बहुत समय पहले की बात है। भारत पर मुगल सम्राट अकबर का शासन था। अकबर अपनी
वीरता, दूरदर्शिता और न्यायप्रियता के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध थे। उनके राज्य में
दूर-दूर से लोग बसने आते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि इस राज्य में हर व्यक्ति को
न्याय मिलेगा। अकबर का मानना था कि किसी भी राजा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सेना या
उसका खजाना नहीं होती, बल्कि उसकी प्रजा का विश्वास होता है। यदि प्रजा को यह
भरोसा हो कि राजा निष्पक्ष है और हर व्यक्ति की बात सुनेगा, तो राज्य अपने आप मजबूत बन
जाता है। इसी विचार के कारण अकबर प्रतिदिन दरबार लगाते थे, जहाँ अमीर-गरीब, व्यापारी,
किसान, सैनिक और
साधारण नागरिक अपनी समस्याएँ लेकर आते थे। उनके दरबार में बीरबल जैसे बुद्धिमान
मंत्री भी थे, जो अपनी सूझबूझ और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे।
एक दिन अकबर अपने महल की ऊँची छत पर खड़े होकर राजधानी का दृश्य देख रहे थे।
उन्होंने देखा कि महल के बाहर बड़ी संख्या में लोग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर आते
हैं। कई बार उन्हें कई दिनों तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। यह देखकर अकबर
को चिंता हुई। उन्होंने सोचा कि यदि किसी गरीब, बूढ़े या असहाय व्यक्ति को
तुरंत न्याय चाहिए तो वह इतनी लंबी प्रतीक्षा कैसे करेगा? उसी समय उन्होंने बीरबल को
बुलाया और अपनी चिंता बताई। बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह, यदि न्याय सबके
लिए समान है, तो उसे पाने का मार्ग भी सबके लिए सरल होना चाहिए।"
अकबर को यह बात बहुत पसंद आई। उन्होंने आदेश दिया कि महल के मुख्य द्वार पर एक
बहुत बड़ी घंटी लगाई जाए। उस घंटी से एक लंबी और मजबूत रस्सी बाँधी गई, जो नीचे सड़क
तक आती थी, ताकि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह बूढ़ा हो, बच्चा हो या कमजोर, आसानी से रस्सी खींचकर घंटी
बजा सके। पूरे राज्य में घोषणा कर दी गई कि जिस किसी को भी लगे कि उसके साथ अन्याय
हुआ है और उसे कहीं से न्याय नहीं मिला, वह सीधे महल के बाहर लगी न्याय की घंटी बजाए।
घंटी की आवाज सुनते ही राजा स्वयं उसकी बात सुनेंगे।
कुछ ही दिनों में न्याय की घंटी पूरे राज्य में प्रसिद्ध हो गई। लोग कहते थे
कि ऐसा न्यायप्रिय राजा संसार में कहीं नहीं है। कई बार छोटे-छोटे विवाद भी घंटी
बजाकर राजा तक पहुँचते, लेकिन अकबर कभी नाराज नहीं होते थे। वे हर व्यक्ति की बात
धैर्य से सुनते और फिर बीरबल तथा अन्य मंत्रियों से सलाह लेकर उचित निर्णय देते।
इससे लोगों का विश्वास और भी बढ़ गया।
एक दिन सुबह-सुबह महल के बाहर लगी घंटी बहुत जोर से बजने लगी। पहरेदार तुरंत
दौड़कर पहुँचे और अकबर को सूचना दी। अकबर बिना देर किए दरबार में आए और बोले,
"जिसने घंटी बजाई है, उसे तुरंत मेरे सामने लाया जाए।" सैनिक बाहर गए,
लेकिन कुछ ही
देर बाद वे आश्चर्यचकित होकर लौटे। उन्होंने कहा, "जहाँपनाह, बाहर कोई
मनुष्य नहीं है।"
अकबर ने स्वयं बाहर जाकर देखा। वहाँ एक बूढ़ा और कमजोर घोड़ा खड़ा था। वह घंटी
की रस्सी से उगी सूखी घास खाने की कोशिश कर रहा था। रस्सी खिंचने से घंटी बज गई
थी। दरबारियों में कुछ लोग हँसने लगे, लेकिन अकबर गंभीर हो गए। उन्होंने कहा,
"यह कोई साधारण बात नहीं है। यह घोड़ा यहाँ यूँ ही नहीं आया होगा।"
बीरबल आगे बढ़े और बोले, "जहाँपनाह, मुझे लगता है कि इस घोड़े की भी कोई कहानी है। यदि अनुमति
हो तो मैं इसकी जाँच करूँ।" अकबर ने तुरंत अनुमति दे दी।
बीरबल ने सैनिकों को आदेश दिया कि वे आसपास के लोगों से पूछताछ करें कि यह
घोड़ा किसका है। थोड़ी ही देर में पता चला कि वह घोड़ा एक व्यापारी का है।
व्यापारी को दरबार में बुलाया गया। वह डरते-डरते आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
अकबर ने पूछा, "क्या यह घोड़ा तुम्हारा है?"
व्यापारी ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "जी हुजूर, यह मेरा ही
घोड़ा है।"
अकबर ने पूछा, "यह इस हालत में क्यों है? यह इतना दुबला और कमजोर
क्यों हो गया?"
व्यापारी ने कहा, "महाराज, यह बहुत बूढ़ा हो गया है। पहले यह मेरे व्यापार में बहुत
काम आता था। अब यह किसी काम का नहीं रहा। इसलिए मैंने इसे खुला छोड़ दिया
है।"
बीरबल ने व्यापारी की ओर ध्यान से देखा और बोले, "जब यह जवान था तब इसने
तुम्हारा कितना साथ दिया होगा?"
व्यापारी ने कहा, "बहुत साथ दिया। वर्षों तक यह मेरा सामान ढोता रहा। इसकी वजह
से मैंने खूब धन कमाया।"
बीरबल ने फिर पूछा, "जब इसने तुम्हारे लिए जीवनभर मेहनत की, तब क्या
बुढ़ापे में इसकी देखभाल करना तुम्हारा कर्तव्य नहीं था?"
व्यापारी चुप हो गया। उसके पास कोई उत्तर नहीं था।
बीरबल ने अकबर से कहा, "जहाँपनाह, यह घोड़ा बोल नहीं सकता, लेकिन इसकी दशा ही इसकी
फरियाद है। जब तक इसमें ताकत थी, इसका मालिक इससे लाभ उठाता रहा। अब जब यह बूढ़ा हो गया,
तो इसे भूखा
छोड़ दिया। यदि यह आज यहाँ न आता, तो शायद भूख से मर जाता।"
अकबर की आँखों में गंभीरता आ गई। उन्होंने व्यापारी से कहा, "जिस प्राणी ने
तुम्हारी सेवा की, उसे इस प्रकार छोड़ देना केवल कृतघ्नता ही नहीं, अन्याय भी
है।"
व्यापारी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सिर झुकाकर क्षमा माँगी।
अकबर ने आदेश दिया कि व्यापारी अपने घोड़े की उचित देखभाल करेगा, उसके भोजन और
उपचार की व्यवस्था करेगा। यदि भविष्य में उसने लापरवाही की, तो उस पर भारी दंड लगाया
जाएगा। साथ ही उन्होंने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि कोई भी व्यक्ति अपने बूढ़े
पशुओं को इस प्रकार बेसहारा नहीं छोड़ेगा। जो भी पशु वर्षों तक अपने मालिक की सेवा
करते हैं, उनका पालन-पोषण करना मालिक का कर्तव्य है।
व्यापारी ने अपनी भूल स्वीकार की। वह घोड़े को अपने साथ ले गया। उसने उसके लिए
साफ-सुथरा अस्तबल बनवाया, अच्छे चारे की व्यवस्था की और वैद्य से उसका उपचार कराया।
कुछ महीनों बाद वही घोड़ा पहले से अधिक स्वस्थ दिखाई देने लगा। अब व्यापारी उसे
काम नहीं करवाता था, बल्कि सम्मान के साथ उसकी देखभाल करता था।
इस घटना के बाद पूरे राज्य में न्याय की घंटी की चर्चा और भी बढ़ गई। लोग कहते
थे कि अकबर का न्याय केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि उन बेजुबान पशुओं के
लिए भी है, जो अपना दुख शब्दों में नहीं कह सकते। बीरबल की बुद्धिमानी की भी सबने प्रशंसा
की, क्योंकि उन्होंने एक साधारण घटना के पीछे छिपे अन्याय को पहचान लिया था।
समय बीतता गया, लेकिन न्याय की घंटी लोगों के लिए आशा का प्रतीक बनी रही।
जब भी कोई अन्याय का शिकार होता, उसे विश्वास होता कि राजा उसकी बात अवश्य सुनेंगे। इससे
राज्य में कानून का सम्मान बढ़ा, लोग अपने कर्तव्यों के प्रति अधिक जागरूक हुए और पशुओं के
प्रति दया तथा संवेदना का भाव भी मजबूत हुआ।
अकबर ने एक दिन दरबार में कहा, "न्याय केवल अपराधी को दंड देने का नाम नहीं है।
न्याय का अर्थ है हर उस व्यक्ति और प्राणी की रक्षा करना जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं
कर सकता।"
बीरबल ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "जहाँपनाह, जहाँ न्याय के
साथ करुणा भी हो, वहीं सच्चे अर्थों में आदर्श राज्य बनता है।"
दरबार में उपस्थित सभी लोगों ने इस बात का समर्थन किया। उस दिन से न्याय की
घंटी केवल एक घंटी नहीं रही, बल्कि यह राजा और प्रजा के बीच विश्वास, समानता और
करुणा का प्रतीक बन गई। लोग अपने बच्चों को यह कहानी सुनाकर बताते थे कि जिसने
जीवनभर हमारी सेवा की हो, उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। चाहे वह मनुष्य हो या पशु,
हर किसी के साथ
दया, सम्मान और न्याय का व्यवहार करना हमारा कर्तव्य है।
तो दोस्तों
सच्चा न्याय
वही है जिसमें मनुष्यों के साथ-साथ बेजुबान प्राणियों के अधिकारों और सम्मान का भी
ध्यान रखा जाए। जो हमारे लिए जीवनभर मेहनत करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता,
दया और
जिम्मेदारी निभाना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
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