मुगल सम्राट अकबर अपने न्याय, दया और बुद्धिमानी के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध थे।
उनके दरबार में अनेक विद्वान, सेनापति और मंत्री उपस्थित रहते थे, लेकिन उनमें सबसे अधिक
सम्मान जिस व्यक्ति को प्राप्त था, वह था बीरबल। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, निष्पक्ष
निर्णय और सच्चाई के प्रति अटूट विश्वास के कारण पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। अकबर
अक्सर कहा करते थे कि किसी भी राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सेना या खजाना नहीं,
बल्कि उसकी
प्रजा की ईमानदारी होती है। यदि लोग सत्य बोलें, मेहनत करें और न्याय का साथ
दें, तो राज्य स्वयं समृद्ध हो जाता है। एक दिन दरबार में इसी विषय पर चर्चा चल रही
थी। कुछ मंत्री कह रहे थे कि आजकल लोगों में ईमानदारी कम होती जा रही है और
अधिकांश लोग अवसर मिलने पर बेईमानी कर बैठते हैं। अकबर ने बीरबल की ओर देखा और
पूछा, "क्या वास्तव में आज के समय में सच्ची ईमानदारी मिलना कठिन है?" बीरबल
मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, ईमानदारी कभी समाप्त नहीं होती। वह केवल परीक्षा की
प्रतीक्षा करती है। जब कठिन परिस्थिति आती है, तभी मनुष्य का वास्तविक
चरित्र सामने आता है।"
बीरबल की बात सुनकर अकबर ने कहा, "यदि ऐसा है तो मैं स्वयं यह
देखना चाहता हूँ कि हमारे राज्य में कितने लोग वास्तव में ईमानदार हैं।"
बीरबल ने सुझाव दिया कि बिना किसी को बताए एक छोटी-सी परीक्षा ली जाए। अकबर को यह
विचार पसंद आया। अगले दिन दोनों साधारण व्यापारियों का वेश धारण करके राजधानी से
दूर स्थित एक व्यस्त कस्बे की ओर निकल पड़े। वहाँ का बाज़ार बहुत प्रसिद्ध था।
दूर-दूर से व्यापारी अपने सामान बेचने आते थे। कोई अनाज बेच रहा था, कोई कपड़ा,
कोई मिट्टी के
बर्तन, तो कोई मसाले। चारों ओर लोगों की भीड़ थी। हर कोई अपने काम में व्यस्त दिखाई
दे रहा था।
बाज़ार के बीचों-बीच एक गरीब युवक बैठा था, जिसका नाम मोहन था। वह
लकड़ी से बने छोटे-छोटे खिलौने बेचता था। उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन उसके
चेहरे पर आत्मविश्वास और संतोष साफ दिखाई देता था। उसके पास बहुत अधिक ग्राहक नहीं
आते थे, फिर भी वह किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता था। जो ग्राहक उसके पास आता,
वह मुस्कुराकर
उसका स्वागत करता। अकबर ने उसे ध्यान से देखा और बीरबल से कहा, "यह युवक बहुत
शांत स्वभाव का लगता है।" बीरबल ने उत्तर दिया, "कभी-कभी सच्चे गुण सबसे
साधारण लोगों में छिपे होते हैं।"
अकबर ने अपनी योजना के अनुसार सोने के सिक्कों से भरी एक छोटी थैली उसी स्थान
के पास गिरा दी जहाँ मोहन बैठा था। थैली भारी थी और उसमें चमचमाते हुए सोने के
सिक्के थे। बाज़ार की भीड़ में किसी का ध्यान उस पर नहीं गया। कुछ ही देर बाद मोहन
की नज़र उस थैली पर पड़ी। उसने उसे उठाया और चारों ओर देखने लगा। वह समझ गया कि
किसी यात्री या व्यापारी की यह बहुमूल्य थैली गिर गई होगी। उसके मन में एक क्षण के
लिए विचार आया कि यदि वह यह धन रख ले, तो उसके परिवार की गरीबी दूर हो सकती है। उसकी
बूढ़ी माँ की दवा, छोटी बहन की पढ़ाई और घर की मरम्मत सब हो सकती थी। लेकिन
अगले ही क्षण उसके मन की आवाज़ ने कहा, "जो धन मेरा नहीं है,
उसे रखना चोरी
के समान है।"
मोहन ने थैली अपने पास रख ली, लेकिन उसे छिपाया नहीं। वह वहीं बैठा रहा और हर आने-जाने
वाले व्यक्ति से पूछने लगा, "क्या किसी की सोने के सिक्कों की थैली खो गई है?"
कई लोगों ने
लालच में झूठ बोलने का प्रयास किया, लेकिन मोहन हर व्यक्ति से थैली का रंग, उसमें बँधे
धागे और सिक्कों की संख्या पूछता। कोई भी सही उत्तर नहीं दे पाया। वह किसी भी हालत
में थैली गलत व्यक्ति को नहीं देना चाहता था।
कुछ देर बाद अकबर और बीरबल वापस उसी स्थान पर आए। अकबर ने व्यापारी बनकर कहा,
"भाई, मेरी एक थैली कहीं गिर गई है। उसमें मेरी जीवन भर की कमाई थी।" मोहन ने
शांत स्वर में पूछा, "उस थैली का रंग क्या था? उस पर किस प्रकार का धागा
बँधा था और उसमें कितने सिक्के थे?" अकबर ने वही विवरण बताया जो वास्तव में थैली का
था। मोहन ने बिना किसी हिचकिचाहट के थैली उन्हें लौटा दी। उसने न तो कोई इनाम
माँगा और न ही किसी प्रकार का अहसान जताया।
अकबर ने उसकी परीक्षा लेने के लिए कहा, "तुमने इतनी बड़ी धनराशि
लौटाकर बहुत बड़ी भूल की है। यदि तुम इसे रख लेते, तो कोई तुम्हें पकड़ नहीं
सकता था।" मोहन मुस्कुराया और बोला, "मालिक, संसार की अदालत
से बचा जा सकता है, लेकिन अपने अंतःकरण से नहीं। यदि मैं यह धन रख लेता,
तो शायद मेरा
घर बन जाता, लेकिन मेरा चरित्र टूट जाता। मैं गरीबी में रह सकता हूँ, पर बेईमान बनकर
नहीं।"
बीरबल ने उसकी बात सुनकर संतोष से अकबर की ओर देखा। लेकिन परीक्षा अभी पूरी
नहीं हुई थी। अकबर ने पास ही खड़े एक व्यक्ति को संकेत किया। वह व्यक्ति दरअसल
शाही सैनिक था, जो साधारण कपड़ों में आया था। उसने अचानक दावा किया कि थैली
उसी की है। उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "यह थैली मेरी है। इस युवक
ने मुझे देने से मना कर दिया है।" बाज़ार में भीड़ इकट्ठी हो गई। लोग अलग-अलग
बातें करने लगे।
मोहन घबराया नहीं। उसने शांत स्वर में कहा, "यदि यह थैली आपकी है,
तो कृपया इसमें
बँधे धागे का रंग, सिक्कों की संख्या और अंदर रखी छोटी-सी चाँदी की अंगूठी का
वर्णन कीजिए।" सैनिक कोई उत्तर नहीं दे पाया। तब लोगों को समझ में आ गया कि
वह झूठ बोल रहा है। सभी ने मोहन की ईमानदारी की प्रशंसा की।
अकबर ने अपनी पहचान प्रकट की। सम्राट को सामने देखकर पूरा बाज़ार स्तब्ध रह
गया। सभी लोगों ने झुककर प्रणाम किया। मोहन भी घबरा गया और हाथ जोड़कर खड़ा हो
गया। अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा, "डरो मत। आज हमने तुम्हारी परीक्षा ली थी और तुम
उसमें पूरी तरह सफल हुए हो।"
अकबर ने पूछा, "तुम्हारी आर्थिक स्थिति इतनी कठिन है, फिर भी तुमने
लालच क्यों नहीं किया?" मोहन ने उत्तर दिया, "महाराज, मेरे पिता कहा
करते थे कि ईमानदारी सबसे बड़ी पूँजी होती है। धन आज है, कल नहीं रहेगा, लेकिन चरित्र
जीवन भर साथ रहता है। यदि मैं बेईमानी करता, तो शायद कुछ समय के लिए सुख
मिलता, लेकिन मैं स्वयं की नज़रों में गिर जाता।"
दरबार में लौटने पर अकबर ने मोहन को भी साथ चलने का निमंत्रण दिया। अगले दिन
पूरे दरबार के सामने अकबर ने उसकी कहानी सुनाई। कई दरबारी आश्चर्यचकित रह गए। कुछ
मंत्रियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने सोचा था कि कोई भी व्यक्ति इतना धन देखकर
स्वयं को रोक नहीं पाएगा। बीरबल ने कहा, "यही कारण है कि किसी मनुष्य
का मूल्य उसके वस्त्रों, धन या पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से आँकना चाहिए।"
अकबर ने मोहन को सम्मानपूर्वक अपने पास बुलाया और कहा, "तुम्हारी
ईमानदारी केवल तुम्हारा नहीं, बल्कि पूरे राज्य का गौरव है।" उन्होंने उसे पुरस्कार
स्वरूप पर्याप्त धन, एक सुंदर घर और लकड़ी के खिलौनों का बड़ा कार्यशाला स्थापित
करने के लिए सहायता प्रदान की। साथ ही यह भी कहा कि यह पुरस्कार उसकी ईमानदारी की
कीमत नहीं, बल्कि उसके आदर्श चरित्र के सम्मान का प्रतीक है।
मोहन ने विनम्रता से कहा, "महाराज, मैं आपका आभारी हूँ, लेकिन यदि अनुमति हो तो मैं
इस धन का एक भाग अपने गाँव के विद्यालय और गरीब बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना
चाहता हूँ।" अकबर उसकी बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने घोषणा की कि
राज्य के प्रत्येक जिले में ऐसे लोगों को सम्मानित किया जाएगा जो कठिन परिस्थितियों
में भी सत्य और ईमानदारी का साथ दें।
बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, "जहाँपनाह, ईमानदार व्यक्ति केवल स्वयं
अच्छा नहीं बनता, बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी सत्य के मार्ग पर चलने की
प्रेरणा देता है। एक दीपक स्वयं जलता है, लेकिन अनेक दीपकों को प्रकाश दे सकता है।"
कुछ महीनों बाद मोहन का छोटा-सा खिलौनों का व्यवसाय एक बड़े कार्यशाला में बदल
गया। उसने कई गरीब कारीगरों को काम दिया। उसके बनाए खिलौने दूर-दूर के नगरों में
बिकने लगे। लोग कहते थे कि जिस व्यक्ति ने ईमानदारी नहीं छोड़ी, भगवान ने भी
उसका साथ नहीं छोड़ा। उसका गाँव समृद्ध होने लगा और वहाँ के बच्चे भी उसके जीवन से
प्रेरणा लेने लगे।
एक दिन अकबर फिर उसी कस्बे में गए। इस बार उन्होंने देखा कि बाज़ार के लोग
लेन-देन में पहले से अधिक सावधानी और सत्यनिष्ठा दिखा रहे हैं। जब उन्होंने इसका
कारण पूछा, तो लोगों ने कहा, "महाराज, जब से मोहन की ईमानदारी का सम्मान हुआ है, तब से हर
व्यक्ति समझ गया है कि सच्चाई का फल देर से सही, लेकिन अवश्य मिलता
है।"
अकबर ने दरबार में लौटकर कहा, "आज मुझे यह विश्वास हो गया है कि किसी भी राज्य
की असली ताकत उसके ईमानदार नागरिक होते हैं। सोने का खजाना समाप्त हो सकता है,
लेकिन चरित्र
का खजाना जितना बाँटा जाए, उतना ही बढ़ता है।"
बीरबल ने उत्तर दिया, "महाराज, सच्ची ईमानदारी वही है जो उस समय भी बनी रहे जब बेईमानी
करने का अवसर हो और कोई देखने वाला भी न हो। वही व्यक्ति वास्तव में महान कहलाने
योग्य है।"
उस दिन के बाद अकबर ने पूरे राज्य में आदेश दिया कि ईमानदार और सत्यनिष्ठ
लोगों को विशेष सम्मान दिया जाए। विद्यालयों में बच्चों को केवल पढ़ाई ही नहीं,
बल्कि अच्छे
चरित्र और सच्चाई का महत्व भी सिखाया जाने लगा। व्यापारियों को निष्पक्ष व्यापार
करने के लिए प्रोत्साहित किया गया और अधिकारियों को चेतावनी दी गई कि यदि वे
बेईमानी करेंगे तो उन्हें कठोर दंड मिलेगा।
समय बीतता गया, लेकिन मोहन की ईमानदारी की कहानी पूरे राज्य में एक प्रेरणा
बन गई। माता-पिता अपने बच्चों को उसकी कथा सुनाते और कहते कि जीवन में धन से अधिक
मूल्यवान सत्य, चरित्र और ईमानदारी है। लोग यह समझ गए कि सच्ची सफलता वही है जो सत्य के मार्ग पर चलकर प्राप्त की जाए।
तो दोस्तों
सच्ची ईमानदारी
वही है जो कठिन परिस्थितियों, लालच और अवसर मिलने पर भी सत्य का साथ न छोड़े। धन और वैभव
क्षणिक हो सकते हैं, लेकिन अच्छा चरित्र और ईमानदारी मनुष्य की सबसे बड़ी
संपत्ति होती है।
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