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Showing posts from February, 2026

ज्ञान का सौदा

  लालच की नींव गंगा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा-सा गाँव था—सूरजपुर। यह गाँव अपने शांत वातावरण , सादे लोगों और आपसी प्रेम के लिए जाना जाता था। गाँव में कच्चे-पक्के मकान थे , सुबह-शाम मंदिर की घंटी बजती थी और बच्चे नंगे पाँव गलियों में खेलते फिरते थे। सूरजपुर में एक ही सरकारी स्कूल था , जो देखने में भले ही साधारण लगता था , लेकिन वही गाँव के बच्चों की शिक्षा का एकमात्र सहारा था। इसी स्कूल में पढ़ाते थे मास्टर हरिदत्त शर्मा , जिन्हें लोग सम्मान से “शर्मा जी मास्टर” कहते थे। मास्टर हरिदत्त शर्मा पढ़े-लिखे और बुद्धिमान व्यक्ति थे। उनकी उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष थी , सिर पर हल्की सफेदी और आँखों पर मोटे शीशों का चश्मा। बाहर से देखने पर वे एक आदर्श शिक्षक लगते थे—सफेद धोती-कुर्ता , हाथ में किताबें और मुँह पर गंभीर भाव। गाँव के लोग उन्हें ईमानदार और सख्त शिक्षक मानते थे , लेकिन उनके मन के भीतर छिपा हुआ लालच किसी को दिखाई नहीं देता था। वे मानते थे कि दुनिया में बिना पैसे के कोई इज्जत नहीं होती और शिक्षक की तनख्वाह में कभी सुख नहीं मिल सकता। शुरुआत में हरिदत्त शर्मा भी बाकी शिक्षकों की त...

ज्ञान का सौदा

  लालच की नींव गंगा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा-सा गाँव था—सूरजपुर। यह गाँव अपने शांत वातावरण , सादे लोगों और आपसी प्रेम के लिए जाना जाता था। गाँव में कच्चे-पक्के मकान थे , सुबह-शाम मंदिर की घंटी बजती थी और बच्चे नंगे पाँव गलियों में खेलते फिरते थे। सूरजपुर में एक ही सरकारी स्कूल था , जो देखने में भले ही साधारण लगता था , लेकिन वही गाँव के बच्चों की शिक्षा का एकमात्र सहारा था। इसी स्कूल में पढ़ाते थे मास्टर हरिदत्त शर्मा , जिन्हें लोग सम्मान से “शर्मा जी मास्टर” कहते थे। मास्टर हरिदत्त शर्मा पढ़े-लिखे और बुद्धिमान व्यक्ति थे। उनकी उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष थी , सिर पर हल्की सफेदी और आँखों पर मोटे शीशों का चश्मा। बाहर से देखने पर वे एक आदर्श शिक्षक लगते थे—सफेद धोती-कुर्ता , हाथ में किताबें और मुँह पर गंभीर भाव। गाँव के लोग उन्हें ईमानदार और सख्त शिक्षक मानते थे , लेकिन उनके मन के भीतर छिपा हुआ लालच किसी को दिखाई नहीं देता था। वे मानते थे कि दुनिया में बिना पैसे के कोई इज्जत नहीं होती और शिक्षक की तनख्वाह में कभी सुख नहीं मिल सकता। शुरुआत में हरिदत्त शर्मा भी बाकी शिक्षकों की त...

लोभी भिक्षु

बहुत समय पहले हिमालय की तलहटी में एक शांत राज्य बसा था , जहाँ प्रकृति और साधना का अनोखा संगम देखने को मिलता था। उस राज्य से थोड़ा दूर एक प्राचीन बौद्ध मठ था , जहाँ भिक्षु आत्मज्ञान की खोज में अपना जीवन समर्पित कर देते थे। उसी मठ में भद्रसेन नाम का एक भिक्षु रहता था। बाहर से देखने पर वह अत्यंत शांत , संयमी और अनुशासित दिखाई देता था। उसकी आँखों में झुकी हुई विनम्रता , धीमी चाल और मधुर वाणी लोगों को यह विश्वास दिलाती थी कि वह सच्चा साधक है। मठ में आने वाले दानदाता और नए शिष्य उसे आदर की दृष्टि से देखते थे , पर कोई यह नहीं जानता था कि उसके मन के भीतर लोभ की गहरी जड़ें फैली हुई थीं। भद्रसेन का अतीत अभावों से भरा था। बचपन में उसने गरीबी का ऐसा रूप देखा था जिसने उसके मन में हमेशा के लिए डर बसा दिया था। कई बार वह बिना भोजन सोया , कई बार अपमान सहा। उसी पीड़ा ने उसके भीतर यह भावना पैदा कर दी थी कि जीवन में सबसे बड़ा खतरा खाली हाथ रह जाना है। जब वह बड़ा हुआ और मठ में आया , तब उसने सोचा कि भिक्षु बनने से उसे सुरक्षा मिलेगी , सम्मान मिलेगा और जीवन की अनिश्चितता समाप्त हो जाएगी। उसने त्याग का मार्...