मुगल सम्राट अकबर का शासन पूरे हिंदुस्तान में न्याय, शांति और समृद्धि के लिए
प्रसिद्ध था। उनके राज्य में दूर-दूर से लोग अपने विवाद लेकर आते थे, क्योंकि उन्हें
विश्वास था कि बादशाह अकबर और उनके प्रिय मंत्री बीरबल के दरबार से कोई भी व्यक्ति
निराश होकर वापस नहीं लौटता। अकबर केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं थे, बल्कि लोगों के
दुख-दर्द को समझने वाले दयालु राजा भी थे। वहीं बीरबल अपनी बुद्धिमत्ता, चतुराई और
निष्पक्ष निर्णयों के कारण पूरे राज्य में सम्मानित थे। उनकी सूझबूझ ऐसी थी कि
सबसे कठिन समस्या का भी सरल और न्यायपूर्ण समाधान निकल आता था। इसी राज्य के एक
छोटे-से गाँव में एक गरीब किंतु अत्यंत ईमानदार लकड़हारा रहता था, जिसका नाम
हरिदास था।
हरिदास का जीवन बहुत साधारण था। उसके पास न कोई खेत था और न ही कोई बड़ी
संपत्ति। उसकी छोटी-सी झोपड़ी गाँव के किनारे जंगल के पास बनी हुई थी। परिवार में
उसकी पत्नी गौरी, एक बेटा मोहन और एक छोटी बेटी राधा थी। गरीबी के बावजूद
उनके घर में प्रेम, संतोष और ईमानदारी का वातावरण था। हरिदास प्रतिदिन सुबह
सूर्योदय से पहले उठता, भगवान का स्मरण करता और अपनी पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी लेकर
जंगल चला जाता। वह केवल सूखे पेड़ों की लकड़ी काटता था, ताकि जंगल को नुकसान न
पहुँचे। शाम तक लकड़ियाँ इकट्ठी करके वह उन्हें नगर के बाजार में बेचता और जो
थोड़ी-बहुत कमाई होती, उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता।
गाँव के लोग उसकी ईमानदारी की मिसाल देते थे। यदि रास्ते में किसी की कोई
वस्तु गिर जाती, तो हरिदास उसे उसके मालिक तक पहुँचाने का पूरा प्रयास करता।
उसने कभी किसी का हक नहीं छीना और न ही कभी झूठ बोलकर लाभ उठाने की कोशिश की। लोग
कहते थे कि यदि पूरे गाँव में सबसे भरोसेमंद व्यक्ति कोई है, तो वह हरिदास
ही है।
एक दिन सुबह हरिदास हमेशा की तरह जंगल पहुँचा। उस दिन वह नदी के किनारे खड़े
एक सूखे पेड़ की डालियाँ काट रहा था। पेड़ नदी के बिल्कुल पास था। जैसे ही उसने एक
मोटी डाल पर जोर से कुल्हाड़ी चलाई, उसका हाथ फिसल गया और कुल्हाड़ी सीधे नदी के
गहरे पानी में जा गिरी। नदी बहुत गहरी थी और उसका बहाव भी तेज था। हरिदास ने कई
बार पानी में उतरकर कुल्हाड़ी खोजने की कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।
कुल्हाड़ी उसके लिए केवल एक औजार नहीं थी, बल्कि उसकी आजीविका का
एकमात्र सहारा थी। बिना कुल्हाड़ी के वह लकड़ी नहीं काट सकता था और बिना लकड़ी
बेचे उसका परिवार भूखा रह जाता। वह नदी किनारे बैठ गया और चिंता में डूब गया। उसकी
आँखों से आँसू बहने लगे। वह सोचने लगा कि अब उसके बच्चों का पेट कैसे भरेगा।
उसी समय वहाँ से कुछ व्यापारी गुजर रहे थे। उन्होंने हरिदास को रोते हुए देखा।
एक व्यापारी ने पूछा, "क्या हुआ भाई? तुम इतने दुखी क्यों हो?"
हरिदास ने पूरी घटना सच-सच बता दी। व्यापारियों ने सहानुभूति तो जताई, लेकिन कोई भी
उसकी सहायता नहीं कर सका। वे अपने रास्ते चले गए।
संयोग से उसी दिन सम्राट अकबर और बीरबल वेश बदलकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहे
थे। वे प्रजा की वास्तविक स्थिति जानना चाहते थे। जब वे नदी के पास पहुँचे,
तो उन्होंने
हरिदास को उदास बैठे देखा। अकबर ने साधारण यात्री बनकर उससे पूछा, "भाई, तुम्हारी
परेशानी क्या है?"
हरिदास ने उन्हें भी वही बात बताई। उसने कहा, "मेरी कुल्हाड़ी नदी में गिर
गई है। मैं गरीब आदमी हूँ। नई कुल्हाड़ी खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं
हैं।"
अकबर ने उसकी बात ध्यान से सुनी। बीरबल ने भी उसके चेहरे को गौर से देखा।
उन्हें लगा कि यह व्यक्ति सच बोल रहा है।
तभी पास के गाँव का एक धनी साहूकार वहाँ आ पहुँचा। उसका नाम धनपाल था। वह
लालची और चालाक व्यक्ति था। उसने बातचीत सुन ली। उसके मन में तुरंत एक योजना आई।
उसने सोचा कि यदि किसी तरह इस गरीब पर चोरी का आरोप लगा दिया जाए, तो उसे दंड
मिलेगा और उसकी जमीन पर भी कब्जा किया जा सकेगा।
धनपाल तुरंत सैनिकों के पास गया और शिकायत कर दी कि उसकी बहुमूल्य चाँदी की
कुल्हाड़ी चोरी हो गई है और उसने हरिदास को उसी क्षेत्र में घूमते देखा था।
सैनिकों ने बिना अधिक जाँच किए हरिदास को पकड़ लिया और अगले दिन उसे दरबार में पेश
कर दिया।
दरबार में अकबर अपने राजसी वेश में सिंहासन पर बैठे थे। हरिदास ने उन्हें
पहचान लिया कि यही वे यात्री थे, जिनसे वह नदी किनारे मिला था। उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
धनपाल ने ऊँची आवाज़ में कहा, "जहाँपनाह! इसी गरीब ने मेरी चाँदी की कुल्हाड़ी
चुराई है।"
अकबर ने शांत स्वर में पूछा, "क्या तुम्हारे पास कोई प्रमाण है?"
धनपाल बोला, "महाराज, मैंने इसे उसी जंगल में देखा था। मेरी कुल्हाड़ी गायब है और
यह भी वहीं था। इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा?"
हरिदास ने विनम्रता से उत्तर दिया, "महाराज, मैंने किसी की
कोई कुल्हाड़ी नहीं चुराई। मेरी अपनी लोहे की कुल्हाड़ी नदी में गिर गई थी। मैं तो
उसी का दुख मना रहा था।"
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। बीरबल समझ गए कि मामला साधारण नहीं है। उन्होंने
दोनों पक्षों से कुछ प्रश्न किए, लेकिन धनपाल बार-बार अपनी बात दोहराता रहा।
बीरबल ने एक योजना बनाई। उन्होंने आदेश दिया कि अगले दिन दरबार में तीन
कुल्हाड़ियाँ लाई जाएँ—एक साधारण लोहे की, एक चमकदार चाँदी की और एक सोने की। अगले दिन जब
तीनों कुल्हाड़ियाँ दरबार में रखी गईं, तो बीरबल ने पहले धनपाल को बुलाया।
उन्होंने पूछा, "बताओ, इनमें तुम्हारी कुल्हाड़ी कौन-सी है?"
धनपाल की आँखें सोने की कुल्हाड़ी पर टिक गईं। लालच में उसने तुरंत कहा,
"महाराज, यही मेरी कुल्हाड़ी है।"
बीरबल मुस्कुराए, लेकिन कुछ बोले नहीं। फिर उन्होंने हरिदास को बुलाया।
हरिदास ने तीनों कुल्हाड़ियों को ध्यान से देखा और बोला, "महाराज,
इनमें से यह
साधारण लोहे की कुल्हाड़ी मेरी जैसी है, लेकिन मेरी कुल्हाड़ी के हत्थे पर एक छोटा-सा
निशान था। यह वैसी नहीं है। इसलिए इनमें से कोई भी मेरी कुल्हाड़ी नहीं है।"
दरबार में बैठे लोग उसकी सच्चाई देखकर प्रभावित हुए।
बीरबल ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि धनपाल के घर की तलाशी ली जाए। कुछ ही
देर बाद सैनिक लौटे और उनके हाथ में एक चाँदी की कुल्हाड़ी थी, जिस पर धनपाल
का नाम खुदा हुआ था। साथ ही यह भी पता चला कि धनपाल की कुल्हाड़ी कभी चोरी हुई ही
नहीं थी। उसने झूठा आरोप लगाकर हरिदास को फँसाने की कोशिश की थी।
बीरबल ने कहा, "यदि यह व्यक्ति सच बोल रहा होता, तो सोने की कुल्हाड़ी को
अपनी नहीं बताता। लालच ने इसे स्वयं अपराधी बना दिया। दूसरी ओर हरिदास ने अपनी
गरीबी के बावजूद झूठ बोलकर सोने या चाँदी की कुल्हाड़ी लेने का प्रयास नहीं किया।
यही सच्ची ईमानदारी है।"
अकबर ने धनपाल को कठोर दंड दिया। उस पर भारी जुर्माना लगाया गया और आदेश दिया
गया कि वह गरीबों की सहायता के लिए धन दान करे। साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से अपनी
गलती स्वीकार करनी पड़ी।
इसके बाद अकबर ने हरिदास की ओर देखकर कहा, "तुम्हारी ईमानदारी पूरे
राज्य के लिए एक आदर्श है। ऐसे व्यक्ति ही राज्य की वास्तविक शक्ति होते
हैं।"
उन्होंने राजकोष से हरिदास को एक नई मजबूत लोहे की कुल्हाड़ी, एक बैलगाड़ी,
एक जोड़ी बैल
और इतना धन देने का आदेश दिया कि वह अपने परिवार का जीवन सम्मानपूर्वक चला सके।
साथ ही उसके बच्चों की शिक्षा का पूरा खर्च भी राजकोष से उठाने की घोषणा की।
हरिदास की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने कहा, "महाराज,
मैंने तो केवल
सच बोलने का अपना कर्तव्य निभाया है।"
बीरबल मुस्कुराकर बोले, "सच बोलना आसान तब होता है जब उससे कोई नुकसान न हो। लेकिन
सच्ची ईमानदारी वही है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ न छोड़े।"
इस घटना की चर्चा पूरे राज्य में फैल गई। लोग अपने बच्चों को हरिदास की कहानी
सुनाकर ईमानदारी का महत्व समझाने लगे। व्यापारियों ने सीखा कि विश्वास सबसे बड़ी
पूँजी है। अधिकारियों ने समझा कि बिना जाँच किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए। गाँव
वालों ने जाना कि सच्चाई देर से सही, पर अंत में अवश्य जीतती है।
समय बीतता गया। हरिदास अपने नए साधनों की सहायता से पहले से अधिक मेहनत करने
लगा। उसने अपनी आय का कुछ भाग गरीबों की सहायता में भी लगाना शुरू कर दिया। वह
अक्सर कहता था कि "ईमानदारी का फल धन से भी बड़ा होता है, क्योंकि इससे
सम्मान और विश्वास मिलता है।"
जब भी दरबार में न्याय, सत्य और चरित्र की चर्चा होती, अकबर इस घटना का उल्लेख
करते और कहते, "राज्य की समृद्धि केवल महलों और खजानों से नहीं होती,
बल्कि उन
ईमानदार लोगों से होती है जो कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं
छोड़ते।"
तो दोस्तों
ईमानदारी
मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है। लालच अंततः अपमान और दंड का कारण बनता है,
जबकि सत्य और
ईमानदारी देर-सबेर सम्मान, विश्वास और सफलता अवश्य दिलाते हैं।
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