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संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

सबसे शक्तिशाली कौन?

 


 

मुगल सम्राट अकबर का दरबार केवल अपने वैभव और शान के लिए ही नहीं, बल्कि वहाँ होने वाली बुद्धिमत्ता से भरी चर्चाओं के लिए भी पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था। दूर-दूर से विद्वान, कवि, संगीतकार, कलाकार और न्यायप्रिय लोग बादशाह अकबर के दरबार में अपनी कला और ज्ञान का प्रदर्शन करने आते थे। उन सभी में सबसे अधिक सम्मान जिस व्यक्ति को प्राप्त था, वह था बीरबल। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, चतुराई, न्यायप्रियता और हाजिरजवाबी के कारण अकबर के सबसे प्रिय मंत्री थे। कई बार ऐसी समस्याएँ सामने आती थीं जिनका समाधान बड़े-बड़े विद्वान नहीं खोज पाते थे, लेकिन बीरबल अपनी बुद्धिमानी से उन्हें कुछ ही क्षणों में हल कर देते थे। यही कारण था कि दरबार के कुछ मंत्री उनसे ईर्ष्या भी करते थे और हमेशा अवसर तलाशते रहते थे कि किसी प्रकार बीरबल को नीचा दिखाया जाए।

एक दिन सुबह का समय था। अकबर अपने भव्य सिंहासन पर बैठे हुए थे। दरबार सज चुका था और सभी मंत्री, सेनापति तथा दरबारी अपनी-अपनी जगह पर उपस्थित थे। चर्चा राज्य की सुरक्षा, जनता की भलाई और व्यापार की उन्नति पर चल रही थी। तभी अकबर के मन में एक अनोखा विचार आया। उन्होंने मुस्कुराते हुए दरबारियों की ओर देखा और गंभीर स्वर में पूछा, "बताइए, इस संसार में सबसे शक्तिशाली कौन है?" प्रश्न सुनते ही पूरा दरबार शांत हो गया। सभी सोच में पड़ गए। यह प्रश्न जितना सरल दिखाई दे रहा था, उतना ही कठिन भी था।

सबसे पहले सेना के प्रधान सेनापति आगे बढ़े। उन्होंने झुककर कहा, "जहाँपनाह, मेरी दृष्टि में सबसे शक्तिशाली सेना होती है। जिसके पास विशाल सेना और पराक्रमी सैनिक हों, वही पूरे संसार पर विजय प्राप्त कर सकता है।" अकबर ने उनकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया। फिर उन्होंने दूसरे मंत्री की ओर देखा।

दूसरे मंत्री ने कहा, "महाराज, सबसे बड़ी शक्ति धन है। धन के बल पर महल बनते हैं, सेनाएँ तैयार होती हैं, व्यापार चलता है और लोग सम्मान प्राप्त करते हैं। जिसके पास अपार धन हो, वही सबसे शक्तिशाली है।"

इसके बाद एक विद्वान दरबारी बोले, "जहाँपनाह, मेरे विचार से सबसे बड़ी शक्ति ज्ञान है। ज्ञान के बिना धन और सेना दोनों व्यर्थ हैं। ज्ञानी व्यक्ति अपनी बुद्धि से असंभव कार्य भी संभव कर सकता है।"

एक अन्य दरबारी ने कहा, "नहीं महाराज, सबसे बड़ी शक्ति समय है। समय के आगे कोई नहीं टिक सकता। राजा हो या भिखारी, समय सभी को बदल देता है।"

दरबार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उत्तर दिया। किसी ने भाग्य को सबसे शक्तिशाली बताया, किसी ने प्रकृति को, तो किसी ने ईश्वर की इच्छा को सबसे बड़ा बल माना। अकबर सभी की बातें सुनते रहे, लेकिन उनके चेहरे से स्पष्ट था कि उन्हें अभी भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।

आखिरकार अकबर की दृष्टि बीरबल पर पड़ी। बीरबल अब तक शांत बैठे सबकी बातें सुन रहे थे। अकबर मुस्कुराए और बोले, "बीरबल, तुमने कुछ नहीं कहा। बताओ, तुम्हारी दृष्टि में संसार का सबसे शक्तिशाली कौन है?"

बीरबल ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह, यदि आपकी अनुमति हो तो मैं इस प्रश्न का उत्तर अभी नहीं, बल्कि कल दूँगा।"

दरबार में हलचल मच गई। कुछ मंत्री मन ही मन प्रसन्न हो गए। उन्हें लगा कि इस बार बीरबल के पास भी उत्तर नहीं है। उनमें से एक मंत्री व्यंग्य करते हुए बोला, "लगता है बीरबल भी इस प्रश्न में उलझ गए हैं।"

बीरबल मुस्कुराए, लेकिन कुछ नहीं बोले। अकबर ने कहा, "ठीक है बीरबल। कल के दरबार में हम तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा करेंगे।"

उस दिन पूरा नगर इसी चर्चा में डूबा रहा कि आखिर बीरबल कल क्या उत्तर देंगे। लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे। कोई कहता कि बीरबल ईश्वर को सबसे शक्तिशाली बताएँगे, तो कोई कहता कि वे बुद्धि की प्रशंसा करेंगे। लेकिन जो लोग बीरबल को अच्छी तरह जानते थे, उन्हें विश्वास था कि उनका उत्तर कुछ अलग और अनोखा होगा।

उधर, बीरबल अपने घर लौटे। उन्होंने रात भर किसी पुस्तक का अध्ययन नहीं किया, न ही किसी विद्वान से सलाह ली। वे केवल मुस्कुराते रहे, मानो उनके मन में पहले से ही उत्तर स्पष्ट हो। उनकी पत्नी ने पूछा, "आज आप कुछ अधिक ही शांत दिखाई दे रहे हैं। क्या दरबार में कोई कठिन समस्या आई है?"

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "समस्या कठिन अवश्य है, लेकिन उसका समाधान शब्दों से नहीं, अनुभव से देना होगा।"

अगले दिन सुबह फिर से भव्य दरबार सजा। सभी की निगाहें बीरबल पर थीं। अकबर भी उत्सुक थे। जैसे ही बीरबल दरबार में पहुँचे, अकबर ने कहा, "बीरबल, अब बताओ, संसार में सबसे शक्तिशाली कौन है?"

बीरबल ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यदि आप मेरे साथ महल के बाहर चलें और थोड़ा धैर्य रखें, तो मैं आपको बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वयं उत्तर दिखा दूँगा।"

अकबर को यह प्रस्ताव रोचक लगा। उन्होंने तुरंत अपने कुछ विश्वसनीय सैनिकों और मंत्रियों को साथ चलने का आदेश दिया। पूरा दल महल से निकलकर नगर की ओर चल पड़ा। रास्ते में लोग बादशाह को देखकर प्रणाम करने लगे। कुछ दूर चलने पर वे एक बड़े बाज़ार में पहुँचे। वहाँ व्यापारी अपनी दुकानों पर ग्राहकों को बुला रहे थे। बच्चे खेल रहे थे, महिलाएँ खरीदारी कर रही थीं और मजदूर अपने काम में व्यस्त थे।

बीरबल ने अकबर से कहा, "जहाँपनाह, कृपया कुछ देर यहाँ खड़े होकर केवल लोगों को ध्यान से देखिए।"

अकबर ने वैसा ही किया। तभी अचानक बाज़ार में एक छोटा-सा बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसकी माँ उसे चुप कराने की बहुत कोशिश कर रही थी, लेकिन बच्चा लगातार रोए जा रहा था। कुछ ही क्षणों में आसपास के कई लोग अपना काम छोड़कर उस बच्चे की ओर देखने लगे। किसी ने उसे खिलौना दिया, किसी ने मिठाई दी, किसी ने उसे गोद में उठाने का प्रयास किया, लेकिन बच्चा शांत नहीं हुआ।

बीरबल मुस्कुराए। उन्होंने अकबर की ओर देखा और बोले, "जहाँपनाह, अभी उत्तर मत दीजिए। थोड़ा और प्रतीक्षा कीजिए। असली उत्तर अभी सामने आने वाला है।"

अकबर उत्सुकता से आगे देखने लगे। उन्हें अभी तक समझ नहीं आया था कि बीरबल उन्हें क्या दिखाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पूरा विश्वास था कि इस साधारण-सी घटना के पीछे कोई गहरा रहस्य अवश्य छिपा है।

अकबर और बीरबल बाज़ार के बीच खड़े होकर उस छोटे बच्चे को ध्यान से देखने लगे। बच्चा लगातार रो रहा था। उसकी माँ उसे प्यार से समझा रही थी, गोद में उठा रही थी, कभी उसके आँसू पोंछती तो कभी उसके सिर पर हाथ फेरती, लेकिन वह किसी भी तरह शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। आसपास के लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। हर कोई अपनी ओर से उसे चुप कराने का प्रयास कर रहा था। किसी ने लकड़ी का रंग-बिरंगा खिलौना दिया, किसी ने गुड़ की मिठाई, तो किसी ने छोटी-सी बाँसुरी बजाकर उसका ध्यान भटकाने की कोशिश की। लेकिन बच्चे की ज़िद कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही थी।

कुछ देर बाद एक बूढ़ा व्यक्ति वहाँ आया। उसने बच्चे की माँ से पूछा, "बेटी, यह क्यों रो रहा है?" माँ ने उदास स्वर में कहा, "इसे सामने वाले कुम्हार की दुकान पर रखा मिट्टी का घोड़ा चाहिए। मैं गरीब हूँ, उसे खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं।" बूढ़े ने बिना कुछ कहे अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और वह मिट्टी का घोड़ा खरीदकर बच्चे को दे दिया। घोड़ा हाथ में मिलते ही बच्चा तुरंत चुप हो गया। उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई और वह खुशी-खुशी खेलने लगा।

अकबर यह दृश्य देखकर बोले, "बीरबल, इसमें क्या विशेष बात है? बच्चे तो अक्सर ऐसी ज़िद करते ही हैं।"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, अभी थोड़ा और धैर्य रखिए। यह तो केवल शुरुआत है।"

इतने में बाज़ार के दूसरे छोर से अचानक शोर सुनाई दिया। लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे। पता चला कि एक सांड किसी कारण से बेकाबू हो गया था। वह तेज़ी से दौड़ता हुआ बाज़ार की ओर आ रहा था। दुकानदार अपनी दुकानें छोड़कर भागने लगे। ग्राहक अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थान खोजने लगे। कुछ ही क्षणों में पूरा बाज़ार अस्त-व्यस्त हो गया।

अकबर ने तुरंत अपने सैनिकों को आदेश दिया, "जाओ, लोगों की रक्षा करो और उस सांड को काबू में करो।"

सैनिक तलवारें और भाले लेकर आगे बढ़े। काफी प्रयास के बाद उन्होंने सांड को रस्सियों से बाँध लिया। धीरे-धीरे बाज़ार में शांति लौट आई। अकबर ने संतोष की साँस ली और बोले, "देखा बीरबल, अंततः शक्ति तो सैनिकों की ही काम आई।"

बीरबल ने विनम्रता से कहा, "महाराज, सैनिकों ने साहस दिखाया, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन यदि लोग भयभीत होकर भागते नहीं, तो क्या सैनिकों को इतनी जल्दी हस्तक्षेप करना पड़ता? भय ने पूरे बाज़ार को एक क्षण में बदल दिया।"

अकबर कुछ सोचने लगे, पर उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

बाज़ार से लौटते समय बीरबल अकबर को नगर के बाहर स्थित खेतों की ओर ले गए। वहाँ किसान अपने परिवार के साथ खेतों में काम कर रहे थे। कोई हल चला रहा था, कोई बीज बो रहा था, तो कोई फसल की सिंचाई कर रहा था। अचानक आकाश में काले बादल छा गए। तेज़ हवा चलने लगी। कुछ ही मिनटों में मूसलाधार वर्षा आरंभ हो गई। किसान तुरंत अपना काम छोड़कर अपने अनाज और औज़ार सुरक्षित स्थान पर रखने लगे। कुछ लोग पेड़ों के नीचे छिप गए, तो कुछ अपनी झोपड़ियों की ओर दौड़ पड़े।

बारिश इतनी तेज़ थी कि थोड़ी ही देर में खेतों में पानी भर गया। बिजली चमकने लगी और बादलों की गड़गड़ाहट दूर-दूर तक सुनाई देने लगी। अकबर ने यह दृश्य देखा और बोले, "प्रकृति के सामने तो मनुष्य वास्तव में छोटा दिखाई देता है।"

बीरबल ने कहा, "जी महाराज। जब प्रकृति अपना रूप बदलती है, तब राजा और प्रजा दोनों को उसकी शक्ति स्वीकार करनी पड़ती है।"

बारिश रुकने के बाद दोनों आगे बढ़े। रास्ते में उन्होंने एक विशाल बरगद का पेड़ देखा। उसकी छाया में कई यात्री विश्राम कर रहे थे। कुछ लोग भोजन कर रहे थे, कुछ अपने पशुओं को आराम दे रहे थे। तभी अचानक तेज़ हवा का एक और झोंका आया। पेड़ की एक मोटी सूखी डाल टूटकर नीचे गिर गई। सौभाग्य से कोई उसके नीचे नहीं था। सभी लोग डरकर दूसरी ओर हट गए।

अकबर ने कहा, "प्रकृति की शक्ति सचमुच अद्भुत है।"

बीरबल मुस्कुराए, लेकिन उन्होंने अभी भी अपने अंतिम उत्तर का खुलासा नहीं किया।

संध्या होने लगी थी। दोनों वापस महल की ओर लौटने लगे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक साधु नदी के किनारे ध्यान में बैठा है। पास ही कुछ यात्री आपस में बहस कर रहे थे। बहस इतनी बढ़ गई कि वे एक-दूसरे पर क्रोधित होने लगे। साधु ने धीरे से आँखें खोलीं और बिना ऊँची आवाज़ किए केवल कुछ शांत शब्द बोले। आश्चर्य की बात यह थी कि उन यात्रियों का क्रोध धीरे-धीरे शांत हो गया। वे एक-दूसरे से क्षमा माँगकर मुस्कुराते हुए अपने-अपने रास्ते चले गए।

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, "बीरबल, इस साधु ने बिना किसी हथियार, बिना धन और बिना किसी पद के लोगों का क्रोध कैसे शांत कर दिया?"

बीरबल ने उत्तर दिया, "महाराज, कभी-कभी मधुर वचन और धैर्य ऐसी शक्ति रखते हैं, जो तलवार भी नहीं रखती।"

अब अकबर का मन और अधिक उत्सुक हो गया। उन्होंने कहा, "बीरबल, तुमने आज मुझे अनेक दृश्य दिखाए—बच्चे की ज़िद, लोगों का भय, प्रकृति की ताकत और साधु के शांत शब्द। लेकिन अभी तक तुमने यह नहीं बताया कि संसार में सबसे शक्तिशाली कौन है।"

बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, "जहाँपनाह, अंतिम उत्तर आपको कल प्रातः दरबार में दूँगा। आज आपने जो कुछ देखा है, वही उस उत्तर की नींव है।"

दरबार के साथ लौट रहे मंत्री आपस में बातें करने लगे। कुछ को लगा कि बीरबल जानबूझकर उत्तर टाल रहे हैं, जबकि कुछ समझ चुके थे कि वे किसी गहरे सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं। स्वयं अकबर भी रात भर यही सोचते रहे कि आखिर इन सभी घटनाओं में ऐसा कौन-सा सूत्र छिपा है जो संसार की सबसे बड़ी शक्ति को सिद्ध करता है।

अगली सुबह पूरे दरबार में असाधारण उत्सुकता थी। सभी की निगाहें बीरबल पर थीं। हर कोई जानना चाहता था कि आखिर उनका उत्तर क्या होगा और वे किसे संसार का सबसे शक्तिशाली घोषित करेंगे।

अगली सुबह शाही दरबार पहले से भी अधिक भव्य ढंग से सजा था। सभी मंत्री, सेनापति, विद्वान और दरबारी समय से पहले ही अपनी-अपनी जगह पर पहुँच चुके थे। हर किसी के मन में केवल एक ही प्रश्न था—आखिर बीरबल किसे संसार का सबसे शक्तिशाली बताएँगे? अकबर भी बड़ी उत्सुकता से अपने सिंहासन पर बैठे थे। जैसे ही बीरबल दरबार में पहुँचे, उन्होंने झुककर बादशाह को प्रणाम किया। अकबर मुस्कुराए और बोले, "बीरबल, अब और प्रतीक्षा मत कराओ। कल तुमने हमें अनेक घटनाएँ दिखाईं। अब बताओ कि तुम्हारे अनुसार संसार में सबसे शक्तिशाली कौन है?"

बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "जहाँपनाह, यदि हम केवल बल की बात करें, तो सेना शक्तिशाली है। यदि संपत्ति की बात करें, तो धन शक्तिशाली है। यदि प्रकृति को देखें, तो वह मनुष्य से कहीं अधिक शक्तिशाली है। यदि ज्ञान को देखें, तो वह अज्ञान को मिटा देता है। लेकिन इन सबसे ऊपर एक ऐसी शक्ति है जो इन सभी को सही या गलत दिशा में ले जा सकती है।"

पूरा दरबार ध्यान से सुनने लगा। बीरबल ने आगे कहा, "वह शक्ति है—मन और बुद्धि पर नियंत्रण। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है, वही वास्तव में सबसे शक्तिशाली है।"

दरबार में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। कुछ मंत्री एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। अकबर ने पूछा, "बीरबल, इसे स्पष्ट करके समझाओ।"

बीरबल ने उत्तर दिया, "महाराज, कल आपने उस छोटे बच्चे को देखा। उसकी इच्छा इतनी प्रबल थी कि खिलौना मिलने तक वह रोता रहा। फिर आपने लोगों को भय से भागते देखा। भय ने उनसे सोचने-समझने की शक्ति छीन ली। आपने वर्षा और आँधी में प्रकृति का प्रभाव देखा, और फिर उस साधु को देखा जिसने केवल शांत वचनों से क्रोधित लोगों के मन को बदल दिया। इन सभी घटनाओं में एक बात समान थी—मन। जब मन इच्छा, भय या क्रोध से भर जाता है, तब मनुष्य अपनी शक्ति खो देता है। लेकिन जो अपने मन को नियंत्रित कर लेता है, वह कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सही निर्णय ले सकता है।"

अकबर गहरी सोच में डूब गए। बीरबल आगे बोले, "एक राजा यदि अपने क्रोध पर नियंत्रण न रखे, तो वह निर्दोषों को दंड दे सकता है। एक सेनापति यदि भयभीत हो जाए, तो उसकी विशाल सेना भी हार सकती है। एक धनवान यदि लालच में पड़ जाए, तो उसका धन उसे विनाश की ओर ले जा सकता है। और एक विद्वान यदि अहंकार में डूब जाए, तो उसका ज्ञान भी व्यर्थ हो जाता है। इसलिए सबसे बड़ी शक्ति बाहरी नहीं, बल्कि भीतर की होती है।"

इतने में एक मंत्री ने आपत्ति जताई। उसने कहा, "यदि मन ही सबसे शक्तिशाली है, तो फिर युद्धों में तलवारें क्यों जीतती हैं?"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "तलवार स्वयं कभी युद्ध नहीं जीतती। उसे चलाने वाला मन जीतता है। यदि योद्धा का मन डगमगा जाए, तो सबसे तेज़ तलवार भी बेकार हो जाती है।"

मंत्री निरुत्तर हो गया।

बीरबल ने आगे कहा, "जहाँपनाह, इतिहास में अनेक ऐसे राजा हुए जिनके पास अपार धन और विशाल सेनाएँ थीं, फिर भी वे हार गए। दूसरी ओर ऐसे लोग भी हुए जिनके पास न धन था, न सेना, लेकिन दृढ़ संकल्प और संयम के कारण वे लोगों के हृदय जीत गए।"

अकबर ने पूछा, "तो क्या तुम यह कहना चाहते हो कि आत्मसंयम ही सबसे बड़ी शक्ति है?"

बीरबल ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "जी महाराज। जो अपने मन, वाणी और कर्म पर नियंत्रण रखता है, वही सबसे शक्तिशाली है। वह कठिनाइयों से घबराता नहीं, सफलता में अहंकार नहीं करता और असफलता में निराश नहीं होता।"

दरबार में बैठे सभी विद्वानों ने सहमति में सिर हिलाया। अकबर के चेहरे पर संतोष की मुस्कान फैल गई। उन्होंने कहा, "बीरबल, तुम्हारा उत्तर केवल बुद्धिमानी से भरा नहीं है, बल्कि जीवन का गहरा सत्य भी बताता है।"

अकबर अपने सिंहासन से उठे और बोले, "आज से मैं भी यह प्रयास करूँगा कि किसी भी निर्णय से पहले अपने मन और क्रोध पर नियंत्रण रखूँ। क्योंकि एक राजा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सेना नहीं, उसका संतुलित मन होता है।"

पूरा दरबार "वाह! वाह!" की आवाज़ से गूँज उठा। बीरबल की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा होने लगी। जो मंत्री उनसे ईर्ष्या करते थे, वे भी मन ही मन उनकी सूझबूझ का सम्मान करने लगे। अकबर ने प्रसन्न होकर बीरबल को बहुमूल्य रेशमी वस्त्र, स्वर्ण मुद्राएँ और सम्मान का प्रतीक एक सुंदर हार भेंट किया।

बीरबल ने विनम्रता से कहा, "जहाँपनाह, आपका विश्वास ही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।"

उस दिन के बाद अकबर जब भी किसी कठिन निर्णय का सामना करते, वे पहले स्वयं को शांत करते और फिर निर्णय लेते। धीरे-धीरे पूरे राज्य में यह बात प्रसिद्ध हो गई कि एक महान शासक वही है जो पहले स्वयं पर शासन करना सीखता है।

इस घटना से दरबारियों को भी एक अमूल्य शिक्षा मिली। उन्होंने समझ लिया कि बाहरी शक्ति सीमित होती है, जबकि आत्मसंयम और विवेक की शक्ति जीवन भर साथ रहती है। धन समाप्त हो सकता है, सेना पराजित हो सकती है, शरीर बूढ़ा हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, उसे कोई आसानी से पराजित नहीं कर सकता।

उस दिन के बाद जब भी दरबार में यह प्रश्न उठता कि संसार में सबसे शक्तिशाली कौन है, तो सभी मुस्कुराकर एक ही उत्तर देते—"सबसे शक्तिशाली वह है, जिसने स्वयं पर विजय प्राप्त कर ली हो।"

तो दोस्तों

सच्ची शक्ति धन, बल या पद में नहीं, बल्कि आत्मसंयम, विवेक और अपने मन पर नियंत्रण रखने में होती है। जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में सबसे शक्तिशाली होता है।

 

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