एक समय की बात है। मुगल सम्राट अकबर का दरबार अपनी न्यायप्रियता, बुद्धिमानी और निष्पक्ष फैसलों के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध था। दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएँ लेकर दरबार में आते और विश्वास करते कि उन्हें अवश्य न्याय मिलेगा। इस न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति थे राजा अकबर के प्रिय मंत्री बीरबल, जिनकी बुद्धिमानी और चतुराई की मिसाल पूरे देश में दी जाती थी। बीरबल कठिन से कठिन मामलों का ऐसा समाधान निकालते कि न केवल दोषी स्वयं अपना अपराध स्वीकार कर लेता, बल्कि उपस्थित सभी लोग उनकी बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगते। एक दिन भी ऐसा ही एक अनोखा मामला दरबार में पहुँचा, जिसने सभी दरबारियों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
दिल्ली नगर में माधव नाम का एक ईमानदार व्यापारी रहता था। वह अपने परिश्रम और
सत्यनिष्ठा के कारण पूरे नगर में सम्मानित था। उसका एक पड़ोसी था, जिसका नाम
रघुनाथ था। देखने में वह बहुत विनम्र और मीठी बातें करने वाला व्यक्ति था, लेकिन भीतर से
अत्यंत लालची और बेईमान था। माधव और रघुनाथ वर्षों से पड़ोसी थे। माधव ने कभी यह
नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति को वह अपना मित्र समझता है, वही एक दिन उसके विश्वास को
तोड़ देगा।
एक दिन माधव को व्यापार के सिलसिले में दूसरे नगर जाना पड़ा। यात्रा लंबी थी
और रास्ता असुरक्षित माना जाता था। उसके पास सौ सोने की अशर्फियाँ थीं, जिन्हें वह
अपने साथ लेकर नहीं जाना चाहता था। उसने सोचा कि इन्हें किसी भरोसेमंद व्यक्ति के
पास सुरक्षित रख दिया जाए। काफी सोचने के बाद उसने अपने पड़ोसी रघुनाथ पर विश्वास
किया। वह उसके घर पहुँचा और बोला, "मित्र, मुझे कुछ दिनों के लिए दूसरे नगर जाना पड़ रहा
है। मेरे पास सौ सोने की अशर्फियाँ हैं। कृपया इन्हें अपने पास सुरक्षित रख लो।
लौटकर मैं इन्हें ले जाऊँगा।"
रघुनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा, "मित्र, तुम निश्चिंत होकर जाओ। तुम्हारी अमानत मेरी
अपनी अमानत है। जब चाहो, आकर ले जाना।" यह सुनकर माधव को बहुत संतोष हुआ। उसने
अशर्फियों की थैली रघुनाथ को सौंप दी। उस समय दोनों गाँव के बाहर खड़े एक बड़े
बरगद के पेड़ के नीचे थे। बातचीत वहीं हुई थी। उस समय वहाँ कोई तीसरा व्यक्ति
मौजूद नहीं था।
माधव निश्चिंत होकर अपनी यात्रा पर चला गया। कई सप्ताह बाद जब वह वापस लौटा,
तो सबसे पहले
रघुनाथ के घर पहुँचा और विनम्रता से अपनी अमानत वापस माँगी। लेकिन रघुनाथ का
व्यवहार पूरी तरह बदल चुका था। उसने आश्चर्य का अभिनय करते हुए कहा, "कौन-सी
अशर्फियाँ? तुमने मुझे कभी कोई धन नहीं दिया। शायद तुम्हें भूल हो रही है।"
माधव यह सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने बार-बार समझाया कि उसने स्वयं अपने हाथों
से सौ अशर्फियाँ उसे दी थीं। लेकिन रघुनाथ अपनी बात पर अड़ा रहा। उसने साफ इनकार
कर दिया। अब माधव के सामने बड़ी समस्या थी। कोई लिखित प्रमाण नहीं था और न ही कोई
गवाह। अंततः न्याय की आशा में वह सम्राट अकबर के दरबार पहुँचा।
दरबार में अकबर ने पूरी बात ध्यान से सुनी। फिर रघुनाथ को भी बुलाया गया। उसने
बड़े आत्मविश्वास से कहा, "जहाँपनाह, मैंने इस व्यक्ति से कभी कोई धन नहीं लिया। यह मुझ पर झूठा
आरोप लगा रहा है। यदि इसके पास कोई गवाह है, तो उसे प्रस्तुत करे।"
दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी जानते थे कि बिना गवाह या प्रमाण के निर्णय
देना कठिन होगा। अकबर कुछ देर तक सोचते रहे, फिर उन्होंने बीरबल की ओर
देखा। बीरबल मुस्कुराए और बोले, "महाराज, यदि अनुमति हो तो मैं इस मामले का समाधान कर
सकता हूँ।"
अकबर ने तुरंत अनुमति दे दी। बीरबल ने माधव से पूछा, "जब तुमने
अशर्फियाँ रघुनाथ को दी थीं, तब वहाँ कोई गवाह था?" माधव ने दुखी स्वर में
उत्तर दिया, "नहीं मंत्री जी, वहाँ कोई मनुष्य नहीं था। केवल गाँव के बाहर
खड़ा वह पुराना बरगद का पेड़ था।"
बीरबल ने गंभीरता से कहा, "यदि ऐसा है, तो उसी पेड़ को गवाह बनाकर
बुलाओ। जाओ और उससे कहो कि राजा अकबर ने उसे दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया
है।"
दरबार में बैठे लोग यह सुनकर हैरान रह गए। कुछ लोग मन ही मन मुस्कुरा भी दिए।
उन्हें लगा कि पेड़ भला कैसे दरबार में आ सकता है। लेकिन माधव को बीरबल पर पूरा
विश्वास था। उसने सिर झुकाया और पेड़ को बुलाने के लिए चल पड़ा।
माधव के जाते ही बीरबल सामान्य विषयों पर दरबार में चर्चा करने लगे। कुछ समय
बीता। फिर अचानक उन्होंने रघुनाथ की ओर देखते हुए सहज भाव से कहा, "क्या तुम्हें
लगता है कि वह व्यक्ति अब तक पेड़ तक पहुँच गया होगा?"
रघुनाथ बिना सोचे-समझे तुरंत बोल पड़ा, "नहीं मंत्री जी, अभी कहाँ
पहुँचा होगा! वह पेड़ तो यहाँ से बहुत दूर है। उसे वहाँ पहुँचने में अभी काफी समय
लगेगा।"
जैसे ही रघुनाथ के मुँह से यह बात निकली, बीरबल के चेहरे पर हल्की
मुस्कान आ गई। उन्होंने तुरंत कहा, "वाह! तुम तो कहते थे कि तुम कभी उस स्थान पर गए
ही नहीं और न ही तुम्हें पता है कि अशर्फियाँ कहाँ दी गई थीं। फिर तुम्हें यह कैसे
मालूम कि पेड़ यहाँ से कितनी दूर है?"
रघुनाथ के चेहरे का रंग उड़ गया। वह समझ गया कि उससे बड़ी भूल हो गई है। उसने
घबराकर इधर-उधर देखना शुरू किया, लेकिन अब बचने का कोई रास्ता नहीं था। दरबार में उपस्थित
सभी लोग उसकी ओर देखने लगे। उसकी चुप्पी ही उसके अपराध का प्रमाण बन चुकी थी।
इतने में माधव भी वापस आ गया। उसने कहा, "मंत्री जी, मैंने आपके
आदेश के अनुसार पेड़ को बुलाया, लेकिन वह तो अपनी जगह से हिला ही नहीं।"
बीरबल मुस्कुराए और बोले, "उसकी आवश्यकता भी नहीं थी। पेड़ ने पहले ही अपनी
गवाही दे दी है।"
माधव आश्चर्यचकित होकर बोला, "मंत्री जी, वह कैसे?"
बीरबल ने उत्तर दिया, "जब तुम पेड़ को बुलाने गए थे, तभी रघुनाथ ने अनजाने में
यह स्वीकार कर लिया कि उसे उस पेड़ का स्थान अच्छी तरह मालूम है। यदि वह वहाँ कभी
गया ही नहीं होता, तो उसे कैसे पता चलता कि पेड़ कितनी दूर है? उसकी यही बात
सिद्ध करती है कि वह उस समय तुम्हारे साथ वहाँ मौजूद था और उसी स्थान पर तुमने उसे
अशर्फियाँ सौंपी थीं।"
अब रघुनाथ के पास कोई उत्तर नहीं था। उसने हाथ जोड़ लिए और रोते हुए अपना
अपराध स्वीकार कर लिया। उसने कहा, "मुझे क्षमा कर दीजिए। लालच ने मेरी बुद्धि छीन
ली थी। मैंने सचमुच माधव की सौ अशर्फियाँ अपने पास रख ली थीं। मैं अभी उसके सारे
पैसे लौटा देता हूँ।"
सम्राट अकबर ने कठोर स्वर में कहा, "विश्वास तोड़ने वाला
व्यक्ति समाज के लिए सबसे बड़ा अपराधी होता है। केवल धन चुराना ही अपराध नहीं है,
बल्कि किसी के
विश्वास को तोड़ना उससे भी बड़ा अपराध है।"
अकबर ने आदेश दिया कि रघुनाथ तुरंत सौ अशर्फियाँ माधव को लौटाए। साथ ही,
उसके अपराध के
लिए उस पर अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया गया, ताकि भविष्य में वह फिर कभी
किसी के साथ धोखा करने का साहस न करे। सैनिकों ने तुरंत आदेश का पालन कराया। माधव
को उसकी पूरी अमानत वापस मिल गई।
माधव ने प्रसन्न होकर सम्राट अकबर और बीरबल का धन्यवाद किया। उसने कहा,
"यदि इस राज्य में ऐसा न्याय न होता, तो मैं जीवन भर अपनी मेहनत की कमाई से वंचित रह
जाता। आज मुझे केवल मेरा धन ही नहीं मिला, बल्कि न्याय पर मेरा विश्वास भी और अधिक मजबूत
हो गया है।"
दरबार में उपस्थित सभी लोग बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे। सभी समझ
गए कि सच्चाई को अधिक समय तक छिपाया नहीं जा सकता। अपराधी चाहे कितना भी चालाक
क्यों न हो, एक न एक दिन अपनी ही बातों में फँस जाता है। बीरबल ने बिना किसी कठोर पूछताछ,
बिना किसी गवाह
और बिना किसी लिखित प्रमाण के केवल अपनी सूझबूझ से सत्य को सामने ला दिया। उनकी
यही विशेषता उन्हें सबसे अलग बनाती थी।
उस दिन के बाद पूरे नगर में "पेड़ की गवाही" की चर्चा होने लगी। लोग
अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते और बताते कि ईमानदारी सबसे बड़ा धन है। विश्वास की
रक्षा करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है, क्योंकि एक बार टूटा हुआ विश्वास फिर आसानी से
नहीं जुड़ता। साथ ही, यह भी सीख दी जाती कि लालच मनुष्य को अंततः अपमान और दंड ही
दिलाता है, जबकि सत्य और ईमानदारी अंत में अवश्य जीतते हैं।
तो दोस्तों
इस कहानी से
हमें शिक्षा मिलती है कि सत्य की हमेशा विजय होती है। लालच मनुष्य से गलत कार्य
करवाता है, लेकिन बुद्धिमानी और न्याय के सामने झूठ अधिक समय तक टिक नहीं सकता। हमें सदैव
ईमानदार रहना चाहिए, दूसरों के विश्वास की रक्षा करनी चाहिए और किसी भी
परिस्थिति में छल-कपट का सहारा नहीं लेना चाहिए।
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