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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

लालच का परिणाम

 



 

मुगल सम्राट अकबर का शासनकाल न्याय, समृद्धि और बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध था। उनके दरबार में देश-विदेश से विद्वान, कलाकार और व्यापारी आया करते थे। लेकिन उन सबमें सबसे अधिक सम्मान बीरबल को प्राप्त था। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, न्यायप्रिय स्वभाव और सरल भाषा में गहरी बात समझाने की कला के कारण पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। जब भी कोई कठिन विवाद सामने आता या कोई ऐसा प्रश्न उठता जिसका उत्तर साधारण बुद्धि से देना संभव न हो, तब अकबर निश्चिंत होकर बीरबल की ओर देखते थे। बीरबल न केवल समस्या का समाधान करते थे, बल्कि ऐसा निर्णय देते थे जिससे लोगों को जीवन की कोई न कोई मूल्यवान शिक्षा अवश्य मिलती थी।

एक दिन प्रातःकाल अकबर दरबार में बैठे राज्य के कार्यों की समीक्षा कर रहे थे। तभी नगर के कुछ व्यापारी अत्यंत चिंतित अवस्था में दरबार में पहुँचे। उन्होंने सम्राट को प्रणाम किया और निवेदन किया, "जहाँपनाह, हमारे नगर का वातावरण दिन-प्रतिदिन बिगड़ता जा रहा है। लोग मेहनत से अधिक छल-कपट और लालच के सहारे धन कमाने लगे हैं। व्यापार में ईमानदारी कम होती जा रही है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो लोगों का विश्वास समाप्त हो जाएगा।"

अकबर ने गंभीरता से उनकी बात सुनी। उन्होंने देखा कि व्यापारियों के चेहरे पर वास्तविक चिंता झलक रही थी। उन्होंने तुरंत बीरबल को बुलाया और कहा, "बीरबल, यदि समाज में लालच बढ़ जाए, तो उसका क्या परिणाम होता है? और लोगों को यह कैसे समझाया जाए कि लालच अंततः विनाश का कारण बनता है?"

बीरबल ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं इस प्रश्न का उत्तर किसी उपदेश से नहीं, बल्कि एक ऐसी घटना के माध्यम से दूँगा जिसे पूरा नगर स्वयं देखेगा।"

अकबर ने सहमति दे दी।

दो दिन बाद बीरबल ने नगर में यह घोषणा करवा दी कि राजमहल के बगीचे में एक विशेष प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। घोषणा में कहा गया कि जो व्यक्ति सबसे बुद्धिमान और ईमानदार सिद्ध होगा, उसे सम्राट की ओर से बहुमूल्य पुरस्कार दिया जाएगा। यह समाचार पूरे नगर में फैल गया। अमीर-गरीब, व्यापारी, किसान, कारीगर और युवा—सभी उत्सुक हो उठे।

प्रतियोगिता वाले दिन महल का विशाल बगीचा लोगों से भर गया। बीच में एक सुंदर स्वर्ण-पात्र रखा गया था। उसके पास एक बड़ी मेज पर चमचमाते सोने के सिक्के रखे थे। हर व्यक्ति की दृष्टि उन्हीं सिक्कों पर टिक गई।

बीरबल मंच पर आए और बोले, "यहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति इस पात्र से केवल एक स्वर्ण-मुद्रा ले सकता है। जो व्यक्ति नियम का पालन करेगा, उसे सम्राट की ओर से अतिरिक्त पुरस्कार दिया जाएगा। लेकिन यदि कोई एक से अधिक मुद्रा लेगा, तो उसे प्रतियोगिता से बाहर कर दिया जाएगा।"

लोगों ने सोचा कि यह तो बहुत सरल परीक्षा है।

सबसे पहले एक वृद्ध किसान आगे आया। उसने विनम्रता से केवल एक स्वर्ण-मुद्रा उठाई, सम्राट को प्रणाम किया और शांतिपूर्वक वापस अपनी जगह बैठ गया।

फिर एक बढ़ई आया। उसने भी केवल एक सिक्का लिया। उसके बाद एक सैनिक आया। उसने भी नियम का पालन किया।

धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। तभी नगर का एक धनी व्यापारी आगे आया। वह अत्यंत चतुर माना जाता था, लेकिन उसके बारे में यह भी प्रसिद्ध था कि वह लाभ के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। उसने चारों ओर देखा। उसे लगा कि इतनी भीड़ में यदि वह दो-तीन सिक्के अपनी जेब में रख लेगा, तो किसी को पता नहीं चलेगा।

उसने एक सिक्का खुले रूप से उठाया और झुकने का बहाना करते हुए दो और सिक्के चुपके से अपनी आस्तीन में छिपा लिए।

बीरबल ने कुछ नहीं कहा। वे केवल मुस्कुराते हुए उसे देखते रहे।

व्यापारी ने सोचा कि उसकी चालाकी सफल हो गई।

उसके बाद कई और लोग आए। अधिकांश ने नियम का पालन किया, लेकिन कुछ लोगों ने व्यापारी को देखकर वही उपाय अपनाने का प्रयास किया। किसी ने दो सिक्के जेब में रख लिए, किसी ने आस्तीन में छिपा लिए और किसी ने पगड़ी के भीतर।

पूरा समय बीरबल शांत रहे। उन्होंने किसी को नहीं रोका।

जब सभी लोग सिक्के ले चुके, तब अकबर ने आश्चर्य से पूछा, "बीरबल, आपने किसी को रोका क्यों नहीं? आपने तो स्वयं देखा कि कई लोगों ने नियम तोड़ा।"

बीरबल ने उत्तर दिया, "जहाँपनाह, कभी-कभी अपराध को उसी समय पकड़ना आवश्यक नहीं होता। लालच स्वयं अपने लिए सबसे बड़ा जाल तैयार करता है।"

इतना कहकर उन्होंने सैनिकों को संकेत दिया।

सैनिकों ने बगीचे के द्वार बंद कर दिए।

अब बीरबल ने सभी लोगों से कहा, "जिस-जिस ने केवल एक सिक्का लिया है, वह निश्चिंत होकर आगे आ जाए।"

सैकड़ों लोग आगे आ गए।

फिर उन्होंने कहा, "अब जिन लोगों ने एक से अधिक सिक्के लिए हैं, वे स्वयं स्वीकार कर लें। जो सच बोल देगा, उसे केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया जाएगा। लेकिन यदि तलाशी में चोरी पकड़ी गई, तो उसे दंड मिलेगा।"

कुछ क्षणों तक सन्नाटा छाया रहा।

किसी ने आगे आने का साहस नहीं किया।

तब बीरबल ने सैनिकों को सभी की तलाशी लेने का आदेश दिया।

तलाशी शुरू हुई। सबसे पहले वही धनी व्यापारी पकड़ा गया। उसकी आस्तीन से दो अतिरिक्त स्वर्ण-मुद्राएँ निकल आईं। उसके बाद पाँच अन्य लोग भी पकड़े गए। किसी की जेब से सिक्के मिले, किसी की पगड़ी से और किसी के जूते के भीतर से।

पूरा दरबार और वहाँ उपस्थित जनता आश्चर्य से यह दृश्य देखने लगी।

व्यापारी शर्म से सिर झुकाए खड़ा था। उसने धीमे स्वर में कहा, "मुझसे गलती हो गई।"

बीरबल ने गंभीर स्वर में कहा, "गलती नहीं, यह लालच का परिणाम है। तुम्हारे पास पहले से ही बहुत धन था, फिर भी कुछ अतिरिक्त सिक्कों के लिए तुमने अपना सम्मान दाँव पर लगा दिया।"

अकबर ने भी कहा, "जिस धन के कारण मनुष्य अपना चरित्र खो दे, वह धन नहीं, विनाश का कारण है।"

लेकिन बीरबल जानते थे कि केवल दंड देने से लोगों की सोच नहीं बदलती। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि अभी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण भाग बाकी है। वे लालच का ऐसा परिणाम सबके सामने लाना चाहते थे, जिसे देखकर भविष्य में कोई भी बेईमानी करने से पहले सौ बार सोचे।

बगीचे में उपस्थित सभी लोग स्तब्ध थे। जिन लोगों ने केवल एक स्वर्ण-मुद्रा ली थी, वे गर्व से खड़े थे, जबकि अतिरिक्त सिक्के छिपाने वाले शर्म से सिर झुकाए खड़े थे। सबसे अधिक शर्मिंदगी उस धनी व्यापारी को हो रही थी, जो नगर में अपनी संपत्ति और प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्ध था। उसने कभी नहीं सोचा था कि कुछ अतिरिक्त स्वर्ण-मुद्राओं के लालच में उसका सम्मान पूरे नगर के सामने धूल में मिल जाएगा। सम्राट अकबर शांत भाव से यह दृश्य देख रहे थे। वे जानते थे कि बीरबल अभी केवल परीक्षा की शुरुआत कर रहे हैं। बीरबल ने सभी की ओर देखकर कहा कि मनुष्य का असली चरित्र तब सामने आता है जब उसके सामने लालच का अवसर रखा जाता है। जो व्यक्ति उस समय भी ईमानदारी का साथ देता है, वही सच्चा धनवान होता है, क्योंकि उसका चरित्र किसी भी सोने-चाँदी से अधिक मूल्यवान होता है।

धनी व्यापारी ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और कहा कि उससे भूल हो गई है। उसने स्वीकार किया कि जब उसने दूसरों को नियम का पालन करते देखा, तब भी उसके मन में यह विचार आया कि यदि वह दो-तीन सिक्के अधिक ले लेगा तो किसी को पता नहीं चलेगा। उसे विश्वास था कि उसकी चतुराई सब पर भारी पड़ेगी, लेकिन अब उसे समझ में आ गया था कि लालच मनुष्य की बुद्धि को भी अंधा बना देता है। बीरबल ने उसकी ओर देखते हुए कहा कि चोरी केवल किसी वस्तु को छिपाकर ले जाना नहीं होती, बल्कि विश्वास को तोड़ना भी चोरी ही है। जिसने नियम तोड़ा, उसने केवल सिक्के नहीं चुराए, बल्कि अपने चरित्र पर भी दाग लगा लिया।

अकबर ने बीरबल से पूछा कि क्या केवल दंड देने से लोगों का लालच समाप्त हो जाएगा। बीरबल ने मुस्कुराकर उत्तर दिया कि दंड भय उत्पन्न कर सकता है, लेकिन सही शिक्षा मनुष्य के विचार बदलती है। उन्होंने सम्राट से अनुमति लेकर अगले दिन नगर के सभी प्रमुख व्यापारियों और नागरिकों की एक विशेष सभा बुलाने का अनुरोध किया। अकबर ने तुरंत अनुमति दे दी। अगले दिन राजसभा में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए। सभी के मन में उत्सुकता थी कि बीरबल अब क्या करने वाले हैं।

सभा के बीचों-बीच एक बड़ा मिट्टी का घड़ा रखा गया। उसके ऊपर कपड़ा ढका हुआ था। बीरबल ने सभी से कहा कि इस घड़े के भीतर एक ऐसी वस्तु रखी है, जिसे पाने वाला व्यक्ति भविष्य में अत्यंत धनी बन सकता है। यह सुनते ही सभा में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कई लोगों की आँखों में उत्सुकता के साथ-साथ लालच भी दिखाई देने लगा। बीरबल ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति एक-एक करके भीतर जाएगा और घड़े में हाथ डालकर जो चाहेगा, वह ले सकता है, लेकिन शर्त केवल इतनी है कि बाहर आने पर वह घड़े में हाथ फँसने की शिकायत नहीं करेगा।

सबसे पहले वही धनी व्यापारी भीतर गया। उसने घड़े में हाथ डाला और भीतर रखे अनेक रत्नों को महसूस किया। उसे लगा कि यदि वह एक-दो रत्न लेगा तो कम लाभ होगा, इसलिए उसने अपनी मुट्ठी भर ली। जब उसने हाथ बाहर निकालना चाहा तो उसकी बंद मुट्ठी घड़े के संकरे मुँह में फँस गई। उसने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन हाथ बाहर नहीं निकला। घबराकर उसने घड़े को हिलाना शुरू कर दिया। बाहर खड़े लोग उसकी बेचैनी देख रहे थे। अंततः बीरबल अंदर पहुँचे और बोले कि यदि हाथ बाहर निकालना है तो मुट्ठी खोलनी होगी। व्यापारी पहले तो तैयार नहीं हुआ, क्योंकि उसे रत्न छोड़ने का दुख था, लेकिन जब बहुत प्रयास करने पर भी हाथ बाहर नहीं निकला, तब उसने मजबूरी में रत्न छोड़ दिए। जैसे ही उसकी मुट्ठी खुली, उसका हाथ आसानी से बाहर निकल आया। उसके चेहरे पर लज्जा स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

इसके बाद अन्य लोगों को भी वही परीक्षा दी गई। जिन लोगों ने केवल एक रत्न उठाया, उनका हाथ बिना किसी कठिनाई के बाहर निकल आया, लेकिन जिन्होंने मुट्ठी भरने की कोशिश की, उनका हाथ भी उसी प्रकार फँस गया। धीरे-धीरे सभी को समझ में आने लगा कि यह कोई साधारण परीक्षा नहीं थी। बीरबल ने सभा की ओर देखकर कहा कि घड़ा जीवन है और मनुष्य की बंद मुट्ठी उसका लालच। जब तक मनुष्य सब कुछ अपने लिए समेटने की कोशिश करता है, तब तक वह स्वयं भी आगे नहीं बढ़ पाता। जैसे ही वह आवश्यकता भर लेकर संतोष करना सीखता है, उसके जीवन की कठिनाइयाँ कम होने लगती हैं।

व्यापारी की आँखों में आँसू आ गए। उसने स्वीकार किया कि जीवन भर उसने धन इकट्ठा किया, लेकिन कभी संतोष नहीं सीखा। उसे लगा कि जितना अधिक मिलेगा, उतना अधिक सुख मिलेगा, लेकिन आज उसे अनुभव हुआ कि लालच मनुष्य को बाँध देता है, जबकि संतोष उसे मुक्त कर देता है। सम्राट अकबर भी बीरबल की बुद्धिमानी से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सभा में उपस्थित सभी लोगों से कहा कि राज्य की समृद्धि केवल खजाने से नहीं, बल्कि ईमानदार नागरिकों से होती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से से अधिक पाने की कोशिश करेगा, तो समाज में विश्वास समाप्त हो जाएगा और अंततः सभी का नुकसान होगा। उस दिन सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ने यह निश्चय किया कि वह कभी भी लालच के कारण अपने चरित्र और सम्मान को दाँव पर नहीं लगाएगा। नगर में यह घटना दूर-दूर तक फैल गई और लोग वर्षों तक अपने बच्चों को यह कहानी सुनाकर समझाते रहे कि आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा ही अधिकांश दुखों की जड़ होती है और लालच का अंत हमेशा अपमान, हानि और पश्चाताप में होता है।

सभा समाप्त होने के बाद भी उस घटना की चर्चा पूरे नगर में होती रही। जिस व्यापारी को कभी लोग उसकी अपार संपत्ति के कारण सम्मान की दृष्टि से देखते थे, अब वही व्यक्ति अपनी भूल के कारण आत्मग्लानि से भर गया था। वह कई दिनों तक अपने घर से बाहर नहीं निकला। उसे बार-बार बीरबल की वह बात याद आती रही कि लालच मनुष्य को बाहर से नहीं, भीतर से गरीब बना देता है। एक रात वह देर तक सो नहीं सका। उसने अपने जीवन के पिछले वर्षों के बारे में सोचना शुरू किया। उसे याद आया कि धन कमाने की दौड़ में उसने अपने परिवार के साथ समय बिताना छोड़ दिया था। उसने कई छोटे व्यापारियों के साथ कठोर व्यवहार किया था, अपने कर्मचारियों को उचित मेहनताना नहीं दिया था और लाभ के लिए कई बार ऐसे निर्णय लिए थे जिनसे दूसरों को नुकसान पहुँचा था। अब उसे समझ में आने लगा कि उसने धन तो बहुत कमाया, लेकिन लोगों का विश्वास और स्नेह धीरे-धीरे खो दिया।

अगली सुबह व्यापारी स्वयं राजदरबार पहुँचा। उसने सम्राट अकबर और बीरबल को प्रणाम किया तथा विनम्र स्वर में कहा कि वह अपने किए पर सच्चे मन से पश्चाताप करता है। उसने स्वीकार किया कि यदि बीरबल उसे समय रहते यह शिक्षा न देते, तो उसका लालच एक दिन उसे पूरी तरह बर्बाद कर देता। उसने कहा कि वह केवल क्षमा नहीं चाहता, बल्कि अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर यह सिद्ध करना चाहता है कि मनुष्य अपनी गलतियों से सीख सकता है। अकबर ने उसकी बात ध्यान से सुनी और बीरबल की ओर देखा। बीरबल ने कहा कि सच्चा पश्चाताप वही है जो व्यवहार में दिखाई दे। केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से परिवर्तन सिद्ध होता है।

बीरबल ने व्यापारी की परीक्षा लेने के लिए उसे एक नया कार्य सौंपा। उन्होंने कहा कि राज्य के दूरस्थ गाँवों में कई गरीब किसान ऐसे हैं जिनके पास खेती करने के लिए अच्छे बीज और आवश्यक साधन नहीं हैं। यदि व्यापारी वास्तव में बदलना चाहता है, तो वह बिना किसी प्रसिद्धि या लाभ की इच्छा के उनकी सहायता करे। व्यापारी ने बिना किसी संकोच के यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अगले ही सप्ताह उसने अनेक गाँवों में जाकर किसानों को बीज, खेती के उपकरण और बैलों के लिए चारा उपलब्ध कराया। उसने यह भी सुनिश्चित किया कि किसी से बदले में कोई धन न लिया जाए। शुरुआत में लोगों को विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि वे उसके पुराने स्वभाव को जानते थे, लेकिन धीरे-धीरे जब उन्होंने उसके व्यवहार में वास्तविक परिवर्तन देखा, तो उनका संदेह दूर हो गया।

कुछ महीनों बाद राज्य में वर्षा अच्छी हुई। जिन किसानों को सहायता मिली थी, उनकी फसल पहले से कहीं अधिक अच्छी हुई। वे अपनी उपज लेकर नगर आए और व्यापारी का धन्यवाद करने लगे। व्यापारी ने विनम्रता से कहा कि धन्यवाद का वास्तविक अधिकारी वह नहीं, बल्कि वह शिक्षा है जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी। यह समाचार जब अकबर तक पहुँचा, तो उन्होंने विशेष दरबार बुलाया और व्यापारी को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया। पूरे दरबार के सामने अकबर ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार करके स्वयं को बदल ले, वही वास्तव में महान कहलाने योग्य है। सभी दरबारियों ने तालियाँ बजाकर उसका स्वागत किया।

उसी समय एक युवा दरबारी ने बीरबल से प्रश्न किया कि यदि लालच इतना हानिकारक है, तो फिर मनुष्य के मन में यह जन्म ही क्यों लेता है। बीरबल ने मुस्कुराकर उत्तर दिया कि इच्छाएँ होना स्वाभाविक है, क्योंकि उन्हीं से परिश्रम की प्रेरणा मिलती है। समस्या इच्छा में नहीं, बल्कि उस समय शुरू होती है जब इच्छा आवश्यकता की सीमा पार करके लालच बन जाती है। आवश्यकता मनुष्य को आगे बढ़ाती है, जबकि लालच उसे दूसरों का अधिकार छीनने के लिए प्रेरित करता है। जब मनुष्य यह भूल जाता है कि उसके पास कितना है और केवल यह सोचता है कि उसे और कितना चाहिए, तभी उसका विवेक कमजोर होने लगता है। इसलिए संतोष का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य मेहनत करना छोड़ दे, बल्कि यह है कि वह ईमानदारी और न्याय के मार्ग से कभी न हटे।

अकबर ने बीरबल की बात सुनकर कहा कि राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति उसका खजाना नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का चरित्र है। यदि लोग ईमानदार होंगे, तो व्यापार बढ़ेगा, किसान समृद्ध होंगे, न्याय पर विश्वास बना रहेगा और पूरा राज्य प्रगति करेगा। लेकिन यदि लालच लोगों के हृदय में घर कर ले, तो चाहे खजाना कितना भी भर जाए, समाज में अशांति फैल जाएगी। इसलिए उन्होंने घोषणा की कि राज्य के सभी विद्यालयों और गुरुकुलों में बच्चों को सत्य, ईमानदारी और संतोष की शिक्षा दी जाएगी, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल धन कमाने की नहीं, बल्कि अच्छा इंसान बनने की भी प्रेरणा प्राप्त करें।

कुछ समय बाद वही व्यापारी फिर से सफल व्यापारियों में गिना जाने लगा, लेकिन इस बार उसकी पहचान केवल उसकी संपत्ति से नहीं थी। लोग उसकी उदारता, न्यायप्रियता और विनम्रता की चर्चा करने लगे। उसके कर्मचारी उसके साथ सम्मान से काम करते थे, ग्राहक उस पर भरोसा करते थे और गरीब लोग उसे अपना हितैषी मानते थे। व्यापारी स्वयं अक्सर कहा करता था कि पहले उसके पास धन अधिक था और शांति कम, लेकिन अब उसके पास संतोष है, इसलिए उसे अपने जीवन की सबसे बड़ी दौलत मिल गई है। उसकी यह बात सुनकर लोग मुस्कुरा देते और बच्चों को समझाते कि धन कमाना बुरा नहीं, लेकिन धन के लिए अपना चरित्र खो देना सबसे बड़ी मूर्खता है।

एक दिन संध्या के समय अकबर और बीरबल महल के बगीचे में टहल रहे थे। सूर्य अस्त होने वाला था और आकाश सुनहरी आभा से चमक रहा था। अकबर ने शांत स्वर में कहा कि आज उन्हें यह स्पष्ट रूप से समझ में आ गया है कि लालच केवल धन का नहीं होता। कोई पद का लालची होता है, कोई प्रशंसा का, कोई शक्ति का और कोई संपत्ति का। लेकिन हर प्रकार का लालच अंततः मनुष्य के विवेक को कमजोर कर देता है। बीरबल ने उत्तर दिया कि जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पहचानकर संतोष का मार्ग चुनता है, वही जीवन का वास्तविक सुख प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि ईमानदारी से कमाया गया थोड़ा-सा धन भी उस अपार संपत्ति से श्रेष्ठ है, जो छल, कपट और लालच से प्राप्त हुई हो।

अकबर ने उसी क्षण पूरे दरबार के लिए एक संदेश लिखवाया—“धन का सम्मान करो, पर धन को अपना स्वामी मत बनने दो। परिश्रम से कमाओ, न्याय से खर्च करो और आवश्यकता से अधिक मिलने पर उसे समाज के हित में लगाओ। यही सच्ची समृद्धि है।” यह संदेश धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गया और लोगों ने उसे अपने जीवन का मार्गदर्शक बना लिया। वर्षों बाद भी जब कोई व्यक्ति अत्यधिक लालच करने लगता, तो बुज़ुर्ग उसे अकबर और बीरबल की यही कहानी सुनाते और कहते कि लालच का परिणाम कभी सुखद नहीं होता। अंततः वही व्यक्ति सबसे अधिक सम्मान पाता है, जो ईमानदारी, संतोष, दया और परिश्रम को अपना सबसे बड़ा धन मानता है। यही इस कहानी का सार है कि लालच मनुष्य को क्षणिक लाभ तो दे सकता है, लेकिन स्थायी सुख, सम्मान और विश्वास केवल अच्छे चरित्र से ही प्राप्त होते हैं।

 

 

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