एक छोटे से गांव में एक गरीब किसान अपनी एकमात्र बेटी रानी के साथ रेहता था। रानी की मां का देहांत उसके जन्म के कुछ ही समय बाद हो गया था। उस वक्त रानी इतनी छोटी थी कि उसे मां का चेहरा भी याद नहीं रहा। गांव के लोगों ने कई बार पिता को समझाया कि वो दूसरी शादी कर ले ताकि बच्ची को मां का साया मिल सके। पर उसने हर बार मना कर दिया।
रानी मेरी पत्नी की आखिरी निशानी है। मैं उसे किसी और
के साए में नहीं पालना चाहता। सौतेली मां चाहे कितनी भी अच्छी क्यों ना हो उसके मन
में वो अपनापन नहीं हो सकता जो एक सगी मां
के दिल में होता है। मैं ही इसका पिता भी हूं और मां भी। जब तक जिंदा हूं इसे किसी
की कमी मेंहसूस नहीं होने दूंगा।
उसने ठान लिया था कि वो अपनी बेटी को खुद ही पाल पोस कर बड़ा करेगा।
चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये । वो खेतों में दिन रात मेहनत करता और जो थोड़ा
बहुत कमाता उसी में दोनों का जीवन चलता।
गरीबी थी पर उस घर में प्रेम और अपनापन की कोई कमी नहीं थी। रानी के लिए उसके पिता ही उसका पूरा संसार थे। मां भी,
पिता भी और शिक्षक भी। वक्त बीतता गया। रानी अब जवान हो चुकी थी। व्यवहार में सरल और पिता के
संस्कारों में पली हुई। पिता को अपनी बेटी पर गर्व था। वही उसकी जिंदगी का सबसे
बड़ा सहारा थी। लेकिन जिंदगी के रास्ते हमेशा
एक जैसे नहीं रेहते। एक बरसाती शाम खेत से लौटते समय बिजली गिरने से रानी के पिता
की मृत्यु हो गई। कुछ ही पलों में उसकी दुनिया बिखर गई। बचपन में मां को खो चुकी रानी
अब पिता के साए से भी वंचित हो गई। उसने
अपने जीवन का दूसरा सबसे बड़ा दुख मेंहसूस
किया। ऐसा खालीपन जिसे कोई भर नहीं सकता था। मरने से पहले पिता ने अपनी बेटी की
जिम्मेदारी अपने छोटे भाई धनिया को सौंपी
थी। उसे विश्वास था कि उसका भाई रानी का
ख्याल रखेगा और उसे बेटी की तरह स्नेह देगा। लेकिन यही वो मोड़ था जहां से रानी के
भाग्य की असली कहानी शुरू हुई। जहां उसे जीवन की सच्चाइयों से पहली बार
सामना करना था। पिता के जाने के बाद रानी की दुनिया बदल चुकी थी। अब वो अपने चाचा धनिया के घर आ गई थी। वही व्यक्ति जिसे उसके पिता ने
अपनी आखिरी सांसों में उसकी जिम्मेदारी सौंपी थी। शुरुआत के कुछ दिन शांति से
गुजरे। घर में सहानुभूति का माहौल था। धनिया की पत्नी ने कुछ समय तक रानी से नरमी से पेश आया। पर जल्दी ही उसके व्यवहार
में ठंडापन आने लगा। रानी जो अब तक अपने
पिता के प्रेम में पली थी। इस घर की अनकही दूरी और तिरस्कार को महसूस करने लगी। वो
सुबह से रात तक घर का सारा काम करती। पानी
भरना, बच्चों की देखभाल,
रसोई और
सफाई। फिर भी उसे कोई अपनापन नहीं मिलता था। धनिया अब पहले जैसा नहीं रहा था। रानी के पिता के
देहांत के बाद उसमें कुछ बदल गया था। या यूं कहिए कि उसके भीतर की छिपी
लालच अब खुलकर सामने आने लगी थी। रानी के
पिता के नाम पर गांव के किनारे कुछ खेत और
थोड़ी सी उपजाऊ जमीन थी। वो जमीन अब रानी के नाम थी। धनिया के मन में यही बात धीरे-धीरे घर बनकर बैठ गई। वो
अक्सर रातों को सोचता,
अगर ये जमीन मेरे हाथ आ जाए, तो मेरी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी। मुझे अब किसी के
आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अपना घर, अपनी खेती, अपना नाम सब कुछ
बदल जाएगा। मैं गांव में सबसे अमीर आदमी बन जाऊंगा। लोग जिस धनिया को आज तिरछी नजरों से देखते हैं, कल उसी के आगे सिर झुकाएंगे। बस किसी तरह ये जमीन मेरे कब्जे में आ जाए।
उसी लालच ने उसके भीतर की
इंसानियत को निगल लिया। वो अब सिर्फ रानी को एक जिम्मेदारी नहीं बल्कि एक सौदा समझने लगा
था। एक दिन गांव के एक जमींदार धनिराम सिंह से उसकी मुलाकात हुई। धनिराम एक बड़ी उम्र का आदमी था। धन में डूबा हुआ पर अकेला। उसकी पेहली
पत्नी मर चुकी थी और कोई संतान नहीं थी। उसे अपने घर के लिए एक कम उम्र और सीधी
साधी औरत की तलाश थी ताकि घर संभले और उसका बुढ़ापा आसान हो जाए। धनिराम ने जब रानी को देखा तो लालच भरी मुस्कान उसके चेहरे पर फैल
गई। उसने धनिया से कहा
धनिया अगर तू अपनी भतीजी की शादी मुझसे करा दे तो मैं
तुझे इतना धन दूंगा कि तू जिंदगी भर चैन से खा सकेगा ना सिर्फ नकद रुपया दूंगा
बल्कि अपने दो उपजाऊ खेत भी तेरे नाम कर दूंगा सोच ले तेरे घर की हालत सुधर जाएगी
और रानी को भी किसी चीज की कमी नहीं रहेगी
मैं उसे रानी की तरह रखूंगा बस तू हां कर दे
धनिया के मन में जैसे आग लग गई धन और जमीन का मोह उसके
के दिमाग पर छा गया। वो जानता था कि ये रिश्ता रानी के लिए अन्याय है। मगर उसके मन की लालसा ने उसे
अंधा कर दिया। उस रात उसने अपनी पत्नी से कहा
देखो अगर रानी की शादी धनिराम से हो गई तो हमें जिंदगी भर की सुविधा मिल
जाएगी। खेत पैसा सब कुछ मिल जाएगा। हां वो उम्र में बड़ा है लेकिन आदमी अमीर है।
ऊंचा घराना है। रानी को कभी किसी चीज की
कमी नहीं रहेगी।
अरे उम्र की कौन देखता है
आजकल? बूढ़ा है तो क्या हुआ?
धनिराम के पास दौलत है, इज्जत है। हमारी लड़की अगर
उसके घर चली गई तो हमें भी लोग सलाम करेंगे। अब सोचो कितने लोग हैं जो
हमारी तरह हाथ फैलाते फिरते हैं। पर हम तो खेतों के मालिक बन जाएंगे।
सही केह रही हो तुम। गरीब की बेटी के लिए कोई राजकुमार तो
आएगा नहीं। धनिराम बूढ़ा जरूर है। पर आदमी
बुरा नहीं लगता। अगर वो रानी को आराम की
जिंदगी दे सकता है तो हमें और क्या चाहिए? हमारी हालत भी सुधर जाएगी। कर्ज उतर
जाएगा और बेटी भी भूख प्यास से तो बचेगी।बस अगर वो मान जाए तो हमारा सब कुछ संवर
जाएगा। हां और सुनो भैया ने जो जमीन छोड़ी थी ना अब वो भी तो हमारी हो जाएगी। आखिर
कौन है और उसे लेने वाला? रानी तो हमारी ही भतीजी है और हम ही तो उसका भला सोच
रहे हैं। जब उसकी शादी धनिराम जैसे अमीर
आदमी से होगी तो गांव में हमारी भी इज्जत बढ़ेगी। लोग कहेंगे देखो धनिया ने अपनी भतीजी की शादी कितनी ऊंचाई पर कर दी।
अरे शादियां सस्ती थोड़ी
होती हैं। दहेज, कपड़े, दावत सब में पैसा पानी की तरह बेहता है।मैं तो केहती
हूं अगर मैं अपनी मेहनत, अपनी बचत और सब
कुछ रानी की शादी में लगा रही हूं तो मुझे
भी तो बदले में कुछ मिलना चाहिए ना। आखिर धनिराम ने खुद कहा है खेत देगा, नकद देगा। तो क्या बुरा है? अगर हम भी थोड़ा सोच लें अपने लिए। हर किसी को अपने घर का
पेट भरना होता है और अब वक्त आ गया है किस्मत हमारे दरवाजे पर खुद चलकर आई है।
पत्नी ने भी लालच में
हामी भर दी और यहीं से तय हो गया रानी का
भाग्य बिना उसकी राय बिना उसकी इच्छा के। कुछ दिनों बाद धनिया ने रानी को बुलाया। उसकी आवाज में अपनापन नहीं ठंडापन
था। वो बोला
तेरे पिता ने जो
जिम्मेदारी दी थी मैं वही निभा रहा हूं। अब तू जवान है। तेरा घर बसाने का समय आ
गया है। पास के गांव के जमींदार धनिराम सिंह तुझसे विवाह करना चाहते हैं।
पर चाचा जी मैं अभी विवाह
नहीं करना चाहती। मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं और और मुझे आपका लाया हुआ
रिश्ता भी पसंद नहीं है। वो धनिराम बहुत बड़े हैं उम्र में। मैं उनके साथ खुश
नहीं रेह पाऊंगी। कृपया मेरी जिंदगी का ये
फैसला मुझ पर मत थोपिए। मैं आपसे विनती
करती हूं।
बस ज्यादा जुबान मत चला रानी
। अपने चाचा से जुबान लड़ाना तेरी परवरिश में नहीं था। मैं यहां तेरी राय सुनने
नहीं आया हूं। मैं तुझे फैसला सुनाने आया हूं। तेरे पिता होते तो वही केहते जो मैं
केह रहा हूं तेरे भले में यही है। धनिराम तुझे रानी की तरह रखेगा और हमारा घर भी संभल
जाएगा। यही आखिरी फैसला है रानी । अब इससे आगे कोई बात नहीं होगी।
रानी ने सुना तो जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसकी आंखों में भय और असमंजस दोनों थे। वो कुछ केह भी नहीं पाई। बस चुप रेह गई। धनिया ने ये सोच रखा था कि अगर वो विरोध करेगी तो भी उसकी बात नहीं मानी जाएगी। वो
रोज ये केहकर समझाने लगा कि यही उसके पिता की इच्छा थी
कि वो सुरक्षित रहे। धीरे-धीरे घर में रानी
की राय का कोई महत्व नहीं रेह गया। शादी
की तैयारियां शुरू हो गई। बिना किसी उत्साह के, बिना किसी खुशी के। शादी के दिन गांव में ढोल तो बजे पर रानी
के मन में सन्नाटा था। धनिराम के चेहरे पर
उम्र की झुर्रिया थी और आंखों में हवस की परछाई। रानी ने जब उसकी ओर देखा तो उसे अपने भविष्य का
अंधेरा साफ दिख गया। वो गूंगी बनी रही
जैसे किसी ने उसकी आवाज छीन ली हो। पिता की आखिरी यादें, उनकी बातें, उनकी मुस्कान सब
एक-एक कर उसके मन में तैरने लगी। वो मन ही
मन रोई।
अगर पिताजी आज होते तो
मुझे इस सौदे का हिस्सा कभी नहीं बनने देते। वो जानते थे कि बेटी कोई बोझ नहीं
होती जिसे रुपए पैसे में तोला जाए। वो कभी अपनी रानी को किसी बूढ़े लालची आदमी के हाथों बेचने की बात
भी नहीं सोचते। वो केहते थे कि इंसान की असली कीमत उसके दिल में होती है उसके
सपनों में ना कि खेतों और सोने के सिक्कों में। अगर वो आज यहां होते तो मेरे सिर
पर हाथ रखकर केहते डर मत रानी मैं हूं
तेरे साथ। लेकिन आज, आज कोई नहीं है जो मेरी बात सुने।
शादी का दिन था। गांव के
कोने-कोने में शोर था। ढोलक बज रही थी और लोग जमींदार के घर के मेहमान बनने की
बातें कर रहे थे। लेकिन उन सबके बीच रानी का दिल जैसे किसी अंधेरी खाई में गिरता जा रहा
था। वो हर क्षण ये सोच रही थी। क्या यही मेरी किस्मत है? क्या मैं भी किसी सौदे की तरह बिक जाऊंगी?
उसकी आंखों के सामने बार-बार पिता का चेहरा आ
जाता था। वही चेहरा जिसने कभी कहा था। रानी , मैं तुझे किसी सौतेली छाया में नहीं पालूंगा। तू मेरी आंखों
की रोशनी है और आज उसी रोशनी को कोई
बुझाने जा रहा था। शाम होते-होते जब सब तैयारियों में व्यस्त थे, रानी ने धीरे से अपनी पायल उतारी और पिछवाड़े के
रास्ते निकल गई। वो भागती चली गई। खेतों
के बीच से कच्चे रास्तों से और आखिर में जंगल तक पहुंच गई। सांझ ढल रही थी। जंगल
की हवा में सन्नाटा था। झींगुरों की आवाजें गूंज रही थी। रानी थक कर एक पुराने पेड़ के नीचे बैठ गई। उसने
आसमान की ओर देखा। तारे झिलमिला रहे थे। जैसे कोई ऊपर से उसे देख रहा हो। उसकी
आंखों से आंसू बरस पड़े। वो फूट-फूट कर रो
पड़ी।
अगर तुम होती तो मुझे कभी
यूं किसी के हाथों बेचने नहीं देती।
तुम्हारे प्यार और अपनेपन के बिना मैं इतनी असुरक्षित मेंहसूस कर रही हूं। तुम ही
तो थी जो मेरी हर खुशी और हर डर को समझती।
तुम्हारे बिना ये दुनिया इतनी कठोर क्यों
लग रही है मां? अगर तुम होती तो ये
लोग मेरे फैसले पर कभी इतना दबाव नहीं डाल
पाते। बाबा आपने क्यों छोड़ा मुझे अकेला?
उसका रोना उस जंगल की
खामोशी में घुल गया। उस रात वो वहीं पेड़
के नीचे लेटी रही। बिना खाना, बिना सहारा बस
अपने आंचल में लिपटती यादें थी। कभी उसे लगता कि वो वापस अपने पुराने घर चली जाए। पिता की चौखट पर
फिर से लौट जाए। लेकिन फिर उसी क्षण एक डर उसके सीने में उठता। अगर चाचा ने पकड़ लिया तो? अगर उन्होंने फिर से उसे उस बूढ़े से बांध दिया
तो? ये सोचकर उसने तय किया। वो वापस नहीं जाएगी। अब वही जंगल उसका ठिकाना होगा।
वो पेड़ों के बीच एक छोटी सी जगह ढूंढकर रेहने
लगी। दिन में नदी से पानी लाती, जंगली फल खाती और
रात को सितारों से बातें करती। धीरे-धीरे वो उस अकेलेपन की आदि होने लगी। मगर भीतर से एक आग
जलती रही। वो जानती थी की भागना
अंत नहीं है। जंगल में कई दिनों तक अकेले रेहने के बाद रानी ने हिम्मत जुटाई। उसने सोचा अगर मैं सच में अपने
जीवन को बदलना चाहती हूं तो कहीं सुरक्षित जगह खोजनी होगी। एक दिन उसने अपने पिता
के पुराने दोस्त जगन्नाथ जी के घर जाने का फैसला किया। जगन्नाथ जी
गांव के ही नहीं पूरे इलाके में ईमानदारी और इंसानियत के लिए जाने जाते थे। रानी ने थक कर पर दृढ़ निश्चय के साथ उनका घर ढूंढा।
जब उसने उन्हें अपनी कहानी बताई तो जगन्नाथ
जी की आंखों में आंसू भर आए।
रानी बेटी तू मेरे घर में सुरक्षित रहेगी। यही बेहतर
है कि तू यहीं रुके। तेरे पिता एक नेक और सच्चे दिल वाले इंसान थे। उन्होंने हमेशा
तेरे भले की सोची। अब मैं हूं और मैं ये सुनिश्चित करूंगा कि तुझ पर कोई अन्याय ना हो।
तू निश्चिंत रेह। मैं अपनी पूरी ताकत से तेरी रक्षा करूंगा।
रानी ने पेहली बार लंबे समय बाद राहत महसूस की। जगन्नाथ जी ने
उसे अपने घर में ठेहराया। खाना, सुरक्षा और प्यार
दिया। रानी की आंखों में धीरे-धीरे एक नई
उम्मीद की किरण चमकने लगी। लेकिन धनिया को
जब ये खबर मिली, तो उसके चेहरे पर क्रोध की लपटें उठ गई। वो तुरंत जगन्नाथ
जी के घर पहुंचा। रानी ने उसे रोकने की कोशिश की और कदम जमा कर कहा।
"मैं वापस नहीं
जाऊंगी, चाचा जी। अब मेरी जिंदगी
पर मेरा हक है। मेरी इच्छा मेरी अपनी है।"
उस समय जगन्नाथ जी घर
पर नहीं थे। धनिया को पता था कि रानी का विरोध उसे रोक नहीं सकता। वो जबरदस्ती उसे पकड़ कर अपने घर ले गया। रानी की आंखों में डर और दुख दोनों थे। धनिया अब क्रोध में था और उसने सबक सिखाने की साजिश रची। उसने गांव के एक बहुत गरीब और भिखारी आदमी से रानी का विवाह तय कर दिया।
इस रानी के कारण धनिराम जमींदार के सामने मेरी बेइज्जती हुई। पूरा गांव
मुझ पर हंस रहा था। अब बदले का समय आ गया है। इतने कठिन जीवन के बाद मैं रानी की जिंदगी तोड़कर ही अपनी योजना पूरा करूंगा।
उसे किसी गरीब भिखारी से बांध दूंगा ताकि लोग उसे तुच्छ समझे और मैं उनसे उसके खेत
और जमीन हड़प सकूं।
रानी ने विरोध किया, रोई, मनाया पर सब बेअसर रहा। वो अब खुद को एक ऐसे बंधन में देख रही थी, जहां ना मर्जी थी, ना सम्मान, ना अपनापन। कुछ
भी उसकी जिंदगी में शेष नहीं रेह गया। शादी की तैयारी शुरू हो गई। रानी के आंसू
जैसे गांव की हर धूल में घुल गए। धनिया ने रानी पर सतर्क निगरानी रखी। किसी भी तरह की भागने की
फिराक को छीनने के लिए उसने हर रास्ता बंद कर दिया था। और फिर रानी का विवाह उसी गांव के बहुत गरीब और भिखारी से
संपन्न हुआ। ये विवाह किसी प्रेम या इच्छा
का नतीजा नहीं था बल्कि धनिया के स्वार्थ
और अपमान की सजा था। शादी के बाद की जिंदगी जिसने पहले उसे जंगल की ठहराव वाली
नीरवता में कुछ राहत दी थी। अब फिर से कठोरता से भर गई। उसका पति निर्लज्ज और
स्वभाव से उदास था रानी की किसी बात को
सम्मान से नहीं सुनता था। वो उसकी भावनाओं
को तुच्छ समझता। उसकी इच्छाओं का मजाक उड़ाता और उसे घरेलू कामकाज के अलावा कुछ और
मानता ही नहीं। रानी ने शुरुआत में सोचा
कि शायद समय के साथ उसका पति बदल जाएगा या कहीं से मदद आ जाएगी। पर उम्मीदें टूटती
रही। धीरे-धीरे उसने अपनी पति की बेरुखी को भी स्वीकार कर लिया। दिन-रात बिना शिकायत के वो अपने पति की देखभाल करने लगी। खाना पकाना,
साफ सफाई, उसके छोटे-मोटे कष्ट सहना। उसने अपनी घुटती इच्छा, आवाज को भीतर दबा लिया। उस घर में उसकी सबसे
बड़ी प्रताड़ना उसकी ननद से थी। उसकी ननद हर बात में ताने कसी। रानी की कमजोरियों को मुद्दा बनाकर उसे नीचा दिखाती।
गांव वालों के सामने उसकी इज्जत गिराने से भी नहीं चूकती। कभी कपड़ों के बारे में
कटाक्ष तो कभी उसके अतीत को मजाक का विषय बना देना। ऐसा व्यवहार रोजमर्राज बन गया। रानी के जीवन में मानो तकलीफों ने अपना ठिकाना बना
लिया था। मगर उसकी आत्मा टूटती नहीं थी। वो अंदर ही अंदर गूंजती रही। एक मौन आवाज जो
बार-बार केहती थी कि ये सब स्थाई नहीं है।
वो छोटी-छोटी बातों में अपने आप को बचाती।
सुबह का पेहला कप चाय, किसी बच्चे की
हंसी, रात में आकाश का एक तारा ये
सूक्ष्म पलों ने उसे जिंदा रखा। वो दिन
रात सेवा करती। पर वहां उसे सम्मान नहीं। केवल तीखा, व्यंग और तिरस्कार मिलता। कभी-कभी वो सोचती कहां गलत हो गया। पिता का संघर्ष, जंगल की एकांतता, जगन्नाथ जी का
दया समर्थन सब किसी दूर बैठे हुए किस्से लगने लगे थे। किस्मत ने उसे बार-बार परखा
था और वो तब भी टूट कर गिरना नहीं चाहती
थी। दिन जैसे तैसे कट रहे थे। रानी अब
अपने कष्टों की आदि हो चली थी। चुपचाप घर के काम करती, ताने सुनती और बिना जवाब दिए अपने भीतर की शांति को बचाने
की कोशिश करती। लेकिन तकदीर ने अभी भी उसे चैन से जीने का मौका नहीं दिया था। एक
दिन उसकी ननद ने जो हर बात में आग लगाने का शौक रखती थी, घर में झगड़ा शुरू कर दिया। उसने अपने भाई राजू के कानों में जहर घोलते हुए कहा,
भैया, तुम्हारे पैसे गायब हो गए हैं। मुझे पूरा यकीन
है कि ये सब रानी की ही करतूत है। मैंने उसे आखिरी बार पैसों के
पास ही देखा था।
राजू पहले ही रानी से दूरी बना चुका था। वो बिना कुछ पूछे, बिना किसी सबूत के बस अपनी बेहन की बातों पर यकीन कर बैठा। रानी
ने कांपती आवाज में कहा,
मैंने कुछ भी नहीं लिया।
सच में भगवान की कसम मैं बिल्कुल बेगुनाह हूं। तुम मुझ पर शक क्यों कर रहे हो?
मैंने कभी तुम्हारे भरोसे को ठेस नहीं
पहुंचाया। फिर भी मुझे इस तरह फंसाया जा रहा है। ये सही नहीं है। मेरी इज्जत और सच के साथ खेला जा
रहा है।
पर उसकी बात सुनने वाला
कोई नहीं था। राजू ने गुस्से में उसे केह
दिया,
मैं अपनी बहन पर पूरा
भरोसा रखता हूं। तुम जानती हो वो झूठ कभी नहीं बोलती। अगर कुछ गड़बड़ हुई है,
तो वो तुम्हारे कारण ही हुई होगी। मैं जानता हूं
तुम्हारे हाथों में वो पैसे नहीं थे।
लेकिन ये सब देखकर मुझे गुस्सा आ रहा है।
मुझे समझ नहीं आता कि तुमने ऐसा क्यों किया।
उस रात रानी खामोशी से आंगन में बैठी रही। उसके सामने वही घर
था जिसे वो अपने कर्म से स्वर्ग बनाना
चाहती थी। पर आज वही घर उसके लिए कारागार बन चुका था। अगले दिन सुबह दरवाजे पर
दस्तक हुई। जब दरवाजा खोला तो सामने जगन्नाथ
जी खड़े थे। वही व्यक्ति जिन्होंने
कभी रानी को आश्रय दिया था। उनकी आंखों
में चिंता थी और चेहरे पर स्नेह।
रानी बेटा, तू मिल गई। मैंने तुझे बहुत ढूंढा। तेरे चाचा ने हमें मिलने नहीं दिया पर मैं
रुक नहीं पाया। तू चल मेरे साथ। अब तुझे इन बेड़ियों में रेहने की जरूरत नहीं।
जगन्नाथ काका
आपका एहसान मैं कभी नहीं भूल सकती। पर अब मैं किसी की बेटी या शरणार्थी नहीं रही।
मैं अब किसी की पत्नी हूं और इस घर की बहू हूं।
पर रानी ये कैसा
जीवन है जहां सम्मान नहीं। विश्वास नहीं और फिर तुम्हारे चाचा ने तुम्हारा विवाह
जबरदस्ती किया था ना।
काका जब मैंने अपने पिता
की चिता के सामने प्रण लिया था कि उनकी इज्जत पर आंच नहीं आने दूंगी तब मैंने ये भी ठाना था कि अपने कर्म से ही अपना भाग्य बदल लूंगी
और मैं अपने पति के घर में हूं। मैं ये घर
छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहती। ये मेरे पति
का घर है।
जब रानी और जगन्नाथ
जी घर में बातें कर रहे थे। राजू उसका पति दूर से सब कुछ सुन रहा था। उसने पहली
बार महसूस किया कि रानी कितनी नेक,
ईमानदार और संवेदनशील लड़की है। उसकी हर बात
में शालीनता थी। हर शब्द में सच्चाई और सम्मान। राजू को अपने पिछले व्यवहार पर गहरा पछतावा हुआ । वो सोचने लगा, मैंने उसे कितना गलत समझा। कितनी बार उसके प्रति अनुचित व्यवहार
किया। जैसे ही सुबह हुई, राजू ने ठान लिया कि अब समय है सुधार का। वो धीरे-धीरे रानी के पास गया और अपनी गलती स्वीकार की।
रानी , मैं जानता हूं कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। मेरे शब्दों ने तुम्हारे दिल को चोट
पहुंचाई और मेरे गुस्से ने हमारी भरोसे की नींव को हिला दिया। मैं इस बात के लिए
खुद पर शर्मिंदा हूं कि मैंने तुम्हें बिना सुने ही दोषी ठेहरा दिया। तुम्हारे
विश्वास और सच्चाई को मैंने नजरअंदाज किया और इसके लिए मुझे सच में बहुत पछतावा
है। मुझे एहसास हुआ कि तुम हमेशा मेरे लिए ईमानदार और भरोसेमंद रही हो और मैंने
इसका सम्मान नहीं किया। कृपया मुझे माफ कर दो। मुझे अपनी गलती सुधारने का मौका दो।
मैं वादा करता हूं कि आगे कभी तुम्हारे भरोसे को तोडूंगा नहीं।
रानी ने उसकी आंखों में सच्चाई देखी और समझ गई कि राजू
अब बदल चुका है। उस दिन से दोनों ने मिलकर
जीवन को नई शुरुआत दी। रानी ने घर का काम
किया। राजू ने उसका सम्मान किया और
धीरे-धीरे उनके बीच विश्वास और अपनापन बढ़ने लगा। रानी की ननद जिसने पेहले उसे ताने मारे थे उसे देखकर
चुप हो गई। राजू ने साफ केह दिया
दीदी अगर तुम यहां रेहना चाहती हो तो रहो। घर पर तुम्हारा पूरा हक है।
बस हमारे निजी मामलों में दखल मत दो और रानी का सम्मान करो। वो इस घर की बहू और मेरी पत्नी
है। यही नियम है ताकि हम सब शांति से रेह सकें।
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