मुगल सम्राट अकबर अपने न्याय, उदारता और प्रजा-वत्सल स्वभाव के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध
थे। उनके दरबार में अनेक विद्वान, कवि, कलाकार और मंत्री उपस्थित रहते थे, परंतु उन सबमें बीरबल का
स्थान सबसे अलग था। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, न्यायप्रियता और मानवीय
संवेदनाओं के कारण सम्राट के अत्यंत प्रिय थे। वे केवल कठिन से कठिन पहेलियाँ ही
नहीं सुलझाते थे, बल्कि लोगों के जीवन में व्याप्त अन्याय और दुख को भी अपनी
बुद्धिमत्ता से दूर करने का प्रयास करते थे। इसी कारण जब भी किसी गरीब, असहाय या
पीड़ित व्यक्ति को कहीं से न्याय नहीं मिलता, तो उसकी अंतिम आशा बीरबल ही
होते थे। ऐसी ही एक घटना एक निर्धन ब्राह्मण से जुड़ी है, जिसने न केवल बीरबल की
चतुराई को सिद्ध किया, बल्कि यह भी बताया कि सच्चा न्याय वही है जिसमें दया,
विवेक और सत्य
का समन्वय हो।
आगरा नगर के एक छोटे से मोहल्ले में एक वृद्ध ब्राह्मण अपनी पत्नी और एकमात्र
पुत्री के साथ रहता था। उसका जीवन अत्यंत साधारण था। वह प्रतिदिन लोगों के घरों
में पूजा-पाठ कराता, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों में मंत्रोच्चार करता तथा बदले
में जो कुछ अन्न या थोड़ी-बहुत दक्षिणा मिलती, उसी से अपने परिवार का
पालन-पोषण करता। समय के साथ उसकी आय कम होती गई। लोग नए-नए पंडितों को बुलाने लगे
और वृद्धावस्था के कारण उसके लिए दूर-दूर तक जाना भी कठिन हो गया। कई बार ऐसा होता
कि पूरे दिन की मेहनत के बाद भी घर में इतना अन्न नहीं होता कि परिवार भरपेट भोजन
कर सके। फिर भी वह ईमानदारी और आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन बिताता था। उसने कभी
किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।
ब्राह्मण की पुत्री अब विवाह योग्य हो चुकी थी। वह अत्यंत संस्कारी, विनम्र और
गुणवान थी। माता-पिता उसकी शादी को लेकर चिंतित रहते थे। एक योग्य वर भी मिल गया
था, किंतु विवाह के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था करना उनके लिए असंभव प्रतीत हो रहा
था। ब्राह्मण ने अनेक परिचितों से सहायता माँगी, परंतु अधिकांश लोगों ने
अपनी असमर्थता जताई। कुछ लोगों ने सहायता का आश्वासन दिया, पर समय आने पर वे भी पीछे
हट गए। धीरे-धीरे उसकी चिंता बढ़ती गई। कई रातें उसने बिना सोए बिताईं। वह ईश्वर
से प्रार्थना करता कि कोई ऐसा मार्ग निकले जिससे उसकी पुत्री का विवाह
सम्मानपूर्वक हो सके।
उसी नगर में एक धनी साहूकार रहता था। वह अत्यंत संपन्न था, परंतु उतना ही
कंजूस और स्वार्थी भी। लोगों की मजबूरी का लाभ उठाना उसकी आदत थी। ब्राह्मण ने
सोचा कि यदि साहूकार कुछ धन उधार दे दे, तो विवाह संपन्न हो जाएगा और बाद में धीरे-धीरे
वह उसे चुका देगा। वह विनम्रता से साहूकार के पास पहुँचा और अपनी समस्या बताई।
साहूकार ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि वह धन देने को तैयार है, लेकिन बदले में
भारी ब्याज देगा और यदि समय पर धन वापस नहीं किया गया तो ब्राह्मण का छोटा-सा घर
भी उसके नाम हो जाएगा। मजबूरी में ब्राह्मण ने यह शर्त स्वीकार कर ली। विवाह की
तैयारी आरंभ हो गई और कुछ ही दिनों में उसकी पुत्री का विवाह सादगीपूर्ण ढंग से
संपन्न हो गया।
विवाह के बाद ब्राह्मण पूरी निष्ठा से धन लौटाने का प्रयास करने लगा। वह पहले
से अधिक मेहनत करता, अधिक से अधिक पूजा-पाठ स्वीकार करता और जो भी दक्षिणा मिलती,
उसका अधिकांश
भाग साहूकार को देता। कई महीनों की कठिन मेहनत के बाद उसने मूल धन और ब्याज का
अधिकांश हिस्सा चुका दिया। अंततः एक दिन उसने शेष राशि भी पूरी कर दी। साहूकार ने
धन तो ले लिया, लेकिन चालाकी से कोई लिखित प्रमाण या रसीद नहीं दी।
ब्राह्मण सीधा-सादा था। उसे विश्वास था कि धन लौट चुका है, इसलिए अब कोई समस्या नहीं
होगी।
कुछ सप्ताह बाद साहूकार अचानक ब्राह्मण के घर पहुँचा और ऊँची आवाज़ में बोला,
“तुमने मेरा
उधार अब तक नहीं चुकाया। यदि आज धन नहीं दिया तो तुम्हारा घर मेरे नाम हो जाएगा।”
ब्राह्मण यह सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने विनम्रता से कहा कि वह तो पूरा धन चुका
चुका है। साहूकार ने हँसते हुए कहा, “यदि धन चुका दिया है तो कोई प्रमाण दिखाओ। मेरे
हिसाब में अभी भी पूरा उधार बाकी है।” ब्राह्मण के पास कोई रसीद नहीं थी। आसपास के
लोग भी उस समय उपस्थित नहीं थे जब उसने अंतिम किस्त चुकाई थी। साहूकार इसी अवसर की
प्रतीक्षा कर रहा था। उसने अदालत में शिकायत कर दी।
मामला सम्राट अकबर के दरबार में पहुँचा। दरबार में दोनों पक्ष उपस्थित हुए।
साहूकार ने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि ब्राह्मण झूठ बोल रहा है और उसने उसका धन
नहीं लौटाया। उसने अपने बनाए हुए बही-खाते भी प्रस्तुत कर दिए, जिनमें
जानबूझकर गलत हिसाब लिखा गया था। दूसरी ओर ब्राह्मण के पास अपनी बात सिद्ध करने के
लिए कोई लिखित प्रमाण नहीं था। वह बार-बार यही कहता रहा कि उसने पूरी ईमानदारी से
धन लौटा दिया है। दरबार के कुछ लोग साहूकार के पक्ष में झुकने लगे क्योंकि उसके
पास कागज़ी प्रमाण थे। अकबर भी कुछ क्षणों के लिए दुविधा में पड़ गए।
तभी बीरबल ने दोनों की बातें ध्यान से सुनीं। उन्होंने ब्राह्मण के चेहरे की
सादगी और सच्चाई को देखा। दूसरी ओर साहूकार के व्यवहार में अहंकार और चालाकी
स्पष्ट दिखाई दे रही थी। बीरबल जानते थे कि केवल अनुमान के आधार पर निर्णय नहीं
दिया जा सकता। उन्हें ऐसा उपाय करना था जिससे सत्य स्वयं सामने आ जाए।
बीरबल ने साहूकार से पूछा, “क्या तुम यह शपथ लेकर कह सकते हो कि ब्राह्मण ने तुम्हें एक
भी रुपया वापस नहीं किया?” साहूकार तुरंत बोला, “हाँ, मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि
उसने मेरा धन नहीं लौटाया।” फिर बीरबल ने ब्राह्मण से वही प्रश्न किया। ब्राह्मण
ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “मैं ईश्वर को साक्षी मानकर कहता हूँ कि मैंने पूरा धन चुका
दिया है।” दोनों के कथन एक-दूसरे के विपरीत थे। दरबार में सन्नाटा छा गया।
बीरबल ने कुछ देर विचार किया और फिर साहूकार से कहा, “तुम्हारे बही-खाते बहुत
व्यवस्थित हैं। अवश्य ही तुम प्रत्येक लेन-देन का सही हिसाब रखते हो। कल प्रातः
अपने सभी पुराने हिसाब-किताब लेकर दरबार में आना।” साहूकार ने प्रसन्न होकर सहमति
दे दी। उसे विश्वास था कि उसके बनाए हुए झूठे रिकॉर्ड ही उसके पक्ष में निर्णय
दिला देंगे।
अगले दिन साहूकार भारी-भरकम बही-खाते लेकर दरबार पहुँचा। बीरबल ने उन्हें
ध्यानपूर्वक देखना आरंभ किया। उन्होंने पाया कि अधिकांश पृष्ठों पर अलग-अलग प्रकार
की स्याही और लेखनी का प्रयोग हुआ था। कुछ स्थानों पर लिखावट भी बदली हुई प्रतीत
हो रही थी। बीरबल ने बिना कुछ कहे दरबार के एक कुशल लेखक को बुलाया और उससे उन
पृष्ठों की लिखावट की तुलना करने को कहा। लेखक ने परीक्षण के बाद बताया कि कुछ
प्रविष्टियाँ बाद में जोड़ी गई लगती हैं। साहूकार घबराने लगा, पर अभी भी उसने
अपने चेहरे पर आत्मविश्वास बनाए रखा।
बीरबल ने फिर एक नया उपाय किया। उन्होंने साहूकार से कहा, “यदि तुम्हारा
दावा सत्य है तो तुम अवश्य बता सकते हो कि ब्राह्मण ने तुमसे धन किस दिन और किस
समय लिया था।” साहूकार ने तुरंत एक तिथि और समय बता दिया। इसके बाद बीरबल ने
ब्राह्मण से वही प्रश्न किया। ब्राह्मण ने भी वही तिथि बताई, पर समय थोड़ा
अलग बताया। बीरबल मुस्कुराए। उन्होंने नगर के कुछ लोगों को बुलवाया, जिनमें वह
व्यक्ति भी था जिसने उस दिन विवाह में भाग लिया था। गवाहों ने बताया कि जिस समय
साहूकार कह रहा है, उस समय वह स्वयं विवाह समारोह में उपस्थित था और वहीं उसने
ब्राह्मण को धन दिया था। इससे साहूकार के कथन में विरोधाभास स्पष्ट हो गया।
इसके बाद बीरबल ने साहूकार से पूछा, “जब ब्राह्मण ने तुम्हें अंतिम किस्त लौटाई,
तब तुम कहाँ थे?”
साहूकार बिना
सोचे-समझे बोल पड़ा, “वह तो कभी लौटा ही नहीं।” तभी बीरबल ने तुरंत कहा, “यदि उसने कभी
अंतिम किस्त लौटाई ही नहीं, तो तुम यह कैसे जानते हो कि वह किस दिन नहीं आया? और यदि वह नहीं
आया, तो तुम्हारी बही में बीच-बीच की किस्तों का हिसाब किस आधार पर लिखा गया है?”
साहूकार के
चेहरे का रंग उड़ गया। वह कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया।
बीरबल ने दरबार के सामने घोषणा की कि साहूकार ने लालच में आकर झूठे लेखे तैयार
किए हैं और एक गरीब ब्राह्मण की संपत्ति हड़पने का प्रयास किया है। उन्होंने आदेश
दिया कि बही-खातों की आगे जाँच की जाए। जाँच में यह सिद्ध हो गया कि कई
प्रविष्टियाँ बाद में जोड़ी गई थीं और उनमें हेरफेर किया गया था। अब साहूकार के
पास बचने का कोई मार्ग नहीं था। अंततः उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने कहा
कि उसे लगा था कि एक गरीब ब्राह्मण के पास कोई प्रमाण नहीं होगा, इसलिए वह आसानी
से उसका घर अपने नाम करा लेगा।
सम्राट अकबर साहूकार के छल से अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने आदेश दिया कि
साहूकार ब्राह्मण से सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगे। साथ ही उसे दंडस्वरूप पर्याप्त
धन गरीबों में दान करना होगा। ब्राह्मण का घर सुरक्षित घोषित कर दिया गया और
भविष्य में किसी प्रकार का झूठा दावा करने पर कठोर दंड की चेतावनी भी दी गई। अकबर
ने ब्राह्मण की ईमानदारी और संघर्ष से प्रभावित होकर राजकोष से उसकी आर्थिक सहायता
करने का भी आदेश दिया ताकि वह सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके।
ब्राह्मण की आँखों में कृतज्ञता के आँसू भर आए। उसने हाथ जोड़कर सम्राट अकबर
और बीरबल को धन्यवाद दिया। उसने कहा कि यदि न्याय न मिलता, तो वह अपना घर और सम्मान
दोनों खो देता। बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “सत्य को कभी भय नहीं होता।
कभी-कभी उसे सामने आने में समय अवश्य लगता है, पर अंत में विजय उसी की
होती है।” दरबार में उपस्थित सभी लोगों ने बीरबल की बुद्धिमत्ता और निष्पक्षता की
प्रशंसा की।
इस घटना के बाद पूरे नगर में यह संदेश फैल गया कि छल और लालच से अर्जित लाभ
अधिक समय तक नहीं टिकता। लोग समझ गए कि झूठे प्रमाण बनाकर किसी निर्दोष को फँसाना
अंततः स्वयं के लिए ही संकट का कारण बनता है। साहूकार ने भी अपने व्यवहार में
परिवर्तन किया। उसने लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना आरंभ किया और
जरूरतमंदों की सहायता करने लगा। दूसरी ओर ब्राह्मण ने अपनी सरलता बनाए रखी,
किंतु अब वह
प्रत्येक लेन-देन का लिखित प्रमाण अवश्य लेने लगा ताकि भविष्य में कोई उसे धोखा न
दे सके।
सम्राट अकबर ने उस दिन दरबार में उपस्थित सभी मंत्रियों से कहा कि न्याय केवल
कागज़ों से नहीं होता, बल्कि सत्य को पहचानने वाली बुद्धि भी आवश्यक होती है। यदि
न्यायाधीश केवल बाहरी प्रमाणों पर निर्भर रहें और विवेक का उपयोग न करें, तो अनेक
निर्दोष लोग अन्याय का शिकार हो सकते हैं। बीरबल ने अपनी सूझबूझ से यह सिद्ध कर
दिया कि न्याय का उद्देश्य केवल विवाद समाप्त करना नहीं, बल्कि सत्य की रक्षा करना
है।
समय बीतता गया, पर यह कथा लोगों की स्मृति में जीवित रही। माता-पिता अपने
बच्चों को यह कहानी सुनाकर सिखाने लगे कि ईमानदारी सबसे बड़ा धन है, लालच मनुष्य को
पतन की ओर ले जाता है और बुद्धिमत्ता का सर्वोत्तम उपयोग दूसरों की सहायता करने
में है। गरीब ब्राह्मण की सहायता की यह घटना अकबर और बीरबल की उन अमर कथाओं में
गिनी जाने लगी, जिनमें न्याय, करुणा, सत्य और चतुराई का अद्भुत मेल दिखाई देता है। यह
कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य, धैर्य और न्याय
पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। अंततः विजय उसी की होती है जो ईमानदार होता है और
दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है।
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