मुगल सम्राट अकबर अपने न्याय, बुद्धिमत्ता और प्रजावत्सल स्वभाव के लिए दूर-दूर तक
प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में अनेक विद्वान, कवि, सेनापति और मंत्री उपस्थित
रहते थे, लेकिन उन सबमें सबसे अलग पहचान थी बीरबल की। बीरबल केवल चतुर ही नहीं थे,
बल्कि वे किसी
भी कठिन परिस्थिति का समाधान अपनी सूझबूझ, विनोदप्रियता और तर्कशक्ति से निकाल लेते थे।
यही कारण था कि अकबर उन्हें विशेष सम्मान देते थे। हालांकि दरबार के कुछ मंत्री और
दरबारी इस बात से ईर्ष्या रखते थे। उन्हें लगता था कि बीरबल को आवश्यकता से अधिक
महत्व दिया जाता है। वे अक्सर ऐसे अवसर खोजते रहते थे, जिनसे बीरबल को नीचा दिखाया
जा सके, लेकिन हर बार बीरबल अपनी बुद्धिमानी से सभी को निरुत्तर कर देते थे।
एक दिन गर्मियों का मौसम था। राजमहल के बगीचों में आम के पेड़ों पर मीठे और
रसीले आम पक चुके थे। पूरे राज्य में आमों की सुगंध फैली हुई थी। अकबर को आम बहुत
पसंद थे। उन्होंने सोचा कि क्यों न आज दोपहर का समय अपने प्रिय मंत्री बीरबल के
साथ बिताया जाए और साथ ही स्वादिष्ट आमों का आनंद लिया जाए। उन्होंने शाही बाग से
सबसे अच्छे और पके हुए आम मंगवाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में सोने की सुंदर
थालियों में अलग-अलग किस्म के आम सजाकर राजमहल में प्रस्तुत किए गए। उनकी सुगंध
इतनी मनमोहक थी कि वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के मुँह में पानी आ गया।
अकबर और बीरबल दोनों संगमरमर के चबूतरे पर बैठ गए। सेवकों ने बड़े आदर के साथ
आम धोकर, काटकर और कुछ पूरे आम भी सामने रख दिए। अकबर ने मुस्कराते हुए कहा,
"बीरबल, आज देखना कौन अधिक आम खाता है।" बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया,
"जहाँपनाह, मैं तो केवल स्वाद का आनंद लेने आया हूँ। प्रतियोगिता करना
मेरा उद्देश्य नहीं है।" अकबर हँस पड़े और बोले, "फिर भी देखते हैं कि अंत
में किसके सामने अधिक गुठलियाँ जमा होती हैं।"
दोनों आम खाने लगे। आम इतने मीठे थे कि एक के बाद एक खाते चले गए। बातचीत भी
चलती रही। अकबर कभी राज्य के विषय में चर्चा करते, कभी बगीचों की सुंदरता की
प्रशंसा करते और कभी बीरबल से मज़ेदार प्रश्न पूछते। बीरबल भी अपनी चतुराई से हर
बात का उत्तर देते रहे। वातावरण अत्यंत आनंदमय था।
कुछ देर बाद अकबर के मन में शरारत सूझी। उन्होंने सोचा कि आज बीरबल के साथ
थोड़ा मज़ाक किया जाए। जब भी वे कोई आम समाप्त करते, उसकी गुठली और छिलका चुपचाप
उठाकर बीरबल की ओर सरका देते। बीरबल सारी बात देख रहे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं
कहा। वे शांत भाव से आम खाते रहे और ऐसा व्यवहार करते रहे मानो उन्हें कुछ पता ही
न हो।
धीरे-धीरे बीरबल के सामने गुठलियों का बड़ा ढेर बन गया। देखने वाला कोई भी
व्यक्ति यही समझता कि बीरबल ने ही इतने सारे आम खाए हैं। दूसरी ओर अकबर के सामने
बहुत कम गुठलियाँ दिखाई दे रही थीं। तभी कुछ दरबारी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा
कि बीरबल के सामने गुठलियों का ढेर लगा है और अकबर के सामने बहुत कम। अकबर
मुस्कराए और ऊँची आवाज़ में बोले, "देखो, बीरबल कितने लालची निकले। इन्होंने तो इतने आम
खा लिए कि गुठलियों का पहाड़ लगा दिया। लगता है इन्होंने मेरे हिस्से के आम भी खा
लिए।"
दरबारियों में से कुछ, जो पहले से ही बीरबल से ईर्ष्या रखते थे, तुरंत हँसने
लगे। वे बोले, "सचमुच, बीरबल तो बड़े भोजनप्रिय निकले। हमें तो विश्वास ही नहीं था
कि वे इतने आम खा सकते हैं।" कुछ लोग अकबर की बात सुनकर मुस्कराने लगे।
उन्हें लगा कि आज पहली बार बीरबल किसी मज़ाक में फँस गए हैं।
बीरबल ने सबकी बातें शांतिपूर्वक सुनीं। उनके चेहरे पर न तो घबराहट थी और न ही
क्रोध। वे जानते थे कि सम्राट केवल विनोद कर रहे हैं, लेकिन साथ ही वे यह भी
समझते थे कि यदि समय पर उत्तर न दिया जाए तो लोग भ्रमित हो सकते हैं। उन्होंने
धीरे से पानी पिया, हाथ धोए और विनम्र स्वर में बोले, "जहाँपनाह,
यदि अनुमति हो
तो मैं भी एक छोटी-सी बात कहूँ?"
अकबर ने हँसते हुए कहा, "अवश्य बीरबल, अब तुम अपनी सफाई दो। इतने सारे आम खाने का क्या
कारण है?" दरबारी उत्सुकता से बीरबल की ओर देखने लगे।
बीरबल मुस्कराए और बोले, "महाराज, आपने सही कहा कि मेरे सामने गुठलियों का ढेर है। लेकिन मैं
तो केवल आम खाकर उनकी गुठलियाँ छोड़ता हूँ। आश्चर्य की बात तो यह है कि आपके सामने
गुठलियाँ और छिलके बहुत कम हैं। इसका अर्थ तो यही हुआ कि आपने केवल आम ही नहीं,
बल्कि उनकी
गुठलियाँ और छिलके भी खा लिए होंगे।"
एक पल के लिए पूरा वातावरण शांत हो गया। अगले ही क्षण अकबर ज़ोर से ठहाका
लगाकर हँस पड़े। दरबारी भी अपनी हँसी रोक न सके। जो लोग अभी तक बीरबल का मज़ाक
उड़ा रहे थे, वे शर्मिंदा होकर एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। अकबर ने हँसते-हँसते कहा,
"बीरबल, तुमने एक बार फिर अपनी बुद्धिमानी से मुझे ही निरुत्तर कर दिया। वास्तव में
मैं ही तुम्हारी ओर गुठलियाँ सरका रहा था और तुम सब समझते हुए भी शांत बैठे
रहे।"
बीरबल ने आदरपूर्वक सिर झुकाया और बोले, "महाराज, कभी-कभी सही
समय पर दिया गया उत्तर किसी भी आरोप से अधिक प्रभावशाली होता है। यदि मैं तुरंत
विरोध करता, तो मज़ाक का आनंद समाप्त हो जाता। इसलिए मैंने उचित अवसर की प्रतीक्षा
की।"
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, "यही कारण है कि मैं तुम्हें सबसे अधिक सम्मान
देता हूँ। बुद्धिमानी केवल कठिन प्रश्नों का उत्तर देने में नहीं, बल्कि धैर्य
रखने और उचित समय पर सही बात कहने में भी होती है।"
यह सुनकर सभी दरबारी सहमत हो गए। उन्हें समझ में आ गया कि बीरबल की सबसे बड़ी
शक्ति उनका धैर्य, उनकी तीक्ष्ण बुद्धि और परिस्थितियों को समझने की क्षमता
है। ईर्ष्यालु दरबारियों ने भी मन ही मन स्वीकार किया कि बीरबल को हराना आसान नहीं
है।
उस दिन के बाद यह घटना पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गई। लोग हँसते हुए
एक-दूसरे को यह कहानी सुनाते और कहते कि केवल दिखाई देने वाली बातों पर विश्वास
नहीं करना चाहिए। कई बार सच्चाई कुछ और होती है, जिसे समझने के लिए विवेक और
धैर्य की आवश्यकता होती है।
अकबर और बीरबल ने उस दिन साथ बैठकर फिर से आम खाए। इस बार अकबर ने हँसते हुए
सारी गुठलियाँ अपने सामने ही रखीं। बीरबल भी मुस्कराए और बोले, "जहाँपनाह,
आज तो कोई यह
नहीं कहेगा कि मैंने आपके हिस्से के आम खा लिए।" दोनों फिर से हँस पड़े और
पूरा वातावरण आनंद से भर गया।
इस छोटी-सी घटना में एक गहरा संदेश छिपा है। जीवन में कई बार लोग बिना पूरी
सच्चाई जाने किसी के बारे में राय बना लेते हैं। कभी-कभी दूसरों की बातों में आकर
किसी निर्दोष व्यक्ति को दोषी मान लिया जाता है। ऐसे समय में क्रोधित होने या
जल्दबाज़ी करने के बजाय धैर्य और बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए। सही समय पर दिया
गया तर्कपूर्ण उत्तर सबसे प्रभावशाली होता है। बीरबल ने यह भी सिखाया कि हास्य और
विनम्रता के साथ कही गई बात किसी भी विवाद को सहजता से समाप्त कर सकती है।
इस प्रकार "अकबर और आम की गुठली" की यह प्रसिद्ध कहानी हमें सिखाती
है कि बुद्धिमत्ता का अर्थ केवल ज्ञान होना नहीं है, बल्कि सही समय पर सही
निर्णय लेना, धैर्य बनाए रखना और परिस्थिति के अनुसार उत्तर देना भी उतना ही आवश्यक है। यही
गुण बीरबल को महान बनाते हैं और यही कारण है कि उनकी कहानियाँ आज भी बच्चों और
बड़ों को समान रूप से प्रेरित करती हैं।
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