एक समय की बात है। मुगल सम्राट अकबर का शासन पूरे भारत में अपनी न्यायप्रियता,
समृद्धि और
दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध था। उनके दरबार में अनेक विद्वान, योद्धा,
कलाकार और
बुद्धिमान मंत्री उपस्थित रहते थे, लेकिन उन सभी में सबसे अलग पहचान थी बीरबल की। बीरबल केवल
अपनी तीव्र बुद्धि के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी विनम्रता, न्यायप्रियता और मानवीय
संवेदनाओं के कारण भी सबके प्रिय थे। अकबर जब भी किसी कठिन समस्या में उलझ जाते,
तो बीरबल अपनी
चतुराई से उसका ऐसा समाधान प्रस्तुत करते कि सभी आश्चर्यचकित रह जाते। यही कारण था
कि कई दरबारी बीरबल से ईर्ष्या भी करते थे। वे अवसर मिलने पर बीरबल को नीचा दिखाने
का प्रयास करते, किंतु हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगती।
एक दिन अकबर अपने महल के सुंदर बगीचे में टहल रहे थे। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल
खिले थे, पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को और भी मनमोहक बना रहा था। उसी समय उन्होंने
देखा कि एक छोटा बालक अपने पिता के साथ बगीचे के बाहर खड़ा है। बालक के हाथ में एक
साधारण-सा जंगली फूल था, जिसे उसने बड़ी श्रद्धा और प्रेम से अपने पिता को दिया।
पिता ने उस फूल को किसी बहुमूल्य रत्न की तरह संभाल लिया और बेटे के सिर पर स्नेह
से हाथ फेर दिया। यह दृश्य देखकर अकबर कुछ देर तक विचारमग्न रहे। उन्होंने सोचा कि
एक साधारण-सा फूल भी किसी के लिए इतना मूल्यवान कैसे हो सकता है? महल लौटने के
बाद भी यही प्रश्न उनके मन में घूमता रहा।
अगले दिन दरबार लगा। अकबर ने सभी दरबारियों से पूछा, “बताइए, संसार का सबसे
अनमोल उपहार क्या है?” प्रश्न सुनते ही दरबार में खामोशी छा गई। कुछ क्षण बाद एक
मंत्री बोला, “जहाँपनाह, सबसे अनमोल उपहार सोना है, क्योंकि उससे हर वस्तु
खरीदी जा सकती है।” दूसरे मंत्री ने कहा, “मेरे विचार से हीरे और जवाहरात सबसे अनमोल हैं,
क्योंकि उनकी
कीमत अपार होती है।” तीसरे दरबारी ने कहा, “राज्य और सत्ता सबसे बड़ा
उपहार हैं, क्योंकि इनके सामने संसार की हर संपत्ति छोटी लगती है।” किसी ने दुर्लभ घोड़े
का नाम लिया, तो किसी ने बहुमूल्य रेशमी वस्त्रों और महलों को सबसे श्रेष्ठ उपहार बताया।
अकबर सभी उत्तर ध्यान से सुनते रहे, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष के भाव दिखाई नहीं
दिए।
अंत में उन्होंने बीरबल की ओर देखा और मुस्कराकर पूछा, “बीरबल, तुम्हारा क्या
विचार है? संसार का सबसे अनमोल उपहार कौन-सा है?” बीरबल ने शांत स्वर में
उत्तर दिया, “महाराज, इस प्रश्न का उत्तर शब्दों में देना आसान नहीं है। यदि आप अनुमति दें, तो मैं कुछ
दिनों में इसका उत्तर प्रमाण सहित प्रस्तुत करूँगा।” अकबर ने सहमति दे दी। दरबार
समाप्त हो गया, लेकिन सभी दरबारी सोचने लगे कि इस बार बीरबल इस कठिन प्रश्न
का उत्तर कैसे देंगे।
बीरबल अगले कई दिनों तक नगर और आसपास के गाँवों में घूमते रहे। वे लोगों से
मिलते, उनके जीवन को देखते और उनकी भावनाओं को समझते। उन्होंने देखा कि एक गरीब किसान
अपनी थोड़ी-सी फसल में से भी कुछ दाने भूखे यात्री को दे देता है। एक माँ अपने
हिस्से का भोजन अपने बच्चे को खिलाकर स्वयं भूखी सो जाती है। एक वृद्ध महिला अपनी
एकमात्र ऊनी चादर ठंड से काँप रहे अनजान यात्री को ओढ़ा देती है। इन सभी घटनाओं को
देखकर बीरबल के मन में उत्तर और अधिक स्पष्ट होता गया।
कुछ दिनों बाद बीरबल ने अकबर से निवेदन किया कि वे साधारण वेश में उनके साथ
नगर भ्रमण पर चलें। अकबर सहमत हो गए। दोनों साधारण वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकल
पड़े। चलते-चलते वे एक छोटे से गाँव में पहुँचे। वहाँ उन्हें एक झोपड़ी दिखाई दी,
जिसके बाहर एक
वृद्ध दंपति बैठा था। उनके कपड़े पुराने थे, घर बहुत साधारण था और यह
स्पष्ट था कि वे अत्यंत गरीब थे। तभी वहाँ एक थका-माँदा यात्री पहुँचा। उसने
विनम्रता से कहा, “मैं कई दिनों से यात्रा कर रहा हूँ। क्या मुझे थोड़ा पानी
और कुछ खाने को मिल सकता है?”
वृद्ध दंपति ने बिना देर किए उसे अपने घर के भीतर बुलाया। उन्होंने मिट्टी के
घड़े का ठंडा पानी पिलाया और घर में बची हुई केवल दो रोटियाँ तथा थोड़ी-सी दाल
उसके सामने रख दी। यात्री ने संकोच से पूछा, “यदि मैं यह सब खा लूँगा,
तो आप लोग क्या
खाएँगे?” वृद्ध मुस्कराया और बोला, “बेटा, अतिथि भगवान का रूप होता है। तुम्हारा पेट भर जाएगा,
यही हमारे लिए
सबसे बड़ा सुख है।” यात्री ने भोजन किया, उनका धन्यवाद किया और आगे बढ़ गया। अकबर और
बीरबल यह सब दूर खड़े होकर देख रहे थे।
अकबर ने धीरे से कहा, “इन लोगों ने अपनी सारी भोजन सामग्री एक अनजान व्यक्ति को दे
दी। अब ये स्वयं क्या करेंगे?” बीरबल ने उत्तर दिया, “महाराज, यही तो सच्ची
उदारता है। जिसने अपने पास की सबसे मूल्यवान वस्तु भी प्रेम से दे दी, उसका उपहार
किसी भी खजाने से अधिक अनमोल है।”
दोनों आगे बढ़े। रास्ते में उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे खेल रहे थे। उनमें से
एक बालक के पास लकड़ी की एक छोटी-सी खिलौना गाड़ी थी। वह गाड़ी पुरानी थी, लेकिन वही उसका
सबसे प्रिय खिलौना था। तभी वहाँ एक छोटा बच्चा आया, जिसके पास खेलने के लिए कुछ
भी नहीं था। पहले बालक ने बिना किसी आग्रह के अपनी प्रिय गाड़ी उसे दे दी और स्वयं
मुस्कराते हुए उसे खेलते हुए देखने लगा। अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “उसने अपना सबसे
प्रिय खिलौना क्यों दे दिया?” बीरबल बोले, “क्योंकि उसे दूसरे की खुशी में अपनी खुशी दिखाई
दी।”
कुछ दूर चलने पर वे एक मंदिर के पास पहुँचे। वहाँ एक गरीब महिला प्रार्थना कर
रही थी। उसके पास केवल एक छोटा-सा दीपक और कुछ फूल थे। पूजा समाप्त होने पर उसने
वे फूल एक बीमार वृद्धा को दे दिए और कहा, “ईश्वर आपकी रक्षा करें।”
फूलों की कोई बड़ी कीमत नहीं थी, लेकिन उनमें छिपी शुभकामना और करुणा अमूल्य थी। यह देखकर
अकबर का मन द्रवित हो उठा।
संध्या होने लगी। बीरबल अकबर को एक छोटे आश्रम में ले गए। वहाँ एक संत रहते
थे। संत ने दोनों का प्रेमपूर्वक स्वागत किया। उनके पास देने के लिए कोई बहुमूल्य
वस्तु नहीं थी। उन्होंने केवल सादा भोजन कराया, मीठे शब्दों में बातचीत की
और जाते समय आशीर्वाद दिया। लौटते समय अकबर ने कहा, “उनके पास धन नहीं था,
फिर भी वहाँ से
लौटते हुए मन बहुत शांत और प्रसन्न है।” बीरबल ने मुस्कराकर कहा, “यही प्रेम,
सम्मान और
सद्भाव का प्रभाव है।”
अगले दिन दरबार में फिर वही प्रश्न उठाया गया। अकबर ने सबके सामने कहा,
“बीरबल, अब हमें अपने
प्रश्न का उत्तर दो।” बीरबल ने विनम्रता से कहा, “महाराज, संसार का सबसे
अनमोल उपहार वह नहीं है जिसकी कीमत सोने-चाँदी से आँकी जा सके। सबसे अनमोल उपहार
है—निस्वार्थ प्रेम, सच्चा स्नेह, विश्वास, करुणा और समय। जब कोई
व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के अपना प्रेम, अपना विश्वास, अपना समय या अपनी सहायता
किसी दूसरे को देता है, तब वह ऐसा उपहार देता है जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा
सकती।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। बीरबल आगे बोले, “जिस गरीब वृद्ध दंपति ने
अपना भोजन अतिथि को दे दिया, उन्होंने रोटियाँ नहीं, बल्कि अपना प्रेम और आतिथ्य
दिया। जिस बालक ने अपना प्रिय खिलौना दूसरे बच्चे को दिया, उसने खिलौना नहीं, बल्कि मित्रता
और खुशी बाँटी। जिस महिला ने अपने फूल वृद्धा को दिए, उसने फूलों के साथ
शुभकामनाएँ और आशा भी दी। संत ने धन नहीं दिया, लेकिन उन्होंने सम्मान,
शांति और
प्रेरणा का उपहार दिया। यही उपहार मनुष्य के हृदय में जीवन भर सुरक्षित रहते हैं।”
अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, “अब मैं समझ गया हूँ कि अनमोल वस्तु वह नहीं होती जो खजाने
में रखी जाए, बल्कि वह होती है जो दिलों में बस जाए।” उन्होंने बीरबल की प्रशंसा करते हुए
कहा, “आज तुमने हमें जीवन का एक ऐसा सत्य बताया है जो किसी भी राज्य के खजाने से
अधिक मूल्यवान है।”
दरबारियों ने भी स्वीकार किया कि वे केवल धन और वैभव को ही सबसे बड़ा उपहार
समझते थे, जबकि वास्तविक अनमोल उपहार तो मानवीय गुण हैं। उस दिन के बाद अकबर ने यह नियम
बनाया कि राज्य में गरीबों, अनाथों, वृद्धों और जरूरतमंदों की सहायता पहले से अधिक की जाएगी।
उन्होंने अधिकारियों को आदेश दिया कि किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय न हो और हर
जरूरतमंद की यथासंभव सहायता की जाए। बीरबल ने कहा, “महाराज, जब शासक स्वयं
करुणा और उदारता का उदाहरण प्रस्तुत करता है, तब पूरी प्रजा भी उसी मार्ग
पर चलने लगती है।”
समय बीतता गया। राज्य में दया, सहयोग और परस्पर सम्मान की भावना बढ़ने लगी। लोग केवल धन
कमाने की नहीं, बल्कि दूसरों की सहायता करने की भी इच्छा रखने लगे। गाँवों
में लोग मिलकर कुएँ बनवाने लगे, यात्री सरायों की व्यवस्था होने लगी और निर्धनों की सहायता
के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने लगे। अकबर जब भी यह सब देखते, उन्हें बीरबल
की कही हुई बात याद आती कि सबसे अनमोल उपहार वह है जो दिल से दिया जाए।
एक दिन अकबर ने बीरबल से कहा, “यदि किसी व्यक्ति के पास देने के लिए धन न हो, तो क्या वह भी
अनमोल उपहार दे सकता है?” बीरबल ने उत्तर दिया, “निश्चित रूप से, महाराज। एक
मधुर मुस्कान, सच्ची प्रशंसा, कठिन समय में दिया गया साथ, किसी दुखी
व्यक्ति को ढाढ़स बँधाने वाले शब्द, किसी बुज़ुर्ग का सम्मान, किसी बच्चे को शिक्षा देना,
किसी बीमार की
सेवा करना और किसी निराश व्यक्ति में आशा जगाना—ये सभी ऐसे उपहार हैं जिन्हें देने
के लिए धन नहीं, बल्कि अच्छा हृदय चाहिए।”
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “आज से मैं भी प्रतिदिन ऐसा कोई कार्य करूँगा जिससे किसी एक
व्यक्ति के जीवन में खुशी आए।” बीरबल ने उत्तर दिया, “महाराज, यही सच्चे राजा
की पहचान है।”
उस दिन के बाद अकबर का दरबार केवल न्याय का केंद्र ही नहीं, बल्कि मानवता
और करुणा का भी प्रतीक बन गया। दूर-दूर से आने वाले लोग कहते कि इस राज्य की सबसे
बड़ी संपत्ति उसके महल, उसके खजाने या उसकी सेना नहीं, बल्कि उसके लोगों का प्रेम
और उनके शासक की उदारता है। बीरबल का उत्तर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाया जाने लगा और
लोगों ने समझा कि जीवन में सबसे मूल्यवान उपहार वही है जो निस्वार्थ भावना से दिया
जाए।
तो दोस्तों संसार का सबसे अनमोल उपहार धन, सोना या हीरे नहीं, बल्कि
निस्वार्थ प्रेम, विश्वास, करुणा, समय और सच्ची सहायता है। इन उपहारों की कोई कीमत नहीं लगाई
जा सकती, क्योंकि ये सीधे मनुष्य के हृदय को स्पर्श करते हैं और जीवन भर याद रहते हैं।
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