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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

किसकी रोटी बेहतर?

 



 

मुगल सम्राट अकबर का दरबार अपनी भव्यता, न्यायप्रियता और विद्वानों की उपस्थिति के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था। दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएँ लेकर दरबार में आते थे और विश्वास करते थे कि यहाँ उन्हें अवश्य न्याय मिलेगा। अकबर स्वयं भी प्रजा की भलाई के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनके सबसे प्रिय मंत्री बीरबल अपनी असाधारण बुद्धि, चतुराई और सूझ-बूझ के कारण सबके सम्मान के पात्र थे। बीरबल केवल कठिन विवादों का समाधान ही नहीं करते थे, बल्कि साधारण-सी दिखने वाली बातों में भी ऐसी सीख छिपा देते थे जिसे लोग जीवन भर याद रखते थे।

एक दिन प्रातःकाल अकबर अपने महल की खिड़की से नगर का दृश्य देख रहे थे। नीचे सड़क पर लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। कोई व्यापारी अपनी दुकान सजा रहा था, कोई किसान बैलगाड़ी लेकर खेतों की ओर जा रहा था, तो कहीं महिलाएँ घरों के सामने झाड़ू लगा रही थीं। तभी अकबर के मन में एक विचार आया। उन्होंने सोचा कि राज्य में रहने वाले अलग-अलग लोगों का जीवन कितना भिन्न है। कोई महल में स्वादिष्ट भोजन करता है, तो कोई मेहनत करके साधारण रोटी खाता है। लेकिन क्या केवल स्वाद ही भोजन को श्रेष्ठ बनाता है, या उसके पीछे छिपी मेहनत और ईमानदारी भी उसे विशेष बनाती है?

यह प्रश्न उनके मन में घूमता रहा। उसी समय उन्होंने बीरबल को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।

कुछ ही देर में बीरबल हाथ जोड़कर दरबार में उपस्थित हुए।

अकबर मुस्कुराए और बोले, "बीरबल, आज मेरे मन में एक विचित्र प्रश्न उठा है।"

"आज्ञा दीजिए जहाँपनाह।"

"बताओ, सबसे अच्छी रोटी किसकी होती है?"

यह प्रश्न सुनते ही पूरा दरबार चौंक गया। कुछ दरबारी एक-दूसरे की ओर देखने लगे। उन्हें लगा कि यह कोई साधारण प्रश्न नहीं है। अवश्य ही इसके पीछे कोई गहरी बात छिपी होगी।

बीरबल ने बिना देर किए उत्तर दिया, "महाराज, सबसे अच्छी रोटी उस व्यक्ति की होती है जो ईमानदारी और परिश्रम से उसे कमाता है।"

अकबर मुस्कुराए, लेकिन बोले, "उत्तर तो अच्छा है, पर मैं इसे प्रमाण सहित देखना चाहता हूँ।"

कुछ दरबारी, जो हमेशा बीरबल से ईर्ष्या करते थे, तुरंत बोले, "जहाँपनाह, यदि केवल मेहनत ही सब कुछ है, तो महल के रसोइयों द्वारा बनाई गई स्वादिष्ट रोटी से अच्छी कोई रोटी कैसे हो सकती है?"

दूसरे दरबारी ने कहा, "मेरा विचार है कि सबसे अच्छी रोटी अमीर व्यापारी के घर की होती है, क्योंकि वहाँ शुद्ध घी, बढ़िया आटा और उत्तम मसालों का उपयोग होता है।"

तीसरे ने कहा, "नहीं, सैनिकों की रोटी सबसे अच्छी होती है, क्योंकि वे देश की रक्षा करते हैं।"

दरबार में अलग-अलग मत सुनाई देने लगे। हर व्यक्ति अपनी बात को सही साबित करने में लगा था।

अकबर ने सबकी बातें सुनीं और फिर बीरबल से कहा, "तुम्हें तीन दिन का समय दिया जाता है। तीन दिन बाद तुम इस प्रश्न का ऐसा उत्तर दोगे जिसे देखकर पूरा दरबार संतुष्ट हो जाए।"

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "जैसी आज्ञा, जहाँपनाह।"

अगले ही दिन बीरबल साधारण कपड़े पहनकर नगर भ्रमण पर निकल पड़े। वे किसी मंत्री की तरह नहीं, बल्कि एक सामान्य नागरिक की तरह लोगों के बीच घूमने लगे। सबसे पहले वे एक बड़े व्यापारी के घर पहुँचे।

व्यापारी ने उनका स्वागत किया और स्वादिष्ट भोजन परोसा। थाली में घी से चुपड़ी गरम-गरम रोटियाँ, सुगंधित सब्जियाँ, मिठाइयाँ और कई प्रकार के व्यंजन थे।

बीरबल ने भोजन करते हुए पूछा, "भाई, तुम इतना धन कैसे कमाते हो?"

व्यापारी ने गर्व से कहा, "मैं दूर-दूर के नगरों में व्यापार करता हूँ।"

बातों-बातों में बीरबल को पता चला कि व्यापारी कई बार नाप-तौल में ग्राहकों को धोखा देता है। कभी कम माल देता है, तो कभी अधिक मूल्य वसूलता है।

भोजन समाप्त होने पर बीरबल ने मन ही मन सोचा, "भले ही रोटी स्वादिष्ट है, लेकिन यदि उसकी कमाई बेईमानी से हुई है, तो यह वास्तव में श्रेष्ठ नहीं हो सकती।"

इसके बाद वे एक धनी साहूकार के घर पहुँचे।

साहूकार ने भी उनका खूब आदर किया और मक्खन लगी मुलायम रोटियाँ परोसीं।

बातचीत के दौरान बीरबल ने पूछा, "तुम्हारे पास इतना धन कैसे आया?"

साहूकार ने हँसते हुए कहा, "मैं गरीब किसानों को ऊँचे ब्याज पर पैसा उधार देता हूँ। समय पर पैसा न लौटाने पर उनकी जमीन और पशु अपने कब्जे में ले लेता हूँ।"

बीरबल ने देखा कि उस व्यक्ति के घर में धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसके व्यवहार में दया और करुणा का अभाव था।

उन्होंने वहाँ से विदा ली।

दोपहर ढलने लगी थी। चलते-चलते बीरबल नगर से बाहर खेतों की ओर निकल गए। वहाँ उन्होंने एक वृद्ध किसान को देखा जो तेज धूप में हल चला रहा था। उसके कपड़े साधारण थे। चेहरे पर पसीना बह रहा था, लेकिन आँखों में संतोष झलक रहा था।

कुछ देर बाद किसान पेड़ की छाया में बैठा। उसने अपनी छोटी-सी पोटली खोली। उसमें दो मोटी बाजरे की रोटियाँ, थोड़ा-सा नमक, प्याज और हरी मिर्च थी।

किसान ने बीरबल को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "भाई, आओ। मेरे पास अधिक तो कुछ नहीं, लेकिन यदि भूख लगी हो तो मेरे साथ रोटी खा लो।"

बीरबल ने बिना संकोच उसके पास बैठकर रोटी खानी शुरू की।

रोटी सादी थी, घी भी नहीं था, लेकिन किसान के चेहरे पर आत्मीयता और संतोष था।

बीरबल ने पूछा, "तुम पूरे दिन इतनी मेहनत करते हो। क्या कभी शिकायत नहीं होती कि तुम्हें इतना साधारण भोजन मिलता है?"

किसान मुस्कुराया और बोला, "शिकायत क्यों करूँ? यह रोटी मेरे अपने पसीने की कमाई है। इसे खाते समय मन को शांति मिलती है। मेहनत की कमाई से मिली सूखी रोटी भी मुझे किसी राजा के भोज से कम नहीं लगती।"

किसान की बात सुनकर बीरबल के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

उन्हें लगा कि शायद उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका है।

लेकिन वे अभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने निश्चय किया कि अगले दिन वे कुछ और लोगों से मिलेंगे और फिर दरबार में ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करेंगे कि कोई भी उनके उत्तर पर संदेह न कर सके।

यही सोचते हुए बीरबल महल की ओर लौट पड़े। उनके मन में एक नई योजना जन्म ले चुकी थी।

अगली सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ ही बीरबल फिर से साधारण वेश में नगर भ्रमण के लिए निकल पड़े। उनके मन में केवल एक ही उद्देश्य था—सम्राट अकबर के प्रश्न का ऐसा उत्तर खोजना, जिसे केवल शब्दों से नहीं बल्कि प्रमाणों से सिद्ध किया जा सके। पिछले दिन उन्होंने व्यापारी, साहूकार और किसान के जीवन को देखा था। अब वे समाज के अन्य लोगों से मिलकर यह समझना चाहते थे कि भोजन का वास्तविक स्वाद किस बात में छिपा होता है।

चलते-चलते वे नगर के मुख्य द्वार पर पहुँचे, जहाँ राज्य के सैनिक पहरा दे रहे थे। उनमें से एक युवा सैनिक कई घंटों से धूप में खड़ा था। उसके चेहरे पर थकान तो थी, लेकिन कर्तव्य के प्रति समर्पण भी साफ दिखाई देता था। दोपहर होने पर उसे विश्राम का समय मिला। उसने अपने थैले से दो गेहूँ की रोटियाँ, थोड़ा-सा गुड़ और छाछ निकाली।

बीरबल उसके पास जाकर बैठ गए और बोले, "भाई, यदि अनुमति हो तो मैं भी तुम्हारे साथ भोजन कर लूँ?"

सैनिक मुस्कुराया और बोला, "अतिथि का स्वागत करना हमारा धर्म है। आइए, जो है वही मिलकर खाते हैं।"

भोजन करते हुए बीरबल ने पूछा, "इतनी कठिन ड्यूटी, इतनी गर्मी और इतना साधारण भोजन—क्या तुम्हें कभी शिकायत नहीं होती?"

सैनिक ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "शिकायत किस बात की? यह रोटी मेरे कर्तव्य की कमाई है। जब मैं जानता हूँ कि मेरी वजह से राज्य के लोग सुरक्षित हैं, तब यह साधारण भोजन भी मुझे अमृत जैसा लगता है।"

बीरबल ने उसके उत्तर को ध्यान से सुना। उन्होंने मन ही मन सोचा कि ईमानदारी और कर्तव्य भी भोजन का स्वाद बढ़ा देते हैं।

वहाँ से आगे बढ़ते हुए वे नगर में बन रहे एक नए पुल के पास पहुँचे। कई मजदूर पत्थर ढो रहे थे, कोई मिट्टी खोद रहा था तो कोई ईंटें जमा रहा था। सभी अपने काम में पूरी लगन से लगे थे।

दोपहर के समय एक मजदूर पेड़ की छाया में बैठा। उसने अपनी पत्नी द्वारा बनाई गई मोटी रोटियाँ और दाल निकाली। तभी उसने देखा कि पास ही बैठे एक बूढ़े भिखारी के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है।

बिना एक क्षण सोचे मजदूर ने अपनी आधी रोटियाँ उस बूढ़े को दे दीं।

बूढ़े ने भावुक होकर कहा, "बेटा, तुम स्वयं मेहनत करते हो, फिर भी अपना भोजन मुझे दे रहे हो?"

मजदूर मुस्कुराया और बोला, "बाबा, यदि मेरी रोटी से किसी की भूख मिट जाए, तो यही सबसे बड़ा सुख है।"

यह दृश्य देखकर बीरबल का हृदय प्रसन्न हो उठा। उन्हें लगा कि भोजन का स्वाद केवल मेहनत से ही नहीं, बल्कि उदारता से भी बढ़ जाता है।

शाम होने से पहले वे महल लौट आए। इस बार वे सीधे राजकीय रसोईघर पहुँचे। वहाँ दर्जनों रसोइए स्वादिष्ट व्यंजन बनाने में लगे हुए थे। बड़े-बड़े तंदूर जल रहे थे, घी की सुगंध पूरे वातावरण में फैल रही थी और सुनहरी रोटियाँ एक के बाद एक तैयार हो रही थीं।

मुख्य रसोइए ने बीरबल का स्वागत किया और कहा, "मंत्री जी, आज हमने महाराज के लिए विशेष भोजन तैयार किया है। कृपया इसका स्वाद चखिए।"

बीरबल ने रोटी का एक टुकड़ा खाया। वह अत्यंत स्वादिष्ट थी।

उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, "तुम्हें यह भोजन बनाकर कैसा लगता है?"

रसोइए ने गर्व से कहा, "महाराज और पूरा राजपरिवार हमारे हाथ का भोजन खाते हैं। यही हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।"

बीरबल ने देखा कि यह भोजन उत्कृष्ट था, लेकिन उसका स्वाद रसोइए की मेहनत और समर्पण के कारण था, केवल घी और मसालों के कारण नहीं।

अब बीरबल को अपने प्रश्न का उत्तर पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था।

अगले दिन दरबार लगने वाला था। बीरबल ने एक विशेष योजना बनाई। उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि अगले दिन अलग-अलग लोगों द्वारा बनाई गई रोटियाँ दरबार में लाई जाएँ। किसी को यह न बताया जाए कि कौन-सी रोटी किसकी है।

तीसरे दिन सुबह पूरा दरबार सजा। सभी दरबारी उत्सुक थे कि बीरबल अब क्या करने वाले हैं।

अकबर ने मुस्कुराते हुए पूछा, "बीरबल, क्या तुम्हें मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया?"

बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, "जी जहाँपनाह, आज केवल उत्तर ही नहीं, उसका प्रमाण भी आपके सामने होगा।"

इतने में चार ढकी हुई थालियाँ दरबार में लाई गईं। पहली में व्यापारी के घर की घी लगी रोटियाँ थीं। दूसरी में महल की रसोई की मुलायम रोटियाँ। तीसरी में सैनिक की साधारण गेहूँ की रोटियाँ और चौथी में किसान की बाजरे की मोटी रोटियाँ।

लेकिन किसी को यह नहीं बताया गया कि कौन-सी थाली किसकी है।

बीरबल ने सभी दरबारियों से कहा, "आप लोग इन रोटियों का स्वाद चखिए और बताइए कि कौन-सी सबसे अच्छी है।"

दरबारी एक-एक करके रोटियाँ खाने लगे। अधिकांश ने घी लगी रोटियों की प्रशंसा की। कुछ ने महल की रोटियों को सबसे स्वादिष्ट बताया। किसी ने कहा कि बाजरे की रोटी भी अच्छी है, लेकिन स्वाद में साधारण है।

जब सभी अपनी राय दे चुके, तब बीरबल मुस्कुराए।

उन्होंने कहा, "अब समय आ गया है कि इन रोटियों का वास्तविक परिचय बताया जाए।"

पूरा दरबार उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगा।

पूरा दरबार शांत था। सभी की निगाहें बीरबल पर टिकी थीं। सम्राट अकबर भी उत्सुक थे कि अब बीरबल इस अनोखी परीक्षा का परिणाम किस प्रकार बताएँगे। चारों थालियाँ अभी भी दरबार के बीचों-बीच रखी थीं। उनमें रखी रोटियाँ देखने में लगभग एक जैसी लग रही थीं, लेकिन बीरबल जानते थे कि उनके पीछे की कहानी ही उनका वास्तविक मूल्य निर्धारित करेगी।

बीरबल ने पहली थाली की ओर संकेत करते हुए कहा, "महाराज, इस थाली की रोटियाँ उस धनी व्यापारी के घर की हैं, जो ग्राहकों को कम तौलकर और अधिक मूल्य लेकर धन कमाता है। इन रोटियों में घी बहुत है, स्वाद भी उत्तम है, लेकिन इनकी कमाई पूरी तरह ईमानदार नहीं है।"

दरबार में बैठे कई लोगों ने आश्चर्य से एक-दूसरे की ओर देखा।

फिर बीरबल दूसरी थाली के पास पहुँचे और बोले, "ये रोटियाँ महल की रसोई में बनी हैं। इन्हें बनाने वाले रसोइए दिन-रात मेहनत करते हैं। उनका उद्देश्य केवल स्वादिष्ट भोजन बनाना नहीं, बल्कि पूरे समर्पण के साथ अपना कर्तव्य निभाना है। इसलिए इन रोटियों में मेहनत और निष्ठा का स्वाद है।"

अकबर ने सहमति में सिर हिलाया।

अब बीरबल तीसरी थाली के पास गए।

"ये साधारण गेहूँ की रोटियाँ उस सैनिक की हैं, जो दिन-रात राज्य की रक्षा करता है। धूप, वर्षा और ठंडी हवाओं की परवाह किए बिना वह अपनी ड्यूटी निभाता है। उसके भोजन में भले ही अनेक व्यंजन न हों, लेकिन उसमें देशभक्ति, अनुशासन और कर्तव्य का सम्मान मिला हुआ है।"

सैनिकों की पंक्ति में बैठे सभी वीर गर्व से मुस्कुरा उठे।

अब बीरबल चौथी और अंतिम थाली के सामने पहुँचे। उसमें बाजरे की मोटी रोटियाँ रखी थीं।

उन्होंने उन्हें अपने हाथ में उठाया और बड़े सम्मान से कहा, "महाराज, ये रोटियाँ उस वृद्ध किसान की हैं, जो सुबह से शाम तक खेत में पसीना बहाता है। उसके पास न घी है, न मिठाइयाँ और न ही महंगे व्यंजन। लेकिन उसकी हर रोटी उसकी ईमानदार मेहनत और संतोष की कमाई है।"

दरबार में सन्नाटा छा गया।

बीरबल ने आगे कहा, "उस किसान ने अपनी साधारण रोटी मेरे साथ बिना किसी स्वार्थ के बाँट ली। उसके चेहरे पर संतोष था, मन में किसी के प्रति छल नहीं था और उसकी कमाई पूरी तरह पवित्र थी। इसलिए मेरे विचार में सबसे श्रेष्ठ रोटी उसी की है।"

इतना कहकर बीरबल कुछ क्षण मौन रहे।

फिर उन्होंने अकबर की ओर देखकर कहा, "जहाँपनाह, स्वाद जीभ को कुछ क्षणों का सुख देता है, लेकिन ईमानदार कमाई मन को जीवन भर का संतोष देती है। जिस भोजन में मेहनत, सच्चाई और आत्मसम्मान मिला हो, वही वास्तव में सबसे स्वादिष्ट और श्रेष्ठ होता है।"

अकबर गहरे विचार में डूब गए।

उन्होंने दरबारियों की ओर देखा और पूछा, "अब तुम लोग क्या सोचते हो?"

एक दरबारी, जिसने पहले व्यापारी की रोटियों को सबसे अच्छा बताया था, विनम्र होकर बोला, "महाराज, हमने केवल स्वाद देखा था। आज समझ में आया कि भोजन का असली मूल्य उसकी कमाई में छिपा होता है।"

दूसरे दरबारी ने कहा, "यदि भोजन बेईमानी से कमाए गए धन से बना हो, तो चाहे वह कितना भी स्वादिष्ट क्यों न हो, वह सम्मान के योग्य नहीं हो सकता।"

तीसरे दरबारी ने कहा, "आज बीरबल ने हमें सिखाया है कि साधारण रोटी भी महान बन सकती है, यदि वह ईमानदार परिश्रम से कमाई गई हो।"

अकबर के चेहरे पर संतोष की मुस्कान फैल गई।

उन्होंने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि उस किसान, सैनिक, मजदूर और महल के रसोइए को सम्मान सहित दरबार में बुलाया जाए।

कुछ ही समय बाद चारों उपस्थित हुए। उन्हें यह भी नहीं पता था कि उन्हें किस कारण बुलाया गया है।

अकबर अपने सिंहासन से उठे और स्वयं किसान के पास जाकर बोले, "तुम्हारी मेहनत पूरे राज्य के लिए प्रेरणा है। तुम्हारी रोटी ने आज हमारे दरबार को एक अमूल्य शिक्षा दी है।"

किसान घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज, मैंने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया है।"

अकबर ने मुस्कुराकर कहा, "यही तो सबसे बड़ी बात है।"

उन्होंने किसान को उत्तम बीज, नए कृषि उपकरण और कुछ उपजाऊ भूमि पुरस्कार स्वरूप देने की घोषणा की, ताकि वह और अधिक सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके।

इसके बाद सैनिक को उसकी निष्ठा के लिए सम्मानित किया गया। मजदूर को उसकी उदारता के लिए पुरस्कार मिला, क्योंकि उसने अपनी भूख से पहले एक भूखे वृद्ध का पेट भरा था। महल के रसोइए को भी उसके समर्पण और सेवा के लिए सम्मानित किया गया।

अंत में अकबर ने पूरे दरबार को संबोधित करते हुए कहा, "आज बीरबल ने हमें यह समझाया है कि भोजन की श्रेष्ठता उसके स्वाद में नहीं, बल्कि उसे कमाने के तरीके में होती है। ईमानदारी से कमाई गई सूखी रोटी भी उस शाही भोज से श्रेष्ठ है, जो छल और अन्याय से प्राप्त धन से बना हो।"

पूरा दरबार तालियों और प्रशंसा की आवाज़ से गूँज उठा।

बीरबल ने विनम्रता से कहा, "जहाँपनाह, मनुष्य की थाली में रखी रोटी केवल आटे और पानी से नहीं बनती। उसमें उसके परिश्रम का पसीना, उसके चरित्र की सच्चाई और उसके मन का संतोष भी मिला होता है। यही कारण है कि मेहनत की कमाई की रोटी सबसे मीठी लगती है।"

उस दिन के बाद राज्य में यह कथा दूर-दूर तक फैल गई। माता-पिता अपने बच्चों को यह कहानी सुनाकर समझाने लगे कि जीवन में धन कमाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उसे ईमानदारी से कमाना। व्यापारियों ने अपने व्यवहार में सुधार करना शुरू किया, किसान अपने श्रम पर गर्व करने लगे, और लोगों ने यह समझ लिया कि सच्ची खुशी वैभव में नहीं, बल्कि नेक कमाई और संतोष में छिपी होती है।

सम्राट अकबर भी जब कभी भोजन करने बैठते, तो उन्हें बीरबल की कही हुई बात अवश्य याद आती—"ईमानदारी की कमाई से बनी साधारण रोटी भी संसार के सबसे स्वादिष्ट भोजन से श्रेष्ठ होती है।"

इस प्रकार बीरबल ने एक साधारण-से प्रश्न का ऐसा उत्तर दिया, जिसने केवल दरबार ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य को जीवन का एक अमूल्य पाठ सिखा दिया।

तो दोस्तों

"मेहनत, ईमानदारी और संतोष से कमाई गई सूखी रोटी भी उस स्वादिष्ट भोजन से श्रेष्ठ होती है, जो छल, लालच या बेईमानी से प्राप्त धन से बनाया गया हो। सच्ची मिठास भोजन में नहीं, बल्कि नेक कमाई और पवित्र मन में होती है।"

 

 

 

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