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Showing posts from January, 2026

दो भाई की कहानी

  FULL STORY   N कड़ाके की ठंड अपनी पूरी ताकत के साथ गांव पर उतर आई थी। तालाब के किनारे बने कच्चे घर की दीवारों की दरारों से सर हवा सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मिट्टी के उस छोटे से घर   में टूटी चारपाई पर एक पुरानी पतली रजाई ओढ़े हरीलाल   और उसका बीटा सोहन सिमटे बैठे थे। SON बाबा घर में आटा भी खत्म हो चुका है और जलाने के लिए लकड़ियां भी नहीं बची हैं। अगर सुबह तक कुछ इंतजाम नहीं हुआ तो हम क्या खाएंगे और इतनी ठंड में रात कैसे गुजरेगी ? FATHER बेटा   आज पूरा दिन गांव में काम की तलाश में भटकता रहा। पर किसी ने एक वक्त की मजदूरी तक नहीं दी। जेब खाली है और दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है। समझ नहीं आ रहा कि किस दरवाजे पर जाऊं। SON आप फिर से जाइए बाबा। कहीं ना कहीं तो काम मिलेगा ही। जब तक आप हिम्मत नहीं हारेंगे , मैं भी नहीं हारूँगा । FATHER जाऊंगा बेटा   जरूर जाऊंगा। जब तक मेरे बूढ़े हाथ चल रहे हैं , तब तक तुझे भूखा पेट नहीं सोने दूंगा। N अगली सुबह धुंध के बीच हरीलाल   अलग-अलग घरों के दरवाजों पर जाता है। FATHER काकी कोई भी छोटा-मो...

बुद्धि की तराजू

बहुत समय पहले की बात है। गंगा के किनारे बसा एक समृद्ध नगर था— धनपुर । धनपुर अपने व्यापार , बाज़ार और सेठों की अमीरी के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। यहाँ दिन निकलते ही दुकानों के पट खुल जाते और शाम ढलते ही सोने-चाँदी की गिनती शुरू हो जाती। पर इस नगर की एक और पहचान थी—यहाँ के अधिकतर व्यापारी बड़े चालाक और स्वार्थी थे। वे मुनाफ़े के लिए धर्म और मानवता दोनों को ताक पर रख देते थे। इसी नगर में एक दिन चतुर ब्राह्मण का आगमन हुआ। वह लंबे समय से देश-देश घूम रहा था , लोगों को समझता , उनके स्वभाव को परखता और जहाँ अन्याय देखता , वहाँ अपनी बुद्धि से उसे उजागर करता। धनपुर में कदम रखते ही उसने महसूस किया कि यहाँ की हवा में ही लालच घुला हुआ है। हर चेहरे पर मुस्कान थी , पर आँखों में हिसाब-किताब चलता रहता था। नगर के बीचोंबीच एक विशाल बाजार था। चतुर ब्राह्मण वहीं एक पेड़ की छाया में बैठ गया और लोगों को देखने लगा। तभी उसकी नज़र एक बूढ़े किसान पर पड़ी , जो काँपते हाथों से अनाज की बोरी पकड़े खड़ा था। सामने बैठा था नगर का प्रसिद्ध व्यापारी सेठ कुबेरदास — नाम कुबेर का , पर मन में केवल धन की भूख। वह किसान से कह...

“सच्ची विद्वता की पहचान”

  गाँव का नाम था शिवपुर । वही पुराना शिवपुर , जहाँ के लोग सादे दिल के थे और जहाँ कभी-कभी चतुर ब्राह्मण अपनी बुद्धि के ऐसे चमत्कार दिखा जाता था कि लोग वर्षों तक उसकी चर्चा करते रहते थे। पिछली बार जब उसने लालची सेठ को उसकी ही चाल में फँसाया था , तब से पूरे गाँव में उसकी अक़्ल की धाक बैठ गई थी। लोग उसे सम्मान से देखते थे , पर कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके मन में ईर्ष्या पलने लगी थी। उन्हीं में से एक था पंडित हरिहर , जो स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान समझता था , पर भीतर से घमंडी और चालाक था। एक दिन की बात है। गाँव में खबर फैली कि पास के राज्य विजयनगर का राजा एक बड़ा यज्ञ कराने वाला है। राजा ने घोषणा करवाई थी कि जो भी विद्वान ब्राह्मण यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराएगा , उसे भारी इनाम मिलेगा—सोने की मुद्राएँ , रेशमी वस्त्र और राज्य से सम्मान। यह सुनते ही कई ब्राह्मणों के कान खड़े हो गए। पंडित हरिहर को लगा कि यही मौका है चतुर ब्राह्मण को नीचा दिखाने का। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस बार वह राजा के सामने स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान सिद्ध करेगा। उधर चतुर ब्राह्मण अपने घर के आँगन में बैठा त...