। हरिदत्त शर्मा गाँव में अपनी
पहुँच और डर का पूरा इस्तेमाल कर रहे थे। वे कहते, “अगर शिकायत करोगे तो बच्चों
का नाम कटवा दूँगा।” इस धमकी ने कई मुँह बंद कर दिए।
शिवनारायण वर्मा ने चुपचाप सबूत इकट्ठा करना शुरू किया। उन्होंने बच्चों की
कॉपियाँ देखीं, कुछ माता-पिता के बयान लिखे और स्कूल की स्थिति का जायज़ा
लिया। उन्हें पता था कि बिना सबूत के कुछ भी करना बेकार है। वे धैर्य से सही समय
का इंतज़ार करने लगे।
मास्टर हरिदत्त को अब बेचैनी होने लगी थी। उन्हें लग रहा था कि गाँव के लोग
पहले जैसे डरते नहीं हैं। बच्चों की आँखों में अब झुकी हुई नजरें नहीं, बल्कि सवाल
दिखाई देने लगे थे। रात को वे चैन से सो नहीं पाते। उन्हें सपने में बच्चे,
कॉपियाँ और
सवाल घेर लेते। लेकिन सुबह होते ही वे फिर अपने लालच की ढाल ओढ़ लेते।
लालच, डर और अन्याय की यह कहानी अब उस मोड़ पर पहुँच रही थी जहाँ चुप्पी टूटने वाली
थी। एक छोटी-सी चिंगारी पूरे गाँव में आग लगा सकती थी, और मास्टर हरिदत्त को इसका
अंदाज़ा तक नहीं था कि उनका अंत अब दूर नहीं है।
सच की जाँच और लालच का पर्दाफ़ाश
सूरजपुर गाँव में अब पहले जैसी शांति नहीं रही थी। हवा में एक अनकहा तनाव घुल
गया था। लोग आपस में कम बोलते, लेकिन आँखों से बहुत कुछ कह जाते। बच्चों के चेहरे पर डर की
जगह एक अजीब-सा साहस दिखाई देने लगा था। मास्टर हरिदत्त शर्मा यह सब महसूस कर रहे
थे, मगर अपने घमंड और लालच के कारण वे इसे गंभीरता से नहीं ले रहे थे। उन्हें लगता
था कि कुछ दिनों में सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा।
शिवनारायण वर्मा ने अंततः कदम उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने ब्लॉक शिक्षा
कार्यालय में एक लिखित शिकायत दी, जिसमें स्कूल की हालत, मास्टर की गतिविधियाँ और
बच्चों के साथ हो रहे अन्याय का पूरा विवरण था। शिकायत के साथ बच्चों की कॉपियाँ,
कुछ माता-पिता
के बयान और अपनी ओर से तैयार की गई रिपोर्ट भी लगाई गई। यह शिकायत अब काग़ज़ का एक
टुकड़ा नहीं थी, बल्कि गाँव के दबे हुए दर्द की आवाज़ थी।
शिकायत पहुँचते ही शिक्षा विभाग हरकत में आया। कुछ ही दिनों में जाँच समिति के
आने की सूचना मिल गई। यह खबर सुनते ही मास्टर हरिदत्त के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उन्होंने सोचा था कि उनका रसूख़ और डर सब संभाल लेगा, लेकिन इस बार मामला हाथ से
निकलता दिख रहा था। उन्होंने तुरंत अपनी चालें चलनी शुरू कर दीं। कुछ माता-पिता को
बुलाकर डराया गया, कुछ को लालच दिया गया कि अगर वे उनके पक्ष में बोलेंगे तो
बच्चों को पास करा दिया जाएगा।
जाँच वाले दिन स्कूल के बाहर पूरे गाँव की भीड़ इकट्ठा हो गई। पहली बार लोगों
में डर से ज़्यादा उत्सुकता और उम्मीद थी। जाँच समिति के अधिकारी कक्षा में गए,
बच्चों से सवाल
पूछे और उनकी कॉपियाँ जाँचीं। कई कॉपियों में साफ़ दिख रहा था कि सही उत्तरों पर
भी गलत का निशान लगाया गया था। बच्चों से जब अकेले में बात की गई, तो कई मासूम
आवाज़ों ने काँपते हुए सच कह दिया।
रामू को भी बुलाया गया। उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने पूरी ईमानदारी
से सब बता दिया—कैसे पैसे माँगे गए, कैसे उसे अपमानित किया गया, और कैसे उसकी
मेहनत को नज़रअंदाज़ किया गया। उसकी बात सुनकर अधिकारियों की आँखों में गंभीरता आ
गई। रामू के बाद एक-एक करके और बच्चे आगे आए। हर बयान मास्टर हरिदत्त के खिलाफ़ एक
और सबूत बनता गया।
अब मास्टर हरिदत्त की बारी थी। वे आत्मविश्वास दिखाने की कोशिश कर रहे थे,
लेकिन उनकी
आवाज़ लड़खड़ा रही थी। उन्होंने कहा कि बच्चे झूठ बोल रहे हैं, कि यह सब किसी
की साज़िश है। लेकिन जब सबूत सामने रखे गए, तो उनके पास कहने को कुछ
नहीं बचा। गाँव वालों की नज़रें अब उन पर थीं—वही नज़रें जिनसे वे कभी डर दिखाकर
काम निकाल लेते थे।
जाँच समिति ने स्कूल के रिकॉर्ड भी खँगाले। अतिरिक्त शुल्क, गैरकानूनी
ट्यूशन और उपहारों का पूरा हिसाब सामने आ गया। मास्टर हरिदत्त का लालच अब पूरी तरह
उजागर हो चुका था। अधिकारी ने साफ़ शब्दों में कहा कि शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में
इस तरह का व्यवहार माफ़ नहीं किया जा सकता।
उस दिन मास्टर हरिदत्त शर्मा को निलंबित कर दिया गया। यह खबर पूरे गाँव में आग
की तरह फैल गई। कुछ लोग खुश थे, कुछ हैरान, और कुछ शर्मिंदा कि उन्होंने इतने दिनों तक चुप्पी साधे
रखी। मास्टर हरिदत्त चुपचाप अपना सामान समेटते रहे। स्कूल से निकलते समय किसी ने
उन्हें रोका नहीं, किसी ने सम्मान से देखा भी नहीं। उनका सिर झुका हुआ था,
मानो पहली बार
उन्हें अपने कर्मों का बोझ महसूस हो रहा हो।
घर पहुँचकर वे देर तक खाली दीवारों को देखते रहे। रेडियो, कपड़े, और जमा किया
हुआ पैसा—सब कुछ होते हुए भी उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि वे अंदर से कितने खोखले
हो चुके हैं। बच्चों के चेहरे, उनकी आँखों के आँसू और रामू की सच्ची आवाज़ उनके कानों में
गूँजती रही। लालच की जीत अस्थायी थी, लेकिन उसकी कीमत बहुत भारी थी।
कुछ दिनों बाद स्कूल में एक नए शिक्षक की नियुक्ति हुई। पढ़ाई फिर से पटरी पर
आने लगी। बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। रामू और उसके साथी अब बिना डर के
सवाल पूछ सकते थे। गाँव वालों ने भी सीखा कि अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाना ज़रूरी
है, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मास्टर हरिदत्त के जीवन में अभी एक और
अध्याय लिखा जाना बाकी था—पश्चाताप और आत्मबोध का अध्याय, जहाँ उन्हें यह समझना था कि
लालच ने उनसे क्या-क्या छीन लिया।
पश्चाताप, पतन और आत्मबोध
मास्टर हरिदत्त शर्मा के जीवन में अब सब कुछ बदल चुका था। जिस स्कूल को वे कभी
अपनी ताक़त समझते थे, वही उनसे छिन गया था। निलंबन के बाद वे अपने ही घर में
अजनबी-से हो गए थे। सुबह अब किसी घंटी की आवाज़ से नहीं खुलती थी, न ही बच्चों की
चहल-पहल सुनाई देती थी। दिन भर वे आँगन में पड़ी टूटी कुर्सी पर बैठे रहते और बीते
दिनों को याद करते रहते। लालच से भरा उनका आत्मविश्वास अब पछतावे में बदल चुका था।
गाँव वाले जो कभी उन्हें “मास्टर जी” कहकर बुलाते थे, अब रास्ता बदल लेते थे। कोई
बात नहीं करता, कोई सम्मान नहीं देता। यह चुप्पी उन्हें सबसे ज़्यादा चुभती
थी। पहले उन्हें लगता था कि पैसा सब कुछ दिला देता है, लेकिन अब समझ में आने लगा
था कि इज़्ज़त खरीदी नहीं जा सकती। घर में रखा रेडियो, महंगे कपड़े और जमा किया
गया पैसा उन्हें बेकार लगने लगा। वे सोचते, “अगर यही सब चाहिए था,
तो शिक्षक
क्यों बना?”
एक दिन उनके पुराने सहकर्मी, मास्टर बद्रीनाथ, उनसे मिलने आए। बद्रीनाथ ईमानदार और सरल स्वभाव
के शिक्षक थे। उन्होंने बिना कटुता के कहा, “हरिदत्त जी, गलती इंसान से
होती है, लेकिन उसे स्वीकार करना और सुधारना उससे बड़ा काम है।” यह बात मास्टर हरिदत्त
के दिल में उतर गई। पहली बार किसी ने उन्हें बिना डर और बिना लालच के सच कहा था।
रात को उन्हें नींद नहीं आई। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी को जैसे फिर से जी
लिया—शुरुआती ईमानदारी, फिर जलन, फिर लालच और अंत में पतन। उन्हें रामू का चेहरा याद आया,
उसकी मेहनत और
उसकी सच्चाई। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने सिर्फ़ नियम नहीं तोड़े, बल्कि कई सपनों
को चोट पहुँचाई। उस रात उनकी आँखों से आँसू बहते रहे। यह आँसू डर के नहीं, पश्चाताप के
थे।
कुछ दिनों बाद जाँच पूरी हुई और अंतिम फ़ैसला आया। मास्टर हरिदत्त को नौकरी से
बर्खास्त कर दिया गया। यह उनके लिए सबसे बड़ा झटका था, लेकिन कहीं न कहीं वे इसके
लिए तैयार भी थे। अब उनके पास खोने को कुछ नहीं बचा था, सिवाय अपने अहंकार के।
उन्होंने बर्खास्तगी का आदेश हाथ में लेकर देर तक देखा और फिर उसे मोड़कर रख दिया।
उन्हें लगा कि यह काग़ज़ उनके कर्मों का प्रमाण है।
आर्थिक स्थिति भी बिगड़ने लगी। जमा किया हुआ पैसा इलाज और ज़रूरतों में खर्च
होने लगा। जिन लोगों को उन्होंने कभी लाभ पहुँचाया था, वे अब साथ देने नहीं आए। तब
उन्हें समझ आया कि लालच से बने रिश्ते कितने खोखले होते हैं। कठिन समय में सिर्फ़
सच्चाई और अच्छे कर्म ही साथ देते हैं।
एक सुबह वे बिना किसी को बताए गाँव से बाहर निकल पड़े। वे पास के शहर पहुँचे
और वहाँ एक छोटे से पुस्तकालय में काम माँगा। पुस्तकालय के मालिक ने उनकी हालत
देखकर उन्हें पुरानी किताबें सँभालने का काम दे दिया। यह काम छोटा था, लेकिन ईमानदार
था। किताबों के बीच रहते हुए उन्हें फिर से ज्ञान की कीमत समझ आने लगी। वे बच्चों
को पढ़ाते नहीं थे, लेकिन किताबों के शब्द उन्हें चुपचाप बहुत कुछ सिखा रहे थे।
कभी-कभी पुस्तकालय में गरीब बच्चे पढ़ने आते। मास्टर हरिदत्त उन्हें देखकर
ठिठक जाते। पहले वे उनसे नज़र चुरा लेते थे, लेकिन धीरे-धीरे वे बच्चों
की मदद करने लगे—बिना पैसे, बिना शर्त। किसी को गणित समझा देते, किसी को कहानी पढ़ा देते।
हर बार ऐसा करते हुए उनके मन का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता।
उन्हें समझ में आने लगा कि शिक्षा व्यापार नहीं, सेवा है। जिस दिन उन्होंने
इसे कमाई का साधन बनाया, उसी दिन से उनका पतन शुरू हो गया था। अब वे मन ही मन ईश्वर
से प्रार्थना करते कि उन्हें अपने पापों का प्रायश्चित करने का अवसर मिले। उनका
अहंकार टूट चुका था, लेकिन उसी टूटन से एक नया इंसान जन्म ले रहा था।
गाँव में इधर स्कूल पूरी तरह बदल चुका था। नए शिक्षक बच्चों को प्रेम और धैर्य
से पढ़ाते थे। रामू अब गाँव के सबसे अच्छे छात्रों में गिना जाने लगा था। उसकी
मेहनत रंग ला रही थी। यह खबर जब मास्टर हरिदत्त तक पहुँची, तो उनकी आँखें नम हो गईं।
उन्हें खुशी भी हुई और अफ़सोस भी।
अब कहानी अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही थी, जहाँ कर्म और प्रायश्चित का
पूरा हिसाब होना था।
प्रायश्चित, क्षमा और कहानी का संदेश
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। एक साल बीत चुका था। सूरजपुर गाँव में अब स्कूल
फिर से शिक्षा का मंदिर बन चुका था। बच्चों की हँसी, प्रश्नों की गूँज और नई
उम्मीदें स्कूल की दीवारों में बस चुकी थीं। रामू अब दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था
और पूरे ब्लॉक में अपनी मेहनत और ईमानदारी के लिए जाना जाने लगा था। उसके शिक्षक
उसे भविष्य का उज्ज्वल सितारा मानते थे। गाँव वालों को उस पर गर्व था।
इसी बीच एक दिन गाँव में खबर फैली कि पूर्व शिक्षक हरिदत्त शर्मा वापस आए हैं।
लोग हैरान थे। वही मास्टर, जिनके नाम से कभी डर लगता था, अब बिना किसी शोर के गाँव
में आए थे। उनके चेहरे पर उम्र और अनुभव की रेखाएँ साफ़ दिख रही थीं। चाल धीमी थी,
सिर झुका हुआ
और आँखों में अहंकार नहीं, बल्कि संकोच था। वे सीधे मंदिर गए और देर तक चुपचाप बैठे
रहे।
अगले दिन वे स्कूल पहुँचे। बच्चों ने उन्हें देखा, तो कुछ सहम गए, कुछ हैरान रह
गए। नए प्रधानाचार्य ने उन्हें रोका, लेकिन हरिदत्त ने विनम्रता से कहा कि वे सिर्फ़
बच्चों से मिलने और क्षमा माँगने आए हैं। अनुमति मिलने पर वे सभा में खड़े हुए।
उनकी आवाज़ भारी थी, लेकिन सच्ची थी। उन्होंने कहा कि लालच ने उनकी बुद्धि और
विवेक दोनों को अंधा कर दिया था। उन्होंने शिक्षा जैसे पवित्र कार्य को बदनाम किया
और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ किया। वे बोले कि उन्हें किसी दंड से ज़्यादा इस
बात का दुख है कि उन्होंने विश्वास तोड़ा।
सभा में सन्नाटा था। फिर उन्होंने रामू को बुलाया। रामू आगे आया। हरिदत्त ने
उसके सामने सिर झुकाया और कहा कि उसकी सच्चाई ने ही उन्हें अपने पाप का एहसास
कराया। यह दृश्य देखकर कई आँखें भर आईं। रामू ने कुछ पल सोचा, फिर बोला कि
गलती बड़ी थी, लेकिन स्वीकार करने का साहस भी उतना ही बड़ा है। उसने
उन्हें क्षमा कर दिया, क्योंकि उसने सीखा था कि माफ़ी से इंसान बड़ा बनता है।
मास्टर हरिदत्त की आँखों से आँसू बह निकले। वर्षों का बोझ जैसे उतर गया।
उन्होंने घोषणा की कि वे अपनी बची हुई जमा राशि से गाँव के गरीब बच्चों के लिए
किताबें और स्टेशनरी दिलवाएँगे। यह कोई दिखावा नहीं था, बल्कि उनके भीतर आए
परिवर्तन का प्रमाण था। गाँव वालों ने पहली बार उन्हें इंसान के रूप में देखा,
न कि एक लालची
शिक्षक के रूप में।
इसके बाद हरिदत्त शर्मा गाँव में नहीं रुके। वे वापस शहर लौट गए, जहाँ वे
पुस्तकालय में ही काम करने लगे और निःशुल्क शिक्षा से जुड़े कार्यों में सहयोग
देने लगे। अब उनका जीवन सादा था, लेकिन मन शांत था। उन्होंने समझ लिया था कि सच्ची समृद्धि
धन में नहीं, बल्कि सही कर्मों में होती है।
रामू की कहानी भी आगे बढ़ी। वह आगे चलकर शिक्षक बना—एक ऐसा शिक्षक, जो कभी बच्चों
की मजबूरी का फायदा नहीं उठाता था। वह अपने छात्रों को सिर्फ़ किताबें नहीं,
बल्कि जीवन का
सही मार्ग भी सिखाता था। हर बार जब वह कक्षा में प्रवेश करता, तो उसे याद आता
कि शिक्षक का एक गलत कदम कितने जीवन प्रभावित कर सकता है।
इस कहानी का संदेश साफ़ है—लालच इंसान को ऊँचाई नहीं, पतन की ओर ले
जाता है, और शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन
है। गलती करना मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन उसे स्वीकार कर सुधार करना ही सच्ची
महानता है।
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