एक दिन की बात है। अकबर अपने भव्य दरबार में बैठे हुए थे। दरबार में सभी मंत्री, सेनापति, विद्वान, कवि और दरबारी अपनी-अपनी जगह पर उपस्थित थे। वातावरण अत्यंत शांत और गंभीर था। तभी बादशाह अकबर के मन में एक अनोखा विचार आया। उन्होंने चारों ओर बैठे दरबारियों को देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "आज मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है। संसार में सबसे बड़ा मूर्ख कौन होता है?" बादशाह का प्रश्न सुनते ही पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। कोई भी तुरंत उत्तर देने का साहस नहीं कर पाया। कुछ दरबारी सोचने लगे कि शायद जो पढ़ा-लिखा न हो वही सबसे बड़ा मूर्ख होगा, जबकि कुछ का मानना था कि जो बिना सोचे-समझे काम करे, वही मूर्ख कहलाता है। लेकिन किसी का उत्तर बादशाह को संतुष्ट नहीं कर पाया।
कुछ देर बाद बादशाह ने अपनी दृष्टि बीरबल की ओर घुमाई। बीरबल हमेशा अपनी
बुद्धिमत्ता और चतुराई के लिए प्रसिद्ध थे। अकबर ने मुस्कुराकर कहा, "बीरबल, तुम तो हर कठिन
प्रश्न का उत्तर बड़ी सरलता से दे देते हो। बताओ, सबसे बड़ा मूर्ख कौन होता
है?" बीरबल ने शांत भाव से उत्तर दिया, "जहाँपनाह, इस प्रश्न का
उत्तर केवल शब्दों में देना उचित नहीं होगा। यदि आप अनुमति दें, तो मैं कुछ
दिनों में इसका उत्तर प्रमाण सहित प्रस्तुत करूँगा।" अकबर को यह बात पसंद आई।
उन्होंने कहा, "ठीक है, तुम्हें सात दिन का समय दिया जाता है। सातवें दिन तुम हमें
सबसे बड़े मूर्ख से मिलवाओ।"
बीरबल अगले ही दिन साधारण वेश धारण करके नगर की गलियों में निकल पड़े। उनका
उद्देश्य ऐसे व्यक्ति की खोज करना था, जो वास्तव में मूर्खता का सबसे बड़ा उदाहरण बन
सके। वे बाज़ार, चौक, मंदिर, खेत और सराय में घूमते रहे। उन्होंने अनेक लोगों से बातें
कीं। कोई लालच में गलत निर्णय लेता था, कोई बिना कारण झगड़ा करता था, तो कोई छोटी-सी
बात पर अपना बड़ा नुकसान कर लेता था। लेकिन बीरबल को लगता था कि इनमें से कोई भी
सबसे बड़ा मूर्ख नहीं है।
घूमते-घूमते वे नगर से बाहर एक गाँव की ओर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक
आदमी अपने गधे पर भारी लकड़ियों का गट्ठर लादे हुए था। आश्चर्य की बात यह थी कि वह
व्यक्ति स्वयं भी गधे पर बैठा था, लेकिन लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर उठाए हुए था। यह दृश्य
देखकर बीरबल रुक गए। उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा, "भाई, जब लकड़ियाँ गधे पर ही रखी
हैं, तो उन्हें सिर पर उठाकर क्यों बैठे हो?" वह आदमी बड़ी मासूमियत से
बोला, "मेरा गधा बहुत कमजोर है। यदि मैं लकड़ियों का भार उसके ऊपर छोड़ दूँगा,
तो उसे बहुत
तकलीफ होगी। इसलिए मैं लकड़ियों का वजन अपने सिर पर उठाए हुए हूँ, ताकि गधे पर कम
बोझ पड़े।"
बीरबल मुस्कुराए, लेकिन उन्होंने अपनी हँसी रोक ली। उन्होंने समझाया,
"भाई, तुम चाहे लकड़ियाँ सिर पर रखो या गधे की पीठ पर, उनका पूरा भार अंततः गधे पर
ही पड़ रहा है, क्योंकि तुम स्वयं गधे पर बैठे हो।" लेकिन वह व्यक्ति
उनकी बात समझ नहीं पाया। वह बोला, "नहीं साहब, मुझे पूरा विश्वास है कि
इससे मेरे गधे का भार कम हो जाता है।" बीरबल ने सोचा कि यह व्यक्ति अज्ञान के
कारण ऐसा कर रहा है, लेकिन अभी उन्हें इससे भी बड़ा उदाहरण चाहिए था।
वे आगे बढ़ गए। कुछ दूरी पर उन्हें एक और विचित्र दृश्य दिखाई दिया। एक किसान
अपने खेत में बैल जोत रहा था। अचानक उसने हल छोड़ दिया और बैलों के सामने बैठकर
रोने लगा। बीरबल ने पास जाकर पूछा, "भाई, क्या हुआ?" किसान बोला, "मेरे खेत में
फसल नहीं उग रही। मैंने सोचा कि यदि मैं बैलों के सामने बैठकर रोऊँगा, तो उन्हें दया
आ जाएगी और वे अधिक मेहनत करेंगे। तब शायद खेत में अच्छी फसल उग जाएगी।"
बीरबल ने उसे समझाया कि अच्छी फसल के लिए सही समय पर बीज, पानी, खाद और मेहनत
की आवश्यकता होती है, आँसू बहाने से कुछ नहीं होगा। किसान ने उनकी बात सुनी,
लेकिन पूरी तरह
समझ नहीं पाया।
कई दिन बीत गए, लेकिन बीरबल को ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसे वे सबसे
बड़ा मूर्ख कह सकें। सातवें दिन की सुबह वे वापस नगर लौट रहे थे। रास्ते में
उन्होंने देखा कि एक धनी व्यापारी अपने नौकरों के साथ यात्रा कर रहा है। व्यापारी
के पास सोने-चाँदी के अनेक संदूक थे। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
बीरबल ने पूछा, "सेठ जी, आप इतने परेशान क्यों हैं?" व्यापारी बोला,
"मुझे डर है कि कहीं रास्ते में डाकू मेरा धन न लूट लें।"
बीरबल ने कहा, "यदि इतना डर है, तो कुछ सैनिक साथ क्यों नहीं रख लेते?"
व्यापारी ने
उत्तर दिया, "सैनिक रखने में बहुत खर्च आता है। इसलिए मैंने एक उपाय
निकाला है।" यह कहकर उसने एक संदूक खोला और उसमें से एक छोटी थैली निकाली।
उसने वह थैली अपने सिर पर रख ली और बोला, "अब मेरा सबसे कीमती धन मेरे
सिर पर है। यदि डाकू आएँगे, तो वे केवल संदूक ले जाएँगे, यह थैली नहीं ले
पाएँगे।"
बीरबल मुस्कुराए और बोले, "यदि डाकू तुम्हें पकड़ लेंगे, तो क्या
तुम्हारे सिर की थैली नहीं ले जाएँगे?" व्यापारी कुछ देर सोचता रहा,
फिर बोला,
"अरे, मैंने तो इस बारे में सोचा ही नहीं।" बीरबल समझ गए कि लोग कई बार बिना
सोचे-समझे निर्णय ले लेते हैं और स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझते हैं।
दरबार का दिन आ गया। सभी दरबारी उत्सुक थे कि आज बीरबल क्या उत्तर देंगे।
बादशाह अकबर ने पूछा, "बीरबल, क्या तुम सबसे बड़े मूर्ख को खोज लाए?" बीरबल ने
विनम्रता से कहा, "जी हुज़ूर, लेकिन पहले मैं एक छोटी-सी कथा सुनाना चाहता हूँ।"
उन्होंने दरबारियों को उन सभी लोगों की घटनाएँ सुनाईं, जिनसे वे यात्रा के दौरान
मिले थे। सभी दरबारी हँसने लगे। फिर अकबर ने कहा, "इनमें से सबसे बड़ा मूर्ख
कौन था?" बीरबल ने उत्तर दिया, "जहाँपनाह, इनमें से कोई
भी सबसे बड़ा मूर्ख नहीं था।"
अकबर आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने पूछा, "फिर सबसे बड़ा मूर्ख कौन है?"
बीरबल ने शांत
स्वर में कहा, "सबसे बड़ा मूर्ख वह व्यक्ति होता है, जो अपनी गलती जानने के बाद
भी उसे सुधारने का प्रयास नहीं करता। जो बिना सोचे-समझे निर्णय लेता है, उससे गलती हो
सकती है। लेकिन जब उसे सही बात समझा दी जाए और फिर भी वह अपनी जिद, अहंकार या
अज्ञान के कारण उसी गलती पर अड़ा रहे, वही सबसे बड़ा मूर्ख कहलाता है।"
दरबार में गहरा सन्नाटा छा गया। सभी लोग बीरबल की बात पर विचार करने लगे।
बादशाह अकबर ने पूछा, "क्या केवल इतना ही?" बीरबल बोले, "नहीं जहाँपनाह।
एक और प्रकार का मूर्ख भी होता है। वह जो दूसरों की सलाह को बिना सुने ही अस्वीकार
कर देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वही सबसे अधिक बुद्धिमान है। ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे
अपनी गलतियों के कारण स्वयं का और दूसरों का भी नुकसान करता है।"
अकबर ने सिर हिलाया और कहा, "तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। मनुष्य से गलती
होना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती स्वीकार करके उसे सुधार लेना ही सच्ची
बुद्धिमानी है।"
इतने में एक दरबारी बोला, "महाराज, यदि कोई व्यक्ति अपनी भूल मान ले, तो क्या वह
मूर्ख नहीं कहलाएगा?" बीरबल मुस्कुराए और बोले, "नहीं। अपनी भूल स्वीकार
करना साहस का काम है। मूर्ख वह नहीं, जो गलती करता है। मूर्ख वह है, जो गलती पर
अड़ा रहता है और उसे सही साबित करने के लिए नए-नए तर्क गढ़ता रहता है।"
यह सुनकर सभी दरबारी प्रभावित हो गए। बादशाह अकबर ने प्रसन्न होकर बीरबल की
बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कहा, "आज तुमने केवल एक प्रश्न का उत्तर नहीं दिया,
बल्कि जीवन का
एक बहुत बड़ा सत्य भी समझाया है।"
उस दिन के बाद दरबार में जब भी कोई निर्णय लिया जाता, तो सभी पहले अच्छी तरह
विचार करते। यदि किसी से गलती हो जाती, तो वह उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं करता।
बीरबल की यह शिक्षा पूरे राज्य में फैल गई कि बुद्धिमानी का अर्थ केवल ज्ञान होना
नहीं है, बल्कि सही बात को स्वीकार करना, अपनी भूल सुधारना और अनुभव से सीखना भी उतना ही
आवश्यक है।
समय बीतता गया, लेकिन यह घटना लोगों की स्मृति में हमेशा बनी रही।
माता-पिता अपने बच्चों को यह कहानी सुनाकर समझाते कि जीवन में कभी भी अहंकार को
अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। शिक्षक अपने विद्यार्थियों से कहते कि प्रश्न
पूछने में संकोच मत करो, क्योंकि जो सीखने के लिए तैयार रहता है, वह कभी मूर्ख
नहीं होता। व्यापारी अपने काम में निर्णय लेने से पहले सोच-विचार करने लगे। किसान
खेती के नए तरीके सीखने लगे। राज्य के अधिकारी भी बिना जाँच-पड़ताल के कोई फैसला
नहीं लेते थे।
इस प्रकार बीरबल ने केवल बादशाह अकबर के प्रश्न का उत्तर ही नहीं दिया,
बल्कि पूरे
राज्य को यह शिक्षा दी कि सच्ची बुद्धिमानी अपनी गलतियों से सीखने में है। जो
व्यक्ति नई बात सीखने के लिए हमेशा तैयार रहता है, सलाह को सम्मान देता है और
समय आने पर अपनी भूल सुधार लेता है, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है। इसके
विपरीत जो व्यक्ति अहंकार, जिद और अज्ञान के कारण अपनी स्पष्ट गलती को भी स्वीकार नहीं
करता, वही संसार का सबसे बड़ा मूर्ख होता है। तो दोस्तों मनुष्य की सबसे बड़ी
बुद्धिमानी अपनी गलती को स्वीकार करके उसे सुधारने में है। अहंकार और जिद इंसान को
मूर्ख बनाते हैं, जबकि विनम्रता, सीखने की इच्छा और सही सलाह को अपनाना उसे महान
बनाते हैं।
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