विजयनगर नहीं, बल्कि मुगल सम्राट अकबर का विशाल साम्राज्य अपनी समृद्धि, न्यायप्रियता और सुव्यवस्थित शासन के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध था। दिल्ली का राजमहल दूर-दूर से आने वाले विद्वानों, कलाकारों, व्यापारियों और साधु-संतों का स्वागत करता था। सम्राट अकबर स्वयं धर्मों का सम्मान करने वाले शासक थे। वे विद्वानों और संतों का आदर करते थे तथा समय-समय पर उनसे धर्म, नीति और मानव जीवन के विषय में चर्चा किया करते थे। उनके दरबार में नवरत्नों में सबसे बुद्धिमान और हाजिरजवाब मंत्री बीरबल थे। बीरबल केवल अपनी चतुराई के कारण ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि वे मनुष्य के स्वभाव को गहराई से समझते थे। वे चेहरे के भाव, बोलने के ढंग और छोटी-छोटी बातों से भी व्यक्ति के इरादों का अनुमान लगा लेते थे। यही कारण था कि जब भी राज्य में कोई कठिन समस्या आती, अकबर सबसे पहले बीरबल की राय लेते थे।
एक दिन राजधानी में एक नए साधु के आने की चर्चा फैल गई। लोग कहते थे कि वह
हिमालय से तपस्या करके आया है। उसके लंबे-लंबे बाल, सफेद दाढ़ी, गेरुए वस्त्र,
गले में
रुद्राक्ष की कई मालाएँ और हाथ में कमंडल देखकर लोग तुरंत उसके चरणों में झुक
जाते। वह मधुर वाणी में धर्म और त्याग की बातें करता था। वह लोगों से कहता कि धन
और वैभव नश्वर हैं तथा केवल दान और पुण्य ही मनुष्य के साथ जाते हैं। उसकी मीठी
वाणी और गंभीर व्यक्तित्व से लोग अत्यंत प्रभावित हो जाते। देखते ही देखते उसकी
प्रसिद्धि पूरे नगर में फैल गई।
प्रतिदिन सैकड़ों लोग उसके आश्रम में पहुँचने लगे। कोई फल लेकर आता, कोई मिठाई,
कोई कपड़े और
कोई सोने-चाँदी के सिक्के। साधु हर किसी को आशीर्वाद देता और कहता कि जो जितना
अधिक दान देगा, उसके जीवन से उतनी ही जल्दी दुख दूर हो जाएँगे। लोग उसकी
बातों पर विश्वास करके अपनी सामर्थ्य से अधिक दान देने लगे। कई धनवान व्यापारियों
ने भी उसे बड़ी-बड़ी धनराशियाँ भेंट कीं। धीरे-धीरे उसके पास अपार धन इकट्ठा हो
गया।
राजधानी के कुछ लोगों को साधु का व्यवहार विचित्र लगने लगा। वह दिन में अत्यंत
विनम्र दिखाई देता, लेकिन रात के समय किसी को अपने आश्रम के पास नहीं आने देता
था। उसके कुछ सेवक भी बहुत कठोर स्वभाव के थे। वे किसी को अंदर झाँकने तक नहीं
देते थे। फिर भी साधु की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि लोग इन बातों पर ध्यान नहीं
देते थे।
कुछ ही दिनों में नगर के कई व्यापारियों ने शिकायत की कि उनके घरों से कीमती
आभूषण और धन गायब हो रहे हैं। चोरी का कोई सुराग नहीं मिलता था। नगर के सैनिकों ने
पूरी कोशिश की, लेकिन चोर पकड़ में नहीं आया। अकबर ने इस विषय को गंभीरता
से लिया और दरबार में मंत्रियों से सलाह माँगी। अधिकांश लोगों का मानना था कि यह
किसी बड़े गिरोह का काम है।
बीरबल पूरे समय शांत बैठे रहे। उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, कभी-कभी अपराधी
वही होता है जिस पर सबसे कम संदेह किया जाता है। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले
हमें हर संभावना पर विचार करना चाहिए।”
अकबर ने पूछा, “क्या तुम्हें किसी पर संदेह है?”
बीरबल ने उत्तर दिया, “अभी केवल संदेह है, प्रमाण नहीं। बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाना
न्याय के विरुद्ध होगा।”
इसके बाद बीरबल स्वयं भेष बदलकर नगर में घूमने लगे। उन्होंने साधारण व्यापारी
का रूप धारण किया और लोगों से बातचीत की। उन्होंने देखा कि लगभग हर व्यक्ति उस
साधु की प्रशंसा कर रहा है। लेकिन कुछ गरीब लोग उससे दूरी बनाए रखते थे। जब बीरबल
ने उनसे कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि साधु केवल धनवान लोगों का सम्मान करता है।
गरीब लोगों को वह अपने पास बैठने तक नहीं देता।
यह बात बीरबल को खटक गई। उन्होंने सोचा कि सच्चा साधु कभी अमीर और गरीब में
भेद नहीं करता। उन्होंने अगले दिन साधु के आश्रम में जाने का निश्चय किया। वे
साधारण वस्त्र पहनकर एक वृद्ध यात्री के रूप में वहाँ पहुँचे। साधु ने उन्हें
देखकर सामान्य-सा आशीर्वाद दिया, लेकिन जैसे ही उसने देखा कि वृद्ध के पास कोई भेंट नहीं है,
उसका व्यवहार
ठंडा पड़ गया। उसने अपने सेवक से कहा कि इस व्यक्ति को अधिक देर तक यहाँ न रहने
दिया जाए।
बीरबल ने ध्यान से आश्रम का निरीक्षण किया। बाहर सादगी दिखाई देती थी, लेकिन भीतर की
व्यवस्था अत्यंत आलीशान थी। वहाँ महँगे कालीन, चाँदी के पात्र और बहुमूल्य
वस्तुएँ दिखाई दे रही थीं। यह देखकर उनका संदेह और गहरा हो गया। उन्होंने बिना कुछ
कहे वहाँ से विदा ली और अगले कुछ दिनों तक गुप्त रूप से आश्रम पर नज़र रखने लगे।
एक रात उन्होंने देखा कि आधी रात के बाद साधु अपने दो विश्वस्त सेवकों के साथ
साधु का वेश बदलकर साधारण कपड़ों में बाहर निकला। वे तीनों अँधेरी गलियों से होते
हुए एक धनी व्यापारी के मकान की ओर बढ़े। बीरबल ने सैनिकों को पहले ही छिपाकर रखा
था। जैसे ही वे लोग चोरी करने के लिए दीवार फाँदने लगे, सैनिकों ने उन्हें चारों ओर
से घेर लिया। साधु भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन पकड़ा गया।
उसके आश्रम की तलाशी ली गई तो वहाँ से चोरी के अनेक आभूषण, सोने के सिक्के,
बहुमूल्य रत्न
और कई व्यापारियों का सामान बरामद हुआ। यह देखकर नगर के लोग स्तब्ध रह गए। जिस
व्यक्ति को वे महान तपस्वी समझते थे, वही सबसे बड़ा ठग और चोर निकला।
अगले दिन दरबार में उसे उपस्थित किया गया। पहले तो उसने स्वयं को निर्दोष
बताया, लेकिन जब चोरी का सामान उसके आश्रम से मिला और उसके सेवकों ने सच्चाई स्वीकार
कर ली, तब उसके पास कोई उत्तर नहीं बचा। उसने सिर झुकाकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
उसने बताया कि वह वर्षों से अलग-अलग राज्यों में साधु का भेष धारण करके लोगों को
धोखा देता था। पहले वह उनकी श्रद्धा जीतता, फिर उनके घरों की जानकारी
इकट्ठा करता और अवसर मिलते ही चोरी कर लेता।
अकबर ने कठोर स्वर में कहा, “धर्म के नाम पर लोगों की आस्था से खिलवाड़ करना सबसे बड़ा
अपराध है। तुमने केवल धन की चोरी नहीं की, बल्कि लोगों के विश्वास को भी ठेस पहुँचाई है।”
इसके बाद अकबर ने बीरबल की ओर देखकर कहा, “एक बार फिर तुम्हारी सूझबूझ
ने राज्य को बड़े अपराधी से बचा लिया। यदि केवल बाहरी वेश देखकर निर्णय लिया जाता,
तो यह व्यक्ति
वर्षों तक लोगों को धोखा देता रहता।”
बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, मनुष्य की पहचान उसके
वस्त्रों से नहीं, बल्कि उसके आचरण से होती है। सच्चा संत कभी लोभ नहीं करता,
कभी भेदभाव
नहीं करता और कभी छल का सहारा नहीं लेता।”
अकबर ने आदेश दिया कि चोरी का सारा सामान उसके वास्तविक मालिकों को लौटा दिया
जाए और नकली साधु को उसके अपराध के अनुसार दंड दिया जाए। नगर के लोगों ने राहत की
साँस ली। उन्हें यह सीख मिली कि किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके पहनावे,
मीठी वाणी या
बाहरी दिखावे से नहीं करना चाहिए। विवेक, सतर्कता और सत्य की परीक्षा हर परिस्थिति में
आवश्यक है।
इस घटना के बाद पूरे राज्य में यह कथा प्रसिद्ध हो गई। माता-पिता अपने बच्चों
को यह कहानी सुनाकर समझाने लगे कि अंधविश्वास से बचना चाहिए और किसी भी व्यक्ति पर
आँख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए। सच्चाई अंततः सामने आ ही जाती है, और जो लोग
छल-कपट से दूसरों को धोखा देते हैं, वे एक दिन अवश्य पकड़े जाते हैं। बीरबल की
बुद्धिमानी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि न्याय केवल शक्ति से नहीं, बल्कि विवेक,
धैर्य और सही
समय पर सही निर्णय लेने से स्थापित होता है।
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