मुगल सम्राट अकबर का दरबार केवल अपनी शानो-शौकत के लिए ही नहीं, बल्कि
न्यायप्रियता और बुद्धिमान मंत्रियों के लिए भी प्रसिद्ध था। उस दरबार में सबसे
अधिक सम्मान जिस व्यक्ति को प्राप्त था, वह था बीरबल। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, चतुराई और
निष्पक्ष निर्णयों के कारण पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। लोग दूर-दूर से अपनी
समस्याएँ लेकर दरबार में आते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यदि बीरबल न्याय करेंगे,
तो किसी के साथ
अन्याय नहीं होगा। अकबर स्वयं भी कठिन से कठिन मामलों में बीरबल की सलाह लेना पसंद
करते थे। एक दिन ऐसा ही एक विचित्र मामला दरबार में आया जिसने सभी दरबारियों को
उलझन में डाल दिया।
उस दिन दरबार पूरी भव्यता के साथ सजा हुआ था। मंत्री, सेनापति, विद्वान और
राज्य के अधिकारी अपने-अपने स्थान पर बैठे थे। तभी दो व्यक्ति दरबार में पहुँचे।
पहला व्यक्ति एक धनी व्यापारी था जिसका नाम धनराज था। दूसरा व्यक्ति एक साधारण
किसान था जिसका नाम हरिदास था। दोनों के चेहरों पर चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
अकबर ने उन्हें आगे आने का संकेत दिया और अपनी समस्या बताने को कहा।
धनराज ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज, कुछ महीने पहले मैंने इस किसान हरिदास को सौ
सोने की अशर्फियाँ उधार दी थीं। उसने वादा किया था कि फसल बिकने के बाद वह पूरी
राशि लौटा देगा। अब उसकी फसल बिक चुकी है, लेकिन वह मेरा धन लौटाने से इनकार कर रहा
है।"
हरिदास ने तुरंत विरोध करते हुए कहा, "जहाँपनाह, यह सरासर झूठ
है। मैंने धनराज से कभी कोई उधार नहीं लिया। यह मुझे झूठे आरोप में फँसाकर मेरा
सम्मान नष्ट करना चाहता है।"
दरबार में हलचल मच गई। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। अकबर ने गंभीर
स्वर में पूछा, "क्या तुम्हारे पास कोई प्रमाण है?"
धनराज मुस्कुराया और बोला, "जी हाँ महाराज। मेरे पास दो गवाह हैं जिन्होंने
अपनी आँखों से मुझे हरिदास को अशर्फियाँ देते हुए देखा था।"
यह सुनकर अकबर ने गवाहों को बुलाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में दो व्यक्ति
दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि उन्होंने धनराज को
हरिदास को सौ अशर्फियाँ देते हुए देखा था।
अकबर ने उनकी बातें ध्यान से सुनीं। पहली नज़र में मामला व्यापारी के पक्ष में
जाता दिखाई दे रहा था, क्योंकि उसके पास दो गवाह थे। लेकिन बीरबल शांत बैठे सब कुछ
देख रहे थे। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, मानो उन्हें इस कहानी में
कुछ असामान्य दिखाई दे रहा हो।
बीरबल ने दोनों गवाहों की ओर देखा और विनम्रता से पूछा, "तुम दोनों ने
यह घटना कब देखी थी?"
पहले गवाह ने उत्तर दिया, "लगभग तीन महीने पहले।"
दूसरे ने भी तुरंत कहा, "जी हाँ, ठीक तीन महीने पहले।"
बीरबल ने अगला प्रश्न किया, "घटना कहाँ हुई थी?"
पहले गवाह ने कहा, "गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे।"
दूसरे ने भी उसकी बात का समर्थन किया।
बीरबल ने सिर हिलाया, लेकिन उनकी आँखों में जिज्ञासा और बढ़ गई। उन्होंने पूछा,
"उस समय मौसम कैसा था?"
पहले गवाह ने कहा, "बहुत तेज धूप थी।"
दूसरे ने कहा, "जी, धूप इतनी तेज थी कि हम पेड़ की छाया में खड़े थे।"
बीरबल ने मुस्कुराते हुए अगला प्रश्न किया, "उस दिन हरिदास ने कौन से
रंग के कपड़े पहने थे?"
पहला गवाह बोला, "उसने सफेद धोती और नीली पगड़ी पहनी थी।"
दूसरे ने तुरंत कहा, "नहीं, उसने हरी पगड़ी पहनी थी।"
दरबार में बैठे लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों गवाहों के उत्तर अलग-अलग
थे।
बीरबल ने बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अगला प्रश्न किया, "और धनराज ने
अशर्फियाँ किस थैली में रखी थीं?"
पहले गवाह ने कहा, "लाल रंग की रेशमी थैली में।"
दूसरा बोला, "वह चमड़े की भूरी थैली थी।"
अब दरबारियों के चेहरे पर आश्चर्य साफ दिखाई देने लगा। दोनों गवाह छोटी-छोटी
बातों में अलग-अलग उत्तर दे रहे थे।
लेकिन बीरबल अभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा, "तुम दोनों कुछ
देर के लिए अलग-अलग कमरों में चले जाओ। मैं तुमसे अलग-अलग प्रश्न पूछूँगा।"
दोनों गवाहों को अलग कर दिया गया।
पहले गवाह से बीरबल ने पूछा, "जब धनराज ने अशर्फियाँ दीं, तब वहाँ कितने
लोग मौजूद थे?"
उसने उत्तर दिया, "हम दोनों और ये दोनों व्यक्ति, कुल चार लोग।"
दूसरे गवाह से यही प्रश्न पूछा गया तो उसने उत्तर दिया, "वहाँ पाँच लोग
थे। एक राहगीर भी खड़ा था।"
अब बीरबल को पूरा विश्वास हो गया कि दोनों झूठ बोल रहे हैं।
वे दोनों को वापस दरबार में ले आए। बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "तुम दोनों ने
दावा किया था कि तुमने अपनी आँखों से घटना देखी है। यदि ऐसा होता, तो तुम्हारे
उत्तर एक जैसे होते। लेकिन तुम कपड़ों के रंग, थैली के प्रकार, वहाँ उपस्थित
लोगों की संख्या और कई अन्य बातों पर अलग-अलग बयान दे रहे हो। इसका अर्थ है कि तुम
दोनों सच्चे गवाह नहीं, बल्कि नकली गवाह हो।"
यह सुनते ही दोनों गवाह घबरा गए। उनके चेहरे का रंग उड़ गया। पूरा दरबार उनकी
ओर देखने लगा। अकबर भी बड़ी उत्सुकता से बीरबल की ओर देख रहे थे।
दोनों गवाहों के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई देने लगी। उनके माथे पर पसीने की
बूंदें चमक रही थीं। दरबार में बैठे सभी लोग समझ चुके थे कि बीरबल को कुछ
महत्वपूर्ण सुराग मिल चुका है। अकबर ने उत्सुकता से बीरबल की ओर देखा और कहा,
"बीरबल, क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि ये दोनों झूठ बोल रहे हैं?"
बीरबल ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "जहाँपनाह, सत्य बोलने
वाले व्यक्ति को अपनी बात याद रखने के लिए सोचने की आवश्यकता नहीं होती। वह हर बार
वही बात कहता है क्योंकि उसने वही देखा होता है। लेकिन जो झूठ बोलता है, उसे हर उत्तर
सोचकर देना पड़ता है, और इसी कारण उसके कथनों में विरोधाभास आ जाता है।"
धनराज ने तुरंत बीच में बोलते हुए कहा, "महाराज, छोटी-मोटी
बातों में अंतर होना स्वाभाविक है। इतने महीने पुरानी घटना कौन पूरी तरह याद रख
सकता है? इसका अर्थ यह नहीं कि मेरे गवाह झूठे हैं।"
बीरबल मुस्कुराए। उन्होंने कहा, "यदि केवल एक-दो बातों में अंतर होता, तो तुम्हारी
बात मान ली जाती। लेकिन यहाँ तो हर महत्वपूर्ण विवरण अलग है। फिर भी मैं बिना
पूर्ण प्रमाण के किसी को दोषी नहीं ठहराऊँगा।"
उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि दोनों गवाहों को अलग-अलग कमरों में रखा जाए
और किसी को भी उनसे मिलने न दिया जाए।
अब बीरबल ने हरिदास को अपने पास बुलाया और पूछा, "सच-सच बताओ, क्या तुमने कभी
धनराज से धन लिया था?"
हरिदास ने बिना घबराए उत्तर दिया, "नहीं मंत्रीवर। मैं गरीब
अवश्य हूँ, लेकिन कभी झूठ नहीं बोलता। यदि मैंने धन लिया होता, तो चाहे खेत बेचने पड़ते,
मैं लौटा
देता।"
बीरबल ने उसकी आँखों में देखा। उनमें डर तो था, पर अपराधबोध नहीं था। दूसरी
ओर धनराज बार-बार अपने वस्त्र ठीक कर रहा था और बेचैनी से इधर-उधर देख रहा था।
कुछ देर बाद बीरबल ने पहले गवाह को अकेले दरबार में बुलवाया।
उन्होंने कहा, "यदि तुम सच बोल रहे हो, तो तुम्हें डरने की
आवश्यकता नहीं। बस एक प्रश्न का उत्तर दो—जब धनराज ने अशर्फियाँ दीं, तब हरिदास ने
उन्हें किस हाथ से लिया था?"
गवाह कुछ क्षण सोचता रहा। फिर बोला, "दाएँ हाथ से।"
बीरबल ने सिर हिलाया और उसे बाहर भेज दिया।
अब दूसरे गवाह को बुलाया गया।
बीरबल ने वही प्रश्न दोहराया।
दूसरे गवाह ने बिना सोचे कहा, "बाएँ हाथ से।"
दरबार में बैठे लोगों के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। दोनों गवाह एक बार फिर
अलग-अलग उत्तर दे चुके थे।
लेकिन बीरबल अभी भी अंतिम प्रहार करना चाहते थे।
उन्होंने सैनिकों से कहा कि दोनों गवाहों को सामने लाया जाए।
बीरबल बोले, "तुम दोनों कहते हो कि तुम उस समय वहाँ उपस्थित थे। अच्छा
बताओ, धनराज ने अशर्फियाँ गिनकर दी थीं या बिना गिने?"
पहला गवाह बोला, "उन्होंने एक-एक अशर्फी गिनकर दी थी।"
दूसरा तुरंत बोला, "नहीं, पूरी थैली एक साथ दे दी थी।"
अब दरबार में बैठे लोग अपनी हँसी नहीं रोक पाए। दोनों गवाहों की कहानी हर
प्रश्न के साथ बदलती जा रही थी।
अकबर का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने धनराज की ओर देखते हुए कहा,
"क्या तुम्हारे पास इन गवाहों के अतिरिक्त कोई प्रमाण है?"
धनराज कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, "नहीं जहाँपनाह, यही दोनों गवाह
मेरे प्रमाण हैं।"
बीरबल ने कहा, "महाराज, यदि अनुमति हो तो मैं एक अंतिम परीक्षा लेना चाहता
हूँ।"
अकबर ने सहमति दे दी।
बीरबल ने एक बड़ी थैली मँगवाई और उसमें कुछ पत्थर भर दिए। फिर उसे कपड़े से
ढँक दिया ताकि कोई अंदर न देख सके।
उन्होंने पहले गवाह से कहा, "इस थैली को उठाकर बताओ कि इसमें क्या है।"
गवाह ने थैली उठाई और बोला, "लगता है इसमें सिक्के हैं।"
फिर दूसरे गवाह से वही प्रश्न पूछा गया।
उसने कहा, "इसमें शायद अनाज है।"
बीरबल ने थैली खोल दी। उसमें केवल पत्थर थे।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "जिस व्यक्ति ने कभी अशर्फियों से भरी थैली उठाई
ही नहीं, वह उसका भार कैसे पहचान सकता है? तुम दोनों ने तो केवल धनराज की कही हुई कहानी
याद की थी। इसलिए हर प्रश्न पर नया उत्तर देते रहे।"
अब दोनों गवाहों की हिम्मत टूट गई।
पहला गवाह काँपते हुए बोला, "महाराज, हमें क्षमा कर दीजिए।"
दूसरा भी घुटनों के बल बैठ गया।
"सच यह है कि हमने कोई घटना नहीं देखी थी। धनराज ने हमें कुछ
सोने के सिक्कों का लालच देकर झूठी गवाही देने के लिए तैयार किया था।"
पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
अकबर ने क्रोध से धनराज की ओर देखा। व्यापारी का चेहरा पीला पड़ चुका था। अब
उसके पास अपने बचाव में कहने के लिए कुछ भी नहीं था।
दोनों गवाहों की स्वीकारोक्ति सुनकर पूरा दरबार स्तब्ध रह गया। कुछ क्षण पहले
तक जो लोग बड़े आत्मविश्वास के साथ स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बता रहे थे, वे अब सिर
झुकाए अपराधी की तरह खड़े थे। दरबारियों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई। सभी बीरबल की
बुद्धिमानी की प्रशंसा कर रहे थे। सम्राट अकबर गंभीर मुद्रा में सिंहासन पर बैठे
थे। उनकी आँखों में क्रोध स्पष्ट दिखाई दे रहा था, क्योंकि उनके दरबार में झूठ
बोलकर न्याय को भ्रमित करने का प्रयास किया गया था।
अकबर ने कठोर स्वर में कहा, "सच-सच बताओ, यह सब कैसे हुआ? यदि अब भी
तुमने झूठ बोला, तो दंड और भी कठोर होगा।"
पहला गवाह काँपते हुए बोला, "जहाँपनाह, हम दोनों पड़ोसी गाँव के
रहने वाले हैं। कुछ दिन पहले धनराज हमारे पास आया था। उसने कहा कि यदि हम उसके
पक्ष में गवाही देंगे तो वह हम दोनों को पाँच-पाँच सोने की अशर्फियाँ देगा। लालच
में आकर हमने उसकी बात मान ली।"
दूसरे गवाह ने भी सिर झुकाकर कहा, "हमने कभी हरिदास को धन लेते
नहीं देखा। हमें केवल कहानी याद कराई गई थी। लेकिन बीरबल जी के प्रश्न इतने
अलग-अलग थे कि हम झूठ को संभाल नहीं पाए।"
अब अकबर की दृष्टि धनराज पर पड़ी। व्यापारी के चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह
समझ गया था कि अब उसके बचने की कोई संभावना नहीं है।
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "धनराज, अब तुम्हारे पास सत्य स्वीकार करने के अतिरिक्त
कोई मार्ग नहीं है।"
कुछ क्षण तक वह मौन खड़ा रहा। फिर धीरे-धीरे उसके होंठ काँपे और उसने कहा,
"महाराज... मुझसे भूल हो गई। मैंने हरिदास को कोई धन नहीं दिया था। मैं उसकी
उपजाऊ जमीन खरीदना चाहता था, लेकिन उसने बेचने से मना कर दिया। तब मैंने सोचा कि यदि उस
पर कर्ज का झूठा आरोप लगा दूँ, तो मजबूर होकर वह अपनी जमीन बेच देगा। इसी उद्देश्य से
मैंने इन दोनों को झूठी गवाही देने के लिए धन का लालच दिया।"
यह सुनते ही दरबार में उपस्थित सभी लोग क्रोधित हो उठे। हरिदास की आँखों में
आँसू आ गए। वह सोच भी नहीं सकता था कि उसकी ईमानदारी को इस प्रकार झूठे आरोपों में
फँसाया जाएगा।
अकबर ने हरिदास को अपने पास बुलाया और पूछा, "क्या यह बात सत्य है कि
धनराज तुम्हारी जमीन खरीदना चाहता था?"
हरिदास ने विनम्रता से उत्तर दिया, "जी महाराज। मेरे पूर्वजों
की वही एकमात्र जमीन है। मैंने उसे बेचने से मना कर दिया था। उसके बाद से धनराज
मुझसे नाराज़ रहने लगा।"
बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह, अब इस पूरे मामले की हर कड़ी स्पष्ट हो चुकी है। धनराज ने
लालच और स्वार्थ में आकर एक निर्दोष किसान पर झूठा आरोप लगाया। उसने न्यायालय को
धोखा देने के लिए नकली गवाह तैयार किए। यदि आज सत्य सामने न आता, तो एक निर्दोष
व्यक्ति को भारी अन्याय सहना पड़ता।"
अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, "जिस राज्य में न्याय बिकने लगे, वहाँ प्रजा का
विश्वास समाप्त हो जाता है। इसलिए ऐसे अपराध को क्षमा नहीं किया जा सकता।"
उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि धनराज को गिरफ्तार कर लिया जाए।
सैनिक तुरंत आगे बढ़े और धनराज को बंदी बना लिया। उसके चेहरे पर पछतावा साफ
दिखाई दे रहा था।
इसके बाद अकबर ने दोनों नकली गवाहों की ओर देखा और बोले, "तुम लोगों ने
धन के लालच में झूठ बोलकर न्याय की मर्यादा का अपमान किया है। यदि प्रत्येक
व्यक्ति धन के लिए झूठी गवाही देने लगे, तो किसी निर्दोष को न्याय नहीं मिल सकेगा।"
दोनों गवाह हाथ जोड़कर क्षमा माँगने लगे।
उन्होंने कहा, "महाराज, हमसे बहुत बड़ी भूल हुई। हमें अपने अपराध का पश्चाताप है।
कृपया हमें एक अवसर और दें।"
बीरबल ने अकबर से कहा, "जहाँपनाह, इन लोगों ने अपराध अवश्य किया है, लेकिन इन्होंने अंत में
सत्य स्वीकार कर लिया। यदि इन्हें ऐसा दंड दिया जाए जिससे ये स्वयं भी सबक सीखें
और समाज को भी शिक्षा मिले, तो अधिक उचित होगा।"
अकबर ने कुछ क्षण विचार किया और फिर अपना निर्णय सुनाया।
उन्होंने कहा, "धनराज पर पचास सोने की अशर्फियों का जुर्माना लगाया जाता
है। यह राशि हरिदास को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जाएगी, क्योंकि उसे झूठे आरोपों के
कारण मानसिक कष्ट सहना पड़ा। इसके अतिरिक्त धनराज को एक महीने तक नगर के सार्वजनिक
कार्यों में श्रम करना होगा ताकि उसे अपने अपराध का एहसास हो।"
फिर उन्होंने दोनों गवाहों की ओर देखकर कहा, "तुम दोनों को भी दंडस्वरूप
एक सप्ताह तक नगर के धर्मशाला और अनाथालय में सेवा करनी होगी। साथ ही पूरे नगर के
सामने यह स्वीकार करना होगा कि झूठी गवाही देना सबसे बड़ा अपराध है।"
दोनों गवाहों ने सिर झुकाकर दंड स्वीकार कर लिया।
हरिदास ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज, आज यदि बीरबल जी न होते, तो मैं निर्दोष होकर भी
अपराधी घोषित कर दिया जाता। मैं जीवन भर आपका और बीरबल जी का आभारी रहूँगा।"
अकबर मुस्कुराए और बोले, "हरिदास, न्याय तभी सच्चा होता है जब वह सत्य पर आधारित हो।"
इसके बाद उन्होंने बीरबल की ओर देखकर कहा, "बीरबल, एक बार फिर
तुमने अपनी बुद्धिमानी से न केवल एक निर्दोष की रक्षा की, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया
कि झूठ चाहे कितना ही चतुर क्यों न हो, सत्य के सामने अधिक देर तक टिक नहीं सकता।"
पूरा दरबार "वाह! वाह!" की आवाज़ से गूँज उठा। सभी दरबारियों ने
बीरबल की प्रशंसा की। कई लोग आश्चर्यचकित थे कि केवल कुछ सरल प्रश्नों के माध्यम
से उन्होंने नकली गवाहों की पोल खोल दी।
उस दिन के बाद पूरे राज्य में यह घटना चर्चा का विषय बन गई। लोग अपने बच्चों
को यह कहानी सुनाते और बताते कि न्यायालय में झूठ बोलना केवल कानून का नहीं,
बल्कि समाज और
सत्य का भी अपमान है। नकली गवाहों ने भी अपना जीवन बदल लिया। उन्होंने कभी फिर
किसी के लालच में आकर झूठी गवाही नहीं दी। धनराज ने भी अपने अपराध से शिक्षा ली और
ईमानदारी के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
बीरबल का यह निर्णय वर्षों तक लोगों को याद रहा। इससे यह संदेश पूरे राज्य में
फैल गया कि सच्चाई को छिपाने के लिए चाहे कितने ही झूठ
क्यों न बोले जाएँ, बुद्धि, धैर्य और न्याय के सामने अंततः सत्य की ही विजय
होती है।
तो दोस्तों
"झूठे गवाह और झूठे प्रमाण कुछ समय के लिए सत्य को छिपा सकते
हैं, लेकिन बुद्धिमानी, धैर्य और निष्पक्ष न्याय के सामने अंततः सत्य की ही जीत
होती है। ईमानदारी सबसे बड़ी ताकत है, जबकि लालच और झूठ अंत में
केवल अपमान और दंड ही देते हैं।"
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