मुगल सम्राट अकबर का शासनकाल न्याय, बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध था। उनके दरबार में अनेक विद्वान, कवि, संगीतज्ञ और सलाहकार उपस्थित रहते थे, किंतु उनमें सबसे अधिक प्रसिद्धि बीरबल को प्राप्त थी। बीरबल अपनी तीव्र बुद्धि, चतुराई और न्यायप्रिय स्वभाव के कारण पूरे राज्य में जाने जाते थे। लोग दूर-दूर से अपनी समस्याएँ लेकर उनके पास आते और विश्वास रखते कि उन्हें अवश्य न्याय मिलेगा। किंतु बीरबल स्वयं भी मानते थे कि बुद्धि केवल राजमहलों या बड़े विद्वानों तक सीमित नहीं होती। कई बार साधारण लोगों में भी ऐसी अद्भुत समझ और विवेक होता है, जो बड़े-बड़े ज्ञानी व्यक्तियों को भी आश्चर्यचकित कर देता है। ऐसी ही एक घटना ने अकबर के दरबार में सबको यह सिखाया कि सच्ची बुद्धिमत्ता पद, धन या प्रतिष्ठा की मोहताज नहीं होती।
एक समय की बात है। आगरा के निकट एक छोटा-सा गाँव था। वहाँ के लोग मेहनती और
ईमानदार थे। गाँव में खेती-बाड़ी ही जीविका का मुख्य साधन थी। उसी गाँव में एक
महिला रहती थी जिसका नाम गौरी था। गौरी साधारण परिवार से थी। उसका पति किसान था और
दोनों मिलकर अपने छोटे-से खेत में मेहनत करते थे। उनके पास अधिक धन नहीं था,
लेकिन वे
संतोषपूर्वक जीवन बिताते थे। गाँव के लोग गौरी का बहुत सम्मान करते थे क्योंकि वह
अत्यंत बुद्धिमान, शांत स्वभाव की और न्यायप्रिय थी। यदि गाँव में किसी दो
लोगों के बीच विवाद होता, तो वे पंचायत के साथ-साथ गौरी की राय भी अवश्य लेते। उसकी
सलाह इतनी संतुलित होती कि दोनों पक्ष संतुष्ट हो जाते।
गौरी ने कभी किसी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन जीवन के
अनुभवों ने उसे बहुत कुछ सिखाया था। वह हर समस्या को धैर्य से सुनती, बिना जल्दबाज़ी
किए सोचती और फिर ऐसा समाधान देती जिससे किसी के साथ अन्याय न हो। यही कारण था कि
उसकी ख्याति धीरे-धीरे आसपास के गाँवों तक फैलने लगी।
एक दिन गाँव के दो व्यापारी आपस में झगड़ते हुए गौरी के घर पहुँचे। दोनों का
दावा था कि सोने के सिक्कों से भरी एक थैली उसी की है। पहले व्यापारी ने कहा,
"यह थैली मेरी है। मैं इसे बाज़ार से लौटते समय खो बैठा था।" दूसरा
व्यापारी बोला, "नहीं, यह मेरी है। मैंने इसे मंदिर के पास रखा था और फिर भूल
गया।" दोनों के पास अपनी-अपनी बातें थीं, लेकिन कोई प्रमाण नहीं था।
गौरी ने दोनों की बातें ध्यान से सुनीं। उसने थैली को खोला और उसमें रखे
सिक्कों को ध्यानपूर्वक देखा। फिर उसने दोनों व्यापारियों से अलग-अलग पूछा कि थैली
में कितने सिक्के हैं। पहला व्यापारी बोला, "लगभग सौ सिक्के
होंगे।" दूसरा बोला, "करीब नब्बे होंगे।" गौरी मुस्कुराई। उसने कहा,
"तुम दोनों को ठीक-ठीक संख्या नहीं पता। इसका अर्थ है कि तुम दोनों में से कोई
भी वास्तविक मालिक नहीं हो सकता।"
इसके बाद उसने गाँव के मुखिया को बुलाया और घोषणा की कि जो व्यक्ति अगले सात
दिनों के भीतर सिक्कों की सही संख्या, थैली की विशेष पहचान और यह बताएगा कि सिक्कों
में कौन-सा विशेष निशान है, वही इसका असली मालिक माना जाएगा। सात दिन बाद एक वृद्ध
व्यापारी गाँव पहुँचा। उसने बताया कि उसकी थैली खो गई थी। उसने सिक्कों की सही
संख्या बताई, थैली पर लगी छोटी-सी सिलाई का वर्णन किया और यह भी बताया कि कुछ सिक्कों पर
विशेष चिह्न बने हुए हैं। जब सबने जाँच की तो उसकी सारी बातें सत्य निकलीं। गाँव
के लोग गौरी की बुद्धिमत्ता देखकर दंग रह गए।
इस घटना की चर्चा धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई। कुछ दिनों बाद यह समाचार
सम्राट अकबर के दरबार तक पहुँचा। अकबर ने आश्चर्य से बीरबल से कहा, "यदि यह बात
सत्य है, तो वह महिला वास्तव में असाधारण बुद्धिमान होगी।" बीरबल ने उत्तर दिया,
"जहाँपनाह, बुद्धिमत्ता किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं होती। यदि अनुमति
हो तो मैं उस महिला से मिलकर आना चाहूँगा।"
अकबर ने स्वयं उस महिला की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे साधारण व्यापारी
का वेश धारण करके बीरबल के साथ गाँव पहुँचे। गाँव वालों को यह पता नहीं था कि उनके
बीच स्वयं सम्राट उपस्थित हैं। अकबर और बीरबल गौरी के घर पहुँचे और उससे सहायता
माँगी।
अकबर ने कहा, "हम दोनों साझेदार हैं। हमारे पास एक हीरा है जिसकी कीमत
बहुत अधिक है। अब हम अलग होना चाहते हैं, लेकिन यह तय नहीं कर पा रहे कि हीरा किसे
मिले।"
गौरी ने शांत स्वर में पूछा, "क्या आपने साझेदारी करते समय कोई लिखित समझौता
किया था?"
दोनों ने कहा, "नहीं।"
गौरी ने फिर पूछा, "क्या इस हीरे को खरीदने के लिए दोनों ने समान धन लगाया था?"
अकबर ने कहा, "हाँ।"
कुछ देर सोचने के बाद गौरी बोली, "यदि हीरा एक है और उसे
बाँटा नहीं जा सकता, तो उसे बेच दीजिए और जो धन प्राप्त हो उसे बराबर बाँट
लीजिए। यदि आप दोनों में से कोई एक हीरा अपने पास रखना चाहता है, तो वह दूसरे को
उसके हिस्से का उचित मूल्य दे। यही सबसे न्यायसंगत उपाय है।"
अकबर ने मुस्कुराकर कहा, "यदि दोनों ही हीरा अपने पास रखना चाहें तो?"
गौरी ने उत्तर दिया, "जो व्यक्ति दूसरे को उचित मूल्य देने के लिए तैयार न हो,
वह हीरे का
वास्तविक अधिकारी बनने योग्य नहीं है। लालच न्याय को नष्ट कर देता है।"
बीरबल गौरी का उत्तर सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। अकबर भी उसकी सूझबूझ से प्रभावित
हुए, लेकिन वे उसकी एक और परीक्षा लेना चाहते थे।
अगले दिन अकबर ने गाँव में घोषणा करवाई कि जो व्यक्ति सबसे कठिन प्रश्न का
उत्तर देगा, उसे सौ स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार में दी जाएँगी। पूरा गाँव इकट्ठा हुआ। अकबर
ने प्रश्न पूछा, "ऐसी कौन-सी वस्तु है जो जितनी अधिक बाँटी जाए, उतनी ही बढ़ती
जाती है?"
कई लोगों ने अलग-अलग उत्तर दिए। किसी ने कहा धन, किसी ने कहा अन्न, किसी ने कहा
प्रेम। लेकिन अकबर संतुष्ट नहीं हुए।
तभी गौरी आगे बढ़ी और बोली, "इस प्रश्न का उत्तर है—ज्ञान और बुद्धि। जितना
अधिक ज्ञान बाँटा जाता है, वह उतना ही बढ़ता है। एक दीपक से हजारों दीपक जल सकते हैं,
लेकिन पहले
दीपक का प्रकाश कम नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञान बाँटने से वह घटता नहीं, बल्कि समाज को
समृद्ध बनाता है।"
अकबर ने प्रसन्न होकर उसकी प्रशंसा की। उन्होंने दूसरा प्रश्न पूछा,
"मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कौन है?"
गौरी ने बिना देर किए उत्तर दिया, "उसका अपना अहंकार। बाहरी
शत्रु से मनुष्य कभी-कभी बच सकता है, लेकिन अहंकार उसे स्वयं गलत निर्णय लेने पर
मजबूर कर देता है।"
सभी लोग उसकी बात सुनकर प्रभावित हुए। बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह,
इस उत्तर में
गहरी जीवन-शिक्षा छिपी है।"
अब अकबर ने अपनी वास्तविक पहचान प्रकट कर दी। पूरा गाँव आश्चर्यचकित रह गया।
सभी लोगों ने सम्राट को प्रणाम किया। गौरी भी विनम्रता से झुक गई। अकबर ने कहा,
"तुम्हारी बुद्धिमत्ता ने हमें अत्यंत प्रभावित किया है। तुमने बिना किसी
स्वार्थ के न्याय किया और हर प्रश्न का उत्तर विवेक से दिया।"
गौरी ने उत्तर दिया, "महाराज, न्याय करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। यदि हम केवल
अपने लाभ के बारे में सोचें, तो समाज में विश्वास समाप्त हो जाएगा।"
अकबर ने कहा, "तुम्हारे जैसे लोग ही राज्य की वास्तविक शक्ति हैं।"
सम्राट ने गौरी को स्वर्ण मुद्राएँ, सुंदर वस्त्र और सम्मान-पत्र प्रदान किया। साथ
ही गाँव में एक विद्यालय बनवाने की घोषणा की ताकि गाँव के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर
सकें। गौरी ने पुरस्कार का अधिकांश भाग विद्यालय और गरीब लोगों की सहायता के लिए
दान कर दिया। यह देखकर अकबर और भी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "जिसके पास
बुद्धि के साथ दया भी हो, वही सच्चा महान व्यक्ति कहलाता है।"
दरबार लौटने के बाद अकबर ने मंत्रियों से कहा, "आज मैंने सीखा है कि ज्ञान
केवल पुस्तकों में नहीं मिलता। जीवन के अनुभव, ईमानदारी और निष्पक्ष सोच
भी मनुष्य को महान बनाते हैं।"
बीरबल मुस्कुराए और बोले, "जहाँपनाह, यही कारण है कि हमें हर
व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। कभी-कभी सबसे मूल्यवान शिक्षा किसी साधारण व्यक्ति
से भी मिल सकती है।"
उस दिन के बाद गौरी की प्रसिद्धि पूरे राज्य में फैल गई। लोग उसे केवल
बुद्धिमान महिला ही नहीं, बल्कि न्याय और करुणा की प्रतिमूर्ति मानने लगे। दूर-दूर से
लोग उसके पास सलाह लेने आने लगे। वह सभी को यही सिखाती कि किसी भी समस्या का
समाधान क्रोध से नहीं, बल्कि धैर्य, सत्य और विवेक से किया जाना चाहिए। उसने कभी
अपने सम्मान का घमंड नहीं किया। वह पहले की तरह सादगी से जीवन जीती रही और गाँव के
लोगों की सहायता करती रही।
कुछ वर्षों बाद गाँव का विद्यालय राज्य के सबसे अच्छे विद्यालयों में गिना
जाने लगा। वहाँ केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि ईमानदारी, सहयोग, न्याय और
मानवता की शिक्षा भी दी जाती थी। गौरी समय-समय पर बच्चों को प्रेरक कहानियाँ
सुनाती और समझाती कि बुद्धिमान वही है जो अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों की भलाई के
लिए करे।
अकबर जब भी उस क्षेत्र से गुजरते, गाँव का हाल अवश्य पूछते। वे जानते थे कि जहाँ
ऐसे बुद्धिमान और ईमानदार लोग रहते हैं, वहाँ न्याय और शांति बनी रहती है। बीरबल भी
अक्सर गौरी का उदाहरण देकर दरबारियों को समझाते कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसके
वस्त्र, धन या पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और विवेक से आँका जाना चाहिए।
समय बीतता गया, लेकिन गौरी की कहानी लोगों के बीच प्रेरणा बनकर जीवित रही।
माता-पिता अपने बच्चों को उसकी कथा सुनाते और कहते कि सच्ची बुद्धिमत्ता केवल चतुर
उत्तर देने में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण निर्णय लेने, दूसरों की सहायता करने और
विनम्र बने रहने में है। यही शिक्षा इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है।
तो दोस्तों
सच्ची बुद्धिमत्ता धन, पद या शिक्षा के प्रमाणपत्रों से नहीं मापी जाती। धैर्य,
न्याय, विवेक, विनम्रता और
दूसरों के हित का विचार ही मनुष्य को वास्तव में महान बनाते हैं।
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