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संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

“साहस और समझ की ताकत”

बहुत पुराने समय की बात है, जब पहाड़ों और जंगलों के बीच बसा हुआ एक रहस्यमयी वन हुआ करता था। इस जंगल की खास बात यह थी कि यहाँ दिन में धूप भी अलग तरह से चमकती थी और रात में चाँदनी भी कुछ ज़्यादा ही उजली लगती थी। लोग कहते थे कि यह जंगल जीवित है—यह सुनता है, समझता है और सही समय पर सही जवाब भी देता है। इसी जंगल में एक छोटा-सा बंदर रहता था, जिसका नाम था मालू। मालू दिखने में साधारण था, लेकिन उसके भीतर सवालों का एक पूरा संसार भरा हुआ था।

मालू को बाकी बंदरों की तरह सिर्फ फल खाना और पेड़ों पर कूदना अच्छा नहीं लगता था। उसे नई जगहें देखना, नई बातें जानना और हर चीज़ के पीछे का कारण समझना पसंद था। जब बाकी बंदर दोपहर में सो जाते, तब मालू अकेले जंगल की सीमाओं तक चला जाता और दूर पहाड़ियों को निहारता रहता। उसके मन में हमेशा एक ही सवाल घूमता रहता—“इस जंगल के बाहर क्या है?” यह सवाल धीरे-धीरे उसकी बेचैनी बन गया।

मालू की माँ अक्सर उसे समझाती थी कि जंगल ही उनका संसार है और बाहर की दुनिया खतरों से भरी है। वह कहती थी कि हर जीव को अपनी सीमा पहचाननी चाहिए। लेकिन मालू का मन इन बातों से संतुष्ट नहीं होता था। उसे लगता था कि अगर हर कोई डर के कारण रुक जाए, तो कोई भी नया रास्ता कभी नहीं खोज पाएगा। वह माँ की बातों का सम्मान करता था, लेकिन उसके भीतर का जिज्ञासु मन उसे बार-बार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता था।

एक दिन जंगल में अजीब सी घटना घटी। सुबह-सुबह तेज़ हवा चली और आसमान अचानक काला पड़ गया। पक्षी चुप हो गए और जानवर अपने-अपने ठिकानों में छिपने लगे। मालू ने पहली बार जंगल को इतना डरा हुआ महसूस किया। तभी पहाड़ियों की ओर से एक ज़ोरदार आवाज़ गूँजी, जैसे किसी ने धरती को झकझोर दिया हो। थोड़ी देर बाद खबर फैल गई कि जंगल के पार वाली नदी सूखने लगी है, वही नदी जिससे पूरा जंगल पानी पाता था।

पानी के बिना जंगल का जीवन अधूरा था। पेड़ मुरझाने लगे, जानवर परेशान हो उठे और चारों ओर चिंता का माहौल बन गया। बुज़ुर्ग जानवरों ने कहा कि ऐसा पहले भी हुआ था और तब किसी ने पहाड़ों के पार जाकर कारण पता लगाया था। लेकिन इस बार कोई आगे आने को तैयार नहीं था। पहाड़ों के पार का रास्ता कठिन था और वहाँ से बहुत कम जीव वापस लौटे थे।

मालू यह सब चुपचाप सुन रहा था। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, लेकिन डर से नहीं—बल्कि एक अजीब से उत्साह से। उसे लगा जैसे यह वही मौका है, जिसके लिए वह हमेशा से तैयार हो रहा था। उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह पहाड़ों के पार जाएगा और नदी के सूखने का कारण ढूँढेगा। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि इसका मतलब था अपने परिवार और जंगल से कुछ समय के लिए दूर जाना।

शाम होते-होते मालू अपनी माँ के पास पहुँचा और धीरे-धीरे अपनी इच्छा बताई। माँ की आँखों में डर और गर्व दोनों थे। उसने मालू को गले लगाया और कहा कि साहस वही होता है जिसमें जिम्मेदारी जुड़ी हो। उसने मालू को जंगल की एक पुरानी सीख याद दिलाई—“जो यात्रा दूसरों के लिए होती है, वह कभी अकेली नहीं होती।” यह सुनकर मालू का हौसला और बढ़ गया।

रात को जब पूरा जंगल सो गया, तब मालू चुपचाप अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। चाँद उसकी राह रोशन कर रहा था और जंगल की हवा जैसे उसे आशीर्वाद दे रही थी। उसे नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है, लेकिन इतना तय था कि उसकी यह यात्रा सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि पूरे जंगल की किस्मत बदलने वाली थी।

सुबह की पहली रोशनी के साथ ही मालू पहाड़ों की तलहटी तक पहुँच चुका था। यहाँ जंगल धीरे-धीरे खत्म हो रहा था और ज़मीन पथरीली होती जा रही थी। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ उसके सामने खड़े थे, मानो उसकी परीक्षा ले रहे हों। मालू ने गहरी साँस ली और चढ़ाई शुरू कर दी। हर कदम के साथ उसे अपने जंगल की याद आ रही थी, लेकिन साथ ही उसके भीतर यह विश्वास भी था कि वह सही रास्ते पर है।

पहाड़ों का रास्ता आसान नहीं था। कहीं तेज़ ढलान थी, तो कहीं फिसलन भरी चट्टानें। कई बार मालू फिसलते-फिसलते बचा। उसके हाथों में छाले पड़ गए और पैरों में दर्द होने लगा, लेकिन उसने हार नहीं मानी। रास्ते में उसे कुछ ऐसे पेड़ मिले, जिन्हें उसने पहले कभी नहीं देखा था। उनके फल खट्टे थे, लेकिन उन्होंने उसे आगे बढ़ने की ताकत दी। मालू समझ गया कि प्रकृति हर जगह अपने तरीके से मदद करती है।

दोपहर के समय उसे एक छोटी-सी गुफा मिली। वहाँ एक बूढ़ा लंगूर ध्यान में बैठा था। उसकी आँखों में अनुभव की गहराई थी। मालू ने आदर से उसे प्रणाम किया और अपनी यात्रा का कारण बताया। लंगूर ने ध्यान से उसकी बात सुनी और कहा कि पहाड़ों के पार नदी सूखने की वजह सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि किसी जीव की लालच भी हो सकती है। उसने मालू को सावधान किया कि आगे की राह में सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि धैर्य और समझ की ज़रूरत पड़ेगी।

लंगूर ने मालू को एक पुरानी कहानी सुनाई। उसने बताया कि पहाड़ों के बीच एक पत्थर का बाँध है, जिसे बहुत पहले कुछ प्राणियों ने बनाया था ताकि पानी अपने लिए रोक सकें। अगर वह बाँध फिर से सक्रिय हो गया है, तो नदी का सूखना तय है। यह सुनकर मालू की चिंता और बढ़ गई, लेकिन अब उसे अपने लक्ष्य की स्पष्ट झलक मिल चुकी थी। उसने लंगूर से आशीर्वाद लिया और आगे बढ़ गया।

जैसे-जैसे वह ऊँचाई पर चढ़ता गया, हवा ठंडी होती गई और साँस लेना मुश्किल होने लगा। फिर भी मालू रुका नहीं। शाम होते-होते उसने पहाड़ों के बीच एक सँकरा रास्ता देखा, जहाँ से पानी की हल्की-सी आवाज़ आ रही थी। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। यह संकेत था कि नदी अभी पूरी तरह मरी नहीं है।

रात उसने उसी इलाके में एक पेड़ की जड़ के पास बिताई। आसमान में तारे पहले से ज़्यादा पास लग रहे थे। थकान से भरे शरीर के बावजूद मालू की आँखों में नींद नहीं थी। वह सोच रहा था कि अगर सच में कोई बाँध है, तो उसे अकेले कैसे तोड़ा जाएगा। लेकिन फिर उसे माँ की बात याद आई—जो यात्रा दूसरों के लिए होती है, वह कभी अकेली नहीं होती।

सुबह की ठंडी हवा ने मालू को जगा दिया। पहाड़ों के बीच सूरज की किरणें देर से पहुँचती थीं, लेकिन जब रोशनी फैली तो चारों ओर सुनहरी चमक बिखर गई। मालू ने नीचे झाँका तो उसने देखा कि एक पतली-सी जलधारा चट्टानों के बीच से बह रही थी। यह वही नदी थी, जो आगे चलकर पूरे जंगल को जीवन देती थी। लेकिन यहाँ उसका प्रवाह कमज़ोर और रुक-रुक कर चल रहा था। मालू का मन भारी हो गया।

जलधारा के साथ-साथ चलते हुए मालू एक खुले मैदान में पहुँचा, जहाँ उसने कुछ अजीब से प्राणी देखे। वे आधे जानवर और आधे इंसान जैसे लग रहे थे। उन्होंने बड़े-बड़े पत्थरों से एक बाँध बना रखा था, जिससे पानी एक तरफ़ इकट्ठा हो गया था। उन प्राणियों के चेहरे पर संतोष था, लेकिन आसपास की ज़मीन सूखी और बेजान हो चुकी थी। मालू समझ गया कि यही वही बाँध है, जिसके बारे में बूढ़े लंगूर ने बताया था।

मालू पेड़ों की आड़ में छिपकर उनकी बातें सुनने लगा। वे प्राणी अपने आराम और सुविधा के लिए पानी जमा कर रहे थे, उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि नीचे का जंगल सूख रहा है। मालू को गुस्सा आया, लेकिन उसने खुद को शांत रखा। उसे पता था कि जल्दबाज़ी में किया गया कोई भी काम नुकसानदेह हो सकता है। उसने पहले बाँध की बनावट और उनकी संख्या को ध्यान से देखा।

अचानक एक छोटा सा बच्चा, जो उन्हीं प्राणियों में से था, फिसलकर पानी के पास गिर गया। तेज़ बहाव में उसका संतुलन बिगड़ गया और वह डूबने लगा। बाकी प्राणी घबरा गए, लेकिन डर के कारण कोई आगे नहीं बढ़ा। यह देखकर मालू से रहा नहीं गया। अपनी जान की परवाह किए बिना वह तुरंत बाहर आया और छलाँग लगाकर बच्चे को पकड़ लिया। बड़ी मुश्किल से उसने उसे सुरक्षित किनारे तक पहुँचा दिया।

यह दृश्य देखकर वे प्राणी हैरान रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि एक छोटा सा बंदर इतनी हिम्मत कैसे दिखा सकता है। मालू ने मौके का फायदा उठाया और उन्हें समझाया कि पानी किसी एक का नहीं होता। उसने बताया कि नीचे एक पूरा जंगल इसी नदी पर निर्भर है और अगर बाँध नहीं हटाया गया, तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। उसकी आवाज़ में सच्चाई और दर्द दोनों थे।

कुछ प्राणी उसकी बात से प्रभावित हुए, लेकिन उनके नेता ने इसे कमजोरी समझा। उसने कहा कि ताकतवर वही है, जिसके पास संसाधन हों। यह सुनकर मालू को दुख हुआ, लेकिन वह निराश नहीं हुआ। उसे समझ आ गया कि यह लड़ाई सिर्फ बाँध की नहीं, बल्कि सोच की भी है। उसने तय किया कि वह उन्हें सबक सिखाने के लिए कोई ऐसा रास्ता ढूँढेगा, जिसमें हिंसा न हो।

शाम तक मालू वहीं छिपा रहा और एक योजना बनाता रहा। उसने देखा कि बाँध का एक हिस्सा पुराना और कमज़ोर है, जहाँ से थोड़ा-सा पानी रिस रहा था। अगर सही समय पर सही जगह दबाव डाला जाए, तो पानी अपने आप रास्ता बना सकता है। मालू ने मन ही मन तय किया कि अगली सुबह वह अपना आख़िरी दांव खेलेगा।

अगली सुबह, मालू पूरी तरह तैयार था। सूरज की पहली किरणों ने पहाड़ों के ऊपर सुनहरी रोशनी बिखेर दी थी। हवा ठंडी थी, लेकिन मालू के मन में जोश गरम था। उसने पहले से ध्यान से देखे गए पुराने और कमजोर हिस्से की ओर बढ़ना शुरू किया। हर कदम सावधानी से उठाया गया। उसे पता था कि गलती होने पर बाँध टूट सकता है और नीचे का जंगल और भी जल्दी सूख जाएगा।

जैसे ही वह कमजोर हिस्से तक पहुँचा, उसने अपनी छोटी-छोटी कूचियाँ और पत्थरों से सही दबाव डालना शुरू किया। पानी धीरे-धीरे बहने लगा, लेकिन बाँध पूरी तरह नहीं टूटा। मालू ने अपनी ताकत और संतुलन का सही उपयोग करते हुए पूरे बाँध के उस हिस्से को नियंत्रित किया। नीचे से धीरे-धीरे पानी बहने लगा, और वह जंगल की तरफ़ बढ़ने लगा। मालू ने देखा कि यह प्रक्रिया न सिर्फ बाँध को कमजोर कर रही थी, बल्कि पानी को सुरक्षित तरीके से जंगल तक पहुँचाने का रास्ता भी बना रही थी।

नीचे जंगल में जानवरों ने पानी का बहाव देखा। सूखी नदी धीरे-धीरे फिर से जीवन देने लगी। पेड़ ताज़ा हो उठे, पक्षियों ने चहकना शुरू किया और छोटे जानवर राहत की साँस लेने लगे। जंगल में खुशी का माहौल बन गया। सभी जानवर मालू के साहस और बुद्धिमानी की तारीफ़ कर रहे थे। मालू ने महसूस किया कि सिर्फ ताकत या हिंसा से समाधान नहीं आता, बल्कि धैर्य, योजना और सही समय का इंतज़ार भी उतना ही जरूरी है।

इस सफलता के बाद, बाँध के पास के प्राणी भी कुछ बदलने लगे। उन्होंने देखा कि जंगल के जीव-जंतु और प्रकृति के संतुलन को नष्ट करने का कोई फायदा नहीं है। उन्होंने अपने इरादे बदल दिए और बाँध की मरम्मत करके पानी को प्राकृतिक प्रवाह में छोड़ दिया। यह देखकर मालू को बहुत खुशी हुई। वह जान गया कि सही समय पर सही कदम और सही तरीके से समझाना, किसी भी समस्या का सबसे बड़ा समाधान है।

शाम को मालू जंगल की ओर वापस लौट रहा था। रास्ते में उसने महसूस किया कि उसकी यात्रा केवल नदी और जंगल को बचाने तक सीमित नहीं थी। उसने समझा कि साहस और जिम्मेदारी का मतलब सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी होना चाहिए। उसकी आँखों में अब अनुभव की चमक थी, और दिल में यह विश्वास कि आगे आने वाली चुनौतियों का सामना वह हमेशा बुद्धिमानी और साहस से करेगा।

रात को जब मालू जंगल में पहुँचा, सभी जानवर उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने उसकी बहादुरी और समझदारी की प्रशंसा की। बूढ़े लंगूर ने कहा, "मालू, तुमने यह साबित कर दिया कि साहस और बुद्धि मिलकर हर कठिनाई को पार कर सकते हैं।" मालू ने शांत होकर मुस्कुराया। वह जानता था कि यह सिर्फ एक यात्रा का अंत था, लेकिन सीख और अनुभव उसकी ज़िंदगी भर के लिए थे।

मालू जंगल में लौट आया था, लेकिन अब वह पहले जैसा छोटा और साधारण बंदर नहीं रहा था। उसकी आँखों में अनुभव की गहराई और दिल में जिम्मेदारी की भावना थी। जंगल के जानवरों ने उसे देखते ही तालियाँ बजाई और उसकी बहादुरी की कहानी पूरे जंगल में फैल गई। छोटे बंदर उसके पास आने लगे और उसे सवाल पूछने लगे कि कैसे उसने साहस और बुद्धि का सही इस्तेमाल किया। मालू ने मुस्कुराते हुए सभी को समझाया कि किसी भी समस्या का हल सिर्फ ताकत से नहीं, बल्कि सोच, धैर्य और योजना से किया जा सकता है।

जंगल में अब पानी की पूरी व्यवस्था बहाल थी। नदी फिर से शांत और स्थिर बहने लगी थी। पेड़ हरे-भरे हो गए और जानवरों के चेहरों पर खुशियों की चमक लौट आई। पक्षी चहकते हुए आसमान में उड़ रहे थे और छोटे जानवर नदी के किनारे खेल रहे थे। मालू ने महसूस किया कि उसकी मेहनत और साहस ने सिर्फ नदी नहीं बचाई, बल्कि पूरे जंगल की जिंदगी को संरक्षित किया।

कुछ दिन बाद, वही प्राणी जो पहले बाँध बनाए थे, जंगल के पास आए। लेकिन इस बार उनके हाथों में कुल्हाड़ी नहीं, बल्कि पौधे और बीज थे। उन्होंने जंगल के महत्व को समझा और मिलकर इसे और सुरक्षित बनाने का वादा किया। मालू ने उन्हें मुस्कुराकर देखा। उसने जाना कि बदलाव डर और शक्ति से नहीं, बल्कि समझ और सहयोग से आता है।

मालू अब जंगल में छोटे जानवरों का शिक्षक और मार्गदर्शक बन गया। वह उन्हें साहस, धैर्य और जिम्मेदारी की कहानियाँ सुनाता। हर नया बंदर उसकी बातें ध्यान से सुनता और सीखता कि कठिनाई में घबराना नहीं, बल्कि बुद्धिमानी से काम लेना ज़रूरी है। मालू की यह यात्रा सिर्फ नदी बचाने की नहीं थी, बल्कि पूरे जंगल को यह सिखाने की थी कि एकता, समझ और साहस से हर समस्या का सामना किया जा सकता है।

रात को जब सभी जानवर अपने घरों में सो गए, मालू उसी पुराने पेड़ की डाल पर बैठा। चाँदनी उसके ऊपर फैली हुई थी और पूरे जंगल को सुनहरी रोशनी दे रही थी। मालू ने गहरी साँस ली और मन ही मन सोचने लगा कि जीवन में चुनौतियाँ हमेशा आएँगी, लेकिन अगर हर कोई अपने घर और दूसरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी समझे, तो कोई भी कठिनाई असंभव नहीं होती।

इस तरह, मालू की कहानी सिर्फ एक बंदर की नहीं रही, बल्कि पूरे जंगल की प्रेरणा बन गई। जंगल ने फिर कभी सूखा नहीं देखा और जानवरों ने हमेशा एकता और समझदारी से जीवन बिताया। मालू की यात्रा यह संदेश छोड़ गई कि साहस, बुद्धि और करुणा किसी भी चुनौती को पार कर सकती है।”


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