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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

सोने का खेत

एक समय की बात है। अकबर का विशाल साम्राज्य दूर-दूर तक अपनी समृद्धि, न्याय और शांति के लिए प्रसिद्ध था। राजधानी के भव्य महल में प्रतिदिन दरबार सजता था, जहाँ देश के कोने-कोने से लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते थे। कोई न्याय की गुहार लगाता, कोई व्यापार से जुड़ी सलाह माँगता, तो कोई खेती और जीवन से संबंधित कठिनाइयों का समाधान चाहता। बादशाह अकबर अपने मंत्रियों की राय अवश्य सुनते थे, लेकिन अंतिम निर्णय लेने से पहले वे हमेशा बीरबल की बुद्धिमानी पर भरोसा करते थे। बीरबल अपनी सूझबूझ, तर्क और सरल समाधान के कारण पूरे राज्य में सम्मानित थे।

एक दिन सुबह-सुबह दरबार की कार्यवाही शुरू ही हुई थी कि एक वृद्ध किसान दरबार में पहुँचा। उसके कपड़े साधारण थे, चेहरा धूप में तपकर साँवला पड़ चुका था और आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी। उसने झुककर बादशाह को प्रणाम किया और बोला, "जहाँपनाह, मैं कई वर्षों से खेती कर रहा हूँ। पहले मेरे खेत में अच्छी फसल होती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मेहनत करने के बाद भी उतनी उपज नहीं मिलती। मैंने नई खाद भी डाली, बैलों से अधिक जुताई भी करवाई, फिर भी लाभ नहीं हुआ। अब मेरी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई है कि परिवार का पालन-पोषण करना कठिन हो रहा है।"

बादशाह अकबर ने किसान की बात ध्यान से सुनी। उन्होंने अपने मंत्रियों की ओर देखा और पूछा, "क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे इस किसान की सहायता की जा सके?" कई मंत्रियों ने अलग-अलग सुझाव दिए। किसी ने कहा कि किसान को धन दे दिया जाए, किसी ने कहा कि उसके कर माफ कर दिए जाएँ। लेकिन बीरबल शांत बैठे रहे।

अकबर ने मुस्कुराकर पूछा, "बीरबल, तुम क्या सोचते हो?" बीरबल ने उत्तर दिया, "जहाँपनाह, धन देना आसान है, लेकिन यदि समस्या का मूल कारण न समझा जाए तो कठिनाई फिर लौट आएगी। यदि अनुमति हो तो मैं स्वयं किसान के गाँव जाकर स्थिति का निरीक्षण करना चाहता हूँ।"

बादशाह ने तुरंत अनुमति दे दी।

अगले दिन बीरबल साधारण वस्त्र पहनकर किसान के साथ उसके गाँव पहुँचे। गाँव बहुत सुंदर था। चारों ओर हरे-भरे पेड़, तालाब और मिट्टी के घर थे। लेकिन किसान का खेत अपेक्षा से कम उपजाऊ दिखाई दे रहा था। बीरबल ने ध्यान से देखा कि खेत में जगह-जगह खरपतवार उगी हुई थी। खेत की मेड़ टूटी हुई थी, जिससे बारिश का पानी बहकर निकल जाता था। सिंचाई की नाली भी जगह-जगह बंद पड़ी थी। खेत की मिट्टी कठोर हो चुकी थी और ऐसा लग रहा था कि लंबे समय से उसकी ठीक प्रकार से देखभाल नहीं की गई थी।

बीरबल ने किसान से पूछा, "तुम प्रतिदिन खेत में कितना समय देते हो?"

किसान ने उत्तर दिया, "पहले तो पूरे दिन काम करता था, लेकिन अब मुझे लगता है कि मेहनत का कोई लाभ नहीं। इसलिए कुछ समय खेत में और बाकी समय चौपाल पर मित्रों के साथ बैठ जाता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद भाग्य ही खराब है।"

बीरबल मुस्कुराए, लेकिन उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा। उन्होंने खेत की मिट्टी हाथ में लेकर देखी, पानी का बहाव जाँचा और आसपास के किसानों से भी बातचीत की। उन्हें समझ आ गया कि समस्या भाग्य की नहीं, बल्कि लापरवाही की थी।

कुछ देर बाद बीरबल ने किसान से कहा, "तुम्हारा खेत बहुत विशेष है।"

किसान आश्चर्य से बोला, "विशेष? इसमें तो कुछ भी अच्छा नहीं उगता।"

बीरबल ने गंभीर स्वर में कहा, "तुम्हें शायद पता नहीं, लेकिन पुराने समय में विद्वानों का मानना था कि इस क्षेत्र की भूमि में सोना छिपा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति पूरे मन से खेत की जुताई करे, हर कोने को साफ करे और पूरी मेहनत से उसकी देखभाल करे, तो उसे सोना मिल सकता है।"

किसान की आँखें चमक उठीं। उसने पूछा, "क्या सचमुच मेरे खेत में सोना है?"

बीरबल ने कहा, "यह बात मैंने प्राचीन लोगों से सुनी है। यदि तुम्हें विश्वास हो, तो पूरे खेत को एक भी इंच छोड़े बिना गहराई से जोतो। खरपतवार हटाओ, मेड़ बनाओ, पानी की व्यवस्था करो और हर हिस्से की देखभाल करो। यदि सोना होगा तो अवश्य मिलेगा।"

किसान ने उसी दिन से जी-जान लगाकर काम शुरू कर दिया। उसने पूरे खेत की कई बार गहरी जुताई की। पत्थर और खरपतवार निकाल दिए। टूटी हुई मेड़ ठीक की। सिंचाई की नालियाँ साफ कीं। समय पर खाद डाली। बीज अच्छी तरह चुने। सुबह सूर्योदय से पहले खेत पहुँच जाता और सूर्यास्त तक मेहनत करता। गाँव के लोग उसकी लगन देखकर आश्चर्य करते थे।

दिन बीतते गए। मौसम बदला। बारिश समय पर हुई। खेत में छोटे-छोटे पौधे निकलने लगे। किसान पहले से कहीं अधिक सावधानी से उनकी देखभाल करता। वह रोज़ पौधों को देखता, कीड़ों से बचाव करता और पानी की सही मात्रा देता। अब उसका अधिकांश समय खेत में ही बीतता था।

कुछ महीनों बाद जब फसल पककर तैयार हुई, तो पूरा खेत सुनहरी बालियों से लहलहा उठा। दूर से देखने पर ऐसा लगता था मानो खेत में सचमुच सोना बिछा हो। गाँव के लोग उस खेत को देखने आने लगे। इस बार किसान की उपज पहले से कई गुना अधिक हुई। उसने फसल बेचकर अच्छा लाभ कमाया। घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई। पुराने कर्ज़ चुक गए और परिवार में खुशियाँ लौट आईं।

फसल कटने के बाद किसान को याद आया कि उसे तो खेत में सोना खोजने के लिए कहा गया था। उसने फिर पूरे खेत को ध्यान से खोदा, लेकिन कहीं भी सोने के सिक्के या खजाना नहीं मिला।

किसान थोड़ा निराश हुआ और अगले ही दिन राजधानी पहुँचकर बीरबल से मिलने गया। उसने कहा, "बीरबल जी, आपने कहा था कि मेरे खेत में सोना है। मैंने पूरा खेत खोद डाला, लेकिन मुझे सोना नहीं मिला।"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "क्या इस वर्ष तुम्हें पहले से अधिक फसल मिली?"

किसान बोला, "जी हाँ, पहले से तीन गुना अधिक।"

"क्या तुम्हारे कर्ज़ उतर गए?"

"जी हाँ।"

"क्या अब तुम्हारे परिवार में सुख और समृद्धि है?"

"जी हाँ।"

तब बीरबल ने कहा, "यही तो तुम्हारे खेत का सोना है। सोना मिट्टी के नीचे दबा हुआ खजाना नहीं था। तुम्हारी मेहनत, लगन और समय पर किया गया परिश्रम ही वह सोना था, जिसने तुम्हारे खेत को समृद्ध बना दिया। यदि मैं तुम्हें सीधे मेहनत करने की सलाह देता, तो शायद तुम उसे गंभीरता से नहीं लेते। लेकिन सोने की आशा ने तुम्हें पूरे मन से काम करने के लिए प्रेरित किया, और उसी मेहनत ने तुम्हें वास्तविक धन दे दिया।"

किसान की आँखों में आँसू आ गए। उसने विनम्रता से कहा, "आज मुझे समझ में आ गया कि भाग्य से अधिक मूल्यवान मेहनत होती है।"

यह बात धीरे-धीरे पूरे गाँव में फैल गई। दूसरे किसान भी अपने खेतों की बेहतर देखभाल करने लगे। उन्होंने समय पर जुताई की, सिंचाई सुधारी और खेती के अच्छे तरीके अपनाए। कुछ ही वर्षों में वह गाँव पूरे राज्य के सबसे समृद्ध गाँवों में गिना जाने लगा।

जब बादशाह अकबर को यह समाचार मिला, तो उन्होंने बीरबल को दरबार में बुलाकर पूछा, "बीरबल, क्या सचमुच उस खेत में सोना था?"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, हर खेत में सोना होता है, लेकिन वह मेहनत के रूप में छिपा रहता है। जो किसान आलस्य छोड़कर पूरी लगन से काम करता है, वही उस सोने को प्राप्त करता है।"

अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, "तुमने एक किसान ही नहीं, पूरे गाँव का जीवन बदल दिया।"

दरबार में उपस्थित सभी लोग बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे। उस दिन बादशाह ने घोषणा की कि राज्य में मेहनती किसानों को विशेष सम्मान दिया जाएगा और खेती को बेहतर बनाने के लिए नई योजनाएँ शुरू की जाएँगी। किसान ने भी प्रण लिया कि वह जीवन में कभी आलस्य नहीं करेगा और अपने बच्चों को भी यही शिक्षा देगा कि परिश्रम से बढ़कर कोई धन नहीं।

समय के साथ यह कहानी पूरे राज्य में प्रसिद्ध हो गई। माता-पिता अपने बच्चों को यह कथा सुनाकर समझाने लगे कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। शिक्षक विद्यार्थियों को बताते कि ज्ञान तभी फल देता है जब उसके साथ नियमित अभ्यास और मेहनत जुड़ी हो। व्यापारी अपने व्यवसाय में ईमानदारी और परिश्रम का महत्व समझने लगे। हर व्यक्ति यह मानने लगा कि यदि मन लगाकर काम किया जाए, तो साधारण अवसर भी सोने के समान मूल्यवान बन सकते हैं।

कई वर्षों बाद भी जब लोग उस गाँव से गुजरते, तो सुनहरी फसलों को देखकर कहते, "यही वह खेत है जहाँ सोना मिला था।" तब गाँव वाले मुस्कुराकर कहते, "हाँ, लेकिन वह सोना मिट्टी के नीचे नहीं, किसान की मेहनत में छिपा था।" तो दोस्तों

परिश्रम, अनुशासन और लगन ही सबसे बड़ा धन हैं। जो व्यक्ति मेहनत से नहीं घबराता, उसके लिए हर खेत, हर अवसर और हर दिन सोने के समान मूल्यवान बन सकता है।

 

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