मुगल सम्राट अकबर अपने न्याय, उदारता और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध
थे। उनके दरबार में अनेक विद्वान, कवि, संगीतज्ञ और बुद्धिमान मंत्री उपस्थित रहते थे, लेकिन उन सभी
में बीरबल का स्थान सबसे अलग था। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, हाजिरजवाबी और गहरी समझ के
कारण अकबर के सबसे प्रिय सलाहकारों में गिने जाते थे। जब भी कोई कठिन प्रश्न सामने
आता या किसी उलझन का समाधान खोजना होता, तब अकबर सबसे पहले बीरबल की ओर देखते थे। बीरबल
न केवल समस्या का उत्तर देते थे, बल्कि ऐसा उत्तर देते थे जो सभी को जीवन की कोई न कोई
महत्वपूर्ण सीख भी दे जाता था।
एक दिन की बात है। बसंत ऋतु का सुंदर मौसम था। महल के बगीचे में रंग-बिरंगे
फूल खिले हुए थे। चारों ओर सुगंध फैली हुई थी और पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को
और भी आनंदमय बना रहा था। अकबर अपने कुछ मंत्रियों के साथ बगीचे में टहल रहे थे।
चलते-चलते उनकी दृष्टि एक गरीब किसान पर पड़ी, जो महल के बाहर सड़क के
किनारे बैठा था। उसके कपड़े पुराने और फटे हुए थे। उसके पैरों में चप्पल तक नहीं
थी और उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। फिर भी वह शांत बैठा हुआ था और
किसी से कुछ माँग नहीं रहा था।
उस किसान को देखकर अकबर के मन में एक विचार आया। उन्होंने मंत्रियों की ओर
देखते हुए पूछा, "बताइए, संसार में सबसे गरीब व्यक्ति कौन होता है?" प्रश्न सुनते
ही सभी मंत्री सोच में पड़ गए। हर किसी के मन में अलग-अलग उत्तर था। एक मंत्री ने
कहा, "जहाँपनाह, जिसके पास धन नहीं होता, वही सबसे गरीब होता
है।" दूसरे मंत्री ने तुरंत कहा, "नहीं महाराज, जिसके पास भोजन
नहीं होता, वही सबसे गरीब कहलाता है।" तीसरे मंत्री ने कहा, "मेरे विचार से
जिसके पास रहने के लिए घर न हो, वही सबसे गरीब व्यक्ति है।"
अकबर ने सभी की बातें ध्यान से सुनीं, लेकिन उनके चेहरे से स्पष्ट था कि वे इन उत्तरों
से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उसी समय बीरबल भी वहाँ आ पहुँचे। अकबर ने मुस्कुराते
हुए उनसे वही प्रश्न दोहराया, "बीरबल, तुम बताओ, संसार में सबसे गरीब कौन है?"
बीरबल ने बिना
किसी जल्दबाजी के उत्तर देने के बजाय पहले कुछ क्षण तक चारों ओर देखा। फिर
उन्होंने उस किसान की ओर एक नज़र डाली और शांत स्वर में कहा, "जहाँपनाह,
इस प्रश्न का
उत्तर शब्दों में देने के बजाय यदि अनुभव से दिया जाए तो अधिक उचित होगा। यदि आप
अनुमति दें तो मैं कल पूरे दरबार के सामने इसका उत्तर दूँगा।"
अकबर ने उत्सुकता से कहा, "ठीक है बीरबल, हम कल तुम्हारे उत्तर की
प्रतीक्षा करेंगे।" अगले दिन दरबार सजा। सभी मंत्री, दरबारी और सैनिक अपने-अपने
स्थान पर उपस्थित थे। अकबर भी सिंहासन पर विराजमान थे। सभी की निगाहें बीरबल पर
थीं क्योंकि हर कोई जानना चाहता था कि आखिर सबसे गरीब व्यक्ति किसे कहा जा सकता
है।
बीरबल ने दरबार में प्रवेश करते ही सबसे पहले एक सेवक को आदेश दिया कि नगर के
चार अलग-अलग व्यक्तियों को बुलाया जाए। पहला व्यक्ति एक धनी व्यापारी था, जिसके पास अपार
धन-संपत्ति थी। दूसरा एक साधारण किसान था, जो मेहनत करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता
था। तीसरा एक भिक्षुक था, जो लोगों से भीख माँगकर जीवन बिताता था। चौथा व्यक्ति नगर
का एक वृद्ध संत था, जो जंगल के पास एक छोटी-सी कुटिया में रहता था।
कुछ समय बाद चारों व्यक्ति दरबार में उपस्थित हो गए। व्यापारी रेशमी वस्त्रों
और कीमती आभूषणों से सजा हुआ था। किसान साधारण कपड़ों में था, लेकिन उसके
चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था। भिक्षुक के कपड़े मैले थे और वह कमजोर दिखाई दे
रहा था। संत ने साधारण वस्त्र धारण किए हुए थे, पर उनके चेहरे पर अद्भुत
शांति और संतोष दिखाई देता था।
बीरबल ने सबसे पहले व्यापारी से पूछा, "बताइए, क्या आप अपने
जीवन से संतुष्ट हैं?" व्यापारी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "नहीं। मेरे पास
बहुत धन है, लेकिन मैं और अधिक धन कमाना चाहता हूँ। पड़ोसी राज्य के व्यापारी मुझसे अधिक
धनी हैं। जब तक मैं उनसे आगे नहीं निकल जाता, मुझे चैन नहीं
मिलेगा।" उसकी बात सुनकर दरबार में हलचल हुई। सभी को आश्चर्य हुआ कि इतना धनी
व्यक्ति भी स्वयं को संतुष्ट नहीं मानता।
इसके बाद बीरबल ने किसान से वही प्रश्न पूछा। किसान ने मुस्कुराते हुए कहा,
"महाराज, मैं सुबह से शाम तक मेहनत करता हूँ। भगवान की कृपा से मेरे परिवार को दो समय
का भोजन मिल जाता है। मेरे बच्चे स्वस्थ हैं, मेरी पत्नी मेरा साथ देती
है और मैं अपने श्रम से जो कमाता हूँ, उसी में प्रसन्न रहता हूँ। मेरे पास अधिक धन
नहीं है, लेकिन मैं संतुष्ट हूँ।"
अब बीरबल ने भिक्षुक से पूछा, "तुम्हें क्या चाहिए?" भिक्षुक ने
तुरंत उत्तर दिया, "मुझे भोजन चाहिए, कपड़े चाहिए, रहने के लिए घर चाहिए और
यदि बहुत धन मिल जाए तो मैं जीवन भर आराम करूँ।" उसके उत्तर में इच्छाओं की
लंबी सूची थी। इसके बाद बीरबल ने संत से वही प्रश्न पूछा। संत मुस्कुराए और बोले,
"मुझे कुछ नहीं चाहिए। प्रकृति ने मुझे हवा, पानी और भोजन दिया है। जो
मिल जाता है, उसी में प्रसन्न रहता हूँ। मन में संतोष हो तो मनुष्य सबसे धनी होता है।"
दरबार में कुछ क्षणों के लिए पूर्ण शांति छा गई। बीरबल ने अकबर की ओर देखकर
कहा, "जहाँपनाह, अब यदि अनुमति हो तो मैं आपके प्रश्न का उत्तर दूँ।"
अकबर ने सिर हिलाकर कहा, "कहो बीरबल।"
बीरबल बोले, "संसार में सबसे गरीब वह नहीं है जिसके पास धन कम है। सबसे
गरीब वह है जिसके मन में संतोष नहीं है। जिसके पास करोड़ों की संपत्ति हो, लेकिन वह हर
समय और अधिक पाने की लालसा में जलता रहे, वह भीतर से गरीब है। दूसरी ओर, जिसके पास
सीमित साधन हों, पर वह अपने श्रम, परिवार और जीवन से संतुष्ट हो, वह वास्तव में
धनी है। गरीबी केवल जेब की नहीं होती, मन की भी होती है। मन की गरीबी सबसे बड़ी गरीबी
है।"
बीरबल की बात सुनकर व्यापारी का सिर झुक गया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
उसने स्वीकार किया कि धन की अंधी दौड़ में उसने अपने परिवार, मित्रों और
जीवन के सुखों को नज़रअंदाज़ कर दिया था। किसान विनम्रता से मुस्कुराता रहा,
जबकि संत शांत
भाव से बैठे रहे।
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, "बीरबल, तुमने आज केवल मेरे प्रश्न का उत्तर ही नहीं
दिया, बल्कि पूरे दरबार को जीवन का एक अमूल्य सत्य भी सिखाया है। वास्तव में मन का
संतोष ही सबसे बड़ा धन है और लालच मनुष्य को सबसे गरीब बना देता है।"
उस दिन के बाद अकबर ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि राज्य में केवल धन के
आधार पर किसी व्यक्ति का सम्मान या अपमान न किया जाए। मेहनत, ईमानदारी और
संतोष को भी उतना ही महत्व दिया जाए। व्यापारी ने भी अपने धन का एक बड़ा भाग
गरीबों की सहायता में लगाना शुरू किया और किसान पहले की तरह मेहनत और संतोष के साथ
अपना जीवन जीता रहा। पूरे राज्य में यह कहानी फैल गई कि सबसे गरीब वह नहीं जिसके
पास धन कम है, बल्कि वह है जिसके मन में संतोष नहीं है और जिसकी इच्छाएँ
कभी समाप्त नहीं होतीं।
दरबार समाप्त होने के बाद भी बीरबल के शब्द अकबर के मन में गूंजते रहे।
उन्होंने सोचा कि यदि मन का संतोष ही सबसे बड़ा धन है, तो राज्य के लोगों के जीवन
को और निकट से समझना चाहिए। अगले ही दिन उन्होंने बीरबल को बुलाया और कहा,
"बीरबल, तुम्हारी बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। मैं जानना चाहता हूँ कि
हमारे राज्य में लोग वास्तव में कैसे रहते हैं। क्या वे सुखी हैं या केवल जीवित
रहने का प्रयास कर रहे हैं?"
बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, "जहाँपनाह, यदि किसी राजा
को अपनी प्रजा का वास्तविक जीवन जानना हो, तो उसे राजसी वस्त्रों में नहीं, बल्कि एक
साधारण नागरिक बनकर उनके बीच जाना चाहिए। लोग राजा के सामने सच बोलने से डरते हैं,
लेकिन एक
साधारण व्यक्ति से वे अपने मन की बात बिना किसी भय के कह देते हैं।"
अकबर को यह सुझाव पसंद आया। उसी रात उन्होंने और बीरबल ने साधारण कपड़े पहने
और बिना किसी शाही पहचान के नगर की गलियों में निकल पड़े। बाजार में चहल-पहल थी।
कहीं मिठाइयाँ बिक रही थीं, कहीं लोहार हथौड़ा चला रहा था, तो कहीं बच्चे खेल रहे थे।
दोनों धीरे-धीरे चलते हुए लोगों की बातें सुनते रहे।
सबसे पहले वे एक सुनार की दुकान पर पहुँचे। दुकान सोने-चाँदी के गहनों से भरी
हुई थी। सुनार ग्राहकों से घिरा था, लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी। जब दुकान बंद
हुई तो वह अपने मित्र से बोला, "इस वर्ष मेरा लाभ पिछले वर्ष से कम हुआ है। यदि
ऐसा ही चलता रहा तो मैं दूसरे व्यापारियों से पीछे रह जाऊँगा।"
अकबर ने धीरे से बीरबल से कहा, "इतना धन होने पर भी यह व्यक्ति चिंतित है।"
बीरबल मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, जिसे अपनी आवश्यकता से अधिक
की चिंता सताती है, वह कभी संतुष्ट नहीं हो सकता।"
आगे बढ़ते हुए दोनों एक कुम्हार के घर पहुँचे। कुम्हार अपनी पत्नी और बच्चों
के साथ भोजन कर रहा था। भोजन बहुत साधारण था—रोटियाँ, दाल और थोड़ी-सी सब्ज़ी।
फिर भी पूरा परिवार हँसते हुए बातें कर रहा था। भोजन समाप्त होने पर कुम्हार ने
भगवान का धन्यवाद किया और बच्चों से कहा, "मेहनत से कमाया हुआ भोजन
सबसे स्वादिष्ट होता है।"
अकबर यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। उन्होंने कहा, "इनके पास बहुत कम है,
फिर भी इनके
चेहरे पर प्रसन्नता है।"
बीरबल ने उत्तर दिया, "यही संतोष का धन है, जहाँपनाह।"
थोड़ी दूर जाने पर उन्होंने एक विशाल हवेली देखी। भीतर से ऊँची आवाज़ें आ रही
थीं। जिज्ञासावश दोनों पास गए। पता चला कि एक अमीर परिवार संपत्ति के बँटवारे को
लेकर आपस में झगड़ रहा था। भाई-भाई पर आरोप लगा रहे थे, माता-पिता दुखी बैठे थे और
नौकर भी भयभीत थे।
अकबर ने दुखी होकर कहा, "इतनी दौलत होते हुए भी यह परिवार सुखी नहीं है।"
बीरबल बोले, "धन घर बना सकता है, लेकिन प्रेम और संतोष के बिना वह घर कभी परिवार
नहीं बन सकता।"
आगे बढ़ते हुए वे नगर के बाहर पहुँचे। वहाँ एक वृद्ध लकड़हारा अपने सिर पर
लकड़ियों का गट्ठर रखे लौट रहा था। उसके कपड़े पुराने थे, शरीर थका हुआ था, लेकिन वह
धीरे-धीरे कोई लोकगीत गुनगुना रहा था। अकबर ने उससे पूछा, "बाबा, क्या तुम थकते
नहीं?"
लकड़हारे ने हँसकर उत्तर दिया, "थकता तो हूँ बेटा, लेकिन मेहनत करने से शर्म
नहीं आती। शाम को जब अपने परिवार के साथ बैठकर भोजन करता हूँ, तब सारी थकान
दूर हो जाती है।"
"क्या तुम्हें कभी अमीर बनने की इच्छा नहीं होती?"
अकबर ने पूछा।
वृद्ध ने मुस्कुराते हुए कहा, "इच्छा तो हर इंसान की होती है, लेकिन यदि
इच्छाएँ ही जीवन पर शासन करने लगें, तो सुख कभी नहीं मिलता। मेरे पास कम है, पर जो है वह
ईमानदारी से कमाया है। यही मेरी सबसे बड़ी दौलत है।"
अकबर ने मन ही मन उस वृद्ध को प्रणाम किया।
रात गहराने लगी थी। लौटते समय दोनों एक पुराने मंदिर के पास रुके। वहाँ एक
साधु कुछ बच्चों को शिक्षा दे रहे थे। वे कह रहे थे, "जिसके मन में लालच है,
वह चाहे कितना
भी धन इकट्ठा कर ले, उसे हमेशा कमी महसूस होगी। लेकिन जो व्यक्ति बाँटना जानता
है, उसका हृदय कभी खाली नहीं होता।"
बच्चों ने पूछा, "गुरुदेव, क्या धन बुरा है?"
साधु मुस्कुराए और बोले, "नहीं, धन बुरा नहीं है। धन का अहंकार और लालच बुरा है। धन का
उपयोग यदि दूसरों की भलाई में हो, तो वही सबसे बड़ा पुण्य बन जाता है।"
यह सुनकर अकबर ने बीरबल की ओर देखा। बीरबल ने धीरे से कहा, "जहाँपनाह,
आज आपने देखा
कि गरीब और अमीर होने का निर्णय केवल धन नहीं करता। मनुष्य का चरित्र, उसका संतोष और
उसका व्यवहार ही उसकी वास्तविक संपत्ति है।"
महल लौटकर अकबर देर तक सो नहीं सके। उन्होंने अपने जीवन पर भी विचार किया।
उन्हें लगा कि राजा होने के बावजूद यदि वे केवल राज्य का विस्तार और खजाने की
वृद्धि ही सोचते रहें, तो वे भी संतोष से दूर हो सकते हैं। उसी समय उन्होंने
निश्चय किया कि वे राज्य की समृद्धि के साथ-साथ लोगों के सुख और सम्मान का भी
ध्यान रखेंगे।
अगले दिन उन्होंने दरबार में घोषणा की कि राज्य के प्रत्येक गाँव में कुएँ
बनवाए जाएँगे, गरीब किसानों को अच्छे बीज दिए जाएँगे, अनाथ बच्चों की
शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी और वृद्धों की सहायता के लिए विशेष कोष बनाया जाएगा।
उन्होंने यह भी आदेश दिया कि कर केवल न्यायपूर्ण मात्रा में लिया जाए, ताकि किसी गरीब
पर अनावश्यक बोझ न पड़े।
दरबारियों ने इस निर्णय की प्रशंसा की। बीरबल ने विनम्रता से कहा,
"जहाँपनाह, जब राजा अपनी प्रजा के सुख को अपना सुख मान लेता है,
तब पूरा राज्य
समृद्ध हो जाता है।"
अकबर मुस्कुराए और बोले, "बीरबल, आज मुझे समझ में आ गया कि राज्य की सबसे बड़ी ताकत उसका
खजाना नहीं, बल्कि संतुष्ट और प्रसन्न प्रजा होती है।"
उस दिन से राज्य में कई नई योजनाएँ शुरू हुईं। धीरे-धीरे किसानों की स्थिति
सुधरने लगी, व्यापार ईमानदारी से बढ़ने लगा और लोगों के मन में यह विश्वास पैदा हुआ कि
उनका राजा केवल धनवान नहीं, बल्कि न्यायप्रिय और दयालु भी है।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। कुछ ही दिनों बाद दरबार में एक ऐसा धनी
व्यापारी आया, जिसने दावा किया कि धन से हर चीज़ खरीदी जा सकती है। उसके
इस घमंड ने एक नई परीक्षा को जन्म दिया, और बीरबल ने उसे ऐसा सबक सिखाया जिसे वह जीवन भर
नहीं भूल पाया।
कुछ दिनों बाद एक अत्यंत धनी व्यापारी अकबर के दरबार में आया। वह दूर-दूर तक
अपने अपार धन और विशाल व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। उसके साथ कई नौकर थे, जो सोने-चाँदी
से भरे संदूक, कीमती रत्न और बहुमूल्य वस्त्र लेकर आए थे। व्यापारी के
चेहरे पर आत्मविश्वास कम और घमंड अधिक दिखाई दे रहा था। उसने अकबर को प्रणाम किया
और गर्व से बोला, "जहाँपनाह, संसार में धन से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। जिसके पास धन है,
उसके लिए कोई
भी कार्य असंभव नहीं। धन से सम्मान खरीदा जा सकता है, मित्र बनाए जा सकते हैं,
महल बनाए जा
सकते हैं और लोगों को अपने अनुसार चलाया जा सकता है।"
दरबार में बैठे कुछ मंत्री उसकी बात से सहमत दिखाई दिए, लेकिन बीरबल शांत भाव से
उसे देखते रहे। अकबर ने मुस्कुराकर कहा, "व्यापारी जी, आपकी बात सुनने
में प्रभावशाली लगती है, लेकिन क्या सचमुच धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है?"
व्यापारी ने बिना सोचे उत्तर दिया, "निश्चय ही, जहाँपनाह। यदि
किसी वस्तु की कीमत अधिक हो, तो वह अवश्य मिल जाती है।"
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। वे समझ गए कि अब व्यापारी के घमंड को दूर करने का
समय आ गया है। उन्होंने विनम्रता से कहा, "यदि जहाँपनाह अनुमति दें,
तो मैं इस बात
की परीक्षा लेना चाहता हूँ।"
अकबर ने तुरंत अनुमति दे दी।
अगले दिन दरबार में विशेष सभा बुलाई गई। नगर के अनेक प्रतिष्ठित नागरिक,
विद्वान,
किसान, कारीगर और
व्यापारी भी उपस्थित हुए। बीरबल ने उस धनी व्यापारी को आगे बुलाया और कहा,
"आप कहते हैं कि धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है। आज मैं आपको कुछ वस्तुएँ
खरीदने का अवसर देता हूँ।"
व्यापारी मुस्कुराया। उसे लगा कि यह बहुत आसान परीक्षा होगी।
बीरबल ने पहला प्रश्न पूछा, "यदि आपका बचपन वापस चाहिए, तो उसकी क्या
कीमत देंगे?"
व्यापारी कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, "बचपन तो वापस नहीं आ
सकता।"
बीरबल ने कहा, "तो इसका अर्थ है कि धन से समय नहीं खरीदा जा सकता।"
दरबार में सहमति की आवाज़ें सुनाई देने लगीं।
फिर बीरबल ने पूछा, "यदि कोई व्यक्ति आपको सच्चा प्रेम बेचने आए, तो क्या आप उसे
खरीद सकते हैं?"
व्यापारी ने उत्तर दिया, "प्रेम तो खरीदा नहीं जा सकता।"
"बहुत अच्छा," बीरबल बोले, "अब बताइए, क्या धन देकर
किसी माँ का स्नेह खरीदा जा सकता है? क्या किसी सच्चे मित्र की निष्ठा खरीदी जा सकती
है? क्या किसी ईमानदार व्यक्ति का चरित्र खरीदा जा सकता है?"
व्यापारी का सिर धीरे-धीरे झुकने लगा। उसने स्वीकार किया, "नहीं।"
बीरबल ने फिर एक वृद्ध किसान को आगे बुलाया। वही किसान था, जिसे पहले भी
दरबार में बुलाया गया था। उसने सम्मानपूर्वक अकबर और बीरबल को प्रणाम किया।
बीरबल ने किसान से पूछा, "यदि तुम्हें इस व्यापारी की सारी संपत्ति दे दी जाए,
लेकिन बदले में
तुम्हें अपने परिवार का प्रेम छोड़ना पड़े, तो क्या तुम तैयार हो?"
किसान ने बिना एक पल गँवाए उत्तर दिया, "कभी नहीं। धन फिर से कमाया
जा सकता है, लेकिन परिवार का प्रेम खो जाए तो जीवन का अर्थ ही समाप्त हो जाता है।"
अब एक सैनिक को बुलाया गया, जिसने वर्षों तक राज्य की सेवा की थी। बीरबल ने उससे पूछा,
"यदि तुम्हें बहुत सारा धन दिया जाए, लेकिन बदले में तुम्हें अपना सम्मान छोड़ना पड़े,
तो क्या तुम
मानोगे?"
सैनिक ने दृढ़ स्वर में कहा, "सम्मान खोकर जीना मृत्यु के समान है। मैं ऐसा
प्रस्ताव कभी स्वीकार नहीं करूँगा।"
फिर एक विद्वान शिक्षक को बुलाया गया। बीरबल ने पूछा, "यदि तुम्हें
अपार धन मिले, लेकिन बदले में तुम्हारा ज्ञान और बुद्धि छीन ली जाए,
तो क्या तुम
तैयार हो?"
विद्वान मुस्कुराए और बोले, "ज्ञान के बिना धन अंधेरे में रखे दीपक के समान
है। मैं ऐसा सौदा कभी नहीं करूँगा।"
अब पूरा दरबार व्यापारी की ओर देखने लगा। उसका चेहरा उतर चुका था।
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "व्यापारी जी, आपने देखा कि संसार की सबसे
मूल्यवान वस्तुएँ—समय, प्रेम, सम्मान, विश्वास, ज्ञान, स्वास्थ्य और संतोष—इनमें से कोई भी धन से नहीं खरीदी जा
सकती। धन जीवन का एक साधन है, लेकिन जीवन का उद्देश्य नहीं।"
व्यापारी की आँखों में पश्चाताप झलकने लगा। उसने हाथ जोड़कर कहा,
"बीरबल जी, आज मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ। मैंने धन कमाने में पूरा
जीवन लगा दिया, लेकिन यह कभी नहीं सोचा कि मैं वास्तव में किस चीज़ का
मालिक हूँ और किस चीज़ से वंचित हूँ।"
अकबर ने स्नेहपूर्वक कहा, "गलती स्वीकार करना भी महानता है।"
व्यापारी ने उसी समय घोषणा की कि वह अपनी आय का एक बड़ा भाग निर्धनों, विद्यार्थियों
और रोगियों की सहायता के लिए दान करेगा। उसने नगर में एक सराय, एक विद्यालय और
यात्रियों के लिए प्याऊ बनवाने का भी संकल्प लिया।
कुछ महीनों बाद जब बीरबल और अकबर फिर से नगर भ्रमण पर निकले, तो उन्होंने
देखा कि व्यापारी के व्यवहार में अद्भुत परिवर्तन आ चुका था। पहले जहाँ वह केवल
लाभ की बात करता था, अब वह अपने कर्मचारियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करता
था। गरीबों की सहायता करता था और ईमानदारी से व्यापार करता था। उसके चेहरे पर पहले
से कहीं अधिक शांति थी।
अकबर ने मुस्कुराकर बीरबल से कहा, "अब मैं समझ गया हूँ कि
सच्ची समृद्धि खजाने में नहीं, बल्कि हृदय में होती है।"
बीरबल ने उत्तर दिया, "जहाँपनाह, मनुष्य के पास चाहे कितना भी धन हो, यदि उसके मन में लालच,
ईर्ष्या और
असंतोष है, तो वह भीतर से गरीब है। लेकिन यदि किसी के पास सीमित साधन हैं, फिर भी वह
मेहनती, ईमानदार, दयालु और संतुष्ट है, तो वही वास्तव में सबसे धनी व्यक्ति है।"
उस दिन अकबर ने पूरे राज्य में एक संदेश भेजा—
"किसी मनुष्य का मूल्य उसके वस्त्रों, महलों या धन से नहीं,
बल्कि उसके
चरित्र, परिश्रम, दया और संतोष से आँका जाए।"
यह संदेश धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गया। लोग अपने बच्चों को यह शिक्षा
देने लगे कि धन कमाना बुरा नहीं, लेकिन धन के लिए अपने संस्कार, ईमानदारी और मानवता को खो
देना सबसे बड़ी गरीबी है। व्यापारी अपने घमंड को छोड़कर विनम्र बन गया, किसान पहले की
तरह संतोष से जीवन जीता रहा, सैनिक अपने सम्मान की रक्षा करता रहा और शिक्षक ज्ञान का
दीप जलाते रहे।
अकबर ने अंत में दरबार में कहा, "आज से यदि कोई मुझसे पूछे कि संसार का सबसे गरीब
व्यक्ति कौन है, तो मेरा उत्तर होगा—'वह, जिसके पास संतोष नहीं है।'"
बीरबल मुस्कुराए। पूरा दरबार उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करने लगा। सभी ने
स्वीकार किया कि धन का महत्व है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—अच्छा चरित्र, संतोष, प्रेम, ईमानदारी और
दूसरों के लिए करुणा। यही वे गुण हैं जो मनुष्य को वास्तव में महान और समृद्ध
बनाते हैं।
इस प्रकार बीरबल ने एक साधारण से प्रश्न—"सबसे गरीब कौन?"—का ऐसा उत्तर
दिया, जो केवल अकबर ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवन का
अमूल्य संदेश बन गया।
तो दोस्तों
सच्ची गरीबी धन
की कमी नहीं, बल्कि लालच, असंतोष और बुरे विचारों की अधिकता है। जो व्यक्ति मेहनत,
ईमानदारी,
प्रेम, दया और संतोष
के साथ जीवन जीता है, वही वास्तव में संसार का सबसे धनी और सुखी व्यक्ति होता है।
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