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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

सबसे मीठी वस्तु

मुगल सम्राट अकबर अपने न्यायप्रिय स्वभाव, दूरदर्शिता और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध थे। उनके विशाल साम्राज्य में दूर-दूर से विद्वान, कलाकार, कवि और बुद्धिमान लोग आया करते थे। अकबर के दरबार में नौ रत्नों का विशेष स्थान था, जिनमें बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, हाजिरजवाबी और सूझ-बूझ के कारण सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। बीरबल केवल कठिन पहेलियों का उत्तर देने में ही निपुण नहीं थे, बल्कि वे मनुष्य के स्वभाव और जीवन के गहरे सत्य को भी सरल उदाहरणों से समझा देते थे। यही कारण था कि अकबर उन्हें बहुत सम्मान देते थे। हालांकि दरबार के कुछ मंत्री और दरबारी बीरबल की लोकप्रियता से ईर्ष्या करते थे और हमेशा अवसर की तलाश में रहते थे कि किसी प्रकार उन्हें गलत साबित किया जा सके।

एक दिन अकबर का दरबार सजा हुआ था। चारों ओर रंग-बिरंगे कालीन बिछे थे, सुगंधित धूप जल रही थी और दरबार में राज्य के महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा चल रही थी। चर्चा समाप्त होने के बाद अकबर का मन कुछ अलग विषय पर विचार करने लगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए सभी दरबारियों की ओर देखा और कहा, "आज मैं तुम सबसे एक सरल प्रश्न पूछना चाहता हूँ, लेकिन उसका उत्तर सोच-समझकर देना। बताओ, इस संसार की सबसे मीठी वस्तु कौन-सी है?" प्रश्न सुनते ही पूरा दरबार शांत हो गया। सभी दरबारी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। कुछ देर बाद एक मंत्री ने आत्मविश्वास से कहा, "जहाँपनाह, संसार की सबसे मीठी वस्तु शहद है। उसकी मिठास का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।" दूसरे दरबारी ने कहा, "महाराज, मेरे विचार से गन्ने का रस सबसे मीठा होता है।" तीसरे ने कहा, "चीनी सबसे मीठी होती है, क्योंकि उससे हर मिठाई बनती है।" किसी ने गुड़ का नाम लिया तो किसी ने पके हुए आम और रसीले फलों का।

अकबर सभी उत्तर ध्यान से सुनते रहे, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष नहीं था। उन्होंने अंत में बीरबल की ओर देखा और पूछा, "बीरबल, तुम्हारे अनुसार संसार की सबसे मीठी वस्तु कौन-सी है?" बीरबल ने बिना किसी हड़बड़ी के शांत स्वर में उत्तर दिया, "जहाँपनाह, संसार की सबसे मीठी वस्तु मीठी वाणी है।" यह सुनते ही कई दरबारी हँस पड़े। उन्हें लगा कि बीरबल ने इस बार बहुत साधारण उत्तर दिया है। एक मंत्री बोला, "बीरबल, वाणी को कोई खा नहीं सकता, उसका स्वाद कैसे मीठा हो सकता है?" दूसरे ने कहा, "शहद और चीनी की मिठास सब जानते हैं, लेकिन शब्दों की मिठास कैसी होती है?" बीरबल मुस्कुराए और बोले, "महाराज, यदि अनुमति दें तो मैं उचित समय पर अपने उत्तर को प्रमाण सहित सिद्ध कर दूँगा।"

अकबर को बीरबल पर विश्वास था। उन्होंने कहा, "ठीक है बीरबल, मैं प्रतीक्षा करूँगा। यदि तुम यह सिद्ध कर दोगे कि मीठी वाणी संसार की सबसे मीठी वस्तु है, तो तुम्हें विशेष पुरस्कार मिलेगा।" दरबार समाप्त हो गया, लेकिन अधिकांश दरबारी यही सोचते रहे कि बीरबल इस बार कैसे सफल होंगे। उन्हें विश्वास था कि शहद, चीनी और मिठाइयों की तुलना किसी भी शब्द से नहीं की जा सकती।

कुछ दिन बीत गए। बीरबल अपने अवसर की प्रतीक्षा करते रहे। एक सुबह अकबर शाही बाग़ में घूम रहे थे। उसी समय एक बूढ़ा माली अपने पौधों की देखभाल कर रहा था। अकबर ने उससे कुछ पौधों के बारे में पूछा। माली ने बड़ी विनम्रता, आदर और मधुर भाषा में उत्तर दिया। उसकी बातें सुनकर अकबर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसकी मेहनत की प्रशंसा की और उसे पुरस्कार देने का आदेश दिया। बीरबल यह सब दूर खड़े होकर देख रहे थे।

अगले दिन बीरबल ने उसी माली को बुलाया और कहा, "आज जब महाराज आएँ, तो उनसे कठोर और अपमानजनक भाषा में बात करना। बदले में तुम्हें अच्छा इनाम मिलेगा।" पहले तो माली डर गया। उसने कहा, "मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? महाराज क्रोधित हो जाएँगे।" बीरबल ने उसे आश्वासन दिया कि अंत में सब ठीक हो जाएगा। बहुत समझाने के बाद माली तैयार हो गया।

अगली सुबह अकबर फिर बाग़ में पहुँचे। उन्होंने मुस्कुराकर माली से पूछा, "कैसे हो? पौधों की देखभाल ठीक चल रही है?" इस बार माली ने रूखे स्वर में उत्तर दिया, "आपको इससे क्या मतलब? अपना काम कीजिए।" यह सुनते ही अकबर का चेहरा बदल गया। उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने फिर एक प्रश्न पूछा, लेकिन माली ने और भी कठोर शब्दों का प्रयोग किया। अब अकबर का धैर्य टूट गया। उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि माली को दरबार में प्रस्तुत किया जाए।

दरबार में पहुँचने पर अकबर ने क्रोधित होकर कहा, "कल तक यही व्यक्ति इतनी विनम्रता से बात कर रहा था और आज इसका व्यवहार इतना बदल गया। इसका कारण क्या है?" तभी बीरबल आगे आए और बोले, "जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं इसका उत्तर दूँ।" अकबर ने सिर हिलाया। बीरबल ने कहा, "महाराज, कल यही माली मीठी वाणी बोल रहा था। उसके शब्दों ने आपका मन प्रसन्न कर दिया था, इसलिए आपने उसे पुरस्कार दिया। आज उसके कटु शब्दों ने आपको क्रोधित कर दिया। उसने आपको न छुआ, न कोई हानि पहुँचाई, केवल शब्द बदले और परिणाम भी बदल गया। यही मीठी वाणी की शक्ति है।"

पूरा दरबार शांत हो गया। दरबारी पहली बार बीरबल की बात पर गंभीरता से विचार करने लगे। बीरबल ने आगे कहा, "शहद केवल जीभ को मीठा लगता है, लेकिन मीठी वाणी सीधे हृदय तक पहुँचती है। शहद की मिठास कुछ क्षण रहती है, जबकि मधुर शब्द वर्षों तक लोगों के मन में बसे रहते हैं।"

बीरबल की बात सुनने के बाद पूरा दरबार कुछ देर तक मौन रहा। जिन दरबारियों ने पहले उनका मज़ाक उड़ाया था, वे भी अब सोच में पड़ गए। अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, "बीरबल, तुम्हारी बात में तर्क तो है, लेकिन क्या केवल एक घटना से यह सिद्ध हो सकता है कि मीठी वाणी संसार की सबसे मीठी वस्तु है?" बीरबल ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, "जहाँपनाह, एक उदाहरण किसी सत्य की झलक देता है, लेकिन यदि आप चाहें तो मैं कई घटनाओं के माध्यम से इसे और स्पष्ट कर सकता हूँ।" अकबर ने प्रसन्न होकर अनुमति दे दी और कहा कि वे पूरे दरबार के सामने अपने विचार विस्तार से रखें।

अगले दिन बीरबल ने दरबार में दो व्यक्तियों को बुलवाया। पहला व्यक्ति नगर का प्रसिद्ध व्यापारी था। वह अपने ईमानदार व्यवहार और मधुर स्वभाव के कारण दूर-दूर तक जाना जाता था। दूसरा व्यापारी भी बहुत धनी था, लेकिन उसका स्वभाव अत्यंत कठोर था। वह ग्राहकों से रूखे शब्दों में बात करता था और छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित हो जाता था। दोनों व्यापारियों को दरबार में देखकर अकबर ने उनसे उनके व्यापार के विषय में पूछा।

पहले व्यापारी ने हाथ जोड़कर बड़े सम्मान से उत्तर दिया, "महाराज, ईश्वर और आपकी कृपा से मेरा व्यापार अच्छा चल रहा है। मैं अपने ग्राहकों से सदैव प्रेम और सम्मान से बात करता हूँ। यदि कोई निर्धन व्यक्ति भी मेरी दुकान पर आता है तो मैं उसे आदर देता हूँ, क्योंकि ग्राहक ही व्यापारी की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं।" उसकी विनम्रता देखकर पूरा दरबार प्रभावित हो गया।

फिर दूसरे व्यापारी से वही प्रश्न पूछा गया। उसने घमंड से उत्तर दिया, "महाराज, व्यापार तो धन से चलता है। मीठी बातें करने से कोई अमीर नहीं बनता। जो वस्तु खरीदना चाहता है, वह चाहे जैसे भी व्यवहार करो, खरीद ही लेगा।" उसके कठोर शब्द सुनकर कई दरबारी असहज हो गए। बीरबल मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं इन दोनों के व्यापार का रहस्य बता सकता हूँ।"

बीरबल ने कहा, "पहले व्यापारी की दुकान पर लोग केवल सामान खरीदने नहीं जाते, बल्कि उसके व्यवहार के कारण बार-बार लौटकर आते हैं। उसके मधुर शब्द लोगों के मन में विश्वास उत्पन्न करते हैं। दूसरी ओर, दूसरा व्यापारी भले ही धनवान हो, लेकिन लोग उसकी दुकान पर केवल मजबूरी में जाते हैं। यदि उन्हें कहीं और वही वस्तु मिल जाए तो वे तुरंत दूसरी दुकान चुन लेते हैं।" अकबर ने दोनों व्यापारियों से पूछा कि क्या यह बात सत्य है। पहले व्यापारी ने मुस्कुराकर सिर झुका दिया और दूसरे व्यापारी ने भी अनिच्छा से स्वीकार कर लिया कि उसके कई पुराने ग्राहक उसके व्यवहार के कारण दूसरी दुकानों पर चले गए थे।

इसके बाद बीरबल ने एक शिक्षक और उसके दो विद्यार्थियों को बुलाया। पहला विद्यार्थी पढ़ाई में सामान्य था, लेकिन विनम्र और मधुर स्वभाव का था। दूसरा विद्यार्थी अत्यंत बुद्धिमान था, परंतु अभिमानी और कटु वाणी बोलता था। शिक्षक ने बताया कि पहला विद्यार्थी सभी का प्रिय है। उसके मित्र अधिक हैं और सभी उसकी सहायता करने के लिए तैयार रहते हैं। दूसरा विद्यार्थी अपनी बुद्धि के बावजूद अकेला रहता है, क्योंकि उसका व्यवहार लोगों को अच्छा नहीं लगता। यह सुनकर अकबर ने कहा, "इसका अर्थ है कि ज्ञान भी तब तक अधूरा है जब तक उसमें विनम्रता और मधुरता न हो।"

बीरबल ने उत्तर दिया, "बिलकुल महाराज। जिस प्रकार फूल की सुंदरता उसकी सुगंध से बढ़ती है, उसी प्रकार मनुष्य का ज्ञान उसकी वाणी से पहचाना जाता है।"

दरबार में उपस्थित एक मंत्री अभी भी संतुष्ट नहीं था। उसने कहा, "यदि मीठी वाणी इतनी प्रभावशाली है, तो क्या उससे युद्ध भी रोका जा सकता है?" बीरबल ने कहा, "कई बार तलवार जहाँ असफल हो जाती है, वहाँ मधुर शब्द सफलता दिला देते हैं।"

यह सुनकर अकबर ने उत्सुकता से पूछा, "क्या तुम्हारे पास इसका भी कोई उदाहरण है?" बीरबल ने उत्तर दिया, "कुछ वर्ष पहले दो पड़ोसी गाँवों के बीच पानी के बँटवारे को लेकर बड़ा विवाद हो गया था। दोनों पक्ष लड़ाई के लिए तैयार थे। यदि सैनिक भेजे जाते, तो कई लोग घायल हो जाते। लेकिन गाँव के एक वृद्ध ने दोनों पक्षों से शांत और सम्मानपूर्वक बात की। उसने किसी को दोष नहीं दिया, बल्कि सबकी समस्या समझी। उसकी मधुर वाणी ने लोगों का क्रोध शांत कर दिया और बिना किसी युद्ध के समझौता हो गया। यदि वह भी कठोर शब्द बोलता, तो निश्चित रूप से रक्तपात होता।"

बीरबल की बात सुनकर दरबारियों ने सहमति में सिर हिलाया। उन्हें समझ आने लगा था कि मधुर वाणी केवल लोगों को प्रसन्न ही नहीं करती, बल्कि कठिन परिस्थितियों को भी सरल बना सकती है।

कुछ दिनों बाद अकबर ने स्वयं एक प्रयोग करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि वे अलग-अलग लोगों से अलग-अलग प्रकार का व्यवहार करें। एक सेवक को निर्देश दिया गया कि वह आने वाले अतिथियों से अत्यंत सम्मानपूर्वक बात करे। दूसरे सेवक को कहा गया कि वह उन्हीं लोगों से कठोर भाषा में बात करे। दिन भर के बाद परिणाम सामने आया। जिन लोगों का स्वागत मधुर शब्दों से किया गया था, वे प्रसन्न होकर महल से लौटे और उन्होंने सम्राट की प्रशंसा की। जिनसे रूखे व्यवहार में बात की गई, वे नाराज़ होकर चले गए, जबकि उन्हें वही भोजन, वही सम्मान और वही सुविधाएँ मिली थीं। अंतर केवल शब्दों का था।

शाम को अकबर ने बीरबल को बुलाया और कहा, "आज मैंने अपनी आँखों से देख लिया कि मनुष्य के शब्द कितने प्रभावशाली होते हैं। वास्तव में व्यवहार ही व्यक्ति की पहचान बनता है।"

बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, "जहाँपनाह, मनुष्य के पास धन हो या न हो, वह मीठे शब्द अवश्य बाँट सकता है। मीठी वाणी बोलने में कोई धन खर्च नहीं होता, लेकिन उससे जो प्रेम, विश्वास और सम्मान मिलता है, वह किसी भी खजाने से अधिक मूल्यवान होता है।"

दरबार के सभी लोग अब बीरबल की बातों से प्रभावित हो चुके थे। केवल वही मंत्री शेष था जिसने प्रारंभ में उनका सबसे अधिक विरोध किया था। उसने कहा, "मैं अभी भी अंतिम प्रमाण देखना चाहता हूँ।" बीरबल ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "अवश्य। कल मैं ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करूँगा, जिसके बाद किसी के मन में कोई संदेह नहीं रहेगा।"

अगले दिन पूरे दरबार में उत्सुकता थी। सभी जानना चाहते थे कि बीरबल इस बार क्या करने वाले हैं। स्वयं अकबर भी समय से पहले दरबार में आकर बैठ गए। बीरबल ने मुस्कुराकर सभी की ओर देखा और कहा, "आज का उदाहरण केवल सुनने का नहीं, अनुभव करने का होगा। इसके बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि संसार की सबसे मीठी वस्तु शहद, चीनी या गुड़ नहीं, बल्कि मनुष्य की मीठी वाणी है।"

इतना कहकर उन्होंने सैनिकों को संकेत दिया कि वे उन लोगों को दरबार में लाएँ जिन्हें उन्होंने पहले से बुलवा रखा था। पूरा दरबार उत्सुकता से द्वार की ओर देखने लगा, क्योंकि सभी जानना चाहते थे कि अब बीरबल कौन-सा अद्भुत प्रमाण प्रस्तुत करेंगे।

अगले दिन शाही दरबार में असाधारण उत्साह था। सभी दरबारी समय से पहले अपने स्थान पर पहुँच गए थे। महल के विशाल सभा-भवन को सुंदर फूलों से सजाया गया था। सम्राट अकबर अपने सिंहासन पर विराजमान थे और उनकी दृष्टि बार-बार बीरबल की ओर जा रही थी। सभी को प्रतीक्षा थी कि आज बीरबल कौन-सा ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करेंगे, जिससे यह सिद्ध हो जाए कि संसार की सबसे मीठी वस्तु वास्तव में मीठी वाणी ही है।

कुछ ही देर में सैनिक दरबार में चार व्यक्तियों को लेकर आए। पहला एक सैनिक था, दूसरा एक किसान, तीसरा एक वृद्ध महिला और चौथा एक छोटा बालक। चारों अलग-अलग परिस्थितियों से आए थे और एक-दूसरे को नहीं जानते थे। बीरबल ने सबसे पहले सैनिक को आगे बुलाया और पूछा, "यदि युद्ध से लौटने के बाद तुम्हारा स्वागत सम्मान और प्रेम से किया जाए, तो तुम्हें कैसा लगेगा?" सैनिक ने उत्तर दिया, "महाराज, वह मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होगा। यदि लोग प्रेम से कहें कि हमने तुम्हारे साहस पर गर्व है, तो सारी थकान दूर हो जाती है।"

फिर बीरबल ने पूछा, "यदि वही लोग तुम्हारा अपमान करें और कठोर शब्द कहें, तो?" सैनिक ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "तब मन टूट जाता है। तलवार का घाव भर सकता है, लेकिन अपमान के शब्द लंबे समय तक याद रहते हैं।"

इसके बाद किसान को बुलाया गया। बीरबल ने उससे पूछा, "तुम्हें सबसे अधिक प्रसन्नता कब होती है?" किसान ने मुस्कुराकर कहा, "जब मेरे परिवार वाले मेरे परिश्रम की सराहना करते हैं और प्रेम से दो मीठे शब्द बोलते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद वही मेरे लिए सबसे बड़ा सुख होता है।"

फिर वृद्ध महिला आगे आई। उसने कहा, "मैं अकेली रहती हूँ। मेरे पास धन नहीं है, लेकिन जब पड़ोस के बच्चे आदर से 'दादी' कहकर हाल-चाल पूछते हैं, तो मुझे लगता है कि मैं संसार की सबसे धनी स्त्री हूँ। उनके मीठे शब्द मेरे लिए किसी भी मिठाई से अधिक आनंद देते हैं।"

अब छोटा बालक सामने आया। बीरबल ने उससे पूछा, "यदि तुम्हारी माँ तुम्हें डाँटने के बजाय प्यार से समझाती है, तो तुम्हें कैसा लगता है?" बालक ने मासूमियत से उत्तर दिया, "मैं उनकी बात तुरंत मान लेता हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि माँ मुझसे प्रेम करती हैं।"

चारों व्यक्तियों की बातें सुनकर पूरा दरबार भावुक हो गया। बीरबल ने सभी की ओर देखते हुए कहा, "जहाँपनाह, इन चारों के उत्तर अलग-अलग हैं, लेकिन इनमें एक बात समान है। सभी ने स्वीकार किया कि प्रेम और सम्मान से बोले गए शब्द मनुष्य के हृदय को प्रसन्न कर देते हैं।"

तभी वही मंत्री, जो प्रारंभ से बीरबल का विरोध कर रहा था, बोला, "लेकिन मिठाई की मिठास तो जीभ पर महसूस होती है। शब्दों की मिठास दिखाई नहीं देती।"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "मंत्री जी, जीभ पर लगी मिठास कुछ ही क्षण रहती है, लेकिन हृदय को छू लेने वाले शब्द जीवनभर याद रहते हैं। यदि कोई आपको सम्मान दे, आपका उत्साह बढ़ाए और कठिन समय में साहस दे, तो क्या आप उसे कभी भूल पाएँगे?" मंत्री कुछ क्षण मौन रहा और फिर धीरे से बोला, "नहीं, ऐसे शब्द कभी नहीं भूलते।"

बीरबल ने आगे कहा, "कल्पना कीजिए कि एक भूखा व्यक्ति आपके द्वार पर आता है। यदि उस समय आपके पास भोजन न हो, लेकिन आप उससे प्रेम और सम्मान से बात करें, तो उसे यह अनुभव होगा कि संसार में अभी भी अच्छे लोग हैं। दूसरी ओर यदि आपके पास स्वादिष्ट भोजन हो, लेकिन आप अपमानजनक शब्दों में बात करें, तो वह भोजन भी उसे कड़वा लगेगा।"

अकबर ने सिर हिलाते हुए कहा, "यह बात बिल्कुल सत्य है।"

बीरबल ने तब एक और छोटा-सा प्रयोग किया। उन्होंने दो सेवकों को बुलाया। पहले सेवक से कहा कि वह दरबार में आए प्रत्येक व्यक्ति का मुस्कुराकर स्वागत करे और सम्मानपूर्वक बैठेने का आग्रह करे। दूसरे सेवक से कहा कि वह उन्हीं लोगों से कठोर भाषा में बात करे। कुछ ही समय में परिणाम सबके सामने था। पहले सेवक के पास जाने वाले लोग प्रसन्न दिखाई दे रहे थे, जबकि दूसरे सेवक के पास जाने वाले लोगों के चेहरे पर असंतोष स्पष्ट दिखाई दे रहा था। आश्चर्य की बात यह थी कि दोनों को समान भोजन और समान सुविधा दी गई थी। अंतर केवल व्यवहार का था।

बीरबल ने कहा, "महाराज, यही कारण है कि कहा जाता है—'मीठे बोल अमृत समान होते हैं।' वे टूटे हुए मन को जोड़ सकते हैं, शत्रु को मित्र बना सकते हैं, क्रोधित व्यक्ति को शांत कर सकते हैं और निराश व्यक्ति में नई आशा जगा सकते हैं।"

दरबार में बैठे राजवैद्य ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, "मैंने अपने जीवन में अनेक रोगियों का उपचार किया है। कई बार दवा के साथ यदि रोगी को आशा और स्नेह के शब्द मिल जाएँ, तो उसका मनोबल बढ़ जाता है और वह जल्दी स्वस्थ होने लगता है।"

इसके बाद सेनापति बोले, "युद्धभूमि में भी सैनिकों का उत्साह बढ़ाने वाले शब्द किसी हथियार से कम नहीं होते। राजा के प्रेरणादायक शब्द सैनिकों में नई शक्ति भर देते हैं।"

महल के मुख्य शिक्षक ने कहा, "विद्यार्थी डाँट से नहीं, बल्कि प्रेम और प्रोत्साहन से अधिक सीखते हैं। एक शिक्षक की मधुर वाणी कई बच्चों का भविष्य बदल सकती है।"

अब तक पूरा दरबार एक मत हो चुका था। वह मंत्री भी उठकर बीरबल के पास आया और बोला, "मैंने आपका विरोध किया था, क्योंकि मुझे लगा था कि संसार की सबसे मीठी वस्तु कोई खाने की चीज़ होगी। लेकिन आज आपने सिद्ध कर दिया कि मीठी वाणी की मिठास सबसे अलग और सबसे स्थायी होती है।"

अकबर अपने सिंहासन से उठे और स्वयं बीरबल के पास आए। उन्होंने कहा, "बीरबल, आज तुमने हमें केवल एक प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने की एक महान शिक्षा दी है। धन, मिठाइयाँ और स्वादिष्ट भोजन कुछ समय के लिए सुख देते हैं, लेकिन मधुर वाणी जीवनभर संबंधों को मधुर बनाए रखती है।"

सम्राट ने उसी समय पूरे राज्य में संदेश भेजने का आदेश दिया कि प्रत्येक अधिकारी जनता से विनम्रता और सम्मान के साथ व्यवहार करे। न्यायालयों में आने वाले लोगों से आदरपूर्वक बात की जाए। विद्यालयों में बच्चों को मधुर भाषा का महत्व सिखाया जाए और परिवारों में प्रेमपूर्ण संवाद को बढ़ावा दिया जाए। उनका विश्वास था कि यदि लोगों की वाणी मधुर होगी, तो समाज में झगड़े कम होंगे और प्रेम तथा सहयोग की भावना बढ़ेगी।

कुछ ही महीनों में पूरे राज्य में इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगा। सरकारी अधिकारी जनता से शिष्टता से बात करने लगे। व्यापारी अपने ग्राहकों का मुस्कुराकर स्वागत करने लगे। शिक्षक विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने लगे। परिवारों में आपसी सम्मान बढ़ा और लोगों ने अनुभव किया कि केवल व्यवहार बदलने से जीवन अधिक सुखद बन सकता है।

एक दिन अकबर ने बीरबल से कहा, "आज मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि संसार की सबसे मीठी वस्तु न शहद है, न चीनी, न गुड़ और न कोई मिठाई। सबसे मीठी वस्तु मनुष्य की मीठी वाणी है, क्योंकि उसकी मिठास सीधे हृदय तक पहुँचती है और वर्षों तक बनी रहती है।"

बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, "जहाँपनाह, मधुर वाणी वह धन है जिसे बाँटने से वह घटता नहीं, बल्कि और बढ़ता है। जो व्यक्ति प्रेम, सम्मान और विनम्रता से बोलता है, वह बिना धन खर्च किए अनगिनत लोगों का हृदय जीत लेता है।"

समूचा दरबार "बीरबल की जय" के नारों से गूँज उठा। अकबर ने बीरबल को बहुमूल्य उपहार और सम्मान प्रदान किया। उस दिन से यह कथा पूरे राज्य में सुनाई जाने लगी कि संसार की सबसे मीठी वस्तु कोई मिठाई नहीं, बल्कि मनुष्य की मीठी वाणी है। मधुर शब्द टूटे हुए संबंधों को जोड़ सकते हैं, क्रोध को शांत कर सकते हैं, दुखी मन में आशा जगा सकते हैं और समाज में प्रेम तथा सद्भाव का वातावरण बना सकते हैं।

तो दोस्तों  मीठी वाणी संसार की सबसे मीठी वस्तु है। प्रेम, सम्मान और विनम्रता से बोले गए शब्द किसी भी मिठाई से अधिक आनंद देते हैं और जीवनभर लोगों के हृदय में बसे रहते हैं।

 

 

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