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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

बीरबल और नाई

 


 


मुगल सम्राट अकबर का दरबार अपनी भव्यता, न्यायप्रियता और विद्वानों की उपस्थिति के कारण पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था। दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएँ लेकर अकबर के दरबार में आते और न्याय प्राप्त करके संतुष्ट होकर लौटते थे। अकबर स्वयं भी बुद्धिमान थे, लेकिन वे जानते थे कि किसी भी राजा की सबसे बड़ी शक्ति उसके योग्य सलाहकार होते हैं। इसी कारण उनके दरबार में नवरत्नों का विशेष स्थान था, जिनमें सबसे अधिक सम्मान बीरबल को प्राप्त था। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, हाजिरजवाबी और न्यायप्रिय स्वभाव के कारण न केवल अकबर के प्रिय थे, बल्कि आम जनता के भी चहेते थे। जहाँ भी कोई कठिन समस्या आती, बीरबल उसका ऐसा समाधान निकालते कि सभी उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करने लगते। यही कारण था कि कुछ दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे और अवसर मिलते ही उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे।

महल में एक नाई भी था, जिसका नाम रघुनाथ था। वह कई वर्षों से अकबर की सेवा कर रहा था। हर सप्ताह वह बड़ी सावधानी से बादशाह की दाढ़ी बनाता और बाल सँवारता। अकबर उसके व्यवहार से प्रसन्न रहते थे और कभी-कभी उससे सामान्य बातचीत भी कर लिया करते थे। धीरे-धीरे रघुनाथ को यह भ्रम होने लगा कि वह बादशाह का अत्यंत विश्वासपात्र है। इसी घमंड में उसने सोचना शुरू कर दिया कि यदि वह चाहे, तो दरबार के बड़े-बड़े मंत्रियों के विरुद्ध भी बादशाह के मन में संदेह पैदा कर सकता है।

दरबार के कुछ ईर्ष्यालु मंत्री रघुनाथ के इस स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने सोचा कि यदि नाई को अपने पक्ष में कर लिया जाए, तो बीरबल को बदनाम करना आसान हो जाएगा। एक दिन उन्होंने नाई को गुप्त रूप से अपने पास बुलाया। पहले उसकी खूब प्रशंसा की, फिर उसे महँगे वस्त्र और कुछ स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं। उपहार पाकर रघुनाथ बहुत प्रसन्न हुआ। तब एक मंत्री ने धीरे से कहा, "रघुनाथ, तुम तो रोज़ बादशाह के इतने निकट रहते हो। यदि तुम चाहो, तो उनसे जो चाहे कहलवा सकते हो।"

नाई ने गर्व से कहा, "बिल्कुल सही कहा आपने। जब मैं बादशाह की दाढ़ी बनाता हूँ, तब वे मुझसे खुलकर बातें करते हैं। यदि मैं कोई बात कहूँ, तो वे अवश्य सुनते हैं।"

मंत्री मुस्कुराया और बोला, "तो फिर हमारी एक छोटी-सी सहायता कर दो। बस इतना कहना कि बीरबल अब पहले जैसे बुद्धिमान नहीं रहे। वे अपने पद का घमंड करने लगे हैं। यदि बादशाह के मन में थोड़ा-सा भी संदेह पैदा हो गया, तो आगे का काम हम संभाल लेंगे।"

रघुनाथ लालच में आ गया। उसने बिना अधिक सोचे उनकी बात मान ली। अगले दिन जब वह अकबर की दाढ़ी बना रहा था, तब उसने बहुत चालाकी से बातचीत शुरू की। पहले उसने राज्य की प्रशंसा की, फिर बोला, "जहाँपनाह, आपके दरबार में सभी मंत्री योग्य हैं, लेकिन लोगों में यह चर्चा होने लगी है कि बीरबल अब पहले जैसे नहीं रहे।"

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, "यह बात किसने कही?"

नाई तुरंत बोला, "हुजूर, मैं तो केवल वही कह रहा हूँ जो बाज़ार में लोग बातें करते हैं। कहते हैं कि बीरबल अपने पद का घमंड करने लगे हैं और उन्हें लगता है कि उनसे अधिक बुद्धिमान कोई नहीं।"

अकबर कुछ क्षण शांत रहे। वे बीरबल को अच्छी तरह जानते थे, इसलिए उन्होंने तुरंत इस बात पर विश्वास नहीं किया। लेकिन मन में हल्का-सा संदेह अवश्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने नाई से आगे कुछ नहीं पूछा।

उसी दिन दरबार लगा। बीरबल हमेशा की तरह आत्मविश्वास और विनम्रता के साथ उपस्थित हुए। अकबर उनके व्यवहार को ध्यान से देखते रहे। उन्हें कहीं भी अहंकार दिखाई नहीं दिया। फिर भी वे नाई की बात भूल नहीं पा रहे थे। उन्होंने सोचा कि किसी की बात पर बिना जाँच किए विश्वास करना उचित नहीं होगा।

इधर दरबार के कुछ मंत्री मन ही मन प्रसन्न थे। उन्हें विश्वास था कि नाई ने अपना काम कर दिया है और अब बीरबल की प्रतिष्ठा धीरे-धीरे कम होने लगेगी। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि बीरबल लोगों के चेहरे और व्यवहार देखकर उनके मन की बात समझने में माहिर थे।

कुछ दिनों बाद बीरबल ने देखा कि अकबर पहले की अपेक्षा कुछ अधिक गंभीर रहते हैं। वे समझ गए कि अवश्य ही किसी ने उनके विरुद्ध कुछ कहा है। लेकिन उन्होंने सीधे पूछने के बजाय उचित अवसर की प्रतीक्षा की।

एक सुबह जब नाई अकबर की दाढ़ी बना रहा था, बीरबल भी किसी आवश्यक कार्य से महल पहुँचे। संयोग से उन्होंने दरवाज़े के बाहर खड़े-खड़े नाई की कुछ बातें सुन लीं। नाई फिर किसी मंत्री की प्रशंसा करते हुए बीरबल के बारे में संकेतों में नकारात्मक बातें कह रहा था। बीरबल सब समझ गए, लेकिन उन्होंने वहाँ कुछ नहीं कहा। वे मुस्कुराते हुए वापस लौट गए।

उस शाम बीरबल ने अपने घर बैठकर पूरी योजना बनाई। उन्होंने सोचा, "यदि किसी व्यक्ति को उसकी गलती का अहसास कराना है, तो केवल दंड देना पर्याप्त नहीं होता। उसे ऐसा अनुभव कराना चाहिए कि वह स्वयं अपनी भूल समझ जाए।"

अगले दिन बीरबल सामान्य रूप से दरबार में पहुँचे। उनके चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि उन्होंने नाई और ईर्ष्यालु मंत्रियों की पूरी चाल समझ ली है। अब वे सही समय की प्रतीक्षा कर रहे थे, ताकि बिना क्रोध किए, केवल अपनी बुद्धिमानी से सच्चाई सबके सामने ला सकें।

उधर नाई अपने घमंड में चूर था। उसे विश्वास था कि उसकी बातों से बादशाह के मन में बीरबल के प्रति संदेह पैदा हो चुका है। उसे यह बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि जल्द ही उसकी अपनी परीक्षा होने वाली है, और उसी परीक्षा में उसका घमंड टूटने वाला है।

अगले दिन सुबह जब शाही दरबार लगा, तो वातावरण सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन बीरबल के मन में एक योजना पूरी तरह तैयार थी। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि नाई और उसके साथ षड्यंत्र रचने वाले मंत्रियों को बिना अपमानित किए, उनकी चालाकी का पर्दाफाश किया जाएगा। बीरबल जानते थे कि यदि वे सीधे नाई पर आरोप लगा देंगे, तो वह अपनी गलती से मुकर जाएगा। इसलिए उन्होंने ऐसा उपाय सोचा जिससे सच्चाई स्वयं सामने आ जाए।

दरबार की कार्यवाही समाप्त होने के बाद बीरबल ने अकबर से कहा, "जहाँपनाह, क्या मैं आपसे एक विशेष विषय पर कुछ निवेदन कर सकता हूँ?" अकबर ने मुस्कुराकर कहा, "निश्चय ही बीरबल, कहो क्या बात है?" बीरबल बोले, "महाराज, हमारे महल का नाई वर्षों से आपकी सेवा कर रहा है। वह मेहनती है और उसकी निष्ठा की चर्चा भी होती है। मेरा विचार है कि उसकी बुद्धिमत्ता की भी एक बार परीक्षा होनी चाहिए।"

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, "नाई की बुद्धिमत्ता की परीक्षा? यह कैसी परीक्षा होगी?"

बीरबल ने उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यदि कोई व्यक्ति राजदरबार के निकट रहता है, तो उसे केवल अपने काम में ही नहीं, बल्कि सत्य और विवेक में भी दृढ़ होना चाहिए।"

अकबर को बीरबल की बात रोचक लगी। उन्होंने तुरंत अनुमति दे दी।

उसी दिन दोपहर को नाई को दरबार में बुलाया गया। वह बड़े गर्व के साथ दरबार में पहुँचा। उसे लगा कि शायद बादशाह उसकी वर्षों की सेवा से प्रसन्न होकर उसे कोई बड़ा इनाम देने वाले हैं। उसने झुककर सलाम किया।

अकबर ने कहा, "रघुनाथ, आज हम तुम्हारी परीक्षा लेना चाहते हैं।"

नाई मुस्कुराते हुए बोला, "हुजूर, मैं हर परीक्षा के लिए तैयार हूँ।"

बीरबल आगे बढ़े और बोले, "तुम्हें केवल एक छोटा-सा काम करना है। तुम्हें पूरे नगर में जाकर यह पता लगाना है कि सबसे ईमानदार व्यक्ति कौन है। लेकिन ध्यान रहे, जो भी उत्तर लेकर आओगे, उसका प्रमाण भी देना होगा।"

नाई ने आत्मविश्वास से कहा, "यह तो बहुत आसान काम है। मैं कल तक उत्तर लेकर आ जाऊँगा।"

अगले दिन वह नगर में घूमने निकला। उसने कई व्यापारियों, किसानों, सैनिकों और कारीगरों से बातें कीं। हर व्यक्ति किसी दूसरे की ईमानदारी की प्रशंसा करता, लेकिन कोई भी यह दावा नहीं करता कि वही सबसे ईमानदार है। शाम तक नाई उलझन में पड़ गया।

आखिर वह एक धनी व्यापारी के पास पहुँचा। व्यापारी ने कहा, "यदि तुम मेरे बारे में दरबार में अच्छी बात कहोगे, तो मैं तुम्हें दस स्वर्ण मुद्राएँ दूँगा।"

नाई लालच में आ गया। उसने सोचा कि बादशाह को क्या पता चलेगा कि मैंने किस आधार पर व्यापारी को सबसे ईमानदार बताया है। उसने स्वर्ण मुद्राएँ ले लीं और अगले दिन दरबार में पहुँच गया।

दरबार में अकबर ने पूछा, "तो बताओ, सबसे ईमानदार व्यक्ति कौन है?"

नाई ने गर्व से कहा, "जहाँपनाह, नगर का सबसे ईमानदार व्यक्ति सेठ गोपालदास है। सभी लोग उसकी प्रशंसा करते हैं।"

बीरबल मुस्कुराए और बोले, "क्या तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण है?"

नाई बोला, "जी, नगर के कई लोगों ने यही कहा।"

बीरबल ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि सेठ गोपालदास को दरबार में बुलाया जाए।

कुछ ही देर में व्यापारी दरबार में उपस्थित हो गया। अकबर ने उससे पूछा, "क्या यह सच है कि तुमने नाई को कोई उपहार या धन नहीं दिया?"

व्यापारी घबरा गया। उसने सोचा कि यदि झूठ बोलूँगा तो पकड़ा जाऊँगा। उसने सिर झुकाकर स्वीकार किया, "जहाँपनाह, मैंने इन्हें दस स्वर्ण मुद्राएँ दी थीं ताकि ये मेरे पक्ष में बात करें।"

पूरा दरबार स्तब्ध रह गया। नाई का चेहरा पीला पड़ गया। उसके हाथ काँपने लगे।

बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "रघुनाथ, तुमने धन के लालच में सत्य को छोड़ दिया। जो व्यक्ति कुछ स्वर्ण मुद्राओं के लिए झूठ बोल सकता है, वह राजा के सामने भी गलत बातें कह सकता है।"

नाई के पास कोई उत्तर नहीं था।

तभी बीरबल ने अकबर की ओर देखकर कहा, "जहाँपनाह, कुछ दिन पहले भी किसी ने आपके मन में मेरे विषय में संदेह उत्पन्न करने का प्रयास किया था। अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि बिना जाँच के कही गई बातों पर विश्वास करना कितना खतरनाक हो सकता है।"

अकबर अब पूरी बात समझ चुके थे। उन्हें एहसास हो गया कि नाई ने ही उनके मन में बीरबल के विरुद्ध शंका पैदा की थी।

अकबर ने कठोर स्वर में पूछा, "रघुनाथ, सच-सच बताओ। क्या तुमने हमारे सामने बीरबल के विषय में झूठी बातें कही थीं?"

नाई की आँखों में आँसू आ गए। वह घुटनों के बल बैठ गया और बोला, "मुझे क्षमा कर दीजिए, जहाँपनाह। कुछ मंत्रियों ने मुझे धन और उपहार का लालच दिया था। मैंने लालच में आकर बहुत बड़ी भूल कर दी।"

दरबार में बैठे वे मंत्री भी घबरा गए। उन्हें लगा कि अब उनका भेद भी खुल जाएगा।

बीरबल ने शांत भाव से कहा, "महाराज, अपराध केवल नाई का नहीं है। जो लोग दूसरों को गलत रास्ते पर ले जाते हैं, वे भी उतने ही दोषी होते हैं।"

अकबर ने तुरंत उन मंत्रियों की ओर देखा। उनके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।

अब पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी यह जानने के लिए उत्सुक थे कि अकबर इस मामले में क्या निर्णय देंगे और बीरबल आगे क्या सलाह देंगे।

 

पूरे दरबार में गहरा सन्नाटा छा गया था। नाई रघुनाथ सिर झुकाए घुटनों के बल बैठा था। जिन मंत्रियों ने उसे लालच देकर बीरबल के विरुद्ध भड़काया था, उनके चेहरों का रंग उड़ चुका था। सम्राट अकबर का चेहरा गंभीर था। वे क्रोधित तो थे, लेकिन किसी भी निर्णय से पहले पूरी सच्चाई जान लेना चाहते थे। उन्होंने कुछ क्षण तक सभी को देखा और फिर कठोर स्वर में कहा, "आज इस दरबार में केवल सत्य ही बोला जाएगा। जो झूठ बोलेगा, उसका दंड पहले से भी अधिक कठोर होगा।"

रघुनाथ काँपती आवाज़ में बोला, "जहाँपनाह, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। कुछ दरबारियों ने मुझे धन और बहुमूल्य वस्त्र देने का लालच दिया। उन्होंने कहा कि यदि मैं आपके सामने बीरबल के विरुद्ध बातें करूँ, तो वे मुझे और भी पुरस्कार दिलाएँगे। मैं लालच में अंधा हो गया और बिना सोचे-समझे उनकी बात मान ली।"

यह सुनते ही दरबार में हलचल मच गई। अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि उन मंत्रियों को आगे लाया जाए जिनका नाम रघुनाथ ने लिया था। सैनिक तुरंत उन्हें दरबार के बीच ले आए। अकबर ने एक-एक मंत्री की ओर देखा और पूछा, "क्या रघुनाथ जो कह रहा है, वह सत्य है?"

शुरू में मंत्रियों ने इनकार करने की कोशिश की, लेकिन जब व्यापारी ने भी यह स्वीकार कर लिया कि उसने नाई को स्वर्ण मुद्राएँ दी थीं, और अन्य सेवकों ने भी बताया कि उन्होंने मंत्रियों को नाई से गुप्त रूप से मिलते देखा था, तब उनके पास बचने का कोई मार्ग नहीं रहा। अंततः उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

एक मंत्री बोला, "जहाँपनाह, हम बीरबल से ईर्ष्या करते थे। हमें लगता था कि आप हर महत्वपूर्ण कार्य में केवल उन्हीं की सलाह लेते हैं। इसी कारण हमने उन्हें बदनाम करने की योजना बनाई।"

अकबर ने गहरी साँस ली। उन्होंने कहा, "ईर्ष्या मनुष्य को इतना अंधा बना देती है कि वह सत्य और असत्य का अंतर भी भूल जाता है। तुम लोगों ने केवल बीरबल का ही नहीं, बल्कि इस दरबार की मर्यादा का भी अपमान किया है।"

दरबार में बैठे सभी लोग अकबर के शब्द ध्यान से सुन रहे थे। किसी को भी यह आशा नहीं थी कि बात इतनी दूर तक पहुँच जाएगी।

अकबर ने बीरबल की ओर देखा और बोले, "बीरबल, यदि तुम चाहते तो पहले ही दिन नाई और इन मंत्रियों की शिकायत कर सकते थे। फिर तुमने इतनी लंबी योजना क्यों बनाई?"

बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यदि मैं केवल आरोप लगाता, तो शायद कोई विश्वास नहीं करता। सत्य को स्वयं सामने आने देना अधिक उचित था। जब व्यक्ति अपनी ही गलती स्वीकार करता है, तब उसे अपनी भूल का वास्तविक एहसास होता है।"

अकबर ने संतोषपूर्वक सिर हिलाया। उन्हें बीरबल की बात पूरी तरह उचित लगी।

फिर अकबर ने नाई से कहा, "रघुनाथ, तुम कई वर्षों से हमारी सेवा कर रहे हो। तुम्हारी एक गलती के कारण तुम्हारी सारी मेहनत व्यर्थ हो सकती थी। क्या तुम्हें अपने किए पर पछतावा है?"

नाई की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह, मुझे अपनी भूल का गहरा पछतावा है। लालच ने मेरी बुद्धि छीन ली थी। यदि आज मुझे क्षमा मिल जाए, तो मैं जीवन भर कभी असत्य का साथ नहीं दूँगा।"

बीरबल ने नाई की ओर देखा। उनके मन में उसके प्रति क्रोध नहीं, बल्कि दया थी। उन्होंने अकबर से कहा, "महाराज, गलती करने वाला यदि सच्चे मन से पश्चाताप करे, तो उसे सुधारने का अवसर अवश्य मिलना चाहिए। कठोर दंड से अधिक प्रभावशाली शिक्षा वही होती है, जो मनुष्य को भीतर से बदल दे।"

दरबार में बैठे अनेक विद्वानों ने भी बीरबल की बात का समर्थन किया।

अकबर कुछ देर तक विचार करते रहे। फिर उन्होंने अपना निर्णय सुनाया। "रघुनाथ, तुम्हें एक महीने तक शाही सेवा से दूर रखा जाएगा। इस अवधि में तुम नगर के गरीब लोगों की निःशुल्क सेवा करोगे। उनके बाल काटोगे, दाढ़ी बनाओगे और बदले में कोई धन नहीं लोगे। इससे तुम्हें सेवा का वास्तविक अर्थ समझ में आएगा।"

फिर उन्होंने उन मंत्रियों की ओर देखकर कहा, "तुम लोगों से कुछ समय के लिए दरबार के विशेष अधिकार वापस लिए जाते हैं। जब तक तुम अपने आचरण से यह सिद्ध नहीं कर देते कि तुम राज्य के प्रति निष्ठावान हो, तब तक तुम्हें किसी महत्वपूर्ण निर्णय में शामिल नहीं किया जाएगा।"

मंत्रियों ने सिर झुकाकर अपना अपराध स्वीकार किया और क्षमा माँगी।

रघुनाथ ने भी बीरबल के चरणों में झुककर कहा, "मैंने आपके साथ बहुत अन्याय किया। आपने चाहा होता तो मुझे कठोर दंड दिला सकते थे, लेकिन आपने मेरे लिए दया की प्रार्थना की। मैं जीवन भर आपका यह उपकार नहीं भूलूँगा।"

बीरबल ने उसे उठाते हुए कहा, "मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसकी गलती नहीं, बल्कि गलती सुधारने की इच्छा होती है। यदि तुमने अपनी भूल से सीख ली है, तो यही तुम्हारी सबसे बड़ी जीत है।"

कुछ महीनों बाद रघुनाथ पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना काम करने लगा। अब वह कभी किसी की चुगली नहीं करता था और न ही किसी के बहकावे में आता था। नगर के लोग भी उसके बदले हुए व्यवहार की प्रशंसा करने लगे।

वे मंत्री भी अपनी ईर्ष्या छोड़कर राज्य के कार्यों में मन लगाने लगे। उन्होंने समझ लिया कि किसी योग्य व्यक्ति को गिराने का प्रयास करने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाना अधिक उचित है।

एक दिन अकबर ने पूरे दरबार के सामने कहा, "आज की इस घटना ने मुझे भी एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी है। राजा को कभी भी किसी की बात बिना जाँच किए स्वीकार नहीं करनी चाहिए। न्याय वही है जो सत्य की पूरी जाँच के बाद किया जाए।"

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "जहाँपनाह, सत्य को छिपाया जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए हराया नहीं जा सकता। अंततः सत्य ही विजयी होता है।"

पूरा दरबार "वाह! वाह!" की आवाज़ से गूँज उठा। अकबर ने प्रसन्न होकर बीरबल को सम्मानस्वरूप स्वर्ण मुद्राएँ, रेशमी वस्त्र और एक सुंदर मोतियों की माला भेंट की। लेकिन बीरबल ने विनम्रता से कहा, "महाराज, आपके विश्वास से बढ़कर मेरे लिए कोई पुरस्कार नहीं है।"

उस दिन के बाद महल में कोई भी व्यक्ति चुगली, ईर्ष्या या झूठी अफवाह फैलाने का साहस नहीं करता था। सभी जानते थे कि बीरबल की बुद्धिमत्ता के सामने छल और कपट अधिक देर तक टिक नहीं सकते।

तो दोस्तों

ईर्ष्या और लालच मनुष्य को सत्य से दूर ले जाते हैं, जबकि ईमानदारी, धैर्य और बुद्धिमानी अंततः सत्य की विजय सुनिश्चित करते हैं। किसी के बारे में सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करने के बजाय हमेशा सत्य की जाँच करनी चाहिए।

 

 

 

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