बहुत समय पहले की बात है। मुगल सम्राट अकबर का दरबार अपनी भव्यता, न्यायप्रियता
और विद्वान दरबारियों के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था। उस दरबार में अनेक
बुद्धिमान, अनुभवी और योग्य लोग थे, लेकिन उनमें सबसे अलग स्थान था बीरबल का। बीरबल केवल अपनी
हाजिरजवाबी के लिए ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि उनकी बुद्धि, सूझ-बूझ, धैर्य और
न्यायप्रियता की भी हर कोई प्रशंसा करता था। बादशाह अकबर को बीरबल पर बहुत विश्वास
था। जब भी दरबार में कोई कठिन समस्या आती, अकबर अक्सर बीरबल की ओर देखते और बीरबल अपनी
बुद्धिमानी से ऐसी बात कह देते कि कठिन से कठिन समस्या का हल भी सरल लगने लगता।
लेकिन हर किसी को बीरबल की यह प्रसिद्धि पसंद नहीं थी। दरबार में कुछ ऐसे
दरबारी भी थे जिन्हें लगता था कि बादशाह अकबर बीरबल को आवश्यकता से अधिक महत्व
देते हैं। वे मन ही मन बीरबल से ईर्ष्या करते थे। उन्हें लगता था कि यदि किसी दिन
बीरबल को किसी ऐसी परीक्षा में असफल कर दिया जाए, जिसमें उनकी बुद्धि काम न
आए, तो बादशाह का विश्वास भी कम हो सकता है। कई बार वे मिलकर बीरबल को नीचा दिखाने
की योजना बनाते, लेकिन बीरबल की समझदारी के सामने उनकी सारी योजनाएँ असफल हो
जातीं।
एक दिन सुबह का समय था। बादशाह अकबर अपने विशाल दरबार में सिंहासन पर बैठे थे।
दरबार में सभी मंत्री, सेनापति, विद्वान और अन्य दरबारी उपस्थित थे। वातावरण शांत था। तभी
एक दरबारी ने आगे बढ़कर बादशाह को सलाम किया और बोला, “जहाँपनाह, आज मैं आपसे एक
बात पूछना चाहता हूँ।”
अकबर ने उसकी ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, “पूछो। हमारे दरबार में
प्रश्न पूछने की पूरी आज़ादी है।”
दरबारी ने कहा, “जहाँपनाह, हम सभी जानते हैं कि बीरबल बहुत बुद्धिमान हैं। वे हर
प्रश्न का उत्तर दे देते हैं और हर कठिन परिस्थिति से निकल आते हैं। लेकिन क्या
कोई ऐसी परीक्षा भी हो सकती है जिसमें बीरबल की बुद्धि वास्तव में परखी जा सके?”
दरबार में हल्की-सी फुसफुसाहट होने लगी। कुछ दरबारी एक-दूसरे की ओर देखकर
मुस्कुराए। अकबर ने तुरंत समझ लिया कि इस प्रश्न के पीछे कोई साधारण जिज्ञासा नहीं
थी।
अकबर ने गंभीर होकर पूछा, “तुम कहना क्या चाहते हो?”
दरबारी ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, मेरा उद्देश्य बीरबल का अपमान करना नहीं है। मैं केवल यह
देखना चाहता हूँ कि क्या उनकी बुद्धि वास्तव में उतनी ही अद्भुत है, जितनी हम सब
कहते हैं।”
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। बीरबल शांत भाव से खड़े थे। उनके चेहरे पर न क्रोध
था, न चिंता। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “जहाँपनाह, यदि कोई मेरी परीक्षा लेना
चाहता है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। आखिर परीक्षा से ही तो योग्यता का पता चलता
है।”
अकबर ने कहा, “बीरबल, क्या तुम सचमुच परीक्षा के लिए तैयार हो?”
“जी हुजूर,” बीरबल ने उत्तर दिया, “लेकिन मेरी एक छोटी-सी शर्त
है।”
अकबर हँस पड़े। “तुम्हारी शर्त भी सुन लेते हैं।”
बीरबल ने कहा, “मेरी परीक्षा चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, उसका निर्णय
केवल परिणाम से होना चाहिए, किसी की पहले से बनी हुई धारणा से नहीं।”
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “बिल्कुल सही। तुम्हारी बात स्वीकार है।”
दरबार में मौजूद दरबारियों में से एक, जो बीरबल से सबसे अधिक ईर्ष्या करता था, आगे आया। उसने
कहा, “जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं बीरबल के लिए पहली परीक्षा प्रस्तुत
कर सकता हूँ।”
अकबर ने सिर हिलाकर अनुमति दे दी।
दरबारी ने कहा, “बीरबल को ऐसी वस्तु खोजकर लानी होगी जो दिखाई भी दे और
दिखाई न भी दे, जिसे पकड़ा भी जा सके और पकड़ा भी न जा सके, और जिसके बिना
कोई मनुष्य एक पल भी जीवित न रह सके।”
यह सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया।
कुछ दरबारियों ने सोचा कि इस बार बीरबल फँस गए। प्रश्न सुनने में सरल था,
लेकिन उसका
उत्तर देना आसान नहीं था। किसी ने सोचा कि शायद यह हवा हो सकती है, क्योंकि हवा
दिखाई नहीं देती लेकिन महसूस की जा सकती है। कोई सोचने लगा कि शायद पानी हो,
क्योंकि पानी
को पकड़ा जा सकता है और वह जीवन के लिए आवश्यक है। लेकिन प्रश्न में कहा गया था कि
वस्तु दिखाई भी दे और दिखाई न भी दे, पकड़ी भी जाए और पकड़ी भी न जाए। बात उलझी हुई
थी।
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। “कहो बीरबल, क्या तुम्हें उत्तर मिल गया?”
बीरबल ने कुछ क्षण आँखें बंद कीं और फिर मुस्कुराए।
“जहाँपनाह, उत्तर तो मिल गया है।”
दरबारियों के चेहरों पर आश्चर्य फैल गया।
अकबर ने पूछा, “तो फिर उत्तर बताने में देर क्यों?”
बीरबल बोले, “क्योंकि केवल उत्तर बताना पर्याप्त नहीं होगा। परीक्षा में
मुझे वस्तु प्रस्तुत भी करनी होगी।”
अकबर ने कहा, “ठीक है। तुम्हें कितना समय चाहिए?”
बीरबल ने कहा, “मुझे केवल एक दिन का समय चाहिए।”
अकबर ने अनुमति दे दी।
दरबार समाप्त होने के बाद बीरबल अपने घर लौटे। रास्ते भर वे सोचते रहे। उन्हें
पता था कि यह परीक्षा केवल पहेली का उत्तर देने के लिए नहीं थी। दरबारी उन्हें ऐसी
स्थिति में डालना चाहते थे जहाँ कोई भी उत्तर गलत सिद्ध किया जा सके। यदि वे हवा
कहते, तो दरबारी कहते कि हवा दिखाई नहीं देती। यदि पानी कहते, तो कहा जाता कि पानी को हाथ
में पकड़ा जा सकता है। यदि प्रकाश कहते, तो कहा जाता कि प्रकाश को पकड़ना संभव नहीं।
इसलिए उन्हें ऐसा उत्तर देना था जो प्रश्न के हर हिस्से को सही साबित कर सके।
बीरबल घर पहुँचे तो उनकी बेटी ने पूछा, “पिताजी, आज आप इतने
विचार में क्यों हैं?”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “आज दरबार में मेरी परीक्षा ली गई है।”
बेटी ने उत्सुकता से पूछा, “और प्रश्न क्या था?”
बीरबल ने पूरी बात बताई। बेटी कुछ देर सोचती रही और बोली, “पिताजी,
क्या उसका
उत्तर छाया नहीं हो सकता?”
बीरबल ने उसकी ओर ध्यान से देखा। “छाया?”
बेटी ने कहा, “हाँ। छाया दिखाई देती है, लेकिन उसे हाथ से पकड़ा
नहीं जा सकता। जब प्रकाश होता है तो वह हमारे साथ रहती है, लेकिन अंधेरे में गायब हो
जाती है।”
बीरबल मुस्कुराए, लेकिन बोले, “तुम्हारा विचार अच्छा है, पर छाया के बिना मनुष्य
जीवित रह सकता है। प्रश्न में कहा गया है कि उसके बिना कोई मनुष्य एक पल भी जीवित
नहीं रह सकता। इसलिए हमें और सोचना होगा।”
बेटी चुप हो गई।
बीरबल खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। बाहर शाम ढल रही थी। पेड़ों के पत्ते
हवा में हिल रहे थे। दूर कुछ बच्चे खेल रहे थे। एक किसान अपने घर की ओर लौट रहा
था। पक्षियों का झुंड आसमान में उड़ रहा था। बीरबल की नजर अचानक एक छोटे बच्चे पर
पड़ी जो दौड़ते-दौड़ते थक गया था और जोर-जोर से साँस ले रहा था।
बीरबल के चेहरे पर अचानक मुस्कान आ गई।
उन्होंने धीरे से कहा, “यही तो है।”
उनकी बेटी ने पूछा, “क्या मिला पिताजी?”
बीरबल बोले, “उत्तर मिल गया।”
अगले दिन सुबह बीरबल दरबार में पहुँचे। अकबर पहले से ही उनकी प्रतीक्षा कर रहे
थे। दरबारियों के चेहरों पर उत्सुकता थी। जिस दरबारी ने परीक्षा रखी थी, वह भी
आत्मविश्वास से मुस्कुरा रहा था।
अकबर ने पूछा, “बीरबल, क्या तुम अपनी परीक्षा पूरी करके आए हो?”
बीरबल ने कहा, “जी हुजूर।”
अकबर ने कहा, “तो बताओ, वह वस्तु कहाँ है?”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, वह वस्तु मेरे पास है।”
दरबारी तुरंत बोला, “तो हमें दिखाइए।”
बीरबल ने अपने हाथ आगे किए। उनके हाथ खाली थे।
दरबारी जोर से हँस पड़ा। “जहाँपनाह, देखिए! बीरबल हमें मूर्ख बनाने आए हैं। इनके हाथ
में तो कुछ भी नहीं है।”
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। “बीरबल, तुम्हारे हाथ खाली हैं।”
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “जी हुजूर, लेकिन वस्तु यहीं है।”
दरबारी ने कहा, “कहाँ है?”
बीरबल ने गहरी साँस ली और कहा, “मेरी साँस में।”
दरबार में एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
बीरबल ने कहा, “वह वस्तु है—हवा।”
दरबारी तुरंत बोला, “लेकिन हवा दिखाई नहीं देती!”
बीरबल ने कहा, “बिल्कुल सही। इसलिए प्रश्न का पहला भाग पूरा हुआ—वह दिखाई
नहीं देती।”
फिर बीरबल ने अपने हाथों को आगे करके कहा, “लेकिन जब मैं इस पंखे से
हवा को महसूस करता हूँ, तो क्या वह मौजूद नहीं है?”
दरबारी चुप रहा।
बीरबल ने आगे कहा, “हवा को हाथ में बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे
महसूस किया जा सकता है। मनुष्य उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। हम हर पल साँस लेते
हैं। इसलिए प्रश्न का दूसरा भाग भी पूरा हुआ।”
अकबर के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
लेकिन परीक्षा लेने वाला दरबारी अभी हार मानने को तैयार नहीं था। उसने कहा,
“जहाँपनाह,
मैं मानता हूँ
कि हवा जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन प्रश्न में कहा गया था कि वस्तु दिखाई भी दे और दिखाई
न भी दे।”
बीरबल ने तुरंत उत्तर दिया, “यह बात भी सही है। हवा स्वयं दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके
प्रभाव दिखाई देते हैं। पेड़ों की पत्तियों का हिलना, कपड़ों का उड़ना और धूल का
उड़ना हवा के दिखाई देने वाले प्रभाव हैं। इसलिए हवा स्वयं अदृश्य है, लेकिन उसकी
उपस्थिति दिखाई देती है।”
अकबर ने जोर से कहा, “वाह बीरबल!”
दरबार में तालियाँ बज उठीं।
ईर्ष्यालु दरबारी का चेहरा उतर गया। लेकिन उसने मन ही मन सोचा, “यह तो पहली
परीक्षा थी। अगली बार मैं ऐसा प्रश्न पूछूँगा जिसका उत्तर बीरबल किसी भी तरह नहीं
दे पाएँगे।”
बीरबल उसकी आँखों को पढ़ चुके थे।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “लगता है आज की परीक्षा से तुम्हें संतोष नहीं हुआ।”
दरबारी ने कहा, “नहीं बीरबल, अभी तो परीक्षा शुरू हुई है।”
अकबर ने दोनों की ओर देखा। उन्हें लगा कि आज दरबार में एक असाधारण मुकाबला
होने वाला है।
उन्होंने घोषणा की, “यदि तुम दोनों तैयार हो, तो बीरबल की परीक्षा का
अगला चरण कल होगा।”
दरबारियों में उत्साह फैल गया।
बीरबल ने सिर झुकाकर कहा, “जैसा हुक्म, जहाँपनाह।”
लेकिन उस रात बीरबल को पता नहीं था कि अगली परीक्षा केवल बुद्धि की नहीं,
बल्कि उनके धैर्य, ईमानदारी और सच्चाई की भी होने
वाली थी।
और अगले दिन दरबार में जो हुआ, उसने पूरे राज्य को यह समझा दिया कि सच्ची बुद्धि केवल कठिन
प्रश्नों के उत्तर देने में नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने में होती है।
अगले दिन सुबह बादशाह अकबर का दरबार पहले से कहीं अधिक उत्सुक दिखाई दे रहा
था। पिछले दिन बीरबल ने पहली परीक्षा में अपनी बुद्धिमानी से सभी को प्रभावित किया
था, लेकिन दरबार के कुछ लोग अभी भी यह मानने को तैयार नहीं थे कि बीरबल हर
परिस्थिति में सफल हो सकते हैं। जिस दरबारी ने पहली परीक्षा रखी थी, उसने रातभर
सोच-विचार करके एक नई योजना बनाई थी। इस बार वह ऐसा प्रश्न पूछना चाहता था जिसका
उत्तर केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि सूझ-बूझ और व्यवहारिक समझ से देना पड़े। उसे पूरा
विश्वास था कि इस बार बीरबल अवश्य उलझ जाएंगे।
जब अकबर दरबार में आए तो सभी दरबारी अपने-अपने स्थान पर बैठ गए। अकबर ने
मुस्कुराकर कहा, “कल की परीक्षा में बीरबल ने अच्छा उत्तर दिया था, लेकिन आज देखते
हैं कि उनकी बुद्धि दूसरी परीक्षा में कैसी रहती है।” बीरबल शांत भाव से खड़े रहे।
उनके चेहरे पर हमेशा की तरह हल्की मुस्कान थी। उन्हें पता था कि आज भी उनके सामने
कोई साधारण सवाल नहीं आने वाला।
वही दरबारी आगे बढ़ा और बोला, “जहाँपनाह, आज की परीक्षा मैं रखूँगा। मैं बीरबल को एक ऐसी समस्या
दूँगा जिसका समाधान उन्हें आज ही करना होगा। यदि वे सफल हुए तो मैं मान लूँगा कि
वे वास्तव में बहुत बुद्धिमान हैं।” अकबर ने उसकी ओर देखकर कहा, “ठीक है,
लेकिन ध्यान
रहे कि परीक्षा न्यायपूर्ण होनी चाहिए।” दरबारी ने सिर झुकाकर कहा, “जी हुजूर।”
कुछ ही देर बाद दरबार के सैनिक एक बड़ा संदूक लेकर आए। संदूक बहुत सुंदर था और
उस पर शाही निशान बना हुआ था। दरबारी ने संदूक को दरबार के बीच में रखवा दिया और
कहा, “बीरबल, इस संदूक के अंदर एक ऐसी वस्तु है जिसकी कीमत पूरे राज्य के लिए बहुत अधिक है।
तुम्हें इसे बिना संदूक खोले पहचानना होगा।” यह सुनते ही दरबार में बैठे लोग
एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। कुछ दरबारी मुस्कुराने लगे क्योंकि उन्हें लगा कि इस
बार बीरबल के सामने सचमुच कठिन समस्या है।
अकबर ने बीरबल से कहा, “क्या तुम यह परीक्षा स्वीकार करते हो?” बीरबल ने संदूक
को ध्यान से देखा और बोले, “जी जहाँपनाह, मैं पूरी कोशिश करूँगा।” दरबारी ने तुरंत कहा,
“सिर्फ कोशिश
नहीं, आपको सही उत्तर देना होगा। और ध्यान रहे, संदूक को छूना या खोलना भी
मना है।”
बीरबल संदूक के चारों ओर धीरे-धीरे घूमने लगे। उन्होंने उसे दूर से देखा,
फिर कुछ क्षण
के लिए आँखें बंद कर लीं। दरबार में पूर्ण शांति थी। सभी लोग उनके उत्तर की
प्रतीक्षा कर रहे थे। बीरबल ने सबसे पहले संदूक की ऊँचाई और चौड़ाई देखी। फिर
उन्होंने जमीन पर पड़े कुछ छोटे-छोटे निशानों को देखा। संदूक के पास बहुत हल्की-सी
खुशबू भी आ रही थी। बीरबल ने उस खुशबू को पहचानने की कोशिश की, लेकिन तुरंत
कोई निष्कर्ष नहीं निकाला।
दरबारी ने मुस्कुराकर कहा, “क्या हुआ बीरबल? आपकी बुद्धि आज चुप क्यों है?” बीरबल ने उसकी
ओर देखकर कहा, “बुद्धि कभी चुप नहीं होती, बस कभी-कभी उत्तर देने से
पहले सोचती है।” यह सुनकर कुछ दरबारी हँस पड़े। अकबर भी मुस्कुरा दिए।
बीरबल ने सैनिकों से पूछा कि संदूक को दरबार में लाने से पहले वह कहाँ रखा गया
था। सैनिकों ने बताया कि उसे महल के पीछे वाले बगीचे से लाया गया था। बीरबल ने फिर
पूछा कि उसे कौन लेकर आया था। सैनिकों ने बताया कि चार सैनिकों ने मिलकर उसे उठाया
था। बीरबल ने उनके हाथों और कपड़ों को ध्यान से देखा। उनके कपड़ों पर मिट्टी के
छोटे-छोटे कण लगे थे।
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, मुझे लगता है कि इस संदूक में कोई ऐसी वस्तु है जिसे बगीचे
से लाया गया है।” दरबारी ने तुरंत कहा, “यह तो कोई भी अनुमान लगा सकता है। मैंने कहा था
कि आपको वस्तु पहचाननी है।”
बीरबल ने उत्तर दिया, “अनुमान और निष्कर्ष में अंतर होता है। मैं केवल अनुमान नहीं
लगा रहा, बल्कि संकेतों को जोड़ रहा हूँ।”
उन्होंने संदूक के पास जाकर बिना उसे छुए जमीन को ध्यान से देखा। वहाँ कुछ
बहुत छोटे पत्ते पड़े थे। बीरबल ने सैनिकों से पूछा कि क्या संदूक को बगीचे में
किसी पेड़ के नीचे रखा गया था। सैनिकों ने हाँ में उत्तर दिया। अब बीरबल की आँखों
में आत्मविश्वास दिखाई देने लगा।
उन्होंने कहा, “इस संदूक के अंदर कोई ऐसी वस्तु है जो पेड़ या पौधे से
संबंधित है।” दरबारी ने कहा, “फिर भी तुमने वस्तु का नाम नहीं बताया।”
बीरबल कुछ क्षण चुप रहे। तभी उन्हें संदूक के भीतर से बहुत हल्की-सी आवाज
सुनाई दी। आवाज इतनी धीमी थी कि शायद किसी और ने उसे सुना भी नहीं था। बीरबल ने
तुरंत सिर उठाया और बोले, “जहाँपनाह, मुझे अपना उत्तर मिल गया।”
अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “क्या है संदूक के अंदर?”
बीरबल ने कहा, “इसके अंदर एक पक्षी है।”
दरबार में बैठे सभी लोग चौंक गए। दरबारी ने जोर से हँसते हुए कहा, “पक्षी? यह कैसे संभव
है? संदूक तो बंद है और आपने उसे खोला भी नहीं।”
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “मैंने संदूक के भीतर से पंखों की हल्की आवाज सुनी। इसके
अलावा संदूक के पास छोटे पंख भी पड़े हैं। सैनिकों के कपड़ों पर बगीचे की मिट्टी
है और संदूक को बगीचे से लाया गया है। इससे मुझे विश्वास हुआ कि अंदर कोई जीवित
पक्षी है।”
दरबारी ने तुरंत कहा, “लेकिन यह तो केवल अनुमान है।”
बीरबल ने कहा, “तो फिर संदूक खोलकर देख लेते हैं।”
अकबर ने सैनिकों को संदूक खोलने का आदेश दिया। जैसे ही संदूक खोला गया,
उसमें से एक
छोटा-सा सफेद कबूतर बाहर उड़ गया। वह दरबार के ऊँचे गुंबद के चारों ओर घूमने लगा
और फिर एक खिड़की के पास जाकर बैठ गया।
पूरा दरबार तालियों से गूँज उठा। अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “बीरबल, तुमने बिना
संदूक खोले उसके अंदर की वस्तु पहचान ली। यह सचमुच बुद्धि और निरीक्षण की शक्ति का
अच्छा उदाहरण है।”
लेकिन बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, इसमें केवल मेरी बुद्धि नहीं थी। मैंने बस उन संकेतों को
ध्यान से देखा जिन्हें बाकी लोग अनदेखा कर रहे थे।”
अकबर ने कहा, “यही तो बुद्धिमानी है, बीरबल। बहुत से लोग चीजों
को देखते हैं, लेकिन कम लोग उन्हें समझते हैं।”
दरबारी अब पहले से अधिक परेशान था। उसकी दूसरी योजना भी असफल हो चुकी थी। फिर
भी उसने हार नहीं मानी। उसने मन ही मन तय किया कि अगली परीक्षा ऐसी होगी जिसमें
बीरबल को केवल संकेतों से नहीं, बल्कि लोगों के व्यवहार से उत्तर निकालना पड़ेगा।
अगले दिन उसने एक और योजना बनाई। इस बार उसने महल के तीन नौकरों को बुलाया और
उन्हें एक जैसी पोशाक पहना दी। तीनों को एक ही कमरे में खड़ा किया गया और उनके
हाथों में एक-एक समान थैली दे दी गई। फिर उसने बीरबल से कहा कि तीनों में से यह
पहचानना होगा कि शाही खजाने की चाबी किस व्यक्ति के पास है। बीरबल को यह भी बताया
गया कि तीनों में से केवल एक व्यक्ति सच बोल रहा है और बाकी दोनों झूठ बोल रहे
हैं।
अकबर ने बीरबल से कहा, “यह परीक्षा पहले से कठिन है। तुम्हें केवल एक प्रश्न पूछने
की अनुमति होगी।”
बीरबल ने तीनों व्यक्तियों को ध्यान से देखा। पहला व्यक्ति बहुत आत्मविश्वास
से खड़ा था। दूसरा बार-बार अपनी थैली की ओर देख रहा था। तीसरा शांत था, लेकिन उसके
माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें थीं। बीरबल ने कुछ क्षण सोचा और फिर तीनों के
सामने एक ही प्रश्न रखा।
उन्होंने पूछा, “जिस व्यक्ति के पास चाबी है, वह अपने दाहिने हाथ को ऊपर
उठाए।”
तीनों ने एक साथ अपने हाथ ऊपर कर दिए।
दरबार में हलचल मच गई। दरबारी मुस्कुराया। उसे लगा कि बीरबल हार गए। लेकिन
बीरबल ने तुरंत कहा, “जहाँपनाह, अब मुझे उत्तर मिल गया है।”
अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “इतनी जल्दी?”
बीरबल ने कहा, “जी। चाबी उस व्यक्ति के पास है जिसने हाथ उठाने से पहले
अपने चेहरे को छिपाने की कोशिश की।”
उन्होंने तीसरे व्यक्ति की ओर संकेत किया।
दरबारी ने तुरंत विरोध किया, “यह तो केवल व्यवहार देखकर अनुमान है।”
बीरबल ने कहा, “सही है, लेकिन परीक्षा में हमें उपलब्ध संकेतों से ही निर्णय लेना
होता है।”
अकबर ने तीसरे व्यक्ति की थैली की तलाशी लेने का आदेश दिया। थैली के अंदर शाही
खजाने की चाबी मिली। दरबार में फिर से आश्चर्य फैल गया।
अकबर ने बीरबल से कहा, “तुमने इस बार भी सही उत्तर दिया।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, इंसान का चेहरा और उसका व्यवहार कई बार उसकी जुबान से
ज्यादा सच बोलता है। जो व्यक्ति अपने भीतर कुछ छिपा रहा हो, उसके शरीर की छोटी-छोटी
हरकतें भी उसके रहस्य को प्रकट कर देती हैं।”
अकबर बहुत प्रसन्न हुए। लेकिन उसी समय उन्हें लगा कि बीरबल की परीक्षा अब केवल
मनोरंजन नहीं रह गई थी। यह दरबार के सभी लोगों के लिए सीख बनती जा रही थी। अकबर ने
दरबारियों से कहा, “बीरबल की बुद्धि का रहस्य केवल यह नहीं है कि वे कठिन
प्रश्नों का उत्तर दे देते हैं। उनका असली गुण यह है कि वे जल्दबाजी में निर्णय
नहीं लेते। वे छोटी-छोटी बातों को देखते हैं, सोचते हैं और फिर निष्कर्ष
निकालते हैं।”
दरबार में मौजूद ईर्ष्यालु दरबारी चुपचाप खड़ा था। उसे अब समझ आने लगा था कि
बीरबल को हराना आसान नहीं है। फिर भी उसके मन में एक आखिरी योजना थी। उसने सोचा कि
अब वह ऐसी परीक्षा लेगा जिसमें बीरबल को धन, सम्मान और पद में से किसी
एक को चुनना होगा। उसे विश्वास था कि उस परीक्षा में बीरबल अवश्य गलती करेंगे।
उसे पता नहीं था कि उसकी अगली परीक्षा बीरबल की बुद्धि से भी अधिक उनके चरित्र और ईमानदारी की परीक्षा बनने वाली थी।
और यही परीक्षा आगे चलकर अकबर के सामने बीरबल की सबसे बड़ी जीत का कारण बनने वाली
थी।
अगली सुबह बादशाह अकबर का दरबार लगा तो सभी दरबारी पिछले दिनों की घटनाओं को
याद कर रहे थे। अब तक बीरबल कई कठिन परीक्षाओं को अपनी सूझ-बूझ से पार कर चुके थे।
लेकिन वह दरबारी, जिसने बीरबल को परीक्षा में असफल करने का निश्चय कर लिया था,
अभी भी पीछे
हटने को तैयार नहीं था। उसने सोचा था कि यदि बुद्धि की परीक्षा में बीरबल को हराना
कठिन है, तो ऐसी परिस्थिति बनाई जाए जिसमें उनके सामने लालच और कर्तव्य में से किसी एक
को चुनने की स्थिति आए। उसका विश्वास था कि मनुष्य चाहे कितना भी बुद्धिमान क्यों
न हो, धन और सम्मान का लालच उसे कभी न कभी कमजोर बना देता है।
दरबार शुरू होने के कुछ समय बाद वह दरबारी बादशाह अकबर के सामने आया और बोला,
“जहाँपनाह,
आज की परीक्षा
सबसे कठिन होगी। अब तक बीरबल ने पहेलियों और संकेतों से उत्तर दिए हैं, लेकिन आज हम
उनकी ईमानदारी और निर्णय लेने की क्षमता की परीक्षा करेंगे।” अकबर ने गंभीर होकर
उसकी ओर देखा और पूछा, “क्या तुम्हारे पास सचमुच ऐसी परीक्षा है?” दरबारी ने सिर
झुकाकर कहा, “जी हुजूर। यदि बीरबल इस परीक्षा में भी सफल हुए तो मैं स्वयं स्वीकार करूँगा
कि उनकी बुद्धि और चरित्र दोनों असाधारण हैं।”
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। बीरबल शांत खड़े थे। उन्होंने कहा, “जहाँपनाह,
मैं परीक्षा के
लिए तैयार हूँ। लेकिन मुझे विश्वास है कि सच्चाई की परीक्षा में डरने की आवश्यकता
नहीं होती।” अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “ठीक है। परीक्षा शुरू की जाए।”
दरबारी ने एक छोटा-सा संदूक मंगवाया। संदूक खोलने पर उसमें सोने के सिक्के,
हीरे-जवाहरात
और कीमती आभूषण दिखाई दिए। दरबारियों की आँखें चमक उठीं। दरबारी ने कहा, “जहाँपनाह,
यह शाही खजाने
का एक छोटा हिस्सा है। आज बीरबल को इसमें से कोई एक वस्तु चुनने की अनुमति है। जो
वस्तु वे चुनेंगे, वह उन्हें पुरस्कार के रूप में दे दी जाएगी। लेकिन इसके साथ
एक शर्त है।”
अकबर ने पूछा, “क्या शर्त है?”
दरबारी ने कहा, “बीरबल को बिना किसी से सलाह लिए और बिना यह पूछे कि किस
वस्तु की कीमत कितनी है, केवल अपनी पसंद से एक वस्तु चुननी होगी। यदि उन्होंने सबसे
मूल्यवान वस्तु चुनी, तो हम मानेंगे कि उन्होंने परीक्षा में सफलता प्राप्त की।
यदि उन्होंने कोई साधारण वस्तु चुनी, तो इसका अर्थ होगा कि वे अवसर को पहचान नहीं
पाए।”
अकबर ने कुछ देर सोचा और फिर कहा, “ठीक है। बीरबल, तुम्हें क्या चुनना है?”
बीरबल संदूक के पास गए। उन्होंने सोने के सिक्कों को देखा, फिर हीरों को
देखा। वहाँ एक चमकदार हार था जिसकी कीमत बहुत अधिक थी। उसके पास एक साधारण-सी
चाँदी की अंगूठी भी रखी थी। बीरबल ने सभी वस्तुओं को ध्यान से देखा और अंत में उसी
साधारण अंगूठी को उठा लिया।
दरबार में बैठे कई लोग आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगे। ईर्ष्यालु दरबारी के
चेहरे पर तुरंत खुशी आ गई। उसे लगा कि आखिरकार बीरबल उसकी परीक्षा में फँस गए। वह
बोला, “जहाँपनाह, बीरबल ने सबसे कीमती वस्तु छोड़कर एक साधारण अंगूठी चुन ली।
इसका अर्थ साफ है कि उनकी बुद्धि की सीमा है।”
अकबर ने बीरबल से पूछा, “तुमने यह अंगूठी क्यों चुनी?”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “जहाँपनाह, मैंने वही चुना जो मुझे सबसे मूल्यवान लगा।”
दरबारी हँस पड़ा। “एक साधारण चाँदी की अंगूठी आपको हीरे से अधिक मूल्यवान लगती
है?”
बीरबल ने कहा, “हाँ।”
दरबारी ने पूछा, “क्यों?”
बीरबल ने अंगूठी अकबर की ओर बढ़ाते हुए कहा, “क्योंकि यह अंगूठी मुझे
अपने पास रखने के लिए नहीं चाहिए। मैं इसे आपके चरणों में वापस करना चाहता हूँ।”
अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “इसका क्या अर्थ है?”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, यदि मैं धन चुनता तो लोग कहते कि मैंने पुरस्कार के लालच
में सबसे महंगी वस्तु चुन ली। यदि मैं आभूषण चुनता तो लोग कहते कि मुझे राजसी
संपत्ति का मोह है। लेकिन मैंने यह साधारण अंगूठी इसलिए चुनी क्योंकि यह मुझे याद
दिलाती है कि किसी भी वस्तु का मूल्य उसकी कीमत से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य से तय
होता है।”
अकबर ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे।
बीरबल ने आगे कहा, “और एक बात और है। यदि यह सचमुच शाही खजाने का हिस्सा है,
तो इसे अपने
पास रखना मेरे अधिकार में नहीं है। मैं दरबार का सेवक हूँ, खजाने का मालिक नहीं। इसलिए
मैं इसे आपको वापस कर रहा हूँ।”
दरबार में सन्नाटा छा गया।
अकबर की आँखों में प्रसन्नता दिखाई दी। उन्होंने कहा, “बीरबल, आज तुमने केवल
अपनी बुद्धि की नहीं, अपने चरित्र की भी परीक्षा पास की है।”
जिस दरबारी ने यह परीक्षा बनाई थी, वह घबरा गया। उसने कहा, “लेकिन जहाँपनाह, मैंने तो यह
कहा ही नहीं था कि उन्हें वस्तु वापस करनी है।”
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “यही तो परीक्षा थी। यदि शर्तों में ईमानदारी लिखकर देनी
पड़े, तो ईमानदारी की परीक्षा कैसी?”
अकबर ने जोर से कहा, “बहुत खूब!”
दरबार में बैठे सभी लोग बीरबल की प्रशंसा करने लगे। लेकिन दरबारी ने फिर भी
हार नहीं मानी। उसने सोचा कि अब आखिरी परीक्षा ऐसी होगी जिसमें बीरबल को ऐसी
परिस्थिति में डालना होगा जहाँ उन्हें किसी निर्दोष व्यक्ति के बारे में गलत
निर्णय लेना पड़े। यदि बीरबल ने जल्दबाजी की, तो वह उन्हें झूठा साबित कर
देगा। और यदि उन्होंने निर्णय लेने में देर की, तो वह कहेगा कि बीरबल
समस्या हल नहीं कर सकते।
उसने एक नई योजना बनाई। उसने महल के एक गरीब सेवक को बुलाया, जो कई वर्षों
से ईमानदारी से काम करता था। उसे आदेश दिया गया कि वह रात के समय शाही बगीचे में
जाकर एक विशेष पेड़ के नीचे रखा हुआ डिब्बा उठा लाए। सेवक को यह नहीं बताया गया कि
डिब्बे में क्या है। उसे केवल इतना कहा गया कि वह आदेश का पालन करे।
उधर दरबारी ने उसी डिब्बे में कुछ शाही सिक्के रख दिए और अगले दिन बादशाह अकबर
से शिकायत कर दी कि एक सेवक ने शाही खजाने से सिक्के चुराए हैं। अकबर ने तुरंत
सैनिकों को उस सेवक को पकड़कर लाने का आदेश दिया।
अगले दिन वह सेवक काँपता हुआ दरबार में आया। उसके हाथ में वही डिब्बा था। अकबर
ने कठोर आवाज में पूछा, “क्या यह डिब्बा तुमने शाही बगीचे से उठाया था?”
सेवक ने सिर झुकाकर कहा, “जी हुजूर।”
अकबर ने पूछा, “और इसमें रखे सिक्के?”
सेवक ने कहा, “मुझे नहीं मालूम, जहाँपनाह। मुझे केवल डिब्बा लाने का आदेश दिया
गया था।”
दरबारी तुरंत बोला, “झूठ बोल रहा है! सिक्के इसी के पास मिले हैं। इसे दंड मिलना
चाहिए।”
सेवक रोने लगा। उसने कहा, “जहाँपनाह, मैंने चोरी नहीं की। मैं गरीब हूँ, लेकिन मैंने कभी शाही खजाने
की ओर बुरी नजर नहीं की।”
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। “बीरबल, अब फैसला तुम्हें करना है।”
बीरबल ने सेवक को देखा। फिर दरबारी को देखा। फिर डिब्बे को देखा। उन्होंने
पूछा, “इस सेवक को डिब्बा लाने का आदेश किसने दिया था?”
दरबारी चुप रहा।
बीरबल ने फिर पूछा, “क्या किसी ने इसे डिब्बे के अंदर की वस्तु के बारे में
बताया था?”
सैनिकों ने कहा, “नहीं।”
बीरबल ने कहा, “तो फिर चोरी का आरोप कैसे लगाया जा सकता है?”
दरबारी ने कहा, “क्योंकि सिक्के इसके पास मिले।”
बीरबल ने उत्तर दिया, “किसी वस्तु का किसी व्यक्ति के पास मिलना यह सिद्ध नहीं
करता कि उसने उसे चुराया है। पहले यह सिद्ध करना होगा कि उसे उस वस्तु के बारे में
जानकारी थी और उसने उसे अपने लाभ के लिए लिया।”
अकबर ने सिर हिलाया।
बीरबल ने डिब्बे को ध्यान से देखा। फिर उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, इस डिब्बे पर
महल के भंडारघर की मुहर नहीं है। यदि यह शाही खजाने से आया होता तो उस पर आधिकारिक
निशान होना चाहिए था।”
अकबर ने सैनिकों को डिब्बे की जाँच करने का आदेश दिया। जाँच के बाद पता चला कि
सचमुच उस डिब्बे पर शाही भंडारघर की मुहर नहीं थी।
बीरबल ने फिर दरबारी की ओर देखा और कहा, “अब एक और प्रश्न है। यह
डिब्बा बगीचे में किसने रखा था?”
दरबारी के चेहरे का रंग बदल गया।
बीरबल ने कहा, “जिस व्यक्ति ने सेवक को डिब्बा लाने का आदेश दिया, वही इस मामले
की सच्चाई जानता होगा।”
अकबर ने तुरंत सैनिकों को जाँच करने का आदेश दिया। कुछ ही समय में सच्चाई
सामने आ गई। बगीचे के एक माली ने बताया कि उसी दरबारी के आदेश पर डिब्बा पेड़ के
नीचे रखा गया था।
अब अकबर समझ गए कि पूरी योजना बीरबल को गलत साबित करने के लिए बनाई गई थी।
अकबर ने दरबारी की ओर कठोर दृष्टि से देखा और कहा, “तुमने एक निर्दोष व्यक्ति
पर चोरी का झूठा आरोप लगाया और बीरबल को फँसाने के लिए यह योजना बनाई। क्या
तुम्हें अपने व्यवहार पर शर्म नहीं आती?”
दरबारी काँपने लगा। उसने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, मुझे क्षमा कर
दीजिए।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, इसे दंड देना आपका अधिकार है, लेकिन मैं केवल इतना कहना
चाहता हूँ कि ईर्ष्या मनुष्य की बुद्धि को भी अंधा कर देती है। यह दरबारी मुझे
हराना चाहता था, इसलिए उसने यह नहीं सोचा कि उसकी योजना में एक निर्दोष
व्यक्ति का जीवन भी बर्बाद हो सकता था।”
अकबर ने बीरबल की बात सुनकर उस सेवक को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। उन्होंने
उसे कुछ धन भी दिया और कहा कि उसने सच बोलकर अच्छा काम किया।
फिर अकबर ने पूरे दरबार की ओर देखकर कहा, “आज बीरबल की सबसे बड़ी
परीक्षा हुई थी। उन्होंने न केवल प्रश्नों का उत्तर दिया, बल्कि न्याय करते समय
जल्दबाजी से भी बचा। सच्ची बुद्धि वही है जो किसी निर्दोष को नुकसान पहुँचाए बिना
सत्य तक पहुँचने का रास्ता खोजे।”
बीरबल ने सिर झुकाकर कहा, “जहाँपनाह, बुद्धि का सबसे बड़ा उद्देश्य किसी को
हराना नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की रक्षा करना है।”
दरबार तालियों से गूँज उठा। उस दिन से बीरबल के प्रति अकबर का विश्वास और भी
बढ़ गया। वहीं वह दरबारी भी समझ गया कि बीरबल को केवल पहेलियों में उलझाकर हराया
नहीं जा सकता। क्योंकि बीरबल की असली शक्ति उनकी हाजिरजवाबी नहीं, बल्कि उनकी
दूरदृष्टि, धैर्य, न्यायप्रियता और सच्चाई थी।
लेकिन अकबर के मन में अब एक नया विचार जन्म ले चुका था। उन्होंने सोचा कि यदि
बीरबल की परीक्षा इतनी कठिन परिस्थितियों में सफल हो सकती है, तो क्यों न
उन्हें ऐसी अंतिम परीक्षा दी जाए जिसमें पूरा राज्य उनकी बुद्धि पर निर्भर हो?
इस परीक्षा में
न कोई पहेली होगी, न कोई संदूक और न ही कोई आसान संकेत। इसमें बीरबल को एक ऐसी
समस्या हल करनी होगी जिसका समाधान किसी ने कभी नहीं निकाला था।
और अगले दिन अकबर ने बीरबल के सामने वही असंभव लगने वाली चुनौती रखी, जिसने पूरे
दरबार को हैरान कर दिया।
अगले दिन जब बादशाह अकबर का दरबार लगा, तो वातावरण कुछ अलग था।
दरबार में सामान्य दिनों की तरह हँसी-मजाक नहीं था। सभी दरबारी शांत बैठे थे और
एक-दूसरे के चेहरे देख रहे थे। उन्हें पता था कि आज बीरबल की परीक्षा का अंतिम और
सबसे कठिन चरण होने वाला है। पिछले दिनों बीरबल ने बुद्धि, निरीक्षण, ईमानदारी और
न्याय की कई परीक्षाएँ सफलतापूर्वक पार कर ली थीं। अब स्वयं बादशाह अकबर ने उनके
लिए एक ऐसी परीक्षा तैयार की थी, जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं था।
अकबर ने दरबार में प्रवेश किया और सिंहासन पर बैठते ही बीरबल को अपने पास
बुलाया। बीरबल ने झुककर सलाम किया। अकबर ने कहा, “बीरबल, पिछले दिनों
तुम्हारी कई परीक्षाएँ हुईं और हर बार तुमने अपनी बुद्धि से सबको चकित किया। लेकिन
आज की परीक्षा मेरी ओर से है। मैं चाहता हूँ कि तुम इसे सबसे कठिन परीक्षा समझकर
स्वीकार करो।”
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “जहाँपनाह, यदि परीक्षा स्वयं आप ले रहे हैं, तो मैं उसे अस्वीकार कैसे
कर सकता हूँ? मैं पूरी निष्ठा से प्रयास करूँगा।”
अकबर ने संकेत किया और कुछ सैनिक दरबार में एक बड़ा लकड़ी का पिंजरा लेकर आए।
पिंजरे के अंदर एक सुंदर सफेद कबूतर बैठा था। अकबर ने कहा, “बीरबल, इस कबूतर को
देख रहे हो?”
“जी हुजूर,” बीरबल ने उत्तर दिया।
अकबर ने कहा, “यह कबूतर आज तुम्हारी परीक्षा का हिस्सा है। तुम्हें इसे
बिना पिंजरा खोले और बिना पिंजरे को तोड़े बाहर निकालना होगा।”
दरबार में बैठे लोग एक-दूसरे को देखने लगे। कुछ दरबारी मुस्कुराए। उन्हें लगा
कि यह तो असंभव कार्य है। पिंजरा मजबूत था और उसका दरवाजा बंद था। यदि बीरबल
दरवाजा खोलते, तो शर्त टूट जाती। यदि पिंजरा तोड़ते, तो भी शर्त टूट
जाती। कबूतर को बाहर निकालने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।
अकबर ने कहा, “ध्यान रहे, पिंजरे को छूना भी मना है।”
बीरबल ने पिंजरे को दूर से देखा। फिर उन्होंने कबूतर को देखा। कबूतर कभी एक
कोने में जाता और कभी दूसरे कोने में। कुछ देर बाद वह चुपचाप बैठ गया।
दरबार में मौजूद वही पुराना ईर्ष्यालु दरबारी भी खड़ा था। अब वह पहले जैसा
आत्मविश्वासी नहीं था, लेकिन इस बार उसे लगा कि शायद बीरबल सचमुच हार जाएँगे। उसने
सोचा कि पिंजरा खोले बिना कबूतर को बाहर निकालना संभव ही नहीं है।
बीरबल ने अकबर से पूछा, “जहाँपनाह, क्या मैं पिंजरे के पास जाकर कबूतर को देख सकता हूँ?”
अकबर ने कहा, “हाँ, लेकिन पिंजरे को छूना नहीं है।”
बीरबल धीरे-धीरे पिंजरे के पास गए। उन्होंने कबूतर को ध्यान से देखा। कबूतर की
आँखें बार-बार दरबार के खुले खिड़की वाले हिस्से की ओर जा रही थीं। बीरबल ने यह
बात नोट कर ली।
उन्होंने सैनिक से पूछा, “यह कबूतर कहाँ से आया है?”
सैनिक ने बताया, “महल के बगीचे से।”
बीरबल ने पूछा, “क्या यह पालतू कबूतर है?”
सैनिक ने कहा, “नहीं, यह बगीचे में रहने वाला कबूतर है।”
अब बीरबल कुछ समझने लगे थे। उन्होंने दरबार के एक सेवक से कहा कि वह खिड़की के
पास जाकर बाहर कुछ दाने बिखेर दे। सेवक ने वैसा ही किया। कुछ ही क्षणों में कबूतर
ने दानों की ओर देखा और बेचैनी से पंख फड़फड़ाने लगा।
बीरबल मुस्कुराए।
उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, मुझे लगता है कि परीक्षा का उत्तर मिल गया है।”
अकबर ने कहा, “तो बताओ, कबूतर को बाहर कैसे निकालोगे?”
बीरबल ने कहा, “मैं कबूतर को बाहर नहीं निकालूँगा। मैं उसे स्वयं बाहर जाने
का अवसर दूँगा।”
यह कहकर बीरबल ने दरबार के सेवकों से कहा कि वे पिंजरे के पास से थोड़ा दूर हट
जाएँ और खिड़की के बाहर रखे दानों को वहीं रहने दें। कुछ देर बाद कबूतर पिंजरे के
अंदर बेचैनी से घूमने लगा। वह बार-बार बाहर की ओर देखने लगा।
अकबर ने पूछा, “लेकिन वह बाहर आएगा कैसे? पिंजरा तो बंद है।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, आपने कहा था कि पिंजरा खोलना मना है। आपने यह नहीं कहा कि
कबूतर को पिंजरे के अंदर ही रहना आवश्यक है।”
अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “तुम कहना क्या चाहते हो?”
बीरबल ने पिंजरे को ध्यान से देखा और कहा, “इस पिंजरे की छत पर एक
छोटा-सा खुला स्थान है, जहाँ से कबूतर आसानी से बाहर निकल सकता है। शायद इसे बनाते
समय किसी ने ध्यान नहीं दिया। कबूतर स्वयं उस रास्ते को पहचान लेगा।”
दरबारियों ने ऊपर देखा। सचमुच पिंजरे की छत में एक छोटा-सा स्थान था। कबूतर ने
कुछ ही क्षणों में उस स्थान से बाहर निकलने की कोशिश की और फिर उड़कर खिड़की के
पास जा बैठा।
पूरा दरबार तालियों से गूँज उठा।
अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “बीरबल, तुमने फिर सिद्ध कर दिया कि कठिन समस्या का समाधान हमेशा बल
से नहीं, बुद्धि से होता है।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, कई बार हम किसी समस्या को इसलिए असंभव समझ लेते हैं क्योंकि
हम उसी रास्ते से समाधान खोजते रहते हैं जो हमें दिखाई देता है। यदि हम परिस्थिति
को दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो रास्ता स्वयं सामने आ जाता है।”
अकबर ने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छी बात कही।”
लेकिन अकबर की परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया
कि दरबार के बाहर एक किसान को बुलाया जाए। थोड़ी देर बाद एक बूढ़ा किसान दरबार में
आया। उसके कपड़े साधारण थे और चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह बादशाह के
सामने झुक गया।
अकबर ने कहा, “यह किसान पिछले कई महीनों से अपने खेत में पानी की कमी की
शिकायत कर रहा है। उसके गाँव के पास नदी है, लेकिन नदी का पानी खेत तक
नहीं पहुँचता। गाँव के लोगों ने कई बार कोशिश की, लेकिन कोई स्थायी रास्ता
नहीं बना सके। बीरबल, तुम्हारी अंतिम परीक्षा यही है। तुम्हें बिना बड़ी लागत के
इस किसान के खेत तक पानी पहुँचाने का उपाय बताना होगा।”
दरबार में बैठे लोग फिर चुप हो गए। इस बार समस्या वास्तविक थी। किसान के पास
धन नहीं था, गाँव के लोगों के पास साधन नहीं थे और नदी खेत से काफी नीचे बहती थी।
बीरबल ने किसान से पूछा, “तुम्हारा खेत नदी से कितनी दूरी पर है?”
किसान ने बताया कि खेत नदी से लगभग आधा कोस दूर था। बीरबल ने पूछा, “क्या खेत और
नदी के बीच कोई ऊँची जगह है?”
किसान ने कहा, “जी, बीच में एक छोटी पहाड़ी है।”
बीरबल ने पूछा, “और नदी का पानी किस दिशा में बहता है?”
किसान ने दिशा बताई।
बीरबल कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने कहा, “तुम्हें नदी से सीधे खेत तक
पानी लाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। पहले पानी को पहाड़ी के दूसरी ओर बने पुराने
गड्ढे में जमा करना होगा। फिर उस गड्ढे से धीरे-धीरे खेत की ओर नहर बनानी होगी।”
किसान ने कहा, “लेकिन उस गड्ढे तक पानी कैसे पहुँचेगा?”
बीरबल ने कहा, “नदी के किनारे एक छोटी बाँध जैसी मिट्टी की दीवार बनाई जाए।
जब नदी का पानी बढ़ेगा, तो उसका कुछ हिस्सा उस पुराने गड्ढे की ओर मोड़ा जा सकेगा।
गाँव के लोग पत्थरों और मिट्टी से यह काम कर सकते हैं। इसमें बहुत अधिक धन की
आवश्यकता नहीं होगी।”
किसान की आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।
अकबर ने तुरंत कहा, “यह योजना मुझे पसंद आई। लेकिन क्या तुमने यह सोच लिया है कि
यदि बारिश बहुत तेज हुई तो पानी गाँव में घुस सकता है?”
बीरबल ने कहा, “हाँ, इसलिए बाँध को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहिए। उसमें एक
नियंत्रित रास्ता रखना होगा, ताकि अतिरिक्त पानी वापस नदी में चला जाए।”
अकबर ने कहा, “और यदि बारिश कम हुई?”
बीरबल ने कहा, “तो गाँव वालों को गड्ढे में जमा पानी का उपयोग सावधानी से
करना होगा। पानी को खेतों तक छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर पहुँचाया जाए, ताकि किसी एक
खेत को अधिक पानी न मिले।”
किसान ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, यदि यह उपाय सफल हो गया तो हमारा पूरा गाँव बच जाएगा।”
अकबर ने किसान को आश्वासन दिया कि राज्य की ओर से आवश्यक सहायता दी जाएगी।
इसके बाद अकबर ने बीरबल की ओर देखा और कहा, “आज की परीक्षा में तुमने
केवल पहेली का उत्तर नहीं दिया। तुमने एक वास्तविक समस्या का समाधान किया है। यही
सच्ची बुद्धिमानी है।”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, बुद्धि का उपयोग तभी सार्थक है जब उससे किसी का भला हो।”
अकबर सिंहासन से उठे और दरबार में घोषणा की, “आज से मैं यह मानता हूँ कि
बीरबल की सबसे बड़ी शक्ति उनकी हाजिरजवाबी नहीं, बल्कि उनकी समझदारी,
धैर्य, न्याय और
दूसरों के प्रति करुणा है। जिसने उन्हें हराने की कोशिश की, उसने केवल उनकी बुद्धि को
परखा; लेकिन इस परीक्षा ने हमें उनके चरित्र को समझने का अवसर दिया।”
वही दरबारी, जिसने कई दिनों तक बीरबल को हराने की कोशिश की थी, आगे आया। उसने
सिर झुकाकर कहा, “बीरबल, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं आपसे ईर्ष्या करता था। मुझे
लगता था कि बादशाह आपको आवश्यकता से अधिक महत्व देते हैं। इसलिए मैंने आपको हराने
की कई योजनाएँ बनाईं। लेकिन आज मुझे समझ आ गया है कि आपका सम्मान केवल बादशाह की
कृपा से नहीं, बल्कि आपकी योग्यता के कारण है।”
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “ईर्ष्या मनुष्य को दूसरों की कमियाँ खोजने पर मजबूर करती है,
लेकिन यदि वही
मनुष्य दूसरों की अच्छाइयों से सीखना शुरू कर दे तो वह स्वयं भी आगे बढ़ सकता है।”
दरबारी ने हाथ जोड़कर कहा, “क्या आप मुझे क्षमा करेंगे?”
बीरबल ने कहा, “यदि मन से गलती स्वीकार कर ली जाए, तो क्षमा माँगना ही सबसे
बड़ा सुधार है।”
अकबर ने दोनों को देखकर कहा, “आज का दिन केवल बीरबल की जीत का दिन नहीं है। यह हम सभी के
लिए सीख का दिन है। बुद्धिमान वही नहीं जो हर प्रश्न का उत्तर जानता हो। बुद्धिमान
वह है जो सही प्रश्न पूछता है, परिस्थिति को समझता है, जल्दबाजी नहीं करता और अपनी
बुद्धि का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करता है।”
दरबार में उपस्थित सभी लोगों ने एक साथ बीरबल की प्रशंसा की। किसान भी प्रसन्न
होकर अपने गाँव लौट गया। कुछ ही समय बाद बीरबल की बताई योजना के अनुसार नदी का
पानी खेतों तक पहुँचाया गया और उस वर्ष गाँव के किसानों की फसल अच्छी हुई। गाँव के
लोग बीरबल को धन्यवाद देने महल आए, लेकिन बीरबल ने कहा कि उन्होंने केवल रास्ता बताया था,
असली मेहनत तो
किसानों ने की थी।
उस दिन के बाद दरबार में बीरबल की परीक्षा लेने की बात कोई नहीं करता था। अब
जब भी कोई कठिन समस्या सामने आती, लोग पहले यह सोचते कि बीरबल उसे किस दृष्टिकोण से देखेंगे।
अकबर भी अक्सर कहते थे कि “समस्या कितनी बड़ी है, यह महत्वपूर्ण नहीं;
महत्वपूर्ण यह
है कि हम उसे किस नजर से देखते हैं।”
इस प्रकार बीरबल की परीक्षा समाप्त हुई, लेकिन इस परीक्षा ने एक ऐसी
सीख छोड़ दी जो आने वाली पीढ़ियों तक याद रखी गई। बीरबल ने साबित कर दिया कि असली
बुद्धिमानी केवल चालाकी में नहीं होती। सच्ची बुद्धिमानी वह है जिसमें ज्ञान के साथ धैर्य, बुद्धि के साथ ईमानदारी, और सफलता के साथ दूसरों के
प्रति दया भी हो। यही कारण था कि बादशाह अकबर के दरबार में
बीरबल का स्थान हमेशा सबसे विशेष रहा।
बीरबल की परीक्षाओं का सिलसिला समाप्त हो चुका था, लेकिन उन परीक्षाओं की
चर्चा पूरे राज्य में होने लगी थी। लोग कहते थे कि बीरबल केवल बादशाह अकबर के
प्रिय दरबारी ही नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति हैं जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी
धैर्य नहीं खोते। उन्होंने कभी अपनी बुद्धि का घमंड नहीं किया और न ही किसी को
नीचा दिखाने के लिए अपनी चतुराई का इस्तेमाल किया। यही कारण था कि आम जनता भी
उन्हें बहुत सम्मान देती थी। दूसरी ओर, वह दरबारी जिसने कई बार बीरबल को परीक्षा में
असफल करने की कोशिश की थी, अब उनके प्रति ईर्ष्या छोड़ने लगा था। उसे धीरे-धीरे समझ
आने लगा था कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति को हराने की कोशिश करने से बेहतर है कि उसकी
बुद्धि से कुछ सीखा जाए।
एक दिन सुबह अकबर अपने महल की छत पर टहल रहे थे। उनके साथ बीरबल भी थे। नीचे
महल के बगीचे में माली पौधों को पानी दे रहे थे। कुछ बच्चे खेल रहे थे और सैनिक
महल के मुख्य द्वार पर पहरा दे रहे थे। अकबर ने अचानक बीरबल से कहा, “बीरबल, मैंने तुम्हारी
कई परीक्षाएँ लीं, लेकिन मेरे मन में अभी भी एक बात है। क्या तुम जानते हो कि
तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत क्या है?” बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “जहाँपनाह, शायद आप मेरी
बुद्धि की बात कर रहे हैं।” अकबर ने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं। तुम्हारी सबसे बड़ी
ताकत तुम्हारी बुद्धि नहीं, बल्कि यह है कि तुम अपनी बुद्धि पर घमंड नहीं करते।”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, बुद्धि भी ईश्वर की देन है। यदि मनुष्य उसे अपनी संपत्ति
समझकर घमंड करने लगे, तो वही बुद्धि उसके लिए परेशानी बन सकती है।” अकबर ने उनकी
बात सुनकर कहा, “तुम्हारी यही बात तुम्हें दूसरों से अलग बनाती है।”
उसी समय महल का एक सैनिक तेजी से वहाँ आया। उसने झुककर सलाम किया और कहा,
“जहाँपनाह,
बाहर कुछ
व्यापारी आपसे मिलने की अनुमति माँग रहे हैं। वे दूर के शहर से आए हैं और कहते हैं
कि उनके पास आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण समाचार है।” अकबर ने उन्हें तुरंत दरबार में
बुलाने का आदेश दिया।
कुछ ही देर बाद तीन व्यापारी दरबार में उपस्थित हुए। उनके कपड़े देखकर लगता था
कि वे बहुत दूर से यात्रा करके आए थे। उनके साथ कई बड़े संदूक भी थे। सबसे बुजुर्ग
व्यापारी ने बादशाह को सलाम करके कहा, “जहाँपनाह, हम आपके राज्य में व्यापार
करने आए हैं। हमारे पास कीमती कपड़े, मसाले और कुछ दुर्लभ वस्तुएँ हैं। लेकिन रास्ते
में हमें एक ऐसी घटना का सामना करना पड़ा, जिसके कारण हम आपकी सहायता लेने आए हैं।”
अकबर ने पूछा, “क्या हुआ?”
व्यापारी ने कहा, “हम जब आपके राज्य की सीमा के पास पहुँचे तो हमारी एक
संदूकची गायब हो गई। उसमें बहुत मूल्यवान सामान था। हमें संदेह है कि हमारे साथ
यात्रा करने वाले किसी व्यक्ति ने उसे चुरा लिया है।”
अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि सभी संदूक दरबार में लाए जाएँ। कुछ समय बाद
संदूकची भी खोज ली गई, लेकिन वह खाली थी। व्यापारी ने कहा कि उसमें बहुत कीमती
रत्न थे। उसने आरोप लगाया कि चोरी उन्हीं लोगों में से किसी ने की है जो उसके साथ
यात्रा कर रहे थे।
अकबर ने बीरबल की ओर देखा। “बीरबल, इस मामले की जाँच करो।”
बीरबल ने सभी व्यापारियों और उनके साथ आए कर्मचारियों को एक कमरे में बुलाया।
उन्होंने सबसे पहले पूछा कि संदूकची आखिरी बार किसने देखी थी। एक व्यापारी ने कहा
कि उसने उसे रात में देखा था। दूसरे ने कहा कि उसने उसे सुबह देखा था। तीसरे ने
कहा कि उसने उसे कभी देखा ही नहीं था।
बीरबल ने प्रत्येक व्यक्ति से अलग-अलग प्रश्न पूछे। उन्होंने देखा कि एक
व्यक्ति बार-बार अपने उत्तर बदल रहा था। कभी वह कहता कि वह रात को सो रहा था,
फिर कहता कि वह
रात में घोड़े देखने गया था। बीरबल ने तुरंत उस पर चोरी का आरोप नहीं लगाया।
उन्होंने केवल इतना कहा कि उसके उत्तरों में कुछ असंगति है।
फिर उन्होंने सभी से पूछा कि संदूकची का ताला किस प्रकार का था। एक व्यापारी
ने कहा कि वह लोहे का ताला था। दूसरे ने कहा कि वह पीतल का था। तीसरे ने कहा कि
उसमें कोई ताला नहीं था, केवल लकड़ी की कुंडी थी।
बीरबल ने संदूकची को ध्यान से देखा। उस पर एक बहुत छोटा निशान बना था।
उन्होंने व्यापारी से पूछा, “यह निशान किसने बनाया था?”
व्यापारी ने कहा, “यह निशान हमने नहीं बनाया।”
बीरबल ने कहा, “तो फिर यह निशान यहाँ पहले से था?”
व्यापारी ने कहा, “जी।”
बीरबल ने उस निशान को देखकर कहा, “यह निशान किसी व्यापारी का नहीं, बल्कि एक
पुराने कारीगर का है। ऐसी निशानी मैंने पहले भी देखी है।”
उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि राज्य के उन कारीगरों को खोजा जाए जो इस
प्रकार की संदूकचियाँ बनाते हैं। थोड़ी देर बाद एक बूढ़ा कारीगर दरबार में लाया
गया। उसने संदूकची को देखते ही कहा, “हाँ, यह मेरे हाथ की बनी हुई है।”
बीरबल ने पूछा, “तुमने इसे किसके लिए बनाया था?”
कारीगर ने एक व्यापारी का नाम लिया।
बीरबल ने उस व्यापारी से पूछा, “क्या यह सच है?”
व्यापारी घबरा गया। उसने कहा, “जी... हाँ।”
बीरबल ने कहा, “लेकिन तुमने कुछ देर पहले कहा था कि तुम्हें पता नहीं कि
संदूकची कहाँ से आई।”
व्यापारी के पास कोई उत्तर नहीं था।
बीरबल ने आगे कहा, “इससे यह सिद्ध होता है कि तुमने झूठ बोला है, लेकिन अभी यह
सिद्ध नहीं होता कि तुमने चोरी की है।”
अकबर ने पूछा, “तो अब क्या करना चाहिए?”
बीरबल ने कहा, “हमें उस वस्तु को खोजने की जरूरत है जो चोरी हुई है। यदि
रत्न सचमुच चोरी हुए हैं, तो वे कहीं न कहीं होंगे।”
उन्होंने सभी व्यापारियों के सामान की जाँच करवाने का आदेश दिया। एक छोटे
संदूक में उन्हें कुछ कपड़े मिले। बीरबल ने कपड़ों को ध्यान से देखा। उनमें से एक
कपड़े पर हल्की-सी लाल मिट्टी लगी थी।
उन्होंने पूछा, “यह मिट्टी कहाँ से आई?”
व्यापारी ने कहा, “रास्ते से।”
बीरबल ने सैनिकों से पूछा कि सीमा के पास किस प्रकार की मिट्टी है। सैनिकों ने
बताया कि वहाँ की मिट्टी पीली है, लाल नहीं।
बीरबल ने कहा, “तो यह कपड़ा उस स्थान से नहीं आया जहाँ व्यापारी ने बताया।”
उन्होंने अनुमान लगाया कि कपड़ा किसी लाल मिट्टी वाली जगह पर गया होगा। राज्य
के नक्शे में ऐसी जगह एक पुराना कुआँ था, जो व्यापारियों के रास्ते से थोड़ा हटकर था।
सैनिकों को वहाँ भेजा गया। कुछ देर बाद वे लौटे और बताया कि कुएँ के पास एक पत्थर
के नीचे उन्हें एक छोटी थैली मिली है।
थैली खोलने पर उसमें वही रत्न थे जिनके चोरी होने की शिकायत व्यापारी ने की
थी।
दरबार में सब लोग आश्चर्य से बीरबल को देखने लगे। अकबर ने पूछा, “तुम्हें कैसे
पता चला कि रत्न वहाँ होंगे?”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, मैंने केवल संकेतों को जोड़ा। कपड़े पर लाल मिट्टी थी,
जबकि यात्रा के
रास्ते में लाल मिट्टी नहीं थी। इसका मतलब था कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे स्थान पर
गया था। और यदि चोरी की वस्तु छिपानी हो तो सुनसान जगह सबसे उपयुक्त होती है।”
पूछताछ के बाद पता चला कि वही व्यापारी, जिसने सबसे अधिक झूठ बोले
थे, रत्नों को चुराकर कुएँ के पास छिपा आया था। उसने सोचा था कि बाद में उन्हें
वापस लेकर भाग जाएगा। लेकिन बीरबल की सूझ-बूझ ने उसकी योजना को असफल कर दिया।
अकबर ने व्यापारी को दंड दिया और बाकी व्यापारियों का सामान उन्हें वापस कर
दिया। फिर उन्होंने बीरबल से कहा, “आज फिर तुमने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची जाँच केवल किसी पर
संदेह करने से नहीं होती। उसके पीछे कारण और प्रमाण भी होना चाहिए।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, किसी निर्दोष पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन सत्य तक पहुँचना
कठिन। इसलिए न्याय करने वाले व्यक्ति को धैर्य रखना चाहिए।”
इस घटना के कुछ दिनों बाद राज्य में एक और समस्या उत्पन्न हुई। इस बार समस्या
बहुत बड़ी थी। राज्य के एक गाँव में दो भाइयों के बीच जमीन को लेकर विवाद हो गया।
दोनों का कहना था कि जमीन उनकी है। मामला इतना उलझ गया कि गाँव के बुजुर्ग भी
फैसला नहीं कर पाए।
अकबर ने बीरबल को गाँव में जाकर समस्या हल करने का आदेश दिया। बीरबल गाँव
पहुँचे तो दोनों भाई उनके सामने उपस्थित हुए। बड़ा भाई बोला, “यह जमीन हमारे
पिता ने मुझे दी थी।” छोटा भाई तुरंत बोला, “नहीं, पिता ने यह
जमीन हम दोनों के नाम की थी।”
बीरबल ने दोनों की बातें सुनीं। उन्होंने गाँव के बुजुर्गों से भी पूछताछ की।
लेकिन कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला। पुराने कागज भी नष्ट हो चुके थे।
बीरबल ने दोनों भाइयों से पूछा, “यदि तुम्हारे पिता ने तुम्हें जमीन दी थी,
तो उन्होंने
तुम्हें इसके बारे में क्या कहा था?”
बड़े भाई ने कहा, “उन्होंने कहा था कि खेत की देखभाल करना।”
छोटे भाई ने कहा, “उन्होंने भी यही कहा था।”
बीरबल ने कुछ देर सोचा और फिर पूछा, “तुम्हारे पिता खेत में सबसे अधिक किस स्थान पर
बैठते थे?”
दोनों भाई कुछ देर चुप रहे। फिर छोटे भाई ने कहा, “वे आम के पेड़ के नीचे
बैठते थे।”
बीरबल ने खेत में जाकर वह आम का पेड़ देखा। पेड़ बहुत पुराना था। उसके पास
जमीन में एक पत्थर दबा हुआ था। बीरबल ने उसे हटाने का आदेश दिया। नीचे एक छोटी
लोहे की डिब्बी मिली। डिब्बी में एक पुराना पत्र था।
पत्र में उनके पिता ने लिखा था कि जमीन दोनों भाइयों की है और दोनों को मिलकर
उसकी देखभाल करनी चाहिए।
दोनों भाई चुप हो गए। बड़े भाई ने छोटे भाई की ओर देखा। छोटा भाई भी भावुक हो
गया।
बीरबल ने कहा, “तुम दोनों जमीन के लिए लड़ रहे थे, लेकिन तुम्हारे पिता चाहते
थे कि तुम इसे मिलकर संभालो। जमीन तुम्हें विरासत में मिली है, लेकिन भाईचारा
उससे भी बड़ी विरासत है।”
दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।
जब बीरबल वापस दरबार में पहुँचे तो अकबर ने पूछा, “क्या समस्या हल हो गई?”
बीरबल ने कहा, “जी हुजूर। जमीन का विवाद तो समाप्त हो गया, लेकिन उससे भी
बड़ी बात यह है कि दो भाइयों का रिश्ता बच गया।”
अकबर ने कहा, “यही कारण है कि मैं तुम्हें अपना सबसे भरोसेमंद सलाहकार
मानता हूँ।”
उस दिन अकबर ने दरबार में घोषणा की कि बीरबल की परीक्षाएँ समाप्त नहीं हुई हैं,
बल्कि उनकी
सबसे बड़ी परीक्षा हर दिन होती है—जब उन्हें सत्ता, धन और न्याय के बीच सही
चुनाव करना पड़ता है। और बीरबल हर दिन यह सिद्ध करते हैं कि सच्ची बुद्धि वही है
जो इंसान को सही मार्ग पर चलाए।
समय बीतता गया। वह दरबारी भी अब बीरबल का विरोधी नहीं रहा। वह अक्सर उनके पास
जाकर सलाह लेने लगा। बीरबल ने भी कभी उसके पुराने व्यवहार को याद करके उसे अपमानित
नहीं किया। एक दिन उस दरबारी ने बीरबल से कहा, “मैंने आपको हराने में जितनी
मेहनत की, यदि उतनी मेहनत स्वयं को बेहतर बनाने में करता तो शायद मैं भी कुछ सीख पाता।”
बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “सीखने के लिए कभी देर नहीं होती।”
दरबारी ने पूछा, “आप इतने शांत कैसे रहते हैं?”
बीरबल ने उत्तर दिया, “क्योंकि मैंने समझ लिया है कि हर समस्या का उत्तर तुरंत
देना जरूरी नहीं। कभी-कभी शांत रहना ही पहला उत्तर होता है।”
कुछ समय बाद अकबर ने बीरबल के सम्मान में एक विशेष सभा आयोजित की। पूरे दरबार
के सामने उन्होंने कहा, “बीरबल की परीक्षा लेने वाले सभी लोगों ने एक बात सीखी है।
किसी व्यक्ति की बुद्धि को केवल कठिन प्रश्नों से नहीं परखा जा सकता। उसकी असली
परीक्षा तब होती है जब उसके सामने लालच हो और वह ईमानदारी चुने, जब उसके सामने
क्रोध हो और वह धैर्य चुने, जब उसके सामने अन्याय हो और वह सत्य चुने, और जब उसके
सामने अपनी जीत का अवसर हो और वह किसी दूसरे की भलाई को प्राथमिकता दे।”
बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, यदि मेरी किसी बात से किसी का भला हुआ है, तो यही मेरे
लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।”
अकबर ने कहा, “और यही कारण है कि तुम मेरे दरबार के सबसे प्रिय रत्नों में
से एक हो।”
पूरा दरबार तालियों से गूँज उठा। बीरबल ने सिर झुका लिया। उनके चेहरे पर वही
सरल मुस्कान थी जो हर परीक्षा के समय दिखाई देती थी।
इस प्रकार बीरबल की परीक्षा की कहानी समाप्त हुई। लेकिन इस कहानी की सीख केवल
अकबर और बीरबल के समय तक सीमित नहीं रही। यह कहानी आज भी हमें याद दिलाती है कि
बुद्धिमान होना केवल बहुत सारी बातें जानना नहीं है। बुद्धिमानी का अर्थ है सही
समय पर सही निर्णय लेना, दूसरों की बात ध्यान से सुनना, बिना प्रमाण किसी पर आरोप न
लगाना, कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना और अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की मदद
के लिए करना। बीरबल ने अपनी हर परीक्षा में यही सिद्ध किया कि सच्चा विजेता वह
नहीं होता जो दूसरों को हरा दे, बल्कि वह होता है जो अपनी बुद्धि से समस्या को हल करे और
अंत में सभी के लिए न्याय और भलाई का रास्ता बनाए। यही कारण था कि बादशाह अकबर का
विश्वास बीरबल पर हमेशा बना रहा और बीरबल का नाम इतिहास की सबसे प्रसिद्ध
बुद्धिमान कहानियों में अमर हो गया।
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