बहुत समय पहले की बात है। यूनान देश में एक शक्तिशाली राजा राज्य करता था जिसका नाम युनान था। वह न्यायप्रिय, बुद्धिमान और अपनी प्रजा का हित चाहने वाला शासक माना जाता था। उसके राज्य में सुख-शांति थी, व्यापार फल-फूल रहा था और लोग समृद्ध जीवन जी रहे थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब राजा एक भयंकर रोग से ग्रस्त हो गया। उसके शरीर पर कुष्ठ रोग जैसे चकत्ते उभर आए। उसने अपने राज्य के बड़े-बड़े वैद्यों और हकीमों को बुलाया। सभी ने तरह-तरह की औषधियाँ दीं, उपचार किए, जड़ी-बूटियाँ खिलाईं, परंतु किसी से भी उसे लाभ नहीं हुआ। रोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। राजा निराश रहने लगा। उसे लगने लगा कि अब वह कभी स्वस्थ नहीं हो सकेगा।
उसी समय एक दूर देश से एक प्रसिद्ध हकीम यूनान पहुँचा। उसका नाम दूबाँ था। वह
केवल चिकित्सा का ही ज्ञाता नहीं था, बल्कि दर्शन, रसायन, वनस्पति
विज्ञान और अनेक भाषाओं का भी विद्वान था। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। जब
उसे राजा के रोग और उसकी पीड़ा के बारे में पता चला, तब उसने निश्चय किया कि वह
राजा को स्वस्थ करेगा। वह राजमहल पहुँचा और दरबारियों के माध्यम से राजा से मिलने
की अनुमति प्राप्त की। जब वह राजा के सामने पहुँचा, तो उसने आदरपूर्वक प्रणाम
किया और कहा, “महाराज, मैंने आपके रोग के विषय में सुना है। यदि आप अनुमति दें तो
मैं आपका उपचार कर सकता हूँ।”
राजा ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। उसने कहा, “अनेक प्रसिद्ध चिकित्सक
मेरा उपचार कर चुके हैं, परंतु कोई भी सफल नहीं हुआ। तुम ऐसा क्या करोगे जो वे नहीं
कर सके?” हकीम दूबाँ मुस्कराया और बोला, “महाराज, मैं आपको ऐसी औषधि दूँगा जिसे न आपको खाना
पड़ेगा और न शरीर पर लगाना पड़ेगा, फिर भी आप स्वस्थ हो जाएँगे।” राजा को उसकी बात विचित्र लगी,
लेकिन उसके
आत्मविश्वास ने राजा को प्रभावित किया। उसने उसे अवसर देने का निर्णय लिया।
अगले दिन हकीम दूबाँ एक विशेष प्रकार का चौगान का डंडा और गेंद लेकर आया। उसने
उन दोनों में दुर्लभ औषधियाँ भरी हुई थीं। उसने राजा से कहा कि वह मैदान में जाकर
चौगान खेले। खेलते समय उसके शरीर से पसीना निकलेगा और डंडे तथा गेंद में भरी
औषधियाँ त्वचा के माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर जाएँगी। राजा ने वैसा ही
किया। वह कई घंटों तक खेलता रहा। उसके शरीर से खूब पसीना निकला। फिर वह स्नान करके
विश्राम करने चला गया।
अगली सुबह जब राजा जागा तो वह अपने शरीर में अद्भुत परिवर्तन देखकर चकित रह
गया। उसके रोग के सभी चिह्न लगभग समाप्त हो चुके थे। कुछ ही दिनों में वह पूर्णतः
स्वस्थ हो गया। राजा की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने हकीम दूबाँ को दरबार में
बुलाया, उसे सम्मानित किया, बहुमूल्य वस्त्र, सोना-चाँदी और धन प्रदान किया। उसने कहा,
“तुमने मुझे नया
जीवन दिया है। मैं जीवन भर तुम्हारा ऋणी रहूँगा।”
इसके बाद राजा हकीम दूबाँ का बहुत सम्मान करने लगा। वह उसे अपने निकट बैठाता,
उसकी सलाह लेता
और उसे भरपूर पुरस्कार देता। धीरे-धीरे हकीम का प्रभाव दरबार में बढ़ने लगा। राजा
का विश्वास उस पर इतना अधिक हो गया कि वह कई महत्वपूर्ण विषयों पर भी उसकी राय
लेने लगा। यह बात राज्य के मुख्य मंत्री को अच्छी नहीं लगी। मंत्री स्वभाव से
ईर्ष्यालु और षड्यंत्रकारी था। उसे भय हुआ कि यदि हकीम का प्रभाव इसी प्रकार बढ़ता
रहा तो उसका अपना महत्व कम हो जाएगा।
मंत्री ने राजा के मन में हकीम के प्रति संदेह उत्पन्न करने का निश्चय किया।
एक दिन अवसर पाकर उसने राजा से कहा, “महाराज, किसी अजनबी पर इतना विश्वास करना उचित नहीं है।
कौन जानता है कि वह वास्तव में कौन है? हो सकता है कि वह किसी शत्रु राज्य का जासूस हो।
संभव है कि उसने आपको स्वस्थ केवल इसलिए किया हो ताकि आपका विश्वास जीत सके और बाद
में आपको हानि पहुँचा सके।”
राजा ने मंत्री की बात सुनकर कहा, “तुम गलत सोच रहे हो। उस व्यक्ति ने मेरा जीवन
बचाया है। वह मेरा हितैषी है।” लेकिन मंत्री ने हार नहीं मानी। वह बार-बार राजा के
सामने ऐसी बातें दोहराता रहा। उसने कहा, “महाराज, बुद्धिमान शासक वही होता है जो संभावित खतरे को
पहले ही पहचान ले। यदि वह वास्तव में आपका शत्रु हुआ तो बाद में पछताने का अवसर भी
नहीं मिलेगा।”
धीरे-धीरे मंत्री की बातें राजा के मन में घर करने लगीं। संदेह का बीज एक बार
मन में पड़ जाए तो वह बढ़ता ही जाता है। राजा के मन में भी शंका उत्पन्न हो गई। वह
सोचने लगा कि कहीं मंत्री की बात सच तो नहीं। अंततः उसने बिना किसी प्रमाण के हकीम
दूबाँ को मृत्युदंड देने का निश्चय कर लिया।
जब यह आदेश हकीम तक पहुँचा तो वह स्तब्ध रह गया। उसने राजा से मिलने की
प्रार्थना की। उसे दरबार में बुलाया गया। उसने विनम्रता से कहा, “महाराज,
मेरा अपराध
क्या है? मैंने आपका क्या नुकसान किया है?” राजा ने उत्तर दिया, “मुझे पता चला है कि तुम
मेरे शत्रुओं के लिए काम करते हो और अवसर मिलने पर मेरी हत्या करना चाहते हो।
इसलिए मैंने तुम्हें मृत्यु-दंड देने का निर्णय लिया है।”
हकीम ने आश्चर्य और दुख से कहा, “महाराज, यह बिल्कुल झूठ है। मैंने तो आपकी सेवा की है।
मैंने आपको रोगमुक्त किया, आपका भला किया। यदि आप मुझे मारेंगे तो यह न्याय नहीं
होगा।” उसने कई बार अपनी निर्दोषता सिद्ध करने का प्रयास किया, परंतु राजा का
मन बदलने को तैयार नहीं था। मंत्री पास खड़ा मुस्करा रहा था। उसे अपनी योजना सफल
होती दिखाई दे रही थी।
हकीम ने समझ लिया कि अब उसकी जान बचना कठिन है। तब उसने कहा, “महाराज,
यदि आप मुझे
मारने का निश्चय कर चुके हैं तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ। लेकिन मेरी एक अंतिम
इच्छा है।” राजा ने पूछा, “क्या इच्छा है?” हकीम बोला, “मेरे पास एक अत्यंत दुर्लभ
पुस्तक है। मेरी मृत्यु के बाद वह आपको भेंट करना चाहता हूँ। उसमें अद्भुत ज्ञान
है। यदि आप उसका उपयोग करेंगे तो आपको बहुत लाभ होगा। मेरी मृत्यु के बाद मेरा सिर
काटकर एक थाल में रख दिया जाए और पुस्तक आपके पास रखी जाए। जब मेरा सिर अलग हो जाए,
तब आप पुस्तक
का छठा पृष्ठ खोलकर तीसरी पंक्ति पढ़ेंगे। उस समय मेरा सिर आपके प्रश्नों का उत्तर
भी देगा।”
राजा को यह बात अत्यंत विचित्र लगी। उसकी जिज्ञासा बढ़ गई। उसने हकीम की इच्छा
स्वीकार कर ली। अगले दिन फाँसी का दिन निश्चित किया गया। हकीम अपने घर गया। उसने
एक मोटी पुस्तक तैयार की। उसके पृष्ठों पर उसने एक घातक विष लगा दिया। फिर वह
पुस्तक लेकर दरबार में पहुँचा।
दरबार में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। सभी को यह देखकर दुख हो रहा था कि
जिसने राजा का जीवन बचाया, उसी को आज मृत्यु दी जा रही है। हकीम शांत भाव से खड़ा था।
उसने पुस्तक राजा को सौंप दी और कहा, “महाराज, इसे संभालकर रखिए। मेरी मृत्यु के बाद इसका
रहस्य प्रकट होगा।”
फिर जल्लाद को आदेश दिया गया। उसने एक ही वार में हकीम का सिर धड़ से अलग कर
दिया। उपस्थित लोग स्तब्ध रह गए। सिर को एक थाल में रख दिया गया। तभी आश्चर्यजनक
रूप से वह सिर बोल उठा। उसने कहा, “महाराज, अब पुस्तक का छठा पृष्ठ खोलिए।”
राजा अत्यंत उत्सुक था। उसने पुस्तक खोली। लेकिन पृष्ठ आपस में चिपके हुए थे।
उन्हें अलग करने के लिए उसने अपनी उँगली पर थूक लगाया और पन्ने पलटने लगा। एक
पृष्ठ, फिर दूसरा, फिर तीसरा। इसी प्रकार वह आगे बढ़ता गया। हर बार वह उँगली
को जीभ से गीला करता और पन्ना पलटता। उसे छठे पृष्ठ पर कुछ भी लिखा नहीं मिला।
उसने सिर से कहा, “यहाँ तो कुछ नहीं लिखा है।”
सिर ने उत्तर दिया, “महाराज, आगे के पृष्ठ देखिए।” राजा फिर पन्ने पलटने लगा। इसी दौरान
पुस्तक पर लगा विष उसकी उँगलियों से उसके शरीर में प्रवेश करने लगा। कुछ ही समय
में विष ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। राजा को चक्कर आने लगे। उसका चेहरा
पीला पड़ गया। शरीर काँपने लगा।
तब हकीम का कटा हुआ सिर बोला, “हे राजा! यही उस अन्याय का फल है जो तुमने मेरे साथ किया।
मैंने तुम्हारा भला किया, लेकिन तुमने मेरी बात सुने बिना मुझे मृत्यु दे दी। तुमने
एक निर्दोष व्यक्ति पर विश्वास नहीं किया और एक ईर्ष्यालु मंत्री की बातों में आ
गए। अब तुम्हें अपने कर्मों का परिणाम भुगतना होगा।”
राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विष तेजी से
पूरे शरीर में फैल चुका था। वह सिंहासन से गिर पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसकी
मृत्यु हो गई। दरबार में हाहाकार मच गया। सभी लोग भय और आश्चर्य से भर गए। मंत्री,
जिसने यह
षड्यंत्र रचा था, वह भी काँप उठा। उसे समझ आ गया कि उसकी ईर्ष्या और छल ने न
केवल एक निर्दोष व्यक्ति की जान ली, बल्कि स्वयं राजा का भी विनाश कर दिया।
इस प्रकार हकीम दूबाँ और राजा युनान की कथा समाप्त होती है। यह कहानी केवल
मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि गहरी शिक्षा भी देती है। यह बताती है कि ईर्ष्या
मनुष्य को अंधा बना देती है। मंत्री की ईर्ष्या ने उसे सत्य से दूर कर दिया। यह
कहानी यह भी सिखाती है कि किसी के बारे में बिना प्रमाण के निर्णय नहीं लेना
चाहिए। राजा ने बिना जाँच-पड़ताल किए अपने सबसे बड़े उपकारी को शत्रु मान लिया और
परिणामस्वरूप अपना जीवन खो दिया। इसके अतिरिक्त यह कथा कृतज्ञता के महत्व को भी
दर्शाती है। जो व्यक्ति हमारे लिए भलाई करता है, उसके प्रति सम्मान और
विश्वास रखना चाहिए।
हकीम दूबाँ बुद्धिमत्ता, विद्या और आत्मसम्मान का प्रतीक था। उसने राजा का उपचार
किया और बदले में विश्वासघात पाया। दूसरी ओर राजा युनान यह दर्शाता है कि यदि शासक
या कोई भी व्यक्ति गलत सलाहकारों के प्रभाव में आ जाए, तो वह स्वयं अपने विनाश का
कारण बन सकता है। मंत्री का चरित्र यह शिक्षा देता है कि स्वार्थ और ईर्ष्या अंततः
सबका नुकसान करती है। इस कहानी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों
पहले था—सत्य को परखे बिना निर्णय नहीं लेना चाहिए, उपकार का बदला अपकार से
नहीं देना चाहिए, और बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो दूसरों की बातों में आने के
बजाय स्वयं विचार करके न्यायपूर्ण निर्णय ले। यही कारण है कि हकीम दूबाँ की कहानी
सदियों से सुनाई जाती रही है और आज भी लोगों को विवेक, न्याय और कृतज्ञता का महत्व
सिखाती है।
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