मुगल सम्राट अकबर का शासनकाल केवल अपने विशाल साम्राज्य और न्यायप्रिय शासन के
लिए ही नहीं, बल्कि अपने अद्भुत दरबार के लिए भी प्रसिद्ध था। उनके दरबार में अनेक विद्वान,
कवि, कलाकार और
बुद्धिमान मंत्री उपस्थित रहते थे। उन सभी में सबसे अधिक सम्मानित और प्रिय थे
राजा बीरबल। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, हाजिरजवाबी और कठिन से कठिन समस्या का सरल
समाधान निकालने की क्षमता के कारण पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। सम्राट अकबर जब भी
किसी उलझन में पड़ते, तो सबसे पहले बीरबल की ओर देखते। बीरबल का उत्तर हमेशा ऐसा
होता था जो केवल समस्या का समाधान ही नहीं करता था, बल्कि जीवन की कोई गहरी सीख
भी दे जाता था। यही कारण था कि दरबार के अनेक लोग उनका सम्मान करते थे, जबकि कुछ
ईर्ष्यालु दरबारी उनकी प्रतिष्ठा से जलते थे और अवसर मिलने पर उन्हें कठिन
परिस्थिति में डालने की कोशिश करते रहते थे।
एक दिन सम्राट अकबर अपने राजमहल के सुंदर बगीचे में टहल रहे थे। चारों ओर
हरियाली फैली हुई थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और हल्की ठंडी हवा
वातावरण को आनंदमय बना रही थी। उसी समय उन्होंने देखा कि महल के पास लगे आम और
जामुन के पेड़ों पर बंदरों का एक बड़ा झुंड उछल-कूद कर रहा है। कुछ बंदर डाल से
डाल पर छलांग लगा रहे थे, कुछ एक-दूसरे के हाथ से फल छीन रहे थे और कुछ छोटे बंदरों
को खेलना सिखा रहे थे। उनका व्यवहार देखकर अकबर मुस्कुरा उठे।
अकबर ने अपने साथ चल रहे बीरबल से पूछा, “बीरबल, इन बंदरों को
देखकर तुम्हारे मन में क्या विचार आता है?”
बीरबल ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “जहाँपनाह, मुझे लगता है कि प्रकृति के
हर जीव का अपना स्वभाव होता है। बंदर चंचल होते हैं। वे जल्दी किसी बात पर विश्वास
नहीं करते, लेकिन यदि उन्हें किसी चीज़ का लालच दिखाई दे जाए, तो वे सोचने-समझने की बजाय
तुरंत उसी की ओर दौड़ पड़ते हैं।”
अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “क्या तुम यह सिद्ध कर सकते हो?”
बीरबल ने आदरपूर्वक उत्तर दिया, “अवश्य महाराज, यदि आप अनुमति दें तो मैं
उचित समय आने पर इसे सिद्ध कर दूँगा।”
अकबर ने बात को वहीं समाप्त कर दिया, लेकिन उनके मन में उत्सुकता बनी रही।
कुछ दिनों बाद दरबार में एक विचित्र घटना घटी। राजमहल के रसोईघर से बार-बार फल
और मिठाइयाँ गायब होने लगीं। रसोइए परेशान थे। पहले उन्हें लगा कि कोई सेवक चोरी
कर रहा है, लेकिन पहरेदारों ने बताया कि कई बार बंदरों का झुंड खिड़की से अंदर घुस जाता
है और फल लेकर भाग जाता है।
यह सुनकर अकबर ने आदेश दिया कि बंदरों को बिना नुकसान पहुँचाए किसी तरह पकड़ा
जाए ताकि यह परेशानी समाप्त हो सके। सैनिकों ने कई प्रयास किए। उन्होंने जाल बिछाए,
रस्सियाँ लगाईं
और पहरा भी बढ़ा दिया, लेकिन बंदर इतने फुर्तीले थे कि हर बार बच निकलते। वे
सैनिकों को चकमा देकर पेड़ों पर चढ़ जाते और दूर बैठकर मानो उनका मज़ाक उड़ाते।
जब सभी उपाय असफल हो गए, तब अकबर ने बीरबल को बुलाया और कहा, “बीरबल, अब यह कार्य
तुम्हें करना होगा। तुम कहते थे कि बंदर लालच में जल्दी फँस जाते हैं। अब अपनी बात
सिद्ध करो।”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, मुझे एक दिन का समय दीजिए।”
अगले दिन बीरबल ने महल के कर्मचारियों को कुछ विशेष प्रकार के घड़े मँगाने का
आदेश दिया। वे घड़े मिट्टी के बने हुए थे और उनके मुँह इतने संकरे थे कि उनमें हाथ
तो आसानी से जा सकता था, लेकिन यदि हाथ में कोई बड़ी वस्तु पकड़ ली जाए तो वह बाहर
नहीं निकल सकता था।
बीरबल ने उन घड़ों में भुने हुए चने, मूँगफली और मीठे फल के छोटे-छोटे टुकड़े भरवा
दिए। फिर उन घड़ों को उन पेड़ों के नीचे रखवा दिया जहाँ बंदर अक्सर आते थे।
कुछ ही देर बाद बंदरों का झुंड वहाँ पहुँचा। पहले वे दूर बैठकर घड़ों को देखने
लगे। उन्हें कोई खतरा दिखाई नहीं दिया। धीरे-धीरे एक साहसी बंदर नीचे उतरा। उसने
घड़े के अंदर हाथ डाला और मुट्ठी भर चने पकड़ लिए। जब उसने हाथ बाहर निकालना चाहा,
तो उसकी मुट्ठी
घड़े के संकरे मुँह में फँस गई।
बंदर ने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन हाथ बाहर नहीं निकला। यदि वह चने छोड़ देता तो हाथ
आसानी से बाहर निकल सकता था, लेकिन लालच के कारण उसने चने छोड़ने से इनकार कर दिया। वह
घड़े को खींचता रहा, इधर-उधर भागता रहा, पर मुट्ठी नहीं खोली।
बाकी बंदरों ने भी यही किया। वे भी अलग-अलग घड़ों में हाथ डालकर मुट्ठी भर चने
पकड़ लेते और फिर हाथ बाहर निकालने की कोशिश करते। कोई भी बंदर अपनी मुट्ठी खोलने
को तैयार नहीं था।
इसी बीच सैनिक धीरे-धीरे वहाँ पहुँचे और बिना किसी कठिनाई के उन बंदरों को
पकड़ लिया। बंदरों ने बहुत उछल-कूद की, लेकिन जब तक उन्होंने मुट्ठी नहीं खोली, वे स्वयं को
मुक्त नहीं कर सके।
सैनिक उन्हें दरबार के सामने ले आए। अकबर यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने कहा, “बीरबल, यह तो बहुत सरल उपाय था। यदि बंदर चने छोड़ देते तो वे
आसानी से बच सकते थे।”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “जहाँपनाह, यही तो लालच का स्वभाव है। मनुष्य हो या बंदर, जब वह लालच में
आ जाता है, तो उसके सामने सरल समाधान भी दिखाई नहीं देता। बंदर केवल अपनी मुट्ठी खोल देते
तो स्वतंत्र हो जाते, लेकिन थोड़े-से चनों के लालच ने उन्हें कैद करा दिया।”
अकबर कुछ देर तक विचारमग्न रहे। फिर उन्होंने कहा, “तुम्हारी बात केवल बंदरों
पर ही नहीं, मनुष्यों पर भी लागू होती है।”
बीरबल ने उत्तर दिया, “बिल्कुल महाराज। संसार में अनेक लोग धन, पद, शक्ति या
छोटी-छोटी इच्छाओं के लालच में ऐसे निर्णय ले लेते हैं जिनसे उन्हें अंततः नुकसान
उठाना पड़ता है। यदि वे समय रहते अपने लालच पर नियंत्रण कर लें, तो अनेक
समस्याओं से बच सकते हैं।”
दरबार में बैठे सभी मंत्री और दरबारी बीरबल की बात ध्यान से सुन रहे थे। कुछ
दरबारियों ने सिर झुका लिया क्योंकि उन्हें अपने व्यवहार की याद आ गई। कई लोग
अक्सर अधिक धन या सम्मान पाने की लालसा में गलत रास्ता चुन लेते थे।
अकबर ने कहा, “बीरबल, आज तुमने केवल बंदरों को पकड़ने का उपाय नहीं बताया,
बल्कि जीवन का
एक बड़ा सत्य भी समझाया है। वास्तव में लालच मनुष्य की बुद्धि को ढक देता है।”
बीरबल ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, संतोष सबसे बड़ा धन है। जिसके मन में संतोष होता है,
वह सही निर्णय
लेता है। लेकिन जो लालच के पीछे भागता है, वह अपनी स्वतंत्रता और विवेक दोनों खो देता है।”
अकबर ने प्रसन्न होकर बीरबल को बहुमूल्य उपहार प्रदान किया और उनकी
बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। उन्होंने दरबारियों से कहा, “आज से इस घटना को हमेशा याद
रखना। छोटी-सी वस्तु के लालच में बड़ी हानि नहीं उठानी चाहिए।”
उस दिन के बाद महल में बंदरों की समस्या भी समाप्त हो गई और यह कहानी पूरे
राज्य में फैल गई। लोग अपने बच्चों को यह कथा सुनाकर समझाने लगे कि लालच मनुष्य का
सबसे बड़ा शत्रु है। यदि हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीख लें, तो जीवन में
अनेक कठिनाइयों से बच सकते हैं और सही निर्णय ले सकते हैं।
समय बीतता गया, लेकिन बीरबल की यह सीख लोगों के मन में हमेशा जीवित रही। जब
भी कोई व्यक्ति लालच के कारण गलत रास्ता चुनने लगता, लोग उसे “बंदर और घड़े” की
यह घटना याद दिलाते। धीरे-धीरे यह कहानी केवल एक मनोरंजक कथा नहीं रही, बल्कि जीवन का
एक महत्वपूर्ण संदेश बन गई कि बुद्धिमानी केवल ज्ञान में नहीं, बल्कि अपनी
इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में भी होती है।
तो दोस्तों
लालच मनुष्य की
बुद्धि को कमजोर कर देता है। संतोष, धैर्य और आत्मसंयम ही सही निर्णय लेने की सबसे
बड़ी शक्ति हैं।
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