Skip to main content

दो भाई की कहानी

  FULL STORY   N कड़ाके की ठंड अपनी पूरी ताकत के साथ गांव पर उतर आई थी। तालाब के किनारे बने कच्चे घर की दीवारों की दरारों से सर हवा सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मिट्टी के उस छोटे से घर   में टूटी चारपाई पर एक पुरानी पतली रजाई ओढ़े हरीलाल   और उसका बीटा सोहन सिमटे बैठे थे। SON बाबा घर में आटा भी खत्म हो चुका है और जलाने के लिए लकड़ियां भी नहीं बची हैं। अगर सुबह तक कुछ इंतजाम नहीं हुआ तो हम क्या खाएंगे और इतनी ठंड में रात कैसे गुजरेगी ? FATHER बेटा   आज पूरा दिन गांव में काम की तलाश में भटकता रहा। पर किसी ने एक वक्त की मजदूरी तक नहीं दी। जेब खाली है और दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है। समझ नहीं आ रहा कि किस दरवाजे पर जाऊं। SON आप फिर से जाइए बाबा। कहीं ना कहीं तो काम मिलेगा ही। जब तक आप हिम्मत नहीं हारेंगे , मैं भी नहीं हारूँगा । FATHER जाऊंगा बेटा   जरूर जाऊंगा। जब तक मेरे बूढ़े हाथ चल रहे हैं , तब तक तुझे भूखा पेट नहीं सोने दूंगा। N अगली सुबह धुंध के बीच हरीलाल   अलग-अलग घरों के दरवाजों पर जाता है। FATHER काकी कोई भी छोटा-मो...

चतुर ब्राह्मण

 बहुत समय पहले की बात है। उत्तर भारत के एक समृद्ध और शांत गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम था देवशर्मा। देवशर्मा अत्यंत गरीब था, लेकिन विद्या, बुद्धि और चतुराई में उसका कोई मुकाबला नहीं था। उसके पास न तो अधिक धन था, न बड़ी ज़मीन, और न ही कोई प्रभावशाली रिश्तेदार। उसकी संपत्ति केवल उसका तेज़ मस्तिष्क, शास्त्रों का ज्ञान और परिस्थितियों को समझने की अद्भुत क्षमता थी। गाँव के लोग उसे सम्मान तो देते थे, लेकिन उसकी गरीबी का मज़ाक भी उड़ाते थे।

देवशर्मा रोज़ सुबह उठकर नदी में स्नान करता, पूजा-पाठ करता और फिर भिक्षा के लिए गाँव में निकल जाता। जो कुछ मिलता, उसी में संतोष करता। उसकी पत्नी, जिसका नाम सीता था, सरल स्वभाव की स्त्री थी। वह अपने पति की बुद्धि पर गर्व करती थी, लेकिन अक्सर चिंता में रहती कि केवल चतुराई से पेट कब तक भरेगा। कई बार वह देवशर्मा से कहती, “स्वामी, आपकी बुद्धि तो अपार है, परंतु उसका उपयोग करके हमें अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहिए।”

एक दिन गाँव में राजा के सिपाही आए। उन्होंने घोषणा की कि पड़ोसी राज्य में एक महान यज्ञ होने वाला है और राजा ने सभी विद्वान ब्राह्मणों को आमंत्रित किया है। जो ब्राह्मण यज्ञ में भाग लेंगे, उन्हें भोजन, वस्त्र और धन दिया जाएगा। यह सुनकर देवशर्मा के मन में आशा की किरण जगी। उसने सोचा कि यह अवसर उसके जीवन को बदल सकता है।

अगली सुबह वह अपनी पत्नी से विदा लेकर यात्रा पर निकल पड़ा। मार्ग लंबा था, जंगलों और पहाड़ियों से होकर गुजरना पड़ता था। रास्ते में उसे कई प्रकार के लोग मिले—साधु, व्यापारी, ठग और यात्री। देवशर्मा हर किसी को ध्यान से देखता, उनकी बातें सुनता और मन ही मन अनुभव बटोरता जा रहा था। वह जानता था कि संसार केवल शास्त्रों से नहीं, बल्कि व्यवहारिक ज्ञान से चलता है।

जंगल के बीचों-बीच चलते हुए उसे एक रोता हुआ व्यक्ति दिखाई दिया। वह व्यक्ति एक व्यापारी था, जिसका धन लुटेरों ने लूट लिया था। देवशर्मा ने उसे सांत्वना दी और बुद्धिमानी से सलाह दी कि जीवन में धैर्य और विवेक सबसे बड़ा धन है। व्यापारी उसकी बातों से प्रभावित हुआ और उसे कुछ भोजन दे दिया। देवशर्मा ने महसूस किया कि उसकी वाणी भी उसकी शक्ति है।

कुछ दिनों बाद वह उस नगर पहुँचा जहाँ यज्ञ होना था। नगर अत्यंत भव्य था—ऊँचे महल, चौड़ी सड़कें और बाज़ारों में चहल-पहल। यज्ञशाला में देश-देश से आए विद्वान ब्राह्मण एकत्र थे। कोई वेदों का पाठ कर रहा था, कोई शास्त्रार्थ में लगा था। देवशर्मा ने देखा कि कई ब्राह्मण दिखावे में विद्वान थे, परंतु उनके भीतर वास्तविक ज्ञान और समझ का अभाव था।

यज्ञ के पहले दिन राजा स्वयं पधारे। राजा विद्वानों की परीक्षा लेना चाहता था। उसने घोषणा की कि जो ब्राह्मण अपनी बुद्धि और विवेक से कठिन प्रश्नों का उत्तर देगा, उसे विशेष पुरस्कार मिलेगा। यह सुनकर देवशर्मा शांत भाव से बैठा रहा। उसे अपने ज्ञान पर भरोसा था, लेकिन वह अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।

राजा ने पहला प्रश्न पूछा—“संसार में सबसे बड़ा धन क्या है?” कई ब्राह्मणों ने उत्तर दिया—सोना, भूमि, शक्ति, राज्य। जब देवशर्मा की बारी आई, उसने विनम्रता से कहा, “महाराज, संसार में सबसे बड़ा धन है बुद्धि, क्योंकि धन, शक्ति और राज्य भी बुद्धि से ही प्राप्त और सुरक्षित किए जा सकते हैं।” राजा उसके उत्तर से प्रसन्न हुआ।

इसके बाद राजा ने और भी कठिन प्रश्न पूछे। देवशर्मा हर बार सरल लेकिन गहन उत्तर देता गया। धीरे-धीरे सभा में उसकी चर्चा होने लगी। अन्य ब्राह्मण उसके प्रति ईर्ष्या करने लगे। उन्हें डर था कि यह गरीब ब्राह्मण कहीं राजा का विशेष कृपापात्र न बन जाए।

यज्ञ समाप्त होने पर राजा ने देवशर्मा को पुरस्कार स्वरूप स्वर्ण मुद्राएँ, वस्त्र और सम्मान दिया। देवशर्मा ने सब कुछ विनम्रता से स्वीकार किया। परंतु उसके मन में घमंड नहीं था। वह जानता था कि यह तो जीवन की शुरुआत है, अंत नहीं।

जब वह नगर से लौटने की तैयारी कर रहा था, तभी कुछ ईर्ष्यालु ब्राह्मणों ने उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचना शुरू कर दी। उन्होंने सोचा कि उसकी चतुराई को उसी के विरुद्ध प्रयोग किया जाए। देवशर्मा को इस बात का आभास हो गया था, लेकिन वह मौन रहा। वह जानता था कि आने वाले समय में उसकी असली परीक्षा होने वाली है।

यात्रा के दौरान, जब वह एक सराय में ठहरा, तो कुछ अजनबी लोग उससे मित्रता करने लगे। उनकी बातें सुनकर देवशर्मा समझ गया कि वे साधारण यात्री नहीं हैं। उसके मन में संदेह जागा, लेकिन उसने अपना व्यवहार सामान्य रखा। वह जानता था कि चतुराई केवल बोलने में नहीं, बल्कि सही समय पर मौन रहने में भी होती है।

यहीं से देवशर्मा के जीवन की वह यात्रा शुरू होती है, जिसमें उसकी बुद्धि, धैर्य और चतुराई बार-बार उसकी रक्षा करती है और उसे नई ऊँचाइयों तक ले जाती है। आने वाले समय में उसे धोखे, लालच, भय और कठिन निर्णयों का सामना करना होगा—और हर बार उसे यह सिद्ध करना होगा कि सच्ची चतुराई केवल अपने लिए नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के लिए प्रयोग की जानी चाहिए।

सराय में रात गहराने लगी थी। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और भीतर दीपक की मंद लौ काँप रही थी। देवशर्मा चुपचाप एक कोने में बैठा भोजन कर रहा था, लेकिन उसका मन पूरी तरह सतर्क था। जिन अजनबी यात्रियों से उसकी बातचीत हुई थी, उनके शब्दों से अधिक उनके हाव-भाव उसे बेचैन कर रहे थे। अनुभव से वह समझ चुका था कि संसार में हर मुस्कान सच्ची नहीं होती।

रात के मध्य, जब अधिकांश यात्री सो चुके थे, देवशर्मा ने देखा कि वही अजनबी आपस में धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं। उन्होंने बार-बार उसकी ओर देखा। देवशर्मा को अब पूरा विश्वास हो गया कि यह कोई साधारण संयोग नहीं था। उसने तुरंत निर्णय लिया कि डरने के बजाय अपनी बुद्धि से स्थिति को संभालना ही उचित होगा।

सुबह होने से पहले ही देवशर्मा सराय से निकल पड़ा, लेकिन उसने ऐसा दिखाया मानो वह अनजान हो। कुछ दूरी पर जाकर वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और देखने लगा कि वे लोग क्या करते हैं। कुछ ही समय में वही अजनबी भी सराय से निकले और उसी मार्ग पर चल पड़े। यह स्पष्ट हो गया कि वे उसी का पीछा कर रहे थे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने देवशर्मा को घेर लिया और कठोर स्वर में बोले, “हे ब्राह्मण, तुम बहुत चतुर बनते हो। राजा से जो धन और सम्मान तुम्हें मिला है, वह हमें सौंप दो, नहीं तो तुम्हारा अंत निश्चित है।” यह सुनकर देवशर्मा तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसके चेहरे पर शांति थी।

उसने मुस्कराकर कहा, “भाइयों, मैं तो एक गरीब ब्राह्मण हूँ। जो कुछ मिला है, वह धर्म का प्रसाद है। पर यदि तुम उसे लेना ही चाहते हो, तो पहले एक छोटी-सी बात सुन लो।” उसकी शांत वाणी ने उन लोगों को थोड़ी देर के लिए भ्रम में डाल दिया।

देवशर्मा ने आगे कहा, “यह धन साधारण नहीं है। इसे राजा ने यज्ञ की पवित्र अग्नि के सामने दिया है। यदि इसे अधर्म से लिया गया, तो भयंकर अनर्थ होगा। मैं स्वयं इससे मुक्त होना चाहता हूँ, परंतु इसका उपाय केवल एक ही है।” लुटेरे लालच में आ गए और बोले, “कौन-सा उपाय?”

देवशर्मा ने पास के नदी किनारे की ओर इशारा किया और कहा, “इस धन को पहले पवित्र जल में धोना होगा। तभी यह निष्पाप होगा।” वे लोग तुरंत मान गए। जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, देवशर्मा ने एक थैली उन्हें पकड़ा दी और दूसरी अपने पास रखी। अंधेरे और जल्दबाज़ी में उन्हें कुछ समझ नहीं आया।

जैसे ही वे लोग नदी में थैली धोने लगे, देवशर्मा ने जोर से चिल्लाया, “अरे! यह क्या कर रहे हो! यह राजा की मुहर वाली थैली है!” डर के मारे वे लोग घबरा गए। उसी समय देवशर्मा ने दूसरी दिशा में दौड़ लगा दी। वे लोग घबराहट में कुछ समझ ही नहीं पाए और जब तक संभलते, देवशर्मा दूर निकल चुका था।

कुछ समय बाद देवशर्मा एक दूसरे मार्ग से अपने गाँव की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में उसने सोचा कि केवल धन पाकर लौट जाना ही पर्याप्त नहीं है। संसार में ऐसे लोग हर जगह हैं जो दूसरों की बुद्धि और परिश्रम का फल छीनना चाहते हैं। उसने निश्चय किया कि अब वह अपनी चतुराई का प्रयोग केवल अपनी रक्षा के लिए नहीं, बल्कि समाज के हित के लिए करेगा।

गाँव पहुँचते ही उसकी पत्नी सीता अत्यंत प्रसन्न हुई। देवशर्मा ने उसे सारी कथा सुनाई। सीता ने कहा, “स्वामी, आज मुझे समझ आया कि सच्ची संपत्ति धन नहीं, बल्कि आपकी बुद्धि और धैर्य है।” देवशर्मा मुस्करा दिया।

कुछ ही दिनों में राजा के दरबार से संदेश आया। राजा को पता चला था कि कुछ ब्राह्मणों ने देवशर्मा के विरुद्ध षड्यंत्र किया था। राजा उसकी चतुराई से और भी प्रभावित हुआ और उसे दरबार में विशेष स्थान देने का विचार किया। यह समाचार पूरे गाँव में फैल गया।

लेकिन देवशर्मा जानता था कि दरबार की राजनीति सरल नहीं होती। वहाँ मित्रता से अधिक ईर्ष्या और षड्यंत्र होते हैं। फिर भी उसने यह अवसर स्वीकार किया, क्योंकि वह जानता था कि बड़े कार्य हमेशा बड़े जोखिम के साथ आते हैं।

दरबार में प्रवेश करते ही उसने देखा कि कई मंत्री और विद्वान उसे संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। वे सोच रहे थे कि एक साधारण गाँव का ब्राह्मण राजा के इतना निकट कैसे पहुँच गया। देवशर्मा ने किसी की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। वह जानता था कि समय ही उसकी सच्चाई सिद्ध करेगा।

राजा ने उसे एक कठिन कार्य सौंपा—राज्य में फैल रहे एक बड़े विवाद को सुलझाने का। यह विवाद दो शक्तिशाली ज़मींदारों के बीच था और यदि समय पर समाधान न हुआ, तो राज्य में अशांति फैल सकती थी। देवशर्मा समझ गया कि यही उसकी अगली और सबसे बड़ी परीक्षा है।

यहीं से उसकी चतुराई, धैर्य और न्यायबुद्धि की असली परीक्षा शुरू होती है—एक ऐसी परीक्षा जो न केवल उसके भाग्य को, बल्कि पूरे राज्य की शांति को निर्धारित करने वाली थी।

राजदरबार में उस दिन असाधारण हलचल थी। राजा अपने सिंहासन पर गंभीर मुद्रा में बैठे थे और उनके सामने दोनों ज़मींदार खड़े थे। एक का नाम रुद्रसेन था और दूसरे का भानु प्रताप। दोनों ही अत्यंत धनी, प्रभावशाली और अहंकारी थे। उनके बीच वर्षों से भूमि और जल के अधिकार को लेकर विवाद चल रहा था, जो अब हिंसा का रूप लेने लगा था। राजा चाहते थे कि बिना युद्ध के इस समस्या का समाधान हो, इसलिए उन्होंने देवशर्मा को यह दायित्व सौंपा था।

देवशर्मा ने दोनों ज़मींदारों की बातें ध्यान से सुनीं। कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। दोनों एक-दूसरे पर झूठ, धोखा और अन्याय के आरोप लगा रहे थे। दरबार के कई मंत्री किसी एक पक्ष का समर्थन कर रहे थे, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई थी। देवशर्मा समझ गया कि यह केवल भूमि का विवाद नहीं, बल्कि अहंकार और प्रभुत्व की लड़ाई है।

उसने राजा से कुछ समय माँगा और विवादित क्षेत्र का स्वयं निरीक्षण करने की अनुमति ली। अगले दिन वह वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि भूमि के बीच से बहने वाली नदी ही पूरे विवाद की जड़ थी। नदी का मार्ग वर्षों में थोड़ा बदल गया था, जिससे दोनों ज़मींदार अपने-अपने अधिकार का दावा कर रहे थे। देवशर्मा ने किसानों, बुज़ुर्गों और पुराने अभिलेखों से जानकारी इकट्ठा की।

कई दिनों के अध्ययन के बाद देवशर्मा ने समाधान निकाला। उसने दोनों ज़मींदारों को दरबार में बुलाया और कहा कि वह अपना निर्णय एक शर्त पर सुनाएगा—दोनों को पहले यह स्वीकार करना होगा कि वे राजा के निर्णय का सम्मान करेंगे। राजा की उपस्थिति में दोनों ने सहमति दे दी।

देवशर्मा ने कहा कि भूमि को नदी के वर्तमान मार्ग से नहीं, बल्कि पुराने प्राकृतिक चिन्हों और जनता के हित के आधार पर बाँटा जाएगा। उसने यह भी सुझाव दिया कि नदी के जल का उपयोग दोनों मिलकर करेंगे और उसके लिए एक साझा व्यवस्था बनेगी। यह निर्णय न केवल न्यायपूर्ण था, बल्कि राज्य की शांति के लिए भी आवश्यक था।

हालाँकि, दोनों ज़मींदारों के चेहरे पर असंतोष साफ़ दिखाई दे रहा था। वे मन ही मन देवशर्मा से नाराज़ हो गए। कुछ मंत्रियों ने भी उसके निर्णय पर सवाल उठाए। देवशर्मा समझ गया कि उसने शक्तिशाली लोगों के हितों को चुनौती दी है, और इसके परिणाम अवश्य होंगे।

कुछ दिनों बाद दरबार में अफ़वाह फैलने लगी कि देवशर्मा ने रिश्वत लेकर निर्णय दिया है। यह पूरी तरह झूठ था, लेकिन अफ़वाहें आग की तरह फैलती हैं। राजा भी कुछ समय के लिए असमंजस में पड़ गए। उन्होंने देवशर्मा को बुलाकर स्पष्टीकरण माँगा।

देवशर्मा ने शांत स्वर में कहा, “महाराज, सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन असत्य को सहारे की ज़रूरत होती है। यदि मुझे अवसर दिया जाए, तो मैं स्वयं अपने ऊपर लगे आरोपों को झूठा सिद्ध कर दूँगा।” राजा ने उसे तीन दिन का समय दिया।

इन तीन दिनों में देवशर्मा ने उन मंत्रियों और लोगों की सूची बनाई जो अफ़वाह फैला रहे थे। उसने बहुत सूझ-बूझ से उनके ही शब्दों और कर्मों को प्रमाण बना लिया। तीसरे दिन दरबार में उसने सबके सामने सत्य उजागर कर दिया। जिन लोगों ने आरोप लगाए थे, वही अपने ही जाल में फँस गए।

राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने देवशर्मा से क्षमा माँगी और उसे राज्य का प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया। अब देवशर्मा की प्रतिष्ठा और भी बढ़ गई, लेकिन उसके साथ ईर्ष्या भी कई गुना बढ़ गई।

देवशर्मा जानता था कि यह अभी अंत नहीं है। दरबार में ऐसे कई लोग थे जो उसकी बुद्धि से भयभीत थे। वे उसे किसी भी तरह नीचा दिखाना चाहते थे। देवशर्मा ने स्वयं से कहा कि सच्ची परीक्षा अभी बाकी है—एक ऐसी परीक्षा जो यह सिद्ध करेगी कि बुद्धि के साथ-साथ चरित्र भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

रात को वह अपने कक्ष में बैठा दीपक की लौ को देख रहा था। उसके मन में एक ही विचार था—यदि बुद्धि का प्रयोग स्वार्थ के लिए किया जाए, तो वह विनाश का कारण बनती है, लेकिन यदि वही बुद्धि धर्म और न्याय के लिए हो, तो वह समाज का मार्गदर्शन करती है।

आने वाले दिनों में एक ऐसा षड्यंत्र रचा जाएगा जो सीधे राजा और राज्य की सुरक्षा से जुड़ा होगा। और उसी षड्यंत्र में देवशर्मा को अपनी चतुराई की अंतिम और सबसे कठिन परीक्षा देनी होगी।

कुछ समय बीतने के बाद राज्य में शांति तो दिखाई दे रही थी, परंतु भीतर ही भीतर एक गहरा षड्यंत्र आकार ले रहा था। जिन मंत्रियों और ज़मींदारों की महत्वाकांक्षाओं पर देवशर्मा की बुद्धि ने रोक लगा दी थी, वे अब उसे हटाए बिना चैन से बैठने वाले नहीं थे। उन्होंने निश्चय किया कि इस बार केवल अपमान नहीं, बल्कि उसका पूर्ण विनाश ही उनका लक्ष्य होगा।

एक रात कुछ गुप्त मंत्रियों ने विदेशी आक्रमणकारियों से संपर्क किया। योजना यह थी कि जब राजा सीमा पर निरीक्षण के लिए जाएँ, तब राजधानी को असुरक्षित दिखाकर विद्रोह कराया जाए और इसका दोष देवशर्मा पर मढ़ दिया जाए। यदि राजा का विश्वास टूट जाए, तो देवशर्मा का अंत निश्चित था।

देवशर्मा को यह सूचना अप्रत्यक्ष रूप से एक साधारण सैनिक से मिली, जो उसकी ईमानदारी से प्रभावित था। देवशर्मा तुरंत समझ गया कि यह उसकी जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है। यदि उसने जल्दबाज़ी की, तो षड्यंत्रकारी सतर्क हो जाएँगे, और यदि देर की, तो राज्य संकट में पड़ जाएगा।

उसने सीधे राजा के पास जाने के बजाय प्रमाण इकट्ठा करने का मार्ग चुना। उसने अपने विश्वसनीय लोगों को अलग-अलग स्थानों पर भेजा और स्वयं साधारण वेश में नगर की गलियों में घूमने लगा। कुछ ही दिनों में उसे सबूत मिल गए—गुप्त संदेश, स्वर्ण मुद्राएँ और गवाही देने वाले लोग।

निर्धारित दिन जब राजा सीमा की ओर जाने वाले थे, उसी दिन देवशर्मा ने दरबार बुलाने का आग्रह किया। दरबार में जब षड्यंत्रकारी मंत्री भी उपस्थित थे, देवशर्मा ने शांत भाव से समस्त प्रमाण राजा के सामने रख दिए। प्रारंभ में कुछ मंत्री चिल्लाने लगे, लेकिन जब सैनिकों ने गुप्त संदेश और विदेशी दूतों को प्रस्तुत किया, तो सत्य सबके सामने आ गया।

राजा क्रोध से काँप उठे। उन्होंने तुरंत दोषियों को दंड देने का आदेश दिया। किंतु देवशर्मा ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, दंड से पहले एक शिक्षा आवश्यक है, ताकि भविष्य में कोई ऐसा दुस्साहस न करे।” राजा ने उसकी बात मानी।

देवशर्मा ने उन दोषियों से स्वयं स्वीकारोक्ति करवाई और उन्हें सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करने के लिए कहा कि सत्ता बिना धर्म के विनाश का कारण बनती है। इसके बाद राजा ने न्यायोचित दंड दिया, जिससे पूरे राज्य में स्पष्ट संदेश गया कि सत्य और बुद्धि के विरुद्ध किया गया कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं हो सकता।

राजा ने सभा में घोषणा की कि देवशर्मा केवल चतुर ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा है। उन्होंने उसे उच्च सम्मान, स्थायी संपत्ति और अधिकार देने की इच्छा प्रकट की। किंतु देवशर्मा ने विनम्रता से कहा, “महाराज, मुझे केवल इतना चाहिए कि मैं धर्म और न्याय के मार्ग पर राज्य की सेवा कर सकूँ।”

कुछ समय बाद देवशर्मा ने स्वयं ही राजदरबार से विदा लेने का निर्णय लिया। उसने कहा कि यदि वह सदा सत्ता के समीप रहेगा, तो लोग उसे सत्ता का प्रतीक समझने लगेंगे, न कि धर्म का। राजा उसकी इस सोच से और भी प्रभावित हुए।

वह अपने गाँव लौट आया। अब वही गाँव, जो कभी उसकी गरीबी पर हँसता था, आज उसका आदर करता था। देवशर्मा ने एक गुरुकुल की स्थापना की, जहाँ बच्चों को केवल शास्त्र ही नहीं, बल्कि विवेक, नैतिकता और व्यवहारिक बुद्धि की शिक्षा दी जाती थी।

वर्षों बाद, जब लोग चतुराई की बात करते, तो देवशर्मा का नाम सम्मान से लिया जाता। उसकी कथा यह सिखाती थी कि चतुराई यदि स्वार्थ से जुड़ जाए तो वह छल बन जाती है, लेकिन यदि वह सत्य और धर्म के साथ हो, तो वही चतुराई समाज का कल्याण करती है।

देवशर्मा का जीवन इस बात का प्रमाण था कि गरीब होना कमजोरी नहीं, और बुद्धि केवल लाभ कमाने का साधन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। उसने यह दिखाया कि सच्चा चतुर वही है, जो अपनी बुद्धि का प्रयोग दूसरों को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें ऊपर उठाने के लिए करे।

Comments

Popular posts from this blog

शेरू: एक वफ़ादार आत्मा

गाँव के बाहर पीपल के एक पुराने पेड़ के नीचे एक छोटा-सा कुत्ता अक्सर बैठा दिखाई देता था। उसकी आँखें भूरी थीं , लेकिन उनमें एक अजीब-सी चमक थी , जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो , बहुत कुछ सहा हो। गाँव वाले उसे “शेरू” कहकर बुलाते थे , हालाँकि कोई नहीं जानता था कि उसका असली नाम क्या है , या कभी कोई नाम था भी या नहीं। शेरू जन्म से आवारा नहीं था , लेकिन परिस्थितियों ने उसे आवारा बना दिया था। वह कभी किसी के घर का प्यारा पालतू रहा होगा , यह उसकी आदतों से साफ झलकता था—वह इंसानों से डरता नहीं था , बच्चों के पास जाते समय पूँछ हिलाता था , और किसी के बुलाने पर तुरंत ध्यान देता था। शेरू को सबसे ज़्यादा पसंद था सुबह का समय। जब सूरज धीरे-धीरे खेतों के पीछे से निकलता और हवा में ठंडक घुली रहती , तब वह पूरे गाँव का चक्कर लगाता। कहीं कोई रोटी का टुकड़ा मिल जाए , कहीं कोई दुलार कर दे , तो उसका दिन बन जाता। लेकिन गाँव के ज़्यादातर लोग उसे बस एक आवारा कुत्ता ही समझते थे—कोई पत्थर मार देता , कोई डाँट देता , और कोई अनदेखा कर देता। फिर भी शेरू का भरोसा इंसानों से कभी पूरी तरह टूटा नहीं। गाँव में एक छोटा-सा घर था , जह...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...