बहुत समय पहले, पहाड़ों और जंगलों के बीच बसे एक छोटे-से गाँव के पास एक विशाल बरगद का पेड़ हुआ करता था। उस पेड़ की ऊँची शाखाओं पर असंख्य पक्षी बसेरा करते थे, पर उनमें सबसे छोटी और सबसे शांत थी एक नन्ही-सी चिड़िया। उसका रंग हल्का भूरा था, आवाज़ पतली-सी, और पंख इतने कोमल कि तेज़ हवा में वह अक्सर डगमगा जाती। बाकी पक्षी उसे देखकर हँसते और कहते कि इतनी कमजोर चिड़िया इस जंगल में कैसे ज़िंदा रहेगी। पर वह चिड़िया हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ उड़ती, दाने खोजती और हर दिन को एक नए विश्वास के साथ जीती।
उस चिड़िया की सबसे बड़ी इच्छा उड़ान थी। उड़ना तो वह उड़ती थी, पर ऊँचा नहीं। जब वह बाज़ को आकाश चीरते देखती या सारसों को
बादलों के बीच तैरते देखती, तो उसका मन भी
उनके साथ उड़ जाना चाहता। कई बार उसने कोशिश की, पर थोड़ी ऊँचाई पर पहुँचते ही डर उसके पंखों को जकड़ लेता। नीचे गिरने का डर, असफल होने का डर और दूसरों के मज़ाक का डर उसे रोक लेता।
फिर भी, हर असफल उड़ान के बाद वह
चुपचाप वापस अपनी शाखा पर लौटती और खुद से कहती कि एक दिन वह ज़रूर ऊँचा उड़ेगी।
बरगद के पेड़ के नीचे एक छोटी नदी बहती थी, जो दूर पहाड़ों से निकलकर आती थी। नदी हर मौसम में बहती रहती, चाहे रास्ते में कितनी ही चट्टानें क्यों न हों। चिड़िया
अकसर नदी को देखती और सोचती कि यह बिना रुके आगे कैसे बढ़ती रहती है। एक दिन उसने
नदी से पूछा कि उसे थकान क्यों नहीं होती। नदी ने हँसते हुए कहा कि वह रुकना नहीं
जानती, इसलिए थकती भी नहीं। यह बात
चिड़िया के मन में गहराई तक उतर गई।
उसी जंगल में एक बूढ़ा उल्लू भी रहता था, जिसे सब पक्षी बुद्धिमान मानते थे। एक शाम जब सूरज ढल रहा था और आसमान नारंगी
रंग से भर गया था, चिड़िया उल्लू
के पास पहुँची। उसने अपनी इच्छा और अपने डर के बारे में बताया। उल्लू ने उसकी
आँखों में देखा और कहा कि ऊँचा उड़ने के लिए पंखों से ज़्यादा हिम्मत चाहिए। अगर
डर पंखों पर बैठ जाए, तो सबसे मज़बूत
पंख भी बोझ बन जाते हैं। चिड़िया ने यह बात सुनी, पर डर अभी भी उसके भीतर था।
अगले कुछ दिनों में जंगल का मौसम बदलने लगा। बादल घिर आए, हवाएँ तेज़ हो गईं और बारिश होने लगी। एक रात भयंकर तूफ़ान
आया। पेड़ झुकने लगे, डालियाँ टूटने
लगीं और पक्षी घबराकर इधर-उधर उड़ने लगे। चिड़िया अपनी छोटी-सी शाखा पर काँप रही
थी। तभी एक तेज़ हवा का झोंका आया और उसकी शाखा टूट गई। वह चिड़िया हवा में उछल गई, नीचे अँधेरा था और ऊपर बेतहाशा हवा। उस पल उसके पास सोचने
का समय नहीं था, बस पंख फैलाने का।
डर और हिम्मत के बीच वह पहली बार पूरी ताकत से उड़ी। हवा ने उसे इधर-उधर धकेला, बारिश ने उसके पंख भिगो दिए, पर उसने पंख समेटे नहीं। वह गिरने से डरती रही, पर उड़ना जारी रखा। कुछ ही पलों में उसे महसूस हुआ कि वह जितना डर रही थी, उतना गिर नहीं रही थी। हवा के साथ तालमेल बैठाते ही उसकी
उड़ान स्थिर होने लगी। पहली बार वह पेड़ों की ऊँचाई से ऊपर पहुँची और नीचे पूरा
जंगल देख पाई।
तूफ़ान थमा तो सुबह हो चुकी थी। चिड़िया एक दूर की पहाड़ी पर बैठी थी, जहाँ वह पहले कभी नहीं पहुँची थी। सूरज उग रहा था और उसकी
किरणें उसके गीले पंखों पर चमक रही थीं। वह थकी हुई थी, पर उसके भीतर एक अजीब-सी शांति थी। उसने समझ लिया कि डर से
भागने से नहीं, बल्कि उसके साथ उड़ने से
रास्ता बनता है। वह जान गई कि उसकी उड़ान की सीमा उतनी नहीं थी जितनी उसने खुद मान
ली थी।
कुछ देर बाद वह वापस अपने जंगल की ओर उड़ी। इस बार उसकी उड़ान में आत्मविश्वास
था। जब वह बरगद के पेड़ पर पहुँची, तो बाकी पक्षी
उसे देखकर चकित रह गए। वही छोटी-सी चिड़िया, जो ऊँचा उड़ने से डरती थी, अब बिना डगमगाए
ऊपर-नीचे उड़ रही थी। किसी ने कुछ नहीं कहा, पर उनकी आँखों में सम्मान था। चिड़िया ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा और
मन-ही-मन तय किया कि यह तो बस शुरुआत है।
उस दिन के बाद चिड़िया हर सुबह थोड़ा और ऊँचा उड़ने लगी। कभी वह थकती, कभी असफल होती, पर अब रुकती
नहीं थी। नदी की तरह आगे बढ़ते रहना उसने सीख लिया था। वह जान गई थी कि हर उड़ान
मंज़िल तक पहुँचना ज़रूरी नहीं, कुछ उड़ानें
हिम्मत सिखाने के लिए होती हैं। जंगल वही था, लोग वही थे, पर चिड़िया बदल चुकी थी।
दिन बीतने लगे और छोटी चिड़िया की उड़ान अब जंगल के लिए नई बात नहीं रही। वह
अब केवल पेड़ों की ऊँचाई तक ही नहीं, बल्कि
पहाड़ियों की चोटियों तक उड़ने लगी थी। हर नई ऊँचाई उसके भीतर एक नई समझ छोड़
जाती। उसे एहसास हुआ कि उड़ान केवल ऊपर जाने का नाम नहीं, बल्कि खुद को पहचानने की प्रक्रिया है। जितना वह ऊपर जाती, उतना ही नीचे का संसार छोटा लगता और उतनी ही बड़ी उसकी सोच
होती जाती।
एक दिन जंगल में एक खबर फैल गई कि दूर उत्तर दिशा से एक विशाल आग बढ़ती चली आ
रही है। सूखी घास, तेज़ हवा और
गर्मी ने मिलकर आग को और भयानक बना दिया था। जानवरों में भय फैल गया। हिरण झुंड
बनाकर भागने लगे, बंदर पेड़ों से
पेड़ों पर कूदने लगे, और पक्षी आसमान
में इधर-उधर उड़ने लगे। पर आग इतनी तेज़ थी कि रास्ता समझ में नहीं आ रहा था। धुआँ
चारों ओर फैल चुका था और सूरज भी धुंधला दिखाई दे रहा था।
चिड़िया ने ऊपर उड़कर पूरा दृश्य देखा। उसे समझ आया कि अगर सब यूँ ही घबराकर
उड़ते रहे, तो कई जानवर रास्ता भटक
सकते हैं। उस पल उसे पहली बार यह एहसास हुआ कि उसकी उड़ान अब सिर्फ़ उसके लिए नहीं
रही। वह ऊपर से साफ़ रास्ते देख सकती थी, नदी की दिशा पहचान सकती थी और सुरक्षित पहाड़ियों का अनुमान लगा सकती थी। उसका
दिल तेज़ी से धड़क रहा था, पर डर के साथ
अब जिम्मेदारी भी जुड़ चुकी थी।
वह नीचे उतरी और तेज़ आवाज़ में बाकी पक्षियों को पुकारने लगी। पहले तो किसी
ने ध्यान नहीं दिया, पर जब उसने
बार-बार संकेत दिए और दिशा में उड़कर दिखाया, तो कुछ पक्षी उसके पीछे आने लगे। उसने उन्हें नदी की ओर जाने का रास्ता दिखाया, जहाँ आग पहुँच नहीं सकती थी। धीरे-धीरे और पक्षी भी समझने
लगे और उसका अनुसरण करने लगे। जंगल, जो कभी उसे
कमजोर समझता था, अब उसी छोटी चिड़िया के
संकेतों पर भरोसा कर रहा था।
आग कई दिनों बाद थमी। जंगल का एक हिस्सा जल चुका था, कई पेड़ राख बन गए थे, पर बहुत-से जानवर सुरक्षित बच गए थे। जब सब लौटे, तो जले हुए पेड़ों के बीच खामोशी थी। चिड़िया एक जली हुई
शाखा पर बैठी थी और नीचे काली ज़मीन को देख रही थी। उसे दुख भी था और संतोष भी।
दुख इसलिए कि जंगल को चोट पहुँची थी, और संतोष इसलिए
कि उसकी उड़ान किसी के काम आई थी।
कुछ दिनों बाद बारिश हुई। काली ज़मीन से हरी-हरी घास निकलने लगी। जले हुए
पेड़ों के बीच नई कोंपलें फूटने लगीं। चिड़िया हर दिन उन कोंपलों को देखती और
समझती कि नष्ट होना अंत नहीं होता। ठीक उसी तरह जैसे उसका डर कभी अंत नहीं था, बल्कि उसकी शुरुआत का रास्ता था। जंगल फिर से जीवित हो रहा
था, पहले से अलग, पर पहले से कमजोर नहीं।
उसी समय जंगल में कुछ नई चिड़ियाँ आईं। वे छोटी थीं, डरी हुई थीं और अक्सर उड़ने से पहले ही रुक जाती थीं। जब वे
उस चिड़िया को ऊँचा उड़ते देखतीं, तो हैरान
होतीं। एक दिन उनमें से एक नन्ही चिड़िया उसके पास आई और बोली कि वह भी ऊँचा उड़ना
चाहती है, पर डरती है। यह सुनकर उस
चिड़िया को अपनी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उसने मुस्कुराकर कहा कि डर रहेगा, पर उड़ान भी रहेगी, बस फैसला तुम्हें करना है कि किसे आगे रखना है।
अब वह चिड़िया अकेली नहीं उड़ती थी। वह दूसरों के साथ उड़ती, उन्हें हवा का बहाव समझाती, गिरने पर फिर उठना सिखाती। कई बार वे असफल होते, कई बार थक जाते, पर वह उन्हें
रुकने नहीं देती। उसने सीखा था कि जब ज्ञान बाँटा जाता है, तो वह कम नहीं होता, बल्कि और मजबूत बनता है। जंगल में एक नई ऊर्जा फैलने लगी थी, मानो हर उड़ान के साथ आत्मविश्वास भी उड़ रहा हो।
एक शाम जब सूरज डूब रहा था, वही बूढ़ा
उल्लू उसके पास आया। उसने गहरी आँखों से चिड़िया को देखा और कहा कि अब वह वही नहीं
रही जो कभी डरकर शाखा पर बैठी रहती थी। चिड़िया ने उत्तर दिया कि वह वही है, बस अब अपने डर से दोस्ती कर चुकी है। उल्लू ने सिर हिलाया
और कहा कि यही सच्ची उड़ान है, जब कोई खुद को
बदले बिना आगे बढ़ जाए।
समय के साथ चिड़िया का नाम जंगल में फैल गया। लोग उसे ऊँचा उड़ने वाली चिड़िया
नहीं, बल्कि रास्ता दिखाने वाली
चिड़िया कहने लगे। पर उसके भीतर कोई घमंड नहीं था। वह जानती थी कि उड़ान एक यात्रा
है, मंज़िल नहीं। हर दिन नया
आसमान होता है और हर आसमान में नई परीक्षा। यही सोच उसे ज़मीन से जुड़े रखती थी, भले ही उसके पंख आसमान को छूते हों।
एक दिन उसने फिर उसी नदी को देखा, जो लगातार बह
रही थी। उसने मन-ही-मन नदी को धन्यवाद दिया, क्योंकि बहना उसी से उसने सीखा था। चिड़िया ने पंख फैलाए और नदी के साथ-साथ
उड़ने लगी। नीचे पानी बह रहा था, ऊपर हवा चल रही
थी, और बीच में वह उड़ रही
थी—डर, हिम्मत और उम्मीद के साथ।
उस पल उसे एहसास हुआ कि उसकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। अभी और उड़ानें बाकी
हैं, और भी ऊँचाइयाँ बाकी हैं, और भी चिड़ियाँ हैं जिन्हें अपने पंखों पर भरोसा दिलाना है।
आसमान बहुत बड़ा है, पर विश्वास
उससे भी बड़ा।
समय अब धीरे-धीरे बहने लगा था, जैसे जंगल ने
एक नई लय पकड़ ली हो। आग के बाद जो खालीपन आया था, वह अब हरियाली और नई आवाज़ों से भरने लगा था। छोटी चिड़िया अब उस बदलाव का
हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी साक्षी बन चुकी
थी। वह हर सुबह उड़ती, पर अब उड़ान
उसके लिए चुनौती नहीं, संवाद बन चुकी
थी—आसमान से, हवा से और खुद से। उसे समझ
आने लगा था कि उड़ान जितनी बाहर होती है, उतनी ही भीतर भी होती है।
एक दिन जंगल के दक्षिणी छोर से तेज़ हवाएँ आने लगीं। ये हवाएँ सामान्य नहीं
थीं, इनमें बेचैनी थी। बूढ़े
पेड़ झुकने लगे, पत्तियाँ असमय गिरने लगीं
और पक्षियों की उड़ान लड़खड़ाने लगी। अनुभवी पक्षी जानते थे कि यह किसी बड़े
परिवर्तन का संकेत है। चिड़िया ने ऊपर उड़कर देखा तो पाया कि दूर रेगिस्तान की ओर
से सूखी आँधी बढ़ रही है, जो अपने साथ
धूल और गर्मी ला रही थी। यह आग जैसी विनाशकारी नहीं थी, पर लंबे समय तक रहने वाली थी।
रेगिस्तानी हवाओं ने जंगल का संतुलन बिगाड़ दिया। पानी की कमी होने लगी, नदी का बहाव धीमा पड़ गया और दाने खोजने में पक्षियों को
कठिनाई होने लगी। छोटे पक्षी हताश होने लगे। चिड़िया ने महसूस किया कि यह समय
सिर्फ़ उड़ने का नहीं, ठहरकर सोचने का
भी है। उसने बाकी पक्षियों के साथ मिलकर ऊँचाई से नए इलाकों की खोज शुरू की, जहाँ पानी और भोजन उपलब्ध हो सकता था।
इन खोजी उड़ानों में कई बार निराशा मिली। कुछ जगहें पहले से उजड़ चुकी थीं, कुछ पर शिकारी पक्षियों का कब्ज़ा था। कई पक्षी लौट आए, पर चिड़िया ने हार नहीं मानी। उसने सीखा था कि हर असफल
उड़ान एक सूचना होती है, हार नहीं।
धीरे-धीरे उसने पहाड़ों के पीछे एक हरा मैदान देखा, जहाँ एक छोटी झील थी और आसपास पेड़ थे। वहाँ पहुँचना कठिन था, पर असंभव नहीं।
चिड़िया ने बाकी पक्षियों को इकट्ठा किया और पूरी बात समझाई। कुछ डरे हुए थे, कुछ थके हुए, और कुछ को
विश्वास नहीं था कि इतनी दूर जाना सही होगा। चिड़िया ने कोई ज़ोर नहीं दिया। उसने
बस इतना कहा कि वह खुद वहाँ जाकर देखेगी और लौटकर सच बताएगी। यह कहते हुए उसने
उड़ान भरी। रास्ता लंबा था, हवा विपरीत थी
और थकान हावी थी, पर इस बार उसके
पंखों से ज़्यादा मज़बूत उसका विश्वास था।
कई घंटों की उड़ान के बाद वह हरे मैदान तक पहुँची। झील का पानी शांत था, पेड़ों पर फल थे और हवा में ठंडक थी। चिड़िया ने राहत की
साँस ली। उसने कुछ समय वहाँ बिताया, ताकत जुटाई और
फिर वापस जंगल की ओर उड़ चली। लौटते समय वह जानती थी कि अब उसकी उड़ान का मतलब
सिर्फ़ उसका लौटना नहीं, बल्कि दूसरों
का भविष्य भी है।
जब वह वापस पहुँची, तो उसकी हालत
देखकर सभी समझ गए कि यात्रा आसान नहीं थी। उसने बिना किसी बढ़ा-चढ़ाकर बात किए, सच बताया—रास्ता कठिन है, पर मंज़िल सुरक्षित है। यह सुनकर कई पक्षियों की आँखों में फिर से उम्मीद
जागी। धीरे-धीरे समूह बनते गए और तय हुआ कि जो तैयार हैं, वे साथ चलेंगे।
यात्रा शुरू हुई। यह उड़ान किसी एक दिन की नहीं थी। रास्ते में कई बार रुकना
पड़ा, कई बार लौटने का मन हुआ।
कुछ पक्षी पीछे छूट गए, कुछ नए जुड़
गए। चिड़िया सबसे आगे नहीं, बल्कि बीच में
उड़ती थी, ताकि कोई पीछे न रह जाए।
उसे अब समझ आ गया था कि नेतृत्व आगे उड़ने से नहीं, साथ उड़ने से बनता है।
आख़िरकार वे हरे मैदान तक पहुँच गए। जब सभी पक्षी झील के पास उतरे, तो लंबे समय बाद उनके चेहरों पर सुकून था। बच्चों की
चहचहाहट गूँज उठी और हवा में फिर से जीवन महसूस हुआ। चिड़िया एक पेड़ की ऊँची शाखा
पर बैठी यह सब देख रही थी। उसके मन में कोई गर्व नहीं था, सिर्फ़ कृतज्ञता थी—अपने पंखों के लिए, अपने डर के लिए और उन सब उड़ानों के लिए जिन्होंने उसे यहाँ
तक पहुँचाया था।
कुछ समय बाद जंगल फिर संतुलित हो गया। हवाएँ बदलीं, पानी लौटा और जीवन ने नई दिशा ली। कई पक्षी पुराने जंगल लौट
गए, कुछ वहीं बस गए। चिड़िया ने
भी उड़ान जारी रखी, कभी यहाँ, कभी वहाँ। वह अब किसी एक जगह की नहीं रही थी। वह जहाँ
ज़रूरत होती, वहाँ उड़ जाती।
एक शाम, जब सूरज झील के पानी में
डूब रहा था, चिड़िया ने आसमान की ओर
देखा। उसे लगा जैसे आसमान मुस्कुरा रहा हो। उसने मन-ही-मन कहा कि वह अब उड़ान से
डरती नहीं, बल्कि उससे सीखती है। उसे
पता था कि चुनौतियाँ फिर आएँगी, हवाएँ फिर
बदलेंगी, पर उसके भीतर अब वह शक्ति
थी जो हर बदलाव के साथ खुद को ढाल सकती थी।
और इस तरह वह छोटी-सी चिड़िया, जिसे कभी कमजोर
समझा गया था, उड़ान का प्रतीक बन गई।
उसकी कहानी किसी एक जंगल तक सीमित नहीं रही। वह हर उस दिल में ज़िंदा हो गई जो डर
के बावजूद उड़ना चाहता है, हर उस मन में
जो गिरकर फिर उठने का साहस रखता है। आसमान खुला था, पंख तैयार थे, और उड़ान कभी
खत्म नहीं होने वाली थी।
समय अब चिड़िया के लिए कोई सीमा नहीं रहा था। दिन, महीने और ऋतुएँ आती-जाती रहीं, पर उसकी उड़ान में ठहराव नहीं आया। अब उसके पंखों पर अनुभव
की परतें थीं और आँखों में दूर तक देखने की आदत। वह जानती थी कि हर आसमान एक जैसा
नहीं होता और हर उड़ान का मकसद अलग होता है। कभी वह नई जगहों की खोज में निकलती, कभी किसी डर से जूझते झुंड के साथ उड़ती, और कभी अकेले बैठकर हवा की आवाज़ सुनती। उसे अब अकेलापन
नहीं डराता था, क्योंकि उसने अपने भीतर की
संगति पा ली थी।
एक दिन वह फिर उसी पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुँची, जहाँ से उसकी कहानी शुरू हुई थी। पेड़ अब पहले जैसा विशाल
नहीं रहा था, पर उसकी जड़ें अब भी गहरी
थीं। कई नई चिड़ियाँ वहाँ बैठी थीं, जो उसकी तरह ही
छोटी और संकोची थीं। वे उड़ान भरतीं, फिर वापस आकर
शाखा पर बैठ जातीं। चिड़िया उन्हें देखती रही और मुस्कुराती रही, क्योंकि उसे खुद का अतीत साफ़ दिखाई दे रहा था। उसने उन्हें
कुछ नहीं कहा, बस उनके साथ बैठी रही, ताकि वे जान सकें कि हर उड़ान को शब्दों की नहीं, साथ की ज़रूरत होती है।
उसी शाम तेज़ बारिश शुरू हुई। आसमान गहराया, बिजली चमकी और हवा ने फिर से अपनी ताकत दिखाई। कई चिड़ियाँ घबरा गईं और
इधर-उधर छिपने लगीं। छोटी चिड़ियाँ काँप रही थीं। तब वह चिड़िया आगे बढ़ी और बिना
किसी डर के बारिश में उड़ गई। उसने ऊँचाई नहीं पकड़ी, बस स्थिर और संतुलित उड़ान भरी। उसे देखकर बाकी चिड़ियों को
हिम्मत मिली। धीरे-धीरे वे भी पंख फैलाने लगीं। बारिश अब बाधा नहीं रही, बल्कि अभ्यास बन गई।
बारिश के बाद जब आसमान साफ़ हुआ, तो हवा में एक
अलग ही ताज़गी थी। छोटी चिड़ियों की आँखों में चमक थी। उन्होंने उड़ान को एक डर
नहीं, एक संभावना की तरह देखना
शुरू कर दिया था। चिड़िया ने महसूस किया कि अब उसे सिखाने की ज़रूरत नहीं, बस उदाहरण बनने की ज़रूरत है। उसने यह भी समझ लिया कि हर
किसी की उड़ान अलग समय पर शुरू होती है, और तुलना उड़ान को भारी बना देती है।
कुछ दिनों बाद वही बूढ़ा उल्लू फिर दिखाई दिया। उसकी आँखें पहले से शांत थीं।
उसने कहा कि अब बहुत-से जंगलों में उसकी कहानी सुनी जाती है। चिड़िया ने उत्तर
दिया कि यह कहानी उसकी नहीं, हर उस पंख की
है जिसने डर के बावजूद हवा को चुना। उल्लू ने मुस्कुराकर कहा कि यही सच्चा ज्ञान
है—जब कोई खुद को कहानी से अलग कर देता है और अर्थ को आगे बढ़ने देता है।
समय के साथ चिड़िया की उड़ान धीमी होने लगी। यह थकान नहीं थी, बल्कि समझ थी। वह जानती थी कि हर उड़ान तेज़ नहीं होती और
हर भूमिका स्थायी नहीं होती। अब वह अक्सर ऊँची शाखा पर बैठकर दूसरों को उड़ते
देखती। जब कोई गिरता, तो वह जानती थी
कि उसे उठना खुद ही सीखना होगा। मदद पास में रह सकती है, पर पंख खुद ही फैलाने पड़ते हैं।
एक सुबह, जब सूरज बहुत नरम रोशनी
लेकर आया, चिड़िया ने आख़िरी बार उस
आसमान की ओर देखा जहाँ उसने सबसे ऊँची उड़ान भरी थी। उसके मन में कोई पछतावा नहीं
था, न कोई अधूरी इच्छा। उसे पता
था कि उसने जितना उड़ना था, उड़ लिया, जितना सीखना था,
सीख लिया, और जितना बाँटना था, बाँट दिया। उसने पंख फैलाए और हल्की उड़ान भरी, जैसे हवा को धन्यवाद कह रही हो।
उसके बाद वह चिड़िया दिखाई नहीं दी, पर उसकी उड़ान ग़ायब नहीं हुई। वह हर उस चिड़िया में ज़िंदा रही जो पहली बार
शाखा से कूदती है, हर उस मन में
जो डर के बावजूद आगे बढ़ता है, और हर उस दिल
में जो जानता है कि ऊँचाई केवल ऊपर जाने से नहीं, बल्कि भीतर उठने से मिलती है। जंगल बदलते रहे, आसमान बदलता रहा, पर उड़ान की
प्रेरणा कभी खत्म नहीं हुई।
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