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दो भाई की कहानी

  FULL STORY   N कड़ाके की ठंड अपनी पूरी ताकत के साथ गांव पर उतर आई थी। तालाब के किनारे बने कच्चे घर की दीवारों की दरारों से सर हवा सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मिट्टी के उस छोटे से घर   में टूटी चारपाई पर एक पुरानी पतली रजाई ओढ़े हरीलाल   और उसका बीटा सोहन सिमटे बैठे थे। SON बाबा घर में आटा भी खत्म हो चुका है और जलाने के लिए लकड़ियां भी नहीं बची हैं। अगर सुबह तक कुछ इंतजाम नहीं हुआ तो हम क्या खाएंगे और इतनी ठंड में रात कैसे गुजरेगी ? FATHER बेटा   आज पूरा दिन गांव में काम की तलाश में भटकता रहा। पर किसी ने एक वक्त की मजदूरी तक नहीं दी। जेब खाली है और दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है। समझ नहीं आ रहा कि किस दरवाजे पर जाऊं। SON आप फिर से जाइए बाबा। कहीं ना कहीं तो काम मिलेगा ही। जब तक आप हिम्मत नहीं हारेंगे , मैं भी नहीं हारूँगा । FATHER जाऊंगा बेटा   जरूर जाऊंगा। जब तक मेरे बूढ़े हाथ चल रहे हैं , तब तक तुझे भूखा पेट नहीं सोने दूंगा। N अगली सुबह धुंध के बीच हरीलाल   अलग-अलग घरों के दरवाजों पर जाता है। FATHER काकी कोई भी छोटा-मो...

परछाइयों का उत्तराधिकारी

दिल्ली की सुबहें हमेशा झूठी होती हैं। वे उजाले का वादा तो करती हैंलेकिन अपने भीतर रात के सारे राज़ छिपाए रखती हैं। आरव सिंह यह बात अच्छी तरह जानता था। वह अपनी बालकनी में खड़ा नीचे बहती ट्रैफिक की आवाज़ सुन रहा था—कारों के हॉर्नचायवालों की पुकारऔर अख़बारों की चरमराहट—सब कुछ सामान्यफिर भी असहज। ब्लैक सन और किंगमेकर की घटनाओं के बाद उसने खुद को परछाइयों से दूर रखने की कोशिश की थीलेकिन कुछ ज़िंदगियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें अंधेरे छोड़ते नहींवे अंधेरे को अपने भीतर ढोती हैं। आरव अब किसी एजेंसी का हिस्सा नहीं थाफिर भी उसकी आदतें नहीं बदली थीं—हर आवाज़ का विश्लेषणहर चेहरे का मूल्यांकनऔर हर शांति पर संदेह।

उस सुबह मीरा क़ाज़ी का संदेश आयाऔर उसी पल आरव को समझ आ गया कि यह दिन सामान्य नहीं रहेगा। मीरा अब सिर्फ़ पत्रकार नहीं थीवह उन लोगों की सूची में आ चुकी थी जिनसे सत्ता डरती है। उसका संदेश छोटा थालेकिन भारी—“मुझे कुछ मिला है। इस बार बात सिर्फ़ नेटवर्क की नहींविरासत की है।” आरव ने जवाब नहीं दियाक्योंकि कुछ संदेशों का जवाब शब्दों में नहीं दिया जाताउन्हें सामने जाकर सुना जाता है। कुछ ही घंटों में वह मीरा के अपार्टमेंट में थाजहाँ दीवारों पर किताबें और फाइलें एक साथ बिखरी हुई थीं—ज्ञान और डर का मिला-जुला दृश्य।

मीरा ने जो दस्तावेज़ दिखाएवे किसी एक देश से जुड़े नहीं थे। यह सत्ता की एक लंबी छाया थीजो दशकों से अलग-अलग सरकारोंसैन्य तख़्तापलटों और आर्थिक संकटों के पीछे मौजूद थी। फर्क सिर्फ़ इतना था कि अब इस छाया का एक नाम उभर रहा था—“उत्तराधिकारी।” किंगमेकर तो बस एक चरण थाअसली खेल उसके बाद शुरू हुआ था। उत्तराधिकारी कोई एक व्यक्ति नहीं थाबल्कि एक चयन प्रक्रिया थी—जो तय करती थी कि अगली पीढ़ी में सत्ता किसके हाथों में जाएगी। यह राजनीति नहीं थीयह भविष्य की नीलामी थी।

आरव को एहसास हुआ कि यह लड़ाई पिछली सभी लड़ाइयों से अलग है। यहाँ दुश्मन गोली नहीं चलाता थावह करियर बनाता थाचेहरे गढ़ता था और नैरेटिव लिखता था। जांच का पहला ठोस सिरा उसे लंदन ले गया—एक ऐसा शहर जो बाहर से सभ्य दिखता हैलेकिन भीतर से साम्राज्यों के पाप ढोता है। लंदन में आरव एक थिंक-टैंक के कॉन्फ़्रेंस में शामिल हुआजहाँ भविष्य के नेतानीति निर्माता और कॉरपोरेट वारिस इकट्ठा हुए थे। वहीं उसे पहली बार महसूस हुआ कि उत्तराधिकारी की प्रयोगशाला यहीं है—जहाँ सत्ता के बीज बोए जाते हैं।

उसी सम्मेलन में उसकी नज़र एक युवा भारतीय चेहरे पर पड़ी—अद्वैत मल्होत्रा। तेज़ दिमाग़संतुलित भाषा और मीडिया का प्रिय चेहरा। बाहर से वह एक उभरता हुआ विचारक थालेकिन आरव की नज़र में वह एक परियोजना था। जैसे-जैसे आरव ने अद्वैत की पृष्ठभूमि खंगालीपरतें खुलने लगीं—अंतरराष्ट्रीय फंडिंगगुप्त मेंटरशिप और रणनीतिक मीडिया कवरेज। यह सब संयोग नहीं था। यह उत्तराधिकारी का अगला दांव था।

आरव ने जब मीरा को यह बतायातो वह चुप रही। फिर बोली, “अगर तुम सही होतो हम किसी व्यक्ति के खिलाफ़ नहीं लड़ रहेहम एक भविष्य के खिलाफ़ लड़ रहे हैं।” यही बात इस मिशन को सबसे खतरनाक बनाती थी। इस बार अगर वे हारतेतो कोई विस्फोट नहीं होताकोई आपातकाल नहीं लगता—बस धीरे-धीरे सब कुछ बदल जाताऔर लोग समझ भी नहीं पाते कि कब उनका चुनाव उनसे छीन लिया गया।

जांच आगे बढ़ी और सुराग पेरिसजिनेवा और नई दिल्ली तक फैले। आरव को हर जगह वही पैटर्न दिखा—एक ही सोचअलग-अलग चेहरे। इसी बीच मीरा को धमकियाँ मिलने लगींइस बार छुपी हुई नहींबल्कि खुली हुई। यह साफ़ था कि उत्तराधिकारी जान चुका था कि कोई उसकी प्रक्रिया को देख रहा है। एक रात मीरा पर हमला हुआ—कोई हथियार नहींकोई गोली नहीं—सिर्फ़ एक दुर्घटना जिसे मीडिया “दुर्भाग्यपूर्ण” कहकर भूल जाता। आरव ने समय रहते उसे बचा लियालेकिन यह चेतावनी थी कि अगली बार समय नहीं मिलेगा।

आरव के भीतर वर्षों से दबा हुआ जासूस पूरी तरह जाग चुका था। उसने तय कर लिया कि इस बार वह सिर्फ़ सच उजागर नहीं करेगाबल्कि इस चयन प्रक्रिया की जड़ काटेगा। उसे पता था कि ऐसा करने का मतलब होगा—हमेशा के लिए परछाइयों में लौट जाना। लेकिन कुछ युद्ध ऐसे होते हैं जिन्हें जीतने के बाद कोई घर नहीं लौटतासिर्फ़ इतिहास का बोझ उठाता है।

दिल्ली लौटते समय विमान की खिड़की से नीचे झांकते हुए आरव ने शहर को देखा—लाखों ज़िंदगियाँअनगिनत सपनेऔर कुछ गिने-चुने लोग जो तय करते हैं कि ये सपने किस दिशा में जाएँगे। उसने अपनी मुट्ठी भींच ली। यह लड़ाई अब सिर्फ़ उसकी या मीरा की नहीं थी। यह उस अधिकार की लड़ाई थी जिसे लोग अक्सर बिना सवाल किए सौंप देते हैं—अपना भविष्य।

और खेल अब शुरू हुआ था।

आरव जानता था कि असली लड़ाइयाँ बंद कमरों में नहींबल्कि खुले मंचों पर लड़ी जाती हैंजहाँ सब कुछ पारदर्शी दिखता हैलेकिन असल खेल परदे के पीछे चलता है। दिल्ली लौटने के बाद उसने खुद को फिर से एक आम नागरिक की तरह ढाल लियालेकिन उसकी रातें अब और भी लंबी हो गई थीं। हर भाषणहर टीवी डिबेट और हर अख़बार की हेडलाइन उसे किसी न किसी तरह एक ही दिशा में जाती दिख रही थी। विचारों का एक नया प्रवाह गढ़ा जा रहा था—राष्ट्रवादविकास और स्थिरता के नाम पर भविष्य की एक ऐसी परिकल्पना तैयार की जा रही थीजिसमें सवाल पूछने की जगह बहुत कम थी। आरव समझ चुका था कि “उत्तराधिकारी” अब परदे के पीछे नहींबल्कि मंच के बीचों-बीच आ चुका है।

मीरा अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई थीलेकिन उसका दिमाग़ पहले से भी तेज़ चल रहा था। अस्पताल के कमरे में बैठे हुए उसने आरव को दिखाया कि कैसे एक ही तरह के लेखशोध-पत्र और सोशल मीडिया अभियान अलग-अलग देशों में एक साथ उभर रहे हैं। शब्द बदल जाते थेचेहरे बदल जाते थेलेकिन मूल विचार वही रहता था। यह किसी पार्टी या विचारधारा का प्रचार नहीं थायह एक ऐसा ढांचा था जो आने वाली पीढ़ियों की सोच को आकार दे रहा था। आरव को पहली बार एहसास हुआ कि अगर यह प्रक्रिया पूरी हो गईतो कोई तानाशाह नहीं आएगाकोई तख़्तापलट नहीं होगा—सब कुछ लोकतांत्रिक दिखेगालेकिन विकल्प सिर्फ़ वही होंगे जो पहले से चुने जा चुके हैं।

जांच करते हुए आरव एक ऐसे नाम तक पहुँचाजिसे वह वर्षों से दफन समझता था—विक्रम राठौड़। वही विक्रमजो कभी अग्निचक्र में उसका मेंटर हुआ करता थाजिसे वह एक आदर्श अधिकारी मानता थाऔर जिसकी मौत को उसने हमेशा व्यवस्था की एक क्रूर लेकिन अनिवार्य त्रासदी समझा था। अब पुराने रिकॉर्ड्स से पता चला कि विक्रम मरा नहीं थाबल्कि गायब कर दिया गया था। और उसके बाद ही उत्तराधिकारी की पहली प्रयोगशाला अस्तित्व में आई थी। यह संयोग नहीं हो सकता था।

आरव ने विक्रम की पुरानी फ़ाइलें दोबारा पढ़ीं। हर मिशनहर निर्णय और हर असहमति एक ही ओर इशारा कर रही थी। विक्रम सिस्टम से लड़ना नहीं चाहता थावह उसे अपने तरीके से चलाना चाहता था—बिना अराजकता केबिना विद्रोह के। यही सोच उत्तराधिकारी की नींव बनी थी। यह जानकर आरव के भीतर कुछ टूट गया। जिन आदर्शों पर उसने अपनी ज़िंदगी खड़ी की थीवही अब एक नए नियंत्रण तंत्र की बुनियाद बन चुके थे।

इसी बीच अद्वैत मल्होत्रा का नाम लगातार सुर्खियों में रहने लगा। टीवी स्टूडियोविश्वविद्यालयों के मंच और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन—हर जगह वही चेहरावही संतुलित भाषावही स्वीकार्य विद्रोह। वह किसी से टकराता नहीं थालेकिन हर बहस को अपनी दिशा में मोड़ देता था। आरव ने जितना उसे देखाउतना ही उसे यक़ीन होता गया कि अद्वैत खुद नहीं जानता कि वह किसी योजना का हिस्सा है या नहीं। शायद वह भी एक चुना हुआ उत्तराधिकारी थाजिसे सच से उतना ही दूर रखा गया था जितना आम जनता को।

मीरा ने चेतावनी दी कि अब बहुत देर हो रही है। उत्तराधिकारी की प्रक्रिया सार्वजनिक समर्थन के उस मुकाम पर पहुँच रही थीजहाँ उसे रोकना लगभग असंभव हो जाएगा। आरव के पास दो ही रास्ते थे—या तो वह सारी जानकारी एक साथ सार्वजनिक कर देजिससे अराजकता फैल सकती थीया फिर वह इस ढांचे के केंद्र तक पहुँचे और उसे भीतर से तोड़े। दोनों ही रास्तों में कीमत थीऔर कीमत सिर्फ़ उसकी जान नहींबल्कि सच्चाई की विश्वसनीयता भी हो सकती थी।

आख़िरकार आरव ने दूसरा रास्ता चुना। उसने उत्तराधिकारी की चयन परिषद तक पहुँचने का तरीका ढूँढ लिया—जिनेवा में होने वाली एक बंद बैठकजहाँ अगली वैश्विक रणनीति तय होनी थी। यह कोई गुप्त बैठक नहीं थीबल्कि एक “नीति संवाद” थाजिसे मीडिया प्रगति का उदाहरण बताने वाला था। आरव जानता था कि यहीं वह सबूत मिल सकता हैजो इस पूरे खेल को उजागर कर दे।

जिनेवा की ठंडी हवा में खड़े होकर आरव ने पहली बार अपने भीतर डर को पूरी तरह स्वीकार किया। यह डर मरने का नहीं थाबल्कि असफल होने का था। अगर वह यहाँ हार गयातो आने वाली पीढ़ियाँ शायद कभी यह न जान पाएं कि उनके विकल्प पहले ही तय कर दिए गए थे। मीरा ने उसे जाते समय सिर्फ़ इतना कहा था कि अगर वह वापस न आएतो कहानी वह पूरी करेगी। आरव मुस्कराया थाक्योंकि वह जानता था—कहानियाँ लोग लिखते हैंलेकिन कुछ कहानियाँ लोग जीते हैं।

सम्मेलन भवन के भीतर सब कुछ शांत और सभ्य था। सूट पहने लोगधीमी आवाज़ में बातचीत और भविष्य पर गंभीर चर्चा। लेकिन आरव को अब साफ़ दिख रहा था कि यह सभ्यता एक आवरण है। उसने जैसे ही आंतरिक नेटवर्क तक पहुँच बनाईउसे वह मिला जिसकी उसे तलाश थी—एक पूरा एल्गोरिदमजो बताता था कि किस देश में किस तरह का नेतृत्व “उपयुक्त” होगा। यह लोकतंत्र नहीं थायह चयनित सहमति थी।

उसी पल आरव को महसूस हुआ कि वह अकेला नहीं है। कोई और भी सिस्टम में हलचल महसूस कर चुका था। यह उत्तराधिकारी की सुरक्षा परत थीजो अब सक्रिय हो चुकी थी। समय खत्म हो रहा था। या तो वह अभी सब कुछ उजागर करेगाया फिर यह मौका हमेशा के लिए खो जाएगा।

आरव ने गहरी साँस ली और फैसला कर लिया।

अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था।

जिनेवा की रात घनी और खामोश थीलेकिन आरव के भीतर तूफ़ान चल रहा था। वह उस विशाल भवन में अकेला नहीं थाजहां दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोग एक जगह इकट्ठा हुए थे। उनके बीच से होकर आरव ने धीरे-धीरे वह मार्ग तय किया जो उसे सीधे नेटवर्क के केंद्रीय सर्वर तक ले जाता। हर कदम पर उसे एहसास होता रहा कि यह लड़ाई सिर्फ़ तकनीकी या राजनीतिक नहीं थी—यह मन और विश्वास की लड़ाई थी। हर व्यक्ति यहाँ जानता था कि कुछ निर्णय दुनिया की दिशा बदल सकते हैंलेकिन कोई यह नहीं जानता था कि उनके पीछे कौन है जो असली दिशा तय करता है। आरव की निगाहें कंप्यूटर स्क्रीन पर टिक गईं—सारे डेटा का विश्लेषणनिर्णयों की भविष्यवाणीनेताओं के चुनाव और मीडिया अभियान—सब कुछ एक साथ उसके सामने खुला था। यही वह शक्ति थीजिसे उत्तराधिकारी ने इतने सालों से छिपाए रखा था।

जैसे ही आरव ने अपनी योजना के अनुसार वायरस को नेटवर्क में डालना शुरू कियाउसे एहसास हुआ कि सिस्टम केवल मशीनें नहीं हैंयह लोगों की आदतोंउनके भय और उनकी उम्मीदों का प्रतिबिंब है। यदि यह टूट गयातो केवल सत्ता का खेल नहीं बिगड़ेगाबल्कि लाखों लोग अस्थिरता का सामना करेंगे। यही आरव की सबसे बड़ी चुनौती थी—सच्चाई को उजागर करनालेकिन बिना अराजकता पैदा किए। उसी समय मीरा का नाम उसके दिमाग़ में आया। उसने तुरंत हेलिकॉप्टर से मीरा को अपडेट किया। मीरा की आवाज़ में डर नहींबल्कि साहस था। उसने कहा कि अगर वह सफल होता हैतो दुनिया को जानने का हक़ मिलेगा कि विकल्प पहले से तय किए गए थे। आरव ने सिर हिलाया और आगे बढ़ा।

अचानक स्क्रीन पर चेतावनी चमकी—किंगमेकर के कुछ बची हुई शाखाओं ने नेटवर्क को सुरक्षित करने की कोशिश शुरू कर दी थी। आरव ने तुरंत सभी गुप्त सुरंगों और बैक-अप सिस्टम का विश्लेषण किया और पता लगाया कि मुख्य सर्वर से कनेक्शन काटना ही एकमात्र उपाय था। उसे एहसास हुआ कि अब इस लड़ाई का परिणाम केवल उसके कौशल और साहस पर निर्भर करेगा। बिना किसी समय गंवाएउसने सभी बैक-अप सिस्टम पर नियंत्रण ले लिया और अंततः नेटवर्क को निष्क्रिय किया।

लेकिन तभी उसे एक और सच्चाई का सामना करना पड़ा—अद्वैत मल्होत्राजिसे वह सिर्फ़ एक मासूम मोहरा समझ रहा थावह खुद भी चयन प्रक्रिया का हिस्सा था। उसे किसी ने चेतावनी दी थी कि अद्वैत को भी सुरक्षित निकालना होगानहीं तो उसकी मौत पूरे मिशन को विफल कर देगी। आरव ने अपनी योजना तुरंत बदली। उसने अद्वैत को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर नेटवर्क से बाहर कियाऔर स्वयं रह गया। इस दौरान कुछ सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें पहचान लियालेकिन आरव की परछाई की तरह हल्की चाल ने उसे पकड़ने से रोक दिया।

अगली सुबहजब सूरज की पहली किरणें शहर पर पड़ींआरव और मीरा एक सुरक्षित स्थान पर खड़े थे। बाहर दुनिया सामान्य लग रही थी—कारेंलोगबच्चे खेल रहे थे—लेकिन अब सब कुछ बदल चुका था। मीरा ने अपनी रिपोर्ट लिखना शुरू कियाजिसमें न केवल उत्तराधिकारी की प्रक्रिया का खुलासा थाबल्कि यह भी बताया गया कि कैसे शक्तियाँ कभी दिखती नहीं हैंलेकिन दुनिया को नियंत्रित करती हैं। यह रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक हलचल मचीलेकिन आरव और मीरा जानते थे कि अब सब कुछ जनता की समझ पर निर्भर था।

आरव ने उस क्षण महसूस किया कि लड़ाई समाप्त नहीं हुई थी। सत्ता हमेशा बनी रहेगीपरछाइयाँ हमेशा रहेंगी और जासूस हमेशा सक्रिय रहेंगे। उसने देखा कि अद्वैत भी अपनी राह पर जा चुका थाऔर अब खुद निर्णय लेने लगेगा। मीरा ने उसे देखा और मुस्कराई—उनकी आंखों में थकान थीलेकिन संतोष भी। वह जानते थे कि उन्होंने इतिहास की एक कड़ी को उजागर किया थाऔर अब बाकी दुनिया उस सच्चाई का सामना करेगी।

दिल्ली लौटकर आरव फिर उसी बालकनी में खड़ा था। शहर चल रहा थालोग अपनी दुनिया में व्यस्त थेलेकिन उसकी नजरें ऊपर आसमान की ओर थीं। उसके हाथ में अब कोई हथियार नहीं थाकेवल तथ्य और सच्चाई का बोझ। वह जानता था कि एक दिन फिर परछाइयाँ आएंगीऔर एक नया खेल शुरू होगा। लेकिन अब वह तैयार था। उसने कोट की कॉलर ठीक कीगहरी सांस ली और अंधेरी गलियों की ओर बढ़ गया। शांति अस्थायी हो सकती थीलेकिन साहस और सच की कीमत स्थायी रहती है। 

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