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Showing posts from May, 2026

एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

प्यारी बेटी का जीवन

  एक छोटे से गांव में एक गरीब किसान अपनी एकमात्र बेटी रानी   के साथ रेहता   था। रानी   की मां का देहांत उसके जन्म के कुछ ही समय बाद हो गया था। उस वक्त रानी   इतनी छोटी थी कि उसे मां का चेहरा भी याद नहीं रहा। गांव के लोगों ने कई बार पिता को समझाया कि वो   दूसरी शादी कर ले ताकि बच्ची को मां का साया मिल सके। पर उसने हर बार मना कर दिया। रानी  मेरी पत्नी की आखिरी निशानी है। मैं उसे किसी और के साए में नहीं पालना चाहता। सौतेली मां चाहे कितनी भी अच्छी क्यों ना हो उसके मन में वो  अपनापन नहीं हो सकता जो एक सगी मां के दिल में होता है। मैं ही इसका पिता भी हूं और मां भी। जब तक जिंदा हूं इसे किसी की कमी मेंहसूस नहीं होने दूंगा। उसने ठान लिया था कि वो  अपनी बेटी को खुद ही पाल पोस कर बड़ा करेगा। चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये । वो  खेतों में दिन रात मेहनत करता और जो थोड़ा बहुत  कमाता उसी में दोनों का जीवन चलता। गरीबी थी पर उस घर में प्रेम और अपनापन की कोई कमी नहीं थी। रानी  के लिए उसके पिता ही उसका पूरा संसार थे। मां भी , पिता भी और ...

कर्म का चक्र

  कर्म का चक्र हिमालय की तलहटी में बसा आनंदपुर गाँव अपनी शांति, प्राकृतिक सुंदरता और सरल लोगों के लिए प्रसिद्ध था। गाँव के बीचों-बीच एक विशाल हवेली थी, जिसमें राघव शरण और उसकी पत्नी कामिनी रहते थे। राघव एक दयालु, धर्मपरायण और उदार व्यक्ति था। वह हमेशा गरीबों की सहायता करता और गाँव के लोगों के सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहता था। लेकिन उसकी पत्नी कामिनी का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था। वह अत्यंत सुंदर और धनी थी, परंतु उसे अपने रूप और संपत्ति पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि धन ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है और जिसके पास धन नहीं, वह सम्मान के योग्य नहीं है। जब भी कोई गरीब, भिखारी या जरूरतमंद उनके घर सहायता माँगने आता, कामिनी उसे अपमानित करके लौटा देती। कई बार राघव उसे समझाने का प्रयास करता कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके धन में नहीं, बल्कि उसके कर्मों में होता है। लेकिन कामिनी उसकी बातों को हँसी में उड़ा देती। उसे विश्वास था कि उसका वैभव और सुख हमेशा उसके साथ रहेगा। समय बीतता गया और उसका अहंकार बढ़ता गया। एक वर्ष आनंदपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में भयंकर अकाल पड़ गया। खेत सूख गए, कुएँ ख...