बहुत समय पहले की बात है। मुगल सम्राट अकबर का राज्य समृद्धि, न्याय और वैभव
के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। उनके दरबार में बड़े-बड़े विद्वान, सेनापति,
व्यापारी और
न्यायप्रिय लोग आया करते थे। लेकिन इन सभी में बीरबल का स्थान सबसे अलग था। बीरबल
अपनी बुद्धिमानी, हाजिरजवाबी और न्याय करने की अद्भुत क्षमता के कारण बादशाह
अकबर के सबसे प्रिय दरबारियों में से एक थे। जब भी दरबार में कोई ऐसा मामला आता
जिसे सामान्य बुद्धि से सुलझाना कठिन होता, अकबर अक्सर बीरबल की ओर
देखते और मुस्कुराकर कहते, “बीरबल, अब तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा है।” बीरबल भी शांत भाव से
सिर झुकाकर कहते, “जहाँपनाह, यदि मामला न्याय का हो तो रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन सत्य तक
पहुँचना असंभव नहीं।”
एक दिन सुबह का समय था। बादशाह अकबर अपने भव्य दरबार में बैठे थे। दरबार में
सभी प्रमुख दरबारी अपने-अपने स्थान पर उपस्थित थे। सैनिक दरबार के द्वार पर पहरा
दे रहे थे और फरियादी एक-एक करके अपनी समस्याएँ लेकर बादशाह के सामने आ रहे थे।
किसी को जमीन का विवाद था, किसी को व्यापार में धोखा मिला था और कोई अपने पड़ोसी की
शिकायत लेकर आया था। अकबर हर व्यक्ति की बात ध्यान से सुनते और फिर उचित निर्णय
देते। उसी समय दरबार के बाहर दो पुरुषों के बीच तेज आवाज़ में बहस होने लगी। उनकी
आवाज़ इतनी ऊँची थी कि दरबार के भीतर बैठे सभी लोगों का ध्यान उस ओर चला गया।
अकबर ने सैनिकों की ओर देखकर कहा, “देखो, बाहर कौन इतना शोर कर रहा है? उन्हें अंदर
लाया जाए।”
कुछ ही क्षण बाद सैनिक दो भाइयों को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। दोनों की
उम्र लगभग चालीस वर्ष के आसपास थी। एक का नाम हरिदास था और दूसरे का नाम गोपालदास।
दोनों भाई देखने में एक-दूसरे से मिलते-जुलते थे, लेकिन उनके चेहरे पर गुस्सा
साफ दिखाई दे रहा था। वे दरबार में आते ही फिर से एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे।
हरिदास ने ऊँची आवाज़ में कहा, “जहाँपनाह, मेरे छोटे भाई ने मेरा हक
छीन लिया है। हमारे पिता की मृत्यु के बाद जो जमीन और घर हमें विरासत में मिला था,
वह सब इसने
अपने कब्जे में कर लिया है।”
गोपालदास तुरंत बोला, “यह झूठ बोल रहा है, हुजूर! पिता ने अपनी मृत्यु से पहले स्वयं वह
जमीन मुझे दे दी थी। यह भाई होने के नाते मेरा हिस्सा मांग रहा है, जबकि उस जमीन
पर मेरा अधिकार है।”
अकबर ने हाथ उठाकर दोनों को शांत किया। “दरबार में ऊँची आवाज़ में बोलना उचित
नहीं है। एक-एक करके अपनी बात कहो। पहले बड़े भाई तुम बताओ कि विवाद क्या है।”
हरिदास ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, हमारे पिता रामदास एक मेहनती किसान थे। उनके पास गाँव के
बाहर लगभग बीस बीघा उपजाऊ जमीन थी। इसके अलावा गाँव में एक पुराना मकान और कुछ धन
भी था। हम दोनों भाई उनके साथ रहते थे। पिता हमेशा कहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद
उनकी संपत्ति दोनों भाइयों में बराबर बाँटी जाएगी। लेकिन कुछ वर्ष पहले पिता बीमार
पड़ गए। उनकी बीमारी के समय मैं कई महीनों तक उनके साथ रहा। मैंने उनकी सेवा की,
दवाइयाँ लाईं
और खेत का काम भी संभाला। मेरे छोटे भाई गोपालदास ने भी कुछ सेवा की, लेकिन वह
अधिकतर व्यापार के काम से बाहर रहता था।”
गोपालदास ने बीच में बोलना चाहा, लेकिन अकबर ने उसे रोक दिया। “तुम्हें भी अपनी
बात कहने का अवसर मिलेगा। पहले अपने भाई को पूरा बोलने दो।”
हरिदास ने आगे कहा, “पिता की मृत्यु के बाद मैंने गोपाल से कहा कि हम संपत्ति का
बराबर हिस्सा कर लें। लेकिन उसने कहा कि पिता ने मरने से कुछ दिन पहले उसे अकेले
में बुलाकर सारी जमीन उसके नाम कर दी थी। उसने कोई लिखित कागज नहीं दिखाया। केवल
अपनी बात को सच बताता रहा। जब मैंने अपना हिस्सा माँगा तो उसने मुझे घर से निकालने
तक की धमकी दी।”
अकबर ने गोपालदास की ओर देखा। “अब तुम अपनी बात बताओ।”
गोपालदास ने सिर झुकाकर कहा, “जहाँपनाह, मेरा भाई आधी सच्चाई बता रहा है। हमारे पिता मुझसे बहुत
प्रेम करते थे। मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि
मैंने जीवन भर व्यापार किया है, इसलिए जमीन की देखभाल मेरे लिए कठिन होगी। उन्होंने कहा कि
वह बीस बीघा जमीन मुझे देना चाहते हैं और गाँव का मकान तथा बाकी धन बड़े भाई
हरिदास को देना चाहते हैं। मैं पिता की इच्छा के विरुद्ध कैसे जाता? इसलिए मैंने
जमीन अपने पास रख ली।”
हरिदास तुरंत बोल उठा, “झूठ! पिता ने कभी ऐसा नहीं कहा था।”
“तुम्हें कैसे पता कि उन्होंने नहीं कहा?” गोपालदास ने पलटकर पूछा।
“क्योंकि पिता ने मेरे सामने कहा था कि हम दोनों बराबर हैं!”
“तुम्हारे सामने उन्होंने बहुत कुछ कहा होगा, लेकिन आखिरी समय में
उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया था।”
दरबार में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। अकबर दोनों भाइयों को ध्यान से
देखने लगे। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। मामला साधारण नहीं था। न कोई
लिखित वसीयत थी, न कोई स्पष्ट गवाह। जमीन गाँव में थी और उस पर कई वर्षों से
दोनों भाइयों का अलग-अलग तरह से अधिकार रहा था।
अकबर ने दरबारियों की ओर देखा और पूछा, “क्या किसी को इस मामले का
कोई समाधान सूझता है?”
एक दरबारी ने कहा, “जहाँपनाह, यदि कोई लिखित प्रमाण नहीं है तो जमीन दोनों भाइयों में
बराबर बाँट दी जाए।”
दूसरे दरबारी ने कहा, “लेकिन यदि पिता ने वास्तव में जमीन छोटे भाई को दी थी,
तो ऐसा करना
अन्याय होगा।”
अकबर कुछ देर सोचते रहे। तभी उनकी नजर बीरबल पर पड़ी। बीरबल शांत भाव से सब
सुन रहे थे। अकबर मुस्कुराए और बोले, “बीरबल, तुम्हारा क्या विचार है?”
बीरबल ने दोनों भाइयों को ध्यान से देखा और पूछा, “जहाँपनाह, निर्णय देने से
पहले मुझे कुछ प्रश्न पूछने होंगे।”
अकबर ने अनुमति दे दी।
बीरबल ने पहले हरिदास से पूछा, “तुम्हारे पिता की मृत्यु कब हुई?”
“लगभग छह महीने पहले।”
“उनकी बीमारी कितने समय तक चली?”
“लगभग तीन महीने।”
“उनकी देखभाल कौन करता था?”
“मुख्य रूप से मैं।”
“क्या तुम्हारे पिता उस समय होश में रहते थे?”
“अधिकतर समय हाँ, लेकिन अंतिम कुछ दिनों में उनकी हालत बहुत खराब थी।”
बीरबल ने सिर हिलाया और अब गोपालदास की ओर देखा। “तुम्हारे पिता ने तुम्हें
जमीन देने की बात कब कही थी?”
गोपाल ने उत्तर दिया, “उनकी मृत्यु से लगभग दस दिन पहले।”
“उस समय वहाँ कौन उपस्थित था?”
गोपाल कुछ क्षण चुप रहा। “हम दोनों अकेले थे।”
“कोई गवाह नहीं?”
“नहीं।”
“कोई लिखित कागज?”
“नहीं।”
“कोई ऐसा व्यक्ति जिसे तुम्हारे पिता ने बाद में बताया हो?”
गोपाल ने फिर सोचकर कहा, “नहीं, लेकिन मुझे उनके शब्दों पर विश्वास था।”
बीरबल ने पूछा, “यदि तुम्हें पिता की इच्छा पर इतना विश्वास था, तो तुमने अपने
भाई को यह बात पिता की मृत्यु के तुरंत बाद क्यों नहीं बताई?”
गोपाल कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “मुझे लगा कि भाई स्वयं समझ जाएगा।”
बीरबल ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने हरिदास से पूछा, “तुम्हारे पिता ने कभी
तुम्हारे सामने यह कहा था कि जमीन तुम्हें या तुम्हारे भाई को अलग-अलग दी जाएगी?”
“नहीं। उन्होंने हमेशा कहा कि हम दोनों मिलकर जमीन संभालें।”
बीरबल ने पूछा, “क्या गाँव में कोई ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हारे पिता की
अंतिम इच्छा के बारे में जानता हो?”
हरिदास ने कहा, “गाँव का मुखिया उन्हें अक्सर मिलने आता था। इसके अलावा
हमारे पुराने मुनीम दीनानाथ भी पिता के बहुत विश्वासपात्र थे।”
गोपाल ने तुरंत कहा, “दीनानाथ को कुछ नहीं पता। पिता ने उनसे कोई ऐसी बात नहीं
कही थी।”
बीरबल की आँखों में हल्की चमक आई। उन्होंने पूछा, “तुम्हें इतना विश्वास कैसे
है कि दीनानाथ को कुछ नहीं पता?”
गोपाल ने उत्तर दिया, “क्योंकि उन्होंने कभी मुझसे ऐसी कोई बात नहीं कही।”
बीरबल मुस्कुराए। “यह उत्तर दिलचस्प है।”
अकबर ने पूछा, “क्यों?”
बीरबल बोले, “जहाँपनाह, अभी निर्णय देना जल्दबाजी होगी। मुझे लगता है कि इस विवाद
में जमीन से अधिक महत्वपूर्ण कोई और चीज छिपी हुई है।”
अकबर ने पूछा, “क्या?”
बीरबल ने कहा, “सत्य।”
दरबार में हल्की मुस्कान फैल गई, लेकिन बीरबल गंभीर थे।
उन्होंने कहा, “मैं दोनों भाइयों से अनुरोध करता हूँ कि वे कल सुबह फिर
दरबार में उपस्थित हों। तब तक मैं गाँव के मुखिया और दीनानाथ से भी पूछताछ करना
चाहता हूँ।”
अकबर ने आदेश दिया कि दोनों भाइयों को अगले दिन उपस्थित होने के लिए कहा जाए।
दरबार समाप्त होने के बाद बीरबल ने अपने एक विश्वसनीय सैनिक को बुलाया और कहा,
“तुम तुरंत उस
गाँव जाओ जहाँ रामदास रहते थे। वहाँ किसी को यह मत बताना कि तुम बादशाह के आदेश से
जाँच करने आए हो। पहले गाँव के लोगों से सामान्य बातचीत करना। पता लगाओ कि रामदास
का स्वभाव कैसा था, दोनों भाइयों का व्यवहार कैसा था और उनके पिता की संपत्ति
को लेकर गाँव में क्या चर्चा थी।”
सैनिक ने सिर झुकाकर आदेश स्वीकार किया।
लेकिन बीरबल की जाँच यहीं समाप्त नहीं हुई। उन्होंने एक और व्यक्ति को बुलाया
और कहा, “दीनानाथ के बारे में पता करो। वह इस परिवार के कितने वर्षों से साथ हैं और
उनकी ईमानदारी के बारे में गाँव में क्या राय है।”
उधर दोनों भाई दरबार से बाहर निकलते ही फिर बहस करने लगे।
हरिदास ने कहा, “अब तुम्हारा झूठ पकड़ा जाएगा।”
गोपाल ने गुस्से में कहा, “मेरा झूठ नहीं, तुम्हारी लालच पकड़ी जाएगी।”
हरिदास बोला, “यदि मुझे लालच होती तो मैं तुम्हें घर में रहने ही क्यों
देता?”
गोपाल ने कहा, “तुमने मुझे घर से निकाला क्योंकि तुम्हें पूरी जमीन चाहिए
थी।”
दोनों फिर एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे। लेकिन दरबार के एक कोने में खड़े बीरबल
ने उनकी बातचीत देखी। उन्होंने गौर किया कि दोनों भाइयों का गुस्सा केवल जमीन के
कारण नहीं था। उनके बीच वर्षों से कोई पुराना मनमुटाव था, जो अब संपत्ति के विवाद के
कारण खुलकर सामने आ गया था।
अगली सुबह बीरबल को गाँव से पहला समाचार मिला। सैनिक ने बताया कि गाँव के
अधिकांश लोगों का मानना था कि रामदास अपने दोनों बेटों से प्रेम करते थे। लेकिन
पिछले दो वर्षों में दोनों भाइयों के बीच संबंध बिगड़ने लगे थे। हरिदास खेती
संभालता था और गोपाल व्यापार करता था। दोनों को लगता था कि दूसरा भाई परिवार के
लिए कम योगदान देता है।
इसके बाद दीनानाथ के बारे में भी जानकारी मिली। वह रामदास के पुराने मुनीम थे
और गाँव में उनकी ईमानदारी की बहुत प्रतिष्ठा थी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी
कि रामदास ने मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले दीनानाथ से एक विशेष बात कही थी।
बीरबल ने तुरंत दीनानाथ को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।
दोपहर होते-होते दीनानाथ दरबार में उपस्थित हुए। उनकी उम्र लगभग साठ वर्ष थी।
वे साधारण कपड़े पहने हुए थे और उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उन्होंने बादशाह को प्रणाम किया।
अकबर ने कहा, “दीनानाथ, तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया गया है क्योंकि रामदास की
संपत्ति को लेकर उसके दोनों बेटों में विवाद है। हमें सत्य जानना है। जो कुछ जानते
हो, बिना डर के बताओ।”
दीनानाथ ने दोनों भाइयों की ओर देखा। फिर धीरे से बोले, “जहाँपनाह,
मैं जो जानता
हूँ वह बताऊँगा, लेकिन मुझे डर है कि मेरी बात सुनकर दोनों भाइयों के बीच
दुश्मनी और बढ़ सकती है।”
बीरबल ने कहा, “यदि बात सत्य है तो उसे छिपाना किसी के लिए अच्छा नहीं
होगा।”
दीनानाथ ने गहरी साँस ली और कहा, “रामदास जी ने अपनी मृत्यु से लगभग एक महीने पहले
मुझे बुलाया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें अपनी मृत्यु निकट लग रही है। उन्होंने
मुझसे कहा था कि उनके दोनों बेटे एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं और उन्हें डर है
कि उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति उनके परिवार को तोड़ देगी।”
अकबर ने पूछा, “फिर उन्होंने क्या कहा?”
दीनानाथ बोले, “उन्होंने कहा था कि वह ऐसी व्यवस्था करना चाहते हैं जिससे
दोनों भाइयों को उनका उचित हिस्सा मिले, लेकिन कोई भी भाई दूसरे पर निर्भर न रहे।
उन्होंने मुझसे एक हिसाब तैयार करने को कहा था।”
हरिदास ने आश्चर्य से कहा, “आपने मुझे कभी नहीं बताया!”
दीनानाथ ने कहा, “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे ऐसा करने से मना किया था।”
गोपाल बेचैनी से बोला, “क्या उन्होंने जमीन मेरे नाम करने की बात कही थी?”
दीनानाथ ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
बीरबल ने गौर किया कि दीनानाथ कुछ छिपा रहे थे।
उन्होंने शांत स्वर में कहा, “दीनानाथ, तुम्हारे पास रामदास की इच्छा का कोई प्रमाण है?”
दीनानाथ ने अपनी कमर से बंधी एक छोटी थैली निकाली। उसमें से उन्होंने एक
पुराना कपड़ा निकाला। कपड़े के भीतर एक मुड़ा हुआ कागज था।
दरबार में अचानक सन्नाटा छा गया।
दीनानाथ ने कहा, “यह कागज रामदास जी ने मुझे दिया था। उन्होंने कहा था कि इसे
उनकी मृत्यु के बाद ही खोला जाए।”
अकबर ने कागज बीरबल को देने का आदेश दिया।
बीरबल ने कागज खोला, उसे ध्यान से पढ़ा और कुछ क्षण तक मौन रहे।
अकबर ने पूछा, “क्या लिखा है?”
बीरबल ने कागज बंद किया और कहा, “जहाँपनाह, इसमें संपत्ति बाँटने की
बात तो है, लेकिन यह मामला उतना सरल नहीं है जितना दिखाई देता है।”
अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “ऐसा क्या लिखा है?”
बीरबल ने कहा, “रामदास ने लिखा है कि उनकी जमीन दोनों भाइयों की है,
लेकिन उसे
बेचने या बाँटने का अधिकार किसी एक को नहीं होगा। साथ ही उन्होंने एक ऐसी शर्त रखी
है जिसे पूरा किए बिना जमीन का असली मालिक कोई नहीं बन सकता।”
दोनों भाइयों ने एक साथ पूछा, “क्या शर्त?”
बीरबल ने कागज को मोड़ते हुए कहा, “यह बात कल दरबार में बताई जाएगी।”
दोनों भाई हैरान रह गए। अकबर भी उत्सुक हो उठे। उन्होंने पूछा, “बीरबल, तुम अभी क्यों
नहीं बताते?”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “क्योंकि जहाँपनाह, कभी-कभी न्याय केवल कागज पढ़कर नहीं किया जाता।
लोगों के मन को भी पढ़ना पड़ता है। मुझे पहले यह पता करना है कि इन दोनों भाइयों
में से कौन अपने पिता की इच्छा को सच में समझता है।”
अकबर ने बीरबल की ओर देखा और कहा, “ठीक है। कल इस मामले का अंतिम निर्णय होगा।”
लेकिन बीरबल जानते थे कि असली रहस्य अभी बाकी था। वह कागज केवल संपत्ति के
बँटवारे की कहानी नहीं बता रहा था। उसके पीछे रामदास की ऐसी योजना थी, जिसने दोनों
भाइयों के पूरे जीवन को बदल देने की तैयारी कर रखी थी।
और सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि आखिर रामदास ने अपनी संपत्ति के साथ ऐसी कौन-सी
शर्त जोड़ी थी, जिसे पूरा किए बिना दोनों में से कोई भी जमीन का मालिक नहीं
बन सकता था?
इस प्रश्न का उत्तर अगले दिन बादशाह अकबर के दरबार में मिलने वाला था।
अगली सुबह बादशाह अकबर का दरबार सामान्य दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक शांत था।
दरबार में उपस्थित सभी लोगों को पता था कि आज दो भाइयों के बीच चल रहे संपत्ति के
विवाद का फैसला होने वाला है। हरिदास और गोपालदास भी दरबार में मौजूद थे। दोनों
भाई अलग-अलग स्थान पर खड़े थे और एक-दूसरे की ओर देखने से भी बच रहे थे। उनके बीच
वर्षों से जमा हुआ मनमुटाव अब केवल जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रह गया था। दोनों
के मन में यह भावना बैठ चुकी थी कि दूसरा भाई उनके साथ अन्याय कर रहा है। बादशाह
अकबर अपने सिंहासन पर बैठे थे और उनके दाईं ओर बीरबल शांत भाव से खड़े थे। उनके
हाथ में वही पुराना कागज था जो दीनानाथ ने पिछले दिन प्रस्तुत किया था।
अकबर ने दरबार की ओर देखते हुए कहा, “कल हमने इस मामले को आज तक के लिए स्थगित किया
था। आज हम जानेंगे कि रामदास ने अपनी संपत्ति के बारे में वास्तव में क्या इच्छा
व्यक्त की थी। बीरबल, तुमने कागज पढ़ा है। अब सभी के सामने उसकी बात स्पष्ट करो।”
बीरबल ने धीरे से कागज खोला और बोले, “जहाँपनाह, रामदास ने लिखा था कि उनके
पास जो बीस बीघा जमीन है, वह उनके दोनों पुत्रों की है। उन्होंने यह भी लिखा कि उनके
दोनों पुत्र उस जमीन पर बराबर अधिकार रखते हैं। लेकिन उन्होंने यह आशंका भी व्यक्त
की थी कि यदि जमीन सीधे दोनों के बीच बाँट दी गई, तो दोनों भाई हमेशा
एक-दूसरे से लड़ते रहेंगे। इसलिए उन्होंने एक शर्त रखी।”
हरिदास और गोपालदास दोनों ध्यान से सुनने लगे। बीरबल ने कहा, “रामदास की
इच्छा थी कि जमीन का बँटवारा तब तक न किया जाए जब तक दोनों भाई मिलकर उस जमीन से
जुड़ा एक अंतिम काम पूरा न कर लें। उसके बाद ही उन्हें अपना-अपना हिस्सा मिलेगा।”
गोपालदास ने बेचैनी से पूछा, “वह काम क्या है?” बीरबल ने उसकी ओर देखा और कहा, “तुम्हारे पिता
ने लिखा है कि उनके खेत के उत्तरी हिस्से में एक पुराना कुआँ है। वह कुआँ वर्षों
से सूखा पड़ा है। तुम्हारे पिता की इच्छा थी कि दोनों भाई मिलकर उस कुएँ को फिर से
उपयोगी बनाएँ। जब तक कुएँ में पानी न आ जाए, जमीन का बँटवारा नहीं
होगा।”
दरबार में बैठे लोगों को यह शर्त कुछ अजीब लगी। अकबर ने भी आश्चर्य से पूछा,
“रामदास ने ऐसा
क्यों लिखा?” बीरबल ने उत्तर दिया, “क्योंकि वह केवल जमीन नहीं बाँटना चाहते थे, वह अपने बेटों
के बीच बचा हुआ संबंध भी बचाना चाहते थे। उन्होंने समझ लिया था कि उनके जाने के
बाद धन उनके पुत्रों को जोड़ने के बजाय अलग कर सकता है। इसलिए उन्होंने ऐसी शर्त
रखी जिसमें दोनों को साथ काम करना पड़े।” हरिदास ने तुरंत कहा, “जहाँपनाह,
मैं तैयार हूँ।
लेकिन मुझे विश्वास है कि मेरा भाई यह काम नहीं करेगा। वह हमेशा अपने व्यापार को
खेती से अधिक महत्वपूर्ण समझता रहा है।”
गोपालदास ने क्रोधित होकर कहा, “और तुम हमेशा यही समझते रहे कि खेती करने के
कारण पूरा परिवार तुम्हारे कारण चलता है। तुमने कभी मेरे व्यापार से आने वाले धन
की कद्र नहीं की।” हरिदास ने पलटकर कहा, “यदि तुम्हें परिवार की इतनी चिंता थी तो पिता की
बीमारी के समय तुम महीनों तक शहर में क्यों रहे?” गोपाल ने कहा, “मैं शहर इसलिए
गया था क्योंकि पिता की दवाइयों के लिए धन चाहिए था। वही धन मैं व्यापार करके लाता
था।” दोनों भाइयों की आवाज़ फिर ऊँची होने लगी। अकबर ने कठोर स्वर में कहा,
“बस! यदि तुम
दोनों अभी भी एक-दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं हो तो तुम्हारे पिता की अंतिम
इच्छा कैसे पूरी होगी?”
दोनों भाई चुप हो गए। बीरबल ने कहा, “यही तो असली परीक्षा है। तुम्हारे पिता ने
तुम्हें केवल कुआँ ठीक करने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने तुम्हें यह समझने का
अवसर दिया है कि परिवार की जमीन का असली मूल्य केवल मिट्टी में नहीं होता, बल्कि उस
रिश्ते में होता है जो उसे सँभालता है।” दोनों भाई कुछ देर तक मौन खड़े रहे। फिर
अकबर ने आदेश दिया कि अगले सात दिनों तक दोनों भाई गाँव जाकर उस कुएँ को ठीक करने
का प्रयास करें। बीरबल ने कहा कि इस काम के दौरान दरबार का एक विश्वसनीय व्यक्ति
भी उनके साथ रहेगा, लेकिन वह केवल उनकी गतिविधियों को देखेगा और किसी विवाद में
हस्तक्षेप नहीं करेगा।
अगले दिन दोनों भाई अपने गाँव पहुँचे। खेत के उत्तरी हिस्से में वास्तव में एक
बहुत पुराना कुआँ था। उसकी दीवारें जगह-जगह से टूट चुकी थीं और उसमें मिट्टी,
पत्थर तथा सूखे
पत्तों का ढेर जमा था। कुएँ के आसपास झाड़ियाँ उग आई थीं। देखकर लगता था कि कई
वर्षों से किसी ने उसकी सुध नहीं ली थी। हरिदास ने कुएँ को देखा और कहा, “इसे साफ करने
में बहुत मेहनत लगेगी।” गोपालदास ने उत्तर दिया, “तो मेहनत कर लो। यही तो
पिता की इच्छा थी।” हरिदास ने उसकी ओर देखा और बोला, “मैं अकेला क्यों करूँ?
तुम्हें भी काम
करना होगा।” गोपाल ने कहा, “मैं काम से भाग नहीं रहा। लेकिन तुम मुझे आदेश देने की
कोशिश मत करो।”
दोनों ने अगले कुछ घंटे कुएँ के आसपास की झाड़ियाँ साफ करने में बिताए। शुरुआत
में वे एक-दूसरे से लगभग बात नहीं कर रहे थे। हरिदास मिट्टी हटाता और गोपाल पत्थर
बाहर निकालता। कभी-कभी किसी काम को लेकर दोनों की राय अलग हो जाती, लेकिन उन्हें
याद था कि बीरबल की निगरानी में वे पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए आए हैं।
शाम तक उन्होंने कुएँ का काफी हिस्सा साफ कर दिया। उन्हें नीचे कुछ पत्थरों के बीच
एक पुराना लोहे का संदूक दिखाई दिया। गोपाल ने तुरंत कहा, “इसे बाहर निकालो।” हरिदास
ने कहा, “पहले देखते हैं कि यह क्या है।”
संदूक बहुत पुराना था और जंग से लगभग खराब हो चुका था। दोनों ने मिलकर उसे ऊपर
खींच लिया। संदूक पर कोई ताला नहीं था। हरिदास ने उसे खोला तो उसमें कुछ पुराने
कागज, एक पीतल की छोटी चाबी और कपड़े में लिपटी हुई एक वस्तु मिली। गोपाल ने आश्चर्य
से पूछा, “यह क्या है?” हरिदास ने कपड़ा खोला तो उसमें उनके पिता की पुरानी मुहर
थी। दोनों भाई कुछ क्षण तक उसे देखते रहे। फिर गोपाल ने कहा, “यह मुहर तो
पिता हमेशा अपने पास रखते थे।”
हरिदास ने पुराने कागजों को ध्यान से देखा। उनमें खेतों का हिसाब, पुराने लेन-देन
और कुछ नाम लिखे हुए थे। लेकिन एक कागज ऐसा था जिस पर केवल कुछ शब्द लिखे थे। उसे
पढ़ते ही हरिदास का चेहरा बदल गया। गोपाल ने पूछा, “क्या हुआ?” हरिदास ने कागज
उसकी ओर बढ़ा दिया। उस पर लिखा था कि यदि कभी दोनों भाइयों के बीच संपत्ति को लेकर
विवाद हो, तो उन्हें गाँव के पुराने मंदिर के पीछे स्थित बरगद के पेड़ के नीचे रखे पत्थर
को हटाना चाहिए। वहाँ उन्हें एक और संदेश मिलेगा।
गोपाल ने कहा, “क्या पिता ने यह सब पहले से सोच रखा था?” हरिदास ने धीरे
से कहा, “शायद।” दोनों अगले दिन सुबह बरगद के पेड़ के पास जाने के लिए तैयार हुए। उस
रात दोनों भाइयों को नींद नहीं आई। पहली बार उनके मन में यह विचार आया कि शायद
उनके पिता ने केवल संपत्ति नहीं छोड़ी थी, बल्कि उनके लिए कोई ऐसी सीख छोड़ी थी जिसे वे
दोनों अब तक समझ ही नहीं पाए थे।
सुबह दोनों बरगद के पेड़ के नीचे पहुँचे। वहाँ कई बड़े पत्थर थे। काफी खोजने
के बाद उन्हें एक पत्थर मिला जिसके नीचे मिट्टी कुछ अलग दिखाई दे रही थी। दोनों ने
मिलकर पत्थर हटाया। नीचे मिट्टी में एक छोटा लकड़ी का डिब्बा दबा हुआ था। डिब्बे
के भीतर एक पत्र था। पत्र देखकर हरिदास के हाथ काँपने लगे। उसने पत्र खोला और
पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था कि रामदास अपने दोनों बेटों को बराबर प्रेम करते
थे। उन्हें पता था कि दोनों भाइयों में स्वभाव का अंतर है। एक मेहनती किसान है और
दूसरा बुद्धिमान व्यापारी। उन्होंने लिखा था कि दोनों की ताकत अलग है, लेकिन दोनों
एक-दूसरे की कमजोरी भी दूर कर सकते हैं।
पत्र के अंत में एक ऐसी बात लिखी थी जिसे पढ़कर दोनों भाई लंबे समय तक चुप
रहे। रामदास ने लिखा था कि उन्होंने अपनी संपत्ति का कोई हिस्सा किसी एक पुत्र को
अकेले देने का निर्णय कभी नहीं लिया था। बल्कि उन्होंने जानबूझकर दोनों भाइयों को
ऐसी परिस्थिति में रखा था जहाँ उन्हें साथ रहकर काम करना पड़े। उन्होंने लिखा था
कि यदि दोनों भाई केवल जमीन के लिए लड़ेंगे तो जमीन उन्हें कभी सुख नहीं देगी।
लेकिन यदि वे जमीन को मिलकर सँभालेंगे तो वही जमीन उनके परिवार की कई पीढ़ियों को
समृद्ध कर सकती है।
गोपालदास की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीरे से कहा, “भैया, शायद हम दोनों
ने पिता को गलत समझा।” हरिदास कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद उसने कहा, “मैंने भी
तुम्हारे बारे में बहुत कुछ गलत सोचा। मुझे लगता था कि तुम परिवार से दूर भागना
चाहते हो।” गोपाल ने कहा, “और मैं समझता था कि तुम मुझे परिवार का हिस्सा ही नहीं
मानते।” दोनों भाई एक-दूसरे को देखते रहे। उनके बीच वर्षों की नाराजगी एक पल में
समाप्त नहीं हुई, लेकिन पहली बार दोनों ने अपने मन की सच्चाई स्वीकार की थी।
उसी समय बीरबल वहाँ पहुँचे। उन्होंने दूर से दोनों भाइयों को देखा और
मुस्कुराए। उन्होंने पूछा, “तो क्या तुम्हें अपने पिता का संदेश मिल गया?” हरिदास ने सिर
झुकाकर कहा, “हाँ, बीरबल जी। लेकिन अब हमें समझ आया है कि पिता ने हमारे लिए जमीन से भी बड़ी चीज
छोड़ी थी।” बीरबल ने पूछा, “क्या?” गोपालदास ने उत्तर दिया, “एक-दूसरे का साथ।”
बीरबल ने कहा, “यही तुम्हारे पिता की असली संपत्ति थी। जमीन तो केवल उसका
माध्यम थी।” फिर उन्होंने दोनों भाइयों से कहा, “अब आखिरी परीक्षा बाकी है।
कुएँ में पानी अभी तक नहीं आया है। यदि तुम दोनों सच में अपने पिता की इच्छा समझ
चुके हो तो आज से इस काम को केवल संपत्ति पाने के लिए मत करना। इसे अपने पिता की
स्मृति के लिए करना।”
दोनों भाइयों ने उसी दिन से पूरे मन से कुएँ की सफाई शुरू कर दी। उन्होंने
गाँव के मजदूरों की मदद ली, लेकिन स्वयं भी काम किया। गोपाल ने अपने व्यापार से पैसे
लगाकर मजबूत पत्थर मँगवाए और हरिदास ने खेत के अनुभव से कुएँ की पुरानी संरचना को
समझकर उसकी मरम्मत करवाई। कई दिनों की मेहनत के बाद कुएँ की गहराई में नमी दिखाई
देने लगी। एक सुबह जब हरिदास ने कुएँ में झाँका तो उसे नीचे चमकता हुआ पानी दिखाई
दिया। उसने खुशी से गोपाल को आवाज़ दी। दोनों भाई दौड़कर आए। कुएँ में धीरे-धीरे
पानी भर रहा था।
गोपाल ने भावुक होकर कहा, “भैया, पिता की इच्छा पूरी हो गई।” हरिदास ने उसके कंधे पर हाथ रखा
और कहा, “नहीं, अभी पूरी नहीं हुई। पानी तो आ गया, लेकिन हमें यह तय करना है कि इस जमीन का उपयोग
हम कैसे करेंगे।” गोपाल ने मुस्कुराकर कहा, “इस बार फैसला हम दोनों
मिलकर करेंगे।”
जब दोनों भाई बादशाह अकबर के दरबार में वापस पहुँचे तो उनके चेहरे पहले जैसे
नहीं थे। उनके बीच अब भी उम्र और स्वभाव का अंतर था, लेकिन दुश्मनी नहीं थी।
अकबर ने उन्हें देखकर पूछा, “तो बताओ, जमीन का क्या हुआ?” हरिदास ने कहा, “जहाँपनाह, जमीन वही है,
लेकिन हम बदल
गए हैं।” गोपाल ने आगे कहा, “हमने समझ लिया है कि पिता ने हमें जमीन बाँटने के लिए नहीं,
बल्कि अपने
रिश्ते को बचाने के लिए एक साथ काम करने का अवसर दिया था।”
अकबर ने प्रसन्न होकर बीरबल की ओर देखा। बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, आज फैसला केवल
दो भाइयों के बीच नहीं हुआ। आज एक परिवार टूटने से बच गया।” अकबर ने आदेश दिया कि
रामदास की जमीन दोनों भाइयों के संयुक्त अधिकार में रहेगी और उसकी आय दोनों के बीच
बराबर बाँटी जाएगी। साथ ही यह भी तय किया गया कि कोई भी भाई दूसरे की अनुमति के
बिना जमीन का कोई हिस्सा बेच नहीं सकेगा। दोनों भाइयों ने यह निर्णय स्वीकार कर
लिया।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। बीरबल को अब भी रामदास के पुराने संदूक में
मिले कागजों को लेकर संदेह था। उन कागजों में कुछ ऐसे नाम लिखे थे जिनका इस विवाद
से सीधा संबंध दिखाई नहीं देता था। बीरबल को लगा कि रामदास ने अपनी संपत्ति के
बारे में जितना कुछ लिखा था, उससे कहीं अधिक कोई रहस्य अभी छिपा हुआ है। उन्हें विशेष
रूप से उस पीतल की चाबी ने परेशान कर रखा था जो संदूक में मिली थी। यदि चाबी वहाँ
थी, तो उसका ताला कहाँ था? और यदि रामदास ने अपने बेटों के लिए इतना सब पहले से सोच
रखा था, तो क्या उन्होंने कोई तीसरा रहस्य भी छिपाया था?
बीरबल ने निश्चय किया कि वह इस रहस्य को भी खोजकर रहेंगे। क्योंकि उन्हें पता
था कि कभी-कभी किसी विवाद का असली कारण वह नहीं होता जो सामने दिखाई देता है। दो
भाइयों के बीच जमीन का झगड़ा तो समाप्त हो चुका था, लेकिन रामदास की विरासत का
एक और अध्याय अभी खुलना बाकी था।
कुएँ में पानी आने के बाद दोनों भाइयों के बीच का पुराना विवाद काफी हद तक
समाप्त हो गया था, लेकिन बीरबल के मन में अभी भी एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था।
वह प्रश्न था उस छोटी-सी पीतल की चाबी का, जो पुराने लोहे के संदूक से मिली थी। बीरबल ने
कई बार उस चाबी को ध्यान से देखा था। वह साधारण चाबी नहीं थी। उसके ऊपर बहुत महीन
नक्काशी बनी हुई थी और उसके एक सिरे पर कमल का छोटा-सा निशान था। बीरबल ने हरिदास
और गोपालदास से पूछा कि क्या उन्होंने अपने पिता के घर में कभी ऐसा ताला या संदूक
देखा था। दोनों ने बहुत सोचने के बाद भी कोई जानकारी नहीं दी। हरिदास ने कहा कि
पिता के पास एक पुराना कमरा था जिसे वह स्वयं भी बहुत कम खोलते थे। गोपालदास को उस
कमरे के बारे में पता तो था, लेकिन उसने कभी उसके भीतर जाने की कोशिश नहीं की थी। बीरबल
ने तुरंत कहा कि शायद इस चाबी का संबंध उसी कमरे से हो सकता है।
अगले दिन बीरबल दोनों भाइयों के साथ उनके पुराने घर पहुँचे। घर वही था जिसमें
रामदास ने अपने जीवन के अधिकांश वर्ष बिताए थे। आँगन के बीच में एक पुराना नीम का
पेड़ था, जिसकी छाया में कभी दोनों भाई बचपन में खेला करते थे। घर की दीवारों पर समय के
निशान साफ दिखाई देते थे। कुछ जगहों पर चूना उतर चुका था और लकड़ी के दरवाजे
पुराने हो गए थे। हरिदास ने बीरबल को घर के पीछे बने एक छोटे कमरे तक पहुँचाया।
दरवाजा मोटा था और उस पर लोहे का ताला लगा था। हरिदास ने कहा, “यह कमरा पिता
हमेशा बंद रखते थे। उन्होंने हमें कभी इसकी चाबी नहीं दी।” बीरबल ने ताले को ध्यान
से देखा और फिर अपनी जेब से पीतल की चाबी निकाली। चाबी ताले में बिल्कुल ठीक बैठ
गई।
दरवाजा खुलते ही धूल की गंध पूरे कमरे में फैल गई। अंदर लकड़ी की पुरानी
अलमारियाँ थीं, कुछ मिट्टी के बर्तन थे और दीवार के पास एक बड़ी संदूकची
रखी थी। कमरे में कोई कीमती सामान दिखाई नहीं दे रहा था। गोपालदास ने कहा,
“शायद पिता यहाँ
पुराने कागज रखते थे।” बीरबल ने उत्तर दिया, “संभव है, लेकिन किसी
व्यक्ति के बंद कमरे को केवल पुराने कागजों का कमरा समझना बुद्धिमानी नहीं है। हर
वस्तु अपने पीछे कोई कहानी छोड़ती है।”
बीरबल ने कमरे की दीवारों, फर्श और अलमारियों को ध्यान से देखना शुरू किया। एक कोने
में उन्हें लकड़ी की एक पट्टी बाकी फर्श से अलग दिखाई दी। उन्होंने हरिदास से कहा
कि उस पट्टी को उठाने का प्रयास करे। पट्टी हटते ही नीचे एक छोटी-सी जगह दिखाई दी।
उसमें कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी रखी थी। हरिदास ने डायरी उठाई और धूल साफ
की। पहले पन्ने पर रामदास का नाम लिखा था। बीरबल ने कहा, “यही वह चीज है जिसकी हमें
तलाश थी।”
डायरी में रामदास ने अपने जीवन की कई घटनाएँ लिखी थीं। उन्होंने अपने बचपन,
अपने पिता,
खेती शुरू करने
के दिनों और व्यापारियों के साथ किए गए सौदों का उल्लेख किया था। लेकिन अंतिम कुछ
पन्नों में उन्होंने अपने दोनों बेटों के बारे में लिखा था। उन्होंने लिखा था कि
हरिदास मेहनती और धैर्यवान है, जबकि गोपालदास तेज बुद्धि वाला और जोखिम उठाने वाला है।
दोनों की खूबियाँ अलग हैं, लेकिन दोनों में एक कमी समान है—वे अपनी बात को सही साबित
करने की जल्दी करते हैं और दूसरे की बात पूरी तरह सुनने से पहले ही निर्णय कर लेते
हैं।
बीरबल ने यह पढ़कर दोनों भाइयों की ओर देखा। दोनों ने सिर झुका लिया। उन्हें
अपने पिता की बातों में अपने पुराने व्यवहार की सच्चाई दिखाई दे रही थी। डायरी के
एक अन्य पन्ने पर रामदास ने लिखा था कि उन्हें सबसे अधिक डर इस बात का है कि उनकी
मृत्यु के बाद दोनों भाई किसी बाहरी व्यक्ति की बातों में आकर एक-दूसरे के विरुद्ध
हो सकते हैं। उन्होंने यह भी लिखा था कि गाँव में कुछ लोग उनकी जमीन पर नजर रखे
हुए हैं। वे लोग जानते हैं कि जमीन उपजाऊ है और नदी के पास होने के कारण भविष्य
में उसका मूल्य और बढ़ सकता है।
बीरबल की आँखें यह पढ़ते ही गंभीर हो गईं। उन्होंने पूछा, “क्या तुम दोनों
के पिता की जमीन खरीदने की कोशिश किसी ने कभी की थी?” हरिदास ने कहा, “हाँ, एक व्यापारी
था—लाला श्यामलाल। उसने पिता से कई बार जमीन बेचने के लिए कहा था।” गोपालदास ने
तुरंत कहा, “लेकिन पिता ने कभी जमीन बेचने से मना कर दिया था।” बीरबल ने पूछा, “क्या श्यामलाल
ने बाद में तुम दोनों में से किसी से संपर्क किया?” दोनों भाइयों ने एक-दूसरे
की ओर देखा। कुछ क्षण बाद गोपालदास ने धीमे स्वर में कहा, “मेरे पास वह एक बार आया
था।”
हरिदास ने आश्चर्य से पूछा, “तुमने मुझे यह कभी क्यों नहीं बताया?” गोपाल ने कहा,
“क्योंकि उसने
कहा था कि वह सिर्फ व्यापार की बात करने आया है। उसने मुझसे कहा था कि अगर मैं
जमीन का अपना हिस्सा बेच दूँ तो मुझे बहुत अच्छा पैसा मिल सकता है। मैंने मना कर
दिया था।” बीरबल ने पूछा, “उसने तुम्हें कितने पैसे देने की बात कही थी?” गोपाल ने रकम
बताई। बीरबल कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, “यह जमीन की वास्तविक कीमत
से काफी अधिक है।”
हरिदास ने तुरंत कहा, “मैंने कहा था न कि यह जमीन बहुत कीमती है!” बीरबल ने उसकी
बात रोकते हुए कहा, “मुद्दा केवल जमीन की कीमत नहीं है। यदि कोई व्यक्ति किसी
संपत्ति के लिए उसकी वास्तविक कीमत से कहीं अधिक देने को तैयार हो, तो उसके पीछे
कोई विशेष कारण जरूर होता है।” गोपाल ने पूछा, “क्या आपको लगता है कि
श्यामलाल की नजर अब भी हमारी जमीन पर है?” बीरबल ने उत्तर दिया, “मुझे केवल लगता नहीं,
मुझे इसका पता
लगाना होगा।”
बीरबल ने अगले दिन श्यामलाल को दरबार में बुलाने का आदेश दिया। श्यामलाल शहर
का एक प्रसिद्ध व्यापारी था। वह महंगे कपड़े और अनाज का व्यापार करता था। अगले दिन
जब वह दरबार में आया तो उसके साथ दो नौकर भी थे। उसने बादशाह को प्रणाम किया और
विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, मुझे किस अपराध के कारण बुलाया गया है?” अकबर ने कहा,
“तुम पर कोई
अपराध सिद्ध नहीं हुआ है। लेकिन हम रामदास की जमीन के बारे में कुछ प्रश्न पूछना
चाहते हैं।”
श्यामलाल ने मुस्कुराकर कहा, “रामदास? वह तो मेरे पुराने परिचित थे। मैंने उनसे व्यापार के
सिलसिले में कई बार मुलाकात की थी।” बीरबल ने पूछा, “क्या तुमने उनसे उनकी जमीन
खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी?” श्यामलाल ने थोड़ी देर रुककर कहा, “हाँ, लेकिन उसमें क्या गलत है?
यदि किसी की
जमीन अच्छी हो तो व्यापारी उसे खरीदना चाहेगा ही।” बीरबल ने कहा, “तुमने उस जमीन
के लिए उसकी सामान्य कीमत से अधिक धन देने की पेशकश क्यों की थी?” श्यामलाल का
चेहरा थोड़ा बदल गया। उसने कहा, “क्योंकि मुझे जमीन पसंद थी।”
बीरबल मुस्कुराए। “केवल पसंद के लिए कोई व्यापारी इतनी बड़ी रकम क्यों खर्च
करेगा?” श्यामलाल चुप हो गया। अकबर ने कहा, “सच बोलो।” तब श्यामलाल ने कहा, “जहाँपनाह,
मुझे पता चला
था कि उस जमीन के नीचे पुराने समय का कोई जलमार्ग हो सकता है। यदि वहाँ कुआँ या
नहर विकसित की जाए तो उस क्षेत्र की कीमत बहुत बढ़ सकती है। इसलिए मैंने अधिक धन
देने की पेशकश की थी।”
हरिदास और गोपालदास एक-दूसरे को देखने लगे। बीरबल ने पूछा, “तुम्हें यह
जानकारी कहाँ से मिली?” श्यामलाल ने कहा, “कुछ मजदूरों ने बताया था कि पुराने समय में उस
जमीन के नीचे से पानी की एक धारा गुजरती थी।” बीरबल ने तुरंत पूछा, “क्या तुमने उस
जमीन पर कभी खुदाई करवाने की कोशिश की?” श्यामलाल ने उत्तर नहीं दिया। उसकी चुप्पी ही
काफी थी।
बीरबल ने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, मुझे लगता है कि रामदास को इस बात का पता था। इसलिए
उन्होंने कुएँ को फिर से चालू करने की शर्त रखी होगी। उन्हें मालूम था कि जमीन के
नीचे पानी का स्रोत है।” अकबर ने कहा, “लेकिन यदि ऐसा था तो रामदास ने यह बात अपने
बेटों को क्यों नहीं बताई?” बीरबल ने उत्तर दिया, “क्योंकि शायद वह चाहते थे
कि उनके बेटे पहले एक साथ काम करना सीखें और फिर उस रहस्य का उपयोग करें।”
बीरबल ने श्यामलाल से पूछा, “क्या तुमने रामदास के जीवनकाल में कभी उनके पुराने कमरे में
प्रवेश किया था?” श्यामलाल ने कहा, “नहीं।” बीरबल ने कहा, “क्या तुम दीनानाथ को जानते
हो?” श्यामलाल ने कहा, “हाँ, वह रामदास के मुनीम थे।” बीरबल ने उसकी आँखों में देखा। उसे
लगा कि श्यामलाल दीनानाथ का नाम सुनकर थोड़ा घबरा गया है। बीरबल ने इस बात को
ध्यान में रख लिया।
उस शाम बीरबल दीनानाथ से मिलने गए। उन्होंने पूछा, “क्या श्यामलाल ने कभी तुमसे
रामदास की जमीन के बारे में बात की थी?” दीनानाथ ने कुछ क्षण मौन रहने के बाद कहा,
“हाँ, एक बार उसने
मुझसे पूछा था कि रामदास अपनी जमीन बेचेंगे या नहीं।” बीरबल ने पूछा, “तुमने क्या
उत्तर दिया?” दीनानाथ ने कहा, “मैंने कहा था कि रामदास अपनी जमीन कभी नहीं बेचेंगे।” बीरबल
ने पूछा, “क्या श्यामलाल ने इसके बाद कोई और बात कही?” दीनानाथ ने कहा, “उसने पूछा था
कि रामदास ने जमीन के नीचे के पानी के बारे में मुझे कुछ बताया है या नहीं। मैंने
कहा था कि मुझे कुछ नहीं पता।”
बीरबल ने पूछा, “लेकिन क्या तुम्हें वास्तव में कुछ पता था?” दीनानाथ ने सिर
झुका लिया। “हाँ,” उसने धीरे से कहा, “रामदास ने मुझे बताया था कि जमीन के नीचे पुराने
समय की एक जलधारा है। लेकिन उन्होंने मुझे यह भी कहा था कि यह बात किसी बाहरी
व्यक्ति को नहीं बतानी है।”
अब बीरबल के सामने तस्वीर साफ होने लगी थी। रामदास केवल जमीन के मालिक नहीं
थे। वह जानते थे कि उनकी जमीन भविष्य में बहुत मूल्यवान हो सकती है। उन्हें डर था
कि लालच उनके बेटों के बीच विवाद पैदा कर सकता है। इसलिए उन्होंने ऐसी योजना बनाई
जिसमें उनके बेटे पहले एक-दूसरे पर भरोसा करना सीखें।
लेकिन बीरबल को अभी भी एक बात समझ नहीं आई थी। रामदास की डायरी में एक पन्ना ऐसा था जिसमें केवल एक वाक्य लिखा था: “जब दोनों भाई सच में एक
हो जाएँ, तब उन्हें तीसरा दरवाजा दिखाना।” बीरबल ने कई बार इस वाक्य को पढ़ा। उन्होंने
हरिदास और गोपालदास से पूछा कि उनके पुराने घर में क्या कोई ऐसा दरवाजा है जिसे
उन्होंने कभी नहीं खोला। दोनों ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई दरवाजा याद नहीं।
बीरबल ने घर की फिर से जाँच करने का निश्चय किया। अगले दिन वह दोनों भाइयों के
साथ घर पहुँचे। उन्होंने दीवारों को ध्यान से देखा। पुराने कमरे के पीछे एक दीवार
पर लकड़ी की अलमारी लगी थी। बीरबल ने उसे हटवाया। अलमारी के पीछे दीवार पर लकड़ी
का एक छोटा हिस्सा दिखाई दिया। उस पर वही कमल का निशान बना था जो पीतल की चाबी पर
था।
गोपालदास ने आश्चर्य से कहा, “तो यही है तीसरा दरवाजा!” बीरबल ने चाबी ताले में लगाई।
जैसे ही ताला खुला, दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे भीतर की ओर खिसक गया। उसके
पीछे एक संकरा रास्ता था जो अँधेरे में कहीं दूर तक जाता दिखाई दे रहा था।
हरिदास ने घबराकर पूछा, “पिता ने घर के भीतर यह रास्ता क्यों बनाया था?” बीरबल ने उत्तर
दिया, “शायद इसका उत्तर इसी रास्ते के अंत में मिलेगा।”
तीनों हाथ में दीपक लेकर उस रास्ते पर आगे बढ़े। कुछ दूर जाने के बाद रास्ता
नीचे की ओर उतरने लगा। हवा ठंडी होती जा रही थी। दीवारों पर नमी दिखाई देने लगी।
कुछ और आगे जाने पर उन्हें पानी की हल्की आवाज सुनाई दी। हरिदास और गोपालदास ने
एक-दूसरे की ओर देखा। अब उन्हें समझ आ रहा था कि उनके पिता ने कुएँ और इस गुप्त
रास्ते के बीच कोई संबंध क्यों रखा था।
आखिर वे एक बड़े भूमिगत कक्ष में पहुँचे। वहाँ पत्थरों से बनी एक पुरानी
जलधारा थी, जिसमें साफ पानी बह रहा था। उसके किनारे एक लोहे का छोटा संदूक रखा था। संदूक
पर वही कमल का निशान बना था। बीरबल ने उसे खोला। अंदर कुछ पुराने दस्तावेज,
जमीन का नक्शा
और रामदास का अंतिम पत्र था।
बीरबल ने पत्र उठाया और पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था कि यह जमीन केवल खेती
के लिए नहीं थी। उसके नीचे से निकलने वाली जलधारा के कारण भविष्य में यहाँ एक बड़ा
जलस्रोत विकसित किया जा सकता था। रामदास ने लिखा था कि यदि उनके दोनों बेटे मिलकर
इस जलस्रोत का उपयोग गाँव के लोगों के लिए करें, तो उनकी जमीन का मूल्य धन
से कहीं अधिक हो जाएगा। उन्होंने यह भी लिखा था कि वह चाहते हैं कि उनके बेटे इस
जलस्रोत को कभी किसी व्यापारी को न बेचें।
पत्र की अंतिम पंक्तियाँ पढ़ते समय बीरबल रुक गए। वहाँ लिखा था कि यदि दोनों
भाइयों ने एक-दूसरे का साथ छोड़ दिया, तो यह जलस्रोत उनके परिवार के लिए वरदान के बजाय
अभिशाप बन जाएगा। लेकिन यदि वे मिलकर इसे सँभालेंगे, तो उनका परिवार ही नहीं,
पूरा गाँव
समृद्ध होगा।
हरिदास की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने गोपालदास का हाथ पकड़ लिया और कहा,
“भाई, पिता हमसे
कितनी दूर की सोच रहे थे और हम कुछ बीघा जमीन के लिए लड़ रहे थे।” गोपाल ने भी
उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। उसने कहा, “अब हम पिता की इच्छा पूरी करेंगे।”
बीरबल ने दोनों भाइयों की ओर देखकर कहा, “आज तुम्हारे विवाद का अंतिम
समाधान मिल गया है। तुम्हारे पिता ने तुम्हें धन का वारिस नहीं बनाया था। उन्होंने
तुम्हें जिम्मेदारी का वारिस बनाया था।”
लेकिन जैसे ही वे भूमिगत कक्ष से बाहर निकलने वाले थे, बीरबल की नजर जमीन के नक्शे
पर पड़ी। नक्शे के एक कोने पर लाल निशान बना था। उस निशान के पास लिखा था,
“यह रहस्य केवल
दो भाइयों के एक होने पर ही सुरक्षित रहेगा।”
बीरबल कुछ देर तक नक्शे को देखते रहे। फिर उन्होंने महसूस किया कि रामदास ने
शायद आने वाले खतरे की कल्पना पहले ही कर ली थी। क्योंकि यदि श्यामलाल को इस
जलधारा के बारे में पता चल चुका था, तो संभव था कि वह केवल जमीन खरीदने तक सीमित न
रहे।
बीरबल ने दोनों भाइयों से कहा, “अब तुम्हारा असली काम शुरू हुआ है। तुम्हें केवल
अपनी जमीन बचानी नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि इस जलस्रोत का लाभ पूरे गाँव को
कैसे मिले।”
दोनों भाइयों ने एक साथ कहा, “हम तैयार हैं।”
लेकिन उसी रात गाँव के बाहर किसी अजनबी व्यक्ति ने उनके घर की गतिविधियों पर
नजर रखी। उसे पता चल चुका था कि रामदास का पुराना रहस्य अब उसके बेटों के हाथ लग
गया है। और वह व्यक्ति अकेला नहीं था।
उस रात गाँव पर अँधेरा कुछ अधिक गहरा लग रहा था। आसमान में बादल छाए हुए थे और
कभी-कभी तेज हवा चलने पर नीम के पेड़ की शाखाएँ आपस में टकराकर अजीब-सी आवाज़ पैदा
कर रही थीं। हरिदास और गोपालदास अपने घर के भीतर बैठे अपने पिता की पुरानी डायरी
और नक्शे को देख रहे थे। दोनों के मन में अब एक नया उत्साह था। उन्हें लग रहा था
कि उनके पिता ने मरने से पहले उनके लिए केवल संपत्ति नहीं छोड़ी, बल्कि एक ऐसा
काम छोड़ा है जिससे पूरे गाँव का भला हो सकता है। लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था
कि उनके घर के बाहर कोई उनकी हर गतिविधि पर नजर रख रहा है।
गोपालदास ने धीरे से कहा, “भैया, यदि इस जलधारा का पानी खेतों तक पहुँचाया जाए तो हमारे गाँव
के बहुत से किसान सूखे के समय भी खेती कर सकेंगे।” हरिदास ने नक्शे को देखते हुए
कहा, “हाँ, लेकिन इसके लिए बहुत मेहनत और धन लगेगा। हमें पहले यह समझना होगा कि जलधारा
कहाँ से आती है और किस दिशा में जाती है।” गोपाल ने कहा, “मैं शहर जाकर अच्छे कारीगर
और पत्थर के मजदूर बुला सकता हूँ।” हरिदास मुस्कुराया और बोला, “और मैं गाँव के
किसानों से बात करूँगा। अगर हम सब मिलकर काम करें तो यह संभव है।” दोनों भाई पहली
बार किसी योजना पर बिना झगड़े के चर्चा कर रहे थे।
उसी समय बाहर हल्की-सी आहट हुई। हरिदास ने सिर उठाकर दरवाजे की ओर देखा। उसे
लगा जैसे कोई वहाँ से गुजर गया हो। वह बाहर निकला, लेकिन आँगन खाली था। उसने
चारों ओर देखा। नीम के पेड़ की छाया के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया। उसने दरवाजा
बंद किया और वापस भीतर आ गया। गोपाल ने पूछा, “क्या हुआ?” हरिदास ने कहा,
“शायद कोई जानवर
होगा।” लेकिन उसके मन में एक हल्का संदेह पैदा हो चुका था।
अगली सुबह दोनों भाई गाँव के मुखिया के पास गए और उन्होंने जलधारा की बात
बताई। मुखिया पहले तो विश्वास नहीं कर पाया। जब दोनों भाइयों ने उसे भूमिगत कक्ष
में मिला नक्शा दिखाया, तो वह गंभीर हो गया। उसने कहा, “यदि यह सच है तो यह पूरे
गाँव के लिए बहुत बड़ा वरदान है। लेकिन यह बात गाँव में फैलते ही कुछ लोग लालच में
भी पड़ सकते हैं।” हरिदास ने कहा, “हम यही चाहते हैं कि इसका लाभ सभी को मिले।” मुखिया ने
उन्हें सावधान करते हुए कहा, “तुम्हारे पिता समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने यह रहस्य वर्षों
तक छिपाकर रखा था। तुम्हें भी सावधानी से काम लेना होगा।”
उधर शहर में लाला श्यामलाल को खबर मिल चुकी थी कि दोनों भाइयों ने अपने पिता
के पुराने घर में कुछ महत्वपूर्ण खोज लिया है। उसके पास गाँव में एक आदमी था जो
कभी-कभी उसे वहाँ की खबर देता था। उस आदमी ने बताया था कि दोनों भाई कई दिनों से
घर के पुराने हिस्से में जा रहे हैं और कुछ मजदूरों को भी बुलाने की तैयारी कर रहे
हैं। श्यामलाल ने यह सुनकर अपनी मूँछों पर हाथ फेरा और कहा, “तो आखिर रामदास
ने वह रहस्य अपने बेटों को बता ही दिया। अब यदि उन्होंने उस जलस्रोत का उपयोग कर
लिया तो जमीन की कीमत कई गुना बढ़ जाएगी। मुझे इससे पहले कुछ करना होगा।”
श्यामलाल ने अपने विश्वसनीय आदमी को बुलाया और कहा, “दोनों भाइयों के बीच फिर से
फूट डालो। उन्हें ऐसा विश्वास दिलाओ कि दूसरा भाई जलस्रोत पर अकेले अधिकार करना
चाहता है।” उस आदमी ने पूछा, “लेकिन दोनों भाई तो अब एक हो चुके हैं।” श्यामलाल ने हँसते
हुए कहा, “हर रिश्ता मजबूत दिख सकता है, लेकिन धन के सामने उसकी परीक्षा होती है। बस सही जगह चोट
करनी होगी।”
कुछ दिनों बाद गाँव में एक अफवाह फैलने लगी। किसी ने हरिदास से कहा कि
गोपालदास शहर के एक व्यापारी से गुप्त रूप से बातचीत कर रहा है। वह व्यापारी
जलस्रोत के बदले बहुत बड़ी रकम देने को तैयार है। हरिदास ने पहले इस बात पर
विश्वास नहीं किया। लेकिन जब उसे दो अलग-अलग लोगों ने यही बात बताई, तो उसके मन में
संदेह पैदा होने लगा। उसने शाम को गोपाल से पूछा, “क्या तुम किसी व्यापारी से
जलधारा के बारे में बात कर रहे हो?” गोपाल ने हैरानी से कहा, “नहीं। तुम ऐसा क्यों पूछ
रहे हो?” हरिदास ने कहा, “गाँव में लोग कह रहे हैं कि तुम जलस्रोत बेचने की तैयारी कर
रहे हो।” गोपाल का चेहरा लाल हो गया। उसने कहा, “तुमने मुझ पर विश्वास नहीं
किया?” हरिदास ने तुरंत कहा, “मैंने सिर्फ पूछा है।”
गोपाल ने कहा, “नहीं, तुमने पूछा नहीं, तुमने शक किया है।” हरिदास चुप हो गया। कुछ क्षण
बाद उसने कहा, “यदि तुम मेरी जगह होते तो क्या करते?” गोपाल ने कहा,
“मैं पहले तुम
पर भरोसा करता।” यह सुनकर हरिदास को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने कहा, “ठीक है,
मुझे माफ कर
दो। शायद किसी ने जानबूझकर यह बात फैलाई है।” दोनों भाइयों ने फिर एक-दूसरे से
वादा किया कि वे किसी भी अफवाह पर तुरंत विश्वास नहीं करेंगे।
लेकिन श्यामलाल की चाल यहीं समाप्त नहीं हुई। उसने गाँव के एक पुराने साहूकार
के माध्यम से हरिदास को संदेश भेजा कि यदि वह चाहे तो उसे उसकी जमीन के हिस्से के
बदले बहुत बड़ी रकम मिल सकती है। संदेश के साथ एक कागज भी था जिसमें लिखा था कि
यदि हरिदास अपना हिस्सा बेच देता है तो उसे इतना धन मिलेगा कि वह जीवन भर आराम से
रह सकता है। हरिदास ने कागज पढ़ा और उसे फाड़ दिया। उसने कहा, “मेरे पिता ने
जो चीज हमें साथ रखने के लिए छोड़ी है, उसे मैं धन के लिए नहीं बेचूँगा।”
जब यह बात गोपाल को पता चली तो उसके मन में अपने भाई के प्रति सम्मान और बढ़
गया। उसने कहा, “भैया, अब मुझे समझ आया कि पिता ने हम दोनों को एक-दूसरे के लिए
क्यों चुना था।” हरिदास ने मुस्कुराकर कहा, “और मुझे समझ आया कि
तुम्हारी व्यापार की समझ हमारे काम आ सकती है।”
दोनों भाइयों ने मिलकर गाँव के लोगों को इकट्ठा किया और जलधारा के उपयोग की
योजना बनाई। उन्होंने तय किया कि पानी का पहला हिस्सा गाँव के पीने के पानी के लिए
होगा, दूसरा हिस्सा खेती के लिए और यदि पानी पर्याप्त बचा तो एक छोटा तालाब बनाया
जाएगा ताकि भविष्य में पशुओं और अन्य जरूरतों के लिए भी पानी उपलब्ध रहे। गाँव के
लोग उनकी योजना से खुश हुए। कई किसानों ने स्वयं श्रम देने की बात कही।
कुछ दिनों में काम शुरू हो गया। भूमिगत जलधारा से पानी निकालने के लिए पत्थर
की नाली बनाई जाने लगी। गोपालदास ने शहर से आवश्यक सामान मँगवाया और हरिदास ने
मजदूरों तथा किसानों के काम का प्रबंध किया। दोनों भाई दिन-रात मेहनत करने लगे।
धीरे-धीरे जलधारा का पानी खेतों की ओर जाने लगा। पहली बार गाँव के लोगों ने महसूस
किया कि रामदास की दूरदर्शिता कितनी बड़ी थी।
लेकिन श्यामलाल यह सब देखकर परेशान था। उसकी योजना विफल हो रही थी। उसने सोचा
कि यदि भाइयों के बीच फूट नहीं डाली जा सकती तो उसे किसी दूसरे रास्ते से काम करना
होगा। उसने अपने आदमी से कहा, “अब उन्हें डराओ। ऐसा डर पैदा करो कि वे स्वयं उस जलधारा को
बंद कर दें।”
उस रात गाँव के खेतों के पास कुछ अज्ञात लोगों ने नहर के एक हिस्से को तोड़
दिया। सुबह जब किसान वहाँ पहुँचे तो पानी बहकर खेतों के बजाय दूसरी दिशा में जा
रहा था। हरिदास और गोपालदास तुरंत वहाँ पहुँचे। उन्होंने नुकसान देखा तो गोपाल ने
कहा, “यह अपने आप नहीं हुआ। किसी ने जानबूझकर नहर तोड़ी है।” हरिदास ने आसपास के
पैरों के निशान देखे। उसे कुछ भारी जूतों के निशान दिखाई दिए।
गाँव के मुखिया ने कहा, “अब हमें सावधान रहना होगा।” उसी समय एक किसान दौड़ता हुआ
आया और बोला, “मैंने रात को दो अजनबी लोगों को इस तरफ जाते देखा था।”
बीरबल को खबर भेजी गई। जब बीरबल वहाँ पहुँचे तो उन्होंने टूटे हुए हिस्से को ध्यान
से देखा। उन्होंने मिट्टी में पड़े जूतों के निशान देखे और कहा, “जिसने यह किया
है, वह जलधारा के बारे में अच्छी जानकारी रखता है। उसे पता था कि कहाँ चोट करने से
पानी का रास्ता बदल जाएगा।”
हरिदास ने कहा, “क्या यह श्यामलाल का काम हो सकता है?” बीरबल ने उत्तर
दिया, “संदेह करना आसान है, प्रमाण जुटाना कठिन। हमें प्रमाण चाहिए।” गोपाल ने कहा,
“यदि वह हमारे
खिलाफ है तो वह फिर कोशिश करेगा।” बीरबल ने कहा, “और यही हमारी सबसे बड़ी
संभावना है। यदि कोई व्यक्ति पहली चाल में सफल नहीं हुआ, तो वह दूसरी चाल अवश्य
चलेगा। हमें उसे दूसरी चाल चलने देना होगा।”
बीरबल ने दोनों भाइयों को एक योजना बताई। उन्होंने गाँव में यह खबर फैलाने को
कहा कि जलधारा के बारे में एक बहुत महत्वपूर्ण पुराना दस्तावेज अभी भी उनके पास
नहीं है और वह दस्तावेज केवल एक विशेष स्थान पर छिपा है। यह खबर जानबूझकर कुछ ऐसे
लोगों तक पहुँचाई गई जिन पर बीरबल को संदेह था। साथ ही उन्होंने पुराने घर में एक
नकली संदूक रखवा दिया और उसमें ऐसे कागज रखे जो देखने में बहुत महत्वपूर्ण लगते
थे।
कुछ दिनों तक सब शांत रहा। फिर एक रात वही हुआ जिसकी बीरबल को प्रतीक्षा थी।
घर के पीछे किसी ने दीवार पार करने की कोशिश की। लेकिन इस बार बीरबल के आदमी पहले
से छिपे हुए थे। जैसे ही वह व्यक्ति नकली संदूक तक पहुँचा, उसे पकड़ लिया गया। उसके
पास से एक छोटा चाकू, रस्सी और कुछ कागज मिले। पूछताछ में उसने पहले कुछ नहीं
बताया। लेकिन जब बीरबल ने उससे कहा कि उसके साथी का नाम पहले ही पता चल चुका है,
तो वह घबरा
गया।
उसने अंततः स्वीकार किया कि उसे श्यामलाल ने भेजा था। उसका काम था संदूक
चुराना और यह पता लगाना कि रामदास ने जलधारा के बारे में क्या लिखा है। उसने यह भी
बताया कि श्यामलाल को डर था कि यदि दोनों भाई जलस्रोत को गाँव के लिए विकसित कर
देंगे तो जमीन बेचने की उसकी योजना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
अकबर के सामने श्यामलाल को फिर बुलाया गया। इस बार उसके पास बचने का कोई
रास्ता नहीं था। उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और कहा, “जहाँपनाह, मैंने लालच में
आकर गलती की। मुझे लगा था कि यदि जमीन मेरे हाथ में आ जाए तो मैं बहुत धन कमा सकता
हूँ।” अकबर ने कठोर स्वर में कहा, “किसी दूसरे के परिवार को तोड़कर धन कमाने की इच्छा केवल
व्यापार नहीं, लालच है।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, इस व्यक्ति को दंड मिलना चाहिए, लेकिन साथ ही इन दोनों
भाइयों को भी एक बात समझनी चाहिए। आज उन्होंने अपना संबंध बचा लिया है, लेकिन भविष्य
में भी उन्हें सावधान रहना होगा। बाहरी लालच तभी सफल होता है जब घर के भीतर
विश्वास कमजोर हो।”
अकबर ने श्यामलाल को उचित दंड देने का आदेश दिया और उसके बाद दोनों भाइयों की
ओर देखा। उन्होंने कहा, “तुम दोनों ने जिस तरह अपने पिता की इच्छा को समझा और
एक-दूसरे पर विश्वास बनाए रखा, वह दूसरों के लिए उदाहरण है। तुम्हारी जमीन अब केवल
तुम्हारी संपत्ति नहीं रहेगी। यदि तुम सहमत हो तो इसका एक हिस्सा गाँव के सामूहिक
जलस्रोत के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा।”
हरिदास ने तुरंत कहा, “मुझे स्वीकार है।” गोपालदास ने भी कहा, “मुझे भी।”
उस दिन गाँव में पहली बार एक बड़ा उत्सव हुआ। कुएँ में पानी था, नहरों में पानी
बह रहा था और किसानों के चेहरे पर खुशी थी। दोनों भाई अपने पिता की समाधि के पास
गए और वहाँ दीपक जलाया। हरिदास ने कहा, “पिता, हम देर से समझे, लेकिन अब आपकी बात समझ गए
हैं।” गोपालदास ने कहा, “आपने हमें जमीन से अधिक एक-दूसरे का साथ दिया।”
दूर खड़े बीरबल यह दृश्य देख रहे थे। अकबर ने उनसे पूछा, “बीरबल, तुम्हें क्या
लगता है, इस पूरे विवाद से सबसे बड़ी सीख क्या मिली?” बीरबल ने मुस्कुराकर कहा,
“जहाँपनाह,
संपत्ति मनुष्य
की परीक्षा लेती है। लेकिन सच्ची जीत तब होती है जब मनुष्य संपत्ति को बचाते-बचाते
अपने रिश्ते को न खो दे। इन दोनों भाइयों ने पहले जमीन के लिए लड़ाई की, फिर जमीन को
बचाने के लिए एक हो गए और अंत में समझ गए कि जमीन से बड़ा उनका रिश्ता है।”
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “तुमने फिर सिद्ध कर दिया कि बुद्धि केवल पहेली सुलझाने के
लिए नहीं, बल्कि टूटे हुए रिश्ते जोड़ने के लिए भी होती है।”
समय बीतता गया। दोनों भाइयों ने मिलकर गाँव की व्यवस्था सुधारी। हरिदास खेती
और पानी की व्यवस्था देखता और गोपालदास व्यापार तथा आवश्यक सामान की व्यवस्था
करता। दोनों ने मिलकर एक छोटा अनाज भंडार भी बनवाया ताकि अकाल के समय गाँव के गरीब
लोगों को भोजन मिल सके। उन्होंने अपने पिता की याद में एक सराय भी बनवाई जहाँ दूर
से आने वाले यात्रियों को मुफ्त पानी और भोजन मिलता था।
लेकिन कहानी का सबसे सुंदर परिवर्तन उनके अपने घर में हुआ। जिस आँगन में कभी
दोनों भाई एक-दूसरे से लड़ते थे, वहीं अब उनके बच्चे साथ खेलते थे। एक दिन हरिदास का छोटा
बेटा अपने चाचा गोपालदास के पास गया और बोला, “चाचाजी, दादाजी इतने
समझदार थे तो उन्होंने आपको पहले ही क्यों नहीं बता दिया कि जमीन दोनों की है?”
गोपालदास हँस
पड़ा और बोला, “क्योंकि तुम्हारे दादाजी जानते थे कि कुछ बातें कानों से
सुनकर नहीं, अनुभव से समझी जाती हैं।”
हरिदास ने पास खड़े होकर कहा, “और तुम्हारे दादाजी यह भी जानते थे कि भाई को खोकर जीती हुई
जमीन कभी खुशी नहीं देती।”
दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा दिए।
कई वर्षों बाद जब लोग रामदास की कहानी सुनाते, तो वे यह नहीं कहते कि उसने
अपने बेटों के लिए कितनी जमीन छोड़ी थी। वे कहते कि उसने अपने बेटों को ऐसा सबक
दिया था जिसे कोई धन खरीद नहीं सकता। उसने उन्हें सिखाया था कि जब परिवार के भीतर
विश्वास हो तो कठिन से कठिन समस्या का समाधान निकाला जा सकता है, लेकिन जब
विश्वास टूट जाए तो सबसे बड़ी संपत्ति भी मनुष्य को सुख नहीं दे सकती।
और इस तरह दो भाइयों का वह विवाद, जो कभी उनके परिवार को तोड़ने वाला था, अंत में पूरे
गाँव को जोड़ने का कारण बन गया। बीरबल की बुद्धिमानी ने केवल जमीन का फैसला नहीं
किया था; उन्होंने दो भाइयों को यह समझाया था कि असली विरासत खेत, घर या धन नहीं,
बल्कि प्रेम,
विश्वास और
एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी है।
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