बहुत समय पहले की बात है। दिल्ली के प्रसिद्ध मुगल सम्राट अकबर का दरबार अपनी
भव्यता, न्यायप्रियता और बुद्धिमान दरबारियों के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था।
दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएँ लेकर बादशाह अकबर के दरबार में आते थे और उन्हें
विश्वास रहता था कि यदि उनकी बात सच्ची है, तो उन्हें न्याय अवश्य
मिलेगा। अकबर के दरबार में अनेक विद्वान, सेनापति, कवि और सलाहकार थे, लेकिन उनमें
सबसे अधिक प्रसिद्ध थे बीरबल। बीरबल अपनी बुद्धिमानी, हाजिरजवाबी और कठिन से कठिन
समस्या को सरल तरीके से हल करने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। बादशाह अकबर भी
अक्सर उनकी बुद्धि की परीक्षा लिया करते थे। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती
थीं, जिनमें बड़े-बड़े विद्वान भी उलझ जाते थे, लेकिन बीरबल अपनी सूझ-बूझ
से कुछ ही क्षणों में समस्या का समाधान खोज लेते थे।
एक दिन सुबह का समय था। सूरज की सुनहरी किरणें आगरा के महल की ऊँची-ऊँची
खिड़कियों से होकर राजदरबार के फर्श पर पड़ रही थीं। दरबार सज चुका था। सैनिक अपने
स्थान पर खड़े थे, मंत्री और दरबारी अपनी-अपनी जगह पर बैठे थे और कुछ फरियादी
बादशाह के सामने अपनी समस्याएँ रखने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अकबर अपने सिंहासन पर
विराजमान थे। उनके चेहरे पर सामान्य दिनों की तरह गंभीरता थी, लेकिन वे आसपास
की गतिविधियों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। उसी समय महल का एक सेवक घबराया हुआ
दरबार में आया और झुककर बादशाह को सलाम किया।
“जहाँपनाह, एक बहुत गंभीर समस्या हो गई है,” सेवक ने काँपती आवाज में
कहा।
अकबर ने उसकी ओर देखा और बोले, “क्या हुआ? इतनी घबराहट क्यों है?”
सेवक ने सिर झुकाकर कहा, “हुजूर, शाही खजाने के पास रखे कीमती सामान में से एक बहुत मूल्यवान
हार गायब हो गया है।”
यह सुनते ही पूरा दरबार शांत हो गया। कुछ क्षण पहले जहाँ हल्की-हल्की बातचीत
हो रही थी, वहाँ अब सन्नाटा छा गया। अकबर की भौंहें तन गईं। शाही खजाने से कोई कीमती
वस्तु चोरी हो जाना साधारण बात नहीं थी। खजाने की सुरक्षा बहुत कड़ी थी और वहाँ
बिना अनुमति किसी का प्रवेश संभव नहीं था।
“कौन-सा हार?” अकबर ने गंभीर स्वर में पूछा।
सेवक ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, वह हार महारानी साहिबा के लिए विशेष रूप से बनवाया गया था।
उसमें दुर्लभ हीरे और मोती जड़े हुए थे। कल रात उसे खजाने के एक सुरक्षित कक्ष में
रखा गया था। आज सुबह जब खजाने की जाँच हुई, तो हार वहाँ नहीं मिला।”
अकबर ने तुरंत खजाने के मुख्य अधिकारी को बुलाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में
एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति घबराया हुआ दरबार में उपस्थित हुआ। उसने झुककर सलाम
किया।
“तुम खजाने के अधिकारी हो?” अकबर ने पूछा।
“जी, जहाँपनाह।”
“कल रात खजाने की सुरक्षा किसके जिम्मे थी?”
अधिकारी ने कुछ नाम बताए। उनमें शाही खजाने के तीन पहरेदार, दो सेवक और एक
मुंशी शामिल थे। अकबर ने सभी को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।
थोड़ी ही देर में पाँचों व्यक्ति दरबार में खड़े थे। उनके चेहरों पर डर साफ
दिखाई दे रहा था। वे जानते थे कि शाही खजाने से चोरी होना बहुत गंभीर अपराध था।
यदि चोर पकड़ा जाता, तो उसे कठोर दंड मिल सकता था। लेकिन समस्या यह थी कि चोरी
का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं था।
अकबर ने सभी की ओर देखते हुए कहा, “कल रात हार खजाने में था और आज सुबह गायब है।
इसका अर्थ है कि तुममें से किसी ने या किसी ऐसे व्यक्ति ने, जिसे तुममें से किसी ने
अंदर आने दिया, हार चुराया है। मैं चाहता हूँ कि चोर स्वयं सच कबूल कर ले।
यदि कोई व्यक्ति अभी अपना अपराध स्वीकार कर लेता है, तो मैं उसके अपराध पर विचार
करूँगा। लेकिन यदि बाद में प्रमाण के साथ पकड़ा गया, तो दंड बहुत कठोर होगा।”
दरबार में खड़े लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कोई कुछ नहीं बोला।
अकबर ने फिर पूछा, “क्या किसी ने रात में खजाने के पास किसी अजनबी को देखा था?”
सभी ने सिर हिलाकर इनकार कर दिया।
तभी बीरबल, जो अब तक चुपचाप सब कुछ देख रहे थे, आगे आए। उन्होंने सभी
संदिग्धों को ध्यान से देखा। कोई अपने हाथ मल रहा था, कोई जमीन की ओर देख रहा था
और कोई बार-बार अपने कपड़े ठीक कर रहा था। बीरबल ने कुछ नहीं कहा। वे बस उनके
चेहरों और हाव-भाव को पढ़ते रहे।
अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल, तुम्हें क्या लगता है? इनमें से चोर कौन हो सकता
है?”
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “जहाँपनाह, अभी यह कहना कठिन है। बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाना उचित
नहीं होगा।”
“तो प्रमाण कैसे मिलेगा?” अकबर ने पूछा।
बीरबल ने उत्तर दिया, “चोर स्वयं अपने व्यवहार से अपना राज खोल देगा।”
दरबारियों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कुछ को बीरबल की बात समझ नहीं आई। अकबर ने
उत्सुकता से पूछा, “वह कैसे?”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, चोर कितना भी चालाक क्यों न हो, उसके मन में अपने अपराध का
डर अवश्य रहता है। वह डर कभी न कभी उसके व्यवहार में दिखाई देता है। हमें केवल उस
डर को पहचानना होगा।”
अकबर मुस्कुराए। वे बीरबल की बुद्धि से परिचित थे। उन्होंने कहा, “ठीक है,
बीरबल। तुम्हें
इस मामले की जाँच की पूरी अनुमति है।”
बीरबल ने सभी संदिग्धों को गौर से देखा और कहा, “मैं आज ही चोर को खोजने का
प्रयास करूँगा।”
इसके बाद बीरबल ने खजाने के अधिकारी से कुछ सवाल किए। उन्होंने पूछा कि हार
किस संदूक में रखा गया था, संदूक की चाबी किसके पास रहती थी, कमरे में कितने दरवाजे थे
और रात में पहरेदार किस क्रम से ड्यूटी बदलते थे। अधिकारी ने सभी प्रश्नों के
उत्तर दिए।
बीरबल ने पूछा, “क्या खजाने के कमरे का दरवाजा रात में बंद था?”
“जी हाँ।”
“और चाबी?”
“चाबी मेरे पास रहती है।”
“क्या रात में किसी ने आपसे चाबी माँगी?”
“नहीं, हुजूर।”
बीरबल ने कुछ देर सोचा। फिर बोले, “तो चोरी करने वाले को कमरे के भीतर जाने की
जानकारी और अवसर दोनों थे।”
उन्होंने पहरेदारों से भी अलग-अलग प्रश्न किए। पहले पहरेदार ने बताया कि उसने
रात के पहले पहर में निगरानी की थी। दूसरे ने कहा कि उसने आधी रात के आसपास ड्यूटी
संभाली। तीसरे ने सुबह तक पहरा दिया था।
बीरबल ने पूछा, “क्या तुमने रात में कोई आवाज सुनी?”
पहले पहरेदार ने कहा, “नहीं।”
दूसरे ने कहा, “मुझे भी कुछ असामान्य नहीं लगा।”
तीसरे ने थोड़ा सोचकर कहा, “हुजूर, मुझे ऐसा लगा था जैसे आधी रात के बाद किसी के कदमों की
हल्की आवाज आई हो, लेकिन मैंने सोचा कि शायद महल का कोई सेवक जा रहा होगा।”
बीरबल की आँखों में चमक आ गई।
“तुमने किसी को देखा था?”
“नहीं, हुजूर।”
“आवाज किस दिशा से आई थी?”
पहरेदार ने दिशा बताई।
बीरबल ने उस दिशा को ध्यान से देखा। फिर उन्होंने कहा, “ठीक है। अभी किसी को
गिरफ्तार मत करना।”
अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “क्या तुमने कुछ पता लगा लिया?”
“अभी नहीं, जहाँपनाह। लेकिन मुझे लगता है कि चोर ने कुछ ऐसा अवश्य
छोड़ा है, जिसे उसने स्वयं शायद देखा भी नहीं।”
अकबर ने पूछा, “क्या?”
बीरबल मुस्कुराए, “उसका डर।”
उस दिन बीरबल ने किसी पर आरोप नहीं लगाया। उन्होंने सभी संदिग्धों को जाने
दिया, लेकिन उन्हें आदेश दिया कि जब तक जाँच पूरी न हो, कोई भी महल से बाहर नहीं
जाएगा। इसके बाद बीरबल खजाने के उस कमरे में गए जहाँ से हार चोरी हुआ था।
कमरा बहुत सुरक्षित था। दीवारें मोटी थीं, खिड़कियाँ छोटी थीं और
दरवाजे पर मजबूत ताला लगा था। कमरे के भीतर कई संदूक और अलमारियाँ थीं। बीरबल ने
हर कोने को ध्यान से देखा। उन्होंने फर्श पर भी नजर डाली। कहीं कोई टूटी हुई वस्तु,
कपड़े का
टुकड़ा या पैरों के निशान मिल सकते थे, लेकिन कुछ खास दिखाई नहीं दिया।
तभी उनकी नजर कमरे के एक कोने में पड़ी। वहाँ एक छोटी-सी लकड़ी की मेज थी। मेज
पर धूल की हल्की परत जमा थी। बीरबल ने उंगली से उस धूल को छुआ और देखा कि वहाँ
किसी चीज के खिसकने का निशान था।
उन्होंने खजाने के अधिकारी से पूछा, “यह मेज यहाँ कब से है?”
“बहुत समय से, हुजूर।”
“क्या कल रात इसे किसी ने हटाया था?”
अधिकारी ने सिर हिलाया, “मुझे जानकारी नहीं।”
बीरबल ने मेज के नीचे देखा। वहाँ धूल में एक बहुत हल्का-सा निशान था। ऐसा लगता
था जैसे किसी का पैर वहाँ कुछ समय के लिए पड़ा हो। लेकिन वह निशान इतना अस्पष्ट था
कि उससे किसी व्यक्ति की पहचान करना संभव नहीं था।
बीरबल ने कहा, “दिलचस्प।”
इसके बाद उन्होंने संदूक की जाँच की जिसमें हार रखा गया था। ताला टूटा नहीं
था। चाबी से ही संदूक खोला गया था। इसका अर्थ था कि चोर को चाबी की जानकारी थी या
उसने किसी तरह चाबी का इस्तेमाल किया था।
बीरबल ने अधिकारी से कहा, “कल रात चाबी कहाँ रखी गई थी?”
अधिकारी ने कहा, “मेरे कमरे में।”
“क्या तुम्हारे कमरे में कोई और भी आता-जाता है?”
अधिकारी ने कुछ सोचकर कहा, “मेरा एक सहायक अक्सर मेरे कमरे में आता है। वह हिसाब-किताब
में मेरी मदद करता है।”
“उसका नाम?”
“रघुनाथ।”
बीरबल ने तुरंत रघुनाथ को बुलाने को कहा।
कुछ देर बाद एक दुबला-पतला युवक दरबार में आया। वह लगभग तीस वर्ष का था। उसने
साधारण कपड़े पहने हुए थे और उसके चेहरे पर घबराहट थी।
उसने झुककर बीरबल को प्रणाम किया।
बीरबल ने उससे सामान्य ढंग से पूछा, “तुम खजाने के अधिकारी के सहायक हो?”
“जी, हुजूर।”
“कल रात तुम कहाँ थे?”
“मैं अपने घर पर था।”
“क्या तुम दिन में खजाने के कमरे में गए थे?”
“जी... हाँ, कुछ हिसाब की पर्चियाँ लेकर गया था।”
“कितनी देर रुके?”
“बस थोड़ी देर।”
बीरबल ने उसकी आँखों में देखा। रघुनाथ ने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं।
बीरबल ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने केवल इतना पूछा, “क्या तुम्हें पता था कि
महारानी का हार खजाने में रखा गया है?”
रघुनाथ ने घबराकर कहा, “नहीं, हुजूर।”
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “मैंने तो यह पूछा ही नहीं था कि तुम्हें पता था या नहीं।
मैंने केवल पूछा था कि हार के बारे में तुम्हें पता था या नहीं।”
रघुनाथ का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।
दरबार में बैठे कुछ लोग मुस्कुराने लगे। अकबर ने बीरबल की ओर देखा। बीरबल ने
रघुनाथ को ध्यान से देखा, लेकिन अभी भी उस पर कोई आरोप नहीं लगाया।
“तुम जा सकते हो,” बीरबल ने कहा।
रघुनाथ ने राहत की साँस ली और वहाँ से चला गया।
अकबर ने धीरे से पूछा, “बीरबल, क्या तुम्हें उसी पर शक है?”
बीरबल ने कहा, “शक है, लेकिन प्रमाण नहीं।”
“उसके व्यवहार से तुम्हें क्या पता चला?”
“जहाँपनाह, जब मैंने उससे पूछा कि उसे हार के बारे में पता था या नहीं,
तो वह घबरा
गया। इसका अर्थ हो सकता है कि वह कुछ जानता है। लेकिन केवल घबराहट अपराध का प्रमाण
नहीं है।”
अकबर ने सिर हिलाया।
बीरबल कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने कहा, “चोर को पकड़ने के लिए हमें
ऐसा जाल बिछाना होगा जिसमें निर्दोष व्यक्ति भी बिना डर के रहे, लेकिन अपराधी
अपने मन के भय के कारण स्वयं फँस जाए।”
अगली सुबह बीरबल ने बादशाह से एक विचित्र योजना की अनुमति माँगी।
“जहाँपनाह,” उन्होंने कहा, “आज रात मैं महल के सभी संदिग्ध लोगों को एक
स्थान पर बुलाऊँगा। मैं उन्हें एक ऐसी बात बताऊँगा जिससे उन्हें लगेगा कि चोर का
पता चल सकता है।”
अकबर ने पूछा, “क्या बात?”
बीरबल ने रहस्यमय मुस्कान के साथ कहा, “यह बात अभी केवल मुझे और
आपको पता रहे तो अच्छा होगा।”
अकबर ने हँसते हुए कहा, “ठीक है, बीरबल। मैं तुम्हारी योजना में बाधा नहीं डालूँगा।”
उस रात महल के एक बड़े कक्ष में सभी संदिग्ध लोगों को बुलाया गया। पहरेदार,
खजाने का
अधिकारी, उसका सहायक रघुनाथ और वे सेवक जो उस रात महल के उस हिस्से में मौजूद थे,
सभी वहाँ
उपस्थित थे।
बीरबल उनके सामने खड़े हुए। उनके हाथ में कुछ छोटी-छोटी लकड़ियाँ थीं।
उन्होंने कहा, “तुम सभी जानते हो कि शाही हार चोरी हुआ है। आज मुझे एक ऐसी
चीज मिली है जिससे चोर की पहचान हो सकती है।”
सभी लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
बीरबल ने आगे कहा, “इनमें से प्रत्येक व्यक्ति को एक-एक लकड़ी दी जाएगी। तुम
सभी इन लकड़ियों को रात भर अपने पास रखोगे। सुबह जो व्यक्ति चोर होगा, उसकी लकड़ी
अन्य लकड़ियों से अलग मिलेगी।”
दरबार में हलचल मच गई।
एक पहरेदार ने पूछा, “लेकिन हुजूर, यह कैसे संभव है?”
बीरबल ने गंभीरता से कहा, “यह साधारण लकड़ी नहीं है। मैंने इस पर विशेष जादुई मंत्र
लगाया है। चोर की लकड़ी रात में एक अंगुल बढ़ जाएगी।”
यह सुनते ही सभी लोग हैरान रह गए।
बीरबल ने सभी को एक-एक समान लंबाई की लकड़ी दे दी।
रघुनाथ ने अपनी लकड़ी हाथ में लेते समय बीरबल की ओर देखा। उसके चेहरे पर डर की
एक हल्की छाया दिखाई दी।
बीरबल ने कहा, “ध्यान रहे, किसी ने अपनी लकड़ी को काटने या बदलने की कोशिश की, तो भी मुझे पता
चल जाएगा। सुबह हम सभी की लकड़ियों को एक साथ रखकर देखेंगे।”
सभी को उनके-अपने कमरों में भेज दिया गया।
असल में बीरबल की लकड़ियों में कोई जादू नहीं था। वे पूरी तरह साधारण थीं।
बीरबल जानते थे कि चोर यदि सचमुच डर गया, तो वह रात में अपनी लकड़ी को काट सकता है,
ताकि सुबह वह
बढ़ी हुई न दिखाई दे। यही बीरबल की योजना थी।
सुबह होते ही सभी लोग फिर उसी कक्ष में इकट्ठा हुए। बीरबल ने एक-एक करके उनकी
लकड़ियाँ मँगवाईं। सभी लकड़ियाँ लगभग समान लंबाई की थीं।
लेकिन रघुनाथ की लकड़ी बाकी लकड़ियों से छोटी थी।
अकबर ने आश्चर्य से उसे देखा।
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “तो आखिरकार हमें अपना चोर मिल गया।”
रघुनाथ काँपने लगा।
अकबर ने गंभीर स्वर में पूछा, “रघुनाथ, तुम्हारी लकड़ी छोटी क्यों है?”
रघुनाथ के पास कोई उत्तर नहीं था।
बीरबल ने कहा, “मैंने कहा था कि चोर की लकड़ी एक अंगुल बढ़ जाएगी। असल में
लकड़ी बढ़ने वाली नहीं थी। मैंने यह केवल चोर के मन में डर पैदा करने के लिए कहा
था। निर्दोष व्यक्ति अपनी लकड़ी को वैसे ही रखेगा, लेकिन जिसे चोरी का भय होगा,
वह सोचेगा कि
सुबह लकड़ी बड़ी हो जाएगी। इसलिए वह रात में उसे काट देगा।”
रघुनाथ के माथे पर पसीना आ गया।
बीरबल ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “तुमने सोचा कि लकड़ी बढ़ जाएगी, इसलिए तुमने
उसे काट दिया। लेकिन तुम्हारे इस डर ने तुम्हारा अपराध बता दिया।”
रघुनाथ कुछ क्षण तक चुप रहा। फिर अचानक वह घुटनों के बल बैठ गया।
“मुझे क्षमा कर दीजिए, हुजूर!” वह रोते हुए बोला।
पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
अकबर ने पूछा, “हार कहाँ है?”
रघुनाथ ने सिर झुकाकर कहा, “मैंने उसे अपने घर के पीछे मिट्टी के एक घड़े में छिपाया
है।”
तुरंत सैनिकों को भेजा गया। थोड़ी देर बाद वे वही कीमती हार लेकर लौटे। हार
सुरक्षित था।
अकबर ने बीरबल की ओर देखा और मुस्कुराए।
“बीरबल, तुमने फिर साबित कर दिया कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, उसका अपना डर
ही उसके लिए सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है।”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, यही तो बात है। जब कोई व्यक्ति गलत काम करता है, तो उसके मन में
डर पैदा हो जाता है। वह डर उसे सामान्य व्यवहार नहीं करने देता। कभी उसकी आँखें सच
बता देती हैं, कभी उसकी जुबान और कभी उसकी छोटी-सी गलती उसके अपराध का
रहस्य खोल देती है।”
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “आज से यह घटना हमारे दरबार में एक उदाहरण के रूप में याद
रखी जाएगी।”
एक दरबारी ने पूछा, “लेकिन हुजूर, इस घटना को क्या नाम दिया जाए?”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “जिसके मन में चोरी का डर हो, वही सबसे पहले अपने व्यवहार
से अपनी चोरी का संकेत दे देता है। इसलिए कहा जा सकता है—‘चोर की दाढ़ी
में तिनका।’”
दरबार में हँसी गूँज उठी।
अकबर ने कहा, “बिल्कुल सही! अपराध करने वाला व्यक्ति बाहर से चाहे कितना
भी सामान्य दिखने की कोशिश करे, उसके मन का डर कहीं न कहीं दिखाई दे ही जाता है।”
उस दिन रघुनाथ को उसके अपराध के अनुसार दंड दिया गया। शाही हार वापस खजाने में
रख दिया गया और खजाने की सुरक्षा पहले से भी अधिक मजबूत कर दी गई। बीरबल की
बुद्धिमानी की एक बार फिर पूरे राज्य में चर्चा होने लगी।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद एक और विचित्र
मामला अकबर के सामने आया। इस बार चोरी शाही खजाने की नहीं, बल्कि एक गरीब व्यापारी की
थी। व्यापारी ने दावा किया कि उसके घर से सोने की एक थैली गायब हो गई है। उसने
अपने ही नौकरों पर चोरी का आरोप लगाया था। मामला इतना उलझा हुआ था कि किसी को समझ
नहीं आ रहा था कि सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन।
अकबर ने जब यह मामला सुना, तो उन्होंने तुरंत बीरबल को बुलाया।
“बीरबल,” अकबर ने कहा, “लगता है तुम्हारे लिए एक और परीक्षा तैयार है।”
बीरबल मुस्कुराए।
“जहाँपनाह, यदि मामला सच का है, तो उसे सामने आने में देर
नहीं लगेगी।”
अकबर ने कहा, “तो चलो, देखते हैं इस बार चोर की दाढ़ी में तिनका कहाँ छिपा है।”
और इस तरह एक नई पहेली की शुरुआत हुई...
ज़रूर। अब भाग 2 को पूरी तरह पैराग्राफ
फॉर्मेट में प्रस्तुत करता हूँ।
पिछली घटना को कुछ ही दिन बीते थे कि एक सुबह बादशाह अकबर के दरबार में एक
वृद्ध व्यापारी बहुत घबराया हुआ पहुँचा। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और चेहरे पर
चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह बार-बार अपने हाथ जोड़कर बादशाह से न्याय की गुहार
लगा रहा था। अकबर ने उसे शांत होने का संकेत दिया और पूछा कि आखिर ऐसी क्या बात हो
गई है जिसके कारण वह इतना परेशान है। व्यापारी ने काँपती आवाज में बताया कि उसका
नाम सेठ हरिदास है और वह पिछले कई वर्षों से आगरा में कपड़े और मसालों का व्यापार
करता है। उसके पास व्यापार से जमा की हुई सोने की एक बड़ी थैली थी, जिसमें कई सौ
सोने की अशर्फियाँ थीं। वह थैली उसने अपने घर के एक गुप्त संदूक में रखी थी,
लेकिन पिछली
रात जब उसने संदूक खोला तो सोने की थैली गायब थी। व्यापारी ने कहा कि उसके घर में
उस रात उसके अलावा केवल उसके तीन नौकर मौजूद थे और उसे पूरा विश्वास है कि उन्हीं
तीनों में से किसी एक ने सोना चुराया है।
अकबर ने व्यापारी की बात ध्यान से सुनी और पूछा कि क्या संदूक का ताला टूटा
हुआ था। व्यापारी ने कहा कि ताला बिल्कुल ठीक था और उसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती
के निशान नहीं थे। यह सुनकर अकबर ने पूछा कि फिर उसे कैसे पता कि उसके नौकरों में
से किसी ने चोरी की है। व्यापारी ने उत्तर दिया कि उसके घर में सोने की थैली के
बारे में केवल वही और उसके तीन नौकर जानते थे। उसने यह भी बताया कि उसका परिवार उस
समय गाँव गया हुआ था और घर में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं आया था। अकबर ने तुरंत
तीनों नौकरों को दरबार में बुलाने का आदेश दिया। थोड़ी देर बाद तीनों नौकर दरबार
में उपस्थित हुए। पहला नौकर गोपाल था, जो पिछले दस वर्षों से व्यापारी के घर में काम
करता था। दूसरा नौकर रहीम था, जो लगभग पाँच वर्षों से वहाँ काम कर रहा था और व्यापारी का
काफी भरोसेमंद माना जाता था। तीसरा नौकर मोहन था, जो अभी कुछ ही महीनों पहले
व्यापारी के यहाँ काम पर आया था।
अकबर ने तीनों को ध्यान से देखा और पूछा कि पिछली रात वे कहाँ थे। गोपाल ने
तुरंत कहा कि वह रात को रसोई के पास वाले कमरे में सोया था और उसे किसी प्रकार की
आवाज सुनाई नहीं दी। रहीम ने कहा कि वह दुकान के पीछे बने छोटे कमरे में सो रहा था
और पूरी रात वहीं था। मोहन ने बताया कि वह आँगन के पास सोया था और आधी रात के बाद
उसे प्यास लगी थी, इसलिए वह पानी पीने के लिए उठा था। उसने कहा कि उस समय उसने
व्यापारी के कमरे का दरवाजा बंद देखा था और फिर वापस जाकर सो गया। तीनों की बातें
सुनने के बाद अकबर ने व्यापारी की ओर देखा और पूछा कि क्या इनमें से किसी पर उसे
विशेष रूप से शक है। व्यापारी ने कुछ देर सोचा और कहा कि उसे सबसे अधिक शक मोहन पर
है, क्योंकि वह नया नौकर था और घर के बारे में उसे बहुत कम जानकारी थी। अकबर ने
कहा कि केवल नया होने के कारण किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं है। उन्होंने बीरबल की
ओर देखा और कहा कि अब इस मामले की जिम्मेदारी उनकी है।
बीरबल धीरे-धीरे अपनी जगह से उठे और तीनों नौकरों के सामने जाकर खड़े हो गए।
उन्होंने सबसे पहले गोपाल से पूछा कि वह कितने समय से व्यापारी के यहाँ काम कर रहा
है। गोपाल ने कहा कि दस साल से। बीरबल ने पूछा कि क्या इस दौरान उस पर कभी चोरी का
आरोप लगा। गोपाल ने कहा कि नहीं, कभी नहीं। इसके बाद बीरबल ने रहीम से वही प्रश्न किया। रहीम
ने बताया कि उसने पाँच वर्षों में कभी व्यापारी का विश्वास नहीं तोड़ा। अंत में
बीरबल ने मोहन से पूछा कि वह कब से काम कर रहा है। मोहन ने कहा कि उसे यहाँ काम
करते हुए चार महीने हुए हैं। बीरबल ने उससे पूछा कि क्या वह व्यापारी के कमरे में
कभी गया है। मोहन ने कहा कि वह केवल सफाई करने के लिए एक-दो बार गया था। बीरबल ने
पूछा कि क्या उसे संदूक के बारे में पता था। मोहन ने तुरंत कहा कि उसे संदूक के
बारे में पता था, लेकिन उसे यह नहीं मालूम था कि उसमें सोना रखा है।
बीरबल ने मोहन के उत्तर को ध्यान से सुना। फिर उन्होंने अचानक पूछा कि संदूक
कमरे के किस कोने में रखा है। मोहन ने बिना सोचे तुरंत बता दिया कि वह व्यापारी के
बिस्तर के दाईं ओर वाली दीवार के पास रखा है। व्यापारी ने आश्चर्य से मोहन की ओर
देखा और कहा कि उसे यह बात कैसे पता है। मोहन तुरंत घबरा गया और बोला कि उसने सफाई
करते समय देखा था। बीरबल ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके मन में एक बात दर्ज हो गई। उन्होंने
व्यापारी से कहा कि अभी किसी को दोषी न ठहराया जाए। वे पहले पूरी घटना को समझना
चाहते हैं।
बीरबल व्यापारी के घर पहुँचे और सबसे पहले उस कमरे की जाँच की जहाँ संदूक रखा
था। संदूक मजबूत लकड़ी का बना था और उसके ऊपर लोहे की पट्टियाँ लगी थीं। ताला बाहर
से बिल्कुल सही था। बीरबल ने व्यापारी से पूछा कि संदूक की चाबी कहाँ रहती थी।
व्यापारी ने बताया कि चाबी हमेशा उसके कमरे में रखी एक छोटी लकड़ी की पेटी में
रहती थी। बीरबल ने पूछा कि उस पेटी की दूसरी चाबी किसके पास है। व्यापारी ने कहा
कि दूसरी चाबी उसके बड़े बेटे के पास थी, लेकिन वह पिछले तीन दिनों से गाँव गया हुआ था।
बीरबल ने पूछा कि क्या उसके नौकरों को चाबी वाली पेटी के बारे में पता था।
व्यापारी ने कहा कि हाँ, तीनों नौकरों ने उसे कई बार देखा था, लेकिन चाबी कहाँ रखी जाती
है, यह बात उसने उन्हें कभी नहीं बताई थी।
बीरबल ने कमरे में चारों तरफ ध्यान से देखा। खिड़की बंद थी। दरवाजे पर कोई
निशान नहीं था। फर्श पर भी कोई स्पष्ट पदचिह्न नहीं थे। उन्होंने संदूक को छुआ और
उसके चारों ओर झुककर देखा। तभी उनकी नजर संदूक के पास फर्श पर पड़े एक छोटे-से
भूरे धब्बे पर पड़ी। उन्होंने उसे उंगली से छुआ और सूँघा। उसमें हल्की-सी मिट्टी
और तेल की गंध थी। बीरबल ने व्यापारी से पूछा कि क्या उसके घर में कोई ऐसा व्यक्ति
है जो अक्सर तेल या मिट्टी का काम करता है। व्यापारी ने कहा कि ऐसा तो कोई नहीं है,
लेकिन मोहन
कभी-कभी दुकान के पीछे रखे दीपकों में तेल भरता है। बीरबल ने इस बात को भी अपने मन
में रख लिया।
इसके बाद बीरबल ने तीनों नौकरों को अलग-अलग बुलाकर उसी घटना के बारे में कई
बार प्रश्न किए। उनका उद्देश्य केवल यह जानना था कि कौन झूठ बोल रहा है। गोपाल ने
कहा कि उसने रात को कुछ नहीं सुना। रहीम ने भी कहा कि उसने कुछ नहीं देखा। मोहन ने
कहा कि वह आधी रात को पानी पीने उठा था। बीरबल ने उससे पूछा कि पानी कहाँ से लिया
था। मोहन ने कहा कि आँगन के पास रखे घड़े से। बीरबल ने पूछा कि क्या उस समय उसने
व्यापारी के कमरे के सामने से होकर जाना पड़ा। मोहन ने कहा कि नहीं, वह पीछे की तरफ
से गया था। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने कमरे की कोई आवाज सुनी। मोहन ने कहा कि
नहीं। फिर बीरबल ने पूछा कि व्यापारी के कमरे का दरवाजा किस दिशा में खुलता है।
मोहन ने तुरंत उत्तर दिया कि दरवाजा अंदर की ओर खुलता है। बीरबल ने मुस्कुराकर कहा
कि वह तो ठीक है और उसे जाने दिया।
कुछ देर बाद बीरबल ने व्यापारी से कहा कि वे एक छोटा-सा प्रयोग करना चाहते
हैं। उन्होंने घर के तीन समान कमरों में तीन समान संदूक रखवाए और प्रत्येक संदूक
पर एक साधारण ताला लगाया। फिर उन्होंने तीनों नौकरों को बुलाकर कहा कि उन्हें पता
चल गया है कि चोरी किसने की है, लेकिन वे अभी उसका नाम नहीं बताएँगे। यह सुनते ही तीनों
नौकरों के चेहरे बदल गए। बीरबल ने कहा कि असली चोर को एक अंतिम अवसर दिया जा रहा
है। यदि वह रात होने से पहले चोरी का सामान वापस कर देगा, तो बादशाह से उसके लिए कम
दंड की प्रार्थना की जाएगी। लेकिन यदि वह झूठ बोलता रहा, तो उसके अपराध का प्रमाण
स्वयं सामने आ जाएगा।
यह सुनकर तीनों नौकर अपने-अपने काम पर चले गए। बीरबल ने व्यापारी से कहा कि
किसी पर नजर रखने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन घर के सभी दरवाजे बंद रखे जाएँ। इसके बाद
वे चुपचाप एक कोने में बैठकर घर की गतिविधियों को देखने लगे। कुछ समय बीत गया।
गोपाल सामान्य रूप से काम करता रहा। रहीम भी दुकान की सफाई में व्यस्त रहा। लेकिन
मोहन बार-बार इधर-उधर देख रहा था। कभी वह व्यापारी के कमरे के पास जाता, कभी आँगन में
लौट आता। बीरबल ने उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी, लेकिन उसे रोका नहीं।
शाम होने लगी। तभी मोहन चुपचाप घर के पीछे वाले हिस्से में गया। बीरबल कुछ
दूरी से उसका पीछा करने लगे। मोहन वहाँ एक पुराने लकड़ी के बक्से के पास गया और
कुछ देर उसे देखने के बाद वापस लौट आया। बीरबल ने बक्से को तुरंत नहीं खोला।
उन्होंने सोचा कि यदि उसमें कुछ छिपा है तो उसे स्वयं निकालने का प्रयास करने दिया
जाए। रात में जब सभी सोने की तैयारी कर रहे थे, बीरबल ने अचानक घोषणा की कि
अगली सुबह सभी नौकरों की तलाशी ली जाएगी। यह सुनते ही मोहन का चेहरा फिर से पीला
पड़ गया।
अगली सुबह बीरबल ने तीनों नौकरों को एक कमरे में बुलाया। उनके सामने तीन
छोटे-छोटे कपड़े के थैले रखे थे। बीरबल ने कहा कि इनमें से एक थैले में वह चीज है
जिससे चोरी का रहस्य खुल जाएगा। उन्होंने पहले गोपाल की तलाशी ली। कुछ नहीं मिला।
फिर रहीम की तलाशी ली गई। उसके पास भी कुछ नहीं था। अंत में मोहन की तलाशी शुरू
हुई। उसकी जेब से एक छोटी लोहे की चाबी निकली। व्यापारी ने तुरंत कहा कि यह उसकी
चाबी जैसी दिखती है। बीरबल ने चाबी को ध्यान से देखा और कहा कि यह संदूक की चाबी
नहीं, बल्कि चाबी की नकल बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक अधूरी चाबी है।
मोहन घबरा गया। उसने कहा कि वह चाबी उसकी नहीं है और किसी ने उसकी जेब में रख
दी होगी। बीरबल ने पूछा कि अगर किसी ने उसकी जेब में चाबी रखी है, तो उसे इसकी
जानकारी क्यों नहीं हुई। मोहन के पास कोई उत्तर नहीं था। फिर बीरबल ने कहा कि अभी
भी केवल चाबी मिलने से चोरी सिद्ध नहीं होती। उन्होंने व्यापारी से कहा कि वह उस
पुराने बक्से को लेकर आएँ जिसे मोहन पिछली शाम देख रहा था। बक्सा खोला गया तो उसके
भीतर कुछ पुराने कपड़े, तेल की बोतलें और एक छोटा लोहे का औजार मिला। बीरबल ने औजार
उठाया और उसे ध्यान से देखा। उसके सिरे पर वही मिट्टी और तेल का मिश्रण लगा था जो
उन्हें संदूक के पास मिला था।
अब बीरबल ने मोहन से कहा कि वह सच बोल दे। लेकिन मोहन फिर भी इनकार करता रहा।
उसने कहा कि उसने चोरी नहीं की और वह निर्दोष है। बीरबल ने उसकी ओर देखा और शांत
स्वर में कहा कि असली चोर अक्सर चोरी से नहीं, बल्कि अपने झूठ को बचाने की
कोशिश से पकड़ा जाता है। उन्होंने व्यापारी से कहा कि अब संदूक की चाबी लाने की
आवश्यकता नहीं है। फिर उन्होंने एक और बात कही जिसने सभी को चौंका दिया। बीरबल ने
कहा कि सोने की थैली अभी भी घर में है।
व्यापारी ने हैरान होकर पूछा कि उन्हें यह कैसे पता। बीरबल ने कहा कि यदि चोर
सोना लेकर घर से बाहर गया होता, तो उसके पास उसे छिपाने का कोई सुरक्षित तरीका नहीं होता।
वह रात के अँधेरे में बाहर जाने का जोखिम नहीं लेता, क्योंकि महल की ओर जाने
वाले रास्तों पर पहरा था और व्यापारी के घर के आसपास भी लोग रहते थे। इसलिए उसने
सोना घर के भीतर ही कहीं छिपाया होगा। फिर बीरबल ने मोहन की ओर देखते हुए कहा कि
जिस व्यक्ति ने सोना छिपाया है, वह जानता है कि घर के कौन-से हिस्से ऐसे हैं जहाँ लंबे समय
तक कोई नहीं जाता। मोहन ने तुरंत अपनी नजरें नीचे कर लीं।
बीरबल ने घर के पीछे रखे पुराने लकड़ी के बक्से को फिर से देखा। उन्होंने कहा
कि इस बक्से को हटाओ। जब बक्सा हटाया गया तो उसके नीचे मिट्टी थोड़ी-सी ढीली दिखाई
दी। बीरबल ने वहाँ खुदाई करवाने का आदेश दिया। कुछ ही क्षणों बाद मजदूरों को
मिट्टी के भीतर कपड़े में लिपटी एक भारी वस्तु मिली। व्यापारी ने जैसे ही कपड़ा
खोला, उसकी आँखें चमक उठीं। उसमें वही सोने की थैली थी जो पिछली रात गायब हुई थी।
अब मोहन के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। वह बीरबल के सामने हाथ जोड़कर बैठ
गया और बोला कि उसने ही चोरी की थी। उसने बताया कि कुछ दिनों पहले उसे पता चला कि
व्यापारी के पास बहुत-सा सोना है। उसने चुपचाप चाबी की नकल बनाने की कोशिश की और
रात में संदूक खोलकर सोने की थैली निकाल ली। लेकिन वह डर गया कि रात में घर से
बाहर जाते समय पकड़ा जाएगा, इसलिए उसने सोना घर के पीछे बक्से के नीचे छिपा दिया। उसे
उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद वह मौका देखकर सोना निकाल लेगा और भाग जाएगा।
बीरबल ने कहा कि तुम्हारी सबसे बड़ी गलती सोना चुराना नहीं थी, बल्कि यह सोचना
था कि तुम अपने डर को छिपा लोगे। तुम्हारे हर कदम ने तुम्हारे बारे में कुछ न कुछ
बता दिया। तुम्हें संदूक की जगह पता थी, जबकि तुमने कहा था कि तुम्हें उसके बारे में
जानकारी नहीं थी। तुम्हारी जेब से चाबी बनाने का औजार मिला। संदूक के पास वही तेल
और मिट्टी का निशान मिला जो तुम्हारे सामान पर था। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी
कि जब मैंने कहा कि चोर का पता चल चुका है, तब तुम्हारा व्यवहार बदल
गया। तुम बार-बार उस स्थान के आसपास जा रहे थे जहाँ तुमने सोना छिपाया था।
तुम्हारा डर ही तुम्हारी सबसे बड़ी गवाही बन गया।
व्यापारी ने बीरबल को धन्यवाद दिया और कहा कि यदि वे न होते तो शायद वह अपने
ही निर्दोष नौकरों पर शक करता रहता। बीरबल ने कहा कि किसी पर केवल शक के आधार पर
आरोप लगाना उचित नहीं है। न्याय वही है जिसमें सत्य को प्रमाण के साथ सामने लाया
जाए। अकबर को जब पूरी घटना की जानकारी मिली तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा
कि बीरबल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बुद्धि केवल कठिन प्रश्नों का उत्तर देने
का नाम नहीं है, बल्कि सही समय पर सही बात को पहचानना भी बुद्धिमानी है।
उस शाम अकबर और बीरबल महल की छत पर टहल रहे थे। सूर्य अस्त हो रहा था और आकाश
लालिमा से भर गया था। अकबर ने मुस्कुराकर कहा, “बीरबल, मुझे लगता है
कि चोरों के लिए सबसे बड़ा शत्रु कोई पहरेदार या सैनिक नहीं, बल्कि उनका
अपना डर है।” बीरबल ने उत्तर दिया, “बिल्कुल जहाँपनाह। इंसान दूसरों से झूठ बोल सकता
है, लेकिन अपने मन से नहीं। अपराध करने के बाद मन में पैदा हुआ डर व्यक्ति को ऐसी
गलतियाँ करवाता है जिन्हें वह सामान्य अवस्था में कभी नहीं करता। इसलिए कहा जाता
है कि चोर की दाढ़ी में तिनका होता है। वह चाहे जितना छिपाने की कोशिश करे,
उसका कोई न कोई
व्यवहार उसके अपराध की ओर संकेत कर देता है।”
अकबर ने हँसते हुए कहा, “लेकिन तुम्हारी बुद्धि के सामने तो चोर की दाढ़ी का तिनका
दूर से ही दिखाई दे जाता है।” बीरबल भी मुस्कुरा पड़े और बोले, “जहाँपनाह,
तिनका तो हमेशा
वहीं रहता है, बस उसे देखने वाली नजर चाहिए।” दोनों हँसते हुए आगे बढ़ गए।
लेकिन उसी समय महल के एक सैनिक ने आकर खबर दी कि शहर के दूसरे हिस्से में भी एक
अजीब चोरी हुई है। इस बार मामला और भी रहस्यमय था, क्योंकि चोरी ऐसी जगह हुई
थी जहाँ किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश की कोई संभावना ही नहीं थी। अकबर ने बीरबल
की ओर देखा और कहा, “लगता है आज तुम्हारी बुद्धि को एक और चुनौती मिलने वाली
है।” बीरबल ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जहाँपनाह, जब तक सच छिपा है, तब तक उसे
खोजने का आनंद भी बना रहेगा।”
बिल्कुल। अब भाग 3 जारी रखते हैं। इस भाग में
रहस्यमय चोरी की नई घटना सामने आएगी और बीरबल अपनी बुद्धि से असली चोर तक पहुँचने
की कोशिश करेंगे। पूरा भाग पैराग्राफ फॉर्मेट में रहेगा।
अगली सुबह आगरा के राजमहल में सामान्य दिनों की तरह चहल-पहल थी, लेकिन बादशाह
अकबर के मन में पिछली रात मिली खबर को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी। रात में महल के
एक सैनिक ने सूचना दी थी कि शहर के प्रसिद्ध सुनार लाला गोविंददास की दुकान से कई
कीमती आभूषण चोरी हो गए हैं। सुनार ने दावा किया था कि चोरी ऐसी रात में हुई जब
उसकी दुकान बाहर से पूरी तरह बंद थी और उसके अनुसार चोर के अंदर प्रवेश करने का
कोई रास्ता ही नहीं था। इस घटना ने अकबर को भी आश्चर्य में डाल दिया था, क्योंकि यदि
दुकान का दरवाजा बंद था, खिड़कियाँ अंदर से बंद थीं और पहरेदारों ने किसी को
आते-जाते नहीं देखा था, तो फिर चोरी हुई कैसे? अकबर ने तुरंत बीरबल को
बुलाया और पूरी घटना की जानकारी दी। बीरबल ने ध्यानपूर्वक बात सुनी और बोले कि यदि
सचमुच बाहर से कोई अंदर नहीं आया, तो दो ही संभावनाएँ हो सकती हैं—या तो चोरी अंदर मौजूद किसी
व्यक्ति ने की है, या फिर चोरी की कहानी में ही कोई ऐसा रहस्य छिपा है जिसे
अभी कोई समझ नहीं पा रहा।
अकबर ने कहा कि लाला गोविंददास स्वयं दरबार में उपस्थित है और उसके साथ उसके
दो कर्मचारी भी आए हैं। बीरबल ने कहा कि उन्हें तुरंत बुलाया जाए। थोड़ी देर बाद
एक भारी शरीर वाला, लगभग पचास वर्ष का व्यक्ति दरबार में आया। उसने रेशमी कपड़े
पहन रखे थे और उसके माथे पर चिंता की लकीरें थीं। उसके पीछे दो युवक खड़े थे।
सुनार ने बादशाह को सलाम करके कहा कि उसका वर्षों का व्यापार एक ही रात में संकट
में पड़ गया है। उसने बताया कि उसकी दुकान में सोने की अंगूठियाँ, चाँदी के कंगन,
हीरे की
बालियाँ और कुछ कीमती हार रखे थे। रात को दुकान बंद करके वह अपने घर चला गया था।
सुबह जब वह दुकान खोलने पहुँचा तो दरवाजा उसी तरह बंद मिला जैसा उसने रात को छोड़ा
था। लेकिन अंदर जाकर उसने देखा कि पीछे की अलमारी खुली हुई थी और उसमें रखे कई
कीमती आभूषण गायब थे। उसने तुरंत पहरेदारों को बुलाया, लेकिन किसी ने किसी संदिग्ध
व्यक्ति को वहाँ आते-जाते नहीं देखा था।
अकबर ने पूछा कि दुकान की चाबी किसके पास रहती थी। सुनार ने बताया कि मुख्य
चाबी उसके पास रहती थी और दूसरी चाबी उसके बड़े कर्मचारी नंदू के पास थी। तीसरा
व्यक्ति उसका नया सहायक श्याम था, जिसे काम पर आए केवल छह महीने हुए थे। अकबर ने पूछा कि क्या
नंदू या श्याम पर उसे शक है। सुनार ने कहा कि नंदू पिछले पंद्रह वर्षों से उसके
साथ काम कर रहा है और उसने कभी कोई बेईमानी नहीं की, जबकि श्याम नया था और उसे
दुकान के हर हिस्से की जानकारी धीरे-धीरे मिली थी। इसलिए उसे थोड़ा शक श्याम पर
था। बीरबल ने तुरंत कहा कि केवल नया कर्मचारी होने के कारण श्याम को दोषी नहीं
माना जा सकता। उन्होंने दोनों कर्मचारियों को ध्यान से देखा। नंदू शांत दिखाई दे
रहा था, जबकि श्याम बार-बार अपनी उंगलियाँ मरोड़ रहा था और कभी जमीन की ओर तो कभी
बीरबल की ओर देख रहा था।
बीरबल ने सबसे पहले नंदू से पूछा कि दुकान बंद करते समय उसने क्या-क्या किया
था। नंदू ने कहा कि उसने आभूषणों की गिनती की, अलमारी बंद की और फिर मुख्य
दरवाजे पर ताला लगाया। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने पीछे वाली खिड़की देखी थी। नंदू
ने कहा कि हाँ, उसने खिड़की बंद की थी। इसके बाद बीरबल ने श्याम से वही
प्रश्न किए। श्याम ने कहा कि वह उस समय दुकान के भीतर ही था और उसने फर्श साफ किया
था। जब दुकान बंद होने वाली थी, तब वह बाहर चला गया था। बीरबल ने पूछा कि वह किस रास्ते से
बाहर निकला। श्याम ने कहा कि वह मुख्य दरवाजे से निकला था। बीरबल ने पूछा कि क्या
उसने पीछे की खिड़की बंद होते देखी। श्याम ने कहा कि नहीं, उसने ध्यान नहीं दिया था।
बीरबल ने कुछ नहीं कहा और दोनों को जाने दिया।
इसके बाद बीरबल स्वयं लाला गोविंददास की दुकान पर पहुँचे। दुकान के बाहर दो
सैनिक पहरा दे रहे थे। बीरबल ने उनसे पूछा कि रात में उन्होंने क्या देखा। एक
सैनिक ने कहा कि उसने पूरी रात दुकान के सामने निगरानी रखी थी और किसी व्यक्ति को
दरवाजे के पास आते नहीं देखा। दूसरे सैनिक ने बताया कि आधी रात के समय थोड़ी देर
के लिए तेज हवा चली थी और कुछ धूल दुकान के सामने जमा हो गई थी। बीरबल ने जमीन की
ओर देखा। दुकान के मुख्य दरवाजे के सामने धूल पर कुछ पैरों के निशान थे, लेकिन वे
पुराने और नए निशानों के मिले-जुले निशान थे। बीरबल ने पूछा कि क्या सुबह दुकान
खुलने से पहले किसी ने यहाँ प्रवेश किया था। सैनिक ने कहा कि नहीं। बीरबल ने जमीन
पर पड़े एक छोटे-से धातु के टुकड़े को उठाया। वह किसी बहुत पतली चाबी या औजार का
हिस्सा लग रहा था। उन्होंने उसे अपनी जेब में रख लिया।
दुकान के अंदर जाकर बीरबल ने सबसे पहले उस अलमारी को देखा जिसमें से आभूषण
गायब हुए थे। अलमारी का ताला टूटा नहीं था। यह बात उन्हें बहुत महत्वपूर्ण लगी।
उन्होंने लाला गोविंददास से पूछा कि क्या अलमारी की भी कोई अलग चाबी है। सुनार ने
कहा कि हाँ, लेकिन वह चाबी हमेशा उसकी कमर में बँधी छोटी थैली में रहती थी। बीरबल ने पूछा
कि क्या रात को सोते समय भी चाबी उसके पास थी। सुनार ने कहा कि हाँ, चाबी पूरी रात
उसके पास थी। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने किसी को चाबी दिखाई थी। सुनार ने कहा कि
उसके दोनों कर्मचारियों ने उसे कई बार इस्तेमाल करते देखा था, लेकिन चाबी
कहाँ रखी जाती है, यह उन्हें नहीं पता था।
बीरबल ने अलमारी के चारों ओर ध्यान से देखा। उन्हें फर्श पर कुछ बहुत महीन
काले कण दिखाई दिए। उन्होंने उन्हें उंगली पर लेकर देखा। यह धातु की महीन धूल थी।
उन्होंने तुरंत नंदू से पूछा कि क्या दुकान में कभी ताले की मरम्मत हुई थी। नंदू
ने कहा कि पिछले महीने अलमारी का ताला थोड़ा अटक रहा था और एक लोहार ने उसे ठीक
किया था। बीरबल ने पूछा कि उस लोहार का नाम क्या था। नंदू ने नाम बताया। बीरबल ने
कहा कि उस लोहार को भी बुलाया जाए।
कुछ देर बाद लोहार दरबार में आया। बीरबल ने उससे पूछा कि क्या उसने अलमारी का
ताला ठीक किया था। उसने कहा कि हाँ। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने उसकी दूसरी चाबी
बनाई थी। लोहार ने कहा कि नहीं, उसने केवल ताले को साफ किया था। बीरबल ने पूछा कि क्या उस
समय नंदू उसके पास मौजूद था। लोहार ने कहा कि हाँ, नंदू उसके पास कुछ देर खड़ा
रहा था। बीरबल ने नंदू की ओर देखा। नंदू ने कहा कि वह केवल यह देखने गया था कि
ताला ठीक हो रहा है या नहीं। बीरबल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
अब बीरबल ने एक अजीब सवाल पूछा। उन्होंने लाला गोविंददास से कहा कि वह दुकान
में रखी सभी अलमारियों के ताले उन्हें दिखाए। सुनार ने ऐसा ही किया। बीरबल ने
प्रत्येक ताले को ध्यान से देखा। फिर उन्होंने अचानक कहा कि चोरी केवल एक अलमारी
से नहीं हुई है। सुनार ने आश्चर्य से पूछा कि उन्हें ऐसा क्यों लग रहा है। बीरबल
ने कहा कि यदि चोर ने केवल एक अलमारी खोली होती तो धातु की धूल केवल उसी स्थान पर
मिलती, लेकिन यहाँ दुकान के दो अलग-अलग हिस्सों में ऐसी धूल दिखाई दे रही है। इसका
अर्थ है कि किसी ने कम से कम दो ताले खोलने की कोशिश की थी। सुनार ने कहा कि दूसरी
अलमारी से कोई सामान चोरी नहीं हुआ था। बीरबल ने उत्तर दिया कि संभव है चोर ने
वहाँ चोरी करने की कोशिश की हो, लेकिन उसे कुछ मिला न हो या उसने अपना इरादा बदल दिया हो।
बीरबल ने फिर दोनों कर्मचारियों को बुलाया और कहा कि वह जानते हैं कि चोरी
करने वाला व्यक्ति दुकान की चाबी के बारे में अच्छी जानकारी रखता था। उन्होंने कहा
कि चोर ने मुख्य दरवाजे को नहीं छुआ, क्योंकि वह जानता था कि बाहर पहरा है। उसने अंदर
से अलमारी खोली और सामान निकाल लिया। अब प्रश्न यह था कि वह दुकान के अंदर आया
कैसे। इस प्रश्न का कोई उत्तर किसी के पास नहीं था। श्याम ने कहा कि शायद कोई पीछे
की खिड़की से आया होगा। बीरबल ने तुरंत पूछा कि यदि ऐसा था तो खिड़की पर कोई निशान
क्यों नहीं है। श्याम चुप हो गया।
बीरबल ने दुकान की पिछली दीवार की जाँच की। वहाँ एक छोटी खिड़की थी, लेकिन उसके
बाहर लोहे की मोटी सलाखें थीं। किसी वयस्क व्यक्ति के लिए उससे अंदर आना लगभग
असंभव था। फिर भी बीरबल ने खिड़की की चौखट को ध्यान से देखा। वहाँ लकड़ी पर एक
बहुत हल्की खरोंच थी। उन्होंने उस खरोंच के पास हाथ लगाया और महसूस किया कि लकड़ी
थोड़ी ढीली है। उन्होंने सुनार से पूछा कि क्या यह खिड़की हमेशा से ऐसी थी। सुनार
ने कहा कि उसे याद नहीं। बीरबल ने सैनिकों को आदेश दिया कि खिड़की की चौखट को
ध्यान से हटाया जाए। कुछ प्रयास के बाद लकड़ी का एक छोटा हिस्सा अलग हो गया और
उसके पीछे एक पतली जगह दिखाई दी। उस जगह से कोई व्यक्ति अंदर नहीं आ सकता था,
लेकिन एक हाथ
आसानी से अंदर जा सकता था।
बीरबल ने कहा कि अब रहस्य थोड़ा खुल रहा है। यदि चोर स्वयं अंदर नहीं आया,
तो उसने अपना
हाथ किसी छोटे रास्ते से अंदर डालकर अंदर की कुंडी या कोई अन्य व्यवस्था हटाई
होगी। लेकिन फिर भी प्रश्न था कि वह अंदर पहुँचने के बाद अलमारी कैसे खोल पाया।
तभी बीरबल की नजर खिड़की के पास पड़े एक पतले तार पर पड़ी। उन्होंने तार उठाया और
कहा कि शायद इसी तरह किसी ने अंदर की कुंडी को खींचा था। लाला गोविंददास ने हैरानी
से कहा कि उसकी दुकान में ऐसा तार पहले कभी नहीं था।
बीरबल ने नंदू और श्याम दोनों की ओर देखा। फिर उन्होंने पूछा कि दुकान की
पिछली दीवार के दूसरी तरफ क्या है। सुनार ने कहा कि वहाँ एक संकरी गली है, जिसके आगे एक पुराना गोदाम है। बीरबल ने कहा कि उन्हें उस गोदाम को देखना होगा। सभी लोग
उनके साथ वहाँ पहुँचे। गोदाम लगभग सुनसान था। वहाँ पुराने लकड़ी के बक्से और टूटी
हुई गाड़ियाँ पड़ी थीं। बीरबल ने फर्श पर नजर दौड़ाई। धूल बहुत थी, लेकिन एक जगह
धूल साफ दिखाई दे रही थी, जैसे हाल ही में कोई वहाँ बैठा या खड़ा हुआ हो। पास ही एक
छोटी सीढ़ी पड़ी थी। बीरबल ने उसे उठाया और दीवार के पास रखा। वहाँ से दुकान की
पिछली खिड़की तक आसानी से पहुँचा जा सकता था।
अचानक बीरबल की नजर एक कपड़े के छोटे टुकड़े पर पड़ी। वह गहरे नीले रंग का था।
उन्होंने उसे उठाया और पूछा कि क्या दुकान में काम करने वाले किसी व्यक्ति के
कपड़े ऐसे रंग के हैं। लाला गोविंददास ने कहा कि नंदू अक्सर नीले रंग का कुर्ता
पहनता है, जबकि श्याम ज्यादातर सफेद या भूरे कपड़े पहनता है। बीरबल ने कपड़े को ध्यान से
देखा, लेकिन तुरंत कोई निष्कर्ष नहीं निकाला। उन्होंने कहा कि केवल कपड़े के टुकड़े
से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जब वे वापस दुकान में आए तो बीरबल ने दोनों कर्मचारियों से कहा कि वे अपने
कपड़ों की जाँच करवाएँ। नंदू ने तुरंत अपना कुर्ता दिखाया। उसके कुर्ते की आस्तीन
के किनारे से कपड़ा थोड़ा फटा हुआ था। उस फटे हिस्से का रंग उसी कपड़े के टुकड़े
से मिलता था जो गोदाम में मिला था। अब सबकी निगाहें नंदू पर टिक गईं। लेकिन नंदू
ने कहा कि उसका कुर्ता कई दिन पहले फटा था और इसका चोरी से कोई संबंध नहीं है।
बीरबल ने कहा कि यह संभव है, इसलिए अभी भी उन्हें एक और प्रमाण चाहिए।
बीरबल ने नंदू से पूछा कि पिछली रात वह दुकान से निकलने के बाद कहाँ गया था।
नंदू ने कहा कि वह सीधे अपने घर गया। बीरबल ने पूछा कि घर कहाँ है। नंदू ने स्थान
बताया। फिर बीरबल ने पूछा कि क्या उसके घर से गोविंददास की दुकान तक आने का कोई
छोटा रास्ता है। नंदू ने कहा कि हाँ, एक संकरी गली है जो पीछे वाले गोदाम के पास से
गुजरती है। बीरबल ने पूछा कि वह रास्ता उसे कैसे पता है। नंदू ने कहा कि वह वर्षों
से दुकान में काम करता है, इसलिए आसपास की सभी गलियाँ जानता है। बीरबल ने सिर हिलाया।
अब बीरबल ने एक ऐसी बात कही जिसने नंदू को बेचैन कर दिया। उन्होंने कहा कि चोर
ने दुकान के अंदर से केवल आभूषण नहीं चुराए, बल्कि उसने एक छोटी वस्तु
भी अपने साथ ली है जो उसके अपराध का प्रमाण बन सकती है। नंदू ने तुरंत पूछा कि
कौन-सी वस्तु। बीरबल ने कहा कि अभी वह यह नहीं बताएँगे। लेकिन उन्होंने सैनिकों को
आदेश दिया कि नंदू के घर की तलाशी ली जाए। नंदू का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने कहा
कि उसके घर में कुछ नहीं है। बीरबल ने शांत स्वर में कहा कि यदि कुछ नहीं है तो
डरने की कोई आवश्यकता नहीं।
सैनिक नंदू के साथ उसके घर गए। कुछ देर बाद वे वापस लौटे और उनके हाथ में एक
छोटा लकड़ी का डिब्बा था। डिब्बे में कुछ चाँदी के पुराने सिक्के और एक पतली लोहे
की सुई मिली। बीरबल ने सुई को देखा और फिर दुकान से मिला धातु का टुकड़ा उसके पास
रख दिया। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए लग रहे थे। लेकिन अभी भी सोने के आभूषण नहीं
मिले थे। नंदू ने कहा कि डिब्बे में जो कुछ मिला है वह उसका निजी सामान है और उसका
चोरी से कोई संबंध नहीं।
बीरबल ने कहा कि असली चोर को पकड़ने के लिए केवल अनुमान काफी नहीं। उन्होंने
लाला गोविंददास से पूछा कि चोरी हुए आभूषणों में सबसे छोटी वस्तु कौन-सी थी। सुनार
ने बताया कि हीरे की एक छोटी अंगूठी भी गायब थी। बीरबल ने पूछा कि क्या उस अंगूठी
की कोई विशेष पहचान थी। सुनार ने कहा कि उसके अंदर दुकान का छोटा-सा निशान खुदा
हुआ था। बीरबल ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि आसपास के बाजार में इस प्रकार की
अंगूठी बेचने की कोशिश करने वाले व्यक्ति पर नजर रखी जाए।
दो दिन बाद खबर आई कि एक व्यक्ति ने उसी तरह की अंगूठी बेचने की कोशिश की थी।
सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। पूछताछ में पता चला कि वह नंदू का दूर का रिश्तेदार था।
उसने कहा कि अंगूठी उसे नंदू ने दी थी। अब नंदू के पास कोई रास्ता नहीं बचा था।
उसने अंततः स्वीकार कर लिया कि चोरी उसी ने की थी। उसने बताया कि वह वर्षों से
दुकान में काम कर रहा था और उसे विश्वास था कि कोई उस पर शक नहीं करेगा। उसने ताले
की व्यवस्था को अच्छी तरह समझ लिया था और कई दिन पहले उसने पीछे के गोदाम से दुकान
की खिड़की तक पहुँचने का रास्ता तैयार किया था। रात में वह दुकान के पीछे पहुँचा,
पतली तार की
मदद से खिड़की की कुंडी हटाई और अंदर हाथ डालकर दरवाजा खोला। फिर उसने अलमारी का
ताला नकली चाबी और औजार की सहायता से खोला और कीमती सामान निकाल लिया।
अकबर को जब पूरा सच बताया गया तो उन्होंने बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा की।
उन्होंने कहा कि नंदू इतने वर्षों से ईमानदार होने का दिखावा करता रहा, लेकिन उसके मन
में लालच बढ़ता गया और अंततः उसी लालच ने उसे अपराधी बना दिया। बीरबल ने कहा कि
सबसे खतरनाक चोर वह नहीं होता जो अचानक चोरी करता है, बल्कि वह होता है जो
धीरे-धीरे विश्वास जीतकर अपराध की तैयारी करता है। लेकिन चाहे वह कितनी भी तैयारी
क्यों न कर ले, कहीं न कहीं उसकी कोई छोटी गलती रह जाती है। नंदू ने भी यही
गलती की थी। उसने पीछे के रास्ते का इस्तेमाल किया, लेकिन वहाँ अपना कपड़ा छोड़
दिया। उसने ताले को सावधानी से खोला, लेकिन धातु की महीन धूल छोड़ दी। उसने चोरी का
सामान छिपाने की कोशिश की, लेकिन एक अंगूठी अपने रिश्तेदार को दे दी। और सबसे बड़ी बात,
जब बीरबल ने
कहा कि चोर का पता चल चुका है, तब उसके चेहरे पर वही डर दिखाई दिया जिसे वह छिपाना चाहता
था।
अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह कहावत सच है कि चोर की दाढ़ी में तिनका जरूर
होता है। बीरबल ने कहा कि तिनका कभी-कभी कपड़े के टुकड़े के रूप में मिलता है,
कभी किसी गलत
उत्तर के रूप में और कभी केवल एक घबराई हुई नजर के रूप में। बुद्धिमान व्यक्ति वही
है जो इन छोटे संकेतों को जोड़कर पूरी सच्चाई तक पहुँच सके। अकबर ने कहा कि इसीलिए
वे बीरबल को अपना सबसे विश्वसनीय सलाहकार मानते हैं।
लेकिन बीरबल के लिए यह मामला समाप्त नहीं हुआ था। उन्हें अब भी एक बात परेशान
कर रही थी। नंदू ने चोरी की पूरी योजना बनाई थी, लेकिन जिस औजार से उसने
ताला खोलने की कोशिश की थी, वह बहुत विशेष प्रकार का था। ऐसा औजार साधारण सुनार की
दुकान पर नहीं मिलता था। इसका अर्थ था कि नंदू को किसी बाहरी व्यक्ति की सहायता
मिली हो सकती है। बीरबल ने यह बात अकबर को बताई। अकबर ने पूछा कि क्या नंदू ने
किसी साथी का नाम लिया है। बीरबल ने कहा कि नंदू ने अभी तक किसी का नाम नहीं लिया,
लेकिन उन्हें
विश्वास है कि कहानी का एक हिस्सा अभी बाकी है।
उसी रात बीरबल को खबर मिली कि शहर के पुराने बाजार में एक रहस्यमय व्यक्ति
पिछले कुछ दिनों से अलग-अलग दुकानों के ताले देखने के लिए घूम रहा है। वह खुद को
ताला बनाने वाला कारीगर बताता था, लेकिन किसी दुकान के लिए काम नहीं करता था। बीरबल ने उसकी
तलाश शुरू करवाई। उन्हें पता नहीं था कि यह व्यक्ति नंदू के अपराध से जुड़ा है या
नहीं, लेकिन उनके अनुभव ने उन्हें सिखाया था कि किसी घटना में यदि एक से अधिक
असामान्य संकेत मिलें, तो उन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए।
और इस तरह चोरी का मामला सुलझने के बाद भी एक नया रहस्य जन्म ले चुका था।
बीरबल को अब यह पता लगाना था कि नंदू को ताला खोलने की कला किसने सिखाई थी और क्या
शहर में कोई ऐसा व्यक्ति घूम रहा था जो चोरी करने वालों को गुप्त रूप से सहायता
देता था। यह रहस्य आगे चलकर अकबर के दरबार के सामने एक और बड़ी चुनौती बनने वाला
था।
नंदू की चोरी का मामला सामने आने के बाद बादशाह अकबर के दरबार में कई दिनों तक
उसी घटना की चर्चा होती रही। लोगों को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर था कि नंदू
जैसा व्यक्ति, जो वर्षों से अपने मालिक का विश्वास जीत चुका था, आखिर लालच में
आकर चोरी की योजना कैसे बना सकता था। लेकिन बीरबल के मन में अभी भी एक प्रश्न
लगातार घूम रहा था। नंदू ने ताला खोलने के लिए जिस विशेष औजार का इस्तेमाल किया था,
वह साधारण औजार
नहीं था। ऐसा औजार बनाने के लिए ताले की बनावट और चाबी की तकनीक का अच्छा ज्ञान
होना जरूरी था। नंदू ने पूछताछ के दौरान यह स्वीकार तो कर लिया था कि उसने चोरी की,
लेकिन उसने यह
नहीं बताया था कि उसे इस काम में किसने सहायता दी थी। बीरबल को पूरा विश्वास था कि
नंदू अकेला नहीं था। उन्हें लगता था कि शहर में कोई ऐसा व्यक्ति अवश्य है जो चोरी
करने वालों को ताले खोलने और सुरक्षा व्यवस्था को समझने की कला सिखाता है।
अगले दिन बीरबल ने अपने कुछ विश्वसनीय सैनिकों को शहर के पुराने बाजार में
भेजा। उन्हें आदेश दिया गया कि वे उस रहस्यमय ताला बनाने वाले व्यक्ति की तलाश
करें जो पिछले कुछ दिनों से अलग-अलग दुकानों के आसपास घूम रहा था। सैनिकों ने कई
दुकानदारों से पूछताछ की। आखिरकार एक बूढ़े दुकानदार ने बताया कि उसने एक आदमी को
अक्सर बाजार की गलियों में घूमते देखा है। वह आदमी अपने साथ लोहे का एक छोटा संदूक
रखता था और खुद को कारीगर बताता था। वह दुकानों के ताले बड़े ध्यान से देखता और
कभी-कभी दुकानदारों से पूछता कि उनकी चाबी किस तरह की है। दुकानदार को उसका
व्यवहार थोड़ा अजीब लगा था, इसलिए उसने उससे कोई काम नहीं करवाया। बीरबल ने यह सुनते ही
सैनिकों को उस व्यक्ति का हुलिया पता करने को कहा।
शाम तक उस व्यक्ति की पहचान हो गई। उसका नाम करीम लोहार था। वह शहर के बाहरी
हिस्से में एक छोटी-सी दुकान चलाता था, लेकिन उसकी दुकान पर ग्राहकों की संख्या बहुत कम
थी। इसके बावजूद उसके पास अलग-अलग प्रकार के ताले, चाबियाँ और लोहे के औजारों
का अच्छा संग्रह था। बीरबल ने तय किया कि करीम को तुरंत गिरफ्तार करना ठीक नहीं
होगा। यदि वह वास्तव में नंदू का साथी था, तो अचानक गिरफ्तारी से वह सावधान हो सकता था और
उसके बाकी साथी भाग सकते थे। इसलिए बीरबल ने एक योजना बनाई। उन्होंने एक सैनिक को
व्यापारी का रूप देकर करीम की दुकान पर भेजा। सैनिक ने कहा कि उसके पास एक बहुत
कीमती संदूक है जिसका ताला खराब हो गया है और वह ऐसा व्यक्ति खोज रहा है जो बिना
ताला तोड़े उसकी चाबी बना सके। करीम ने तुरंत रुचि दिखाई और कहा कि वह ऐसा काम कर
सकता है।
सैनिक ने करीम को एक नकली ताला दिखाया। करीम ने उसे हाथ में लिया और कुछ देर
तक ध्यान से देखा। उसने ताले की बनावट देखकर कहा कि यह साधारण ताला नहीं है और इसे
खोलने के लिए विशेष औजार चाहिए। सैनिक ने पूछा कि क्या वह ऐसा औजार बना सकता है।
करीम ने कहा कि वह बना सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ दिन लगेंगे। सैनिक ने जानबूझकर पूछा कि
यदि उसे जल्दी हो तो क्या कोई दूसरा रास्ता है। करीम ने धीरे से कहा कि यदि उसे
ताले की अंदरूनी बनावट पता हो तो वह बहुत कम समय में उसे खोल सकता है। सैनिक ने
पूछा कि ऐसी जानकारी उसे कौन दे सकता है। करीम ने उत्तर देने से बचते हुए कहा कि
वह ऐसे काम की बातें किसी अनजान व्यक्ति से नहीं करता। बीरबल के सैनिक को यकीन हो
गया कि यह व्यक्ति सामान्य लोहार नहीं है।
अगले दिन बीरबल स्वयं साधारण व्यापारी का रूप धारण करके करीम की दुकान पर
पहुँचे। उनके साथ केवल एक विश्वसनीय सैनिक था। बीरबल ने कहा कि उनके पास कुछ कीमती
सामान है और वे अपने घर के लिए एक विशेष ताला बनवाना चाहते हैं। करीम ने उन्हें
दुकान के अंदर बैठाया। बीरबल ने बातचीत के दौरान जानबूझकर नंदू का नाम लिया और कहा
कि उन्होंने उसके बारे में सुना है कि वह ताले और चाबियों के काम को अच्छी तरह
समझता है। करीम का चेहरा अचानक बदल गया। उसने तुरंत पूछा कि नंदू से उनका क्या
संबंध है। बीरबल ने कहा कि वह बस एक परिचित है। करीम ने विषय बदलने की कोशिश की,
लेकिन बीरबल
समझ गए कि नंदू का नाम सुनकर उसका डर सामने आ गया है।
बीरबल ने दुकान के चारों ओर देखा। एक कोने में लोहे का संदूक रखा था। उन्होंने
पूछा कि उसमें क्या है। करीम ने कहा कि उसमें पुराने औजार हैं। बीरबल ने मजाक में
कहा कि क्या उसमें इतने पुराने औजार हैं कि उनसे आज भी किसी शाही खजाने का ताला
खोला जा सके। करीम ने हँसने की कोशिश की, लेकिन उसकी हँसी बनावटी थी। बीरबल ने तुरंत
महसूस किया कि वह कुछ छिपा रहा है। उन्होंने ज्यादा सवाल नहीं किए और वहाँ से चले
गए।
उस रात बीरबल ने सैनिकों को आदेश दिया कि करीम की दुकान पर नजर रखी जाए। कुछ
ही समय बाद एक आदमी दुकान के पीछे से आया। उसने चारों ओर देखा और चुपचाप अंदर चला
गया। सैनिकों ने उसे पहचानने की कोशिश की और सुबह होते-होते खबर दी कि वह व्यक्ति
नंदू का रिश्तेदार था। बीरबल को अब लगभग यकीन हो गया कि नंदू और करीम के बीच कोई
संबंध था। लेकिन वे ऐसा प्रमाण चाहते थे जिसे दरबार में प्रस्तुत किया जा सके।
बीरबल ने नंदू को जेल से बुलवाया और उससे कहा कि यदि वह पूरी सच्चाई बता देगा
तो उसके अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए बादशाह से दया की प्रार्थना की जा
सकती है। नंदू पहले तो चुप रहा। फिर उसने स्वीकार किया कि करीम ने ही उसे ताला
खोलने का तरीका बताया था। नंदू ने कहा कि वह कई महीनों से करीम के संपर्क में था।
करीम ने उसे समझाया था कि यदि वह किसी दुकान में वर्षों से काम करता है तो उसे
सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी होगी और वह बिना किसी को शक हुए चोरी कर सकता
है। बदले में चोरी का एक हिस्सा करीम को देना था। नंदू ने बताया कि सुनार की दुकान
में काम करते समय उसे धीरे-धीरे लालच आने लगा था। करीम ने उसे विश्वास दिलाया कि
वह कभी पकड़ा नहीं जाएगा।
बीरबल ने पूछा कि क्या केवल सुनार की दुकान ही उनका लक्ष्य थी। नंदू ने सिर
झुकाकर कहा कि नहीं। करीम ने शहर की कई दुकानों के बारे में जानकारी जुटाई थी। वह
दुकानों के ताले देखता, पहरेदारों की संख्या नोट करता और फिर ऐसी दुकान चुनता जहाँ
चोरी करना आसान हो। नंदू का काम अंदर की जानकारी देना था। यह सुनकर बीरबल गंभीर हो
गए। अब मामला केवल एक चोरी का नहीं रहा था। यह शहर में चल रहे एक बड़े चोरी के
गिरोह का संकेत था।
अकबर को जब यह बात बताई गई तो उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि करीम को गिरफ्तार
किया जाए। सैनिक उसकी दुकान पर पहुँचे, लेकिन करीम वहाँ नहीं था। दुकान खाली थी। ऐसा लग
रहा था कि वह किसी तरह खतरे की भनक पाकर भाग चुका था। बीरबल ने दुकान की तलाशी
लेने का आदेश दिया। लोहे के संदूक को खोला गया तो उसमें दर्जनों तरह के औजार,
नकली चाबियाँ
और कुछ कागज मिले। उन कागजों पर शहर की कई दुकानों के नाम लिखे थे। प्रत्येक दुकान
के सामने उसके ताले, पहरेदारों और मालिक की आदतों के बारे में कुछ संकेत लिखे
थे। बीरबल ने कागजों को देखकर कहा कि यह व्यक्ति बहुत लंबे समय से चोरी की तैयारी
कर रहा था।
लेकिन एक कागज ने बीरबल को सबसे अधिक चिंतित किया। उस पर शाही महल के एक बाहरी
भंडार का नाम लिखा था। उसके सामने महल के पहरेदारों की संख्या और पहरे बदलने का
समय भी लिखा हुआ था। बीरबल समझ गए कि गिरोह की नजर अब शाही संपत्ति पर भी पड़ चुकी
थी। उन्होंने तुरंत अकबर को सूचना दी। अकबर ने महल की सुरक्षा दोगुनी करने का आदेश
दिया और पूछा कि करीम कहाँ जा सकता है। बीरबल ने कहा कि ऐसा व्यक्ति सीधे शहर से
बाहर नहीं जाएगा। यदि वह वर्षों से चोरी की योजना बना रहा है तो उसके पास कोई
सुरक्षित ठिकाना अवश्य होगा।
बीरबल ने करीम की दुकान के आसपास के लोगों से पूछताछ की। एक बच्चा, जो अक्सर वहाँ
खेलता था, उसने बताया कि करीम कभी-कभी रात को एक पुराने कुएँ की ओर जाता था। उस कुएँ के
पास एक जर्जर मंदिर और एक बंद पड़ा गोदाम था। बीरबल तुरंत वहाँ पहुँचे। गोदाम बाहर
से बंद था, लेकिन ताले पर धूल कम थी। इसका मतलब था कि ताला हाल ही में इस्तेमाल हुआ था।
सैनिकों ने दरवाजा खोला। अंदर कई पुराने बक्से पड़े थे। उनमें से एक बक्से में
कपड़े, कुछ नकली मूँछें, अलग-अलग तरह के साफे और साधारण व्यापारी के कपड़े मिले।
बीरबल ने समझ लिया कि चोरी करने वाले लोग भेष बदलने के लिए इनका इस्तेमाल करते थे।
अचानक एक सैनिक ने बताया कि गोदाम की पिछली दीवार में एक छोटा रास्ता है जो
बाहर की गली में जाता है। बीरबल ने उस रास्ते की जाँच की। वहाँ ताजा पैरों के
निशान थे। उन्होंने सैनिकों से कहा कि आसपास के सभी रास्तों पर नजर रखी जाए। कुछ
देर बाद दूर एक व्यक्ति भागता हुआ दिखाई दिया। सैनिक उसके पीछे दौड़े। वह व्यक्ति
करीम था। उसने भागने की पूरी कोशिश की, लेकिन अंततः सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।
करीम को दरबार में लाया गया। अकबर ने उससे पूछा कि वह शाही भंडार की जानकारी
क्यों जुटा रहा था। करीम ने पहले झूठ बोलने की कोशिश की। उसने कहा कि वह केवल ताले
बनाने का काम करता था और उसके पास मिले कागजों का चोरी से कोई संबंध नहीं है।
बीरबल मुस्कुराए और बोले कि यदि वह केवल ताले बनाता था तो उसने अलग-अलग दुकानों के
पहरेदारों की संख्या क्यों लिख रखी थी। करीम चुप हो गया। बीरबल ने दूसरा प्रश्न
किया कि यदि वह निर्दोष था तो नंदू ने उसका नाम क्यों लिया। करीम ने फिर चुप्पी
साध ली। अंत में बीरबल ने वह लोहे का औजार उसके सामने रखा जो सुनार की दुकान से
मिला था और पूछा कि क्या उसने यह औजार नंदू को दिया था। करीम ने कोई उत्तर नहीं
दिया।
बीरबल ने कहा कि झूठ बोलने वाला व्यक्ति अक्सर अपने ही शब्दों में फँस जाता
है। उन्होंने करीम से पहले पूछा कि क्या वह नंदू को जानता है। करीम ने कहा कि
नहीं। फिर बीरबल ने पूछा कि क्या उसने कभी सुनार की दुकान देखी है। करीम ने कहा कि
नहीं। उसके बाद बीरबल ने एक कागज सामने रख दिया जिस पर सुनार की दुकान के पीछे
वाले गोदाम का नक्शा बना था। बीरबल ने कहा कि यह नक्शा केवल वही बना सकता है जिसने
उस जगह को बहुत ध्यान से देखा हो। करीम के चेहरे का रंग उड़ गया।
अब करीम के पास कोई रास्ता नहीं बचा। उसने स्वीकार कर लिया कि वह चोरी के
गिरोह का मुखिया था। उसने बताया कि वह पहले ईमानदारी से लोहे का काम करता था,
लेकिन
धीरे-धीरे उसे लगा कि चोरी करके वह बहुत जल्दी धन कमा सकता है। उसने ताले खोलने की
कला सीखी और फिर ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया जो अलग-अलग दुकानों में
नौकर थे। वे उसे अंदर की जानकारी देते और वह चोरी की योजना बनाता। नंदू भी उसी
गिरोह का हिस्सा बन गया था। सुनार की दुकान से चोरी के बाद वे शाही भंडार को
निशाना बनाने वाले थे।
अकबर ने कठोर स्वर में कहा कि ऐसे अपराधियों को दंड मिलना चाहिए, क्योंकि
उन्होंने केवल धन नहीं चुराया बल्कि लोगों के विश्वास को भी धोखा दिया। बीरबल ने
कहा कि अपराध की जड़ केवल लालच नहीं होती, बल्कि यह विश्वास भी होता है कि व्यक्ति अपने
अपराध को हमेशा छिपा सकता है। करीम ने वर्षों तक अपने अपराध छिपाए, लेकिन अंततः
उसकी अपनी लिखी हुई सूची, उसके औजार और उसके साथियों के बयान ने उसे पकड़वा दिया।
अकबर ने बीरबल की ओर देखकर कहा कि इस पूरे मामले में सबसे रोचक बात यह थी कि
चोरों ने बहुत सावधानी से योजना बनाई थी। बीरबल ने उत्तर दिया कि योजना चाहे कितनी
भी सावधानी से बनाई जाए, उसमें कोई न कोई तिनका जरूर रह जाता है। करीम के मामले में
वह तिनका उसकी लालच भरी सूची थी। नंदू के मामले में वह तिनका उसका फटा हुआ कुर्ता
था। और पहले मामले में चोर की लकड़ी छोटी हो गई थी। इसलिए कहावत केवल किसी एक
प्रकार की चोरी पर लागू नहीं होती। इसका अर्थ यह है कि अपराध करने वाला व्यक्ति
अपनी गलती छिपाने की जितनी कोशिश करता है, उतना ही उसके व्यवहार में उसका डर दिखाई देने
लगता है।
कुछ दिनों बाद शहर में यह खबर फैल गई कि एक बड़े चोरी के गिरोह का पर्दाफाश हो
गया है। कई व्यापारी बीरबल का धन्यवाद करने दरबार में आए। उन्होंने कहा कि यदि यह
गिरोह पकड़ा न जाता तो न जाने कितने और लोग अपनी मेहनत की कमाई से हाथ धो बैठते।
अकबर ने बीरबल को सम्मानित किया और कहा कि उनकी बुद्धिमानी ने फिर साबित कर दिया
कि न्याय के लिए केवल शक्ति नहीं, बल्कि विवेक और धैर्य भी आवश्यक है।
लेकिन कहानी में एक अंतिम रहस्य अभी बाकी था। करीम की जब्त की गई वस्तुओं में
एक छोटी लाल रंग की डायरी मिली थी। उसमें कई नाम लिखे थे, लेकिन उनमें से एक नाम ऐसा
था जिसे देखकर बीरबल कुछ देर तक चुप रहे। वह नाम दरबार से जुड़े एक व्यक्ति का था।
बीरबल ने डायरी तुरंत अकबर को नहीं दिखाई। उन्होंने पहले स्वयं उस व्यक्ति के बारे
में जानकारी जुटाने का निर्णय लिया। उन्हें आशंका थी कि चोरी का गिरोह केवल बाजार
तक सीमित नहीं था और शायद महल के भीतर भी किसी व्यक्ति की सहायता उन्हें मिल रही
थी।
उस रात बीरबल ने डायरी अपने पास रखी और अकेले बैठकर उसके पन्ने पलटते रहे। हर
पन्ने पर किसी न किसी व्यापारी, दुकान या गोदाम का उल्लेख था। लेकिन आखिरी पन्ने पर केवल एक
वाक्य लिखा था, “जिसे महल के भीतर की खबर चाहिए, उसे बाहर से चोर खोजने की
जरूरत नहीं।” बीरबल ने उस वाक्य को दो बार पढ़ा। उनके चेहरे पर गंभीरता आ गई।
उन्होंने धीरे से कहा, “अब असली परीक्षा शुरू होती है।”
करीम की लाल डायरी बीरबल के हाथ लगने के बाद उनके मन में कई सवाल उठने लगे थे।
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा वाक्य साधारण नहीं था। उसमें साफ संकेत था कि चोरी
के गिरोह को महल के भीतर की जानकारी मिल रही थी। यदि यह सच था, तो समस्या पहले
की घटनाओं से कहीं अधिक गंभीर थी। शाही महल में सुरक्षा के कई स्तर थे। पहरेदारों
की ड्यूटी बदलने का समय, अलग-अलग कमरों की चाबियाँ, खजाने और भंडार की व्यवस्था
तथा बादशाह के आने-जाने के रास्तों की जानकारी केवल कुछ चुनिंदा लोगों को ही होती
थी। यदि यह जानकारी किसी बाहरी व्यक्ति तक पहुँच रही थी, तो निश्चित रूप से महल के
भीतर कोई ऐसा व्यक्ति था जो गुप्त बातें बाहर पहुँचा रहा था। बीरबल जानते थे कि इस
बार जल्दबाजी करना खतरनाक होगा। यदि उन्होंने बिना प्रमाण किसी पर शक किया,
तो असली अपराधी
सावधान हो सकता था।
अगली सुबह बीरबल ने अकबर से अकेले में मिलने की अनुमति माँगी। दरबार समाप्त
होने के बाद उन्होंने लाल डायरी बादशाह के सामने रख दी। अकबर ने डायरी खोली और
उसके पन्ने पढ़ने लगे। कई नाम देखकर वे चौंके। उनमें शहर के बड़े व्यापारी,
कुछ छोटे
दुकानदार और दो ऐसे लोग भी थे जो कभी-कभी महल में सामान पहुँचाने आते थे। लेकिन
आखिरी पन्ने पर लिखा वाक्य पढ़कर अकबर गंभीर हो गए। उन्होंने पूछा कि क्या बीरबल
को किसी व्यक्ति पर शक है। बीरबल ने कहा कि उन्हें शक तो है, लेकिन अभी वे
नाम नहीं बताएँगे। अकबर ने पूछा कि क्यों। बीरबल ने उत्तर दिया कि यदि उनका अनुमान
गलत हुआ तो एक निर्दोष व्यक्ति बदनाम हो सकता है और यदि सही हुआ तो असली अपराधी को
भनक लगते ही वह अपने सभी प्रमाण नष्ट कर सकता है। इसलिए उन्हें पहले उस व्यक्ति को
बिना बताए उसकी गतिविधियों पर नजर रखनी होगी।
अकबर ने बीरबल को पूरी स्वतंत्रता दे दी। बीरबल ने सबसे पहले महल के उन लोगों
की सूची बनवाई जिन्हें शाही भंडार, हथियारघर और खजाने की सुरक्षा से संबंधित जानकारी रहती थी।
इसमें कई पहरेदार, दो मुंशी, एक चाबी रखने वाला अधिकारी, कुछ सेवक और महल में सामान
पहुँचाने वाले व्यापारी शामिल थे। बीरबल ने ध्यान दिया कि करीम की डायरी में जिन
दुकानों का उल्लेख था, उनमें से कई दुकानों से सामान महल में भी आता था। इसका अर्थ
यह हो सकता था कि चोरी के गिरोह को महल में आने-जाने वाले किसी व्यापारी के माध्यम
से जानकारी मिलती थी। लेकिन डायरी में एक नाम ऐसा था जो बाकी सभी नामों से अलग था।
वह नाम था हरिदत्त, जो शाही भंडार का हिसाब रखने वाले मुंशी का सहायक था।
हरिदत्त कई वर्षों से महल में काम कर रहा था। उसका काम साधारण दिखाई देता था।
वह सामान की सूची बनाता, आने-जाने वाली वस्तुओं का हिसाब रखता और समय-समय पर पुराने
रिकॉर्ड व्यवस्थित करता था। वह बहुत शांत स्वभाव का था और किसी से ज्यादा बातचीत
नहीं करता था। उसे देखकर कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि वह किसी अपराध में शामिल
हो सकता है। बीरबल ने पहले उसके बारे में महल के अन्य कर्मचारियों से जानकारी ली।
सबने कहा कि हरिदत्त मेहनती और ईमानदार है। कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि यदि महल
में किसी व्यक्ति पर आँख बंद करके भरोसा किया जा सकता है तो वह हरिदत्त है। यह
सुनकर बीरबल का शक कम नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया। वे जानते थे कि किसी व्यक्ति का अच्छा
नाम होना उसके निर्दोष होने का प्रमाण नहीं है।
बीरबल ने एक योजना बनाई। उन्होंने अकबर से कहा कि अगले दिन जानबूझकर शाही
भंडार की सुरक्षा में बदलाव की घोषणा की जाए। दरबार में यह खबर फैलाई जाए कि खजाने
के एक विशेष कक्ष की चाबी बदल दी गई है और वहाँ रखे कीमती सामान को दूसरे स्थान पर
ले जाया जाएगा। लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं किया जाना था। यह केवल एक झूठी
सूचना थी जिसे अलग-अलग लोगों तक अलग-अलग तरीके से पहुँचाया जाना था। बीरबल ने कहा
कि यदि कुछ ही समय में यह खबर बाहर किसी संदिग्ध व्यक्ति तक पहुँच जाती है,
तो उन्हें पता
चल जाएगा कि महल के भीतर से जानकारी कौन पहुँचा रहा है।
अकबर ने उनकी योजना स्वीकार कर ली। अगले दिन बीरबल ने तीन अलग-अलग लोगों को
तीन अलग-अलग झूठी बातें बताईं। एक पहरेदार से कहा गया कि खजाने की नई चाबी शाम को
बदली जाएगी। एक सेवक से कहा गया कि कीमती सामान को हथियारघर में ले जाया जाएगा। और
हरिदत्त से कहा गया कि शाही भंडार के पीछे बने पुराने कमरे में एक विशेष संदूक रखा
जाएगा और उसकी सुरक्षा केवल दो सैनिक करेंगे। बीरबल ने जानबूझकर हरिदत्त को यह भी
बताया कि यह सूचना अत्यंत गोपनीय है और किसी को नहीं बतानी चाहिए।
हरिदत्त ने सिर झुकाकर कहा कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगा। बीरबल ने उसे जाने
दिया। इसके बाद वे चुपचाप उसकी गतिविधियों पर नजर रखने लगे। शाम होते-होते शहर के
एक पुराने बाजार में खबर फैल गई कि महल के पीछे वाले कमरे में एक कीमती संदूक रखा
जाएगा। यह वही सूचना थी जो केवल हरिदत्त को दी गई थी। बीरबल के सैनिकों ने तुरंत
उस व्यक्ति को पकड़ लिया जो यह खबर आगे पहुँचा रहा था। पूछताछ में पता चला कि वह
करीम का पुराना साथी था। उसने बताया कि उसे खबर एक ऐसे व्यक्ति ने दी थी जो महल
में काम करता है। उसने नाम नहीं बताया, लेकिन इतना कहा कि वह व्यक्ति अक्सर शाही भंडार
के आसपास दिखाई देता है।
अब बीरबल का शक मजबूत हो चुका था। उन्होंने हरिदत्त को तुरंत गिरफ्तार नहीं
किया। इसके बजाय उन्होंने उसके कमरे की गुप्त निगरानी करवानी शुरू की। दो दिन तक
कुछ असामान्य नहीं हुआ। हरिदत्त सुबह काम पर आता, दिनभर हिसाब लिखता और शाम
को अपने घर चला जाता। वह किसी संदिग्ध व्यक्ति से मिलता हुआ दिखाई नहीं दिया।
तीसरे दिन रात को एक सैनिक ने देखा कि हरिदत्त अपने घर से निकलकर शहर की एक सुनसान
गली में गया। वहाँ एक व्यक्ति पहले से उसका इंतजार कर रहा था। दोनों कुछ देर बात
करते रहे और फिर अलग-अलग दिशाओं में चले गए। सैनिक ने उस व्यक्ति का पीछा किया और
पाया कि वह करीम के गिरोह से जुड़ा एक आदमी था।
बीरबल ने अगली सुबह हरिदत्त को दरबार में बुलाया। वह हमेशा की तरह शांत दिखाई
दे रहा था। उसने झुककर बादशाह को सलाम किया। अकबर ने उससे पूछा कि क्या वह करीम को
जानता है। हरिदत्त ने बिना झिझक कहा कि नहीं। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने पिछले
कुछ दिनों में शहर के पुराने बाजार की तरफ किसी से मुलाकात की। हरिदत्त ने कहा कि
नहीं, वह सीधे घर जाता है। बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि उन्हें उसका उत्तर याद रहेगा।
फिर उन्होंने उसे जाने दिया।
अकबर ने पूछा कि बीरबल ने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया। बीरबल ने कहा कि अभी
केवल झूठ बोलना अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसा प्रमाण
चाहिए जिससे वह इनकार न कर सके। उन्होंने कहा कि अब वे हरिदत्त के सामने एक ऐसा
जाल बिछाएँगे जिसमें वह अपने ही हाथों से फँसेगा।
उस शाम बीरबल ने महल में घोषणा करवाई कि अगले दिन शाही भंडार की सभी चाबियों
की जाँच होगी। उन्होंने हरिदत्त को विशेष रूप से कहा कि वह पुराने रिकॉर्डों से यह
पता लगाए कि पिछले छह महीनों में किन-किन चाबियों की नकल बनवाई गई थी। हरिदत्त ने
कहा कि वह यह काम कर देगा। बीरबल ने उसे कुछ पुराने रिकॉर्ड दिए। उन रिकॉर्डों में
जानबूझकर एक गलत जानकारी भी रखी गई थी। उसमें लिखा था कि महल के एक गुप्त कक्ष की
चाबी की नकल तीन महीने पहले बनवाई गई थी। असल में उस कक्ष की कोई दूसरी चाबी थी ही
नहीं।
अगले दिन बीरबल ने देखा कि हरिदत्त उस रिकॉर्ड को बहुत ध्यान से पढ़ रहा है।
उसने चुपचाप उस पन्ने की एक छोटी-सी नकल बना ली। बीरबल के एक विश्वसनीय व्यक्ति ने
यह सब देख लिया। शाम को हरिदत्त महल से बाहर निकला और सीधे उसी सुनसान गली में गया
जहाँ वह पहले भी गया था। वहाँ वही व्यक्ति उसका इंतजार कर रहा था। हरिदत्त ने उसे
कागज का टुकड़ा दिया। उस व्यक्ति ने कागज पढ़ा और कहा कि अब काम आसान हो जाएगा।
सैनिकों ने दोनों को तुरंत पकड़ लिया।
हरिदत्त को दरबार में लाया गया। इस बार बीरबल ने उसके सामने वह कागज रख दिया
जो उसने गुप्त रूप से बाहर पहुँचाया था। हरिदत्त का चेहरा बदल गया। उसने कहा कि
उसने केवल कागज दिया था, उसे नहीं पता था कि उसमें क्या है। बीरबल ने पूछा कि यदि
उसे नहीं पता था तो उसने उसे छिपाकर क्यों दिया। हरिदत्त चुप रहा। फिर बीरबल ने
कहा कि कागज में जिस गुप्त कक्ष का उल्लेख है, उसकी दूसरी चाबी होने की
बात झूठी थी। यह जानकारी केवल उसी व्यक्ति को पता हो सकती थी जो महल के अंदर की
व्यवस्था जानता हो। हरिदत्त अब कोई उत्तर नहीं दे सका।
अंततः उसने स्वीकार किया कि वह कई महीनों से करीम के गिरोह को महल की जानकारी
दे रहा था। उसने बताया कि शुरुआत में उसे केवल छोटी-छोटी जानकारियों के बदले पैसे
मिलते थे। बाद में लालच बढ़ता गया। करीम ने उसे विश्वास दिलाया था कि यदि वह महल
की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी दे दे, तो वे शाही भंडार से बड़ी
चोरी कर सकते हैं। हरिदत्त ने स्वीकार किया कि उसने पहरेदारों की ड्यूटी बदलने के
समय, कुछ चाबियों की बनावट और भंडार के कम इस्तेमाल होने वाले रास्तों की जानकारी
गिरोह को दी थी।
अकबर यह सुनकर बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने कहा कि महल में काम करने वाले
व्यक्ति का अपने ही राज्य के विरुद्ध इस प्रकार विश्वासघात करना अत्यंत गंभीर
अपराध है। लेकिन बीरबल ने कहा कि इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है।
उन्होंने पूछा कि हरिदत्त को यह सब करने की प्रेरणा किसने दी थी। हरिदत्त ने बताया
कि करीम ने उसे लालच दिया था, लेकिन उसने यह भी कहा कि महल में एक और व्यक्ति था जो करीम
के संपर्क में था। वह व्यक्ति कभी सीधे चोरी में शामिल नहीं हुआ, लेकिन वह गुप्त
सूचनाएँ आगे पहुँचाता था।
बीरबल ने पूछा कि वह व्यक्ति कौन है। हरिदत्त ने एक नाम बताया। यह नाम सुनकर
दरबार में मौजूद कई लोग चौंक गए। वह महल का एक पुराना कर्मचारी था, जिसे वर्षों से
बहुत ईमानदार समझा जाता था। वह व्यक्ति अक्सर बादशाह के निजी कक्षों के पास काम
करता था और उसे महल के कई गुप्त रास्तों की जानकारी थी। अकबर ने उसे तुरंत बुलाने
का आदेश दिया।
वह व्यक्ति दरबार में आया तो उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी। उसने सामान्य
रूप से बादशाह को सलाम किया। अकबर ने उससे पूछा कि क्या वह करीम को जानता है। उसने
कहा कि नहीं। बीरबल ने पूछा कि क्या वह हरिदत्त को जानता है। उसने कहा कि हाँ,
वह महल का
कर्मचारी है। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने कभी उससे अकेले में मुलाकात की। उसने कहा
कि नहीं। उसके उत्तर बहुत शांत और निश्चित थे। यदि कोई उसे पहली बार देखता तो उसे
निर्दोष ही समझता।
बीरबल ने अचानक कहा कि उन्हें लगता है कि असली चोर वही व्यक्ति है। दरबार में
हलचल मच गई। अकबर ने भी आश्चर्य से बीरबल की ओर देखा। उस व्यक्ति ने तुरंत कहा कि
यह झूठा आरोप है और बीरबल को प्रमाण देना होगा। बीरबल मुस्कुराए और बोले कि प्रमाण
अवश्य दिया जाएगा। उन्होंने एक छोटा-सा डिब्बा मँगवाया। उसमें एक तिनका रखा था।
उन्होंने कहा कि यह तिनका उस व्यक्ति के कमरे में मिला है। दरबार में बैठे लोग समझ
नहीं पाए कि एक साधारण तिनके से चोरी का क्या संबंध हो सकता है।
बीरबल ने कहा कि उन्हें कल रात उस व्यक्ति के कमरे की तलाशी के दौरान कुछ
विशेष नहीं मिला। लेकिन उसके कमरे की खिड़की के बाहर मिट्टी में पैरों के निशान
थे। उन निशानों के पास यह तिनका मिला। यह तिनका साधारण नहीं था। यह उसी प्रकार की
विशेष घास का हिस्सा था जो महल के पीछे के उस गुप्त रास्ते के पास उगती थी जहाँ से
हरिदत्त के संपर्क वाला व्यक्ति कई बार आया-जाया करता था। बीरबल ने कहा कि केवल
तिनका किसी अपराध का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह उस व्यक्ति के जूते पर लगे मिट्टी के
निशान और हरिदत्त के बयान के साथ मिलकर एक महत्वपूर्ण संकेत बन जाता है।
अकबर ने उस व्यक्ति के जूतों की जाँच करने का आदेश दिया। जूतों के तलवे में
वही लाल मिट्टी लगी थी जो महल के पीछे के गुप्त रास्ते पर थी। अब उसका चेहरा बदल
गया। उसने कहा कि वह उस रास्ते से कभी-कभी जाता था क्योंकि वहाँ से होकर उसका घर
जल्दी पड़ता था। बीरबल ने पूछा कि यदि वह रास्ता उसके घर के लिए छोटा था तो उसने
पिछले तीन महीनों में उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया। वह चुप हो गया।
बीरबल ने फिर कहा कि अपराधी की सबसे बड़ी कमजोरी उसका डर है। वह व्यक्ति
वर्षों से खुद को ईमानदार दिखाता रहा, लेकिन जैसे ही उसे लगा कि उसके अपराध का
पर्दाफाश हो सकता है, उसकी हर बात में बचाव की कोशिश दिखाई देने लगी। उसने अंततः
स्वीकार किया कि वह भी करीम के संपर्क में था। वह सीधे चोरी नहीं करता था, लेकिन महल की
अंदरूनी जानकारी बाहर पहुँचाता था। बदले में उसे धन मिलता था। उसने यह भी स्वीकार
किया कि उसने शाही भंडार की सुरक्षा में कमजोर स्थानों की जानकारी दी थी।
अकबर ने कहा कि आज उन्हें फिर समझ आया कि चोर की दाढ़ी में तिनका क्यों कहा
जाता है। बीरबल ने उत्तर दिया कि कभी-कभी वह तिनका सचमुच एक तिनका होता है,
कभी कोई कागज,
कभी मिट्टी का
निशान और कभी इंसान के चेहरे पर दिखाई देने वाला डर। अपराधी अपने अपराध को छिपाने
के लिए जितनी कोशिश करता है, उतने ही अधिक संकेत पीछे छोड़ता जाता है।
इस घटना के बाद अकबर ने महल की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जाँच करवाने का आदेश
दिया। सभी कर्मचारियों की जिम्मेदारियाँ बदली गईं और गुप्त सूचनाओं की सुरक्षा के
लिए नए नियम बनाए गए। करीम, नंदू और हरिदत्त सहित सभी अपराधियों को उनके अपराध के
अनुसार दंड दिया गया। शहर के व्यापारियों को भी सावधान रहने की सलाह दी गई। लोगों
को समझाया गया कि किसी व्यक्ति पर केवल उसके अच्छे नाम के कारण आँख बंद करके भरोसा
नहीं करना चाहिए और न ही केवल शक के आधार पर किसी को दोषी ठहराना चाहिए।
उस रात अकबर ने बीरबल से कहा कि उन्होंने इस मामले में केवल चोरों को नहीं
पकड़ा, बल्कि यह भी साबित किया कि किसी अपराध को समझने के लिए धैर्य सबसे बड़ा हथियार
है। बीरबल ने कहा कि जल्दबाजी में किया गया निर्णय कई बार निर्दोष व्यक्ति को दोषी
बना देता है और असली अपराधी को बच निकलने का मौका दे देता है। इसलिए सच्चाई खोजने
वाला व्यक्ति हर छोटे संकेत को ध्यान से देखता है, लेकिन किसी एक संकेत को
अंतिम सत्य नहीं मानता।
अकबर ने मुस्कुराकर कहा कि तुम्हारी बातों से लगता है कि चोर की दाढ़ी में
तिनका ही नहीं, बल्कि पूरा जंगल छिपा हो सकता है। बीरबल हँस पड़े और बोले
कि जहाँपनाह, जंगल चाहे कितना भी बड़ा हो, यदि कोई व्यक्ति उसके निशानों को ध्यान से पढ़ना जानता है
तो रास्ता अवश्य मिल जाता है।
लेकिन बीरबल को अभी यह पता नहीं था कि अगले ही दिन उनके सामने एक ऐसी घटना आने
वाली है जिसमें न कोई चोरी का सामान मिलेगा, न कोई टूटे हुए ताले का
निशान और न ही कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखाई देगा। फिर भी किसी ने महल की सबसे कीमती
वस्तु गायब कर दी थी। और इस बार चुनौती इतनी कठिन होने वाली थी कि स्वयं अकबर भी
कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाने वाले थे।
अगली सुबह बादशाह अकबर का दरबार लगा ही था कि महल का एक विश्वसनीय सेवक बहुत
घबराया हुआ दरबार में पहुँचा। उसके चेहरे पर ऐसा भय था कि उसे देखकर ही समझ आ रहा
था कि कोई असाधारण घटना हुई है। उसने झुककर बादशाह को सलाम किया और काँपती आवाज
में कहा कि शाही संग्रह कक्ष से एक अत्यंत मूल्यवान वस्तु गायब हो गई है। अकबर ने
तुरंत पूछा कि क्या वस्तु गायब हुई है। सेवक ने बताया कि वह एक दुर्लभ रत्न था,
जिसे कई वर्ष
पहले एक विदेशी शासक ने अकबर को भेंट किया था। वह रत्न आकार में बहुत बड़ा नहीं था,
लेकिन उसकी चमक
असाधारण थी। उसे शाही संग्रह में एक विशेष काँच के संदूक में रखा जाता था और उसकी
सुरक्षा के लिए दिन-रात पहरा रहता था। अकबर ने गंभीर होकर पूछा कि क्या संदूक का
ताला टूटा है। सेवक ने कहा कि नहीं, ताला बिल्कुल सही है। काँच भी नहीं टूटा था और
कमरे का दरवाजा भी अंदर से बंद मिला था।
यह सुनकर दरबार में बैठे सभी लोग हैरान रह गए। अकबर ने तुरंत बीरबल को
बुलवाया। बीरबल कुछ ही देर में दरबार में पहुँचे। उन्होंने सेवक से घटना की पूरी
जानकारी पूछी। पता चला कि पिछली शाम संग्रह कक्ष की जाँच की गई थी और उस समय रत्न
अपने स्थान पर था। रात में कमरे को बंद कर दिया गया था। दो सैनिक बाहर पहरा दे रहे
थे और किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। सुबह जब संग्रह कक्ष खोला गया तो
रत्न गायब था। सबसे विचित्र बात यह थी कि काँच का संदूक उसी तरह बंद था और उसकी
चाबी संग्रह अधिकारी के पास थी। बीरबल ने कुछ देर तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
उन्होंने केवल कहा कि उन्हें स्वयं उस कक्ष को देखना होगा।
जब बीरबल संग्रह कक्ष में पहुँचे तो उन्होंने सबसे पहले कमरे के दरवाजे को
देखा। ताला सही था और उस पर किसी प्रकार की खरोंच नहीं थी। फिर उन्होंने काँच के
संदूक की जाँच की। वह भी पूरी तरह सुरक्षित था। संदूक की चाबी अधिकारी के पास थी
और अधिकारी ने कहा कि उसने रात में चाबी अपने कमरे में रखी थी। बीरबल ने पूछा कि
क्या कोई दूसरी चाबी है। अधिकारी ने बताया कि दूसरी चाबी बादशाह के निजी कक्ष में
सुरक्षित रहती है। बीरबल ने पूछा कि क्या रात में किसी ने उसे इस्तेमाल किया था।
अकबर के निजी सेवक ने कहा कि नहीं। बीरबल ने संदूक के चारों ओर ध्यान से देखा।
रत्न जिस स्थान पर रखा जाता था वहाँ हल्की-सी धूल थी, लेकिन उसके बीच एक गोल
निशान साफ दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई वस्तु वहाँ रखी गई थी और बाद
में उठा ली गई।
बीरबल ने कमरे में मौजूद सभी लोगों को बाहर जाने का आदेश दिया। उन्होंने केवल
दो सैनिकों और संग्रह अधिकारी को अपने पास रखा। फिर उन्होंने पूछा कि कमरे की
खिड़कियाँ कब खोली जाती हैं। अधिकारी ने कहा कि दिन में सफाई के समय खिड़कियाँ कुछ
देर के लिए खोली जाती हैं, लेकिन रात में वे हमेशा बंद रहती हैं। बीरबल ने खिड़की के
पास जाकर चौखट को छुआ। वहाँ उन्हें एक बहुत महीन सफेद पाउडर दिखाई दिया। उन्होंने
उसे उंगली पर लिया और ध्यान से देखा। उन्होंने पूछा कि क्या कमरे की सफाई में कोई
विशेष पाउडर इस्तेमाल किया जाता है। अधिकारी ने कहा कि नहीं, सफाई के लिए
केवल पानी और कपड़ा इस्तेमाल होता है।
बीरबल ने पूछा कि क्या महल में हाल ही में कोई निर्माण या सजावट का काम हुआ
है। एक सैनिक ने बताया कि संग्रह कक्ष के ऊपर वाली छत की मरम्मत कुछ दिन पहले हुई
थी। बीरबल ने तुरंत छत की ओर देखा। उन्होंने कहा कि उन्हें ऊपर जाना होगा। सैनिकों
ने सीढ़ी लगाई और बीरबल छत पर पहुँचे। वहाँ कुछ पुराने पत्थर और लकड़ी के टुकड़े
पड़े थे। एक जगह छत के किनारे पर सफेद पाउडर की वही परत दिखाई दी जो नीचे खिड़की
के पास थी। बीरबल ने अनुमान लगाया कि यह किसी निर्माण सामग्री का अवशेष हो सकता
है। लेकिन फिर उन्होंने छत के एक कोने में एक पतली रस्सी का टुकड़ा देखा। रस्सी
बहुत छोटी थी, जैसे किसी ने उसे काटकर फेंक दिया हो।
बीरबल ने रस्सी को उठाकर देखा और पूछा कि क्या छत पर काम करने वाले मजदूरों ने
ऐसी रस्सी का इस्तेमाल किया था। अधिकारी ने कहा कि हाँ, कुछ मजदूर सामान ऊपर खींचने
के लिए रस्सी इस्तेमाल करते थे। बीरबल ने पूछा कि वे मजदूर कौन थे। अधिकारी ने चार
नाम बताए। बीरबल ने उन सभी को बुलाने का आदेश दिया। थोड़ी देर बाद चार मजदूर दरबार
में उपस्थित हुए। बीरबल ने उनसे पूछा कि मरम्मत के दौरान वे किस समय काम करते थे
और क्या कभी रात में भी काम किया था। तीन मजदूरों ने कहा कि वे केवल दिन में काम
करते थे। चौथे मजदूर, जिसका नाम शेखर था, ने कहा कि कभी-कभी वह देर शाम तक रुक जाता था।
बीरबल ने शेखर से पूछा कि वह देर शाम तक क्यों रुकता था। उसने कहा कि उसे औजार
समेटने होते थे। बीरबल ने पूछा कि क्या उसने संग्रह कक्ष की छत के ऊपर से कभी नीचे
देखा था। शेखर ने कहा कि नहीं। बीरबल ने फिर पूछा कि क्या वह उस कक्ष की सुरक्षा
व्यवस्था के बारे में जानता था। शेखर ने कहा कि उसे कुछ पता नहीं। उसके उत्तर
सामान्य थे, लेकिन उसकी आँखें बेचैन थीं। बीरबल ने तुरंत उस पर आरोप नहीं लगाया। उन्होंने
सभी मजदूरों को जाने दिया, लेकिन शेखर को महल से बाहर न जाने का आदेश दिया।
इसके बाद बीरबल ने एक और महत्वपूर्ण जाँच शुरू की। उन्होंने पूछा कि शाही रत्न
का आकार कितना था। संग्रह अधिकारी ने बताया कि वह लगभग एक छोटे नींबू जितना था।
बीरबल ने पूछा कि यदि कोई व्यक्ति उसे कमरे से बाहर ले जाए तो वह कहाँ छिपा सकता
है। अधिकारी ने कहा कि किसी कपड़े या थैली में। बीरबल ने कहा कि फिर कमरे में ऐसा
कोई निशान क्यों नहीं मिला। उन्होंने फर्श की धूल, खिड़की, संदूक और
दरवाजे को फिर से देखा। उन्हें कोई ऐसा निशान नहीं मिला जिससे पता चले कि कोई
व्यक्ति कमरे में आया या बाहर गया था।
अचानक बीरबल ने पूछा कि क्या रत्न वास्तव में कमरे से बाहर ले जाया गया है। यह
सुनकर अधिकारी चौंक गया। उसने कहा कि यदि रत्न संदूक में नहीं है तो वह कमरे में
कहाँ हो सकता है। बीरबल ने कहा कि यही तो रहस्य है। हो सकता है कि चोर ने रत्न को
कमरे से बाहर निकाला ही न हो। उसने केवल ऐसा किया हो कि रत्न दिखाई न दे। अकबर को
जब यह बात बताई गई तो उन्होंने पूछा कि ऐसा कैसे संभव है। बीरबल ने कहा कि उन्हें
एक प्रयोग करना होगा।
उन्होंने वैसा ही एक काँच का संदूक मँगवाया और उसमें एक नकली रत्न रखा। फिर
कमरे की रोशनी अलग-अलग दिशाओं से डाली गई। कुछ कोणों से रत्न साफ दिखाई देता था,
जबकि कुछ कोणों
से वह लगभग गायब लगता था। बीरबल ने कहा कि यदि किसी पारदर्शी वस्तु या विशेष
पदार्थ का इस्तेमाल किया जाए तो रत्न को कुछ समय के लिए छिपाया जा सकता है। लेकिन
इसके लिए चोर को बहुत सावधानी से काम करना होगा। अकबर ने पूछा कि क्या ऐसा कोई
पदार्थ महल में उपलब्ध है। बीरबल ने कहा कि उन्हें अभी पता लगाना होगा।
उन्होंने महल के रसायन और औषधि कक्ष की जाँच करवायी। वहाँ काँच, तेल, पारदर्शी रेजिन
और विभिन्न प्रकार के पाउडर रखे थे। एक वृद्ध वैद्य ने बताया कि कुछ विशेष पेड़ों
से निकलने वाला पारदर्शी गोंद काँच जैसी सतह पर लगाने से वस्तु को कुछ कोणों से कम
दिखाई दे सकता है। बीरबल ने तुरंत उस पदार्थ का नाम और उसकी मात्रा पूछी। वैद्य ने
बताया कि पिछले सप्ताह उस पदार्थ का एक छोटा डिब्बा गायब हुआ था, लेकिन उसने
सोचा था कि शायद किसी सेवक ने गलती से कहीं रख दिया होगा।
अब मामला और रहस्यमय हो गया। यदि वही पदार्थ रत्न को छिपाने के लिए इस्तेमाल
हुआ था, तो उसे किसने लिया था? बीरबल ने औषधि कक्ष के सभी कर्मचारियों को बुलाया। एक सेवक
ने बताया कि शेखर नाम का मजदूर कुछ दिन पहले वहाँ आया था और उसने औजारों के लिए
तेल माँगा था। बीरबल की नजर तुरंत शेखर पर गई। उन्होंने उससे पूछा कि वह औषधि कक्ष
में क्यों गया था। शेखर ने कहा कि उसे काम के लिए तेल चाहिए था। बीरबल ने पूछा कि
क्या उसने पारदर्शी गोंद देखा था। शेखर ने कहा कि नहीं।
बीरबल ने उसे एक छोटा-सा परीक्षण करने को कहा। उन्होंने एक काँच की शीशी में
थोड़ा पानी भरकर शेखर के सामने रखी और कहा कि इसमें वह पदार्थ डालकर दिखाए जिसके
बारे में उसने कहा था कि उसने कभी नहीं देखा। शेखर कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने
गलती से उस पदार्थ का सही नाम बता दिया। कमरे में सन्नाटा छा गया। बीरबल ने कहा कि
यदि तुमने उसे कभी देखा ही नहीं, तो तुम्हें उसका नाम कैसे पता? शेखर के चेहरे का रंग उड़
गया।
फिर भी बीरबल ने कहा कि केवल यह प्रमाण पर्याप्त नहीं है। उन्होंने शेखर के
काम के औजारों की तलाशी ली। एक छोटे लोहे के डिब्बे में उन्हें वही पारदर्शी गोंद
मिला। शेखर ने कहा कि यह उसे किसी दूसरे मजदूर ने दिया था। बीरबल ने पूछा कि
कौन-सा मजदूर। शेखर ने नाम लेने से इनकार कर दिया। तब बीरबल ने कहा कि उसे सोचने
के लिए समय दिया जाएगा, लेकिन तब तक वह महल से बाहर नहीं जाएगा।
अगले दिन शेखर ने स्वीकार किया कि उसने अकेले यह काम नहीं किया था। उसे एक ऐसे
व्यक्ति ने योजना बताई थी जो शाही संग्रह कक्ष की सफाई और व्यवस्था के बारे में
अच्छी तरह जानता था। उसने बताया कि उसे रत्न चोरी करने का लालच दिया गया था। योजना
यह थी कि रत्न को संदूक से निकालकर विशेष पारदर्शी गोंद से बने एक छोटे पात्र में
छिपाया जाए और फिर ऐसा दिखाया जाए कि संदूक खाली है। लेकिन योजना के दौरान समस्या
आ गई। शेखर ने बताया कि उसने रत्न को अस्थायी रूप से छत के ऊपर एक लकड़ी के बक्से
में छिपा दिया था। वह बाद में उसे निकालने वाला था, लेकिन तभी सुरक्षा बढ़ा दी
गई और उसे मौका नहीं मिला।
सैनिकों ने छत की तलाशी ली और कुछ ही देर में वह लकड़ी का बक्सा मिल गया। उसके
अंदर कपड़े में लिपटा हुआ वही दुर्लभ रत्न था। अकबर ने राहत की साँस ली। बीरबल ने
कहा कि असली अपराधी केवल शेखर नहीं था। उन्होंने उस व्यक्ति का नाम पूछा जिसने उसे
योजना बताई थी। शेखर ने अंततः संग्रह कक्ष के एक सहायक का नाम लिया। वह सहायक कई
वर्षों से वहाँ काम कर रहा था और रत्न की सुरक्षा की पूरी जानकारी रखता था। उसे भी
तुरंत गिरफ्तार किया गया।
पूछताछ में पता चला कि दोनों ने मिलकर योजना बनाई थी। सहायक को विश्वास था कि
संग्रह कक्ष की सुरक्षा इतनी कड़ी है कि कोई व्यक्ति अंदर जाकर चोरी नहीं कर सकता।
इसलिए उसने ऐसा तरीका खोजा जिसमें चोर को कमरे में प्रवेश करने की आवश्यकता ही न
पड़े। शेखर ने छत की मरम्मत के दौरान ऊपर से रास्ता बनाया और एक पतली रस्सी की मदद
से नीचे पहुँचने की कोशिश की। उसने काँच के संदूक तक पहुँचकर रत्न निकाला और उसे
ऊपर ले गया। लेकिन जल्दबाजी में रस्सी का एक हिस्सा वहीं टूट गया और सफेद पाउडर भी
नीचे गिर गया। यही छोटे-छोटे संकेत अंततः बीरबल को सच्चाई तक ले गए।
अकबर ने बीरबल की ओर देखकर कहा कि यह चोरी पहले की सभी चोरियों से अलग थी।
बीरबल ने कहा कि हर अपराधी अपनी योजना को सबसे अधिक चतुर समझता है, लेकिन वह यह
भूल जाता है कि दुनिया में कोई भी योजना पूर्ण नहीं होती। कहीं न कहीं कोई निशान
छूट जाता है। इस मामले में वह निशान रस्सी का टुकड़ा, सफेद पाउडर, गायब हुआ गोंद
और शेखर का गलत उत्तर था।
अकबर ने पूछा कि क्या शेखर ने रत्न को छिपाकर रखने के बाद किसी को बताया था।
बीरबल ने कहा कि लालच ने उसे चुप नहीं रहने दिया। वह जल्द ही रत्न बेचने की योजना
बना रहा था। यदि सुरक्षा बढ़ाई नहीं जाती तो कुछ ही दिनों में वह उसे बाहर भेज
देता। अकबर ने कहा कि लालच इंसान को अंधा कर देता है। बीरबल ने उत्तर दिया कि लालच
के साथ डर जुड़ जाए तो व्यक्ति अपनी ही गलतियों का कैदी बन जाता है।
अकबर ने हँसते हुए कहा कि अब तो उन्हें लगता है कि “चोर की दाढ़ी में तिनका”
कहावत के पीछे पूरी दुनिया की कहानियाँ छिपी हैं। बीरबल ने कहा कि जहाँपनाह,
तिनका हमेशा
दिखाई नहीं देता। कभी वह चोर की बातों में होता है, कभी उसके कदमों में,
कभी उसके सामान
में और कभी उसकी आँखों में। सच्चाई को पहचानने वाला व्यक्ति केवल एक तिनके को नहीं
देखता, बल्कि उन सभी संकेतों को जोड़कर पूरी तस्वीर बनाता है।
उस दिन शाही रत्न को फिर से सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया। महल की सुरक्षा
व्यवस्था की एक बार फिर समीक्षा की गई और छतों, खिड़कियों तथा गुप्त
रास्तों पर अतिरिक्त पहरेदार नियुक्त किए गए। अकबर ने बीरबल की प्रशंसा करते हुए
कहा कि उन्होंने एक ऐसी चोरी का रहस्य सुलझाया जिसमें दरवाजा तक नहीं खुला था।
बीरबल ने विनम्रता से कहा कि दरवाजा चाहे बंद हो, लेकिन यदि अपराधी का मन
खुला रह जाए तो उसका अपराध छिपा नहीं रह सकता।
शाम को जब दरबार समाप्त हुआ तो बीरबल अकेले महल के बगीचे में टहल रहे थे। तभी
एक छोटा लड़का दौड़ता हुआ उनके पास आया। उसने कहा कि उसके पिता शहर के पुराने
हिस्से में रहते हैं और उनके घर से भी एक अजीब वस्तु चोरी हुई है। बीरबल ने सोचा
कि शायद यह कोई साधारण चोरी होगी, लेकिन लड़के ने जो अगली बात कही, उसे सुनकर बीरबल रुक गए।
लड़के ने बताया कि चोरी की वस्तु कोई सोना या आभूषण नहीं थी, बल्कि एक
पुरानी लकड़ी की पेटी थी जिसमें उसके परिवार का एक बहुत पुराना रहस्य छिपा था।
बीरबल ने लड़के से पूछा कि वह पेटी इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी। लड़के ने कहा कि
उसके पिता कहते हैं कि उस पेटी में एक ऐसा पत्र है जो कई वर्ष पहले हुए एक अन्याय
का सच सामने ला सकता है। बीरबल समझ गए कि यह केवल चोरी का मामला नहीं हो सकता।
शायद उस पेटी में ऐसा प्रमाण था जो किसी पुराने अपराध का रहस्य खोल सकता था।
उन्होंने लड़के को भरोसा दिलाया कि वह उसके पिता की सहायता करेंगे।
और इस तरह एक बार फिर बीरबल के सामने एक नया रहस्य खड़ा हो गया। इस बार चोरी
हुई वस्तु छोटी थी, लेकिन उसके भीतर छिपा सच बहुत बड़ा हो सकता था। बीरबल को
अभी यह पता नहीं था कि उस पुरानी पेटी की खोज उन्हें एक ऐसे व्यक्ति तक ले जाएगी
जिसे पूरा शहर वर्षों से निर्दोष मानता आया था। लेकिन जैसा कि बीरबल अक्सर कहते थे,
सच चाहे कितनी
भी पुरानी पेटी में बंद क्यों न हो, अपराधी की दाढ़ी में तिनका
किसी न किसी दिन दिखाई दे ही जाता है।
अगली सुबह बीरबल ने उस छोटे लड़के को अपने सामने बुलाया जिसने पिछली शाम अपने
पिता की चोरी हुई लकड़ी की पेटी के बारे में बताया था। लड़का बहुत गरीब परिवार से
था और उसके कपड़ों से भी उसकी आर्थिक स्थिति साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन उसकी
आँखों में अपने पिता के लिए चिंता और न्याय पाने की उम्मीद थी। बीरबल ने उसे प्यार
से बैठाया और पूछा कि उसके पिता कौन हैं और वह पेटी उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण
क्यों है। लड़के ने बताया कि उसके पिता का नाम माधव है और वे शहर के पुराने हिस्से
में छोटी-सी दुकान चलाते हैं। उनके दादा के समय से एक पुरानी लकड़ी की पेटी उनके
परिवार के पास थी। उसके पिता हमेशा कहते थे कि उस पेटी में एक ऐसा पत्र है जो
साबित करता है कि उनके परिवार के साथ कई वर्ष पहले अन्याय हुआ था। लड़के को पत्र
के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, क्योंकि उसके पिता ने उसे कभी पढ़ने नहीं दिया
था। कुछ दिन पहले उनके घर में चोरी हुई और चोर केवल वही पुरानी पेटी लेकर गया। घर
में रखे पैसे, कपड़े और अन्य सामान को उसने हाथ तक नहीं लगाया।
बीरबल को यह बात बहुत असामान्य लगी। सामान्य चोर धन और कीमती वस्तुओं की तलाश
करता है, लेकिन यदि किसी ने केवल एक पुरानी लकड़ी की पेटी चुराई हो और बाकी सब छोड़
दिया हो, तो निश्चित रूप से उसे पेटी के भीतर की किसी चीज की जानकारी थी। बीरबल ने
लड़के से पूछा कि क्या उसके पिता ने हाल ही में किसी से उस पेटी के बारे में बात
की थी। लड़के ने कुछ देर सोचकर कहा कि कुछ दिन पहले उनके घर एक बूढ़ा आदमी आया था।
उसने पिता से बहुत देर तक बात की थी और बार-बार पुराने कागजों और दादा के समय की
बातों के बारे में पूछ रहा था। बीरबल ने पूछा कि वह बूढ़ा आदमी कौन था। लड़के ने
कहा कि उसे नाम नहीं पता, लेकिन उसके पिता उसे पहचानते थे और उससे बात करते समय बहुत
गंभीर हो गए थे।
बीरबल ने तुरंत माधव को दरबार में बुलवाया। माधव एक दुबला-पतला व्यक्ति था
जिसकी उम्र लगभग पचास वर्ष रही होगी। वह दरबार में आया तो उसके चेहरे पर चिंता
स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसने बीरबल को प्रणाम किया और कहा कि उसे विश्वास नहीं हो
रहा कि उसकी छोटी-सी पेटी भी चोरों के लिए इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है। बीरबल ने
पूछा कि क्या उसे पता है कि पेटी में क्या था। माधव ने कहा कि उसके दादा ने मरने
से पहले उसके पिता को वह पेटी दी थी और कहा था कि उसमें एक पत्र है। दादा ने यह भी
कहा था कि जब सही समय आए, तभी उस पत्र को खोलना। माधव के पिता ने भी वही बात अपने
बेटे को बताई थी। इस तरह वह पेटी पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके परिवार में चली आ रही थी।
बीरबल ने पूछा कि क्या माधव ने कभी वह पत्र पढ़ा था। माधव ने कहा कि उसने कई
बार पत्र खोलने का विचार किया, लेकिन उसके पिता की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उसने
उसे नहीं खोला। बीरबल ने पूछा कि उसके दादा के साथ क्या अन्याय हुआ था। माधव ने
बताया कि लगभग चालीस वर्ष पहले उसके दादा एक बड़े व्यापारी के यहाँ मुंशी का काम
करते थे। व्यापारी के पास बहुत संपत्ति थी और उसके व्यापार का हिसाब-किताब माधव के
दादा संभालते थे। एक दिन व्यापारी के खजाने से बड़ी रकम गायब हो गई। बिना पूरी
जाँच किए माधव के दादा पर चोरी का आरोप लगा दिया गया। उन्होंने बहुत विरोध किया और
कहा कि वे निर्दोष हैं, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। उन्हें नौकरी से निकाल
दिया गया और उनका सम्मान पूरी तरह नष्ट हो गया। कुछ वर्षों बाद वे बीमारी से मर
गए। मरने से पहले उन्होंने परिवार को बताया था कि उनके पास अपनी निर्दोषता का
प्रमाण है, लेकिन वह प्रमाण कभी सामने नहीं आया।
बीरबल ने ध्यान से पूछा कि क्या वह व्यापारी अभी जीवित है। माधव ने कहा कि वह
स्वयं तो मर चुका है, लेकिन उसका बेटा और पोता अभी भी शहर में रहते हैं और बहुत
बड़े व्यापारी हैं। बीरबल ने पूछा कि उस पुराने व्यापारी के परिवार का नाम क्या
था। माधव ने नाम बताया। बीरबल उस नाम को सुनकर कुछ देर चुप रहे, क्योंकि वह
परिवार आज भी शहर के सबसे सम्मानित व्यापारिक परिवारों में से एक था। यदि पुराने
मामले में सचमुच कोई धोखा हुआ था, तो इसका प्रभाव आज भी उस परिवार की प्रतिष्ठा पर पड़ सकता
था।
बीरबल ने माधव से पूछा कि वह बूढ़ा व्यक्ति जो कुछ दिन पहले घर आया था,
क्या उसी
व्यापारी परिवार से जुड़ा हो सकता है। माधव ने कहा कि उसे निश्चित रूप से नहीं पता,
लेकिन बूढ़े
व्यक्ति ने पुराने मामले के बारे में बहुत सवाल किए थे। उसने विशेष रूप से पूछा था
कि क्या माधव के पास वह पुराना पत्र अभी भी है। माधव ने कहा कि उसने कोई उत्तर
नहीं दिया और बातचीत बदल दी। अगले ही दिन उसके घर से पेटी चोरी हो गई। बीरबल ने
समझ लिया कि चोर को पत्र के बारे में पहले से जानकारी थी।
उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि माधव के घर की फिर से जाँच की जाए। घर छोटा
था और उसमें कोई विशेष वस्तु नहीं मिली। लेकिन घर के पीछे मिट्टी में पैरों के कुछ
निशान थे। बीरबल ने देखा कि एक व्यक्ति दीवार के पास खड़ा हुआ था और फिर पीछे की
ओर गया था। पास ही उन्हें लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा मिला। वह उसी प्रकार की लकड़ी
का था जिससे पुरानी पेटी बनी थी। बीरबल ने उसे सुरक्षित रख लिया। उन्होंने माधव से
पूछा कि पेटी किस लकड़ी की बनी थी। माधव ने बताया कि वह बहुत पुरानी सागौन की
लकड़ी थी और उसके ऊपर एक विशेष नक्काशी बनी थी। बीरबल ने लकड़ी के टुकड़े को देखा
और कहा कि यह संभवतः उसी पेटी का हिस्सा है।
अब प्रश्न था कि चोर पेटी लेकर गया कहाँ। बीरबल ने शहर के पुराने बाजार में
लकड़ी के सामान बेचने वाले लोगों से पूछताछ शुरू करवाई। एक दुकानदार ने बताया कि
पिछली शाम एक बूढ़ा आदमी एक पुरानी लकड़ी की पेटी लेकर उसके पास आया था। वह उसे
बेचने के बजाय पेटी की मरम्मत करवाना चाहता था। दुकानदार ने कहा कि पेटी की
नक्काशी बहुत पुरानी थी और उसने उससे पूछा था कि यह पेटी उसे कहाँ मिली। बूढ़े
आदमी ने कोई उत्तर नहीं दिया और कुछ देर बाद पेटी लेकर चला गया। बीरबल ने पूछा कि
वह बूढ़ा आदमी कैसा दिखता था। दुकानदार ने उसका हुलिया बताया। वह वही व्यक्ति था
जिसके बारे में माधव के बेटे ने बताया था।
बीरबल ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि शहर के उन सभी स्थानों पर नजर रखी जाए
जहाँ पुरानी वस्तुओं की खरीद-बिक्री होती है। दोपहर तक एक सैनिक खबर लेकर आया कि
एक बूढ़ा व्यक्ति शहर के बाहर स्थित एक पुराने सराय में ठहरा हुआ है और उसके पास
एक बड़ी लकड़ी की पेटी है। बीरबल स्वयं वहाँ पहुँचे। सराय के एक कमरे में वही
पुरानी पेटी रखी थी। बूढ़ा व्यक्ति वहाँ नहीं था। बीरबल ने पेटी को ध्यान से देखा।
ताला लगा था, लेकिन ताला बहुत पुराना था। उन्होंने उसे तोड़ने के बजाय माधव को बुलाया। माधव
ने पेटी देखते ही पहचान लिया।
पेटी खुली तो उसमें कुछ पुराने कपड़े, एक पीतल की छोटी मूर्ति और एक कपड़े में लिपटा
पत्र था। माधव ने पत्र देखते ही उसे पहचान लिया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने
कहा कि यही वह पत्र है जिसके बारे में उसके दादा ने बताया था। बीरबल ने पत्र को
सावधानी से खोला। उसमें पुराने व्यापार का विस्तृत हिसाब लिखा था। पत्र में कुछ
ऐसे नाम और संख्याएँ थीं जिनसे पता चलता था कि उस समय व्यापारी के खजाने से निकली
रकम वास्तव में चोरी नहीं हुई थी, बल्कि व्यापारी के एक साझेदार ने उसे दूसरे खाते में भेजा
था। माधव के दादा ने इस गड़बड़ी का पता लगाया था और इसी कारण उन्होंने यह पत्र
तैयार किया था। लेकिन पत्र कभी सार्वजनिक नहीं हुआ।
बीरबल ने पत्र पढ़कर कहा कि माधव के दादा सचमुच निर्दोष थे। उन्होंने परिवार
से कहा कि यह पत्र केवल उनके परिवार की प्रतिष्ठा वापस नहीं करेगा, बल्कि पुराने
अन्याय को भी सामने लाएगा। लेकिन अभी उन्हें यह पता लगाना था कि बूढ़ा आदमी कौन था
और उसने पेटी क्यों चुराई। उसी समय सैनिकों ने खबर दी कि बूढ़ा व्यक्ति सराय के
पीछे से निकलने की कोशिश कर रहा है। उसे पकड़कर दरबार में लाया गया।
अकबर के सामने उस बूढ़े व्यक्ति ने अपना नाम बताया। वह उसी पुराने व्यापारी के
परिवार का दूर का रिश्तेदार था। उसने स्वीकार किया कि उसे अपने परिवार के पुराने
इतिहास के बारे में कुछ जानकारी मिली थी। उसे डर था कि यदि माधव के परिवार के पास
वह पत्र रहा तो उसके परिवार की प्रतिष्ठा समाप्त हो सकती है। इसलिए उसने पत्र नष्ट
करने के लिए पेटी चुराई थी। उसने यह भी बताया कि उसे पुराने मामले के बारे में
जानकारी उसके दादा की पुरानी डायरी से मिली थी। जब उसे पता चला कि माधव के परिवार
के पास प्रमाण है, तो उसने चोरी की योजना बनाई।
अकबर ने उससे पूछा कि यदि उसे पत्र नष्ट करना ही था तो उसने पेटी को बेचने की
कोशिश क्यों की। उसने कहा कि वह शहर से बाहर जाने की तैयारी कर रहा था और रास्ते
में किसी सुनसान जगह पर पत्र जला देना चाहता था। लेकिन पेटी भारी थी और उसे डर था
कि रास्ते में पकड़ा जाएगा। इसलिए वह सराय में रुक गया। यही उसकी गलती थी।
बीरबल ने कहा कि अपराधी चाहे कितना भी सावधान हो, उसके मन का डर उसे किसी न
किसी मोड़ पर रोक देता है। इस व्यक्ति ने चोरी तो कर ली, लेकिन उसके बाद उसे समझ
नहीं आया कि पत्र कहाँ और कैसे नष्ट करे। यही उसकी कमजोरी बनी। उसने पेटी छिपाने
के लिए जगह बदली, लकड़ी के टुकड़े छोड़े और अंततः उसी सराय में रुक गया जहाँ
सैनिकों की नजर पहुँच गई।
माधव ने बीरबल के सामने हाथ जोड़कर कहा कि उन्होंने उसके परिवार को केवल एक पुराना पत्र वापस नहीं दिलाया, बल्कि उसके दादा का सम्मान
भी वापस दिलाया है। बीरबल ने कहा कि सच्चाई को सामने आने में कभी-कभी वर्षों लग
जाते हैं, लेकिन यदि प्रमाण सुरक्षित रहे तो न्याय की उम्मीद कभी समाप्त नहीं होती। अकबर
ने आदेश दिया कि पुराने मामले की आधिकारिक जाँच की जाए और माधव के परिवार के साथ
हुए अन्याय को राजकीय रिकॉर्ड में सुधारा जाए।
दरबार में उपस्थित लोगों ने बीरबल की प्रशंसा की। अकबर ने कहा कि इस मामले में
कोई सोने की चोरी नहीं थी, फिर भी यह चोरी उतनी ही गंभीर थी क्योंकि इसमें एक परिवार
की सच्चाई को हमेशा के लिए मिटाने का प्रयास किया गया था। बीरबल ने उत्तर दिया कि
धन की चोरी से कभी-कभी धन वापस पाया जा सकता है, लेकिन सम्मान और सत्य की
चोरी उससे कहीं अधिक गंभीर होती है। इसलिए न्याय केवल चुराई हुई वस्तु वापस दिलाने
का नाम नहीं, बल्कि सच को उसका उचित स्थान देने का नाम भी है।
उस शाम अकबर ने बीरबल से कहा कि आज की घटना ने उन्हें फिर याद दिलाया कि “चोर
की दाढ़ी में तिनका” केवल मजाकिया कहावत नहीं है। हर अपराधी अपने पीछे कोई न कोई
निशान छोड़ जाता है। कभी वह तिनका होता है, कभी टूटी लकड़ी, कभी गलत बात,
कभी घबराई हुई
नजर और कभी ऐसा निर्णय जो केवल अपराधी ही कर सकता है। बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि
इंसान अपने हाथों से अपराध करता है, लेकिन उसका मन अक्सर उसके खिलाफ गवाही देता है।
माधव अपने परिवार की पुरानी पेटी और पत्र लेकर घर लौट गया। उसने उस रात पहली
बार अपने पिता और दादा के बारे में गर्व से सोचा। उसे लगा कि वर्षों से उनके
परिवार पर जो कलंक था, वह अब मिट गया है। दूसरी ओर, वह बूढ़ा अपराधी अपने किए
पर पछता रहा था। उसने सोचा कि यदि उसने अपने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के बजाय सच
को स्वीकार कर लिया होता तो शायद उसे यह अपराध करने की आवश्यकता ही न पड़ती।
लेकिन बीरबल के मन में एक और विचार चल रहा था। पत्र में जिस पुराने व्यापारी
के साझेदार का नाम था, वह व्यक्ति वर्षों पहले मर चुका था। फिर भी उसके बारे में
कुछ ऐसा लिखा था जो इस पुराने मामले को एक और रहस्य से जोड़ता था। पत्र के अंतिम
हिस्से में एक वाक्य था, जिसमें लिखा था कि “जिस व्यक्ति ने यह धन छिपाया है,
वह अभी भी अपने
असली रहस्य को अपने साथ लेकर घूम रहा है।” बीरबल ने उस वाक्य को पढ़कर भौंहें
सिकोड़ लीं। यदि धन सचमुच कहीं छिपाया गया था, तो क्या वह आज भी मौजूद था?
और यदि था,
तो कहाँ?
अकबर ने जब यह बात सुनी तो उन्होंने कहा कि शायद यह कहानी यहीं समाप्त हो जानी
चाहिए। बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि जहाँपनाह, कभी-कभी एक पुराना अपराध
अपने साथ दूसरे रहस्य की चाबी भी लेकर आता है। शायद यह केवल पत्र की कहानी नहीं
है। शायद चालीस वर्ष पहले जो धन गायब हुआ था, उसका कुछ हिस्सा अभी भी
कहीं छिपा है।
अकबर ने आश्चर्य से पूछा कि क्या इतने वर्षों बाद भी उस धन का पता लगाया जा
सकता है। बीरबल ने कहा कि यदि चोर ने धन छिपाया था, तो उसने उसे कहीं न कहीं
छिपाया होगा। और यदि वह स्थान आज भी मौजूद है, तो उसके आसपास कोई निशान
अवश्य बचा होगा।
अगले दिन बीरबल पुराने व्यापारी के परिवार के घर पहुँचे। वहाँ उन्होंने पुराने
कागजात, जमीन के नक्शे और व्यापार की पुस्तकों की जाँच शुरू की। उन्हें पता चला कि
चालीस वर्ष पहले व्यापारी की संपत्ति के पीछे एक बड़ा बगीचा था, जिसमें एक
पुराना कुआँ और पत्थर का छोटा कमरा था। व्यापार की पुस्तकों में उस कमरे का उल्लेख
कई बार हुआ था, लेकिन बाद के रिकॉर्ड में उसका नाम गायब था।
बीरबल ने उस स्थान को देखने का निर्णय लिया। उन्हें क्या पता था कि उस पुराने
कमरे की मिट्टी के नीचे छिपा एक रहस्य न केवल पुराने चोरी के मामले को पूरी तरह
सुलझाएगा, बल्कि यह भी बताएगा कि आखिर असली चोर कौन था और उसने इतने वर्षों तक अपना राज
कैसे छिपाए रखा।
और यहीं से “चोर की दाढ़ी में तिनका” की कहानी अपने सबसे बड़े रहस्य की ओर बढ़ने लगी।
अगली सुबह बीरबल सूरज निकलने से पहले ही पुराने व्यापारी के घर पहुँच गए। उनके
साथ कुछ सैनिक, एक अनुभवी राजमिस्त्री और पुराने दस्तावेजों को समझने वाला
एक मुंशी था। बीरबल ने व्यापारी के परिवार से उस पुराने बगीचे के बारे में जानकारी
ली जिसके बारे में चालीस वर्ष पुराने कागजों में उल्लेख था। परिवार के वर्तमान
मुखिया ने बताया कि वह बगीचा अब उनके घर का हिस्सा नहीं रहा। कई वर्ष पहले जमीन का
कुछ भाग बेच दिया गया था और बाकी हिस्सा धीरे-धीरे उजड़ गया। पुराने कुएँ और पत्थर
के कमरे का भी अब कोई उपयोग नहीं था। बीरबल ने पूछा कि क्या उस जगह पर कोई निर्माण
हुआ है। व्यापारी ने कहा कि नहीं, वहाँ केवल झाड़ियाँ और पुराने पेड़ हैं। बीरबल ने तुरंत उस
स्थान पर चलने का निर्णय लिया।
बगीचे में पहुँचते ही बीरबल ने चारों ओर ध्यान से देखा। जगह बहुत सुनसान थी।
बड़े-बड़े पेड़ों की जड़ें जमीन से बाहर निकल आई थीं और झाड़ियों के बीच पुराने
पत्थर बिखरे पड़े थे। कुछ दूरी पर एक सूखा हुआ कुआँ था और उसके पास आधी टूटी हुई
दीवारों वाला छोटा पत्थर का कमरा दिखाई दे रहा था। बीरबल ने सबसे पहले कमरे की
दीवारों को देखा। पत्थर बहुत पुराने थे, लेकिन एक दीवार बाकी दीवारों की तुलना में कुछ
अलग दिखाई दे रही थी। उसकी मिट्टी अपेक्षाकृत नई थी। उन्होंने राजमिस्त्री से पूछा
कि क्या वह बता सकता है कि इस दीवार की मरम्मत कब हुई होगी। राजमिस्त्री ने
पत्थरों को छूकर कहा कि दीवार बाकी हिस्से से बाद में बनाई गई है। संभवतः किसी ने
कई वर्ष पहले यहाँ कुछ छिपाने के बाद दीवार को दोबारा बंद किया था।
बीरबल की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने सैनिकों से कहा कि दीवार के उस हिस्से
को सावधानी से खोला जाए। सैनिकों ने पत्थर हटाने शुरू किए। कुछ ही देर में अंदर एक
छोटा खाली स्थान दिखाई दिया। लेकिन उसमें कोई धन नहीं था। केवल एक पुरानी मिट्टी
की सुराही रखी थी। बीरबल ने सुराही उठाकर देखा। वह खाली थी। सैनिकों को निराशा हुई,
लेकिन बीरबल ने
कहा कि खाली सुराही भी किसी रहस्य का संकेत हो सकती है। उन्होंने सुराही के नीचे
की मिट्टी को ध्यान से देखा। वहाँ मिट्टी का रंग बाकी जमीन से अलग था। बीरबल ने
आदेश दिया कि उस स्थान को खोदा जाए।
कुछ गहराई पर लोहे की एक पतली पट्टी मिली। राजमिस्त्री ने उसे बाहर निकाला तो
पता चला कि वह किसी पुराने संदूक का हिस्सा थी। बीरबल ने कहा कि जमीन के नीचे शायद
कोई बड़ा संदूक है। थोड़ी और खुदाई के बाद लकड़ी और लोहे से बना एक पुराना संदूक
दिखाई दिया। वह बहुत जर्जर था, लेकिन उसके भीतर कुछ भारी वस्तु होने का संकेत मिल रहा था।
सैनिकों ने उसे सावधानी से बाहर निकाला। संदूक पर कोई ताला नहीं था। जब उसे खोला
गया तो उसमें सोने के सिक्के, चाँदी की मुद्राएँ और कुछ पुराने दस्तावेज मिले। सभी लोग
स्तब्ध रह गए।
बीरबल ने सिक्कों को ध्यान से देखा। उन पर वही निशान था जो चालीस वर्ष पहले
व्यापारी के खातों में दर्ज सोने की मुद्राओं पर था। उन्होंने कहा कि संभवतः यही
वह धन है जिसे चोरी हुआ बताया गया था। लेकिन प्रश्न यह था कि इसे किसने छिपाया था।
माधव के दादा पर जिस धन की चोरी का आरोप लगाया गया था, वह वास्तव में यहाँ छिपा
हुआ था। यदि ऐसा था, तो माधव के दादा निर्दोष थे। लेकिन असली चोर कौन था?
बीरबल ने संदूक में मिले दस्तावेजों को पढ़ना शुरू किया। उनमें व्यापार के
पुराने हिसाब थे। एक दस्तावेज में लिखा था कि व्यापारी का साझेदार लगातार व्यापार
में घाटा कर रहा था। उसने कई बार व्यापारी से अतिरिक्त धन माँगा था, लेकिन व्यापारी
ने मना कर दिया था। दूसरे दस्तावेज में कुछ गुप्त भुगतान का उल्लेख था। बीरबल ने
महसूस किया कि साझेदार पर पहले से ही भारी कर्ज था। संभव है कि उसी ने धन चुराया
हो और फिर दोष माधव के दादा पर डाल दिया हो।
लेकिन बीरबल को एक बात परेशान कर रही थी। यदि साझेदार ने धन चुराया था तो उसने
उसे इतने लंबे समय तक छिपाकर क्यों रखा? क्या वह उसे बाद में लेने वाला था? या किसी कारण
से वह धन तक पहुँच ही नहीं पाया? उन्होंने पुराने रिकॉर्ड फिर से देखे। उन्हें पता चला कि
चोरी के कुछ ही दिनों बाद साझेदार अचानक शहर छोड़कर चला गया था। उसके बाद वह कभी
वापस नहीं आया। कुछ वर्ष बाद उसकी मृत्यु की खबर आई थी। उसके परिवार को भी यह नहीं
पता था कि उसने कोई धन कहाँ छिपाया था।
बीरबल ने कहा कि संभवतः साझेदार ने धन चुराकर यहाँ छिपाया और शहर से भागने की
योजना बनाई थी। लेकिन किसी कारण से वह लौट नहीं सका। इस बीच माधव के दादा पर चोरी
का आरोप लगा दिया गया। व्यापारी ने अपने सबसे विश्वसनीय मुंशी पर विश्वास किया और
बिना पर्याप्त जाँच किए उसे दोषी मान लिया। यही उस पुराने अन्याय की जड़ थी।
अचानक बीरबल को एक और बात याद आई। पत्र में लिखा था कि “जिस व्यक्ति ने यह धन
छिपाया है, वह अपने असली रहस्य को अपने साथ लेकर घूम रहा है।” शायद माधव के दादा का मतलब
था कि उन्हें पता था कि असली चोर कौन था, लेकिन उनके पास केवल लिखित प्रमाण था। बीरबल ने
दस्तावेजों में एक पुराना नाम देखा। वह नाम था गोविंददास। यह वही साझेदार था जिसके
बारे में पुराने व्यापारिक रिकॉर्ड में उल्लेख था।
बीरबल ने शहर में गोविंददास के पुराने घर के बारे में पता करवाया। घर वर्षों
से बंद था, लेकिन उसके पुराने नौकर का बेटा अभी भी शहर में रहता था। उसे दरबार में बुलाया
गया। उसने बताया कि उसके पिता अक्सर कहा करते थे कि गोविंददास बहुत चालाक व्यक्ति
था। उसके पास एक छोटी लोहे की चाबी थी जिसे वह हमेशा अपने कपड़ों के भीतर रखता था।
जब भी कोई उस चाबी के बारे में पूछता तो वह कहता कि वह उसके व्यापार की सबसे
महत्वपूर्ण चाबी है। लेकिन उसकी मृत्यु के बाद वह चाबी कभी नहीं मिली।
बीरबल ने तुरंत पूछा कि गोविंददास की मृत्यु कहाँ हुई थी। पता चला कि वह शहर
से बहुत दूर एक दूसरे नगर में बीमारी से मरा था। उसके सामान में कुछ पुराने कपड़े,
व्यापार की
किताबें और एक छोटी लकड़ी की पेटी मिली थी। वह पेटी उसके परिवार को दी गई थी,
लेकिन बाद में
खो गई। बीरबल ने सोचा कि शायद वही चाबी उस पुराने संदूक की थी। यदि गोविंददास ने
धन छिपाया था तो वह किसी समय उसे निकालने के लिए वापस आना चाहता था। लेकिन उसकी
योजना असफल हो गई।
अकबर को जब इस खोज की खबर मिली तो उन्होंने बीरबल को तुरंत दरबार में बुलाया।
बीरबल ने पूरा घटनाक्रम बताया। अकबर ने कहा कि इतने वर्षों बाद भी सत्य का मिल
जाना वास्तव में आश्चर्यजनक है। उन्होंने पूछा कि अब इस धन का क्या किया जाए।
बीरबल ने कहा कि पहले यह तय होना चाहिए कि धन वास्तव में किसका था। यदि यह
व्यापारी का था, तो उसके उत्तराधिकारियों का अधिकार बनता है। लेकिन यदि उस
धन में व्यापार के साझेदार का हिस्सा भी था, तो पुराने कानून के अनुसार
उसकी जाँच आवश्यक होगी। अकबर ने आदेश दिया कि पुराने रिकॉर्डों के आधार पर उचित
निर्णय लिया जाए।
माधव को भी बुलाया गया। जब उसे पता चला कि उसके दादा के नाम पर लगा आरोप पूरी
तरह झूठा था, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा कि उसके दादा जीवन भर इस अन्याय का
दर्द सहते रहे थे। उन्होंने अपने बच्चों से केवल इतना कहा था कि एक दिन सत्य सामने
आएगा। आज वह दिन आ गया था। बीरबल ने कहा कि न्याय देर से आया है, लेकिन आया है।
उन्होंने आदेश दिया कि राजकीय अभिलेखों में माधव के दादा को निर्दोष घोषित किया
जाए।
लेकिन तभी बीरबल ने संदूक में मिले एक छोटे कागज को देखा। उस पर केवल कुछ शब्द
लिखे थे। लिखा था, “धन यहाँ है, लेकिन असली हिसाब उस व्यक्ति के पास है जिसे कोई चोर नहीं
समझेगा।” बीरबल ने कागज पढ़कर माथे पर हाथ रखा। उन्हें समझ आ गया कि कहानी अभी
पूरी नहीं हुई है।
उन्होंने पूछा कि यह कागज किसकी लिखावट में है। पुराने व्यापारी के परिवार के
एक वृद्ध व्यक्ति ने उसे देखकर कहा कि यह लिखावट गोविंददास की नहीं है। बीरबल ने
पूछा कि क्या वह किसी और को पहचानता है। वृद्ध ने कहा कि यह लिखावट शायद पुराने
व्यापारी के छोटे भाई की हो सकती है। लेकिन वह व्यक्ति उस समय शहर में नहीं रहता
था। उसने कई वर्ष पहले व्यापार से अलग होकर दूसरे शहर में घर बसा लिया था।
बीरबल ने तुरंत उसके बारे में जानकारी जुटाने का आदेश दिया। पता चला कि वह
व्यक्ति अब जीवित नहीं था, लेकिन उसका एक पुत्र अभी भी जीवित था और शहर के दूसरे
हिस्से में रहता था। सैनिक उसे लेकर आए। उसने कागज देखते ही कहा कि यह उसके पिता
की लिखावट है। बीरबल ने पूछा कि उसके पिता गोविंददास के बारे में क्या जानते थे।
उसने बताया कि उसके पिता हमेशा कहते थे कि गोविंददास ने व्यापार में धोखा किया था,
लेकिन वे किसी
कारण से यह बात सार्वजनिक नहीं कर सके। उन्होंने कहा था कि यदि कभी पुराने मामले
का सच सामने आए तो एक खास संदूक की तलाश करना।
अब बीरबल समझ गए कि पुराना मामला केवल चोरी का नहीं था। व्यापार में धोखाधड़ी,
छिपे हुए धन और
परिवारों के बीच पुराने विश्वासघात की कई परतें थीं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह
थी कि माधव के दादा के पास जो पत्र था, वह केवल उनकी निर्दोषता का प्रमाण नहीं था। वह
पूरे मामले की पहली कड़ी था।
अकबर ने पूछा कि क्या अब भी कोई रहस्य बाकी है। बीरबल ने कहा कि धन तो मिल गया,
लेकिन यह पता
लगाना बाकी है कि पुराने व्यापारी के परिवार में किसने इतने वर्षों तक इस रहस्य को
छिपाए रखा। यदि किसी व्यक्ति को इस धन की जानकारी थी, तो वह इतने लंबे समय तक चुप
क्यों रहा? और यदि वह सचमुच निर्दोष था, तो उसने माधव के परिवार को पहले ही क्यों नहीं बताया?
इसी बीच दरबार में एक बूढ़ा व्यक्ति आया। उसने कहा कि वह पुराने व्यापारी के
घर में कभी सेवक हुआ करता था। उसने बताया कि उसे चालीस वर्ष पहले की एक घटना याद
है। चोरी वाली रात उसने व्यापारी के छोटे भाई को आधी रात के समय बगीचे की ओर जाते
देखा था। उसके हाथ में एक लोहे का छोटा संदूक था। उसने किसी को यह बात नहीं बताई
क्योंकि उसे डर था कि यदि उसने सच बताया तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। कुछ
दिनों बाद माधव के दादा पर चोरी का आरोप लगा और पूरा मामला वहीं समाप्त हो गया।
बीरबल ने यह सुनकर तुरंत पूछा कि उस बूढ़े सेवक ने इतने वर्षों तक चुप्पी
क्यों साधे रखी। उसने कहा कि वह गरीब था और शक्तिशाली लोगों के खिलाफ बोलने का
साहस नहीं करता था। लेकिन अब उसे लगा कि सच छिपाना भी एक प्रकार का अपराध है।
इसलिए वह सामने आया।
अब पूरी तस्वीर धीरे-धीरे स्पष्ट हो रही थी। गोविंददास ने धन चुराया था,
लेकिन शायद
उसके व्यापारिक साथी और परिवार के कुछ लोगों को इसकी जानकारी थी। माधव के दादा ने
हिसाब में गड़बड़ी पकड़ ली थी। उन्होंने पत्र लिखकर अपनी निर्दोषता और धन की
वास्तविक स्थिति दर्ज की। लेकिन शक्तिशाली लोगों के दबाव के कारण उन्हें चोर बना
दिया गया। गोविंददास धन लेकर भागना चाहता था, लेकिन वह धन बगीचे में छिपा
रह गया। वर्षों बाद वही रहस्य फिर सामने आया।
बीरबल ने अकबर से कहा कि इस घटना से सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि किसी
व्यक्ति पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन न्याय करना कठिन। यदि उस समय थोड़ी भी सावधानी बरती
जाती तो एक निर्दोष व्यक्ति का जीवन बर्बाद नहीं होता। अकबर ने गंभीर होकर कहा कि
राज्य में न्याय केवल अपराधियों को दंड देने से नहीं होता, बल्कि निर्दोषों को बचाने
से भी होता है।
माधव अपने दादा की पुरानी तस्वीर लेकर दरबार से बाहर निकला। उसने तस्वीर को
देखते हुए मन ही मन कहा कि आज उनके सिर से वह कलंक उतर गया है जिसे उन्होंने पूरी
जिंदगी ढोया था। दूसरी ओर बीरबल ने पुराने संदूक को फिर देखा। उन्हें लगा कि इस
संदूक ने चालीस वर्ष तक चुप रहकर भी आखिरकार सच बोल दिया था।
अकबर ने मुस्कुराकर कहा कि बीरबल, अब तो इस मामले में कोई तिनका बचा नहीं होगा।
बीरबल ने उत्तर दिया कि जहाँपनाह, तिनका तो हर चोर के साथ रहता है। बस उसे देखने के लिए धैर्य
और सही नजर चाहिए। इस बार तिनका किसी चोर की दाढ़ी में नहीं, बल्कि एक
पुराने पत्थर के कमरे, एक भूले हुए पत्र और एक डरपोक गवाह की याद में छिपा था।
लेकिन जैसे ही सभी लोग यह समझने लगे कि रहस्य समाप्त हो गया है, बीरबल को
पुराने संदूक के तल में एक और छोटी-सी मुहर दिखाई दी। वह मुहर उस व्यापारी परिवार
की नहीं थी। उस पर शाही निशान जैसा एक चिह्न बना था। बीरबल ने उसे हाथ में उठाया
और गंभीर हो गए। चालीस वर्ष पुराने इस मामले में शाही मुहर कैसे आई? क्या उस समय भी
किसी दरबारी का हाथ इस घटना में था? या यह मुहर किसी बिल्कुल अलग कहानी की ओर संकेत
कर रही थी?
बीरबल ने उस मुहर को सुरक्षित रख लिया और अकबर से कहा कि अभी एक आखिरी प्रश्न
का उत्तर बाकी है। यदि उस समय के अपराध में किसी शाही कर्मचारी की भूमिका थी,
तो यह मामला
केवल पुराने व्यापारियों का नहीं रह जाता। अब यह सीधे शाही व्यवस्था की ईमानदारी
से जुड़ जाता था।
और इस तरह “चोर की दाढ़ी में तिनका” की कहानी फिर एक नए मोड़ पर पहुँच गई—जहाँ चालीस साल पुराना अपराध वर्तमान
दरबार के एक पुराने रहस्य से जुड़ने वाला था।
पुराने संदूक से मिली शाही मुहर ने बीरबल के मन में एक नया संदेह पैदा कर दिया
था। चालीस वर्ष पुराने एक व्यापारिक विवाद में शाही मुहर का मिलना साधारण बात नहीं
थी। बीरबल जानते थे कि शाही मुहर का इस्तेमाल केवल विशेष सरकारी दस्तावेजों पर
किया जाता था और उसे बिना अनुमति किसी निजी व्यक्ति के पास होना लगभग असंभव था।
उन्होंने मुहर को ध्यान से देखा। उस पर शाही निशान तो था, लेकिन वह बहुत पुरानी और
घिसी हुई थी। बीरबल ने अकबर के सामने उसे रखते हुए कहा कि यह मुहर वर्तमान समय की
नहीं है। संभव है कि यह किसी पुराने अधिकारी के समय की हो। अकबर ने अपने पुराने
अभिलेखों की जाँच करने का आदेश दिया।
महल के अभिलेखागार में वर्षों पुराने दस्तावेजों का बड़ा संग्रह था। कई
दस्तावेज इतने पुराने थे कि उनके कागज पीले पड़ चुके थे और किनारे टूटने लगे थे।
बीरबल ने एक-एक करके पुराने अधिकारियों की नियुक्ति और जिम्मेदारियों के रिकॉर्ड
देखने शुरू किए। कई घंटों की खोज के बाद उन्हें एक ऐसा दस्तावेज मिला जिस पर
बिल्कुल उसी तरह की मुहर लगी थी। दस्तावेज लगभग चालीस वर्ष पुराना था और उसमें शहर
के व्यापारियों से विशेष कर वसूलने की अनुमति दी गई थी। उस समय शाही राजस्व विभाग
का एक अधिकारी था जिसका नाम रघुनाथ सेन था। उसके हस्ताक्षर उस दस्तावेज पर साफ
दिखाई दे रहे थे।
बीरबल ने पूछा कि रघुनाथ सेन का क्या हुआ। अभिलेख अधिकारी ने बताया कि कुछ
वर्षों बाद उस पर हिसाब में गड़बड़ी करने का आरोप लगा था और उसे पद से हटा दिया
गया था। इसके बाद वह शहर छोड़कर चला गया था। बीरबल ने तुरंत पूछा कि क्या उसके
खिलाफ कोई मुकदमा हुआ था। अधिकारी ने बताया कि मुकदमा शुरू हुआ था, लेकिन कुछ समय
बाद अचानक बंद हो गया। उस समय यह कहा गया था कि पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले। बीरबल
ने यह सुनकर कहा कि शायद उस पुराने मामले की परतें अभी तक पूरी तरह खुली नहीं थीं।
अकबर ने आदेश दिया कि रघुनाथ सेन के बारे में पूरी जानकारी जुटाई जाए। पता चला
कि वह अब जीवित नहीं था, लेकिन उसका परिवार शहर में ही रहता था। उसका पोता, देवदत्त,
एक सम्मानित
व्यापारी था और दरबार में भी उसका आना-जाना था। यह सुनकर बीरबल कुछ देर सोचते रहे।
उन्होंने पूछा कि क्या देवदत्त को अपने दादा के पुराने मामलों की जानकारी है।
अभिलेख अधिकारी ने कहा कि वह अक्सर अपने दादा की ईमानदारी की प्रशंसा करता है और
कहता है कि उसके दादा को गलत तरीके से बदनाम किया गया था।
बीरबल ने उसी दिन देवदत्त को दरबार में बुलवाया। देवदत्त आत्मविश्वास से दरबार
में आया। उसने बादशाह को प्रणाम किया और पूछा कि उसे किस कारण बुलाया गया है।
बीरबल ने बिना भूमिका बनाए शाही मुहर उसके सामने रख दी। देवदत्त ने उसे देखते ही
एक पल के लिए अपनी आँखें झुका लीं। बीरबल ने उस छोटे-से परिवर्तन को तुरंत नोट कर
लिया। उन्होंने पूछा कि क्या उसने इस मुहर को पहले देखा है। देवदत्त ने कहा कि
नहीं। बीरबल ने पूछा कि क्या उसके दादा के पास कभी शाही मुहर रही थी। देवदत्त ने
कहा कि उसके दादा राजस्व अधिकारी थे, इसलिए उनके पास सरकारी दस्तावेजों के लिए मुहर
का अधिकार हो सकता था, लेकिन वह निश्चित नहीं है।
बीरबल ने कहा कि यदि उसे जानकारी नहीं है तो कोई बात नहीं। फिर उन्होंने उससे
पूछा कि क्या वह पुराने व्यापारी परिवार को जानता है। देवदत्त ने कहा कि वह उन्हें
अच्छी तरह जानता है। बीरबल ने पूछा कि क्या उसके दादा का उस परिवार से कभी कोई
विवाद हुआ था। देवदत्त ने उत्तर दिया कि उसे ऐसी कोई जानकारी नहीं। बीरबल ने कुछ
नहीं कहा और देवदत्त को जाने दिया।
अकबर ने पूछा कि क्या देवदत्त पर शक है। बीरबल ने कहा कि केवल मुहर देखकर किसी
पर आरोप नहीं लगाया जा सकता। लेकिन उसके चेहरे पर आया डर उन्हें कुछ बता रहा था।
उन्होंने सैनिकों से देवदत्त की गतिविधियों पर नजर रखने को कहा। दो दिन तक देवदत्त
सामान्य रूप से अपने व्यापार में व्यस्त रहा। वह बाजार जाता, दुकान पर बैठता
और शाम को घर लौटता। ऐसा कोई काम नहीं था जिससे उस पर शक किया जा सके। तीसरे दिन
वह अचानक शहर के पुराने हिस्से में गया और एक सुनसान मकान में प्रवेश किया।
सैनिकों ने उस मकान की निगरानी की। कुछ देर बाद देवदत्त बाहर आया और उसके हाथ में
एक पुरानी कपड़े की थैली थी।
बीरबल ने सैनिकों को आदेश दिया कि उसे रोका न जाए। वे जानना चाहते थे कि वह
थैली कहाँ ले जाता है। देवदत्त सीधे अपने घर गया और थैली को एक कमरे में छिपा
दिया। रात में उसके घर से निकलने के बाद सैनिकों ने उस कमरे की गुप्त जाँच की।
थैली के अंदर पुराने कागज थे। उनमें से एक पर रघुनाथ सेन के हस्ताक्षर थे। दूसरे
कागज में कुछ व्यापारियों से लिए गए धन का हिसाब था। तीसरे कागज पर उसी पुराने
व्यापारी का नाम था जिसके यहाँ माधव के दादा काम करते थे।
अब बीरबल को विश्वास होने लगा कि शाही मुहर और पुराने व्यापारिक मामले के बीच
कोई संबंध था। लेकिन उन्हें यह पता लगाना था कि रघुनाथ सेन की भूमिका क्या थी।
उन्होंने पुराने दस्तावेजों को फिर से पढ़ा। एक रिकॉर्ड में लिखा था कि चोरी के
मामले की जाँच के समय रघुनाथ सेन ने स्वयं व्यापारी के हिसाब की जाँच की थी। उसी
जाँच में माधव के दादा को दोषी ठहराने वाली रिपोर्ट तैयार हुई थी। बीरबल ने सोचा
कि यदि वही अधिकारी भ्रष्ट था तो संभव है कि उसने असली चोर की सहायता की हो।
अगले दिन देवदत्त को फिर बुलाया गया। इस बार बीरबल ने उसके सामने पुराने
दस्तावेज रखे। उन्होंने कहा कि उसके दादा केवल भ्रष्ट नहीं थे, बल्कि संभव है
कि उन्होंने एक निर्दोष व्यक्ति को दोषी ठहराने में भूमिका निभाई हो। देवदत्त ने
तुरंत विरोध किया। उसने कहा कि उसके दादा ऐसा कभी नहीं कर सकते। बीरबल ने पूछा कि
यदि ऐसा नहीं था तो उसके पास इतने पुराने गुप्त दस्तावेज क्यों हैं। देवदत्त चुप
हो गया।
कुछ देर बाद उसने कहा कि उसे अपने दादा की पुरानी संदूकची से ये कागज मिले थे।
उसके दादा ने मृत्यु से पहले उसे बताया था कि उनका नाम एक बड़े मामले में गलत
तरीके से इस्तेमाल हुआ था। उन्होंने कहा था कि असली कहानी कभी सामने नहीं आनी
चाहिए क्योंकि इससे कई शक्तिशाली लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो सकती है। देवदत्त ने
स्वीकार किया कि उसे शाही मुहर के बारे में पता था, लेकिन उसने उसे कभी
इस्तेमाल नहीं किया। वह केवल अपने परिवार की पुरानी प्रतिष्ठा बचाना चाहता था।
बीरबल ने पूछा कि यदि वह सच में निर्दोष था तो उसने यह जानकारी छिपाई क्यों।
देवदत्त ने कहा कि वह डरता था। उसे लगता था कि यदि उसने अपने दादा के बारे में सच
बताया तो उसका परिवार समाज में बदनाम हो जाएगा। बीरबल ने कहा कि किसी परिवार की
प्रतिष्ठा झूठ से नहीं बचती। यदि अपराध हुआ है तो उसे छिपाने से अपराध छोटा नहीं
हो जाता।
लेकिन बीरबल अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने देवदत्त से पूछा कि
क्या उसके दादा ने कभी पुराने व्यापारी से मुलाकात की थी। देवदत्त ने कहा कि हाँ,
चोरी के मामले
से कुछ दिन पहले दोनों के बीच कई बैठकें हुई थीं। बीरबल ने पूछा कि क्या वह जानता
है कि उन बैठकों में क्या हुआ। देवदत्त ने कहा कि उसे केवल इतना पता था कि
व्यापारी अपने व्यापार में एक बड़ी समस्या को लेकर चिंतित था।
बीरबल ने पुराने व्यापारी के परिवार से भी पूछताछ की। परिवार के एक वृद्ध
सदस्य ने बताया कि उसके पिता अक्सर कहते थे कि रघुनाथ सेन ने उन्हें एक बार
चेतावनी दी थी कि उनके व्यापार में कुछ लोग गड़बड़ी कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने यह
नहीं बताया कि वे लोग कौन थे। बीरबल को लगा कि शायद रघुनाथ सेन स्वयं पूरी तरह
अपराधी नहीं था। संभव है कि वह किसी बड़े गिरोह के दबाव में था।
बीरबल ने पुराने दस्तावेजों को क्रम से रखा और घटनाओं की समयरेखा बनाई। चोरी
से कुछ दिन पहले व्यापारी और रघुनाथ सेन की मुलाकात हुई। चोरी के बाद रघुनाथ सेन
ने जाँच की। उसी जाँच में माधव के दादा पर आरोप लगाया गया। कुछ वर्षों बाद रघुनाथ
सेन पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा। फिर उसका मुकदमा अचानक बंद हो गया। अब शाही
मुहर एक ऐसे संदूक में मिली थी जो उसी पुराने धन से जुड़ा था। यह सब केवल संयोग
नहीं हो सकता था।
अचानक बीरबल ने एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान दिया। पुराने दस्तावेजों में
रघुनाथ सेन की मुहर थोड़ी अलग थी। वर्तमान में मिली मुहर के निशान में एक बहुत
छोटा-सा अंतर था। बीरबल ने तुरंत कहा कि यह असली शाही मुहर नहीं है। यह उसकी नकल
है। यह बात बहुत महत्वपूर्ण थी। इसका अर्थ था कि किसी ने शाही मुहर की नकल बनाकर
सरकारी दस्तावेज तैयार किए थे।
अकबर ने पूछा कि ऐसा कौन कर सकता था। बीरबल ने कहा कि केवल वही व्यक्ति जो
राजकीय दस्तावेजों और मुहरों की बनावट से परिचित हो। उन्होंने महल के पुराने मुहर
बनाने वाले कारीगरों के बारे में जानकारी जुटाने का आदेश दिया। पता चला कि चालीस
वर्ष पहले एक कारीगर था जो शाही मुहरों की प्रतिकृतियाँ तैयार करता था। उसका नाम
नसीर था। वह बाद में अचानक गायब हो गया था।
नसीर के पुराने घर की खोज की गई। वहाँ एक बूढ़ी महिला मिली जिसने बताया कि
नसीर के पास बहुत पुराने औजार थे। उसने कहा कि नसीर कभी-कभी रात में भी काम करता
था और कई ऐसे लोगों से मिलता था जिनका नाम वह परिवार को नहीं बताता था। उसने यह भी
बताया कि नसीर के पास एक छोटी लोहे की पेटी थी जिसे वह किसी को छूने नहीं देता था।
पेटी उसके मरने के बाद भी घर में थी।
सैनिकों ने पेटी की तलाशी ली। उसमें कुछ पुराने धातु के टुकड़े, अधूरी मुहरें
और राजकीय निशान की नकली प्रतियाँ मिलीं। अब रहस्य की एक और परत खुल गई। किसी ने
चालीस वर्ष पहले शाही मुहर की नकल बनवाई थी और संभवतः उसी नकली मुहर का इस्तेमाल
व्यापारिक दस्तावेजों में किया गया था। लेकिन प्रश्न अभी भी यही था कि किसने नसीर
को ऐसा करने के लिए मजबूर किया।
बीरबल ने नसीर के परिवार से पूछताछ की। उसके पोते ने बताया कि उसके दादा एक
बार बहुत डरे हुए घर लौटे थे। उन्होंने कहा था कि उन्होंने ऐसा काम किया है जिसके
कारण उनकी जान खतरे में है। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। कुछ दिनों बाद वह शहर
छोड़कर चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए। परिवार को केवल इतना पता था कि उन्हें कुछ
शक्तिशाली लोग धमका रहे थे।
बीरबल ने कहा कि अब उन्हें लगता है कि चालीस वर्ष पहले की चोरी एक अकेले
व्यक्ति का काम नहीं थी। उसमें व्यापारी, उसका साझेदार, राजस्व अधिकारी और नकली
मुहर बनाने वाला कारीगर जैसे कई लोग किसी न किसी रूप में जुड़े थे। माधव के दादा
को इसलिए फँसाया गया क्योंकि वह हिसाब-किताब जानता था और असली गड़बड़ी पकड़ सकता
था।
अकबर ने पूछा कि क्या इस मामले में अब कोई जीवित व्यक्ति है जो पूरी सच्चाई
जानता हो। बीरबल ने कहा कि संभवतः एक व्यक्ति अभी जीवित है। वह वही बूढ़ा सेवक था
जिसने रात में व्यापारी के छोटे भाई को बगीचे की ओर जाते देखा था। बीरबल ने उसे
फिर बुलाया और पूछा कि उस रात उसने किसके हाथ में लोहे का संदूक देखा था। बूढ़े
सेवक ने कहा कि अंधेरा था, इसलिए चेहरा साफ नहीं दिखा। लेकिन उसने एक चीज स्पष्ट रूप
से देखी थी। उस व्यक्ति के दाहिने हाथ में एक बड़ी चाँदी की अंगूठी थी, जिस पर घोड़े
का निशान बना था।
बीरबल ने दरबार में उपस्थित पुराने व्यापारिक परिवार के लोगों की ओर देखा। फिर
उन्होंने पूछा कि उस परिवार में किसके पास घोड़े के निशान वाली चाँदी की अंगूठी
थी। वृद्ध व्यापारी ने कहा कि उनके दादा के छोटे भाई के पास ऐसी अंगूठी थी। वह वही
व्यक्ति था जिसका नाम पहले पुराने कागजों में आया था।
अब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आ रहा था। यदि बूढ़े सेवक की याद
सही थी, तो माधव के दादा पर चोरी का आरोप लगना एक सोची-समझी साजिश थी। लेकिन उस साजिश
में रघुनाथ सेन की क्या भूमिका थी और शाही मुहर की नकली प्रतिकृति क्यों बनाई गई
थी, यह अभी स्पष्ट नहीं था।
बीरबल ने उसी शाम पुराने व्यापारी के परिवार के घर की फिर तलाशी लेने का आदेश
दिया। वहाँ एक पुराने संदूक के नीचे कपड़े में लिपटा हुआ एक पत्र मिला। पत्र पर
रघुनाथ सेन की लिखावट थी। उसमें लिखा था कि यदि कभी यह मामला सामने आए तो यह समझ
लिया जाए कि असली अपराधी वह नहीं है जिस पर आरोप लगाया गया है। उसने यह भी लिखा था
कि उसने दबाव में आकर गलत रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए थे और उसे डर था कि यदि उसने
सच बताया तो उसके परिवार को नुकसान पहुँचाया जाएगा।
पत्र के अंत में एक नाम अधूरा लिखा था। केवल पहले दो अक्षर दिखाई दे रहे थे।
बीरबल ने अनुमान लगाया कि यही वह व्यक्ति था जिसने पूरे मामले की योजना बनाई थी।
लेकिन नाम का बाकी हिस्सा फटा हुआ था। अब बीरबल के सामने एक नई चुनौती थी—उस अधूरे
नाम को पूरा करना।
अकबर ने कहा कि क्या इतने वर्षों बाद उस व्यक्ति का पता लगाना संभव होगा।
बीरबल ने उत्तर दिया कि समय अपराध के निशान मिटा सकता है, लेकिन सभी निशान नहीं।
उन्होंने कहा कि यदि उस व्यक्ति का नाम किसी दस्तावेज, संपत्ति या परिवार के
रिकॉर्ड में बचा है तो वे उसे खोज निकालेंगे।
बीरबल ने पुराने शहर के सभी संपत्ति रिकॉर्ड मँगवाए। कई घंटे तक वे नामों की
सूची देखते रहे। अंततः उन्हें एक ऐसा नाम मिला जिसके शुरुआती अक्षर वही थे जो पत्र
पर लिखे थे। वह व्यक्ति अब जीवित नहीं था, लेकिन उसकी संपत्ति उसके पोते के पास थी। और
सबसे बड़ी बात यह थी कि उसका पोता आज भी दरबार में एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में
आता-जाता था।
बीरबल ने उस नाम को देखकर धीरे से कहा, “अब तिनका दिखाई दे रहा है।”
लेकिन उन्होंने तुरंत उसका नाम सार्वजनिक नहीं किया। क्योंकि उन्हें पता था कि
यदि वे जल्दबाजी करेंगे तो अपराधी का परिवार सारे प्रमाण नष्ट कर सकता है।
उन्होंने सैनिकों को उस व्यक्ति के पोते की गतिविधियों पर नजर रखने का आदेश दिया।
अगले कुछ दिनों में जो घटनाएँ सामने आने वाली थीं, वे साबित करने वाली थीं कि
चालीस वर्ष पुरानी साजिश का एक धागा आज भी जीवित था।
और इस प्रकार “चोर की दाढ़ी में तिनका” की कहानी अब अपने अंतिम और सबसे बड़े रहस्य की ओर बढ़ रही थी—जहाँ बीरबल को यह
साबित करना था कि वर्षों पहले किया गया अपराध भले ही पुराना हो गया हो, लेकिन उसका
तिनका अभी भी वहीं पड़ा है।
अगली सुबह बीरबल ने सबसे पहले उस अधूरे नाम वाले पत्र को अपने सामने रखा। पत्र
पुराना था, कागज के किनारे टूट चुके थे और स्याही भी कई जगह हल्की पड़ गई थी, लेकिन नाम के
जो दो अक्षर बचे थे, वे स्पष्ट थे। बीरबल ने उन अक्षरों को बार-बार देखा और फिर
पुराने संपत्ति रिकॉर्ड से मिलाया। अंततः उन्हें एक ऐसा नाम मिला जो उन अक्षरों से
मेल खाता था। उस व्यक्ति का नाम हरिदास मलिक था। चालीस वर्ष पहले वह शहर के सबसे
प्रभावशाली व्यापारियों में से एक था। उसके पास जमीन, अनाज के गोदाम और दूर-दूर
तक फैला व्यापार था। पुराने रिकॉर्ड के अनुसार उसका संबंध उसी व्यापारी परिवार से
भी था जिसके खजाने से धन गायब हुआ था।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि हरिदास मलिक का पोता आज भी शहर में रहता था और
उसका नाम रतन मलिक था। रतन दरबार में अक्सर आता था और अकबर के प्रशासन में कई
छोटे-बड़े व्यापारिक काम करता था। वह ईमानदार और सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाना
जाता था। किसी ने कभी उस पर शक नहीं किया था। बीरबल ने सोचा कि यही तो अपराध की
सबसे बड़ी ताकत होती है—वह अक्सर अपने चारों ओर विश्वास का ऐसा पर्दा बना देता है
कि कोई उसके पीछे छिपे चेहरे को देख ही नहीं पाता।
बीरबल ने रतन को तुरंत गिरफ्तार नहीं कराया। उन्होंने पहले उसके व्यवहार पर
नजर रखने का निर्णय लिया। सैनिकों को आदेश दिया गया कि वे दूर से उसकी गतिविधियों
पर नजर रखें। रतन रोज की तरह अपने व्यापारिक काम करता रहा। वह बाजार जाता, व्यापारियों से
मिलता और शाम को घर लौट आता। उसके व्यवहार में कोई असामान्यता दिखाई नहीं दी।
लेकिन तीसरे दिन वह अचानक शहर के उस पुराने हिस्से में पहुँचा जहाँ नसीर नाम का
मुहर बनाने वाला कारीगर कभी रहता था। रतन ने उस पुराने मकान के सामने कुछ देर खड़े
होकर चारों ओर देखा और फिर अंदर चला गया।
सैनिकों ने यह खबर बीरबल तक पहुँचाई। बीरबल ने तुरंत वहाँ पहुँचने के बजाय
सैनिकों को इंतजार करने को कहा। वह जानना चाहते थे कि रतन वहाँ किससे मिलने आया
है। लगभग आधे घंटे बाद रतन बाहर निकला। उसके साथ एक बहुत बूढ़ा व्यक्ति था जिसे
देखकर बीरबल ने तुरंत पहचान लिया। वह नसीर का पुराना शिष्य था। रतन ने उसे कुछ
दिया और फिर वहाँ से चला गया। बीरबल ने सैनिकों को आदेश दिया कि बूढ़े व्यक्ति को
शांतिपूर्वक उनके पास लाया जाए।
बूढ़े व्यक्ति ने डरते हुए कहा कि वह किसी अपराध में शामिल नहीं है। बीरबल ने
उसे आश्वस्त किया कि यदि वह सच बताएगा तो उसे सुरक्षा दी जाएगी। बूढ़े ने बताया कि
रतन पिछले कुछ दिनों से उससे एक पुरानी मुहर के बारे में पूछ रहा था। वह जानना
चाहता था कि नसीर ने कभी किसी विशेष शाही मुहर की नकल बनाई थी या नहीं। बीरबल ने
पूछा कि उसने रतन को क्या बताया। बूढ़े ने कहा कि उसने केवल इतना बताया कि उसके
गुरु नसीर ने कभी एक शाही मुहर की प्रतिकृति बनाई थी और उस प्रतिकृति का इस्तेमाल
किसी पुराने व्यापारिक मामले में हुआ था।
बीरबल ने पूछा कि रतन ने उसे क्या दिया। बूढ़े ने एक छोटी कपड़े की थैली
निकाली। उसमें चाँदी के कुछ सिक्के थे। बीरबल ने कहा कि इसका मतलब रतन केवल
जानकारी लेने नहीं आया था। वह पुराने प्रमाण खोज रहा था। बूढ़े ने सिर झुका लिया
और कहा कि रतन ने उससे कहा था कि यदि उसे पुराने कागज या मुहर का कोई निशान मिले
तो वह उसे दे। बदले में उसे धन मिलेगा।
अब बीरबल के पास रतन के खिलाफ पहला मजबूत संकेत था। लेकिन वह अभी भी सीधे
कार्रवाई नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि केवल इतना प्रमाण यह साबित नहीं
करता कि रतन स्वयं अपराध में शामिल है। हो सकता है कि वह अपने दादा की पुरानी
प्रतिष्ठा बचाने के लिए ऐसा कर रहा हो। उन्हें ऐसा प्रमाण चाहिए था जिससे यह साबित
हो कि वह पुराने अपराध के रहस्य को छिपाने की कोशिश कर रहा है।
बीरबल ने एक योजना बनाई। उन्होंने एक नकली दस्तावेज तैयार करवाया और उस पर
पुराने समय की तरह की मुहर लगवाई। दस्तावेज में लिखा गया कि पुराने व्यापारी के
मामले से संबंधित एक और प्रमाण राजकीय अभिलेखागार में सुरक्षित है और उसमें हरिदास
मलिक का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है। बीरबल ने जानबूझकर यह खबर कुछ ऐसे लोगों के
माध्यम से फैलवाई जिनके बारे में उन्हें पता था कि वे रतन तक बात पहुँचा देंगे।
दो दिन बाद रतन ने अभिलेखागार में जाने की कोशिश की। वह वहाँ एक पुराने
कर्मचारी से मिला और उसने कहा कि उसे एक विशेष दस्तावेज देखना है। कर्मचारी ने उसे
बताया कि ऐसा कोई दस्तावेज देखने के लिए बीरबल की अनुमति आवश्यक है। रतन वहाँ से
चला गया, लेकिन उसी रात उसने एक व्यक्ति को अभिलेखागार के पीछे भेजा। सैनिक पहले से ही
वहाँ छिपे थे। उन्होंने उस व्यक्ति को पकड़ लिया। उसके पास नकली चाबी और एक छोटा
लोहे का औजार था।
जब उस व्यक्ति से पूछताछ हुई तो उसने स्वीकार किया कि उसे रतन ने भेजा था।
उसका काम केवल इतना था कि वह उस पुराने दस्तावेज को खोजकर नष्ट कर दे। अब बीरबल के
पास पर्याप्त प्रमाण था कि रतन पुराने मामले से जुड़ी जानकारी को मिटाने की कोशिश
कर रहा था।
अकबर ने रतन को दरबार में बुलवाया। रतन को जैसे ही पता चला कि उसे किस कारण
बुलाया गया है, उसके चेहरे की रंगत बदल गई। फिर भी उसने स्वयं को शांत रखने
की कोशिश की। अकबर ने पूछा कि क्या उसने किसी व्यक्ति को अभिलेखागार में भेजा था।
रतन ने तुरंत कहा कि नहीं। बीरबल ने उस व्यक्ति को सामने बुलाया। उसने रतन की ओर
देखते हुए कहा कि उसी ने उसे भेजा था।
रतन ने कहा कि वह झूठ बोल रहा है। बीरबल ने पूछा कि यदि वह झूठ बोल रहा है तो
उसके पास रतन द्वारा दिए गए सिक्के कहाँ से आए। सैनिकों ने सिक्कों की थैली सामने
रख दी। रतन चुप हो गया। बीरबल ने फिर पूछा कि वह नसीर के पुराने शिष्य से क्यों
मिला था। रतन ने कोई उत्तर नहीं दिया।
कुछ देर बाद रतन ने कहा कि वह अपने दादा की प्रतिष्ठा बचाना चाहता था। उसने
स्वीकार किया कि उसे अपने दादा के बारे में कुछ ऐसी बातें पता चली थीं जो उसके
परिवार को बदनाम कर सकती थीं। लेकिन उसने कहा कि उसने कोई चोरी नहीं की। बीरबल ने
कहा कि अभी तक उन्होंने उस पर चोरी का आरोप भी नहीं लगाया। उन्होंने केवल पूछा था
कि उसने पुराने प्रमाण नष्ट करने की कोशिश क्यों की।
रतन ने सिर झुका लिया। फिर उसने बताया कि उसके दादा हरिदास मलिक वास्तव में उस
पुराने व्यापारिक मामले में शामिल थे। लेकिन रतन के अनुसार हरिदास अकेले नहीं थे।
उस समय कई बड़े व्यापारी मिलकर व्यापारिक करों और सरकारी धन में हेराफेरी करते थे।
रघुनाथ सेन को भी इस समूह में शामिल किया गया था। नसीर से नकली शाही मुहर बनवाई गई
थी और उसका इस्तेमाल झूठे सरकारी दस्तावेज तैयार करने में किया जाता था। माधव के
दादा ने हिसाब में गड़बड़ी पकड़ ली थी। इसलिए उन्हें दोषी बनाकर रास्ते से हटाया
गया।
बीरबल ने पूछा कि चोरी का धन किसने छिपाया। रतन ने कहा कि उसे निश्चित रूप से
नहीं पता। उसके दादा ने मरने से पहले केवल इतना कहा था कि धन कभी वापस नहीं लिया
जा सका। संभव है कि उसे गोविंददास ने छिपाया हो, लेकिन हरिदास को उस स्थान
की जानकारी थी। बीरबल ने पूछा कि यदि ऐसा था तो हरिदास ने धन वापस क्यों नहीं
लिया। रतन ने कहा कि शायद परिस्थितियाँ बदल गई थीं। कुछ लोग मर गए, कुछ भाग गए और
कुछ के बीच विश्वास नहीं रहा। अंततः रहस्य दफन रह गया।
अकबर ने कहा कि फिर माधव के दादा को दोषी क्यों ठहराया गया। रतन ने कहा कि
क्योंकि वे सबसे आसान निशाना थे। वे ईमानदार थे, लेकिन शक्तिशाली नहीं थे।
उन्हें बदनाम करना आसान था और किसी ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया।
दरबार में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। अकबर ने गंभीर होकर कहा कि यह केवल
एक व्यक्ति पर किया गया अन्याय नहीं था। यह पूरी व्यवस्था की कमजोरी थी। यदि
अधिकारी सत्य की जाँच करने के बजाय शक्तिशाली लोगों की बात मान लें तो न्याय का
कोई अर्थ नहीं रह जाता।
बीरबल ने रतन से पूछा कि उसने यह सब जानते हुए इतने वर्षों तक चुप्पी क्यों
साधी। रतन ने कहा कि वह अपने परिवार से डरता था। उसके पिता ने उसे चेतावनी दी थी
कि यदि उसने पुराने मामले की चर्चा की तो परिवार की प्रतिष्ठा नष्ट हो जाएगी।
बीरबल ने कहा कि प्रतिष्ठा सच छिपाने से नहीं बचती। बल्कि जितना अधिक झूठ छिपाया
जाता है, उतना ही बड़ा कलंक बनता जाता है।
इसके बाद बीरबल ने माधव को दरबार में बुलाया। उसके सामने पुराने सभी दस्तावेज
रखे गए। रतन ने स्वयं स्वीकार किया कि माधव के दादा निर्दोष थे। माधव की आँखों में
आँसू आ गए। उसने कहा कि उसके परिवार ने चालीस वर्ष तक यह अपमान सहा है। उसने कभी
बदला लेने की इच्छा नहीं की, केवल इतना चाहता था कि उसके दादा को चोर न कहा जाए।
अकबर ने उसी समय आदेश दिया कि माधव के दादा का नाम राजकीय रिकॉर्ड में सम्मान
के साथ दर्ज किया जाए। उनके परिवार को क्षतिपूर्ति भी दी जाए और पुराने मामले की
सच्चाई सार्वजनिक की जाए। साथ ही उन लोगों की संपत्ति और पुराने दस्तावेजों की
जाँच का आदेश दिया गया जो उस साजिश से लाभान्वित हुए थे।
बीरबल ने कहा कि इस मामले में एक बात सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि
अपराधी अक्सर यह सोचता है कि यदि वह प्रमाण मिटा देगा तो अपराध भी मिट जाएगा।
लेकिन प्रमाण केवल कागजों में नहीं होते। लोगों की यादें, पुराने घर, टूटी दीवारें,
हस्तलिखित पत्र,
सिक्के,
मुहरें और यहाँ
तक कि किसी व्यक्ति की एक छोटी-सी गलती भी सच तक पहुँचने का रास्ता बन सकती है।
अकबर मुस्कुराए और बोले कि इस बार सचमुच चोर की दाढ़ी में तिनका दिखाई दे गया।
बीरबल ने कहा कि जहाँपनाह, तिनका बहुत छोटा था, लेकिन उसे छिपाने के लिए
चोर ने बहुत बड़ी कहानी बना दी थी। अंततः वही कहानी उसके खिलाफ गवाही बन गई।
रतन को दंड दिया गया, लेकिन बीरबल ने उसके लिए एक बात की सिफारिश की। उन्होंने
कहा कि रतन ने अपराध छिपाने की कोशिश की थी, लेकिन उसने अंत में सच
स्वीकार किया है। इसलिए उसे ऐसा दंड दिया जाए जिसमें वह समाज के सामने अपने परिवार
के पुराने अपराध की सच्चाई बताए और माधव के परिवार से सार्वजनिक रूप से क्षमा
माँगे। अकबर ने बीरबल की सलाह स्वीकार की।
कुछ दिनों बाद शहर के मुख्य चौक पर लोगों की सभा हुई। वहाँ रतन ने सबके सामने
माधव के दादा को निर्दोष बताया। उसने स्वीकार किया कि उसके परिवार के लोगों ने
लालच और भय के कारण एक ईमानदार व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाया था। माधव ने उसकी ओर
देखा और कहा कि वह बदला नहीं चाहता। वह केवल चाहता है कि आने वाली पीढ़ियाँ इस
घटना से सीखें।
सभा के बाद बीरबल ने अकबर से कहा कि आज न्याय पूरा हुआ। अकबर ने पूछा कि
उन्हें ऐसा क्यों लगता है। बीरबल ने कहा कि जब अपराधी को दंड मिलता है तो न्याय का
एक हिस्सा पूरा होता है, लेकिन जब निर्दोष व्यक्ति का सम्मान वापस मिलता है तब न्याय
वास्तव में पूर्ण होता है।
उस रात अकबर और बीरबल महल की छत पर बैठे थे। आसमान में चाँद चमक रहा था। अकबर
ने कहा कि उन्होंने जीवन में कई अपराध देखे हैं, लेकिन इस मामले ने उन्हें
एक अलग बात सिखाई। कभी-कभी अपराध करने वाला व्यक्ति वर्षों तक सम्मानित जीवन जीता
है, जबकि निर्दोष व्यक्ति बदनामी सहता रहता है। बीरबल ने कहा कि यही कारण है कि
न्याय करने वाले व्यक्ति को केवल वर्तमान नहीं, बल्कि अतीत के निशानों को
भी देखना चाहिए।
अकबर ने मुस्कुराकर पूछा कि अब क्या कोई और तिनका बाकी है। बीरबल ने कहा कि
नहीं, जहाँपनाह। इस बार दाढ़ी भी साफ है और तिनका भी सामने है। फिर दोनों हँस पड़े।
लेकिन बीरबल ने जाते-जाते एक अंतिम बात कही। उन्होंने कहा कि “चोर की दाढ़ी
में तिनका” केवल चोर को पकड़ने की कहानी नहीं है। यह मनुष्य को यह याद दिलाती है
कि गलत काम करने के बाद वह चाहे जितना छिपे, उसका अपना डर, उसकी अपनी गलती
और उसकी अपनी बेचैनी किसी न किसी दिन उसे उजागर कर देती है। इसलिए सबसे सुरक्षित
रास्ता हमेशा सच का रास्ता है। झूठ को बचाने के लिए एक झूठ बोलना पड़ता है,
फिर उस झूठ को
बचाने के लिए दूसरा, और धीरे-धीरे इंसान अपने ही बनाए जाल में फँस जाता है। सच
बोलने वाले को शायद कुछ समय के लिए कठिनाई हो, लेकिन उसे अपने पीछे कोई
तिनका छिपाने की जरूरत नहीं पड़ती।
इस प्रकार चालीस वर्ष पुराने अपराध का रहस्य समाप्त हुआ। माधव के दादा का
सम्मान लौट आया, चोरी का धन बरामद हुआ, नकली शाही मुहर का रहस्य
खुला और उन लोगों की साजिश सामने आई जिन्होंने लालच और डर के कारण एक निर्दोष
व्यक्ति का जीवन बर्बाद कर दिया था। बीरबल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बुद्धि
केवल कठिन प्रश्नों का उत्तर देने का नाम नहीं है। सच्ची बुद्धि वह है जो अंधेरे
में छिपे छोटे-से-छोटे संकेत को पहचानकर सत्य तक पहुँच सके।
और उस दिन से जब भी दरबार में कोई व्यक्ति किसी अपराध को छिपाने की कोशिश करता,
अकबर
मुस्कुराकर बीरबल की ओर देखते और कहते, “बीरबल, कहीं किसी की दाढ़ी में तिनका तो नहीं?” बीरबल हँसकर
उत्तर देते, “जहाँपनाह, तिनका चाहे जितना छोटा हो, अगर अपराध बड़ा है तो वह एक
दिन दिखाई अवश्य देगा।”
यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख थी—झूठ कितना भी पुराना क्यों न हो,
सच की एक छोटी-सी किरण उसे उजागर करने के लिए पर्याप्त होती है।
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