एक छोटे से गाँव में रघु नाम का एक मेहनती लकड़हारा रहता था। उसका घर गाँव के सबसे अंदर वाले हिस्से में था। हर सुबह वह लकड़ियाँ काटने जंगल जाता, लेकिन जब तक वह जंगल पहुँचता, तब तक दूसरे लकड़हारे अच्छी और सूखी लकड़ियाँ काटकर अपने घर लौट चुके होते। इस कारण रघु को बहुत कम लकड़ियाँ मिलतीं और उसकी कमाई भी बेहद कम होती थी। उसकी बूढ़ी माँ बीमार रहती थी, घर की हालत खराब थी और वह अपनी बचपन की साथी गौरी से विवाह भी करना चाहता था। मगर पैसों की कमी उसके हर सपने के बीच दीवार बनकर खड़ी थी।
एक दिन जंगल जाते समय
उसकी मुलाकात गौरी से हुई। गौरी चिंतित थी। उसने रघु से कहा कि उसके पिता उसके लिए
वर ढूँढ़ रहे हैं और यदि रघु ने जल्द ही विवाह की बात नहीं की, तो उसकी शादी किसी और से कर दी जाएगी। रघु ने
दुखी होकर कहा कि वह गौरी से बहुत प्रेम करता है, लेकिन उसके पास इतना धन नहीं है कि वह विवाह की जिम्मेदारी
उठा सके। माँ का इलाज, घर की मरम्मत और
अन्य खर्चे उसकी कमाई से पूरे नहीं हो पा रहे थे। गौरी को दिलासा देकर वह जंगल की
ओर चल पड़ा।
जंगल पहुँचने पर उसे फिर
वही निराशा हाथ लगी। सारी सूखी लकड़ियाँ पहले ही काटी जा चुकी थीं। उदास होकर
लौटते समय उसकी मुलाकात बूढ़े लकड़हारे हिम्मत चाचा से हुई। हिम्मत चाचा ने उसकी
परेशानी सुनकर गाँव के दूसरी ओर स्थित एक रहस्यमयी जंगल का जिक्र किया। उन्होंने
बताया कि वहाँ बहुत बड़े और पुराने पेड़ हैं, जिनकी लकड़ी अत्यंत मजबूत, टिकाऊ और महँगी बिकती है। लेकिन उन्होंने यह भी चेतावनी दी
कि जो भी उस जंगल में गया, वह कभी वापस नहीं
लौटा। वर्षों से गाँव वालों में उस जंगल का भय व्याप्त था।
रघु घर लौट आया, लेकिन उसके मन में उस जंगल का विचार लगातार
घूमता रहा। रात को जब उसने अपनी माँ को भोजन कराया, तब माँ ने उसकी उदासी का कारण पूछा। रघु ने अपनी आर्थिक
परेशानियों का जिक्र किया। तब उसकी माँ शांति ने उसे उस रहस्यमयी जंगल में जाने से
मना किया और एक पुरानी घटना सुनाई।
वर्षों पहले रघु के पिता
केशव भी लकड़हारे थे। उन्होंने अपने मित्र जग्गू के साथ उसी जंगल में जाना शुरू
किया था। वहाँ की लकड़ियाँ बहुत अच्छी थीं और उनकी कमाई भी बढ़ गई थी। धीरे-धीरे
गाँव के अन्य लकड़हारे भी वहाँ जाने लगे। लेकिन कुछ समय बाद अजीब घटनाएँ होने लगीं।
जो भी लकड़हारा अकेले उस जंगल में जाता, वह रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाता। भय के कारण अधिकांश लोगों ने वहाँ जाना छोड़
दिया, लेकिन केशव ने इन बातों
को अफवाह समझा और एक दिन अकेले जंगल चला गया। उस दिन के बाद वह कभी वापस नहीं
लौटा।
यह सुनकर भी रघु का
निश्चय नहीं बदला। उसने सोचा कि यदि उसे अपनी माँ का इलाज करवाना है और अपने सपनों
को पूरा करना है, तो उसे उस जंगल
का रहस्य जानना ही होगा। अगले दिन वह कुल्हाड़ी लेकर उस दिशा में चल पड़ा।
कई घंटों की यात्रा के
बाद वह रहस्यमयी जंगल में पहुँचा। वहाँ के विशाल पेड़ और हरियाली देखकर वह
मंत्रमुग्ध हो गया। लेकिन अचानक उसे किसी के फुसफुसाने और रोने जैसी आवाजें सुनाई
देने लगीं। तभी उसके पीछे काले धुएँ का एक विशाल गुबार प्रकट हुआ। देखते ही देखते
वह धुआँ एक भयानक जिन्न का रूप ले बैठा। उसकी लाल चमकती आँखें और डरावना स्वर किसी
भी इंसान को भयभीत कर सकता था।
जिन्न ने कहा, “बहुत वर्षों बाद कोई बिना मेरी अनुमति के इस
जंगल में आया है। अब तुम्हें भी वही सज़ा मिलेगी जो बाकी लोगों को मिली थी।”
रघु ने साहस दिखाते हुए
पूछा कि क्या गाँव के गायब हुए लकड़हारों के पीछे वही जिम्मेदार है। जिन्न ने गर्व
से स्वीकार किया कि उसने ही उन सभी को गायब किया था, क्योंकि कोई भी उसकी एक इच्छा पूरी नहीं कर पाया था। उसकी
इच्छा थी कि उसे मनुष्यों जैसा शरीर मिले। धुएँ के शरीर के कारण वह न ठीक से चल
सकता था, न वस्तुएँ पकड़ सकता था
और न ही मनुष्यों की तरह जीवन जी सकता था।
रघु समझ गया कि उसके पिता
और बाकी लोग इसी जिन्न के जाल में फँसे हैं। उसने चतुराई से जिन्न को विश्वास
दिलाया कि वह उसकी इच्छा पूरी करने की कोशिश करेगा। जिन्न ने उसे बताया कि जंगल के
अंत में एक विशेष पेड़ है, जिसकी खाल बहुत
पतली और लचीली है। उस खाल से मनुष्य के आकार का शरीर बनाया जा सकता है, जिसमें प्रवेश करके वह इंसान जैसा बन जाएगा।
रघु उस पेड़ की खोज में
निकल पड़ा। रास्ते में उसे एक पक्षी मिला जिसने चेतावनी दी कि यदि जिन्न को वह
शरीर मिल गया, तो वह और भी अधिक
शक्तिशाली और खतरनाक हो जाएगा। लेकिन रघु ने पक्षी को विश्वास दिलाया कि उसके पास
जिन्न को हराने की योजना है। पक्षी ने उसकी सहायता की और उसे उस विशेष पेड़ तक
पहुँचा दिया।
रघु ने सावधानी से पेड़
की खाल निकाली और मनुष्य के आकार का ढाँचा बनाकर जिन्न के पास लौट आया। खाल देखकर
जिन्न बहुत प्रसन्न हुआ, लेकिन रघु ने कहा
कि पहले उसकी दो शर्तें पूरी करनी होंगी। जिन्न ने सहमति दे दी।
रघु की पहली शर्त थी कि
जिन्न अब तक जिन-जिन लोगों को कठपुतली बनाकर कैद किए हुए है, उन्हें मुक्त करे। जिन्न ने जादू किया और देखते
ही देखते अनेक कठपुतलियाँ फिर से मनुष्य बन गईं। उनमें रघु के पिता केशव भी थे।
वर्षों बाद अपने पिता को देखकर रघु की आँखों में आँसू आ गए। केशव भी अपने बेटे को
पहचानकर भावुक हो उठे।
अब रघु ने दूसरी शर्त
रखी। उसने एक खाली बोतल निकाली और जिन्न से कहा, “यदि तुम सचमुच इतने शक्तिशाली हो, तो अपना आकार छोटा करके इस बोतल के अंदर जाकर दिखाओ। तभी
मैं मानूँगा कि तुम इस नए शरीर के योग्य हो।”
अहंकारी जिन्न ने इसे
अपनी शक्ति का अपमान समझा। उसने तुरंत अपना आकार छोटा किया और धुएँ के रूप में
बोतल के अंदर प्रवेश कर गया। जैसे ही वह भीतर पहुँचा, रघु ने फुर्ती से बोतल का ढक्कन बंद कर दिया।
जिन्न क्रोध से चिल्लाने
लगा, लेकिन अब बहुत देर हो
चुकी थी। उसकी सारी शक्तियाँ बोतल के भीतर कैद हो गई थीं। पक्षी, केशव और अन्य लकड़हारे रघु की बुद्धिमानी देखकर
उसकी प्रशंसा करने लगे।
रघु ने कहा कि इस बोतल को
ऐसी जगह छिपाना होगा जहाँ से कोई इसे दोबारा न खोल सके। इसलिए वह समुद्र के किनारे
गया और उस बोतल को गहरे पानी में फेंक दिया। इस प्रकार धुएँ वाले दुष्ट जिन्न का
अंत हो गया।
इसके बाद रघु अपने पिता
को लेकर गाँव लौट आया। वर्षों बाद पति को देखकर उसकी माँ शांति की आँखों में खुशी
के आँसू भर आए। जब पूरे गाँव को पता चला कि रघु ने न केवल अपने पिता बल्कि सभी खोए
हुए लकड़हारों को वापस लौटा दिया है, तो लोग उसकी बहादुरी और बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे।
यह समाचार जब गौरी के
पिता तक पहुँचा, तो वे भी बहुत
प्रसन्न हुए। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के गौरी का विवाह रघु से करने की सहमति
दे दी। अब रघु के पास अपने परिवार, अपने प्रेम और
अपने भविष्य की खुशियाँ थीं।
इस प्रकार रघु ने अपने
साहस, धैर्य और बुद्धिमानी से न
केवल अपने पिता को वापस पाया, बल्कि पूरे गाँव
को वर्षों पुराने भय से भी मुक्त कर दिया। उसकी कहानी हमेशा के लिए गाँव वालों के
लिए प्रेरणा बन गई।
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