मुगल सम्राट अकबर अपने न्याय, उदारता और बुद्धिमत्ता के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में अनेक विद्वान, कवि, कलाकार और बुद्धिमान मंत्री उपस्थित रहते थे। उन सभी में सबसे अधिक चतुर और हाजिरजवाब थे बीरबल। बीरबल अपनी सूझबूझ, तीव्र बुद्धि और कठिन से कठिन समस्या का सरल समाधान निकालने की क्षमता के कारण सम्राट के अत्यंत प्रिय थे। दरबार में जब भी कोई उलझा हुआ मामला आता, बीरबल अपनी बुद्धिमत्ता से ऐसा समाधान प्रस्तुत करते कि सभी आश्चर्यचकित रह जाते। अकबर को पशु-पक्षियों से भी विशेष प्रेम था। उनके महल में अनेक प्रकार के दुर्लभ पक्षी और जानवर पाले जाते थे। इन्हीं में एक अत्यंत सुंदर, हरे पंखों वाला, लाल चोंच वाला तोता भी था, जिसे अकबर अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते थे।
यह तोता साधारण पक्षी नहीं था। वह मीठी आवाज़ में बोलता, लोगों की बातें
दोहराता और सम्राट के आने पर उनका स्वागत करता था। जब भी अकबर सुबह बाग में घूमने
जाते, तोता उन्हें देखकर खुशी से बोल उठता, “जहाँपनाह की जय हो!” यह सुनकर अकबर प्रसन्न हो
जाते। वे स्वयं अपने हाथों से उसे फल खिलाते और उससे बातें करते। धीरे-धीरे पूरे
महल में यह बात प्रसिद्ध हो गई कि सम्राट अपने इस प्रिय तोते से बहुत अधिक स्नेह
करते हैं। महल के सेवक भी उसकी पूरी देखभाल करते, क्योंकि वे जानते थे कि यदि
तोते को किसी प्रकार की हानि पहुँची तो सम्राट बहुत दुखी होंगे।
एक दिन अकबर को किसी महत्वपूर्ण कार्य से कुछ दिनों के लिए राज्य के दूसरे भाग
की यात्रा पर जाना पड़ा। प्रस्थान करने से पहले उन्होंने अपने सबसे विश्वसनीय सेवक
को बुलाया और कहा, “मैं इस तोते से बहुत प्रेम करता हूँ। जब तक मैं लौटकर न आऊँ,
इसकी पूरी
देखभाल करना। इसे समय पर भोजन देना, साफ पानी देना और इसका विशेष ध्यान रखना। लेकिन
मेरी एक बात ध्यान से सुन लो। यदि किसी ने मुझे आकर यह समाचार दिया कि मेरा तोता
मर गया है, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा।” सम्राट की यह बात सुनकर सेवक घबरा गया, लेकिन उसने सिर
झुकाकर आदेश स्वीकार कर लिया।
अकबर यात्रा पर चले गए। सेवक पूरी ईमानदारी से तोते की सेवा करने लगा। वह समय
पर उसे ताज़े फल देता, पानी बदलता और उसके पिंजरे की सफाई करता। लेकिन जीवन और
मृत्यु मनुष्य के हाथ में नहीं होते। कुछ ही दिनों बाद अचानक तोता बीमार पड़ गया।
राजवैद्य को बुलाया गया। उन्होंने दवा दी, देखभाल की, लेकिन तोते की हालत लगातार
बिगड़ती गई। अंततः एक सुबह वह शांत हो गया। सेवक ने देखा कि तोता अब न तो हिल रहा
था, न बोल रहा था और न ही साँस ले रहा था। वह समझ गया कि तोते की मृत्यु हो चुकी
है।
यह देखकर सेवक के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे सम्राट की बात याद आई कि जो भी
यह समाचार देगा कि तोता मर गया है, उसे दंड मिलेगा। अब वह गहरे संकट में पड़ गया। यदि सच बताए
तो दंड मिलेगा और यदि झूठ बोले तो भी अपराध होगा। वह दिन-रात इसी चिंता में डूबा
रहा। अंत में उसे एक ही उपाय सूझा—बीरबल के पास जाना।
सेवक रोता हुआ बीरबल के घर पहुँचा। उसने पूरी घटना सुनाई और हाथ जोड़कर बोला,
“मंत्री जी,
मेरी कोई गलती
नहीं है। मैंने पूरी निष्ठा से तोते की सेवा की, लेकिन उसकी मृत्यु हो गई।
यदि मैं सम्राट को सच बताऊँगा तो वे मुझे दंड देंगे। कृपया मेरी सहायता कीजिए।”
बीरबल ने सेवक की पूरी बात ध्यान से सुनी। वे समझ गए कि सेवक निर्दोष है और
केवल सम्राट के क्रोध से भयभीत है। बीरबल कुछ देर तक शांत बैठे रहे। फिर उनके
चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। उन्होंने कहा, “चिंता मत करो। तुमने अपना
कर्तव्य निभाया है। अब मैं ऐसा उपाय करूँगा कि सम्राट को भी सत्य का पता चल जाएगा
और तुम्हें दंड भी नहीं मिलेगा।”
कुछ दिनों बाद अकबर अपनी यात्रा पूरी करके राजधानी लौट आए। राजकाज का कार्य
समाप्त करने के बाद उन्हें अपने प्रिय तोते की याद आई। उन्होंने तुरंत पूछा,
“मेरा तोता कैसा
है?”
दरबार में सन्नाटा छा गया। कोई भी उत्तर देने का साहस नहीं कर रहा था। तभी
बीरबल आगे बढ़े और विनम्रता से बोले, “जहाँपनाह, आपका प्रिय तोता बहुत
अद्भुत अवस्था में पहुँच गया है।”
अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “क्या मतलब?”
बीरबल ने गंभीर स्वर में कहा, “महाराज, वह न कुछ खाता है, न पानी पीता है, न किसी से बात करता है।
उसने अपनी आँखें बंद कर ली हैं, अपने पंख बिल्कुल स्थिर कर लिए हैं और वह आकाश की ओर मुख
करके एकदम शांत पड़ा है।”
अकबर चौंक गए। उन्होंने कहा, “बीरबल, सीधी बात क्यों नहीं करते? क्या मेरा तोता मर गया है?”
बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, यह शब्द तो आपने स्वयं कहा
है। मैंने तो केवल उसकी अवस्था का वर्णन किया है।”
अकबर कुछ क्षणों तक मौन रहे। फिर उन्हें अपनी कही हुई बात याद आई कि जो भी
तोते की मृत्यु का समाचार देगा, उसे दंड मिलेगा। वे समझ गए कि यदि सेवक सीधे यह बात कहता तो
उसे अन्यायपूर्ण दंड मिलता, जबकि उसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। बीरबल ने बड़ी
बुद्धिमानी से सत्य भी बता दिया और निर्दोष सेवक को बचा भी लिया।
अकबर ने तुरंत सेवक को बुलाने का आदेश दिया। सेवक काँपता हुआ दरबार में आया।
उसने सिर झुकाकर क्षमा माँगी। सम्राट ने शांत स्वर में कहा, “तुमने कोई
अपराध नहीं किया। मृत्यु पर किसी का अधिकार नहीं होता। यदि तुमने पूरी निष्ठा से
अपने कर्तव्य का पालन किया है, तो तुम्हें दंड नहीं बल्कि प्रशंसा मिलनी चाहिए।”
इसके बाद अकबर ने बीरबल की ओर देखा और मुस्कराते हुए बोले, “बीरबल, तुम्हारी
बुद्धिमानी वास्तव में अद्भुत है। तुमने मुझे मेरी अपनी भूल का एहसास करा दिया।
क्रोध में दिया गया आदेश अक्सर निर्दोष लोगों के लिए संकट बन जाता है। भविष्य में
मैं किसी भी परिस्थिति में ऐसा आदेश नहीं दूँगा जिससे किसी निर्दोष को भय हो।”
दरबार में उपस्थित सभी मंत्री और दरबारी बीरबल की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करने
लगे। सभी ने अनुभव किया कि कठिन परिस्थिति में धैर्य और समझदारी सबसे बड़ा हथियार
है। यदि बीरबल चाहते तो सीधे कह सकते थे कि तोता मर गया है, लेकिन उन्होंने ऐसी भाषा का
प्रयोग किया जिससे सत्य भी छिपा नहीं और किसी को अनावश्यक दंड भी नहीं मिला। यही
उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।
इस घटना के बाद अकबर ने महल के सभी कर्मचारियों से कहा कि वे बिना किसी भय के
हमेशा सच बोलें। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शासक को अपने शब्दों का बहुत
सोच-समझकर प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि उसके आदेश का प्रभाव अनेक लोगों के जीवन पर पड़ता
है। सेवक ने राहत की साँस ली और मन ही मन बीरबल का धन्यवाद किया। वह समझ गया कि
बुद्धिमानी केवल कठिन प्रश्नों का उत्तर देने में नहीं, बल्कि दूसरों को संकट से
निकालने में भी होती है।
समय बीतता गया, लेकिन “अकबर का तोता” की यह घटना पूरे राज्य में प्रसिद्ध
हो गई। लोग बच्चों को यह कहानी सुनाकर सिखाने लगे कि सत्य बोलना आवश्यक है,
परंतु सत्य को
बुद्धिमानी और विनम्रता के साथ प्रस्तुत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह कथा इस
बात का भी संदेश देती है कि क्रोध में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं,
जबकि धैर्य,
विवेक और न्याय
से लिया गया निर्णय सभी के लिए हितकारी होता है।
बीरबल की चतुराई ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि वास्तविक बुद्धिमत्ता केवल
ज्ञान में नहीं, बल्कि परिस्थिति को समझकर सही समय पर सही शब्दों का चयन
करने में होती है। यही कारण था कि सम्राट अकबर उन्हें इतना सम्मान देते थे और उनके
बिना कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना पसंद नहीं करते थे। आज भी यह कहानी हमें सिखाती
है कि विवेक, सत्य, करुणा और न्याय का मार्ग ही सबसे श्रेष्ठ मार्ग है। जो व्यक्ति कठिन समय में
धैर्य बनाए रखता है और अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करता है,
वही सच्चे
अर्थों में महान कहलाता है।
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