गाँव का नाम था शिवपुर। वही पुराना शिवपुर, जहाँ के लोग सादे दिल के थे और जहाँ कभी-कभी चतुर ब्राह्मण अपनी बुद्धि के ऐसे चमत्कार दिखा जाता था कि लोग वर्षों तक उसकी चर्चा करते रहते थे। पिछली बार जब उसने लालची सेठ को उसकी ही चाल में फँसाया था, तब से पूरे गाँव में उसकी अक़्ल की धाक बैठ गई थी। लोग उसे सम्मान से देखते थे, पर कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके मन में ईर्ष्या पलने लगी थी। उन्हीं में से एक था पंडित हरिहर, जो स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान समझता था, पर भीतर से घमंडी और चालाक था।
एक दिन की बात है। गाँव में खबर फैली कि पास के राज्य विजयनगर का राजा एक बड़ा यज्ञ कराने वाला है। राजा ने घोषणा करवाई थी कि जो भी विद्वान
ब्राह्मण यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराएगा, उसे भारी इनाम मिलेगा—सोने की मुद्राएँ, रेशमी वस्त्र और राज्य से सम्मान। यह सुनते ही कई ब्राह्मणों के कान खड़े हो
गए। पंडित हरिहर को लगा कि यही मौका है चतुर ब्राह्मण को नीचा दिखाने का। उसने मन
ही मन निश्चय कर लिया कि इस बार वह राजा के सामने स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान
सिद्ध करेगा।
उधर चतुर ब्राह्मण अपने घर के आँगन में बैठा तुलसी को पानी दे रहा था। उसकी
पत्नी ने उससे कहा, “सुनते हो, विजयनगर में राजा यज्ञ करवा रहा है। लोग कह रहे हैं कि बहुत
बड़ा इनाम मिलेगा।” चतुर ब्राह्मण मुस्कुरा दिया। बोला, “इनाम से ज़्यादा मुझे वहाँ होने वाले खेल में मज़ा आएगा।
जहाँ बड़ा इनाम होता है, वहाँ बड़ा छल
भी होता है।” उसकी आँखों में वही पुरानी चमक लौट आई थी—वह चमक जो किसी नई चाल की
शुरुआत का संकेत देती थी।
अगले ही दिन गाँव से कई ब्राह्मण विजयनगर के लिए निकल पड़े। पंडित हरिहर
जानबूझकर चतुर ब्राह्मण के पास आया और मीठी आवाज़ में बोला, “भाई, क्यों न हम साथ
चलें? रास्ते में धर्म-कर्म की
बातें होंगी।” चतुर ब्राह्मण उसकी नीयत भाँप गया, पर उसने कुछ कहा नहीं। मुस्कुराकर बोला, “ज़रूर, साथ चलने से रास्ता छोटा
लगता है।” भीतर ही भीतर वह समझ चुका था कि यह यात्रा साधारण नहीं होने वाली।
रास्ते में हरिहर बार-बार शास्त्रों के कठिन श्लोक सुनाने लगा, ताकि चतुर ब्राह्मण को नीचा दिखा सके। वह जानबूझकर ऐसे
प्रश्न पूछता, जिनका उत्तर कठिन लगता।
लेकिन चतुर ब्राह्मण हर बार सरल उदाहरण देकर उत्तर दे देता। कभी किसान की खेती से, कभी ग्वाले की गाय से। राह चलते लोग रुककर सुनने लगते और
हरिहर की जगह चतुर ब्राह्मण की प्रशंसा होने लगती। यह देखकर हरिहर का मन और भी
जलने लगा।
जब वे विजयनगर पहुँचे, तो वहाँ का
वैभव देखकर सब दंग रह गए। ऊँचे महल, चौड़ी सड़कें
और हर जगह सैनिकों की निगरानी। राजा का दरबार अगले दिन लगना था। रात को सभी
ब्राह्मणों के ठहरने की व्यवस्था एक बड़े धर्मशाला में की गई। वहीं हरिहर ने कुछ
अन्य ईर्ष्यालु ब्राह्मणों को इकट्ठा किया और कानाफूसी में बोला, “अगर चतुर ब्राह्मण राजा के सामने छा गया, तो हम सब खाली हाथ लौटेंगे।” सबने सिर हिलाया। फिर एक ने
पूछा, “तो उपाय क्या है?” हरिहर की आँखों में चालाकी चमक उठी—“उपाय है, बस सही समय पर फँसाना होगा।”
उधर चतुर ब्राह्मण धर्मशाला के कोने में चुपचाप बैठा सब देख-सुन रहा था। वह
जानता था कि उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा जा रहा है। पर वह घबराया नहीं। उसने मन ही
मन सोचा, “जब तक सामने वाले की चाल
पूरी न समझ लूँ, तब तक अपनी चाल चलना
मूर्खता है।” उसने आँखें बंद कीं और अगले दिन के यज्ञ की कल्पना करने लगा।
सुबह होते ही शंखनाद हुआ और सभी ब्राह्मणों को राजमहल बुलाया गया। राजा
सिंहासन पर विराजमान था। उसकी आँखें तेज़ थीं और आवाज़ में अधिकार। उसने कहा, “आज मैं केवल मंत्र नहीं, बुद्धि भी देखना चाहता हूँ। जो धर्म को समझे, वही यज्ञ का अधिकारी होगा।” यह सुनते ही चतुर ब्राह्मण हल्के से मुस्कुराया, जबकि हरिहर के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
यज्ञ शुरू होने ही वाला था कि राजा ने एक प्रश्न पूछा—ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर केवल शास्त्रों में नहीं, अनुभव में छिपा था। सभा में सन्नाटा छा गया। हरिहर आगे बढ़ा, पर शब्द उसके गले में अटक गए। तभी चतुर ब्राह्मण ने एक कदम
आगे रखा…
सभा में सन्नाटा छाया हुआ था। राजा का प्रश्न अभी भी हवा में तैर रहा था। उसने
पूछा था, “बताओ, वह कौन-सा धर्म है जो न तो ग्रंथों में पूरा मिलता है, न ही केवल यज्ञों से सिद्ध होता है, फिर भी उसी पर राज्य और समाज टिका रहता है?” यह प्रश्न सुनकर कई बड़े-बड़े विद्वान ब्राह्मण भी एक-दूसरे
का मुँह देखने लगे। पंडित हरिहर आगे तो आया था, पर उसके होंठ काँपने लगे। उसे शास्त्रों के श्लोक याद थे, पर राजा अनुभव की बात पूछ रहा था, यह बात उसके समझ में देर से आई।
तभी चतुर ब्राह्मण ने शांत भाव से राजा की ओर देखा और बोला, “महाराज, आज्ञा हो तो एक
छोटा सा उदाहरण दूँ?” राजा ने सिर
हिलाकर अनुमति दे दी। चतुर ब्राह्मण बोला, “मान लीजिए, एक किसान है। वह रोज़ खेत
में हल चलाता है, बीज बोता है, पानी देता है। वह वेद नहीं पढ़ता, मंत्र नहीं जानता, पर अगर वह ईमानदारी से अपना काम करे, तो अनाज उपजता है। वही अनाज राजा की सेना खाती है, प्रजा का पेट भरता है। यही कर्म और निष्ठा का धर्म है, जो बिना बोले समाज को चला रहा है।” सभा में धीमी-धीमी
सराहना की आवाज़ गूँजने लगी।
राजा के चेहरे पर संतोष झलक उठा। उसने कहा, “तुम्हारी बात में सच्चाई है।” यह सुनते ही हरिहर के भीतर आग लग गई। उसने तुरंत
एक नई चाल सोची। वह बोला, “महाराज, यह तो सामान्य बात हुई। असली विद्वता तो यज्ञ की विधि में
दिखाई देती है। मैं प्रमाण सहित बता सकता हूँ कि कौन सही मंत्र जानता है और कौन
नहीं।” उसके इस कथन में छिपा अर्थ साफ था—वह चतुर ब्राह्मण को मंत्रों में फँसाना
चाहता था।
राजा ने चुनौती स्वीकार कर ली। उसने आदेश दिया कि सभी प्रमुख ब्राह्मण यज्ञ की
एक-एक विधि समझाएँ। हरिहर को भरोसा था कि कठिन मंत्रों में चतुर ब्राह्मण पिछड़
जाएगा। जब हरिहर की बारी आई, तो उसने
भारी-भरकम संस्कृत श्लोकों की झड़ी लगा दी। शब्द सुनने में प्रभावशाली थे, पर भाव समझना कठिन। कुछ दरबारी तो सिर हिलाने लगे, पर उनकी आँखों में भ्रम साफ दिख रहा था।
अब चतुर ब्राह्मण की बारी थी। उसने कोई लंबा श्लोक नहीं पढ़ा। वह बोला, “महाराज, मंत्र तभी फल
देते हैं जब मन शुद्ध हो। अगर यज्ञ करने वाला भीतर से लालची हो, तो अग्नि भी मौन रह जाती है।” उसने यज्ञ की हर विधि को सरल
भाषा में समझाया—क्यों लकड़ी डाली जाती है, क्यों घी अर्पित होता है, और क्यों यज्ञ
केवल दिखावा नहीं, बल्कि त्याग का
प्रतीक है। उसकी बातें सीधे दिल में उतर रही थीं।
यह देखकर राजा ने यज्ञ का दायित्व चतुर ब्राह्मण को सौंप दिया। यही वह क्षण था, जिसका हरिहर को डर था। मगर वह चुप नहीं बैठा। उसने कुछ
ब्राह्मणों के साथ मिलकर रात में यज्ञ सामग्री बदलने की योजना बना ली, ताकि अगली सुबह दोष निकल आए और दोष चतुर ब्राह्मण पर आए।
उसे लगा कि उसकी चाल कोई नहीं समझेगा।
लेकिन हरिहर भूल गया था कि चतुर ब्राह्मण केवल बोलने में ही नहीं, देखने में भी तेज़ था। रात को जब सब सोने का नाटक कर रहे थे, तब चतुर ब्राह्मण ने धर्मशाला में हलचल महसूस की। उसने बिना
कुछ कहे सब नोट कर लिया और मन ही मन मुस्कुराया। उसे अब पूरी चाल समझ में आ चुकी
थी।
सुबह यज्ञ शुरू हुआ। जैसे ही सामग्री अग्नि में डाली जाने लगी, एक ब्राह्मण ने ऊँची आवाज़ में कहा, “यह सामग्री शुद्ध नहीं लगती!” सभा में खलबली मच गई। सबकी
निगाहें चतुर ब्राह्मण पर टिक गईं। हरिहर के चेहरे पर हल्की-सी जीत की मुस्कान आ
गई। पर तभी चतुर ब्राह्मण ने हाथ उठाकर सबको रोका और बोला, “महाराज, सत्य सामने आने
दीजिए।”
उसने राजा से अनुमति लेकर सभी सामग्री की जाँच करवाई और फिर शांत स्वर में
बोला, “जो शुद्ध नहीं है, वह आज रात बदली गई है। और जिसने बदली है, वह यज्ञ का अपमान नहीं, बल्कि स्वयं धर्म का अपमान कर रहा है।” यह सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया।
हरिहर के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी।
अब सबकी निगाहें राजा पर थीं…
सभा में सन्नाटा ऐसा था जैसे समय थम गया हो। राजा की गंभीर दृष्टि एक-एक
ब्राह्मण पर घूम रही थी। चतुर ब्राह्मण के शब्दों ने सबके मन में शंका जगा दी थी।
राजा ने आदेश दिया, “जो कह रहा है
कि सामग्री बदली गई है, वह प्रमाण दे।”
यह सुनते ही हरिहर के हृदय की धड़कन तेज़ हो गई। उसे लग रहा था कि अब बचना कठिन है, फिर भी उसने चेहरे पर मासूमियत ओढ़ ली।
चतुर ब्राह्मण ने आगे बढ़कर कहा, “महाराज, यज्ञ की सामग्री केवल वस्तु नहीं होती, उसमें मंत्रों से संस्कार भी जुड़े होते हैं। रात को जो
सामग्री बदली गई, उस पर संस्कार
नहीं हैं। अगर अनुमति हो, तो मैं एक छोटा
सा परीक्षण करूँ।” राजा ने तुरंत अनुमति दे दी। चतुर ब्राह्मण ने दोनों प्रकार की
सामग्री अग्नि के पास रखवाई और एक ही मंत्र दोनों पर पढ़ा। जिस सामग्री पर संस्कार
था, उसमें अग्नि तेज़ हो उठी, और दूसरी पर अग्नि शांत रही। सभा में हलचल मच गई।
अब राजा का क्रोध स्पष्ट दिखाई देने लगा। उसने कड़क आवाज़ में कहा, “यह कृत्य किसका है?” कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था। तभी धर्मशाला का एक सेवक काँपते हुए आगे
आया और बोला, “महाराज, रात को मैंने पंडित हरिहर और उनके साथियों को सामग्री कक्ष
के पास देखा था।” यह सुनते ही हरिहर का चेहरा पीला पड़ गया। उसने सफ़ाई देने की
कोशिश की, पर शब्द उसका साथ छोड़ चुके
थे।
राजा ने तुरंत निर्णय सुनाया, “धर्म के नाम पर
छल करने वाला विद्वान नहीं, अपराधी होता
है।” हरिहर और उसके साथियों को दरबार से निकाल दिया गया। उनकी विद्वता, जो अब तक घमंड का कारण थी, उसी दिन अपमान में बदल गई। सभा में उपस्थित लोग चतुर ब्राह्मण की बुद्धि और
संयम की प्रशंसा करने लगे।
इसके बाद यज्ञ पूर्ण विधि-विधान से संपन्न हुआ। अग्नि शांत थी, वातावरण पवित्र और राजा का मन संतुष्ट। यज्ञ के समापन पर
राजा ने चतुर ब्राह्मण को अपने पास बुलाया और कहा, “तुमने आज केवल यज्ञ नहीं कराया, बल्कि मुझे यह
भी सिखाया कि सच्ची विद्वता सरलता और सत्य में होती है।” उसने चतुर ब्राह्मण को
सोने की मुद्राएँ, बहुमूल्य
वस्त्र और राज्य से सम्मान प्रदान किया।
पर चतुर ब्राह्मण ने विनम्रता से कहा, “महाराज, मुझे इनाम से अधिक संतोष इस
बात का है कि धर्म की रक्षा हुई।” यह सुनकर राजा और भी प्रभावित हुआ। उसने आदेश
दिया कि चतुर ब्राह्मण को जब चाहे राजदरबार में आने का अधिकार रहेगा। यह सम्मान
किसी धन से कम नहीं था।
जब चतुर ब्राह्मण अपने गाँव लौटा, तो पूरे शिवपुर
में उत्सव का माहौल था। वही लोग जो कभी ईर्ष्या करते थे, अब गर्व से उसका नाम लेते थे। उसने सबको एक ही सीख
दी—“बुद्धि का उपयोग कभी छल के लिए मत करो, क्योंकि छल अंत में स्वयं को ही जला देता है।” उसकी यह बात गाँव वालों के मन
में गहराई से बैठ गई।
रात को अपने घर के आँगन में बैठा चतुर ब्राह्मण आकाश की ओर देख रहा था। उसकी
पत्नी ने मुस्कुराकर पूछा, “अब अगला यज्ञ
कहाँ होगा?” वह हँस पड़ा और बोला, “जहाँ अन्याय होगा, वहीं मेरी अगली परीक्षा होगी।” उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी—नई कहानी, नई चुनौती की चमक।
Comments
Post a Comment