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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

सिंदबाद जहाज़ी की कहानी

बहुत समय पहले One Thousand and One Nights की प्रसिद्ध कहानियों में एक साहसी और बुद्धिमान व्यापारी था, जिसका नाम सिंदबाद जहाज़ी था। वह Baghdad में रहता था। सिंदबाद एक धनी परिवार में पैदा हुआ था, लेकिन युवावस्था में उसने अपने पिता की संपत्ति को बिना सोचे-समझे खर्च कर दिया। जब उसकी अधिकांश दौलत समाप्त हो गई, तब उसे अपने पिता की कही हुई बात याद आई कि गरीबी से बचने का सबसे अच्छा उपाय मेहनत और समझदारी है। इस बात ने सिंदबाद को गहराई से प्रभावित किया। उसने निश्चय किया कि वह फिर से अपनी किस्मत बनाएगा और व्यापार के माध्यम से धन कमाएगा।

सिंदबाद ने अपनी बची हुई संपत्ति से कुछ व्यापारिक सामान खरीदा और उन व्यापारियों के साथ समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा जो दूर-दूर के देशों में जाकर व्यापार करते थे। यह उसकी पहली समुद्री यात्रा थी। वह उत्साहित भी था और थोड़ा भयभीत भी, क्योंकि उसने पहले कभी समुद्र का लंबा सफर नहीं किया था। विशाल जहाज़ पर सवार होकर वह कई बंदरगाहों से गुज़रा। रास्ते में उसने नए देशों, नई संस्कृतियों और अनगिनत प्राकृतिक दृश्यों को देखा। समुद्र कभी शांत रहता, तो कभी उसकी ऊँची-ऊँची लहरें जहाज़ को हिलाकर रख देतीं। लेकिन सिंदबाद का साहस उसे आगे बढ़ाता रहा।

कई दिनों की यात्रा के बाद जहाज़ एक सुंदर द्वीप के पास पहुँचा। वह स्थान इतना हरा-भरा और मनोहारी था कि सभी यात्री वहाँ उतरकर विश्राम करना चाहते थे। सिंदबाद भी अपने साथियों के साथ द्वीप पर उतर गया। वहाँ उन्होंने पेड़ों की छाया में आराम किया और भोजन बनाने के लिए आग जलाई। कुछ देर बाद अचानक धरती हिलने लगी। सभी लोग घबरा गए। तभी जहाज़ के कप्तान ने जोर से चिल्लाकर कहा कि यह कोई द्वीप नहीं, बल्कि समुद्र में सोई हुई एक विशाल व्हेल मछली है। आग की गर्मी से वह जाग गई थी और अब समुद्र में गोता लगाने वाली थी।

यह सुनते ही सभी लोग घबराकर अपनी नावों और जहाज़ की ओर भागे। कई लोग समय रहते जहाज़ पर चढ़ गए, लेकिन सिंदबाद पीछे रह गया। अगले ही क्षण विशाल व्हेल समुद्र में डूब गई और सिंदबाद गहरे पानी में गिर पड़ा। उसके चारों ओर केवल अथाह समुद्र था। वह तैरना जानता था, इसलिए उसने अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष शुरू किया। सौभाग्य से उसे जहाज़ से गिरा हुआ एक लकड़ी का बड़ा तख्ता मिल गया। वह उसी का सहारा लेकर समुद्र की लहरों में बहता रहा।

पूरा दिन और पूरी रात वह समुद्र में तैरता रहा। कभी उसे लगता कि अब उसकी मृत्यु निश्चित है, तो कभी वह आशा करता कि ईश्वर उसकी रक्षा करेगा। अगले दिन सुबह वह एक दूसरे द्वीप के किनारे पहुँच गया। थका हुआ सिंदबाद किसी तरह किनारे पर चढ़ा और बेहोश होकर गिर पड़ा। कुछ समय बाद जब उसकी आँख खुली तो उसने स्वयं को हरे-भरे मैदानों और फलों से लदे वृक्षों के बीच पाया। उसने मीठे फल खाए और झरने का पानी पीकर अपनी शक्ति वापस प्राप्त की।

द्वीप पर घूमते हुए उसने एक सुंदर घोड़ी को देखा, जो एक खूंटे से बंधी हुई थी। सिंदबाद को आश्चर्य हुआ कि इतने निर्जन स्थान पर घोड़ी कैसे हो सकती है। तभी जमीन के नीचे से कुछ लोगों की आवाज़ें सुनाई दीं। थोड़ी देर बाद कुछ आदमी बाहर निकले। वे राजा के सेवक थे। उन्होंने सिंदबाद को बताया कि वे लोग राजा के घोड़ों की देखभाल करते हैं और विशेष समय पर उन्हें यहाँ चराने लाते हैं। सिंदबाद की कहानी सुनकर वे लोग उसके प्रति दयालु हो गए और उसे अपने साथ राजा के पास ले गए।

राजा ने सिंदबाद का स्वागत किया और उसे अपने महल में रहने की अनुमति दी। सिंदबाद कुछ समय तक वहीं रहा। उसने राजा और उसके दरबारियों का विश्वास जीत लिया। एक दिन बंदरगाह पर खड़े हुए उसने एक व्यापारिक जहाज़ देखा। जब वह उसके पास गया, तो उसे पता चला कि वह वही जहाज़ था जिससे वह समुद्र में गिर गया था। जहाज़ का कप्तान यह मान चुका था कि सिंदबाद मर चुका है। कप्तान के पास अभी भी सिंदबाद का व्यापारिक सामान सुरक्षित रखा हुआ था।

सिंदबाद ने कप्तान को अपनी पहचान बताई, लेकिन पहले तो कप्तान को विश्वास नहीं हुआ। बाद में जब सिंदबाद ने यात्रा से जुड़ी कई घटनाएँ बताईं, तब कप्तान ने उसे पहचान लिया। वह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सिंदबाद का सारा सामान उसे लौटा दिया। सिंदबाद ने उस सामान का व्यापार किया और अच्छा लाभ कमाया। कुछ समय बाद उसने अपने नए मित्रों को विदा कहा और उसी जहाज़ से वापस अपने नगर लौटने का निर्णय लिया।

लंबी यात्रा के बाद सिंदबाद सकुशल Baghdad पहुँच गया। वहाँ उसने अपने व्यापार से कमाए हुए धन से फिर से समृद्ध जीवन शुरू किया। उसके मित्र और रिश्तेदार उसे जीवित देखकर आश्चर्यचकित थे, क्योंकि सभी लोग मान चुके थे कि वह समुद्र में मर गया होगा। सिंदबाद ने अपनी अद्भुत यात्रा के अनुभव सबको सुनाए। लोगों ने उसकी बहादुरी और धैर्य की बहुत प्रशंसा की।

लेकिन सिंदबाद का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वह हमेशा एक ही स्थान पर बैठा रहे। समुद्र की रोमांचक दुनिया, दूर देशों की यात्राएँ और नए अनुभव उसे बार-बार आकर्षित करते थे। कुछ समय आराम करने के बाद उसके मन में फिर से समुद्री यात्रा करने की इच्छा जाग उठी। उसे लगता था कि संसार बहुत विशाल है और अभी उसने उसका केवल एक छोटा-सा भाग ही देखा है। इसलिए उसने दूसरी यात्रा की तैयारी शुरू कर दी, जो उससे भी अधिक रोमांचक और खतरनाक साबित होने वाली थी।

पहली समुद्री यात्रा से सुरक्षित लौटने के बाद सिंदबाद ने कुछ समय तक आराम किया। उसके पास पर्याप्त धन-संपत्ति थी और वह आराम से जीवन बिता सकता था। लेकिन उसका मन केवल धन कमाने में नहीं लगता था। उसे नई जगहें देखने, नए लोगों से मिलने और अनजाने रहस्यों को जानने की तीव्र इच्छा रहती थी। समुद्र की लहरों की आवाज़ जैसे उसे बार-बार पुकारती थी। अंततः उसने दूसरी समुद्री यात्रा पर निकलने का निश्चय किया।

सिंदबाद ने अपने लिए बहुमूल्य व्यापारिक वस्तुएँ खरीदीं और व्यापारियों के एक दल के साथ फिर जहाज़ पर सवार हो गया। जहाज़ ने अनुकूल हवाओं के सहारे यात्रा शुरू की। कई दिनों तक सब कुछ ठीक चलता रहा। व्यापारी अलग-अलग द्वीपों और नगरों में अपना सामान बेचते और नया सामान खरीदते रहे। सिंदबाद भी सफलतापूर्वक व्यापार कर रहा था। लेकिन एक दिन भाग्य ने फिर उसके लिए एक नई परीक्षा तैयार कर रखी थी।

जहाज़ एक सुंदर द्वीप के निकट पहुँचा। वहाँ हरे-भरे पेड़, रंग-बिरंगे फूल और स्वच्छ जल के झरने थे। सभी लोग उस स्थान की सुंदरता से आकर्षित हो गए। सिंदबाद भी कुछ साथियों के साथ द्वीप पर घूमने निकल पड़ा। वह प्रकृति की सुंदरता में इतना खो गया कि अपने साथियों से दूर निकल गया। जब उसे होश आया और वह वापस समुद्र तट पर पहुँचा, तब तक जहाज़ वहाँ से जा चुका था।

सिंदबाद ने दूर समुद्र में अपने जहाज़ को जाते हुए देखा और उसे रोकने के लिए बहुत पुकारा, लेकिन उसकी आवाज़ किसी तक नहीं पहुँची। अब वह फिर अकेला था। उसके सामने घना जंगल था और चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने हिम्मत नहीं हारी और भोजन तथा आश्रय की तलाश में द्वीप के भीतर की ओर चल पड़ा।

कुछ दूर जाने पर उसे एक बहुत ऊँचा सफेद गुंबद दिखाई दिया। वह इतना विशाल था कि उसे देखकर सिंदबाद आश्चर्यचकित रह गया। उसने उसके चारों ओर घूमकर देखा, लेकिन उसका कोई दरवाज़ा या खिड़की नहीं थी। तभी उसे यात्रियों द्वारा सुनाई गई एक कहानी याद आई। यह विशाल गुंबद वास्तव में रुख नामक एक अद्भुत और विशाल पक्षी का अंडा था। रुख इतना बड़ा पक्षी माना जाता था कि वह हाथियों को अपने पंजों में उठाकर उड़ सकता था।

सिंदबाद अभी यह सोच ही रहा था कि अचानक आकाश अंधकारमय हो गया। उसने ऊपर देखा तो एक विशाल पक्षी उड़ता हुआ आ रहा था। वह रुख था। पक्षी आकर अपने अंडे पर बैठ गया। सिंदबाद के मन में एक साहसी योजना आई। उसने अपनी पगड़ी खोलकर स्वयं को रुख के एक विशाल पैर से बाँध लिया। उसका विचार था कि जब पक्षी उड़ान भरेगा, तो वह उसे किसी आबाद स्थान तक पहुँचा देगा।

अगली सुबह रुख आकाश में उड़ गया। वह इतनी ऊँचाई पर पहुँच गया कि नीचे के पहाड़ और समुद्र छोटे-छोटे दिखाई देने लगे। सिंदबाद भय और आश्चर्य से भर गया। कुछ समय बाद रुख एक गहरी घाटी में उतरा। जैसे ही पक्षी जमीन पर पहुँचा, सिंदबाद ने जल्दी से स्वयं को उसके पैर से अलग कर लिया।

जब उसने चारों ओर देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। घाटी अनगिनत चमकते हुए हीरों से भरी हुई थी। जहाँ तक उसकी दृष्टि जाती थी, वहाँ हीरे ही हीरे दिखाई देते थे। लेकिन यह स्थान जितना सुंदर था, उतना ही खतरनाक भी था। घाटी में विशाल अजगर और भयंकर साँप रहते थे। दिन के समय वे चट्टानों की दरारों में छिपे रहते और रात होते ही बाहर निकल आते थे।

सिंदबाद समझ गया कि यहाँ से निकलना आसान नहीं होगा। तभी उसने एक और विचित्र बात देखी। ऊपर पहाड़ों से समय-समय पर मांस के बड़े-बड़े टुकड़े घाटी में गिराए जा रहे थे। पहले तो वह कुछ समझ नहीं पाया, लेकिन बाद में उसे व्यापारियों की एक पुरानी युक्ति याद आई। व्यापारी घाटी में मांस फेंकते थे। हीरे उन मांस के टुकड़ों से चिपक जाते थे। फिर विशाल गिद्ध उन टुकड़ों को उठाकर अपने घोंसलों में ले जाते थे। व्यापारी गिद्धों को भगाकर मांस से हीरे इकट्ठा कर लेते थे।

सिंदबाद ने भी यही उपाय अपनाने का निर्णय किया। उसने एक बड़े मांस के टुकड़े से स्वयं को मजबूती से बाँध लिया। कुछ ही देर बाद एक विशाल गिद्ध नीचे उतरा और उस मांस को उठाकर पहाड़ की चोटी पर अपने घोंसले में ले गया। जैसे ही गिद्ध ने मांस छोड़ा, सिंदबाद ने स्वयं को अलग कर लिया।

उसी समय व्यापारी वहाँ पहुँचे। पहले तो वे उसे देखकर डर गए, क्योंकि उन्होंने कभी किसी मनुष्य को उस घाटी से जीवित निकलते नहीं देखा था। जब सिंदबाद ने अपनी कहानी सुनाई, तो वे उसकी बहादुरी से प्रभावित हुए। उसके पास घाटी से इकट्ठे किए गए कई बहुमूल्य हीरे भी थे। व्यापारियों ने उसका स्वागत किया और उसे अपने साथ ले लिया।

इसके बाद सिंदबाद ने उन व्यापारियों के साथ कई देशों की यात्रा की। उसने दुर्लभ वस्तुओं का व्यापार किया और बहुत लाभ कमाया। जहाँ भी वह गया, लोगों ने उसकी अद्भुत कहानी सुनकर आश्चर्य व्यक्त किया। धीरे-धीरे उसकी संपत्ति पहले से भी अधिक बढ़ती गई।

कई महीनों बाद सिंदबाद अपने नगर वापस लौटा। उसके साथ बहुमूल्य हीरे, मोती और अन्य कीमती वस्तुएँ थीं। उसकी समृद्धि देखकर लोग चकित रह गए। उसने गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता की तथा अपने मित्रों के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

लेकिन रोमांच का आकर्षण उसके मन से अभी भी समाप्त नहीं हुआ था। उसे लगता था कि संसार में अभी भी अनेक रहस्य छिपे हुए हैं। कुछ समय बाद उसके मन में तीसरी समुद्री यात्रा पर जाने की इच्छा जागी। उसे यह पता नहीं था कि आने वाली यात्रा में उसे ऐसे भयानक राक्षसों और खतरनाक घटनाओं का सामना करना पड़ेगा, जिनकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी।

दूसरी यात्रा से लौटने के बाद सिंदबाद की प्रसिद्धि और धन-दौलत दोनों बहुत बढ़ गए थे। उसके पास इतना धन था कि उसे जीवन भर काम करने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी उसका मन शांत नहीं था। उसे दूर-दूर के देशों की यात्रा करना और नए अनुभव प्राप्त करना बहुत पसंद था। कुछ समय तक आराम करने के बाद उसने तीसरी समुद्री यात्रा पर जाने का निश्चय किया।

इस बार उसने पहले से अधिक मूल्यवान व्यापारिक वस्तुएँ खरीदीं और एक बड़े जहाज़ में सवार होकर समुद्र की ओर निकल पड़ा। कई सप्ताह तक यात्रा सुखद रही। जहाज़ विभिन्न बंदरगाहों पर रुकता, व्यापारी सामान खरीदते-बेचते और फिर आगे बढ़ जाते। सिंदबाद भी सफलतापूर्वक व्यापार कर रहा था।

एक दिन जहाज़ एक ऐसे समुद्री क्षेत्र में पहुँचा जहाँ तेज़ हवाएँ चल रही थीं। अचानक भयंकर तूफ़ान आ गया। विशाल लहरें जहाज़ से टकराने लगीं। कप्तान ने जहाज़ को बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन तूफ़ान इतना प्रचंड था कि जहाज़ अपना रास्ता खो बैठा। कई घंटों तक संघर्ष करने के बाद जहाज़ एक अनजान द्वीप के निकट पहुँच गया।

नाविकों के चेहरों पर भय साफ दिखाई दे रहा था। कप्तान ने बताया कि यह एक खतरनाक द्वीप है, जिसके बारे में समुद्री यात्रियों में डरावनी कहानियाँ प्रचलित हैं। लेकिन उनके पास वहाँ रुकने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जहाज़ किनारे लगाया गया और सभी लोग सावधानी से उतर गए।

द्वीप घने जंगलों से भरा हुआ था। वहाँ का वातावरण अजीब और रहस्यमय था। कुछ दूर चलने पर यात्रियों को एक विशाल भवन दिखाई दिया। उसकी दीवारें ऊँची थीं और मुख्य द्वार खुला हुआ था। आश्रय की तलाश में वे सभी भीतर चले गए।

अंदर पहुँचकर उन्होंने देखा कि वहाँ मनुष्यों की हड्डियों के ढेर पड़े हुए थे। पास ही बड़े-बड़े लोहे के डंडे और आग जलाने की व्यवस्था थी। यह दृश्य देखकर सभी भयभीत हो गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह स्थान किसका है।

रात होने पर अचानक धरती काँपने लगी। भारी कदमों की आवाज़ सुनाई दी। कुछ ही क्षणों में एक विशालकाय राक्षस भवन के अंदर आया। वह इतना लंबा था कि उसकी ऊँचाई किसी खजूर के पेड़ जैसी प्रतीत होती थी। उसकी केवल एक आँख थी, जो माथे के बीचोंबीच चमक रही थी। उसके बड़े-बड़े दाँत बाहर निकले हुए थे और चेहरा अत्यंत भयानक था।

राक्षस ने यात्रियों को एक-एक करके उठाकर देखा, जैसे कोई व्यक्ति बाज़ार में फल चुनता है। उसने सबसे मोटे व्यापारी को पकड़ लिया, लोहे की छड़ में पिरोया और आग पर भूनकर खा गया। यह दृश्य देखकर सभी लोगों के प्राण सूख गए। पूरी रात वे भय से काँपते रहे।

अगली सुबह राक्षस चला गया। उसके जाते ही यात्रियों ने वहाँ से भागने की योजना बनाई। उन्होंने जंगल से लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और समुद्र किनारे छोटी-छोटी नावें बनानी शुरू कर दीं। लेकिन शाम होने से पहले वे तैयार नहीं हो सके।

रात को राक्षस फिर आया और उसने एक अन्य व्यक्ति को पकड़कर खा लिया। अब सभी को विश्वास हो गया कि यदि वे जल्दी नहीं भागे, तो एक-एक करके सभी उसकी भेंट चढ़ जाएँगे। सिंदबाद ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक साहसी योजना बनाई।

उन्होंने आग में लोहे की लंबी छड़ों को लाल-गर्म कर दिया। जब राक्षस भोजन करके गहरी नींद में सो गया, तब सभी धीरे-धीरे उसके पास पहुँचे। एक संकेत मिलते ही उन्होंने लाल-गर्म छड़ें उसकी एकमात्र आँख में घुसा दीं।

राक्षस दर्द से भयानक चीख मारकर उठ बैठा। वह इधर-उधर हाथ मारने लगा, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यात्रियों ने तुरंत वहाँ से भागकर समुद्र तट की ओर दौड़ लगाई।

सुबह होने से पहले वे अपनी छोटी नावों में बैठकर समुद्र की ओर निकल गए। लेकिन संकट अभी समाप्त नहीं हुआ था। अंधा राक्षस अपने अन्य राक्षस साथियों के साथ समुद्र किनारे पहुँच गया। वे विशाल चट्टानें उठाकर नावों पर फेंकने लगे।

अधिकांश नावें चट्टानों की चोट से टूट गईं और उनमें बैठे लोग समुद्र में डूब गए। सौभाग्य से सिंदबाद की नाव बच गई। उसमें केवल कुछ ही लोग थे। वे तेज़ी से चप्पू चलाकर उस भयावह स्थान से दूर निकल गए।

कई दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद वे एक अन्य द्वीप पर पहुँचे। पहले तो उन्हें लगा कि अब वे सुरक्षित हैं, लेकिन यह भ्रम जल्द ही टूट गया। रात को जब वे विश्राम कर रहे थे, तभी एक विशाल अजगर वहाँ आ पहुँचा। उसका शरीर किसी बड़े पेड़ के तने जैसा मोटा था।

अजगर ने सिंदबाद के एक साथी को निगल लिया और फिर जंगल में गायब हो गया। अगले दिन यात्रियों ने ऊँचे पेड़ों पर चढ़कर रात बिताने का निर्णय किया। लेकिन अगली रात अजगर फिर आया और एक अन्य व्यक्ति को खा गया।

अब सिंदबाद अकेला बचा था। उसने लकड़ियों और काँटेदार झाड़ियों से अपने चारों ओर एक मजबूत घेरा बना लिया ताकि अजगर उसके पास न पहुँच सके। पूरी रात वह भय से जागता रहा। सुबह होने पर अजगर वहाँ से चला गया।

कई दिनों तक अकेले भटकने के बाद सिंदबाद समुद्र तट पर पहुँचा। तभी उसने दूर एक जहाज़ को गुजरते देखा। उसने अपनी पगड़ी खोलकर हवा में लहराई और जोर-जोर से सहायता के लिए पुकारने लगा।

सौभाग्य से जहाज़ के नाविकों ने उसे देख लिया। वे नाव लेकर किनारे आए और उसे अपने साथ जहाज़ पर ले गए। सिंदबाद ने अपनी पूरी कहानी सुनाई। नाविक उसकी विपत्तियों को सुनकर हैरान रह गए।

जहाज़ का कप्तान दयालु व्यक्ति था। उसने सिंदबाद को भोजन और वस्त्र दिए। बाद में जब उसे पता चला कि यह वही प्रसिद्ध व्यापारी सिंदबाद है, जिसकी समुद्री यात्राओं की चर्चाएँ दूर-दूर तक फैली हुई हैं, तो उसने उसका विशेष सम्मान किया।

कुछ महीनों बाद सिंदबाद अपने नगर वापस पहुँच गया। उसने फिर से व्यापार किया और पहले से भी अधिक धनी बन गया। लोगों ने उसकी अद्भुत कहानी सुनकर आश्चर्य व्यक्त किया। सबको लगता था कि इतना कष्ट सहने के बाद अब वह कभी समुद्री यात्रा नहीं करेगा।

लेकिन सिंदबाद का साहसी हृदय अभी भी रोमांच की खोज में था। कुछ समय बाद उसने चौथी समुद्री यात्रा की तैयारी शुरू कर दी। उसे पता नहीं था कि अगली यात्रा में उसे ऐसी रहस्यमयी घटनाओं का सामना करना पड़ेगा, जहाँ जीवित मनुष्यों को मृतकों के साथ दफना दिया जाता था।

तीसरी समुद्री यात्रा के भयानक अनुभवों से बचकर लौटने के बाद सिंदबाद ने कुछ समय तक अपने घर में आराम किया। उसने अपने मित्रों और परिवार के साथ सुखपूर्वक दिन बिताए। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी और जीवन में किसी वस्तु की कमी नहीं थी। फिर भी उसका मन बार-बार समुद्र की ओर खिंचता था। रोमांच और खोज की भावना उसके स्वभाव का हिस्सा बन चुकी थी। अंततः उसने चौथी समुद्री यात्रा पर जाने का निश्चय कर लिया।

इस बार भी उसने मूल्यवान वस्तुएँ खरीदीं और व्यापारियों के एक समूह के साथ जहाज़ पर सवार हो गया। प्रारंभिक यात्रा बहुत अच्छी रही। जहाज़ अनेक द्वीपों और नगरों में गया। व्यापार सफलतापूर्वक चलता रहा और सभी लोग प्रसन्न थे। लेकिन एक दिन समुद्र में भयंकर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ।

तेज़ हवाएँ चलने लगीं और विशाल लहरें जहाज़ को चारों ओर से घेरने लगीं। कप्तान ने जहाज़ को बचाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन प्रकृति की शक्ति के सामने उसकी सारी कोशिशें व्यर्थ सिद्ध हुईं। अंततः जहाज़ एक चट्टान से टकराकर टूट गया। अनेक यात्री और नाविक समुद्र में डूब गए।

सिंदबाद किसी तरह लकड़ी के एक बड़े तख्ते का सहारा लेकर तैरता रहा। कई घंटों के संघर्ष के बाद वह कुछ अन्य बचे हुए लोगों के साथ एक द्वीप पर पहुँच गया। सभी लोग थके हुए और भूखे थे, लेकिन जीवित बच जाने के कारण ईश्वर का धन्यवाद कर रहे थे।

द्वीप पर उन्हें फल और पानी मिल गया, जिससे उनकी जान बच गई। कुछ दिन बाद वे आगे बढ़ते हुए एक ऐसे देश में पहुँचे जहाँ के लोग सभ्य और मित्रतापूर्ण थे। वहाँ के निवासियों ने यात्रियों का स्वागत किया और उन्हें भोजन तथा रहने की जगह दी।

सिंदबाद ने देखा कि उस राज्य के लोग एक विचित्र परंपरा का पालन करते थे। पहले तो उसे इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन बाद में उसने इसके बारे में सुना और बहुत आश्चर्यचकित हुआ।

कुछ समय बाद सिंदबाद ने वहाँ के एक प्रतिष्ठित परिवार की युवती से विवाह कर लिया। वह अपने नए जीवन में संतुष्ट था। उसे सम्मान मिला और वह धीरे-धीरे उस समाज का हिस्सा बन गया। लेकिन शीघ्र ही उसे उस देश की सबसे भयानक परंपरा के बारे में पता चला।

वहाँ का नियम था कि यदि किसी विवाहित व्यक्ति की मृत्यु हो जाए, तो उसके जीवित पति या पत्नी को भी उसके साथ दफना दिया जाता था। यदि पति मरता, तो पत्नी को उसके साथ जीवित कब्र में उतार दिया जाता। और यदि पत्नी मरती, तो पति को भी उसी प्रकार दफना दिया जाता।

जब सिंदबाद ने यह सुना तो वह भयभीत हो गया। उसने लोगों को समझाने का प्रयास किया कि यह परंपरा अत्यंत क्रूर है, लेकिन वहाँ के लोगों का विश्वास था कि यह उनके पूर्वजों की परंपरा है और इसे बदलना असंभव है।

कुछ समय तक सब कुछ ठीक चलता रहा। लेकिन दुर्भाग्य से सिंदबाद की पत्नी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। चिकित्सकों ने उसका उपचार किया, परंतु वह बच नहीं सकी। उसकी मृत्यु हो गई।

पत्नी की मृत्यु के साथ ही सिंदबाद पर भी संकट टूट पड़ा। राज्य के लोग परंपरा के अनुसार उसे भी जीवित दफनाने की तैयारी करने लगे। सिंदबाद ने राजा से प्रार्थना की कि वह विदेशी है और उस पर यह नियम लागू नहीं होना चाहिए, लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

कुछ ही दिनों बाद उसे अपनी मृत पत्नी के शव के साथ एक विशाल पर्वत की गुफा में ले जाया गया। वहाँ एक गहरा गड्ढा था, जो मृतकों की कब्र के रूप में प्रयोग किया जाता था। मृत पत्नी के शरीर के साथ कुछ रोटियाँ और पानी का एक घड़ा रख दिया गया।

फिर सिंदबाद को भी उसी गड्ढे में उतार दिया गया। ऊपर से भारी पत्थर रखकर गुफा का द्वार बंद कर दिया गया। अब वह पूर्ण अंधकार में कैद था।

गुफा के भीतर मृत शरीरों की दुर्गंध फैली हुई थी। चारों ओर केवल हड्डियाँ और कंकाल दिखाई देते थे। सिंदबाद को लगा कि अब उसका अंत निश्चित है। वह रोने लगा और अपने भाग्य को कोसने लगा।

कुछ दिनों तक उसने अपने पास रखी रोटियों और पानी के सहारे जीवन बिताया। समय बीतने के साथ उसकी आशा समाप्त होने लगी। तभी एक दिन उसे ऊपर से पत्थर हटने की आवाज़ सुनाई दी।

किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु हुई थी और परंपरा के अनुसार उसके जीवित जीवनसाथी को भी गुफा में उतारा जा रहा था। जब वह व्यक्ति नीचे पहुँचा, तो सिंदबाद ने आत्मरक्षा के लिए उस पर हमला कर दिया और उसके पास मौजूद भोजन तथा पानी अपने पास रख लिया।

समय-समय पर नए लोग गुफा में उतारे जाते रहे। सिंदबाद उनके भोजन और पानी की सहायता से जीवित रहा। यद्यपि उसे यह सब करना अच्छा नहीं लगता था, लेकिन जीवित रहने के लिए उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं था।

एक दिन उसने गुफा के भीतर किसी जानवर के चलने की आवाज़ सुनी। उसने ध्यान से उस दिशा में जाना शुरू किया। काफी दूर चलने के बाद उसे एक छोटा-सा छेद दिखाई दिया, जहाँ से हल्की रोशनी आ रही थी।

वास्तव में वह एक गुप्त मार्ग था, जिसका उपयोग जंगली जानवर गुफा में आने-जाने के लिए करते थे। बड़ी कठिनाई से सिंदबाद उस रास्ते से बाहर निकलने में सफल हो गया।

जब वह बाहर पहुँचा तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने लंबे समय बाद खुला आकाश देखा। समुद्र की ताज़ी हवा उसके चेहरे से टकराई और उसे लगा मानो उसे नया जीवन मिल गया हो।

गुफा से बाहर निकलने के बाद वह कुछ दिनों तक वहीं रहा। इस दौरान उसने गुफा में पड़े अनेक बहुमूल्य रत्न, मोती और आभूषण इकट्ठा कर लिए, जो मृतकों के साथ दफनाए गए थे।

कुछ समय बाद एक व्यापारिक जहाज़ वहाँ से गुज़रा। सिंदबाद ने संकेत देकर उसे रोका। नाविक उसे जहाज़ पर ले गए और उसकी अद्भुत कहानी सुनकर हैरान रह गए।

सिंदबाद उन रत्नों के साथ वापस अपने नगर पहुँचा। इस यात्रा से वह पहले से भी अधिक धनी बन गया। लोगों ने उसकी जीवित दफन होने और फिर बच निकलने की कहानी सुनकर आश्चर्य व्यक्त किया।

लेकिन जैसा कि हमेशा होता था, कुछ समय बाद उसके मन में फिर समुद्र की पुकार सुनाई देने लगी। उसे लगा कि संसार में अभी भी अनेक रहस्य शेष हैं। इसलिए उसने पाँचवीं समुद्री यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।

उसे यह नहीं मालूम था कि अगली यात्रा में उसका सामना फिर से विशाल रुख पक्षी, क्रोधित समुद्री जीवों और अनेक नई विपत्तियों से होने वाला है।

चौथी समुद्री यात्रा से लौटने के बाद सिंदबाद की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। लोग उसकी कहानियाँ सुनकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। किसी को विश्वास नहीं होता था कि एक व्यक्ति इतने संकटों का सामना करके बार-बार जीवित लौट सकता है। सिंदबाद स्वयं भी कई बार सोचता कि अब उसे समुद्र की यात्राएँ छोड़ देनी चाहिए। लेकिन उसके भीतर का साहसी यात्री उसे चैन से बैठने नहीं देता था।

कुछ समय बाद उसने फिर से व्यापारिक सामान खरीदा और पाँचवीं समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा। इस बार वह एक नए जहाज़ में सवार हुआ, जो विशेष रूप से व्यापार के लिए बनाया गया था। जहाज़ पर अनुभवी नाविक और व्यापारी मौजूद थे। सभी लोग आशा कर रहे थे कि यात्रा सफल होगी।

यात्रा के प्रारंभिक दिन बहुत सुखद रहे। समुद्र शांत था और हवाएँ अनुकूल दिशा में बह रही थीं। जहाज़ विभिन्न द्वीपों और बंदरगाहों पर रुकता हुआ आगे बढ़ता रहा। सिंदबाद भी अपने व्यापार में व्यस्त था और अच्छा लाभ कमा रहा था।

एक दिन जहाज़ एक ऐसे निर्जन द्वीप के निकट पहुँचा जहाँ किसी मनुष्य के रहने के कोई चिन्ह दिखाई नहीं देते थे। यात्रियों ने वहाँ उतरकर विश्राम करने का निश्चय किया। द्वीप पर घने पेड़ और विशाल चट्टानें थीं। घूमते-घूमते कुछ नाविकों को एक बहुत बड़ा सफेद अंडा दिखाई दिया।

सिंदबाद ने उसे देखते ही पहचान लिया कि यह रुख पक्षी का अंडा है। उसने अपने साथियों को चेतावनी दी कि इस अंडे को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुँचाएँ। उसने उन्हें बताया कि रुख अत्यंत शक्तिशाली पक्षी है और यदि वह क्रोधित हो गया, तो सबके लिए संकट खड़ा हो जाएगा।

लेकिन कुछ लालची और मूर्ख नाविकों ने उसकी बात नहीं मानी। उन्होंने अंडे को तोड़ दिया और उसके भीतर से निकले बच्चे को मारकर उसका मांस खाने लगे। सिंदबाद यह देखकर बहुत चिंतित हो गया। उसे पता था कि इस कार्य का परिणाम भयानक होगा।

अगली सुबह आकाश में दो विशाल छायाएँ दिखाई दीं। वे रुख पक्षी थे—एक नर और एक मादा। जब उन्होंने अपने टूटे हुए अंडे और मृत बच्चे को देखा, तो वे क्रोध से पागल हो उठे।

दोनों पक्षी ऊँचे पहाड़ों की ओर उड़ गए और वहाँ से अपनी चोंच तथा पंजों में विशाल चट्टानें उठाकर वापस आए। जहाज़ पर मौजूद लोगों ने यह दृश्य देखकर भय से चीखना शुरू कर दिया।

कुछ ही क्षणों में रुख पक्षियों ने उन विशाल चट्टानों को जहाज़ पर फेंकना शुरू कर दिया। पहली चट्टान जहाज़ के पास समुद्र में गिरी और उससे इतनी बड़ी लहरें उठीं कि जहाज़ बुरी तरह हिल गया। दूसरी चट्टान सीधे जहाज़ पर गिरी।

एक भयानक धमाके के साथ जहाज़ टूट गया। यात्री और नाविक समुद्र में गिर पड़े। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। कई लोग उसी समय डूब गए।

सिंदबाद किसी तरह एक बड़े लकड़ी के तख्ते को पकड़ने में सफल हो गया। समुद्र की लहरें उसे दूर तक बहाती रहीं। दिनभर और पूरी रात संघर्ष करने के बाद वह एक अन्य द्वीप के किनारे पहुँच गया।

द्वीप सुंदर और उपजाऊ था। वहाँ फलदार वृक्ष और मीठे पानी के झरने थे। सिंदबाद ने कुछ दिन वहीं बिताए और अपनी शक्ति वापस प्राप्त की। लेकिन वह जानता था कि यदि उसे घर लौटना है, तो उसे कोई उपाय खोजना होगा।

एक दिन द्वीप पर घूमते हुए उसे एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई दिया। बूढ़ा बहुत कमजोर प्रतीत होता था और बोल नहीं सकता था। उसने इशारों से सिंदबाद से सहायता माँगी और संकेत किया कि वह उसे अपने कंधों पर बैठाकर नदी के पार पहुँचा दे।

दयालु स्वभाव के कारण सिंदबाद ने उसकी सहायता करने का निश्चय किया। उसने बूढ़े को अपने कंधों पर बैठा लिया। लेकिन नदी पार करने के बाद बूढ़ा नीचे उतरने को तैयार नहीं हुआ।

उसने अपने पैरों को सिंदबाद की गर्दन के चारों ओर कसकर जकड़ लिया। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि सिंदबाद चाहकर भी उसे हटा नहीं सका। अब वह बूढ़ा उसके कंधों पर बैठा रहता और उसे जहाँ चाहता, वहाँ ले जाता।

यदि सिंदबाद रुकने की कोशिश करता, तो बूढ़ा उसकी गर्दन दबाने लगता। इस प्रकार कई दिनों तक सिंदबाद उसका गुलाम बनकर रह गया। वह दिनभर उसे ढोता और रात को भी उससे छुटकारा नहीं पाता।

धीरे-धीरे सिंदबाद की शक्ति क्षीण होने लगी। उसे लगा कि यदि कोई उपाय नहीं निकाला गया, तो वह शीघ्र ही मर जाएगा। एक दिन उसे जंगल में अंगूर के कुछ गुच्छे दिखाई दिए।

उसने अंगूरों का रस निकालकर एक सूखे बर्तन में भर दिया। कुछ दिनों बाद वह रस प्राकृतिक रूप से किण्वित होकर मदिरा जैसा पेय बन गया। सिंदबाद ने थोड़ा-सा पिया तो उसे नई शक्ति का अनुभव हुआ।

बूढ़े ने यह देखा तो उसने भी उस पेय की माँग की। सिंदबाद ने उसे भरपूर मात्रा में पिला दिया। कुछ ही देर में बूढ़ा नशे में धुत्त हो गया और उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

यही अवसर देखकर सिंदबाद ने उसे अपने कंधों से नीचे गिरा दिया और एक भारी पत्थर उठाकर उस पर प्रहार किया। बूढ़ा वहीं मर गया।

इस प्रकार सिंदबाद उस भयानक व्यक्ति से मुक्त हो गया, जिसे बाद में उसने "समुद्र का बूढ़ा आदमी" कहा। यह उसकी यात्राओं के सबसे विचित्र और कष्टदायक अनुभवों में से एक था।

कुछ समय बाद सिंदबाद समुद्र तट पर पहुँचा। वहाँ उसे कुछ व्यापारी मिले जो दुर्लभ मसाले और अन्य वस्तुएँ इकट्ठा कर रहे थे। उन्होंने सिंदबाद का स्वागत किया और उसकी कहानी सुनकर आश्चर्यचकित रह गए।

सिंदबाद उनके साथ कई देशों में गया। उसने व्यापार किया और फिर से अच्छा धन अर्जित किया। अंततः उसे एक जहाज़ मिल गया जो उसके नगर की दिशा में जा रहा था।

लंबी यात्रा के बाद वह सकुशल अपने घर लौट आया। उसके पास फिर से बहुमूल्य वस्तुएँ और पर्याप्त धन था। लोगों ने उसकी नई कहानी सुनकर दाँतों तले उँगली दबा ली।

लेकिन अब तक जो लोग सिंदबाद को जानते थे, वे समझ चुके थे कि वह अधिक समय तक घर पर नहीं टिकेगा। सचमुच कुछ महीनों बाद उसके मन में फिर एक नई यात्रा का विचार आने लगा।

उसे नहीं पता था कि छठी यात्रा में उसका सामना ऐसे भयंकर समुद्री तूफ़ानों, खतरनाक चट्टानों और रहस्यमय नगरों से होगा, जो उसकी सभी पिछली यात्राओं से भी अधिक कठिन साबित होने वाले थे।

 

 

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