मुगल सम्राट अकबर का नाम भारत के इतिहास में केवल एक शक्तिशाली शासक के रूप
में ही नहीं, बल्कि न्यायप्रिय, दूरदर्शी और बुद्धिमान राजा के रूप में भी लिया जाता है।
उनके विशाल साम्राज्य में दूर-दूर तक शांति और समृद्धि का वातावरण था। राजधानी का
भव्य महल हर सुबह रंग-बिरंगे फूलों की सुगंध, सैनिकों की अनुशासित
पंक्तियों और दरबारियों की चहल-पहल से जीवंत हो उठता था। अकबर का राजदरबार अपने
समय का सबसे प्रतिष्ठित दरबार माना जाता था, जहाँ देश-विदेश से विद्वान,
कवि, कलाकार,
व्यापारी और
यात्री आया करते थे। उस दरबार की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वहाँ किसी भी विषय पर
खुलकर चर्चा की जाती थी। अकबर का मानना था कि विचारों का आदान-प्रदान ही किसी
राज्य को महान बनाता है। उनके दरबार में नौ रत्न थे, और उन सभी में सबसे अधिक
प्रसिद्ध थे बीरबल, जिनकी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई की मिसाल पूरे राज्य में
दी जाती थी।
बीरबल का वास्तविक नाम महेश दास था, लेकिन अपनी प्रतिभा और बुद्धिमानी के कारण वे
अकबर के सबसे विश्वसनीय सलाहकार बन गए थे। वे किसी भी समस्या का समाधान बड़ी सरलता
और सूझबूझ से निकाल लेते थे। यही कारण था कि अकबर अक्सर उनकी परीक्षा लेने के लिए
कठिन प्रश्न पूछते रहते थे। कई बार ये प्रश्न केवल मनोरंजन के लिए होते थे,
तो कई बार उनके
पीछे कोई गहरी सीख छिपी होती थी। दरबार में कुछ ऐसे मंत्री भी थे जो बीरबल से
ईर्ष्या करते थे। उन्हें लगता था कि अकबर हर बात में बीरबल की प्रशंसा करते हैं और
उनकी सलाह को सबसे अधिक महत्व देते हैं। वे चाहते थे कि किसी दिन बीरबल किसी
प्रश्न का उत्तर न दे पाएँ और उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाए।
एक दिन की बात है। सुबह का समय था। सूरज की सुनहरी किरणें महल की ऊँची
खिड़कियों से होकर दरबार के संगमरमर के फर्श पर पड़ रही थीं। दरबार अपने पूरे वैभव
के साथ सजा हुआ था। सैनिक अपने स्थान पर खड़े थे, मंत्री अपनी-अपनी सीटों पर
बैठे थे और राजगायक मधुर संगीत प्रस्तुत कर रहे थे। कुछ ही देर बाद शाही नगाड़े
बजे और सम्राट अकबर अपने सिंहासन पर आकर विराजमान हुए। सभी दरबारियों ने खड़े होकर
उनका अभिवादन किया। अकबर ने मुस्कुराते हुए सबको बैठने का संकेत दिया। उस दिन उनके
चेहरे पर एक विशेष उत्सुकता दिखाई दे रही थी। ऐसा लगता था मानो उनके मन में कोई
नया विचार चल रहा हो।
कुछ देर तक राज्य के सामान्य कार्यों पर चर्चा होती रही। सीमाओं की सुरक्षा,
किसानों की
समस्याएँ, व्यापारियों की शिकायतें और कर व्यवस्था जैसे विषयों पर निर्णय लिए गए। जब सभी
आवश्यक कार्य पूरे हो गए, तब अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, "आज मैं आप सबकी
बुद्धि की परीक्षा लेना चाहता हूँ। मैं एक ऐसा प्रश्न पूछूँगा जिसका उत्तर
सोच-समझकर देना होगा। जो सबसे उचित उत्तर देगा, उसे विशेष सम्मान
मिलेगा।"
यह सुनते ही पूरे दरबार में उत्साह फैल गया। सभी दरबारी सीधे होकर बैठ गए। कुछ
मुस्कुराने लगे, तो कुछ मन ही मन सोचने लगे कि इस बार सम्राट कौन-सा प्रश्न
पूछने वाले हैं। बीरबल शांत भाव से बैठे रहे। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह
आत्मविश्वास और विनम्रता दोनों झलक रहे थे।
अकबर ने कुछ क्षण तक सभी की ओर देखा और फिर पूछा, "बताइए, इस संसार में
सबसे तेज़ क्या है?"
प्रश्न सुनते ही पूरा दरबार एकदम शांत हो गया। कुछ क्षण पहले तक जो लोग आपस
में बातें कर रहे थे, वे अब गहरी सोच में डूब गए। प्रश्न सुनने में सरल था,
लेकिन उसका
उत्तर उतना ही कठिन था। आखिर संसार में सबसे तेज़ क्या हो सकता है? घोड़ा, हवा, नदी, बिजली या कुछ
और?
सबसे पहले सेना के प्रधान सेनापति उठे। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा,
"जहाँपनाह, मेरे विचार से संसार में सबसे तेज़ दौड़ने वाला अरबी घोड़ा
है। युद्ध के मैदान में उससे तेज़ कोई नहीं दौड़ सकता। वह पलक झपकते ही लंबी दूरी
तय कर लेता है।"
अकबर ने मुस्कुराकर पूछा, "क्या सचमुच उससे तेज़ कुछ नहीं?"
सेनापति कुछ क्षण सोचकर बोले, "मेरी जानकारी में नहीं, हुजूर।"
अकबर ने कोई उत्तर नहीं दिया और अगले दरबारी की ओर देखने लगे।
इस बार एक व्यापारी मंत्री खड़े हुए। उन्होंने कहा, "महाराज,
मेरे अनुसार
हवा सबसे तेज़ है। वह पहाड़ों, जंगलों, समुद्रों और रेगिस्तानों को बिना रुके पार कर जाती है। उसे
कोई रोक नहीं सकता।"
दरबार के कई लोगों ने सहमति में सिर हिलाया। हवा सचमुच हर जगह पहुँच जाती थी।
लेकिन अकबर फिर भी संतुष्ट नहीं हुए।
तभी राजवैद्य बोले, "जहाँपनाह, बिजली सबसे तेज़ होती है। बादलों से निकलते ही वह एक क्षण
में धरती तक पहुँच जाती है। उसकी गति के सामने हवा भी धीमी लगती है।"
कुछ दरबारियों ने इस उत्तर की प्रशंसा की। उन्हें लगा कि शायद यही सही उत्तर
होगा।
तभी एक विद्वान पंडित खड़े हुए और बोले, "महाराज, प्रकाश सबसे
तेज़ है। सूर्योदय होते ही उसकी किरणें दूर-दूर तक फैल जाती हैं। अंधकार तुरंत
समाप्त हो जाता है।"
अब दरबार में चर्चा और भी रोचक हो गई। हर व्यक्ति अपने उत्तर को सही सिद्ध
करने का प्रयास कर रहा था। कोई नदी की गति की बात करता, कोई समय की, तो कोई भाग्य
की। लेकिन अकबर हर उत्तर सुनने के बाद केवल मुस्कुरा देते। इससे स्पष्ट था कि वे
अभी भी उस उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे जिसकी उन्हें तलाश थी।
आखिरकार उनकी दृष्टि बीरबल पर जाकर ठहर गई।
"बीरबल," अकबर ने कहा, "तुम इतने शांत क्यों बैठे
हो? क्या तुम्हारे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है?"
बीरबल ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह, उत्तर तो है,
लेकिन यदि
अनुमति दें तो मैं उसे अभी नहीं बताना चाहता।"
पूरा दरबार आश्चर्यचकित रह गया। ऐसा पहली बार हुआ था कि बीरबल ने तुरंत उत्तर
देने के बजाय समय माँगा हो।
अकबर ने मुस्कुराकर पूछा, "क्यों? क्या इस बार प्रश्न कठिन पड़ गया?"
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "प्रश्न कठिन नहीं है, लेकिन उसका उत्तर केवल
शब्दों में नहीं दिया जा सकता। यदि आप अनुमति दें, तो मैं कल पूरे दरबार के
सामने इसका उत्तर एक उदाहरण के साथ प्रस्तुत करूँगा।"
अकबर को बीरबल की बात रोचक लगी। उन्होंने कहा, "ठीक है। तुम्हें कल तक का
समय दिया जाता है। लेकिन याद रखना, यदि तुम्हारा उत्तर हमें संतुष्ट नहीं कर पाया, तो इस बार
तुम्हें भी हार स्वीकार करनी होगी।"
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "जैसा आपका आदेश, जहाँपनाह।"
दरबार समाप्त हो गया, लेकिन पूरे महल में केवल एक ही चर्चा थी—"आखिर बीरबल
कल क्या उत्तर देंगे? संसार में सबसे तेज़ क्या है?"
ईर्ष्यालु दरबारियों के चेहरे पर खुशी थी। उन्हें विश्वास था कि इस बार बीरबल
अवश्य उलझ जाएँगे। वे आपस में कहने लगे, "अब देखना, कल बीरबल के
पास कोई उत्तर नहीं होगा।"
लेकिन जो लोग बीरबल को अच्छी तरह जानते थे, वे निश्चिंत थे। उन्हें
विश्वास था कि यदि बीरबल ने समय माँगा है, तो अवश्य ही उनके मन में कोई ऐसी योजना है जो
सबको चकित कर देगी।
उधर बीरबल अपने घर लौटे। रास्ते भर वे शांत रहे। उन्होंने किसी से इस प्रश्न
पर चर्चा नहीं की। रात को भोजन करने के बाद वे अपने आँगन में टहलते रहे। आकाश में
असंख्य तारे चमक रहे थे। ठंडी हवा बह रही थी। बीरबल कभी आकाश की ओर देखते, कभी धरती की
ओर। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। ऐसा लग रहा था मानो उन्हें उत्तर पहले से
मालूम हो, लेकिन वे उसे इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहते थे कि केवल अकबर ही नहीं, बल्कि पूरा
दरबार जीवन भर उसे याद रखे।
अगली सुबह राजमहल में सामान्य दिनों से कहीं अधिक भीड़ थी। समाचार पूरे नगर
में फैल चुका था कि आज बीरबल सम्राट अकबर के कठिन प्रश्न—"संसार में सबसे
तेज़ क्या है?"—का उत्तर देने वाले हैं। दरबारियों के साथ-साथ कई विद्वान,
व्यापारी और
विशेष अतिथि भी उस ऐतिहासिक क्षण को देखने के लिए उपस्थित हुए। सभी की निगाहें महल
के मुख्य द्वार पर लगी थीं, जहाँ से कुछ ही देर में बीरबल प्रवेश करने वाले थे...
अगली सुबह फतेहपुर सीकरी का राजमहल असाधारण रूप से जीवंत दिखाई दे रहा था। महल
के विशाल प्रांगण में दूर-दूर से आए विद्वान, व्यापारी, सैनिक और
सम्मानित अतिथि एकत्रित थे। हर व्यक्ति के मन में केवल एक ही जिज्ञासा थी—क्या
बीरबल सचमुच सम्राट अकबर के कठिन प्रश्न का ऐसा उत्तर दे पाएँगे जो पूरे दरबार को
संतुष्ट कर दे? महल के गलियारों में धीरे-धीरे यही चर्चा चल रही थी। कुछ
लोग अनुमान लगा रहे थे कि बीरबल हवा को सबसे तेज़ बताएँगे, कुछ का मानना था कि वे
प्रकाश का नाम लेंगे, जबकि कुछ को विश्वास था कि उनका उत्तर बिल्कुल अप्रत्याशित
होगा।
कुछ ही देर में शाही नगाड़े गूँजे और सम्राट अकबर अपने सिंहासन पर आकर
विराजमान हुए। पूरा दरबार खड़ा हो गया। अभिवादन के बाद सभी अपने स्थान पर बैठ गए।
अकबर ने चारों ओर नज़र दौड़ाई और फिर मुस्कुराकर कहा, "आज हम सब उस उत्तर की
प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसके लिए बीरबल ने एक दिन का समय माँगा था।"
इसी बीच बीरबल शांत कदमों से दरबार में प्रवेश कर गए। उनके हाथ में कोई भारी
वस्तु नहीं थी, न कोई पुस्तक और न ही कोई विशेष उपकरण। वे सामान्य रूप से
आए और विनम्रता से झुककर अकबर को प्रणाम किया। उनकी सहजता देखकर कई दरबारी हैरान
रह गए। उन्हें लगा था कि बीरबल किसी विचित्र प्रयोग की तैयारी करके आएँगे, लेकिन ऐसा कुछ
दिखाई नहीं दे रहा था।
अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा, "बीरबल, अब समय आ गया है। बताओ, इस संसार में सबसे तेज़
क्या है?"
बीरबल ने उत्तर देने से पहले पूरे दरबार की ओर देखा। फिर उन्होंने शांत स्वर
में कहा, "जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं उत्तर देने से पहले कुछ छोटे-छोटे
प्रश्न पूछना चाहता हूँ।"
अकबर ने सिर हिलाकर अनुमति दे दी।
बीरबल ने सबसे पहले सेनापति से पूछा, "यदि आपका सबसे तेज़ घोड़ा
दौड़ रहा हो और उसी समय आपको अपने घर की चिंता हो जाए, तो पहले क्या
पहुँचेगा—घोड़ा या आपकी चिंता?"
सेनापति कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, "मेरी चिंता तो उसी क्षण घर
पहुँच जाएगी।"
बीरबल मुस्कुराए, लेकिन कुछ नहीं बोले।
फिर उन्होंने व्यापारी मंत्री से पूछा, "यदि आप यहाँ बैठे-बैठे अपने
गोदाम का हिसाब सोचने लगें, तो क्या आपका मन तुरंत वहाँ नहीं पहुँच जाता?"
व्यापारी ने कहा, "हाँ, पहुँच जाता है।"
इसके बाद बीरबल ने एक विद्वान पंडित से पूछा, "यदि मैं आपसे कहूँ कि अपने
बचपन का पहला विद्यालय याद कीजिए, तो क्या उसे याद करने में आपको कई घंटे लगेंगे?"
पंडित मुस्कुराए और बोले, "नहीं, वह तो अभी मेरी आँखों के सामने आ गया।"
अब पूरा दरबार ध्यान से बीरबल की बात सुन रहा था। उन्हें महसूस होने लगा था कि
बीरबल किसी गहरे निष्कर्ष की ओर बढ़ रहे हैं।
बीरबल ने आगे कहा, "जहाँपनाह, अब मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूँ। कृपया कुछ क्षण के
लिए अपनी आँखें बंद कीजिए।"
अकबर ने बिना संकोच अपनी आँखें बंद कर लीं।
बीरबल बोले, "कल्पना कीजिए कि आप कश्मीर की बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर
खड़े हैं।"
अकबर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
बीरबल ने फिर कहा, "अब स्वयं को बंगाल के समुद्र तट पर देखिए।"
कुछ ही क्षण बाद उन्होंने कहा, "अब अपने बचपन के महल में जाइए।"
फिर बोले, "अब भविष्य की कल्पना कीजिए कि आपका राज्य और भी विशाल हो
गया है।"
कुछ देर बाद बीरबल ने कहा, "अब अपनी आँखें खोलिए।"
अकबर ने आँखें खोलीं और मुस्कुराकर बोले, "अद्भुत! कुछ ही क्षणों में
मैं न जाने कितनी जगहों पर पहुँच गया।"
बीरबल ने विनम्रता से पूछा, "जहाँपनाह, क्या आपके शरीर ने यह
यात्रा की?"
"नहीं," अकबर ने उत्तर दिया।
"क्या कोई घोड़ा आपको वहाँ ले गया?"
"नहीं।"
"क्या हवा आपको लेकर गई?"
"नहीं।"
"तो फिर कौन गया?"
अकबर कुछ पल सोचते रहे। अचानक उनके चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। वे बोले,
"मेरा मन..."
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "जी हाँ, जहाँपनाह।"
पूरा दरबार एकदम शांत हो गया।
बीरबल ने स्पष्ट स्वर में कहा, "मेरे विचार से संसार में सबसे तेज़ मन है। मन एक ही क्षण में हजारों कोस दूर पहुँच सकता है। वह पल
भर में अतीत में जा सकता है, भविष्य की कल्पना कर सकता है और वर्तमान में लौट सकता है।
जहाँ पहुँचने में घोड़े को कई दिन लगेंगे, हवा को समय लगेगा और मनुष्य को महीनों की यात्रा
करनी पड़ेगी, वहाँ मन एक पल में पहुँच जाता है।"
दरबार में धीमी-धीमी फुसफुसाहट शुरू हो गई। कई लोग सहमति में सिर हिलाने लगे।
लेकिन ईर्ष्यालु दरबारियों में से एक मंत्री तुरंत खड़ा हो गया। उसने कहा,
"जहाँपनाह, मैं इस उत्तर से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। मन तो केवल कल्पना
करता है। वास्तविक गति तो हवा, बिजली या प्रकाश की होती है।"
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, "आपका प्रश्न उचित है। लेकिन ज़रा सोचिए, हर महान कार्य
की शुरुआत कहाँ से होती है?"
मंत्री चुप रहे।
बीरबल ने आगे कहा, "कोई महल बनने से पहले उसकी कल्पना मन में जन्म लेती है। कोई
युद्ध जीतने से पहले रणनीति मन में बनती है। कोई कविता लिखने से पहले उसके शब्द मन
में आते हैं। कोई व्यापारी व्यापार बढ़ाने से पहले योजना मन में बनाता है। यदि मन
न हो, तो न विचार होगा, न योजना और न ही कोई उपलब्धि।"
अकबर ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।
बीरबल ने एक और उदाहरण दिया, "मान लीजिए कि एक माँ अपने बेटे के बारे में
सोचती है जो सैकड़ों मील दूर रहता है। उसका मन उसी क्षण उसके पास पहुँच जाता है।
एक विद्यार्थी अपने गाँव को याद करता है और पल भर में बचपन की गलियों में घूम आता
है। एक सैनिक अपने परिवार को याद करता है और उसका मन तुरंत घर पहुँच जाता है। यही
मन की गति है।"
अब अधिकांश दरबारी बीरबल की बात से प्रभावित हो चुके थे।
तभी एक वृद्ध विद्वान खड़े हुए और बोले, "बीरबल, यदि मन सबसे
तेज़ है, तो क्या वही सबसे शक्तिशाली भी है?"
बीरबल ने उत्तर दिया, "मन की गति सबसे तेज़ है, लेकिन उसकी शक्ति इस बात पर
निर्भर करती है कि उसे सही दिशा कौन देता है। यदि मन पर बुद्धि और विवेक का
नियंत्रण हो, तो मनुष्य महान कार्य करता है। यदि मन लालच, क्रोध और अहंकार के पीछे चल
पड़े, तो वही मन उसे विनाश की ओर भी ले जा सकता है।"
अकबर ने संतोष से सिर हिलाया।
उसी समय उन्होंने दरबार के एक युवा सैनिक को बुलाया और पूछा, "यदि तुम्हें
अभी अपने गाँव की याद आए, तो क्या तुम्हारा मन वहाँ पहुँच जाएगा?"
सैनिक मुस्कुराकर बोला, "जी जहाँपनाह। मैं अभी अपने माता-पिता और अपने खेतों की
कल्पना कर सकता हूँ।"
अकबर ने कहा, "यही तो बीरबल कह रहे हैं।"
अब ईर्ष्यालु मंत्री के पास कोई तर्क नहीं बचा था। उसने चुपचाप अपना सिर झुका
लिया।
अकबर ने बीरबल की ओर देखकर कहा, "तुमने फिर सिद्ध कर दिया कि किसी प्रश्न का
उत्तर केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि गहरी समझ और जीवन के अनुभव से मिलता है।"
पूरा दरबार तालियों और प्रशंसा से गूँज उठा। लेकिन बीरबल अभी रुके नहीं।
उन्होंने कहा, "जहाँपनाह, इस प्रश्न का एक और पक्ष भी है। यदि अनुमति हो, तो मैं एक
छोटी-सी घटना सुनाकर अपनी बात पूरी करना चाहूँगा।"
अकबर मुस्कुराए और बोले, "निश्चित रूप से। हम सब सुनना चाहेंगे।"
पूरा दरबार उत्सुकता से बीरबल की ओर देखने लगा, क्योंकि सभी जानते थे कि
उनकी हर कहानी में कोई न कोई गहरी सीख अवश्य छिपी होती है।
पूरा दरबार शांत था। सभी की निगाहें बीरबल पर टिकी हुई थीं। सम्राट अकबर भी
उत्सुकता से उनकी अगली बात सुनने की प्रतीक्षा कर रहे थे। बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा,
"जहाँपनाह, यदि आप अनुमति दें तो मैं एक छोटी-सी घटना सुनाकर अपनी बात
पूरी करना चाहता हूँ।"
अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा, "बीरबल, तुम्हारी कहानियाँ हमेशा कोई न कोई नई सीख देती
हैं। अवश्य सुनाओ।"
बीरबल ने कहना शुरू किया, "बहुत समय पहले एक छोटे-से गाँव में दो मित्र
रहते थे। दोनों एक ही गुरु के शिष्य थे, दोनों ने समान शिक्षा प्राप्त की थी और दोनों के
पास मेहनत करने की क्षमता भी बराबर थी। लेकिन उनके जीवन की दिशा अलग-अलग हो गई।
इसका कारण उनकी बुद्धि या शक्ति नहीं, बल्कि उनके मन का स्वभाव था।"
दरबार के सभी लोग ध्यान से सुनने लगे।
"पहला मित्र हर समय बड़े-बड़े सपने देखता था, लेकिन उन सपनों
को पूरा करने के लिए कभी प्रयास नहीं करता था। उसका मन हर पल एक नई इच्छा की ओर
दौड़ता रहता था। कभी वह सोचता कि मैं बहुत बड़ा व्यापारी बनूँगा, कभी कल्पना
करता कि मैं राजा का मंत्री बन जाऊँगा, तो कभी बिना मेहनत के धनवान बनने के सपने देखने
लगता। उसका मन तेज़ था, लेकिन वह किसी एक लक्ष्य पर टिकता नहीं था।"
"दूसरा मित्र भी सपने देखता था, लेकिन हर सपना देखने के बाद
वह सोचता कि उसे पूरा कैसे किया जाए। उसने खेती सीखी, मेहनत की, नई विधियाँ
अपनाईं और धीरे-धीरे अपने गाँव का सबसे सफल किसान बन गया।"
बीरबल ने कुछ क्षण रुककर पूछा, "दोनों के मन तेज़ थे, लेकिन सफल कौन हुआ?"
दरबारियों ने एक स्वर में उत्तर दिया, "दूसरा मित्र।"
"क्यों?" बीरबल ने पूछा।
एक वृद्ध मंत्री बोले, "क्योंकि उसने अपने मन को सही दिशा दी।"
बीरबल मुस्कुराए और बोले, "यही इस कहानी का सार है। मन सबसे तेज़ अवश्य है,
लेकिन यदि उस
पर संयम और विवेक न हो, तो उसकी गति किसी काम की नहीं रहती।"
अकबर ने संतोषपूर्वक सिर हिलाया।
तभी बीरबल ने दरबार में उपस्थित एक छोटे बालक को बुलाया। वह राजमहल के एक
अधिकारी का पुत्र था और अपने पिता के साथ दरबार देखने आया था। बीरबल ने उससे पूछा,
"बेटा, यदि मैं तुमसे कहूँ कि अभी अपनी माँ के बारे में सोचो, तो क्या तुम सोच सकते हो?"
बालक ने तुरंत कहा, "जी हाँ।"
"और यदि मैं कहूँ कि अपने घर का आँगन याद करो?"
बालक मुस्कुराकर बोला, "वह भी अभी याद आ गया।"
"और यदि मैं कहूँ कि तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?"
बालक ने गर्व से कहा, "मैं एक बहादुर सैनिक बनना चाहता हूँ।"
बीरबल ने उसकी ओर देखकर कहा, "देखा जहाँपनाह? इस बालक का मन एक ही क्षण
में वर्तमान से भविष्य और फिर घर तक घूम आया। यही मन की गति है।"
दरबार में बैठे सभी लोग मुस्कुरा उठे।
लेकिन तभी वही ईर्ष्यालु मंत्री, जो पहले भी बीरबल का विरोध कर चुका था, फिर खड़ा हुआ।
उसने कहा, "यदि मन इतना तेज़ है, तो लोग गलत निर्णय क्यों
लेते हैं?"
बीरबल ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "क्योंकि तेज़ होना और सही
होना दोनों अलग बातें हैं।"
पूरा दरबार उनकी ओर देखने लगा।
बीरबल ने कहा, "एक तेज़ दौड़ने वाला घोड़ा यदि गलत दिशा में दौड़ पड़े,
तो वह अपने
सवार को मंज़िल तक नहीं, बल्कि संकट में पहुँचा देगा। उसी प्रकार मन भी यदि लालच,
क्रोध, ईर्ष्या और
अहंकार के पीछे दौड़े, तो मनुष्य का जीवन कठिन हो जाता है। लेकिन यदि मन सत्य,
धैर्य और विवेक
के साथ चले, तो वही मन मनुष्य को महान बना देता है।"
अकबर ने कहा, "तुम्हारी बात बिल्कुल सही है।"
इसके बाद बीरबल ने एक और उदाहरण दिया।
"मान लीजिए दो धनुर्धर हैं। दोनों के पास समान धनुष और समान
तीर हैं। पहला बिना लक्ष्य देखे तीर चला देता है, जबकि दूसरा पहले लक्ष्य को
ध्यान से देखता है, फिर सही समय पर तीर छोड़ता है। दोनों के पास समान साधन हैं,
लेकिन सफल वही
होगा जिसने अपने मन को स्थिर रखा।"
यह उदाहरण सुनकर दरबारियों ने तालियाँ बजाईं।
अकबर ने सिंहासन से उठकर कहा, "बीरबल, तुमने हमारे एक छोटे से प्रश्न को जीवन की बड़ी
शिक्षा में बदल दिया।"
फिर उन्होंने पूरे दरबार की ओर देखकर कहा, "आज से हम सब यह याद रखेंगे
कि मन सबसे तेज़ है, इसलिए उसे सही दिशा देना सबसे आवश्यक है।"
सभी दरबारियों ने एक स्वर में कहा, "जहाँपनाह की जय!"
अकबर ने अपने खजांची को आदेश दिया कि बीरबल को एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ,
रेशमी वस्त्र
और सम्मान का विशेष हार भेंट किया जाए।
खजांची तुरंत बहुमूल्य उपहार लेकर उपस्थित हुआ।
बीरबल ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह, आपके विश्वास
से बढ़कर मेरे लिए कोई पुरस्कार नहीं।"
अकबर मुस्कुराए और बोले, "यही कारण है कि तुम हमारे सबसे प्रिय मंत्री हो। ज्ञान
विनम्रता के बिना अधूरा है, और तुम्हारे भीतर दोनों का सुंदर मेल है।"
पूरा दरबार "वाह! वाह!" की आवाज़ों से गूँज उठा।
उस दिन की चर्चा पूरे राज्य में फैल गई। गाँवों की चौपालों में लोग इस कहानी
को सुनाने लगे। गुरुकुलों में आचार्य विद्यार्थियों को समझाने लगे कि मन की गति
अद्भुत है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उसका सही उपयोग। माता-पिता अपने बच्चों को
यह कथा सुनाकर बताते कि केवल सपने देखना पर्याप्त नहीं, उन्हें पूरा करने के लिए
परिश्रम, अनुशासन और धैर्य भी आवश्यक हैं।
समय बीतता गया, लेकिन अकबर और बीरबल के इस प्रश्न-उत्तर की चर्चा वर्षों तक
होती रही। जब भी कोई व्यक्ति जल्दबाज़ी में निर्णय लेने लगता, लोग कहते,
"मन सबसे तेज़ है, इसलिए उसे विवेक की लगाम देना मत भूलो।" धीरे-धीरे यह
कथा केवल मनोरंजन की कहानी नहीं रही, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन करने वाली सीख बन गई।
बीरबल ने उस दिन केवल एक प्रश्न का उत्तर नहीं दिया था। उन्होंने यह समझाया था
कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका मन है। वही मन उसे ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है
और वही मन उसे भटका भी सकता है। इसलिए जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित करना सीख
लेता है, वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय ले सकता है।
सम्राट अकबर ने दरबार समाप्त करते हुए कहा, "आज हमने जाना कि संसार में
सबसे तेज़ मन है, लेकिन सबसे महान वह व्यक्ति है जो अपने मन को सत्य, धैर्य और
बुद्धि के मार्ग पर चलाना जानता है।"
बीरबल ने विनम्रता से सिर झुकाया और कहा, "जहाँपनाह, मन की गति
ईश्वर का वरदान है, और उसका सदुपयोग मनुष्य का कर्तव्य।"
इतना सुनते ही पूरा दरबार सम्मान में खड़ा हो गया। शाही नगाड़े बजे, सभा समाप्त हुई
और सभी अपने-अपने घर लौटे। लेकिन हर व्यक्ति अपने साथ एक अमूल्य सीख लेकर गया—मन
जितना तेज़ है, उतना ही शक्तिशाली भी है; इसलिए उसे सही दिशा देना ही
सच्ची बुद्धिमानी है।
तो दोस्तों
मन संसार की
सबसे तेज़ शक्ति है। वह एक पल में कहीं भी पहुँच सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक शक्ति
तभी प्रकट होती है जब वह बुद्धि, विवेक, धैर्य और सदाचार के मार्ग पर चलता है। जो अपने मन पर
नियंत्रण रखता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और सम्मान प्राप्त करता है।
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