बरसों पुराने एक छोटे से गाँव का नाम था हरिपुर। गाँव चारों ओर से हरे-भरे खेतों, आम के बागों और एक शांत नदी से घिरा हुआ था। वहाँ रहने वाले लोग मेहनती थे और एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे। उसी गाँव में एक बहुत बड़ा ज़मींदार रहता था, जिसका नाम था सेठ दयानाथ। उसके पास सैकड़ों बीघा उपजाऊ ज़मीन, कई मकान, अनाज से भरे गोदाम और ढेर सारी दौलत थी। लोग उसे गाँव का सबसे बड़ा मालिक कहते थे। जब भी वह घोड़े पर बैठकर खेतों का निरीक्षण करने निकलता, लोग सम्मान से सिर झुका लेते। धीरे-धीरे दयानाथ को अपनी संपत्ति पर इतना घमंड हो गया कि वह स्वयं को हर चीज़ का असली मालिक समझने लगा। उसे लगता था कि धन के बल पर दुनिया की हर वस्तु खरीदी जा सकती है।
दयानाथ के विशाल मकान में हर सुविधा मौजूद थी। दर्जनों नौकर-चाकर उसकी सेवा
में लगे रहते थे। सुबह उठते ही उसके सामने तरह-तरह के व्यंजन परोसे जाते, फिर वह अपने
खेतों का हिसाब-किताब देखता और शाम को गाँव के लोगों के सामने अपनी संपत्ति का
बखान करता। यदि कोई किसान उसकी प्रशंसा करता, तो वह प्रसन्न हो जाता,
लेकिन यदि कोई
उसकी बात से असहमत होता, तो वह उसे अपमानित करने से भी नहीं चूकता। धीरे-धीरे गाँव
के लोग उससे डरने लगे, पर मन से उसका सम्मान कम होने लगा।
गाँव के किनारे एक साधारण सी झोपड़ी में एक वृद्ध संत रहते थे। उनका नाम
स्वामी शिवानंद था। वे किसी से कुछ नहीं माँगते थे। गाँव वाले अपनी श्रद्धा से
उन्हें भोजन और आवश्यक वस्तुएँ दे देते थे। स्वामी शिवानंद हमेशा लोगों को सादगी,
ईमानदारी और
सेवा का महत्व समझाते थे। उनका कहना था कि इस संसार में मनुष्य केवल कुछ समय के
लिए आता है और जो कुछ भी उसके पास है, वह उसे केवल संभालने के लिए मिला है, हमेशा के लिए
रखने के लिए नहीं। गाँव के अधिकांश लोग उनकी बातों का सम्मान करते थे।
एक दिन दयानाथ ने सुना कि गाँव वाले संत की बातों को उससे अधिक महत्व देते
हैं। यह बात उसके अहंकार को ठेस पहुँचाने वाली थी। उसने तय किया कि वह संत के पास
जाकर उनसे ऐसा प्रश्न पूछेगा, जिसका उत्तर वे न दे सकें। अगले दिन वह अपने नौकरों के साथ
संत की कुटिया पर पहुँचा। वहाँ कई ग्रामीण बैठे हुए थे। दयानाथ ने ऊँची आवाज़ में
कहा, “स्वामीजी, लोग कहते हैं कि आप बड़े ज्ञानी हैं। बताइए, इस गाँव का
सबसे बड़ा मालिक कौन है?”
स्वामी शिवानंद मुस्कुराए। उन्होंने शांत स्वर में उत्तर दिया, “जिसे तुम मालिक
समझते हो, वह भी एक दिन सब कुछ छोड़कर चला जाएगा। इसलिए इस संसार में कोई भी मनुष्य असली
मालिक नहीं है।”
दयानाथ हँस पड़ा। उसने कहा, “मेरे पास सैकड़ों बीघा ज़मीन है, इतने मकान हैं, अनाज के भंडार
हैं, सोना-चाँदी है। यदि मैं मालिक नहीं हूँ, तो फिर मालिक कौन है?”
संत ने उत्तर दिया, “यदि यह सब वास्तव में तुम्हारा है, तो क्या तुम इसे अपने साथ
लेकर जा सकते हो? क्या तुम समय को रोक सकते हो? क्या तुम मृत्यु को आदेश दे
सकते हो कि वह तुम्हारे पास न आए? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है, तो फिर सोचो कि मालिक कौन
है और संरक्षक कौन।”
दयानाथ को यह उत्तर पसंद नहीं आया। उसने तर्क दिया, “मैंने अपनी मेहनत से यह सब
कमाया है।”
संत ने मुस्कुराकर कहा, “तुमने मेहनत की, यह सत्य है। लेकिन क्या तुमने भूमि बनाई?
क्या तुमने
वर्षा कराई? क्या तुमने सूर्य को उगाया? क्या तुमने अपने शरीर को स्वयं बनाया? यदि प्रकृति एक
वर्ष भी साथ न दे, तो सारी मेहनत व्यर्थ हो सकती है। इसलिए मनुष्य मेहनत अवश्य
करता है, पर सब कुछ केवल उसके नियंत्रण में नहीं होता।”
दयानाथ बिना कुछ कहे वहाँ से लौट आया, लेकिन संत की बातें उसके मन में घूमती रहीं। फिर
भी उसका अहंकार कम नहीं हुआ। उसने निश्चय किया कि वह अपनी संपत्ति और बढ़ाएगा ताकि
लोग उसे ही सबसे बड़ा मालिक मानें।
कुछ महीनों बाद गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। वर्षा न होने से खेत सूखने लगे।
तालाबों का पानी कम हो गया। किसानों की फसलें बर्बाद होने लगीं। दयानाथ के गोदाम
अनाज से भरे थे, लेकिन उसने ऊँचे दामों पर ही अनाज बेचने का निर्णय लिया।
गरीब किसान मजबूरी में कर्ज़ लेने लगे। गाँव में कठिन समय आ गया।
उधर स्वामी शिवानंद लोगों को धैर्य रखने के लिए प्रेरित करते रहे। उन्होंने
जिनके पास थोड़ा अधिक था, उनसे ज़रूरतमंदों की सहायता करने का आग्रह किया। कई
ग्रामीणों ने मिलकर भोजन बाँटना शुरू किया। गाँव में सहयोग की भावना बढ़ने लगी,
लेकिन दयानाथ
अपने धन की रक्षा में लगा रहा।
कुछ ही दिनों बाद अचानक एक रात दयानाथ के सबसे बड़े गोदाम में आग लग गई। आग
इतनी तेज़ थी कि देखते ही देखते वर्षों का जमा हुआ अनाज जलकर राख हो गया। गाँव
वाले आग बुझाने दौड़े। जिन किसानों को उसने कभी अपमानित किया था, वे भी उसकी मदद
करने आए। बड़ी मुश्किल से आग पर काबू पाया गया, लेकिन नुकसान बहुत हो चुका
था।
दयानाथ टूट गया। उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस संपत्ति पर वह इतना गर्व करता
था, वह एक रात में नष्ट हो सकती है। अगले दिन वह उदास मन से संत के पास पहुँचा।
उसने कहा, “स्वामीजी, मैंने सब कुछ सुरक्षित रखने की कोशिश की, फिर भी इतना
बड़ा नुकसान हो गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ?”
संत ने उसे पास बैठाया और बोले, “जीवन हमें बार-बार याद दिलाता है कि हम किसी भी
वस्तु के स्थायी मालिक नहीं हैं। धन, भूमि और भवन हमारे पास कुछ समय के लिए रहते हैं।
यदि उनका उपयोग केवल अपने अहंकार के लिए किया जाए, तो वे मन को बाँध लेते हैं।
लेकिन यदि उनका उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए किया जाए, तो वही संपत्ति पुण्य बन
जाती है।”
दयानाथ चुपचाप सुनता रहा। उसके मन का अभिमान धीरे-धीरे टूटने लगा। उसने पहली
बार अपने व्यवहार पर विचार किया। उसे याद आया कि उसने कितने किसानों को कठोर शब्द
कहे थे और कितनों की मजबूरी का लाभ उठाया था।
कुछ दिनों बाद वर्षा हुई। खेतों में फिर हरियाली लौट आई। दयानाथ ने इस बार अलग
निर्णय लिया। उसने अपने गोदाम में बचा हुआ अनाज गरीब किसानों में उचित मूल्य पर
बाँटना शुरू किया। जिन किसानों पर अधिक कर्ज़ था, उनका कुछ कर्ज़ माफ़ कर
दिया। उसने गाँव के तालाब की मरम्मत करवाई, स्कूल की छत बनवाई और एक
छोटा चिकित्सालय भी बनवाया। धीरे-धीरे लोगों के मन में उसके लिए सम्मान लौटने लगा,
लेकिन इस बार
सम्मान उसके धन के कारण नहीं, बल्कि उसके बदलते स्वभाव के कारण था।
एक दिन उसने फिर संत से पूछा, “स्वामीजी, अब मुझे बताइए कि असली मालिक कौन है?”
संत ने मुस्कुराते हुए कहा, “जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह केवल एक जिम्मेदार संरक्षक
है, तभी वह सच्चे अर्थों में जीवन को समझता है। प्रकृति, समय और परम सत्य के सामने
सभी समान हैं। मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। इसलिए असली मालिक
वह नहीं, जो केवल अधिकार जताए, बल्कि वह है जो अपने पास आई हर वस्तु का सदुपयोग करे और उसे
दूसरों के हित में लगाए।”
दयानाथ की आँखों में नमी आ गई। उसने विनम्रता से कहा, “मैंने जीवन भर स्वयं को
मालिक समझा, लेकिन आज समझ पाया कि मैं केवल एक सेवक और संरक्षक हूँ।”
उस दिन के बाद दयानाथ का जीवन पूरी तरह बदल गया। वह पहले की तरह घमंड से नहीं,
बल्कि नम्रता
से लोगों से मिलता। किसानों की समस्याएँ सुनता, बच्चों की पढ़ाई में सहायता
करता और गाँव के विकास के लिए अपनी संपत्ति का उपयोग करता। उसने अपने बच्चों को भी
यही शिक्षा दी कि धन का मूल्य तभी है जब उससे किसी का जीवन बेहतर बने।
वर्षों बाद जब दयानाथ वृद्ध हुआ, तब उसने अपनी अधिकांश संपत्ति समाज के हित में
दान कर दी। उसने गाँव के नाम एक पुस्तकालय, विद्यालय और अस्पताल
बनवाया। लोग अब उसे केवल धनी व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक उदार और समझदार
इंसान के रूप में याद करने लगे। उसकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ। उस
दिन लोगों ने महसूस किया कि वह अपने साथ न तो धन ले गया, न ज़मीन और न ही महल। पीछे
रह गईं तो केवल उसकी नेक यादें और अच्छे कर्म।
स्वामी शिवानंद ने गाँव वालों से कहा, “यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य
है। संपत्ति का अहंकार मिट जाता है, लेकिन सेवा और सदाचार अमर हो जाते हैं। असली
मालिक बनने की इच्छा छोड़कर यदि मनुष्य एक अच्छा संरक्षक बन जाए, तो उसका जीवन
सफल हो जाता है।”
हरिपुर गाँव में यह कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने लगी। बच्चे जब भी पूछते
कि असली मालिक कौन है, तो बुज़ुर्ग मुस्कुराकर कहते, “जिसे अपनी शक्ति, संपत्ति और
अवसर का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करना आ जाए, वही जीवन का सही अर्थ समझता
है। इस संसार की हर वस्तु क्षणभंगुर है। मनुष्य केवल कुछ समय के लिए उसका रखवाला
है। इसलिए घमंड नहीं, कृतज्ञता और सेवा ही सबसे बड़ी संपत्ति है।”
तो दोस्तों
मनुष्य किसी भी
वस्तु का स्थायी मालिक नहीं होता। धन, पद और संपत्ति अस्थायी हैं। सच्ची महानता
विनम्रता, सेवा, सदाचार और जिम्मेदारी से जीवन जीने में है।
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