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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

लालची समोसा वाला

 लालच की पहली खुशबू

शहर के सबसे पुराने बाज़ार के कोने में, जहाँ दिन भर धूल उड़ती रहती थी और शाम को शोर से कान बजने लगते थे, वहीं एक छोटी-सी दुकान थी—“श्याम समोसा भंडार।” दुकान छोटी थी, लेकिन उसकी पहचान बड़ी थी। वजह स्वाद नहीं, बल्कि दुकानदार का स्वभाव था। श्यामलाल, जिसे लोग पीठ पीछे “लालची समोसा वाला” कहते थे, पूरे बाज़ार में अपने लालच के लिए मशहूर था।

श्यामलाल सुबह से पहले दुकान खोलता नहीं था, क्योंकि उसका मानना था कि जल्दी खोलने से ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है और मुनाफ़ा वही रहता है। वह हर चीज़ तौल-तौल कर देता—आलू कम, मटर गिने-चुने, और मसाले इतने कि बस नाम के हों। समोसा बाहर से बड़ा दिखता था, लेकिन अंदर से खोखला। फिर भी लोग खाते थे, क्योंकि बाज़ार में और कोई विकल्प नहीं था।

पैसे के मामले में श्यामलाल का दिल पत्थर से भी सख्त था। उधार तो दूर, अगर किसी ने गलती से एक रुपया कम दे दिया, तो वह समोसा छीन लेता। कई बार बच्चों के हाथ से भी प्लेट वापस ले ली जाती थी। लोगों की बद्दुआएँ उसकी दुकान के आसपास मंडराती रहती थीं, लेकिन श्यामलाल को फर्क नहीं पड़ता था। उसका मानना था—“दुनिया लालच से चलती है, मैं बस ईमानदारी से लालची हूँ।”

श्यामलाल का बचपन भी कुछ खास नहीं था। गरीबी में पला था, लेकिन गरीबी से उसने मेहनत नहीं, बल्कि डर सीखा था। उसे हमेशा लगता था कि अगर उसने ज़रा भी छोड़ा, तो दुनिया सब छीन लेगी। इसी डर ने उसे लालची बना दिया। वह न किसी से हँसकर बात करता था, न किसी की मदद करता था। उसके लिए हर इंसान ग्राहक था और हर ग्राहक सिर्फ पैसा।

उसकी दुकान के सामने एक बूढ़ा भिखारी रोज़ बैठता था। लोग उसे कभी समोसा दे देते, कभी पैसे। एक दिन भिखारी ने श्यामलाल से कहा, “बेटा, एक समोसा दे दे, कल पैसे दे दूँगा।” श्यामलाल ने बिना देखे जवाब दिया, “मेरी दुकान मंदिर नहीं है।” भिखारी चुपचाप उठ गया, लेकिन उसकी आँखों में जो उदासी थी, उसने कुछ पलों के लिए श्यामलाल के दिल में हलचल पैदा की—जो तुरंत ही दबा दी गई।

उसी बाज़ार में एक और समोसा वाला था—रघु। उसकी दुकान पर भीड़ कम रहती थी, लेकिन जो जाता था, मुस्कुराकर लौटता था। रघु थोड़ा कम कमाता था, पर दिल से अमीर था। श्यामलाल उसे मूर्ख समझता था। वह अक्सर कहता, “दया दिखाकर पेट नहीं भरता।” लेकिन जब वह देखता कि लोग रघु की इज़्ज़त करते हैं, तो उसके भीतर कहीं जलन जरूर होती थी।

एक दिन शहर में बड़ा मेला लगा। भीड़ ज़्यादा थी, मौका सुनहरा। श्यामलाल ने समोसे के दाम अचानक दोगुने कर दिए। लोगों ने मजबूरी में खरीदे। उस दिन उसने खूब पैसे कमाए, लेकिन उसी दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने उसकी ज़िंदगी की दिशा बदलनी शुरू कर दी।

शाम को एक थका हुआ आदमी दुकान पर आया। कपड़े पुराने थे, चेहरा पसीने से भीगा हुआ। उसने एक समोसा माँगा और पैसे कम पड़ गए। श्यामलाल ने उसे डाँटकर भगा दिया। आदमी कुछ दूर जाकर गिर पड़ा। लोग इकट्ठा हो गए। किसी ने पानी दिया, किसी ने सहारा। श्यामलाल दूर से यह सब देखता रहा, लेकिन आगे नहीं बढ़ा। उसे डर था—कहीं लोग उससे मुफ़्त समोसा न माँग लें।

उस रात श्यामलाल ठीक से सो नहीं पाया। पहली बार उसके कानों में सिक्कों की खनक नहीं, बल्कि उस आदमी की गिरती हुई देह की आवाज़ गूँज रही थी। उसने करवट बदली, आँखें बंद कीं, लेकिन नींद नहीं आई। कहीं भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे सवाल पूछने लगा था।

उसे नहीं पता था कि यह बेचैनी उसके लालच की नींव को हिला रही है, और आने वाले दिन उसे ऐसा सबक सिखाने वाले हैं, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

लालच का हिसाब

अगली सुबह श्यामलाल की आँख देर से खुली। रात भर जिस बेचैनी ने उसे सोने नहीं दिया था, वह अब भी उसके सीने में अटकी हुई थी। फिर भी उसने खुद को समझाया कि यह सब वहम है। उसने मन ही मन गिनती की—कल कितने समोसे बिके, कितना मुनाफ़ा हुआ, कितने नए नोट गल्ले में पड़े हैं। यही सोचकर उसने अपने मन को शांत किया और रोज़ की तरह दुकान खोलने बाज़ार की ओर चल पड़ा।

बाज़ार पहुँचा तो कुछ अजीब लगा। पहले जहाँ उसकी दुकान के सामने हमेशा भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज सन्नाटा था। दो-चार ग्राहक आए भी तो कीमत पूछकर चले गए। श्यामलाल को गुस्सा आया। उसने आवाज़ लगाई, “गरम समोसे! सबसे बढ़िया!” लेकिन आवाज़ में वह दम नहीं था, जो पहले हुआ करता था। लोग अब सीधे रघु की दुकान की ओर जा रहे थे।

रघु की दुकान पर आज कुछ खास था। वह हर ग्राहक को मुस्कुराकर समोसा दे रहा था और साथ में पानी भी। कुछ लोगों को उसने मुफ़्त समोसा भी दिया। यह देखकर श्यामलाल का खून खौल उठा। उसे लगा कि रघु जानबूझकर उसे नीचा दिखा रहा है। लेकिन भीतर कहीं एक डर भी जन्म लेने लगा—अगर यही हाल रहा, तो उसका क्या होगा?

दोपहर तक श्यामलाल ने जितने समोसे बेचे, उतने वह आमतौर पर एक घंटे में बेच देता था। उसने कीमत घटाने के बारे में सोचा, लेकिन लालच आड़े आ गया। “कम दाम में बेचकर क्या फ़ायदा,” उसने खुद से कहा, “मुनाफ़ा तो कम हो जाएगा।” यही सोचकर वह अपनी ज़िद पर अड़ा रहा।

शाम के समय वही बूढ़ा भिखारी फिर आकर दुकान के पास बैठ गया। आज उसके चेहरे पर कमजोरी साफ दिख रही थी। वह कुछ बोला नहीं, बस चुपचाप ज़मीन पर बैठा रहा। श्यामलाल ने उसे अनदेखा करने की कोशिश की, लेकिन उसकी मौजूदगी उसे परेशान कर रही थी। आखिरकार वह झुंझलाकर बोला, “यहाँ क्यों बैठा है? हट यहाँ से, ग्राहक डर जाते हैं।” भिखारी ने धीमी आवाज़ में कहा, “बेटा, आज बहुत भूख लगी है।” श्यामलाल ने गुस्से में मुँह फेर लिया।

उसी रात एक अनहोनी हो गई। श्यामलाल के घर में अचानक आग लग गई। आग बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन दुकान का कुछ सामान और आटे की बोरियाँ जल गईं। मोहल्ले वालों ने मिलकर आग बुझाई। जब सब शांत हुआ, तो श्यामलाल राख के ढेर को देखता रह गया। पहली बार उसे पैसों के अलावा किसी और चीज़ के खोने का एहसास हुआ।

अगले दिन दुकान खोलना उसके लिए मुश्किल हो गया। उधार माँगने की नौबत आ गई, लेकिन जिन लोगों को उसने कभी उधार नहीं दिया था, वे आज उसकी मदद करने से कतरा रहे थे। हर दरवाज़ा उसके लिए बंद होता जा रहा था। उसे समझ आने लगा कि लालच ने उसे अकेला कर दिया है।

रघु को जब आग की खबर मिली, तो वह खुद चलकर श्यामलाल के पास आया। उसने बिना कुछ कहे आटे की एक बोरी और थोड़ा सामान रख दिया। श्यामलाल अवाक् रह गया। जिस आदमी को वह हमेशा मूर्ख समझता था, वही आज उसके काम आया। उसकी आँखें भर आईं, लेकिन आदत के कारण उसने धन्यवाद तक नहीं कहा।

उस रात श्यामलाल देर तक बैठा सोचता रहा। उसे अपने बचपन की गरीबी याद आई, जब उसने ठान लिया था कि कभी किसी पर निर्भर नहीं रहेगा। लेकिन आज उसे समझ आ रहा था कि इंसान सिर्फ पैसों से नहीं, रिश्तों से भी ज़िंदा रहता है। लालच ने उसे पैसा तो दिया, लेकिन भरोसा छीन लिया।

उसे यह एहसास नहीं था कि यह तो बस शुरुआत है। असली परीक्षा अभी बाकी थी, और आने वाला समय उससे उसका सबसे बड़ा हिसाब लेने वाला था।

टूटता हुआ घमंड

आग की घटना के बाद श्यामलाल की ज़िंदगी जैसे धीमी पड़ गई थी। दुकान तो फिर से खुल गई, लेकिन पहले जैसी रौनक लौटकर नहीं आई। जो लोग कभी मजबूरी में उसके यहाँ से समोसे खरीदते थे, अब वे भी रास्ता बदलकर रघु की दुकान पर जाने लगे थे। श्यामलाल यह सब देखता था, पर मानने को तैयार नहीं था कि गलती उसकी अपनी है। उसके भीतर का लालच अब भी ज़िंदा था, बस थोड़ा डर के साए में छिप गया था।

दिन बीतते गए और हालात और बिगड़ते चले गए। श्यामलाल ने नुकसान की भरपाई के लिए समोसे का साइज और छोटा कर दिया। उसे लगा कि इससे मुनाफ़ा बढ़ेगा, लेकिन हुआ उल्टा। ग्राहकों ने शिकायत करनी शुरू कर दी। कुछ ने तो खुलेआम कहना शुरू कर दिया कि अब उसके समोसे खाने लायक भी नहीं रहे। ये बातें उसके कानों में तीर की तरह चुभती थीं, लेकिन वह उन्हें अनसुना कर देता था।

एक दिन नगर निगम के कुछ अधिकारी बाज़ार में आए। दुकानों की जाँच शुरू हुई। जब वे श्यामलाल की दुकान पर पहुँचे, तो उन्होंने साफ़-सफाई और नाप-तौल पर सवाल उठाए। पहले तो श्यामलाल बहस करने लगा, लेकिन फिर उसने अपनी जेब की ओर हाथ बढ़ाया। उसे लगा कि पैसे देकर मामला सुलझ जाएगा। पर इस बार चाल नहीं चली। अधिकारियों ने चालान काट दिया और दुकान बंद करने की चेतावनी देकर चले गए।

वह दिन श्यामलाल के लिए बहुत भारी था। पहली बार उसे लगा कि पैसे भी हर बार काम नहीं आते। वह चुपचाप दुकान समेट रहा था, तभी उसकी नज़र उस बूढ़े भिखारी पर पड़ी। वही भिखारी जो रोज़ उसकी दुकान के सामने बैठता था। आज वह नहीं था। किसी ने बताया कि वह बहुत बीमार हो गया है और मंदिर के पास पड़ा है।

श्यामलाल का दिल अजीब तरह से धड़क उठा। न जाने क्यों, उसके कदम अपने-आप मंदिर की ओर बढ़ गए। वहाँ उसने देखा—वही बूढ़ा आदमी ज़मीन पर पड़ा था, साँसें उखड़ी हुई थीं। आसपास कुछ लोग खड़े थे, लेकिन कोई ज़्यादा मदद नहीं कर रहा था। श्यामलाल को अपने भीतर कुछ टूटता हुआ महसूस हुआ।

उसने पास जाकर भिखारी को पानी पिलाया और पास की दुकान से खाना मँगवाया। यह सब करते हुए उसके हाथ काँप रहे थे। भिखारी ने आँखें खोलीं और कमजोर आवाज़ में कहा, “बेटा… भगवान भला करे।” ये शब्द श्यामलाल के दिल में उतर गए। पहली बार उसे लगा कि किसी को देने में भी एक अजीब-सी तसल्ली होती है।

उस रात श्यामलाल घर लौटकर देर तक रोता रहा। उसे अपने सारे पुराने व्यवहार याद आए—वह बच्चों से झगड़ना, भूखों को भगा देना, हर रिश्ते को पैसों से तौलना। उसे महसूस हुआ कि उसका घमंड और लालच मिलकर उसे इंसान से पत्थर बना चुके थे।

अगले दिन उसने कुछ ऐसा किया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उसने दुकान के बाहर एक तख्ती टाँग दी—“आज ज़रूरतमंदों के लिए मुफ़्त समोसे।” बाज़ार में हलचल मच गई। लोग हैरान थे। कुछ ने इसे दिखावा कहा, कुछ ने मज़ाक उड़ाया। लेकिन श्यामलाल ने किसी की परवाह नहीं की।

जब पहला भूखा बच्चा आगे बढ़ा और उसने समोसा लिया, तो श्यामलाल की आँखें भर आईं। उसे लगा जैसे उसके भीतर जमी बर्फ पिघल रही हो। वह जानता था कि एक दिन में सब कुछ नहीं बदलेगा, लेकिन यह पहला क़दम था—लालच से इंसानियत की ओर।

उसे अभी यह नहीं पता था कि यह रास्ता आसान नहीं होगा। समाज उसकी परीक्षा लेगा, उसकी नीयत पर शक करेगा। लेकिन अब श्यामलाल तैयार था—क्योंकि उसका घमंड टूट चुका था, और उसी टूटन से एक नया इंसान जन्म ले रहा था।

बदलाव की कीमत

श्यामलाल की दुकान के बाहर लगी तख्ती ने पूरे बाज़ार में हलचल मचा दी थी। कुछ लोग रुक-रुक कर पढ़ते, कुछ सिर हिलाकर आगे बढ़ जाते और कुछ ठहाके लगाकर कहते, “नाटक है, दो दिन में सब ठीक हो जाएगा।” किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि वही श्यामलाल, जो एक रुपये के लिए लोगों से झगड़ पड़ता था, अब मुफ़्त समोसे बाँट रहा है।

पहले दिन ज़रूरतमंद कम आए। शायद उन्हें भी डर था कि कहीं यह कोई चाल न हो। लेकिन श्यामलाल चुपचाप समोसे तलता रहा। न गिनती की, न हिसाब लगाया। जब शाम को उसने गल्ला देखा, तो आमदनी बहुत कम थी। पुराने श्यामलाल के लिए यह सदमे की बात होती, लेकिन आज उसे अजीब-सी शांति महसूस हो रही थी।

अगले कुछ दिनों में धीरे-धीरे हालात बदलने लगे। जिन लोगों को उसने पहले अपमानित किया था, वे दूर से सब देख रहे थे। कुछ के मन में शक था, कुछ के मन में उम्मीद। एक दिन वही स्कूल के बच्चे आए, जिनसे वह पहले बहस करता था। इस बार उसने उन्हें मुस्कुराकर समोसे दिए। बच्चे हँसते हुए भाग गए, और उनकी हँसी श्यामलाल के दिल में उतर गई।

लेकिन बदलाव की कीमत भी होती है। पैसों की तंगी बढ़ने लगी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। कई रातें ऐसी आईं जब श्यामलाल भूखा सोया। पुराने डर फिर से सिर उठाने लगे—“अगर सब खत्म हो गया तो?” कई बार उसका मन हुआ कि सब छोड़कर फिर से पुराने तरीके अपनाए, लेकिन हर बार उसे उस बूढ़े भिखारी की आँखें याद आ जातीं।

रघु यह सब चुपचाप देख रहा था। एक शाम वह श्यामलाल के पास बैठा और बोला, “बदलाव आसान नहीं होता, लेकिन अगर दिल से हो तो रास्ता निकल ही आता है।” उसने श्यामलाल को कुछ व्यावहारिक सलाह दी—साफ़-सफाई बढ़ाने की, समोसे की क्वालिटी सुधारने की और दाम ठीक रखने की। श्यामलाल ने पहली बार बिना जलन के उसकी बातें सुनीं।

धीरे-धीरे लोगों का भरोसा लौटने लगा। कुछ पुराने ग्राहक वापस आए। वे अभी भी सतर्क थे, लेकिन अब उनके चेहरे पर नाराज़गी नहीं थी। श्यामलाल हर ग्राहक से ठीक से बात करता, नाप-तौल सही रखता और अगर किसी दिन किसी के पास पैसे कम होते, तो वह कह देता, “कल दे देना।”

एक दिन वही बूढ़ा भिखारी, जो अब थोड़ा ठीक हो गया था, लाठी टेकता हुआ दुकान पर आया। उसने काँपते हाथों से श्यामलाल के सिर पर हाथ रखा और बोला, “बेटा, तू अब अमीर हो गया है।” श्यामलाल समझ नहीं पाया। भिखारी मुस्कुराया, “पैसे से नहीं, दिल से।” ये शब्द श्यामलाल के जीवन का सबसे बड़ा इनाम बन गए।

बाज़ार में अब लोग उसे “लालची समोसा वाला” नहीं कहते थे। नाम पूरी तरह बदला नहीं था, लेकिन उसके साथ एक नई पहचान जुड़ने लगी थी—“बदला हुआ इंसान।” श्यामलाल जानता था कि उसकी पुरानी छवि मिटने में समय लगेगा, पर वह अब जल्दबाज़ी में नहीं था।

उसने समझ लिया था कि लालच छोड़ना एक दिन का काम नहीं, बल्कि रोज़ का संघर्ष है। हर सुबह उसे खुद से लड़ना पड़ता था। लेकिन अब यह लड़ाई उसे बोझ नहीं लगती थी, बल्कि ज़िंदा होने का एहसास दिलाती थी।

कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी। श्यामलाल की असली परीक्षा अभी बाकी थी—वह परीक्षा जो तय करने वाली थी कि उसका बदलाव स्थायी है या बस हालात की मजबूरी।

असली मुनाफ़ा

समय धीरे-धीरे अपनी चाल से आगे बढ़ रहा था, लेकिन श्यामलाल के भीतर सब कुछ बदल चुका था। अब उसकी दुकान सुबह सबसे पहले खुलती थी और रात को सबसे आख़िर में बंद होती थी। फर्क बस इतना था कि अब वह हर दिन सिर्फ कमाई के लिए नहीं, बल्कि दिल की तसल्ली के लिए काम करता था। पुराने श्यामलाल और आज के श्यामलाल के बीच की दूरी अब साफ़ दिखाई देने लगी थी।

एक दिन बाज़ार में एक बड़ी खबर फैली। शहर के एक बड़े व्यापारी ने बाज़ार की ज़मीन खरीद ली थी और छोटी दुकानों को हटाने की योजना बना रहा था। मुआवज़ा तो मिलना था, लेकिन इतना नहीं कि कोई नई दुकान खोल सके। श्यामलाल के सामने फिर वही पुराना सवाल खड़ा हो गया—अपने फायदे के लिए दूसरों को पीछे छोड़ दे या सबके साथ खड़ा हो जाए।

व्यापारी ने श्यामलाल को अलग से बुलाया। उसे ज्यादा पैसे देने का लालच दिया, बस शर्त यह थी कि वह बाकी दुकानदारों को समझाए कि वे चुपचाप दुकान खाली कर दें। यह मौका था—फिर से बड़ा मुनाफ़ा कमाने का। एक पल के लिए श्यामलाल का दिल डगमगाया। पुरानी आदतें फुसफुसाने लगीं।

लेकिन फिर उसे वे सारे चेहरे याद आए—भूखे बच्चे, बूढ़ा भिखारी, रघु की मदद, और वह तख्ती। उसने व्यापारी की ओर देखा और साफ़ कहा, “मैं यह नहीं कर सकता।” व्यापारी हैरान रह गया। श्यामलाल जानता था कि इसका मतलब नुकसान होगा, लेकिन उसे अब फर्क नहीं पड़ता था।

श्यामलाल ने बाक़ी दुकानदारों को इकट्ठा किया और सबको सच्चाई बताई। पहली बार लोग उसकी बात ध्यान से सुन रहे थे। सबने मिलकर विरोध किया। मामला अख़बारों तक पहुँचा। नगर प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा और छोटी दुकानों को बचा लिया गया।

उस दिन बाज़ार में जश्न जैसा माहौल था। लोगों ने श्यामलाल को कंधों पर उठा लिया। किसी ने कहा, “आज असली फायदा हुआ है।” श्यामलाल मुस्कुरा दिया। उसे समझ आ गया था कि असली मुनाफ़ा नोटों में नहीं, भरोसे में होता है।

अब उसकी दुकान पर भीड़ फिर से रहती थी, लेकिन इस बार वजह मजबूरी नहीं, बल्कि सम्मान था। समोसे पहले से ज़्यादा स्वादिष्ट हो गए थे—शायद इसलिए कि उनमें अब लालच नहीं, बल्कि अपनापन घुला हुआ था।

बूढ़ा भिखारी रोज़ आता, अब भीख माँगने नहीं, बल्कि हालचाल पूछने। बच्चे स्कूल जाते समय हाथ हिलाते। रघु उसका दोस्त बन चुका था। और श्यामलाल—जो कभी “लालची समोसा वाला” कहलाता था—अब बाज़ार का सबसे भरोसेमंद आदमी बन गया था।

कभी-कभी वह शाम को दुकान बंद करते हुए आसमान की ओर देखता और खुद से कहता, “अगर मैंने पहले यह समझ लिया होता…” फिर मुस्कुरा देता। देर से सही, लेकिन सही रास्ता मिल गया था।

कस्बे में आज भी समोसे बिकते हैं, लेकिन उस कहानी का स्वाद सबसे अलग है—जो यह सिखाती है कि लालच जितना देता है, उससे कहीं ज़्यादा छीन लेता है, और इंसानियत जितना बाँटती है, उससे कहीं ज़्यादा लौटा देती है।

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