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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

सबसे अमीर कौन?

 



 

मुगल सम्राट अकबर का राज्य दूर-दूर तक अपनी समृद्धि, न्यायप्रियता और शांति के लिए प्रसिद्ध था। उनके शासन में व्यापार फल-फूल रहा था, किसानों की फसलें लहलहा रही थीं और नगरों में नए-नए बाजार बस रहे थे। विदेशी व्यापारी भी अकबर के राज्य में व्यापार करने आते थे, क्योंकि उन्हें यहाँ सुरक्षा, ईमानदारी और उचित न्याय मिलता था। बादशाह अकबर अपनी प्रजा की खुशहाली देखकर अत्यंत प्रसन्न रहते थे। वे अक्सर कहते थे कि किसी राजा की सबसे बड़ी सफलता उसके खजाने की संपत्ति नहीं, बल्कि उसकी प्रजा की मुस्कान होती है। फिर भी, उनके विशाल महल, सोने-चाँदी से भरे खजाने और अनगिनत हीरे-जवाहरात देखकर कई लोग मानते थे कि संसार में उनसे अधिक अमीर कोई नहीं हो सकता।

एक दिन सुबह का समय था। अकबर अपने दरबार में बैठे थे। चारों ओर रंग-बिरंगे कालीन बिछे थे, दीवारों पर सुंदर चित्र बने थे और महल के स्तंभों पर सोने की नक्काशी चमक रही थी। दरबार में मंत्री, सेनापति, विद्वान और व्यापारी अपनी-अपनी जगह पर बैठे थे। बातचीत का विषय राज्य की बढ़ती समृद्धि था। तभी एक धनी व्यापारी खड़ा हुआ और बोला, "जहाँपनाह, आपके राज्य का वैभव देखकर लगता है कि इस संसार में आपसे अधिक अमीर कोई नहीं है। आपके पास इतना धन है कि कई राज्यों के खजाने भी उसके सामने छोटे लगें।"

व्यापारी की बात सुनकर अनेक दरबारियों ने सहमति में सिर हिलाया। किसी ने कहा, "बादशाह सलामत के पास असीम धन है।" दूसरे ने कहा, "उनके पास विशाल सेना, शानदार महल और अनगिनत खजाने हैं। उनसे अधिक धनी कौन हो सकता है?" धीरे-धीरे पूरा दरबार इसी चर्चा में डूब गया।

अकबर ने मुस्कुराकर बीरबल की ओर देखा और पूछा, "बीरबल, तुम चुप क्यों हो? क्या तुम भी यही मानते हो कि मैं इस संसार का सबसे अमीर व्यक्ति हूँ?"

बीरबल ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यदि केवल सोना-चाँदी, महल और खजाने को ही धन माना जाए, तो निस्संदेह आपका कोई मुकाबला नहीं। लेकिन यदि सच्ची अमीरी की बात करें, तो उसका अर्थ केवल धन-दौलत नहीं होता।"

दरबार में सन्नाटा छा गया। कुछ दरबारी एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। अकबर ने उत्सुक होकर पूछा, "तो फिर तुम्हारे अनुसार सबसे अमीर कौन होता है?"

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "जहाँपनाह, इस प्रश्न का उत्तर शब्दों में देना आसान नहीं है। यदि अनुमति मिले, तो मैं आपको इसका उत्तर अनुभव के माध्यम से दूँगा।"

अकबर को बीरबल की बातें हमेशा रोचक लगती थीं। उन्होंने तुरंत कहा, "ठीक है। हम स्वयं देखना चाहते हैं कि तुम्हारा उत्तर क्या है।"

बीरबल ने निवेदन किया, "जहाँपनाह, कल सुबह आप साधारण वस्त्र पहनकर मेरे साथ नगर की सैर पर चलिए। वहाँ आपको इस प्रश्न का उत्तर स्वयं मिल जाएगा।"

अगले दिन सूर्योदय से पहले अकबर और बीरबल साधारण नागरिकों का वेश धारण करके महल से निकल पड़े। उनके साथ केवल दो विश्वसनीय सैनिक दूर-दूर से उनकी सुरक्षा कर रहे थे ताकि कोई उन्हें पहचान न सके।

सबसे पहले वे राजधानी के सबसे बड़े बाजार पहुँचे। वहाँ एक धनी व्यापारी की विशाल दुकान थी। दुकान में रेशमी कपड़े, कीमती मसाले, सोने-चाँदी के बर्तन और अनमोल रत्न रखे थे। व्यापारी ग्राहकों से घिरा हुआ था। बाहर कई नौकर सामान उठा रहे थे।

बीरबल और अकबर दुकान के सामने खड़े होकर उसे देखने लगे। तभी व्यापारी अपने मुनीम पर जोर-जोर से चिल्लाने लगा, "आज का लाभ कल से कम क्यों हुआ? यदि अगले महीने लाभ नहीं बढ़ा, तो कई नौकरों को निकाल दूँगा।"

उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

बीरबल ने धीरे से पूछा, "सेठ जी, आपके पास इतना धन है, फिर भी आप परेशान क्यों दिखाई देते हैं?"

व्यापारी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "धन जितना बढ़ता है, चिंता भी उतनी ही बढ़ती है। मुझे हर समय डर लगा रहता है कि कहीं माल चोरी न हो जाए, व्यापार में घाटा न हो जाए या कोई धोखा न दे दे। रात को भी चैन की नींद नहीं आती।"

अकबर ने आश्चर्य से उसकी बात सुनी। बाहर से अत्यंत समृद्ध दिखाई देने वाला व्यापारी भीतर से चिंताओं से घिरा हुआ था।

वे वहाँ से आगे बढ़े। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक बहुत बड़ा महल दिखाई दिया। वह राज्य के एक प्रसिद्ध जागीरदार का था। महल के बाहर सैकड़ों सैनिक पहरा दे रहे थे। बीरबल ने वहाँ के एक सेवक से पूछा, "क्या आपके मालिक घर पर हैं?"

सेवक बोला, "हाँ, लेकिन वे किसी से मिलना नहीं चाहते।"

बीरबल ने कारण पूछा।

सेवक ने धीरे से कहा, "मालिक को हर समय यह डर लगा रहता है कि कहीं उनके रिश्तेदार उनकी संपत्ति पर अधिकार न कर लें। वे किसी पर विश्वास नहीं करते।"

यह सुनकर अकबर और भी आश्चर्यचकित हुए।

कुछ देर बाद दोनों नगर से बाहर निकलकर गाँव की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा किसान दिखाई दिया। वह खेत में हल चला रहा था। उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी। उसके पास एक छोटा-सा बैल था और खेत के किनारे उसकी पत्नी भोजन तैयार कर रही थी। थोड़ी दूरी पर उसके बच्चे खेलते हुए हँस रहे थे।

बीरबल किसान के पास गए और बोले, "बाबा, दिन भर मेहनत करते हो। क्या तुम थकते नहीं?"

किसान मुस्कुराया और बोला, "मेहनत से शरीर थकता है, लेकिन मन नहीं। शाम को जब अपने परिवार के साथ बैठकर भोजन करता हूँ, तो सारी थकान दूर हो जाती है।"

बीरबल ने पूछा, "क्या तुम्हारे पास बहुत धन है?"

किसान हँस पड़ा।

"धन? नहीं साहब। मेरे पास बस इतना है कि परिवार का पेट भर जाए। लेकिन भगवान की कृपा से हम सब स्वस्थ हैं, ईमानदारी से कमाते हैं और चैन की नींद सोते हैं। इससे बड़ी दौलत और क्या होगी?"

अकबर किसान की बातें ध्यान से सुन रहे थे।

तभी किसान की छोटी बेटी मिट्टी के घड़े में ठंडा पानी लेकर आई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बाबा, पहले पानी पी लीजिए।"

किसान ने घड़ा बीरबल और अकबर की ओर बढ़ाते हुए कहा, "आप भी पानी पीजिए। मेहमान भगवान का रूप होते हैं।"

दोनों ने पानी पिया। वह साधारण पानी भी उन्हें किसी अमृत से कम नहीं लगा, क्योंकि उसमें सच्चे अपनत्व का स्वाद था।

आगे बढ़ते हुए अकबर ने धीरे से कहा, "बीरबल, उस किसान के पास धन तो बहुत कम है, फिर भी वह इतना प्रसन्न कैसे है?"

बीरबल मुस्कुराए, लेकिन बोले कुछ नहीं।

थोड़ी दूर पर उन्हें एक छोटा-सा कुम्हार मिला। वह मिट्टी के घड़े बना रहा था। उसके हाथ मिट्टी से सने थे, लेकिन चेहरे पर संतोष था। पास ही कुछ बच्चे उसके बनाए खिलौनों से खेल रहे थे।

बीरबल ने पूछा, "भाई, तुम्हारी कमाई कैसी चल रही है?"

कुम्हार ने कहा, "जितनी जरूरत है, उतनी हो जाती है। उससे अधिक मिले तो अच्छा, नहीं मिले तो भी शिकायत नहीं। मेहनत करता हूँ, ईमानदारी से कमाता हूँ और शाम को अपने परिवार के साथ हँसता-बोलता हूँ। यही मेरे लिए सबसे बड़ी संपत्ति है।"

अकबर अब गहरे विचार में डूब चुके थे। उन्होंने देखा कि जिन लोगों के पास अपार धन था, वे चिंता और भय से घिरे हुए थे, जबकि जिनके पास सीमित साधन थे, वे संतोष और खुशी से भरा जीवन जी रहे थे।

सूरज धीरे-धीरे पश्चिम की ओर ढलने लगा। लौटते समय अकबर ने बीरबल से कहा, "आज मैंने कुछ ऐसा देखा है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन अभी भी मेरे मन में एक प्रश्न है—क्या केवल संतोष ही किसी को सबसे अमीर बना देता है?"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, इस प्रश्न का उत्तर आपको कल दरबार में मिलेगा। आज जो आपने देखा, वह केवल शुरुआत थी।"

अकबर की उत्सुकता और बढ़ गई। वे सोचने लगे कि आखिर बीरबल दरबार में ऐसा क्या करने वाले हैं जिससे इस प्रश्न का अंतिम उत्तर मिल सके।

अकबर और बीरबल अगले दिन समय पर शाही दरबार में पहुँचे। दरबार पहले की तरह सजा हुआ था। सभी मंत्री, सेनापति, व्यापारी और दरबारी अपनी-अपनी जगह पर बैठे थे। सभी यह जानने के लिए उत्सुक थे कि बीरबल आखिर कैसे सिद्ध करेंगे कि संसार का सबसे अमीर व्यक्ति कौन है। अकबर ने सिंहासन पर बैठते ही कहा, "बीरबल, कल तुमने मुझे नगर और गाँव की सैर कराई। मैंने देखा कि जिन लोगों के पास अपार धन था, वे चिंता और भय में जी रहे थे, जबकि साधारण किसान और कुम्हार अपने सीमित साधनों में भी प्रसन्न थे। अब बताओ, क्या सच्ची अमीरी का संबंध धन से नहीं है?" बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, "जहाँपनाह, धन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन धन ही जीवन नहीं है। यदि धन के साथ संतोष, स्वास्थ्य, ईमानदारी और प्रेम न हो, तो सबसे बड़ा खजाना भी मनुष्य को सुख नहीं दे सकता। यदि अनुमति हो तो मैं आज दरबार में एक छोटा-सा प्रयोग करना चाहता हूँ।" अकबर ने तुरंत अनुमति दे दी। बीरबल ने सैनिकों को आदेश दिया कि राज्य के सबसे धनी व्यापारी, एक साधारण किसान, एक कुम्हार, एक शिक्षक और एक वृद्ध साधु को दरबार में बुलाया जाए। कुछ ही समय में पाँचों व्यक्ति दरबार में उपस्थित हो गए। सभी लोग उत्सुकता से उन्हें देखने लगे।

बीरबल ने सबसे पहले धनी व्यापारी से पूछा, "सेठ जी, यदि आपको आज से दुगुना धन मिल जाए, तो क्या आप पूरी तरह निश्चिंत और प्रसन्न हो जाएँगे?" व्यापारी ने कुछ क्षण सोचकर कहा, "नहीं। तब मुझे उस धन की सुरक्षा की और अधिक चिंता होगी। व्यापार भी बढ़ेगा, जोखिम भी बढ़ेंगे और दुश्मन भी बढ़ेंगे।" बीरबल ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और फिर किसान से पूछा, "यदि तुम्हें केवल इतना अन्न मिल जाए कि पूरे परिवार का पेट भर सके, स्वस्थ रहो और ईमानदारी से जीवन चलता रहे, तो क्या तुम स्वयं को सुखी मानोगे?" किसान ने बिना देर किए कहा, "हाँ हुजूर। मेरी सबसे बड़ी खुशी यही है कि मेरा परिवार एक साथ बैठकर हँसते हुए भोजन करता है। मैं रात को बिना किसी डर के सो जाता हूँ।" इसके बाद बीरबल ने कुम्हार से पूछा, "यदि तुम्हारे बनाए सभी घड़े बिक जाएँ, तो तुम सबसे पहले क्या करोगे?" कुम्हार मुस्कुराकर बोला, "मैं अपने बच्चों के लिए किताबें खरीदूँगा, पत्नी के लिए एक नई साड़ी और फिर कुछ धन बचाकर रखूँगा ताकि कठिन समय में काम आ सके। उसके बाद भी यदि कुछ बचेगा, तो मंदिर के बाहर बैठे गरीबों को भोजन कराऊँगा।" उसकी बात सुनकर दरबार में बैठे कई लोग प्रभावित हुए।

अब बीरबल शिक्षक की ओर मुड़े और बोले, "गुरुजी, आपके पास न महल है, न खजाना। फिर भी आपके चेहरे पर इतना संतोष क्यों है?" शिक्षक ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "मैंने जीवनभर बच्चों को शिक्षा दी है। मेरे कई शिष्य आज बड़े अधिकारी, व्यापारी और विद्वान बने हैं। जब वे सम्मान से मेरे चरण छूते हैं, तब मुझे लगता है कि मैं संसार का सबसे धनी व्यक्ति हूँ। ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। यही मेरी सबसे बड़ी संपत्ति है।" इसके बाद बीरबल ने वृद्ध साधु से पूछा, "महात्मन, आपके पास तो कोई धन-दौलत भी नहीं है। फिर भी आपके चेहरे पर इतनी शांति कैसे है?" साधु मुस्कुराए और बोले, "जिस दिन मनुष्य की इच्छाएँ सीमित हो जाती हैं, उसी दिन वह सबसे अमीर बन जाता है। जिसके पास कम इच्छाएँ हैं, उसके पास सबसे बड़ा खजाना है, क्योंकि उसे खोने का डर नहीं रहता।"

दरबार में गहरा सन्नाटा छा गया। अकबर पाँचों व्यक्तियों की बातें ध्यान से सुन रहे थे। तभी बीरबल ने एक सोने की थैली मँगवाई जिसमें स्वर्ण मुद्राएँ भरी हुई थीं। उन्होंने व्यापारी से कहा, "यदि यह थैली आपको दे दी जाए, तो क्या आप इसे बिना गिने किसी दूसरे को सौंप देंगे?" व्यापारी तुरंत बोला, "कभी नहीं। पहले मैं इसे कई बार गिनूँगा, फिर सुरक्षित स्थान पर रखूँगा।" फिर वही थैली किसान को दी गई। किसान ने आदरपूर्वक थैली लौटाते हुए कहा, "मुझे जितनी आवश्यकता है, उतना मेरे पास है। यह धन किसी ऐसे व्यक्ति को दे दीजिए जिसे इसकी अधिक जरूरत हो।" कुम्हार ने भी वही उत्तर दिया। शिक्षक ने कहा, "यदि यह धन विद्यालय बनाने में लगे, तो उसका लाभ हजारों बच्चों को मिलेगा।" साधु ने मुस्कुराकर कहा, "जिस वस्तु की मुझे आवश्यकता ही नहीं, उसे लेकर मैं क्या करूँगा?" यह सुनकर पूरे दरबार में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। सभी को महसूस हुआ कि धन का मूल्य केवल उसके होने में नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग में है।

अकबर ने बीरबल की ओर देखकर कहा, "आज मैं समझ गया कि केवल सोने-चाँदी का मालिक होना अमीरी नहीं है। सच्चा अमीर वह है जिसके पास संतोष है, जो स्वस्थ है, जिसके परिवार में प्रेम है, जो ईमानदारी से कमाता है और दूसरों की सहायता करने का मन रखता है। ऐसा व्यक्ति कम साधनों में भी सुखी रहता है, जबकि लालची व्यक्ति अपार धन के बाद भी गरीब ही रहता है, क्योंकि उसकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं।" बीरबल ने विनम्रता से कहा, "जहाँपनाह, यही कारण है कि संसार के सबसे बड़े खजाने भी उस व्यक्ति को सुख नहीं दे सकते जिसके मन में संतोष नहीं है। लेकिन एक संतुष्ट और दयालु मनुष्य बिना बड़े खजाने के भी सबसे अमीर कहलाने योग्य होता है।"

अकबर ने उसी समय घोषणा की कि राज्य में गरीब, मेहनती और ईमानदार लोगों की सहायता के लिए एक विशेष कोष बनाया जाएगा। उन्होंने व्यापारियों से भी कहा कि वे केवल धन कमाने के बारे में न सोचें, बल्कि समाज के हित में भी अपना योगदान दें। दरबारियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस निर्णय का स्वागत किया। उस दिन के बाद अकबर जब भी किसी धनी व्यक्ति से मिलते, तो केवल उसके खजाने को नहीं देखते थे, बल्कि यह भी देखते थे कि वह अपने धन का उपयोग किस प्रकार करता है। बीरबल की इस सीख ने पूरे राज्य की सोच बदल दी। लोग समझ गए कि सच्ची अमीरी महलों, गहनों और सोने के ढेरों में नहीं, बल्कि संतोष, ईमानदारी, प्रेम, उदारता और अच्छे कर्मों में छिपी होती है। यही कारण था कि वर्षों बाद भी लोग अकबर और बीरबल की इस घटना को याद करके अपने बच्चों को समझाते थे कि मनुष्य का सबसे बड़ा खजाना उसका चरित्र होता है, क्योंकि धन कभी भी छिन सकता है, लेकिन अच्छे संस्कार और नेक कर्म जीवनभर उसके साथ रहते हैं।

अगले दिन से पूरे राज्य में अकबर के नए आदेश की चर्चा होने लगी। नगरों, कस्बों और गाँवों में लोग इस बात पर विचार करने लगे कि वास्तव में अमीर किसे कहा जाना चाहिए। कुछ लोग अब भी मानते थे कि जिसके पास अधिक धन है, वही सबसे अमीर है, जबकि कई लोग बीरबल की बातों से सहमत थे कि सच्ची अमीरी मन की शांति, संतोष और अच्छे चरित्र में होती है। अकबर चाहते थे कि यह शिक्षा केवल दरबार तक सीमित न रहे, बल्कि राज्य का प्रत्येक नागरिक इसे समझे। इसलिए उन्होंने पूरे राज्य में "सच्ची अमीरी" विषय पर सभाएँ आयोजित करने का आदेश दिया। विद्वान, शिक्षक और बुज़ुर्ग गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाने लगे कि धन कमाना बुरा नहीं है, लेकिन धन का घमंड करना और दूसरों की उपेक्षा करना सबसे बड़ी गरीबी है। लोग इन सभाओं में बड़ी रुचि से भाग लेने लगे और अपने जीवन के अनुभव भी साझा करने लगे। धीरे-धीरे राज्य का वातावरण बदलने लगा। लोग केवल अधिक कमाने की नहीं, बल्कि सही तरीके से कमाने और उसका उचित उपयोग करने की बात करने लगे।

कुछ ही दिनों बाद राजधानी में एक विशाल मेला लगा। दूर-दूर से व्यापारी, कलाकार, किसान और शिल्पकार अपने सामान लेकर आए। मेले में तरह-तरह की दुकानें सजी थीं। कहीं सुंदर वस्त्र बिक रहे थे, कहीं मिट्टी के बर्तन, कहीं लकड़ी के खिलौने और कहीं स्वादिष्ट मिठाइयाँ। अकबर और बीरबल भी साधारण वेश में मेले का निरीक्षण करने पहुँचे। वे लोगों के व्यवहार को ध्यान से देख रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक धनी व्यापारी अपनी दुकान पर बैठे-बैठे हर ग्राहक से कठोर शब्दों में बात कर रहा था। यदि कोई ग्राहक कीमत कम करने की बात करता, तो वह उसे अपमानित कर देता। दूसरी ओर एक वृद्ध महिला छोटी-सी टोकरी में घर पर बने मिट्टी के दीपक बेच रही थी। वह हर ग्राहक का मुस्कुराकर स्वागत करती, बच्चों को प्यार से समझाती और यदि कोई गरीब व्यक्ति दीपक खरीदने में असमर्थ होता, तो उसे एक दीपक बिना मूल्य के दे देती। आश्चर्य की बात यह थी कि उसकी छोटी-सी दुकान पर लोगों की भीड़ लगी हुई थी, जबकि धनी व्यापारी की बड़ी दुकान पर ग्राहक कम होते जा रहे थे। अकबर ने यह दृश्य देखकर बीरबल से पूछा, "ऐसा क्यों हो रहा है?" बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "जहाँपनाह, धन से दुकान बड़ी हो सकती है, लेकिन व्यवहार से दिल जीते जाते हैं। जो लोगों को सम्मान देता है, वही वास्तव में सबसे धनी होता है।"

उसी समय एक छोटा बालक दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में कुछ सिक्के थे। उसने वृद्ध महिला से दो दीपक खरीदे और बोला, "दादी, मेरी माँ ने कहा है कि आपका व्यवहार बहुत अच्छा है, इसलिए हम हर वर्ष दीपक आपसे ही खरीदते हैं।" वृद्ध महिला ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और एक अतिरिक्त दीपक उसे उपहार में दे दिया। बालक खुशी से उछल पड़ा। अकबर यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। उन्होंने महसूस किया कि लोगों के मन में सम्मान और प्रेम कमाने वाला व्यक्ति वास्तव में सबसे समृद्ध होता है। धन से खरीदी गई वस्तुएँ कुछ समय के लिए खुशी दे सकती हैं, लेकिन प्रेम और विश्वास जीवनभर साथ रहते हैं।

मेले से लौटते समय अकबर ने बीरबल से कहा, "आज मुझे समझ में आ गया कि लोगों के दिल जीतना किसी भी खजाने को जीतने से अधिक कठिन है।" बीरबल ने उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यही कारण है कि इतिहास उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने दूसरों के जीवन में सुख बाँटा, न कि केवल धन इकट्ठा किया।"

कुछ सप्ताह बाद अकबर ने पूरे राज्य के प्रमुख व्यापारियों, किसानों, कारीगरों और विद्वानों को राजसभा में आमंत्रित किया। उन्होंने सभी से एक ही प्रश्न पूछा, "यदि तुम्हें जीवन में केवल एक ही संपत्ति चुनने का अवसर मिले, तो तुम क्या चुनोगे?" किसी ने कहा कि वह स्वास्थ्य चुनेगा, किसी ने परिवार, किसी ने ज्ञान और किसी ने ईमानदारी। बहुत कम लोगों ने केवल सोना या महल चुनने की बात कही। तब अकबर मुस्कुराए और बोले, "आज मुझे यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि हमारे राज्य के लोग समझने लगे हैं कि जीवन का सबसे बड़ा धन वह है, जो किसी चोर द्वारा चुराया नहीं जा सकता, आग में जल नहीं सकता और समय के साथ नष्ट नहीं होता। ज्ञान, चरित्र, प्रेम, विश्वास और संतोष ही मनुष्य की वास्तविक संपत्ति हैं।"

बीरबल ने आगे कहा, "जिस व्यक्ति के पास करोड़ों की दौलत हो, लेकिन वह रातभर चिंता में जागता रहे, हर समय दूसरों से डरता रहे और किसी पर विश्वास न कर सके, वह भीतर से गरीब है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से मेहनत करता है, अपने परिवार के साथ प्रेम से रहता है, दूसरों की सहायता करता है और संतोषपूर्वक जीवन जीता है, तो वही संसार का सबसे अमीर व्यक्ति है।" उनकी बात सुनकर पूरा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

अकबर ने उसी दिन एक नया नियम बनाया कि राज्य में हर वर्ष उन लोगों को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने धन कमाने के साथ-साथ समाज की सेवा भी की हो। अगले वर्ष जब यह सम्मान दिया गया, तो सबसे पहले एक शिक्षक, एक किसान, एक चिकित्सक और एक कारीगर को सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने जीवनभर ईमानदारी से काम किया था और अनेक लोगों की सहायता की थी। धनी व्यापारी भी यह देखकर प्रेरित हुए और उन्होंने गरीब बच्चों की शिक्षा, यात्रियों के लिए सराय और प्यासे लोगों के लिए कुएँ बनवाने शुरू किए। धीरे-धीरे पूरे राज्य में सेवा और दान की भावना बढ़ने लगी। लोग अब केवल यह नहीं पूछते थे कि किसी के पास कितना धन है, बल्कि यह भी पूछते थे कि उसने अपने धन और अपने जीवन का उपयोग कितने लोगों की भलाई के लिए किया है।

वर्षों बाद जब लोग अकबर के शासनकाल की चर्चा करते, तो वे केवल उनके विशाल साम्राज्य या सोने से भरे खजाने की बात नहीं करते थे। वे उस दिन को भी याद करते थे, जब बीरबल ने उन्हें सिखाया था कि सच्ची अमीरी धन के ढेर में नहीं, बल्कि संतोष, प्रेम, दया, ईमानदारी, ज्ञान और उदारता में बसती है। उस शिक्षा ने न केवल अकबर की सोच बदली, बल्कि पूरे राज्य के लोगों का जीवन बदल दिया। माता-पिता अपने बच्चों को यह कहानी सुनाकर कहते, "बेटा, जीवन में खूब मेहनत करके धन कमाना, लेकिन कभी यह मत भूलना कि सबसे बड़ा धन अच्छा चरित्र और संतुष्ट मन होता है।" बच्चे यह शिक्षा अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते और बड़े होकर समाज के जिम्मेदार नागरिक बनते।

इसी प्रकार बीरबल ने बिना किसी कठिन तर्क या लंबे उपदेश के एक साधारण अनुभव के माध्यम से बादशाह अकबर और पूरे राज्य को यह समझा दिया कि संसार का सबसे अमीर व्यक्ति वह नहीं है जिसके पास सबसे अधिक धन है, बल्कि वह है जिसके पास संतोष से भरा मन, सच्चे रिश्ते, अच्छा चरित्र, स्वस्थ शरीर, ज्ञान, दया और दूसरों की सहायता करने की भावना है। यही संपत्ति मनुष्य को जीवनभर सम्मान, सुख और सच्ची समृद्धि प्रदान करती है। इसलिए कहा गया है कि धन का मूल्य तभी है जब वह अच्छे कर्मों में लगे, क्योंकि अंत में मनुष्य अपने साथ सोना-चाँदी नहीं, बल्कि अपने कर्मों की कमाई लेकर जाता है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है कि सच्चा अमीर वही है, जो अपने धन से पहले अपने हृदय को समृद्ध बनाता है।

 

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