बहुत समय पहले हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से राज्य के किनारे एक प्राचीन मठ था। उस मठ का नाम शांतिधाम था, और वहाँ रहने वाले भिक्षु अपनी तपस्या, अनुशासन और करुणा के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उसी मठ में एक भिक्षु रहता था जिसका नाम आर्यनंद था। आर्यनंद बचपन से ही मठ में पला-बढ़ा था। उसके माता-पिता उसे बहुत छोटी उम्र में मठ के द्वार पर छोड़ गए थे, यह कहकर कि शायद ईश्वर की सेवा में उसका जीवन सार्थक हो जाए। गुरु महायोगी शिवरत्न ने उसे शरण दी और अपने सान्निध्य में शिक्षा दी। आर्यनंद बुद्धिमान था, तेज स्मरणशक्ति वाला और साधना में भी आगे, लेकिन उसके स्वभाव में एक ऐसी अग्नि थी जिसे वह स्वयं भी समझ नहीं पाता था—वह थी क्रोध की अग्नि। छोटी-सी बात पर उसका चेहरा लाल हो जाता, आँखें जलने लगतीं और शब्द तीर की तरह निकलते। गुरु शिवरत्न अक्सर उसे समझाते, “क्रोध भीतर की अधूरी समझ का परिणाम है, पुत्र। जब मन अपने ही भय से टकराता है, तो वह आग बन जाता है।” परंतु आर्यनंद के भीतर का तूफान शांत होने का नाम नहीं लेता था।
एक दिन मठ में दूर देश से कुछ यात्री आए। वे थके हुए थे और भोजन की याचना कर
रहे थे। अन्य भिक्षु प्रेम से उनकी सेवा में लग गए, परंतु आर्यनंद उस दिन रसोई की देखरेख कर रहा था। उसने देखा कि यात्रियों में
से एक व्यक्ति बिना अनुमति के भंडार गृह में चला गया। बस, इतना भर देखना था कि उसके भीतर का ज्वालामुखी फट पड़ा। वह
तेज कदमों से वहाँ पहुँचा और उस यात्री पर चिल्लाने लगा, “क्या तुम्हें नियमों का ज्ञान नहीं? यह मठ है, कोई सराय
नहीं!” उसकी आवाज इतनी कठोर थी कि यात्री काँप उठा। अन्य भिक्षु बीच-बचाव करने आए, पर आर्यनंद का क्रोध शांत नहीं हुआ। अंततः गुरु शिवरत्न
स्वयं आए। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस शांत दृष्टि
से आर्यनंद को देखा। वह दृष्टि इतनी गहरी थी कि कुछ पल के लिए समय थम गया। फिर
गुरु ने धीरे से कहा, “जिस घर में
करुणा का दीप बुझ जाता है, वहाँ तपस्या भी
राख हो जाती है।” यह सुनकर आर्यनंद को क्षणिक ग्लानि हुई, पर भीतर का अहंकार अब भी जीवित था।
समय बीतता गया। मठ में आर्यनंद की विद्वता की चर्चा थी, पर उसके क्रोध से सभी सावधान रहते। एक दिन गुरु शिवरत्न ने
उसे बुलाया और कहा, “तुम्हें एक
यात्रा पर जाना होगा।” आर्यनंद ने आश्चर्य से पूछा, “कहाँ, गुरुदेव?” गुरु ने उत्तर दिया, “पहाड़ों के उस पार एक छोटा-सा गाँव है—निर्झरपुर। वहाँ के लोग जल की कमी से
पीड़ित हैं। तुम वहाँ जाओ, उनकी सहायता
करो और जब तक तुम्हारा मन पूर्णतः शांत न हो जाए, लौटकर मत आना।” यह आदेश अप्रत्याशित था, पर शिष्य धर्म निभाते हुए आर्यनंद चल पड़ा। उसके मन में अनेक प्रश्न थे—क्या
यह दंड है? या परीक्षा?
निर्झरपुर पहुँचते ही उसे समझ आ गया कि समस्या गंभीर है। गाँव के पास बहने
वाली नदी का प्रवाह कम हो गया था। कुएँ सूख रहे थे और लोग निराश थे। आर्यनंद ने
गाँववालों को एकत्र किया और जल संचय के उपाय सुझाने लगा। वह बुद्धिमानी से बातें
करता, पर जब कोई उसकी बात समझने
में देर करता, तो वह झुँझला उठता। गाँव के
बुजुर्ग हरिराम ने एक दिन कहा, “बाबा, ज्ञान तब फलता है जब वह धैर्य की मिट्टी में बोया जाए।” यह
सुनकर आर्यनंद को बुरा लगा। उसने सोचा—ये लोग मेरी सहायता चाहते हैं, फिर भी मुझे उपदेश दे रहे हैं। उसका क्रोध भीतर ही भीतर फिर
सुलगने लगा।
एक शाम जब वह पहाड़ी पर ध्यान कर रहा था, एक छोटा बालक उसके पास आया। बालक का नाम गोपाल था। उसने मासूमियत से पूछा, “बाबा, क्या आप सचमुच
संत हैं?” आर्यनंद ने कहा, “हाँ, मैं मठ का
भिक्षु हूँ।” बालक हँस पड़ा और बोला, “पर संत तो कभी
गुस्सा नहीं होते, मेरी दादी कहती
हैं।” यह सुनकर आर्यनंद का चेहरा तमतमा गया, पर बालक की निर्मल आँखों में कोई भय नहीं था। वह बोला, “जब आप चिल्लाते हैं, तो हमें लगता है जैसे बादल गरज रहे हों, पर बारिश नहीं हो रही।” यह वाक्य उसके हृदय में तीर की तरह लगा। वह रातभर सो
नहीं पाया। उसने पहली बार स्वयं से प्रश्न किया—क्या सच में मेरा क्रोध मेरे ज्ञान
को ढक रहा है?
अगले दिन उसने गाँववालों के साथ मिलकर पहाड़ी के पास एक छोटा बाँध बनाने का
कार्य आरंभ किया। काम कठिन था। पत्थर ढोने, मिट्टी जमाने और नहर बनाने में कई दिन लग गए। इस दौरान कई बार लोग थककर बैठ
जाते, बच्चों की शरारतें होतीं, काम में भूलें होतीं। हर बार आर्यनंद का मन क्रोध से भर
उठता, पर उसे गोपाल की बात याद आ
जाती—“बादल गरजते हैं, पर बारिश नहीं
होती।” वह गहरी साँस लेता, आँखें बंद करता
और स्वयं को रोकता। धीरे-धीरे उसने अनुभव किया कि जब वह शांत रहता है, तो लोग अधिक मन लगाकर काम करते हैं। उसकी आवाज में कठोरता
की जगह सहानुभूति आने लगी।
एक दिन भारी वर्षा हुई। गाँववाले चिंतित थे कि कहीं उनका बनाया बाँध टूट न
जाए। सभी लोग मिलकर उसे मजबूत करने लगे। तभी अचानक मिट्टी का एक हिस्सा धँस गया और
पानी तेज़ी से बहने लगा। कुछ लोग घबरा गए। पुराने आर्यनंद होते तो शायद क्रोध में
चिल्लाने लगते, पर इस बार उसने शांत स्वर
में निर्देश दिए। उसने स्वयं आगे बढ़कर पत्थर जमाए, लोगों का हौसला बढ़ाया और अंततः बाँध को बचा लिया। वर्षा रुकने के बाद जब सबने
देखा कि बाँध सुरक्षित है और जल संचय हो गया है, तो गाँव में उत्सव-सा माहौल बन गया। हरिराम ने आर्यनंद के चरण छूते हुए कहा, “आज आपने हमें केवल पानी नहीं दिया, धैर्य भी दिया।”
उस रात आर्यनंद अकेले बैठा आकाश की ओर देख रहा था। उसे लगा जैसे भीतर की कोई
गाँठ खुल रही हो। उसे स्मरण हुआ कि गुरु शिवरत्न ने कभी उसे डाँटा नहीं, केवल मौन दृष्टि से समझाया। शायद वही मौन उसकी सबसे बड़ी
शिक्षा थी। उसे समझ आया कि क्रोध अक्सर असुरक्षा से जन्म लेता है—यह भय कि कहीं
लोग हमें कम न समझ लें, हमारी बात न
मानें। पर सच्ची शक्ति तो शांत रहने में है।
कई महीने बीत गए। निर्झरपुर में अब जल की कमी नहीं थी। लोग संगठित हो चुके थे
और स्वयं अपने संसाधनों का ध्यान रखने लगे थे। आर्यनंद ने महसूस किया कि उसका मन
पहले से हल्का है। एक दिन गोपाल ने फिर पूछा, “बाबा, अब आप सच में संत बन गए?” इस बार आर्यनंद मुस्कराया और बोला, “मैं अभी सीख रहा हूँ।” बालक ने कहा, “अब जब आप बोलते हैं, तो हमें डर नहीं लगता।” यह सुनकर उसकी आँखों में आँसू आ गए।
अंततः वह मठ लौटने के लिए चला। शांतिधाम पहुँचते ही उसने गुरु शिवरत्न को
प्रणाम किया। गुरु ने पूछा, “यात्रा कैसी
रही?” आर्यनंद ने उत्तर दिया, “गुरुदेव, मैंने पानी की
धारा को रोकना सीखा, पर उससे भी
अधिक अपने क्रोध की धारा को मोड़ना सीखा।” गुरु मुस्कराए, “तो अब तुम समझ गए कि क्रोध नदी की तरह है—यदि उसे दिशा न दी
जाए, तो वह विनाश करता है; और यदि उसे साध लिया जाए, तो जीवन देता है।”
उस दिन से आर्यनंद मठ में पहले जैसा नहीं रहा। उसकी विद्वता वही थी, पर उसके शब्दों में कोमलता आ गई थी। जब कोई नया शिष्य गलती
करता, तो वह डाँटने के बजाय उसे
पास बैठाकर समझाता। कभी-कभी भीतर हल्की चिंगारी उठती भी, तो वह उसे पहचान लेता और शांत श्वासों में विलीन कर देता।
लोग अब उसे “क्रोधी भिक्षु” नहीं, बल्कि
“धैर्यनंद” कहने लगे।
वर्षों बाद जब गुरु शिवरत्न ने देह त्यागी, तो मठ की जिम्मेदारी आर्यनंद को सौंपी गई। उसने अपने पहले उपदेश में कहा, “मैंने जीवन में सीखा है कि क्रोध शत्रु नहीं, शिक्षक है। वह हमें बताता है कि भीतर कहीं असंतुलन है। यदि
हम उसे समझ लें, तो वही ऊर्जा करुणा में बदल
जाती है।” उसके शब्दों में अनुभव की गहराई थी। मठ में आने वाले लोग अब केवल
शास्त्र नहीं, बल्कि उसके जीवन की कथा
सुनने आते।
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