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संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

झूठ का अंत

 


 

मुगल सम्राट अकबर का दरबार केवल अपनी शानो-शौकत और वैभव के लिए ही नहीं, बल्कि न्याय, बुद्धिमत्ता और निष्पक्ष निर्णयों के लिए भी पूरे देश में प्रसिद्ध था। उस दरबार की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वहाँ किसी भी व्यक्ति को अपनी समस्या लेकर आने की पूरी स्वतंत्रता थी। अमीर हो या गरीब, व्यापारी हो या किसान, सैनिक हो या साधारण नागरिक—यदि किसी के साथ अन्याय हुआ होता, तो उसे विश्वास रहता कि बादशाह अकबर और उनके प्रिय मंत्री बीरबल अवश्य न्याय करेंगे। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, सूझबूझ और मनुष्य के स्वभाव को समझने की अद्भुत क्षमता के कारण हर कठिन से कठिन विवाद को सरलता से सुलझा देते थे। लोग कहते थे कि यदि सत्य कहीं छिपा हो, तो बीरबल उसे भी खोज निकालते हैं। यही कारण था कि दूर-दूर से लोग न्याय पाने के लिए अकबर के दरबार में आते थे।

एक दिन सुबह का समय था। सूरज की सुनहरी किरणें आगरा के महल पर पड़ रही थीं। दरबार अपनी पूरी भव्यता के साथ सज चुका था। मंत्री, सेनापति, विद्वान और दरबारी अपने-अपने स्थान पर बैठे थे। तभी दरबार के द्वार पर एक साधारण किसान पहुँचा। उसके कपड़े धूल से सने हुए थे, चेहरा थका हुआ था और आँखों में चिंता साफ झलक रही थी। उसने हाथ जोड़कर बादशाह अकबर को प्रणाम किया और बोला, "जहाँपनाह, मैं बहुत बड़ी परेशानी में हूँ। मुझे आपसे न्याय की आशा है।"

अकबर ने शांत स्वर में कहा, "डरो मत। यहाँ सत्य की जीत होती है। अपनी समस्या विस्तार से बताओ।"

किसान ने बताया कि उसका नाम रामू है। उसने वर्षों की मेहनत से थोड़ी-थोड़ी बचत करके सौ स्वर्ण मुद्राएँ इकट्ठी की थीं। कुछ दिन पहले उसे अपने बीमार रिश्तेदार से मिलने दूसरे गाँव जाना पड़ा। जाते समय उसने अपनी सारी जमा पूँजी अपने पड़ोसी श्यामलाल के पास सुरक्षित रखने के लिए दे दी। श्यामलाल गाँव का प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता था। किसान को विश्वास था कि उसकी मेहनत की कमाई पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। लेकिन जब वह वापस लौटा और अपनी स्वर्ण मुद्राएँ माँगीं, तो श्यामलाल ने साफ इनकार कर दिया। उसने कहा कि उसने कभी कोई स्वर्ण मुद्राएँ ली ही नहीं थीं।

दरबार में हलचल मच गई। अकबर ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि श्यामलाल को दरबार में प्रस्तुत किया जाए। थोड़ी ही देर में श्यामलाल दरबार में उपस्थित हुआ। वह अच्छे वस्त्र पहने हुए था और उसके चेहरे पर आत्मविश्वास दिखाई दे रहा था। उसने बादशाह को प्रणाम किया और बोला, "जहाँपनाह, यह किसान झूठ बोल रहा है। इसने मुझे कभी कोई स्वर्ण मुद्राएँ नहीं दीं। यह मुझ पर झूठा आरोप लगा रहा है।"

अब दरबार में दोनों पक्ष आमने-सामने थे। किसान बार-बार कह रहा था कि उसने अपनी सारी पूँजी श्यामलाल को सौंपी थी, जबकि श्यामलाल हर बात से इंकार कर रहा था। दोनों के पास कोई लिखित प्रमाण नहीं था और न ही कोई प्रत्यक्ष गवाह मौजूद था। अकबर कुछ देर तक सोचते रहे, फिर उन्होंने बीरबल की ओर देखा और मुस्कुराकर बोले, "बीरबल, अब इस विवाद का समाधान तुम्हारी बुद्धि ही कर सकती है।"

बीरबल धीरे-धीरे उठे। उन्होंने पहले किसान से कई प्रश्न पूछे। किसान ने बिना झिझक हर प्रश्न का उत्तर दिया। उसने बताया कि उसने किस दिन, किस समय और किस स्थान पर स्वर्ण मुद्राएँ श्यामलाल को दी थीं। फिर बीरबल ने श्यामलाल से भी वही प्रश्न पूछे। श्यामलाल के उत्तर बार-बार बदल रहे थे। कभी वह कहता कि किसान उसके घर आया ही नहीं था, कभी कहता कि आया था लेकिन खाली हाथ था। बीरबल ने उसकी बदलती बातों को ध्यान से देखा, लेकिन तुरंत कोई निर्णय नहीं दिया।

कुछ देर बाद बीरबल ने किसान से पूछा, "जब तुमने स्वर्ण मुद्राएँ श्यामलाल को दी थीं, तब वहाँ कौन उपस्थित था?"

किसान ने कुछ देर सोचकर उत्तर दिया, "वहाँ कोई मनुष्य तो नहीं था, लेकिन हम दोनों गाँव के बाहर एक बहुत बड़े बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे। उसी पेड़ की छाया में मैंने थैली उसे सौंपी थी।"

बीरबल ने गंभीरता से सिर हिलाया और बोले, "अच्छा, यदि कोई मनुष्य गवाह नहीं है, तो वही बरगद का पेड़ गवाही देगा। तुम अभी उसी पेड़ के पास जाओ और उससे कहना कि बीरबल ने उसे दरबार में गवाही देने के लिए बुलाया है।"

दरबारियों ने यह बात सुनी तो एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। कई लोगों को लगा कि शायद बीरबल कोई अनोखी योजना बना रहे हैं। किसान ने बिना कोई प्रश्न किए बीरबल की बात मानी और तुरंत बरगद के पेड़ की ओर चल पड़ा।

किसान के जाते ही बीरबल सामान्य विषयों पर दरबार में चर्चा करने लगे। कुछ समय बीत गया। फिर अचानक उन्होंने श्यामलाल से सहज भाव से पूछा, "क्या तुम्हें लगता है कि किसान अब तक उस बरगद के पेड़ तक पहुँच गया होगा?"

श्यामलाल ने बिना सोचे-समझे उत्तर दे दिया, "नहीं, अभी कहाँ पहुँचा होगा! वह पेड़ तो गाँव से काफी दूर है। वहाँ तक पहुँचने में अभी समय लगेगा।"

इतना कहते ही बीरबल मुस्कुरा दिए। पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर ने भी ध्यान से श्यामलाल की ओर देखा। बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "श्यामलाल, तुमने अभी कहा कि किसान उस पेड़ तक नहीं पहुँचा होगा क्योंकि वह बहुत दूर है। यदि तुम कभी उस स्थान पर गए ही नहीं, जैसा कि तुम दावा कर रहे हो, तो तुम्हें यह कैसे पता कि वह बरगद गाँव से कितनी दूर है?"

श्यामलाल का चेहरा पीला पड़ गया। वह कुछ क्षण तक चुप खड़ा रहा। उसके माथे पर पसीना छलक आया। वह कोई उत्तर नहीं दे पाया। दरबारियों को समझ में आ गया कि वह स्वयं अपने झूठ के जाल में फँस चुका है।

इसी बीच किसान भी लौट आया। उसने हाथ जोड़कर कहा, "हुजूर, मैंने आपकी आज्ञा के अनुसार बरगद के पेड़ से कहा कि वह दरबार में आकर गवाही दे, लेकिन वह तो वहीं खड़ा रहा।"

बीरबल मुस्कुराकर बोले, "वह पेड़ अपनी गवाही पहले ही दे चुका है।"

किसान आश्चर्य से बीरबल की ओर देखने लगा। तब बीरबल ने पूरी बात सबको समझाई कि श्यामलाल ने अनजाने में यह स्वीकार कर लिया कि वह उस स्थान पर गया था जहाँ किसान ने स्वर्ण मुद्राएँ देने की बात कही थी। यदि वह वहाँ कभी गया ही नहीं होता, तो उसे पेड़ की दूरी का ज्ञान कैसे होता?

अब श्यामलाल पूरी तरह घबरा गया। उसने बादशाह अकबर के सामने हाथ जोड़ दिए और काँपती आवाज़ में बोला, "जहाँपनाह, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। लालच ने मेरी बुद्धि छीन ली थी। किसान ने वास्तव में मुझे सौ स्वर्ण मुद्राएँ सुरक्षित रखने के लिए दी थीं। मैंने सोचा कि कोई गवाह नहीं है, इसलिए मैं आसानी से मुकर जाऊँगा। लेकिन मैं बीरबल की बुद्धिमानी के सामने हार गया। कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए।"

अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, "जो व्यक्ति विश्वास तोड़ता है और झूठ बोलकर किसी की मेहनत की कमाई हड़पने का प्रयास करता है, वह दया का पात्र नहीं होता।"

उन्होंने आदेश दिया कि श्यामलाल तुरंत किसान की सौ स्वर्ण मुद्राएँ वापस करे। साथ ही दंडस्वरूप उसे अतिरिक्त बीस स्वर्ण मुद्राएँ भी किसान को देनी होंगी, ताकि उसे हुए मानसिक कष्ट की भरपाई हो सके। इसके अतिरिक्त श्यामलाल पर जुर्माना लगाया गया और चेतावनी दी गई कि यदि भविष्य में उसने किसी के साथ छल किया, तो उससे भी कठोर दंड दिया जाएगा।

किसान की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने अपनी स्वर्ण मुद्राएँ वापस प्राप्त कीं और हाथ जोड़कर बादशाह अकबर तथा बीरबल का आभार व्यक्त किया। उसने कहा, "आज मुझे केवल मेरी धनराशि ही नहीं मिली, बल्कि न्याय पर मेरा विश्वास भी और अधिक मजबूत हो गया है।"

दरबार में उपस्थित सभी लोगों ने बीरबल की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। कई दरबारी जो पहले बरगद के पेड़ वाली बात पर मुस्कुरा रहे थे, अब समझ चुके थे कि सच्चा न्याय केवल बल या प्रमाण से ही नहीं, बल्कि सूझबूझ और मनुष्य के मन को समझने की क्षमता से भी किया जाता है।

उस दिन के बाद श्यामलाल ने कभी किसी के साथ छल करने का साहस नहीं किया। उसने ईमानदारी का मार्ग अपनाया और लोगों का खोया हुआ विश्वास वापस पाने का प्रयास किया। गाँव के लोग भी इस घटना को वर्षों तक याद रखते रहे और अपने बच्चों को सुनाते रहे कि झूठ चाहे कितना भी चतुराई से बोला जाए, एक न एक दिन उसका अंत अवश्य होता है।

सम्राट अकबर ने दरबार समाप्त होने के बाद बीरबल से कहा, "तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि तुम कठिन प्रश्नों का उत्तर जानते हो, बल्कि यह है कि तुम मनुष्य के मन में छिपे सत्य को पहचान लेते हो।"

बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, "महाराज, सत्य को छिपाने के लिए झूठ को बार-बार बदलना पड़ता है, लेकिन सत्य को याद रखने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए अंत में जीत हमेशा सत्य की ही होती है।"

अकबर ने संतोषपूर्वक सिर हिलाया। दरबार में उपस्थित सभी लोगों ने यह सीख अपने हृदय में बसा ली कि विश्वास सबसे बड़ी संपत्ति है और झूठ का जीवन बहुत छोटा होता है। चाहे कोई कितना भी चालाक क्यों न हो, एक छोटी-सी भूल उसके सारे छल को उजागर कर देती है। जो व्यक्ति ईमानदारी, सत्य और विश्वास का मार्ग अपनाता है, वही अंततः सम्मान, सफलता और सुख प्राप्त करता है।

तो दोस्तों

 झूठ चाहे कुछ समय के लिए जीतता हुआ दिखाई दे, लेकिन अंत में सत्य की ही विजय होती है। ईमानदारी और विश्वास जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं, जबकि लालच और झूठ अंततः अपमान और दंड का कारण बनते हैं।

 

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