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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

सबसे अच्छा धन

 



बहुत समय पहले की बात है। हिंदुस्तान पर बादशाह अकबर का शासन था। उनका दरबार अपनी भव्यता, न्यायप्रियता और विद्वानों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध था। अकबर के दरबार में अनेक बुद्धिमान मंत्री और विद्वान हुआ करते थे, लेकिन उनमें सबसे अलग स्थान था बीरबल का। बीरबल केवल अपनी चतुराई के लिए ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी शांत रहकर सही रास्ता खोज लेते थे। बादशाह अकबर को बीरबल की बुद्धि पर बहुत विश्वास था। जब भी दरबार में कोई ऐसी समस्या आती जिसका हल किसी को समझ नहीं आता, तब सभी की निगाहें बीरबल की ओर उठ जातीं।

एक सुबह बादशाह अकबर अपने महल की ऊँची खिड़की के पास खड़े होकर राजधानी को देख रहे थे। सूरज की सुनहरी किरणें महल की दीवारों पर पड़ रही थीं। पक्षियों की आवाजें वातावरण को मधुर बना रही थीं, लेकिन अकबर के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने अपने सेवक को आदेश दिया कि आज का दरबार सामान्य समय से पहले लगाया जाए। कुछ ही देर में दरबार सज गया। मंत्री, सेनापति, व्यापारी, विद्वान और दूर-दूर से आए फरियादी सभी अपनी-अपनी जगह बैठ गए। लेकिन उस दिन अकबर के मन में एक ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर वे स्वयं भी नहीं जानते थे।

बादशाह सिंहासन पर बैठे और उन्होंने चारों ओर देखा। फिर बोले, “आज मैं दरबार में एक ऐसा प्रश्न रखने वाला हूँ जिसका उत्तर केवल वही व्यक्ति दे सकेगा जो वास्तव में बुद्धिमान है। मैं चाहता हूँ कि मेरे दरबार के सभी लोग ध्यान से सोचें। उत्तर जल्दी देने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन उत्तर ऐसा होना चाहिए जो मेरे मन को संतुष्ट कर सके।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी विद्वान उत्सुक होकर बादशाह की ओर देखने लगे। अकबर ने धीरे-धीरे कहा, “बताइए, संसार में ऐसी कौन-सी चीज है जो जितनी अधिक बाँटी जाए, उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है, लेकिन जिसे धन से खरीदा नहीं जा सकता?”

दरबारियों ने एक-दूसरे की ओर देखा। किसी ने सोचा कि उत्तर ज्ञान होगा, किसी ने प्रेम के बारे में सोचा, तो किसी ने कहा कि शायद खुशी। लेकिन कोई भी तुरंत उत्तर देने का साहस नहीं कर पाया।

एक दरबारी ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, मेरा विचार है कि इसका उत्तर धन हो सकता है। यदि धन को व्यापार में लगाया जाए तो वह बढ़ सकता है।”

अकबर मुस्कुराए और बोले, “लेकिन मैंने कहा कि जिसे धन से खरीदा नहीं जा सकता। इसलिए तुम्हारा उत्तर सही नहीं है।”

दूसरे दरबारी ने कहा, “शायद भोजन। भोजन बाँटने से लोगों की खुशी बढ़ती है।”

अकबर ने सिर हिलाया। “भोजन बाँटने से संतोष मिल सकता है, लेकिन भोजन स्वयं बढ़ता नहीं है।”

एक-एक करके कई लोगों ने उत्तर देने की कोशिश की, मगर कोई भी बादशाह को संतुष्ट नहीं कर सका। तभी दरबार के एक कोने से धीमी आवाज आई, “जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं भी अपना विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ।”

अकबर ने देखा कि बीरबल अभी दरबार में पहुँचे नहीं थे। आवाज एक वृद्ध विद्वान की थी, जो कुछ दिनों पहले ही दूसरे राज्य से आया था। अकबर ने उसे बोलने की अनुमति दी।

वृद्ध ने कहा, “मेरा अनुमान है कि उत्तर प्रेम है। प्रेम जितना बाँटते हैं, उतना ही बढ़ता है।”

दरबारियों में कुछ लोगों ने सहमति में सिर हिलाया। अकबर कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, “उत्तर सुंदर है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि इसके पीछे ऐसी बुद्धि हो जिसे किसी उदाहरण से सिद्ध किया जा सके।”

वृद्ध विद्वान चुप हो गया।

उसी समय दरबार के बड़े दरवाजे खुले और बीरबल अंदर आए। उन्होंने झुककर बादशाह को प्रणाम किया। अकबर ने मुस्कुराकर कहा, “आइए बीरबल! आज आपकी परीक्षा होने वाली है।”

बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, आपकी सेवा में उपस्थित होना ही मेरे लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है। परीक्षा कैसी भी हो, कोशिश अवश्य करूँगा।”

अकबर ने अपना प्रश्न दोहराया। बीरबल ने कुछ क्षण आँखें बंद कीं और फिर मुस्कुराने लगे।

अकबर ने पूछा, “क्या आपको उत्तर मिल गया?”

बीरबल बोले, “जहाँपनाह, उत्तर तो मिल गया है, लेकिन केवल एक शब्द में उत्तर देना आपके प्रश्न के साथ न्याय नहीं होगा।”

अकबर ने उत्सुकता से कहा, “तो फिर विस्तार से बताइए।”

बीरबल ने कहा, “मेरे विचार से उत्तर है—ज्ञान।”

दरबार में हलचल हुई। कुछ दरबारी मुस्कुराने लगे। उनमें से एक ने तुरंत कहा, “ज्ञान बाँटने से कैसे बढ़ सकता है? यदि मेरे पास एक पुस्तक है और मैं किसी को पढ़ा दूँ, तो पुस्तक तो वही रहेगी।”

बीरबल ने उसकी ओर देखकर कहा, “पुस्तक वही रहेगी, लेकिन पुस्तक में लिखा ज्ञान दो लोगों के मन में पहुँच जाएगा। यदि वे दोनों आगे दस लोगों को वही ज्ञान सिखाएँगे तो वह ज्ञान दस लोगों तक पहुँच जाएगा। इस प्रकार ज्ञान की कोई सीमा नहीं रहती।”

अकबर ध्यान से सुन रहे थे।

बीरबल आगे बोले, “धन को बाँटने पर वह कम हो सकता है, भोजन बाँटने पर समाप्त हो सकता है और वस्तुएँ बाँटने पर हमारे पास कम बचती हैं। लेकिन ज्ञान ऐसी संपत्ति है जिसे बाँटने से देने वाला गरीब नहीं होता। बल्कि वह स्वयं और अधिक सीखता है। जब कोई व्यक्ति अपने ज्ञान को दूसरे के साथ बाँटता है, तो सामने वाला प्रश्न पूछता है, अपनी बात बताता है और कभी-कभी ऐसी नई बात सामने आती है जो पहले व्यक्ति ने भी नहीं सोची होती। इसलिए ज्ञान बाँटने से दोनों समृद्ध होते हैं।”

अकबर के चेहरे पर प्रसन्नता आ गई। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुम्हारा उत्तर मुझे पसंद आया। लेकिन आज मैं केवल उत्तर सुनना नहीं चाहता। मैं चाहता हूँ कि तुम इसे सिद्ध करके दिखाओ।”

बीरबल ने सिर झुकाया। “जैसा आदेश, जहाँपनाह।”

अकबर ने दरबारियों की ओर देखा और कहा, “कल सुबह तक बीरबल को यह सिद्ध करना होगा कि ज्ञान वास्तव में बाँटने से बढ़ता है। यदि वह ऐसा नहीं कर सके, तो उसे स्वीकार करना होगा कि उसका उत्तर अधूरा था।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे आपका आदेश स्वीकार है।”

दरबार समाप्त होने लगा। लेकिन कुछ दरबारियों के चेहरे पर खुशी थी। उन्हें लगा कि इस बार बीरबल कठिन परीक्षा में फँस गए हैं। उनमें से मीर कासिम नाम का एक दरबारी बीरबल से विशेष रूप से ईर्ष्या करता था। वह कई बार चाहता था कि किसी तरह बीरबल की प्रतिष्ठा कम हो जाए। उसने अपने साथी से धीरे से कहा, “आज लगता है बीरबल की बुद्धि की असली परीक्षा होगी। ज्ञान बाँटकर बढ़ता है, यह कहना आसान है, लेकिन इसे साबित करना इतना आसान नहीं।”

बीरबल ने उसकी बात सुन ली, मगर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

दरबार से निकलते समय अकबर ने बीरबल को अपने पास बुलाया और पूछा, “क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि तुम कल इसका प्रमाण दे सकोगे?”

बीरबल मुस्कुराए। “जहाँपनाह, जब सवाल कठिन होता है, तभी उत्तर खोजने में आनंद आता है।”

अकबर ने कहा, “लेकिन ध्यान रहे, मैं केवल शब्दों से संतुष्ट नहीं होऊँगा।”

मैं भी केवल शब्दों के भरोसे नहीं हूँ,” बीरबल ने उत्तर दिया।

उस रात बीरबल अपने घर लौटे। उनकी पत्नी ने पूछा, “आज बादशाह ने आपको किस चिंता में डाल दिया?”

बीरबल ने सारी बात बताई। पत्नी ने हँसकर कहा, “आप तो हर समस्या का हल निकाल लेते हैं। इस बार क्या करेंगे?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “इस बार मुझे किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे शहर को समझाना होगा।”

अगली सुबह बीरबल बहुत जल्दी उठ गए। उन्होंने साधारण कपड़े पहने और बिना किसी शाही पहचान के शहर की ओर निकल पड़े। वे बाजार में पहुँचे। वहाँ एक गरीब लड़का अपनी छोटी-सी दुकान के सामने बैठा था। उसके पास कुछ पुराने खिलौने और मिट्टी के बर्तन थे। लड़का बार-बार एक किताब की ओर देख रहा था, लेकिन उसे पढ़ना नहीं आता था।

बीरबल उसके पास गए और पूछा, “क्या तुम पढ़ना चाहते हो?”

लड़के ने कहा, “हाँ, लेकिन मुझे अक्षर नहीं आते। मेरे पिता कहते हैं कि पढ़ाई अमीर बच्चों के लिए होती है।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “किसने कहा कि ज्ञान केवल अमीरों की संपत्ति है?”

लड़का चुप रहा।

बीरबल ने जमीन पर लकड़ी की एक छोटी छड़ी से पहला अक्षर लिखा और उसे पढ़ना सिखाया। फिर दूसरा अक्षर। कुछ ही देर में लड़का दोनों अक्षरों को पहचानने लगा। तभी पास खड़ा एक दूसरा बच्चा भी देखने लगा।

बीरबल ने दूसरे बच्चे से कहा, “तुम भी सीखना चाहते हो?”

उसने सिर हिला दिया।

बीरबल ने दोनों बच्चों को एक साथ पढ़ाना शुरू किया। कुछ देर बाद पहला लड़का दूसरे बच्चे को वही अक्षर समझाने लगा जो उसने अभी-अभी सीखा था।

बीरबल ने मन ही मन कहा, “यही तो प्रमाण है।”

लेकिन उनकी परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी।

वे वहाँ से आगे बढ़े तो उन्हें एक बूढ़ा किसान मिला जो परेशान बैठा था। उसकी फसल बार-बार खराब हो रही थी। बीरबल ने उससे उसकी समस्या पूछी। किसान ने बताया कि वह पानी देने का सही समय नहीं जानता और इसी कारण खेत को नुकसान हो जाता है।

बीरबल ने उसे पानी बचाने और खेत में नमी बनाए रखने का एक सरल तरीका बताया। किसान ने ध्यान से बात सुनी। तभी पास के खेत का दूसरा किसान भी आ गया। उसने पूछा, “मुझे भी बताइए।”

पहले किसान ने तुरंत कहा, “मैं तुम्हें बताता हूँ।”

बीरबल दूर खड़े होकर यह दृश्य देखते रहे। उन्हें समझ आ गया कि ज्ञान की यही खूबी है—एक व्यक्ति को दिया गया ज्ञान दूसरे तक पहुँचते ही और फैलने लगता है।

लेकिन उसी समय उन्हें खबर मिली कि मीर कासिम दरबार में जाकर बादशाह से कह रहा है कि बीरबल का उत्तर गलत है और वह केवल लोगों को छोटी-छोटी बातें सिखाकर बादशाह को भ्रमित कर रहे हैं।

बीरबल ने तय किया कि अब उन्हें ऐसा प्रमाण देना होगा जिसे पूरा दरबार अपनी आँखों से देख सके।

शाम को वे महल लौटे। अगले दिन दरबार में बड़ी भीड़ जमा थी। अकबर ने पूछा, “बीरबल, क्या तुम अपने उत्तर का प्रमाण लेकर आए हो?”

बीरबल ने कहा, “हाँ, जहाँपनाह। लेकिन प्रमाण मैं अकेला नहीं दूँगा। आज कुछ लोग स्वयं बताएँगे कि उन्हें क्या मिला और उन्होंने उसे आगे कैसे बाँटा।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “कौन लोग?”

बीरबल ने दरबार के बाहर खड़े लोगों को अंदर बुलाया। सबसे पहले वही गरीब लड़का आया। उसने बादशाह को प्रणाम किया और कहा, “मुझे कल एक व्यक्ति ने अक्षर पढ़ना सिखाया। फिर मैंने अपने मित्र को वही अक्षर सिखाए। आज हम दोनों मिलकर तीसरे बच्चे को पढ़ाने वाले हैं।”

अकबर ने बीरबल की ओर देखा।

फिर बूढ़ा किसान आया। उसने बताया कि बीरबल से सीखी खेती की विधि उसने अपने पड़ोसी किसान को बता दी और अब दोनों किसान उसी तरीके से खेत में पानी बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

अकबर कुछ देर तक चुप रहे।

बीरबल बोले, “जहाँपनाह, यदि मेरे पास एक सिक्का होता और मैं उसे किसी को दे देता, तो वह सिक्का मेरे पास नहीं रहता। लेकिन यदि मेरे पास एक ज्ञान की बात होती और मैं उसे किसी को दे देता, तो वह मेरे पास भी रहती और उसके पास भी पहुँच जाती। फिर वह व्यक्ति किसी तीसरे को सिखा सकता है। इस प्रकार ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, बल्कि फैलता है।”

अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “आज तुमने केवल मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, बल्कि उसका अर्थ भी समझा दिया।”

लेकिन तभी मीर कासिम आगे आया और बोला, “जहाँपनाह, यह तो बहुत छोटी बात है। मैं भी किसी को कोई बात बता दूँ तो वह ज्ञान कहलाएगा? क्या इससे राज्य की कोई बड़ी समस्या हल हो सकती है?”

अकबर ने उसकी ओर देखा। “तुम्हारे प्रश्न में कुछ दम है। बीरबल, क्या तुम ऐसी कोई बड़ी समस्या हल करके दिखा सकते हो जिसमें ज्ञान बाँटने का महत्व स्पष्ट हो?”

बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “जी हाँ।”

अकबर ने पूछा, “कब?”

बीरबल बोले, “जब अगली समस्या हमारे सामने आएगी।”

अकबर ने हँसकर कहा, “तो फिर इंतजार करते हैं।”

किसी को नहीं पता था कि उसी रात महल के बाहर एक ऐसा व्यक्ति आने वाला था, जो पूरे राज्य को संकट में डाल देगा। उसके पास एक रहस्यमय संदेश था और उस संदेश में ऐसी पहेली लिखी थी जिसका उत्तर न मिलने पर बादशाह को एक बहुत बड़ा निर्णय लेना पड़ सकता था।

और उस पहेली का संबंध सीधे बीरबल की बुद्धि से होने वाला था।

अगली सुबह बादशाह अकबर का दरबार हमेशा की तरह लगा हुआ था, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर में दरबार में एक ऐसा रहस्यमयी संदेश आने वाला है जो पूरे राज्य में हलचल मचा देगा। बादशाह अकबर सिंहासन पर बैठे थे। उनके सामने मंत्री, सेनापति, विद्वान और व्यापारी अपनी-अपनी समस्याएँ लेकर उपस्थित थे। बीरबल भी अपने स्थान पर शांत भाव से बैठे हुए थे। तभी महल के मुख्य द्वार पर एक सैनिक तेजी से आया और उसने झुककर कहा, “जहाँपनाह, महल के बाहर एक अजनबी व्यक्ति आया है। वह कहता है कि उसके पास आपके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है।”

अकबर ने पूछा, “वह कौन है?”

सैनिक ने उत्तर दिया, “वह अपना नाम बताने से इनकार कर रहा है। उसने केवल इतना कहा है कि वह दूर के एक राज्य से आया है और यह संदेश सीधे बादशाह के हाथों में देना चाहता है।”

अकबर ने कुछ क्षण सोचा और फिर कहा, “उसे अंदर बुलाया जाए।”

कुछ ही क्षण बाद एक लंबा, दुबला-पतला व्यक्ति दरबार में आया। उसने साधारण काले कपड़े पहन रखे थे। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन उसकी आँखों में अजीब-सी गंभीरता दिखाई दे रही थी। वह आगे बढ़ा और एक मोहरबंद पत्र दोनों हाथों से बादशाह के सामने रख दिया।

जहाँपनाह,” उसने कहा, “यह पत्र मुझे आपके लिए दिया गया है। जिसने यह भेजा है, उसने कहा है कि इसका उत्तर केवल वही व्यक्ति दे सकता है जो बुद्धि के साथ-साथ धैर्य भी रखता हो।”

दरबार में फुसफुसाहट होने लगी।

अकबर ने पत्र खोला। उसमें केवल कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं—

जिसे खोजोगे, वह दिखाई नहीं देगा। जिसे पकड़ोगे, वह हाथ में नहीं आएगा। जिसे बाँटोगे, वह बढ़ता जाएगा। और जिसे छिपाओगे, वह धीरे-धीरे मर जाएगा। बताओ, वह क्या है?”

अकबर ने पत्र को दोबारा पढ़ा।

उनके चेहरे पर गंभीरता आ गई।

उन्होंने दरबारियों से कहा, “यह केवल पहेली नहीं लगती। इसके पीछे कोई संदेश छिपा है।”

मीर कासिम तुरंत बोला, “जहाँपनाह, इसका उत्तर तो बहुत सरल है। यह हवा हो सकती है। हवा दिखाई नहीं देती, हाथ में नहीं आती और सबमें फैलती है।”

एक अन्य दरबारी बोला, “नहीं, यह प्रकाश है।”

तीसरे ने कहा, “शायद समय।”

बीरबल चुपचाप पत्र को देख रहे थे।

अकबर ने पूछा, “बीरबल, तुम क्या सोचते हो?”

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, यह पहेली कल के प्रश्न से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।”

अकबर ने भौंहें उठाईं। “कैसे?”

बीरबल बोले, “कल आपने पूछा था कि कौन-सी चीज बाँटने से बढ़ती है। आज इस पत्र में भी वही संकेत दिया गया है—‘जिसे बाँटोगे, वह बढ़ता जाएगा।’ इसलिए मेरा पहला अनुमान है कि उत्तर ज्ञान हो सकता है।”

मीर कासिम हँस पड़ा। “बीरबल को तो हर जगह ज्ञान ही दिखाई देता है।”

बीरबल ने उसकी ओर देखा और शांत स्वर में कहा, “कभी-कभी किसी व्यक्ति को वही दिखाई देता है जिसकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता होती है।”

दरबार में कुछ लोग मुस्कुरा दिए।

अकबर ने हाथ उठाकर सबको शांत कराया। “बीरबल, केवल अनुमान से काम नहीं चलेगा। हमें पता लगाना होगा कि यह संदेश किसने भेजा और क्यों।”

अजनबी व्यक्ति अभी भी दरबार में खड़ा था।

अकबर ने उससे पूछा, “तुम्हें यह पत्र किसने दिया?”

उसने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, मैं उसका नाम नहीं बता सकता।”

क्यों?”

क्योंकि मुझे आदेश दिया गया था कि जब तक पहेली का उत्तर न मिल जाए, तब तक उसका नाम किसी को न बताऊँ।”

अकबर ने कहा, “और यदि हम उत्तर न दे पाए?”

अजनबी ने सिर झुकाकर कहा, “तब शायद बहुत देर हो जाएगी।”

यह सुनते ही दरबार में तनाव फैल गया।

अकबर ने गंभीर स्वर में पूछा, “बहुत देर किस बात के लिए?”

अजनबी ने कुछ क्षण चुप रहने के बाद कहा, “आपके राज्य के लिए।”

अब हर व्यक्ति की नजर उस पर टिक गई।

अकबर ने सैनिकों को संकेत किया कि दरबार के द्वार बंद कर दिए जाएँ।

बीरबल ने अजनबी को ध्यान से देखा। उसके कपड़ों पर धूल थी, जूतों पर सूखी मिट्टी लगी थी और उसकी दाईं हथेली पर एक हल्का-सा निशान था।

बीरबल ने पूछा, “तुम कितने दिनों से यात्रा कर रहे हो?”

अजनबी ने कहा, “लगभग चार दिन।”

किस दिशा से आए?”

उत्तर-पश्चिम से।”

रास्ते में कहाँ रुके?”

अजनबी ने दो-तीन स्थानों के नाम बताए।

बीरबल कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने पूछा, “तुम्हारे पास कोई और वस्तु है?”

अजनबी ने कहा, “नहीं।”

लेकिन तभी बीरबल की नजर उसके कमरबंद पर पड़ी। वहाँ एक छोटी-सी धातु की चाबी लटक रही थी।

बीरबल ने पूछा, “उस चाबी का क्या उपयोग है?”

अजनबी घबरा गया।

यह... यह मेरी निजी वस्तु है।”

बीरबल ने कहा, “यदि यह निजी वस्तु है तो तुम्हें इसे छिपाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?”

अकबर ने सैनिकों को संकेत किया।

सैनिक आगे बढ़ा, लेकिन बीरबल ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

जहाँपनाह, इसे बलपूर्वक लेने की आवश्यकता नहीं है। मुझे विश्वास है कि वह स्वयं इसका रहस्य बताएगा।”

अजनबी चुप रहा।

अकबर ने कठोर स्वर में कहा, “सच बताओ।”

अजनबी ने आखिरकार कमरबंद से चाबी निकालकर जमीन पर रख दी।

यह चाबी एक संदूक की है।”

किस संदूक की?” अकबर ने पूछा।

अजनबी ने कहा, “मुझे नहीं पता।”

बीरबल मुस्कुराए। “तुम्हें नहीं पता, फिर यह चाबी तुम्हारे पास क्यों है?”

अजनबी ने उत्तर नहीं दिया।

बीरबल उसके पास गए और बोले, “तुम्हें जिसने भेजा है, उसने तुम्हें केवल संदेश नहीं दिया। उसने तुम्हें एक रास्ता दिया है। पत्र पहेली है, चाबी संकेत है और संदूक शायद उस पहेली का अगला चरण।”

अकबर ने तुरंत आदेश दिया कि महल और शहर में ऐसा कोई संदूक खोजा जाए जिसके बारे में हाल में कोई सूचना मिली हो।

सैनिक पूरे महल में खोज करने लगे। कुछ देर बाद एक सैनिक दौड़ता हुआ आया।

जहाँपनाह! महल के पुराने पुस्तकालय के पीछे एक बंद कमरा मिला है। वहाँ एक बहुत पुराना संदूक रखा है।”

अकबर ने कहा, “उसे तुरंत यहाँ लाया जाए।”

कुछ ही देर में चार सैनिक भारी संदूक उठाकर दरबार में लाए। संदूक लकड़ी का था और उसके ऊपर लोहे की पट्टियाँ लगी थीं। उस पर कोई शाही निशान नहीं था। सबसे रहस्यमयी बात यह थी कि संदूक पर धूल की मोटी परत जमी थी, जैसे उसे वर्षों से किसी ने छुआ ही न हो।

अजनबी को देखते ही वह पीछे हट गया।

बीरबल ने यह बात नोट कर ली।

अकबर ने पूछा, “क्या यही संदूक है?”

अजनबी ने कहा, “मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा।”

बीरबल ने उसकी आँखों में देखा और बोले, “झूठ।”

दरबार में सन्नाटा छा गया।

अकबर ने पूछा, “तुम्हें कैसे पता?”

बीरबल ने कहा, “जब संदूक अंदर आया, तब इस व्यक्ति के चेहरे पर डर दिखाई दिया। जो व्यक्ति किसी वस्तु को पहली बार देखता है, वह सामान्यतः आश्चर्यचकित होता है। लेकिन यह व्यक्ति उसे देखकर घबरा गया। इसका अर्थ है कि वह संदूक को पहचानता है।”

अजनबी ने तुरंत कहा, “नहीं!”

बीरबल बोले, “यदि तुम सच बोल रहे हो तो इस चाबी से इसे खोलने में तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

अजनबी चुप हो गया।

अकबर ने चाबी उठाई और संदूक के पास गए। उन्होंने चाबी ताले में लगाई, लेकिन वह घूमी नहीं।

मीर कासिम हँसते हुए बोला, “लगता है बीरबल का अनुमान गलत निकला।”

बीरबल ने संदूक को ध्यान से देखा। फिर उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, चाबी गलत नहीं है। तरीका गलत है।”

उन्होंने चाबी निकाली और ताले को ध्यान से देखने लगे। ताले के पास लकड़ी पर बहुत छोटे-छोटे निशान बने हुए थे। वे सामान्य आँखों से लगभग दिखाई नहीं दे रहे थे।

बीरबल ने दीपक पास लाने को कहा।

उन्होंने निशानों को देखा और धीरे से कहा, “यह कोई साधारण ताला नहीं है।”

अकबर ने पूछा, “तो फिर इसे कैसे खोला जाए?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “शायद चाबी से नहीं, उत्तर से।”

दरबारियों को कुछ समझ नहीं आया।

बीरबल ने पत्र फिर से खोला और पहेली को ध्यान से पढ़ा।

जिसे खोजोगे, वह दिखाई नहीं देगा। जिसे पकड़ोगे, वह हाथ में नहीं आएगा। जिसे बाँटोगे, वह बढ़ता जाएगा। और जिसे छिपाओगे, वह धीरे-धीरे मर जाएगा।”

उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, इसमें चार संकेत हैं। पहला—वह दिखाई नहीं देता। दूसरा—उसे हाथ में नहीं पकड़ा जा सकता। तीसरा—बाँटने से बढ़ता है। चौथा—छिपाने से मर जाता है।”

अकबर ने कहा, “ज्ञान।”

बीरबल ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन केवल ज्ञान नहीं। शायद सत्य।”

दरबार में फिर से हलचल हुई।

बीरबल बोले, “सत्य को खोजा जाता है, लेकिन वह दिखाई नहीं देता। उसे हाथ में नहीं पकड़ा जा सकता। सत्य को लोगों तक पहुँचाया जाए तो वह मजबूत होता है। लेकिन यदि सत्य को छिपाया जाए, तो झूठ फैलने लगता है और सत्य कमजोर पड़ जाता है।”

उन्होंने संदूक के ताले को देखा।

शायद संदूक का ताला इसीलिए उत्तर से खुलता है।”

अकबर ने पूछा, “तो हमें क्या करना होगा?”

बीरबल ने कहा, “पहले हमें यह पता लगाना होगा कि संदूक किसका है।”

उन्होंने अजनबी की ओर देखा।

और मुझे लगता है कि यह व्यक्ति उस रहस्य की पहली कड़ी है।”

अजनबी ने घबराकर कहा, “मैं कुछ नहीं जानता।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है। यदि तुम कुछ नहीं जानते, तो मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दे दो।”

अजनबी चुप रहा।

पहला—तुम्हें पत्र किसने दिया?”

कोई उत्तर नहीं।

दूसरा—तुम चार दिन पहले किस गाँव से निकले?”

अजनबी ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, लेकिन फिर बंद कर लिया।

तीसरा—तुम्हारी हथेली पर यह निशान कैसे आया?”

अजनबी ने तुरंत अपना हाथ पीछे कर लिया।

बीरबल समझ गए कि असली रहस्य इसी निशान में छिपा है।

उन्होंने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, यदि मुझे अनुमति मिले तो मैं इस व्यक्ति को अपने साथ कुछ देर अकेले में बात करना चाहता हूँ।”

अकबर ने अनुमति दे दी।

बीरबल अजनबी को दरबार के एक छोटे कमरे में ले गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दरवाजा बंद किया और कहा, “मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता। लेकिन यदि तुमने सत्य नहीं बताया तो न केवल तुम्हारी जान खतरे में पड़ेगी, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी भी संकट में आ सकती है।”

अजनबी की आँखों में आँसू आ गए।

उसने धीमे स्वर में कहा, “मैं अपराधी नहीं हूँ, बीरबल।”

मैंने तुम्हें अपराधी नहीं कहा।”

लेकिन यदि मैंने सच बताया तो मेरे पीछे आने वाले लोग मुझे मार डालेंगे।”

बीरबल ने कहा, “यदि तुम सच नहीं बताओगे तो शायद वही लोग पूरे राज्य को नुकसान पहुँचा देंगे।”

अजनबी कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने अपनी कमर से एक छोटा कपड़ा निकाला। कपड़े में एक और वस्तु लिपटी हुई थी।

उसने उसे बीरबल के सामने रखा।

वह एक पुरानी मुहर थी।

बीरबल ने मुहर देखते ही पहचान लिया कि यह किसी सामान्य व्यक्ति की नहीं थी।

उस पर शाही निशान जैसा प्रतीक बना था, लेकिन वह अकबर के राज्य का निशान नहीं था।

बीरबल ने पूछा, “यह किसका है?”

अजनबी ने काँपती आवाज में कहा, “उस व्यक्ति का... जो आपके दरबार में ही मौजूद है।”

बीरबल की आँखें गंभीर हो गईं।

कौन?”

अजनबी ने दरवाजे की ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में एक नाम लिया।

वह नाम सुनकर बीरबल कुछ क्षण के लिए बिल्कुल शांत हो गए।

क्योंकि वह नाम मीर कासिम का था।

बीरबल ने तुरंत दरवाजा खोला और दरबार की ओर देखा।

लेकिन मीर कासिम वहाँ मौजूद नहीं था।

वह अचानक गायब हो चुका था।

बीरबल ने सैनिकों से कहा, “महल के सभी द्वार बंद कर दो। कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं जाएगा।”

अकबर ने पूछा, “क्या हुआ?”

बीरबल ने गंभीर स्वर में कहा, “जहाँपनाह, अब यह केवल एक पहेली नहीं रही। हमारे बीच कोई ऐसा व्यक्ति है जो इस पूरे रहस्य को नियंत्रित कर रहा है।”

अकबर ने कहा, “कौन?”

बीरबल ने उत्तर दिया—

मीर कासिम।”

लेकिन उसी क्षण महल के बाहर से एक जोरदार आवाज आई।

किसी ने चिल्लाकर कहा, “बहुत देर हो चुकी है!”

सभी सैनिक बाहर की ओर दौड़े।

और जब बीरबल ने महल की खिड़की से बाहर देखा, तो उन्हें दूर शहर की ओर उठता हुआ काला धुआँ दिखाई दिया।

महल की ऊँची खिड़की से उठता हुआ काला धुआँ देखकर पूरे दरबार में अफरा-तफरी मच गई। कुछ सैनिक तुरंत बाहर की ओर दौड़े, जबकि बाकी सैनिकों ने महल के सभी रास्तों को घेर लिया। बादशाह अकबर स्वयं अपनी जगह से उठ खड़े हुए। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने बीरबल की ओर देखा और पूछा, “क्या यह वही संकट है जिसके बारे में वह अजनबी बता रहा था?”

बीरबल ने गंभीर स्वर में कहा, “जहाँपनाह, मुझे ऐसा ही लगता है। लेकिन हमें जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। अगर हमारे सामने कोई चाल चल रहा है, तो उसका उद्देश्य केवल आग लगाना नहीं हो सकता। संभव है कि यह आग हमें किसी दूसरी जगह से ध्यान हटाने के लिए लगाई गई हो।”

अकबर ने तुरंत सेनापति को आदेश दिया, “शहर में सैनिक भेजो। पता लगाओ कि आग कहाँ लगी है और उसे तुरंत बुझाने का प्रबंध करो। साथ ही, कोई भी संदिग्ध व्यक्ति शहर से बाहर न जाने पाए।”

सेनापति ने आदेश का पालन किया और सैनिकों का एक दल महल से निकल गया।

बीरबल ने उस अजनबी की ओर देखा, जो अभी भी दरबार के एक कोने में खड़ा था। उसके चेहरे पर भय था। बीरबल उसके पास गए और बोले, “तुमने कहा था कि तुम्हें डर है कि तुम्हारे पीछे आने वाले लोग तुम्हें मार देंगे। अब मुझे पूरी बात बताओ। मीर कासिम इस योजना में कब से शामिल है?”

अजनबी ने काँपते हुए कहा, “मैंने उसका नाम केवल इसलिए बताया क्योंकि अब मेरे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा। लेकिन मुझे नहीं पता कि वह अकेला है या उसके साथ और भी लोग हैं।”

अकबर ने पूछा, “तुम्हें यह सब कैसे पता?”

अजनबी ने कहा, “जहाँपनाह, मैं पड़ोसी राज्य का संदेशवाहक हूँ। हमारे राज्य के राजा को कुछ दिन पहले एक गुप्त पत्र मिला था। उसमें लिखा था कि आपके राज्य में कुछ लोग आपके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं। हमारे राजा ने मुझे वह पत्र लेकर आपके पास आने को कहा। लेकिन रास्ते में मेरे पीछे कुछ घुड़सवार लग गए। मुझे लगा कि वे मुझे पकड़ना चाहते हैं। मैंने रास्ता बदल लिया और कई दिनों तक जंगलों में छिपता रहा। अंत में मैं आपके महल पहुँचा।”

बीरबल ने पूछा, “फिर यह मुहर?”

अजनबी ने कहा, “यह मुहर मुझे उसी गुप्त पत्र के साथ मिली थी। हमारे राजा ने कहा था कि इसे देखकर शायद आप पहचान सकेंगे कि षड्यंत्र किसका है।”

अकबर ने मुहर को हाथ में लिया। उन्होंने ध्यान से देखा। “मैंने यह निशान पहले कभी नहीं देखा।”

बीरबल बोले, “यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।”

मीर कासिम का अचानक गायब होना, रहस्यमयी संदूक, पहेली, अजनबी का संदेश और अब शहर में आग—इन सभी घटनाओं के बीच कोई न कोई संबंध अवश्य था।

अकबर ने कहा, “बीरबल, मुझे लगता है कि मीर कासिम ने हमारे साथ विश्वासघात किया है।”

बीरबल ने सिर हिलाया। “संभव है, लेकिन अभी हमारे पास इतना प्रमाण नहीं है कि हम उसे दोषी घोषित कर दें।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “वह भाग गया है और उसके नाम की मुहर हमारे पास है। इससे अधिक प्रमाण क्या चाहिए?”

बीरबल बोले, “जहाँपनाह, एक बुद्धिमान व्यक्ति वह नहीं जो सबसे पहले निष्कर्ष निकाल ले। बुद्धिमान वह है जो निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले यह देखे कि सामने वाला उसे किस दिशा में ले जाना चाहता है।”

अकबर कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “तुम्हारा मतलब है कि मीर कासिम का गायब होना भी एक चाल हो सकती है?”

जी।”

और वह चाहता है कि हम उसी पर संदेह करें?”

संभव है।”

इसी बीच एक सैनिक तेजी से दरबार में आया। उसने झुककर कहा, “जहाँपनाह! शहर के पुराने अनाज बाजार में आग लगी है। कई दुकानें जल गई हैं, लेकिन सैनिकों ने आग को फैलने से रोक लिया है।”

अकबर ने पूछा, “क्या किसी को पकड़ा गया?”

सैनिक ने कहा, “नहीं, लेकिन वहाँ एक अजीब बात मिली है।”

क्या?”

आग जिस दुकान से शुरू हुई, उसके पास एक कागज मिला है।”

बीरबल ने तुरंत कहा, “कागज यहाँ लाओ।”

सैनिक ने कागज प्रस्तुत किया। उस पर केवल एक वाक्य लिखा था—

जिसे बाँटोगे, वह बढ़ेगा।”

अकबर ने कागज को देखा और बोले, “फिर वही बात!”

बीरबल ने कागज अपने हाथ में लिया। उन्होंने उसे सूँघा, फिर पलटकर देखा। कागज साधारण था, लेकिन उसके किनारे पर हल्का नीला रंग लगा था।

बीरबल ने पूछा, “यह कागज कहाँ मिला?”

एक दुकान के पीछे।”

और वहाँ कोई संदूक था?”

सैनिक ने आश्चर्य से कहा, “हाँ। एक छोटा लकड़ी का संदूक था, लेकिन वह खाली था।”

बीरबल की आँखों में चमक आ गई।

उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, हमें तुरंत उस स्थान पर जाना होगा।”

अकबर ने कहा, “मैं भी चलूँगा।”

कुछ ही देर में अकबर, बीरबल और कुछ सैनिक अनाज बाजार पहुँच गए। वहाँ अभी भी धुएँ की हल्की गंध थी। कई दुकानों के बाहर लोग जमा थे। व्यापारी परेशान थे और अपने सामान को सुरक्षित करने में लगे थे।

बीरबल उस दुकान के पीछे पहुँचे जहाँ से आग लगी थी। वहाँ सचमुच एक छोटा संदूक पड़ा था। संदूक का ढक्कन खुला हुआ था।

उन्होंने उसे ध्यान से देखा।

अंदर कुछ भी नहीं था।

अकबर ने पूछा, “क्या यह वही संदूक है?”

बीरबल ने कहा, “नहीं। लेकिन यह उसी तरह का संदूक है।”

उन्होंने लकड़ी के अंदरूनी हिस्से को छुआ। वहाँ एक छोटा-सा खांचा बना हुआ था।

बीरबल ने कहा, “इसमें कुछ रखा गया था।”

सैनिक ने पूछा, “क्या?”

कोई कागज या वस्तु।”

बीरबल ने खांचे को ध्यान से देखा। उसमें एक बहुत छोटा धागा फँसा हुआ था। धागा नीले रंग का था।

बीरबल ने उसे निकाला और मुस्कुराए।

अकबर ने पूछा, “इस छोटे से धागे में ऐसा क्या है?”

बीरबल बोले, “कभी-कभी छोटी चीज ही बड़ी सच्चाई छिपाती है।”

उन्होंने बाजार के लोगों को बुलाया और पूछा, “क्या किसी ने पिछले दो दिनों में किसी अजनबी व्यक्ति को इस दुकान के आसपास देखा?”

एक बूढ़े व्यापारी ने हाथ उठाया।

मैंने देखा था।”

बीरबल ने पूछा, “वह कैसा दिखता था?”

व्यापारी ने कहा, “मध्यम कद का था। सिर पर लाल पगड़ी थी और वह बार-बार इस दुकान के पास घूम रहा था।”

क्या वह अकेला था?”

पहली बार अकेला था। दूसरी बार उसके साथ एक और व्यक्ति था।”

दूसरे व्यक्ति का चेहरा?”

व्यापारी ने आँखें बंद करके याद करने की कोशिश की।

उसकी दाढ़ी थी... और वह लंगड़ा कर चल रहा था।”

बीरबल तुरंत सतर्क हो गए।

क्या तुम उसे पहचान सकते हो?”

व्यापारी ने कहा, “शायद।”

बीरबल ने सैनिकों से कहा, “शहर के सभी सराय और यात्रियों के ठिकानों की जाँच करो। विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति को खोजो जिसकी दाढ़ी हो और जो लंगड़ा कर चलता हो।”

अकबर ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है?”

बीरबल बोले, “मुझे लगता है कि यह आग केवल संदेश देने के लिए नहीं लगाई गई थी। यह किसी वस्तु को नष्ट करने के लिए लगाई गई थी।”

कौन-सी वस्तु?”

हमें अभी पता नहीं।”

वे दुकान के चारों ओर देखने लगे। तभी बीरबल की नजर एक बूढ़े मजदूर पर पड़ी जो बार-बार अपनी जेब छू रहा था।

बीरबल उसके पास गए।

तुम्हारी जेब में क्या है?”

मजदूर घबरा गया।

कुछ नहीं।”

बीरबल ने कहा, “कुछ नहीं है तो दिखाने में डर कैसा?”

मजदूर पीछे हटने लगा।

सैनिकों ने उसे रोक लिया।

उसकी जेब से एक छोटी धातु की प्लेट निकली।

अकबर ने पूछा, “यह क्या है?”

बीरबल ने प्लेट हाथ में ली। उस पर वही निशान बना था जो अजनबी की मुहर पर था।

अब मामला और गंभीर हो गया।

बीरबल ने मजदूर से पूछा, “यह तुम्हें कहाँ मिली?”

मजदूर ने कहा, “मुझे सड़क पर पड़ी मिली।”

झूठ।”

नहीं, हुजूर!”

बीरबल ने उसकी आँखों में देखा।

तुम्हें यह किसी ने दी है।”

मजदूर चुप हो गया।

कुछ देर बाद उसने स्वीकार किया, “हाँ। एक आदमी ने मुझे यह दी थी।”

कौन?”

मुझे उसका नाम नहीं पता।”

उसने तुम्हें क्या कहा?”

मजदूर ने काँपते हुए कहा, “उसने कहा कि इसे इस दुकान के पीछे वाले संदूक में रख देना। बदले में मुझे पैसे मिलेंगे।”

कितने?”

पाँच चाँदी के सिक्के।”

अकबर ने कहा, “और तुमने इसे संदूक में रख दिया?”

जी।”

बीरबल ने पूछा, “फिर संदूक खाली कैसे हुआ?”

मजदूर ने सिर झुका लिया।

मैं नहीं जानता।”

बीरबल कुछ क्षण सोचते रहे।

फिर उन्होंने पूछा, “तुम्हें पैसे किसने दिए?”

मजदूर ने जिस दिशा की ओर इशारा किया, वहाँ एक पुरानी सराय थी।

बीरबल ने सैनिकों को तुरंत वहाँ भेजा।

लेकिन सैनिकों के पहुँचने से पहले ही सराय के पीछे से एक घोड़ा तेज गति से निकल गया।

एक सैनिक चिल्लाया, “वह भाग रहा है!”

सैनिक घोड़े के पीछे दौड़े।

बीरबल ने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, यह व्यक्ति हमें उस व्यक्ति तक ले जा सकता है जो इस षड्यंत्र के पीछे है।”

कुछ ही देर में सैनिक वापस आए। वे एक आदमी को पकड़कर लाए थे। उसके सिर पर लाल पगड़ी थी।

बीरबल ने उसे देखा।

यही वह व्यक्ति है जिसे व्यापारी ने देखा था।”

उस व्यक्ति ने कुछ नहीं कहा।

अकबर ने पूछा, “तुम्हारा नाम?”

चुप्पी।

बीरबल उसके पास गए।

तुम्हें बोलने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी चुप्पी भी हमें बहुत कुछ बता रही है।”

उस आदमी ने पहली बार बीरबल की ओर देखा।

बीरबल ने कहा, “तुम्हें लगता है कि तुम्हें पकड़ लिया गया है, लेकिन वास्तव में तुमने हमें एक और सुराग दे दिया है।”

आदमी के चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

बीरबल ने उसके हाथों को देखा।

उसकी उँगलियों पर नीला रंग लगा था।

बीरबल ने तुरंत कहा, “यही रंग उस कागज के किनारे पर था।”

अकबर ने कहा, “तो यही आग लगाने वाला है?”

बीरबल ने कहा, “संभवतः।”

लेकिन तभी वह व्यक्ति हँस पड़ा।

आप लोग मुझे पकड़कर बहुत खुश हो रहे हैं,” उसने कहा, “लेकिन आप अभी भी असली आदमी तक नहीं पहुँचे।”

अकबर ने कठोर स्वर में पूछा, “असली आदमी कौन है?”

वह आदमी मुस्कुराया।

जिसे आप सबसे अधिक भरोसेमंद समझते हैं।”

दरबार में सन्नाटा छा गया।

अकबर ने बीरबल की ओर देखा।

बीरबल के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

उस व्यक्ति ने आगे कहा, “आप मीर कासिम को खोज रहे हैं। लेकिन मीर कासिम तो केवल एक मोहरा है।”

तो फिर असली षड्यंत्रकारी कौन है?” अकबर ने पूछा।

वह आदमी कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक उसने अपने मुँह में छिपी कोई वस्तु निगल ली।

बीरबल ने तुरंत सैनिकों को उसे पकड़ने का आदेश दिया, लेकिन देर हो चुकी थी।

वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

बीरबल ने उसकी तलाशी ली। उसके पास केवल एक छोटा कागज मिला।

कागज पर लिखा था—

जिसे तुम अपना समझते हो, वही तुम्हें धोखा देगा।”

अकबर ने कागज को देखा और गंभीर हो गए।

बीरबल, अब मुझे किसी पर विश्वास नहीं रहा।”

बीरबल ने धीरे से कहा, “जहाँपनाह, यही तो इस षड्यंत्र का उद्देश्य है।”

क्या?”

आपके आसपास अविश्वास पैदा करना।”

बीरबल ने कागज मोड़ा और कहा, “जो व्यक्ति चाहता है कि बादशाह अपने ही लोगों पर शक करने लगे, वह आधी लड़ाई बिना तलवार उठाए जीत जाता है।”

अकबर ने पूछा, “तो हमें क्या करना चाहिए?”

बीरबल मुस्कुराए।

अब हम उसके खेल को उसी के विरुद्ध इस्तेमाल करेंगे।”

कैसे?”

बीरबल ने कहा, “हम एक झूठी खबर फैलाएँगे।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “झूठी खबर?”

जी। ऐसी खबर जो केवल षड्यंत्रकारी तक पहुँचेगी। यदि वह उस खबर पर प्रतिक्रिया देता है, तो हमें पता चल जाएगा कि वह कौन है।”

अकबर कुछ क्षण सोचते रहे।

फिर उन्होंने कहा, “ठीक है। लेकिन खबर क्या होगी?”

बीरबल ने उत्तर दिया—

हम यह खबर फैलाएँगे कि रहस्यमयी संदूक खोलने की कुंजी मिल गई है।”

अकबर ने पूछा, “लेकिन हमारे पास तो कुंजी नहीं है।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “यही तो बात है, जहाँपनाह। यदि असली षड्यंत्रकारी को लगता है कि हमारे पास कुंजी है, तो वह उसे पाने के लिए अवश्य कोई कदम उठाएगा।”

लेकिन बीरबल को अभी यह पता नहीं था कि उनका यह जाल उसी रात एक ऐसे व्यक्ति को फँसाने वाला था जिसकी कल्पना स्वयं अकबर ने भी नहीं की थी।

बीरबल ने बादशाह अकबर के सामने अपनी योजना रख दी थी। योजना सरल दिखाई देती थी, लेकिन उसके पीछे बहुत गहरी चाल छिपी थी। बीरबल जानते थे कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में उस रहस्यमयी संदूक और संदेश के पीछे है, तो वह किसी भी कीमत पर उस संदूक की कथित कुंजी हासिल करना चाहेगा। इसलिए बीरबल ने निर्णय लिया कि वे ऐसी खबर फैलाएँगे जो केवल षड्यंत्रकारी को सुनाई जाएगी।

अकबर ने पूछा, “लेकिन यह खबर दरबार में फैलेगी तो हर कोई इसे सुन लेगा। फिर हम कैसे जानेंगे कि असली व्यक्ति कौन है?”

बीरबल मुस्कुराए। “जहाँपनाह, खबर सबको सुनाई जाएगी, लेकिन हर व्यक्ति को अलग-अलग बात बताई जाएगी।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “अलग-अलग?”

जी। मैं पाँच लोगों को पाँच अलग बातें बताऊँगा। यदि रात में किसी एक स्थान पर हमला होता है, तो हमें पता चल जाएगा कि खबर किस व्यक्ति के माध्यम से बाहर गई।”

अकबर ने कहा, “यह बहुत चतुर योजना है।”

बीरबल ने उत्तर दिया, “षड्यंत्रकारी को पकड़ने के लिए कभी-कभी तलवार से अधिक जरूरी है कि उसे यह विश्वास दिलाया जाए कि वह स्वयं बहुत चतुर है।”

अगली सुबह बीरबल ने दरबार के पाँच विश्वसनीय लोगों को अलग-अलग बुलाया। एक को बताया कि संदूक की चाबी राजकीय अस्तबल में छिपाई गई है। दूसरे को बताया कि चाबी पुस्तकालय में रखी गई है। तीसरे को बताया कि चाबी खजाने के तहखाने में है। चौथे को बताया कि चाबी पुराने मंदिर के पास है। पाँचवें को बताया कि चाबी बीरबल के घर में सुरक्षित है।

लेकिन वास्तविकता यह थी कि ऐसी कोई चाबी थी ही नहीं।

बीरबल ने इन पाँचों से कहा कि वे इस बात को किसी से न कहें। फिर वे शांत होकर अपने काम में लग गए।

अकबर ने पूछा, “अब?”

बीरबल बोले, “अब हम प्रतीक्षा करेंगे।”

दिन बीत गया। शाम हुई। महल में सामान्य गतिविधियाँ चलती रहीं। रात होते-होते पूरा महल शांत हो गया। लेकिन बीरबल ने अपने विश्वसनीय सैनिकों को गुप्त रूप से अलग-अलग स्थानों पर तैनात कर दिया।

आधी रात के करीब अचानक महल के अस्तबल की ओर से घोड़े के हिनहिनाने की आवाज आई।

एक सैनिक ने तुरंत संकेत दिया।

बीरबल पहले से तैयार थे।

उन्होंने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, जाल में पहला कदम पड़ चुका है।”

दोनों गुप्त मार्ग से अस्तबल की ओर बढ़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति अंधेरे में कुछ खोज रहा था। उसके हाथ में छोटा दीपक था।

सैनिकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

रुक जाओ!”

व्यक्ति ने भागने की कोशिश की, लेकिन सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

उसके चेहरे पर कपड़ा बँधा हुआ था।

बीरबल ने कहा, “चेहरा दिखाओ।”

व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया।

सैनिक ने उसका चेहरा ढका कपड़ा हटा दिया।

अकबर और बीरबल दोनों कुछ क्षण चुप रह गए।

वह व्यक्ति दरबार का एक छोटा अधिकारी था, जो वर्षों से महल में सेवा कर रहा था।

अकबर ने कठोर स्वर में पूछा, “तुम यहाँ क्या कर रहे थे?”

वह काँपते हुए बोला, “मैं... मैं बस घोड़ों को देखने आया था।”

बीरबल ने अस्तबल के फर्श की ओर देखा। वहाँ मिट्टी में उसके पैरों के निशान थे, और उसके हाथ में एक छोटी लोहे की छड़ थी।

बीरबल ने कहा, “घोड़ों को देखने के लिए लोहे की छड़ की आवश्यकता नहीं होती।”

अधिकारी चुप रहा।

अकबर ने पूछा, “तुम्हें किसने भेजा?”

किसी ने नहीं।”

बीरबल ने कहा, “अच्छा। तो फिर तुम स्वयं ही उस झूठी खबर के पीछे गए जो केवल पाँच लोगों को बताई गई थी।”

अधिकारी का चेहरा पीला पड़ गया।

अकबर ने तुरंत पूछा, “तुम्हें कैसे पता कि चाबी अस्तबल में है?”

अधिकारी के पास कोई उत्तर नहीं था।

बीरबल ने कहा, “अब हमें केवल यह पता लगाना है कि तुम्हें यह खबर किसने दी।”

अधिकारी चुप रहा।

बीरबल ने उसे गिरफ्तार करने का आदेश दिया और कहा, “इसे अभी किसी से मिलने मत देना।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “क्या यही हमारा मुख्य षड्यंत्रकारी है?”

बीरबल ने सिर हिलाया। “नहीं, जहाँपनाह। यह केवल एक कड़ी है।”

तुम्हें कैसे पता?”

क्योंकि जो व्यक्ति इतना बड़ा षड्यंत्र रच सकता है, वह स्वयं आधी रात को अस्तबल में चाबी खोजने नहीं आएगा। वह किसी और को भेजेगा।”

अकबर ने कहा, “तो अब?”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “अब हम उस व्यक्ति की प्रतीक्षा करेंगे जो इस आदमी को छुड़ाने आएगा।”

उन्होंने सैनिकों को अधिकारी को एक सुरक्षित कमरे में रखने का आदेश दिया।

रात और गहरी होती गई।

महल में सब कुछ शांत था।

लेकिन बीरबल जानते थे कि यह शांति केवल ऊपर से है। कहीं न कहीं षड्यंत्र की अगली चाल चल रही थी।

लगभग एक घंटे बाद एक सैनिक दौड़ता हुआ आया।

बीरबल जी! कैदखाने के पास किसी के कदमों की आवाज सुनी गई है।”

बीरबल तुरंत वहाँ पहुँचे।

कैदखाने की दीवार के पास एक व्यक्ति छिपा हुआ था। उसने बीरबल को देखते ही भागने की कोशिश की।

सैनिकों ने उसका पीछा किया।

कुछ ही क्षण बाद उसे पकड़ लिया गया।

उसका चेहरा देखते ही बीरबल की आँखें सिकुड़ गईं।

वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि वही अजनबी संदेशवाहक था जो कुछ घंटे पहले तक दरबार में मौजूद था।

अकबर ने कहा, “तुम!”

अजनबी ने सिर झुका लिया।

बीरबल ने पूछा, “तुम कैदखाने के पास क्यों आए?”

अजनबी ने कहा, “मैं केवल यह देखने आया था कि पकड़े गए व्यक्ति को कोई नुकसान तो नहीं हुआ।”

बीरबल ने कहा, “यह उत्तर तुम्हें और अधिक संदिग्ध बना देता है।”

अजनबी चुप रहा।

अकबर ने कठोर स्वर में कहा, “सच बोलो!”

अजनबी ने गहरी साँस ली।

जहाँपनाह, मैं सच बोलूँगा। लेकिन पहले मेरी बात पूरी सुननी होगी।”

अकबर ने उसे बोलने की अनुमति दी।

अजनबी ने कहा, “मैं वास्तव में दूसरे राज्य का संदेशवाहक हूँ, लेकिन मुझे यहाँ भेजने वाले राजा ने पूरी सच्चाई नहीं बताई थी। हमारे राज्य में कुछ लोग चाहते हैं कि आपके और हमारे राज्य के बीच युद्ध हो। उन्हें लगता है कि यदि दोनों राज्यों में संघर्ष होगा तो वे व्यापार और सत्ता पर कब्जा कर सकेंगे।”

बीरबल ने पूछा, “और मीर कासिम?”

अजनबी ने कहा, “वह उन लोगों के संपर्क में था।”

अकबर ने पूछा, “क्या वह उनके लिए काम करता था?”

हाँ।”

तो तुम भी?”

अजनबी ने सिर झुका लिया।

कुछ हद तक।”

दरबार में मौजूद सैनिकों ने तलवारों पर हाथ रख लिया।

लेकिन बीरबल ने उन्हें रोक दिया।

उन्होंने पूछा, “तुमने यह सब हमें क्यों बताया?”

अजनबी बोला, “क्योंकि मैं समझ गया कि जिन लोगों के लिए मैं काम कर रहा था, वे केवल आपके राज्य को नहीं, मेरे राज्य को भी बर्बाद करना चाहते हैं। वे युद्ध चाहते हैं। और युद्ध में आम लोग मरते हैं।”

बीरबल कुछ क्षण उसे देखते रहे।

तो तुमने अपना पक्ष बदल लिया?”

हाँ।”

अकबर ने कहा, “तुम्हारी बात पर विश्वास क्यों किया जाए?”

अजनबी ने अपनी कमर से एक और पत्र निकाला।

क्योंकि इसमें उनके अगले कदम की जानकारी है।”

बीरबल ने पत्र लिया।

उसमें लिखा था—

कल सूर्योदय से पहले राजकीय खजाने से वह वस्तु निकाल ली जाएगी जिसे बादशाह सबसे अधिक सुरक्षित समझते हैं।”

अकबर ने पूछा, “राजकीय खजाने में क्या है?”

बीरबल ने कहा, “बहुत कुछ। लेकिन यदि वे किसी खास वस्तु को निकालना चाहते हैं, तो संभवतः वह सोना नहीं है।”

अकबर ने पूछा, “फिर क्या?”

बीरबल ने कहा, “शायद कोई दस्तावेज।”

अकबर ने तुरंत खजाने की सुरक्षा बढ़ाने का आदेश दिया।

लेकिन बीरबल वहीं नहीं रुके।

उन्होंने अजनबी से पूछा, “क्या तुम जानते हो कि वह दस्तावेज कौन-सा है?”

अजनबी ने कहा, “हाँ।”

कौन-सा?”

आपके राज्य और पड़ोसी राज्यों के बीच हुए पुराने समझौतों का मूल दस्तावेज।”

अकबर ने कहा, “उस दस्तावेज का क्या महत्व है?”

बीरबल बोले, “यदि वह दस्तावेज गायब हो जाए, तो कोई व्यक्ति पुराने समझौतों पर सवाल खड़ा कर सकता है। फिर झूठे दावे किए जा सकते हैं कि अमुक जमीन किस राज्य की है, किसे कर देना है और किसका अधिकार है।”

अकबर ने गंभीरता से कहा, “तो उनका उद्देश्य युद्ध पैदा करना है।”

जी।”

अचानक बाहर से घोड़ों की तेज आवाज सुनाई दी।

सैनिकों ने बताया कि महल के पिछले हिस्से से कुछ लोग भागने की कोशिश कर रहे हैं।

अकबर ने बीरबल की ओर देखा।

बीरबल बोले, “वे जानते हैं कि उनका रहस्य खुल गया है।”

सैनिकों का एक दल तुरंत पीछे की ओर दौड़ा।

कुछ देर बाद खबर आई कि तीन लोगों को पकड़ लिया गया है, लेकिन एक व्यक्ति भाग निकला।

कौन?” अकबर ने पूछा।

सैनिक ने कहा, “उसका चेहरा साफ नहीं दिखा, लेकिन वह लंबा था और दाईं टाँग से थोड़ा लंगड़ा रहा था।”

बीरबल चौंक गए।

वही व्यक्ति!”

अकबर ने पूछा, “कौन?”

जिसे बूढ़े व्यापारी ने देखा था।”

बीरबल ने सैनिकों से कहा, “वह शहर से बाहर जाने की कोशिश करेगा। सभी द्वार बंद कर दो।”

लेकिन कुछ ही क्षण बाद एक और सैनिक दौड़ता हुआ आया।

जहाँपनाह! उत्तरी द्वार से एक संदेश मिला है।”

बीरबल ने संदेश लिया।

उसमें केवल एक पंक्ति थी—

जिसे तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे पास नहीं, तुम्हारे पीछे है।”

बीरबल कुछ क्षण उस पंक्ति को देखते रहे।

फिर अचानक उनकी आँखों में चमक आ गई।

उन्होंने कहा, “अब मुझे समझ आया।”

अकबर ने पूछा, “क्या?”

बीरबल बोले, “हम अब तक सोच रहे थे कि षड्यंत्रकारी महल के बाहर से लोगों को नियंत्रित कर रहा है। लेकिन संदेश कह रहा है—‘तुम्हारे पीछे है।’ इसका अर्थ है कि हमें अपने आसपास नहीं, अपने पीछे की घटनाओं को देखना होगा।”

उन्होंने तुरंत पिछले तीन दिनों की घटनाओं को क्रम से याद करना शुरू किया—रहस्यमयी पत्र, संदूक, आग, नकली मुहर, मीर कासिम का गायब होना, अजनबी का आगमन, झूठी कुंजी की खबर और अब यह संदेश।

फिर बीरबल अचानक बोले—

जहाँपनाह, हमें पुराने पुस्तकालय में वापस जाना होगा।”

अकबर ने पूछा, “क्यों?”

क्योंकि असली संदूक वहीं मिला था। और अगर मेरी सोच सही है, तो संदूक खाली नहीं था। उसमें कुछ ऐसा था जिसे किसी ने निकाल लिया है।”

वे तुरंत पुराने पुस्तकालय की ओर बढ़े।

रात के अंधेरे में पुस्तकालय की विशाल दीवारें और भी रहस्यमयी लग रही थीं। बीरबल उस स्थान पर पहुँचे जहाँ संदूक मिला था।

उन्होंने जमीन पर दीपक रखा।

फिर दीवार को ध्यान से देखने लगे।

कुछ क्षण बाद उन्होंने एक छोटी दरार पर हाथ रखा।

लकड़ी की पट्टी थोड़ी हिली।

बीरबल मुस्कुराए।

जहाँपनाह, यहाँ एक गुप्त दरवाजा है।”

सैनिकों ने पट्टी हटाई।

दीवार के पीछे एक संकरा रास्ता दिखाई दिया।

अकबर ने पूछा, “यह रास्ता कहाँ जाता है?”

बीरबल ने कहा, “यह पता लगाने के लिए हमें अंदर जाना होगा।”

वे मशाल लेकर उस गुप्त मार्ग में प्रवेश कर गए।

रास्ता बहुत पुराना था। दीवारों पर धूल और मकड़ी के जाले लगे थे। कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक छोटा कमरा मिला।

कमरे के बीचों-बीच एक मेज थी।

मेज पर एक दीपक जल रहा था।

इसका अर्थ था कि कोई व्यक्ति अभी-अभी यहाँ से गया था।

बीरबल ने मेज पर रखा एक कागज उठाया।

उस पर केवल तीन शब्द लिखे थे—

बीरबल, तुम देर से आए।”

अकबर ने चारों ओर देखा।

अचानक पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

सैनिकों ने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा बाहर से बंद था।

और अंधेरे में किसी की आवाज गूँजी—

अब देखता हूँ कि आपकी बुद्धि आपको यहाँ से कैसे बचाती है।”

बीरबल शांत खड़े रहे।

फिर उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

तुमने एक गलती की है।”

आवाज आई, “कौन-सी?”

बीरबल बोले—

तुमने मुझे बंद तो कर दिया, लेकिन मेरी सोच को नहीं।”

गुप्त कमरे का दरवाजा बाहर से बंद हो चुका था। चारों ओर अंधेरा था और केवल मेज पर रखा छोटा-सा दीपक ही कमरे को हल्की रोशनी दे रहा था। बादशाह अकबर के साथ आए सैनिक दरवाजे को खोलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन दरवाजा इतना मजबूत था कि उनकी पूरी ताकत लगाने के बाद भी उसमें कोई हलचल नहीं हुई। बाहर से वही रहस्यमयी आवाज फिर सुनाई दी, “बीरबल, अब तुम्हारी बुद्धि कहाँ गई? तुम दूसरों की चाल समझते हो, लेकिन आज खुद मेरी चाल में फँस गए हो।”

अकबर ने तलवार की मूठ पर हाथ रखा और गुस्से में बोले, “कायर! सामने आकर बात करो।”

बाहर से हँसी की आवाज आई। “जहाँपनाह, आज तलवार आपकी मदद नहीं करेगी।”

बीरबल शांत खड़े रहे। उन्होंने कमरे को ध्यान से देखना शुरू किया। उनके चेहरे पर घबराहट का कोई निशान नहीं था। अकबर ने पूछा, “बीरबल, क्या तुम्हें कोई रास्ता दिखाई दे रहा है?”

बीरबल ने कहा, “रास्ता हमेशा दिखाई नहीं देता, जहाँपनाह। कभी-कभी उसे समझना पड़ता है।”

उन्होंने कमरे की दीवारों को छूना शुरू किया। एक-एक पत्थर को दबाकर देखने लगे। सैनिक आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे। कुछ देर बाद बीरबल मेज के पास गए और उस पर रखा दीपक उठाया।

अकबर ने पूछा, “दीपक में ऐसा क्या है?”

बीरबल बोले, “दीपक में कुछ नहीं, लेकिन जिस जगह यह रखा है, वहाँ बहुत कुछ है।”

उन्होंने दीपक हटाया।

नीचे पत्थर पर एक छोटा-सा गोल निशान बना था।

बीरबल ने उस निशान को दबाया।

कुछ नहीं हुआ।

उन्होंने फिर दबाया।

इस बार दीवार के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

एक सैनिक ने उत्साहित होकर कहा, “जहाँपनाह! शायद कोई गुप्त रास्ता है।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, लेकिन इसे खोलने के लिए केवल ताकत नहीं, सही क्रम चाहिए।”

उन्होंने कमरे में रखी तीन वस्तुओं को देखा—दीपक, लकड़ी की मेज और एक लोहे का छोटा डिब्बा।

उन्होंने लोहे के डिब्बे को उठाया। वह खाली था।

बीरबल बोले, “यहाँ कोई व्यक्ति हमें रास्ता दिखाना चाहता है, लेकिन साथ ही हमें भ्रमित भी कर रहा है।”

अकबर ने पूछा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

क्योंकि अगर वह हमें मारना चाहता, तो कमरे में दीपक जलाकर नहीं जाता। वह चाहता है कि हम कुछ खोजें।”

क्या?”

बीरबल ने मेज के नीचे हाथ डाला। उनकी उँगलियों को कुछ कागज जैसा महसूस हुआ। उन्होंने उसे बाहर निकाला।

वह एक पुराना नक्शा था।

अकबर ने मशाल की रोशनी में उसे देखा। नक्शे पर महल का एक हिस्सा बना हुआ था, लेकिन उसमें कुछ ऐसे रास्ते भी थे जो वर्तमान महल के नक्शे में नहीं थे।

बीरबल ने कहा, “यह महल के पुराने गुप्त मार्गों का नक्शा है।”

अकबर चौंक गए। “लेकिन यह नक्शा तो मेरे राजकीय अभिलेखों में भी नहीं है।”

बीरबल बोले, “यही तो सबसे बड़ा रहस्य है।”

उन्होंने नक्शे को फैलाया। उसमें एक रास्ता पुराने पुस्तकालय से शुरू होकर महल के पीछे की पहाड़ी तक जाता था। रास्ते में कई छोटे कमरे बने थे। उनमें से एक कमरे पर लाल निशान था।

बीरबल ने कहा, “हमें यहाँ जाना होगा।”

सैनिकों ने दरवाजा तोड़ने की कोशिश की, लेकिन बीरबल ने उन्हें रोक दिया।

उन्होंने दीवार के एक हिस्से पर तीन बार दस्तक दी।

पहली दस्तक पर कुछ नहीं हुआ।

दूसरी पर भी नहीं।

तीसरी दस्तक के बाद दीवार के अंदर से हल्की आवाज आई।

बीरबल ने कहा, “यही है।”

उन्होंने नक्शे पर बने निशान के अनुसार पत्थर के तीन हिस्सों को क्रम से दबाया।

अचानक दीवार का एक हिस्सा अंदर की ओर खिसक गया।

गुप्त रास्ता खुल गया।

अकबर ने कहा, “बीरबल, तुमने यह कैसे समझा?”

बीरबल बोले, “नक्शे में रास्ते के पास तीन छोटे निशान बने थे। मुझे लगा कि वे केवल सजावट नहीं हो सकते।”

सभी लोग उस रास्ते में प्रवेश कर गए।

सुरंग बहुत संकरी थी। कई जगह उन्हें झुककर चलना पड़ा। दीवारों पर पुराने शिलालेख बने थे। कुछ जगहों पर ऐसा लगता था जैसे वर्षों से किसी ने इस रास्ते का उपयोग नहीं किया हो, लेकिन कुछ जगहों पर धूल हटाई हुई थी।

बीरबल ने कहा, “कोई इस रास्ते का उपयोग हाल में कर रहा है।”

अकबर ने पूछा, “क्या वह मीर कासिम हो सकता है?”

संभव है।”

कुछ दूर जाने के बाद उन्हें पैरों के ताजा निशान दिखाई दिए।

सैनिकों ने कहा, “यहाँ से कोई अभी गया है।”

बीरबल ने जमीन पर झुककर निशान देखे।

दो लोग।”

अकबर ने पूछा, “दो?”

हाँ। एक व्यक्ति भारी कदमों से चला है और दूसरा हल्के कदमों से।”

तुम्हें यह कैसे पता?”

बीरबल ने कहा, “मिट्टी पर दबाव अलग है।”

वे आगे बढ़े।

कुछ देर बाद सुरंग दो रास्तों में बँट गई।

बीरबल रुक गए।

अकबर ने पूछा, “अब कौन-सा रास्ता?”

बीरबल ने दोनों रास्तों को देखा।

एक रास्ते से हल्की हवा आ रही थी।

दूसरा पूरी तरह बंद लग रहा था।

सैनिकों ने कहा, “हवा वाले रास्ते से जाना चाहिए।”

बीरबल मुस्कुराए।

यही वह गलती है जो कोई सामान्य व्यक्ति करेगा।”

अकबर ने पूछा, “क्यों?”

क्योंकि अगर कोई व्यक्ति हमें गुमराह करना चाहता है, तो वह जानता होगा कि हम हवा की दिशा देखकर बाहर निकलने का रास्ता चुनेंगे।”

उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

कुछ सैनिकों को यह अजीब लगा, लेकिन वे बीरबल के पीछे चल पड़े।

लगभग सौ कदम आगे जाने के बाद सुरंग एक छोटे कमरे में खुली।

कमरे में एक व्यक्ति बैठा था।

उसके हाथ बंधे हुए थे।

अकबर ने मशाल उठाकर चेहरा देखा।

वह मीर कासिम था।

अकबर ने कठोर स्वर में कहा, “मीर कासिम!”

मीर कासिम ने सिर उठाया। उसके चेहरे पर थकान थी।

जहाँपनाह...”

अकबर आगे बढ़े। “तुम्हें यहाँ किसने बाँधा?”

मीर कासिम ने कहा, “मैं स्वयं भी यही जानना चाहता हूँ।”

बीरबल ने उसके बंधे हाथ देखे। रस्सी बहुत कसकर बाँधी गई थी।

उन्होंने पूछा, “तुम यहाँ कब से हो?”

शायद कई घंटे।”

तुम्हें किसने पकड़ा?”

एक आदमी ने।”

कैसा दिखता था?”

मीर कासिम ने कहा, “लंबा था। दाढ़ी थी। दाईं टाँग से लंगड़ा रहा था।”

बीरबल ने तुरंत अजनबी की ओर देखा।

वह चुप था।

बीरबल ने पूछा, “क्या तुम उसे पहचानते हो?”

मीर कासिम ने सिर हिलाया।

नहीं।”

बीरबल ने मीर कासिम की रस्सी काट दी।

अकबर ने कहा, “बीरबल, क्या तुमने उसे मुक्त कर दिया? यही तो षड्यंत्रकारी हो सकता है!”

बीरबल ने उत्तर दिया, “हो सकता है। लेकिन अभी हमें उसके शब्दों की नहीं, उसके व्यवहार की जाँच करनी होगी।”

मीर कासिम खड़ा हुआ। वह कमजोर लग रहा था।

बीरबल ने पूछा, “तुमने हमारे विरुद्ध षड्यंत्र क्यों किया?”

मीर कासिम ने हैरानी से कहा, “मैंने नहीं किया।”

लेकिन तुम्हारे नाम की मुहर मिली।”

वह मुहर मेरी है।”

अकबर ने कहा, “तो फिर तुमने यह स्वीकार कर लिया कि तुम उस रहस्य में शामिल हो?”

मीर कासिम ने गहरी साँस ली।

जहाँपनाह, मैं सच बताऊँगा। मैंने गलती की है। लेकिन मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ।”

बीरबल चुपचाप उसे देखते रहे।

मीर कासिम ने आगे कहा, “कुछ सप्ताह पहले मेरे पास एक व्यक्ति आया था। उसने कहा कि वह पड़ोसी राज्य का व्यापारी है। उसने मुझे धन देने का प्रस्ताव दिया। बदले में उसे केवल कुछ पुराने राजकीय दस्तावेजों की जानकारी चाहिए थी। मैंने उसे कुछ छोटी बातें बता दीं। मुझे लगा कि इससे कोई नुकसान नहीं होगा।”

अकबर ने गुस्से से कहा, “तुमने राज्य की जानकारी किसी अजनबी को दी?”

मीर कासिम ने सिर झुका लिया।

हाँ। यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी।”

बीरबल ने पूछा, “और फिर?”

कुछ दिनों बाद वही लोग मुझे धमकाने लगे। उन्होंने कहा कि यदि मैंने उनकी बात नहीं मानी तो वे मेरे परिवार को नुकसान पहुँचाएँगे। मैंने डरकर उनकी कुछ मदद की।”

अकबर ने कहा, “तो तुम अपराधी हो।”

मीर कासिम ने सिर झुका लिया।

हाँ, जहाँपनाह।”

बीरबल ने पूछा, “लेकिन तुमने आज हमें क्यों नहीं धोखा दिया?”

मीर कासिम ने कहा, “क्योंकि मुझे समझ आ गया कि वे लोग मेरे साथ भी विश्वासघात करेंगे। उन्होंने मुझे इस सुरंग में बुलाया और फिर बाँधकर छोड़ दिया।”

बीरबल ने कमरे की दीवारों को देखा।

तुम्हें यहाँ क्यों लाया गया?”

मुझे नहीं पता।”

क्या तुमने कोई दस्तावेज देखा?”

मीर कासिम कुछ क्षण चुप रहा।

फिर बोला, “हाँ।”

कौन-सा?”

पुराना राजकीय समझौता।”

अकबर ने पूछा, “वह कहाँ है?”

मीर कासिम ने कमरे के एक कोने की ओर इशारा किया।

वहाँ पत्थर के पीछे एक छोटा गुप्त खांचा था।

सैनिकों ने पत्थर हटाया।

अंदर एक कपड़े में लिपटा हुआ दस्तावेज रखा था।

अकबर ने उसे बाहर निकाला।

उन्होंने राहत की साँस ली।

तो यही वह दस्तावेज है जिसे वे चुराना चाहते थे।”

बीरबल ने दस्तावेज को देखा, लेकिन तुरंत कहा, “जहाँपनाह, इसे खोलिए मत।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों?”

क्योंकि यह दस्तावेज असली हो भी सकता है और नकली भी।”

उन्होंने कपड़े की सिलाई देखी। उस पर वही नीला धागा लगा था जो उन्हें अनाज बाजार वाले संदूक में मिला था।

बीरबल ने कहा, “यहाँ कोई हमें बार-बार वही निशान दिखा रहा है।”

अकबर ने पूछा, “तो असली दस्तावेज कहाँ है?”

बीरबल कुछ क्षण चुप रहे।

फिर उन्होंने मीर कासिम से पूछा, “तुमने जो दस्तावेज देखा था, वह यहीं रखा था?”

हाँ।”

और जब तुम आए, तब क्या यह पहले से यहाँ था?”

मीर कासिम ने कहा, “हाँ।”

बीरबल ने कहा, “तो फिर जिसने तुम्हें यहाँ बाँधा, उसने दस्तावेज यहीं क्यों छोड़ा?”

मीर कासिम के चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

बीरबल बोले, “क्योंकि यह असली दस्तावेज नहीं है।”

अकबर ने कपड़ा खोला।

अंदर दस्तावेज था।

बीरबल ने उसकी पहली पंक्ति पढ़ी और तुरंत मुस्कुराए।

जहाँपनाह, यह नकली है।”

अकबर ने पूछा, “तुम्हें कैसे पता?”

क्योंकि पुराने राजकीय दस्तावेजों पर शाही मुहर का रंग गहरा लाल होता था। इस पर हल्की नीली स्याही है। और सबसे महत्वपूर्ण बात—इसमें एक शब्द ऐसा लिखा है जो उस समय राजकीय भाषा में इस्तेमाल ही नहीं होता था।”

अकबर ने दस्तावेज को ध्यान से देखा।

बीरबल सही कह रहे थे।

अचानक कमरे के बाहर कदमों की आवाज सुनाई दी।

सभी सैनिक सतर्क हो गए।

किसी ने सुरंग के दूसरे छोर से मशाल बुझा दी।

अंधेरा छा गया।

फिर वही आवाज आई—

बीरबल, तुम बहुत करीब पहुँच गए हो।”

बीरबल शांत रहे।

आवाज फिर आई—

लेकिन अब तुम्हें असली सवाल का जवाब देना होगा।”

अकबर ने तलवार निकाल ली।

कौन हो तुम?”

आवाज आई—

जिसे तुम खोज रहे हो, वह मीर कासिम नहीं है। वह तुम्हारे सामने खड़ा भी नहीं है।”

बीरबल ने धीरे से कहा, “मुझे पता है।”

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर आवाज आई—

तो बताओ, असली व्यक्ति कौन है?”

बीरबल ने अपने साथ खड़े सभी लोगों की ओर देखा।

अजनबी।

मीर कासिम।

सैनिक।

और स्वयं बादशाह अकबर।

फिर उनकी नजर अचानक अजनबी पर टिक गई।

बीरबल ने कहा—

असली खेल तुम्हारे राज्य से नहीं, तुम्हारी कहानी से शुरू हुआ था।”

अजनबी का चेहरा सफेद पड़ गया।

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “बीरबल, तुम क्या कहना चाहते हो?”

बीरबल ने उत्तर दिया—

जहाँपनाह, यह व्यक्ति जितना हमें सच बताता आया है, उससे कहीं अधिक बातें उसने हमसे छिपाई हैं।”

अजनबी पीछे हटने लगा।

लेकिन उसी क्षण सुरंग के अंधेरे में किसी ने एक मशाल जला दी।

और रोशनी पड़ते ही दीवार पर एक ऐसा चित्र दिखाई दिया जिसे देखकर अकबर भी स्तब्ध रह गए।

वह चित्र वर्षों पुराना था।

उसमें युवा अकबर के साथ एक व्यक्ति खड़ा था।

और उस व्यक्ति का चेहरा...

अजनबी से बिल्कुल मिलता था।

गुप्त सुरंग की दीवार पर बनी पुरानी तस्वीर को देखते ही पूरा कमरा जैसे पत्थर का हो गया। किसी की आवाज नहीं निकल रही थी। मशाल की काँपती हुई रोशनी में वह चित्र साफ दिखाई दे रहा था। उसमें युवा बादशाह अकबर एक पुराने महल के सामने खड़े थे और उनके साथ एक व्यक्ति था। उस व्यक्ति के चेहरे की बनावट, आँखें और माथे की रेखाएँ उस अजनबी से इतनी मिलती थीं कि पहली नजर में दोनों को अलग करना मुश्किल था।

अकबर कुछ कदम आगे बढ़े। उन्होंने तस्वीर को ध्यान से देखा और फिर अजनबी की ओर मुड़े।

यह तस्वीर कितने वर्षों पुरानी है?”

अजनबी चुप रहा।

अकबर ने फिर पूछा, “मैंने तुम्हें प्रश्न किया है।”

अजनबी ने धीरे से कहा, “लगभग पच्चीस वर्ष।”

अकबर के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया। “तब तो तुम...”

बीरबल ने तुरंत कहा, “जहाँपनाह, पहले निष्कर्ष पर मत पहुँचिए।”

अकबर ने बीरबल की ओर देखा।

बीरबल बोले, “तस्वीर में जो व्यक्ति है, वह यह व्यक्ति हो भी सकता है और नहीं भी। हमें यह पता लगाना होगा कि तस्वीर में कौन है और इसका इस पूरे रहस्य से क्या संबंध है।”

अजनबी अब भी चुप था।

बीरबल उसके पास गए और बोले, “तुम्हें इस तस्वीर के बारे में पहले से पता था।”

अजनबी ने सिर उठाकर देखा।

हाँ।”

फिर तुमने हमें क्यों नहीं बताया?”

उसने उत्तर नहीं दिया।

बीरबल ने कहा, “क्योंकि यदि तुमने पहले ही बता दिया होता तो तुम्हारी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी टूट जाती।”

अकबर ने पूछा, “बीरबल, क्या तुम्हें लगता है कि यह व्यक्ति हमसे झूठ बोलता रहा है?”

जी, जहाँपनाह।”

अजनबी ने तुरंत कहा, “मैंने झूठ नहीं बोला।”

बीरबल ने उसकी ओर देखकर कहा, “तुमने पूरा सच नहीं बताया। कभी-कभी आधा सच भी झूठ से अधिक खतरनाक होता है।”

अजनबी ने गहरी साँस ली।

ठीक है। मैं सब बताऊँगा।”

सभी लोग उसकी ओर देखने लगे।

अजनबी ने कहा, “मेरा नाम रहमान है। मैं उस पड़ोसी राज्य का सामान्य संदेशवाहक नहीं हूँ जैसा मैंने कहा था। मैं वहाँ के पुराने राजपरिवार से जुड़ा हुआ हूँ।”

अकबर ने पूछा, “पुराने राजपरिवार से?”

जी।”

और इस तस्वीर में जो व्यक्ति है?”

रहमान ने धीरे से कहा, “वह मेरे पिता हैं।”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

अकबर ने तस्वीर को देखा।

तुम्हारे पिता मेरे साथ कैसे?”

रहमान बोला, “बहुत वर्षों पहले मेरे पिता आपके मित्रों में से एक थे। उस समय दो राज्यों के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। लेकिन मेरे पिता ने कई बार शांति स्थापित करने में आपकी सहायता की थी।”

बीरबल ने पूछा, “फिर क्या हुआ?”

रहमान की आवाज भारी हो गई।

एक दिन मेरे पिता पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया। कहा गया कि उन्होंने राज्य के गुप्त दस्तावेज दुश्मनों को बेच दिए हैं। उन्हें दरबार से निकाल दिया गया। हमारे परिवार को अपमानित होना पड़ा।”

अकबर ने गंभीर स्वर में पूछा, “किसने आरोप लगाया था?”

रहमान ने कहा, “एक मंत्री ने।”

कौन?”

रहमान ने जवाब दिया—

उस समय के प्रधानमंत्री।”

अकबर कुछ क्षण चुप रहे। उन्हें पुरानी घटनाओं की धुंधली यादें आने लगीं।

बीरबल ने पूछा, “क्या तुम्हारे पिता सच में दोषी थे?”

रहमान की आँखों में आँसू आ गए।

नहीं।”

तुम्हारे पास इसका प्रमाण है?”

हाँ।”

उसने अपनी पोशाक के अंदर से एक पुराना पत्र निकाला।

पत्र बहुत जीर्ण था।

उस पर शाही मुहर लगी थी।

बीरबल ने उसे लिया और ध्यान से पढ़ा।

फिर उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, यह पत्र महत्वपूर्ण है।”

अकबर ने पूछा, “इसमें क्या लिखा है?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “इसमें लिखा है कि आपके पुराने प्रधानमंत्री ने गुप्त रूप से दूसरे राज्य के कुछ लोगों से संपर्क किया था। आपके पिता समान पुराने मित्र पर लगाया गया आरोप झूठा था।”

अकबर ने पत्र पढ़ा।

उनकी आँखों में क्रोध आ गया।

तो मेरे अपने दरबार में किसी ने इतने वर्षों पहले विश्वासघात किया था?”

रहमान ने कहा, “जी।”

बीरबल ने पूछा, “लेकिन इसका आज के षड्यंत्र से क्या संबंध है?”

रहमान ने उत्तर दिया, “उसी पुराने षड्यंत्र के कुछ लोग आज भी सक्रिय हैं।”

अकबर ने कहा, “कौन लोग?”

रहमान बोला, “मुझे पूरी सूची नहीं पता। लेकिन एक नाम मैं जानता हूँ।”

बीरबल ने कहा, “मीर कासिम?”

रहमान ने सिर हिलाया।

नहीं।”

तो कौन?”

रहमान ने बहुत धीरे से कहा—

दरबार का राजकीय अभिलेखपाल।”

अकबर चौंक गए।

अभिलेखपाल?”

जी। वही व्यक्ति जिसके पास पुराने दस्तावेजों और शाही समझौतों तक पहुँच है।”

बीरबल कुछ क्षण सोचते रहे।

अब तक की घटनाओं को जोड़ने पर एक नई तस्वीर सामने आ रही थी। यदि अभिलेखपाल पुराने दस्तावेजों में बदलाव कर सकता था, तो नकली समझौते बनाना आसान था। यदि उसे राजकीय मुहरों की जानकारी थी, तो नकली मुहर बनाना भी संभव था। और यदि उसे गुप्त सुरंगों की जानकारी थी, तो महल के अंदर-बाहर जाना भी कठिन नहीं था।

अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया, “राजकीय अभिलेखपाल को तुरंत गिरफ्तार करो।”

लेकिन बीरबल ने हाथ उठाकर रोक दिया।

जहाँपनाह, अभी नहीं।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों?”

क्योंकि यदि वह सच में इस षड्यंत्र का हिस्सा है तो वह अभी हमारे हाथ से निकल सकता है। हमें पहले यह पता लगाना होगा कि वह किसके साथ है।”

अकबर ने कहा, “लेकिन वह भाग गया तो?”

बीरबल मुस्कुराए।

वह भागेगा नहीं।”

तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?”

क्योंकि उसे लगता है कि अभी तक उसका भेद नहीं खुला।”

बीरबल ने एक सैनिक को बुलाया और उसके कान में कुछ कहा।

सैनिक तुरंत चला गया।

कुछ देर बाद बीरबल ने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, अब हमें एक और नाटक करना होगा।”

अकबर मुस्कुराए। “तुम्हारे नाटक कभी छोटे नहीं होते।”

बीरबल ने कहा, “और आपके दरबार के षड्यंत्रकारी कभी साधारण नहीं होते।”

अगली सुबह पूरे महल में एक खबर फैलाई गई कि बीरबल ने रहस्यमयी संदूक खोलने का तरीका खोज लिया है। यह भी बताया गया कि संदूक में मौजूद वस्तु के आधार पर सभी षड्यंत्रकारियों के नाम सामने आ जाएँगे।

यह खबर जानबूझकर राजकीय अभिलेखपाल तक पहुँचाई गई।

अभिलेखपाल ने बाहर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

वह सामान्य रूप से अपना काम करता रहा।

लेकिन बीरबल उसकी आँखों पर नजर रखे हुए थे।

दोपहर में अभिलेखपाल ने एक पुराने दस्तावेज की माँग की।

सैनिक ने पूछा, “कौन-सा?”

उसने कहा, “वही पुराना समझौता जिसमें उत्तर-पश्चिमी सीमा की जानकारी है।”

सैनिक ने कहा, “वह तो कल ही राजकीय खजाने में भेजा गया है।”

अभिलेखपाल के चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आई।

फिर उसने स्वयं को संभाल लिया।

अच्छा।”

वह वापस अपनी मेज पर बैठ गया।

लेकिन बीरबल को यही प्रतिक्रिया चाहिए थी।

बीरबल ने सैनिकों से कहा, “अब उसकी निगरानी करो।”

शाम होते-होते अभिलेखपाल ने अपना काम खत्म किया और महल से बाहर निकल गया।

सैनिक उसके पीछे-पीछे चलने लगे।

वह शहर की एक सुनसान गली में पहुँचा।

वहाँ एक आदमी पहले से उसका इंतजार कर रहा था।

उस आदमी की दाईं टाँग में हल्की लंगड़ाहट थी।

सैनिकों ने उसे देखते ही पहचान लिया।

वही रहस्यमयी व्यक्ति।

अभिलेखपाल ने धीमे स्वर में कहा, “संदूक का रहस्य खुल गया है।”

दूसरे व्यक्ति ने कहा, “तो अब?”

हमें योजना बदलनी होगी।”

क्या अभिलेखपाल सुरक्षित है?”

अभी तक।”

और मीर कासिम?”

वह हमारे लिए बेकार हो चुका है।”

रहमान?”

अभिलेखपाल ने कहा, “वह सबसे बड़ा खतरा है।”

दूसरे व्यक्ति ने पूछा, “क्या वह बीरबल को सब बता चुका है?”

शायद।”

उन्हें पता नहीं था कि पास की छत पर बीरबल के दो सैनिक सब सुन रहे थे।

लेकिन तभी उस लंगड़े व्यक्ति ने अचानक ऊपर देखा।

उसे कुछ शक हुआ।

वह चिल्लाया, “कोई है!”

सैनिकों ने भागने की कोशिश की।

एक सैनिक पकड़ लिया गया, लेकिन दूसरा भागकर बीरबल तक खबर पहुँचाने में सफल हो गया।

कुछ ही देर बाद बीरबल वहाँ पहुँचे।

लेकिन तब तक दोनों षड्यंत्रकारी भाग चुके थे।

गली में केवल एक चीज पड़ी थी।

एक छोटी-सी चाबी।

बीरबल ने उसे उठाया।

चाबी पर वही निशान था जो रहस्यमयी संदूक पर था।

अकबर ने पूछा, “क्या यह वही चाबी है?”

बीरबल ने कहा, “शायद।”

तो संदूक अब खुल सकता है?”

बीरबल ने चाबी को ध्यान से देखा।

हाँ।”

तो चलो।”

दोनों तुरंत महल लौटे।

संदूक को दरबार के बीच में रखा गया।

सभी प्रमुख दरबारी बुलाए गए।

मीर कासिम भी सैनिकों की निगरानी में मौजूद था।

रहमान भी वहीं था।

राजकीय अभिलेखपाल को अभी तक यह पता नहीं था कि उसका भेद खुल चुका है।

बीरबल ने चाबी ताले में लगाई।

चाबी घूमी।

ताला खुल गया।

संदूक का ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठा।

अंदर सोना नहीं था।

न कोई हथियार।

न कोई राजकीय दस्तावेज।

सिर्फ एक पुरानी पुस्तक थी।

बीरबल ने पुस्तक उठाई।

उसके पहले पृष्ठ पर लिखा था—

जिस ज्ञान को छिपाया गया, उसी ने राज्य को अंधेरे में रखा।”

बीरबल ने पुस्तक खोली।

उसमें पिछले पच्चीस वर्षों की घटनाओं का विवरण था।

किसने किससे संपर्क किया।

किस दस्तावेज में क्या बदला गया।

किसने झूठे आरोप लगाए।

किसने धन लिया।

और अंत में उन लोगों की सूची थी जो वर्तमान षड्यंत्र में शामिल थे।

अकबर पन्ने पलटते गए।

उनका चेहरा बदलता गया।

फिर अंतिम पृष्ठ पर उनकी नजर ठहर गई।

वहाँ केवल एक नाम लिखा था।

अकबर ने पढ़ा—

राजकीय अभिलेखपाल।”

दरबार में हलचल मच गई।

लेकिन बीरबल ने पुस्तक का अंतिम पन्ना पलटा।

उसके पीछे एक और वाक्य लिखा था—

यदि यह पुस्तक बादशाह तक पहुँच जाए, तो समझ लेना कि असली विश्वासघाती अभी पकड़ा नहीं गया है।”

अकबर ने कहा, “क्या?”

बीरबल ने तुरंत पुस्तक बंद कर दी।

उसी समय बाहर से एक सैनिक दौड़ता हुआ आया।

जहाँपनाह! राजकीय अभिलेखपाल महल से गायब है।”

अकबर ने कहा, “उसे खोजो!”

सैनिक ने उत्तर दिया, “हमने पूरे महल की तलाशी ली। लेकिन उसकी कोई खबर नहीं है।”

बीरबल ने धीरे से कहा, “वह महल से नहीं गया।”

अकबर ने पूछा, “क्या मतलब?”

बीरबल ने पुस्तक की ओर देखा।

वह अभी भी यहीं है।”

अकबर ने चारों ओर देखा।

कहाँ?”

बीरबल ने दरबार में मौजूद लोगों की ओर देखा।

फिर उनकी नजर एक ऐसे व्यक्ति पर जाकर रुकी, जिसकी उपस्थिति पर अब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया था।

बीरबल ने कहा—

जहाँपनाह, असली षड्यंत्रकारी हमारे बीच ही खड़ा है।”

और उसी क्षण दरबार के एक साधारण सेवक ने अपना चेहरा उठाया।

उसकी आँखों में वही चमक थी जिसे बीरबल कई दिनों से खोज रहे थे।

अकबर के दरबार में उस समय ऐसा सन्नाटा छा गया था कि किसी को अपनी साँसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी। बीरबल की उँगली उस साधारण सेवक की ओर उठी हुई थी, और दरबार में उपस्थित हर व्यक्ति उसी सेवक को आश्चर्य से देख रहा था। वह व्यक्ति वर्षों से महल में काम कर रहा था और कभी किसी को उस पर संदेह करने का अवसर नहीं मिला था। उसके कपड़े साधारण थे, सिर थोड़ा झुका हुआ था और चेहरे पर ऐसी मासूमियत थी कि यदि बीरबल ने उस पर उँगली न उठाई होती तो शायद कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता था कि वह इतने बड़े रहस्य का हिस्सा हो सकता है। अकबर ने कठोर आवाज में पूछा, “बीरबल, तुम्हें इस व्यक्ति पर संदेह कैसे हुआ?” बीरबल ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, क्योंकि पिछले कई दिनों से यह व्यक्ति हमारे आसपास था, लेकिन हमने इसे कभी देखा ही नहीं। यह महल के हर उस स्थान पर पहुँच सकता था जहाँ सामान्य सैनिक भी नहीं पहुँच सकते थे। यह दरबार की बातें सुन सकता था, संदेश पहुँचा सकता था और बिना किसी संदेह के अंदर-बाहर जा सकता था। सबसे बड़ी बात यह है कि जब भी कोई महत्वपूर्ण घटना हुई, यह किसी न किसी रूप में उसके आसपास मौजूद रहा।”

सेवक ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, मैं निर्दोष हूँ। बीरबल जी को अवश्य कोई भ्रम हुआ है।” अकबर ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। बीरबल धीरे-धीरे उसके पास पहुँचे और बोले, “यदि तुम निर्दोष हो तो डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं केवल कुछ प्रश्न पूछूँगा।” सेवक ने सिर झुका दिया। बीरबल ने पूछा, “तुम महल में कितने वर्षों से काम कर रहे हो?” उसने कहा, “लगभग दस वर्ष।” बीरबल ने पूछा, “तुम्हारा काम क्या है?” उसने उत्तर दिया, “महल के अलग-अलग हिस्सों में दीपक जलाना, सफाई करना और आवश्यकता पड़ने पर सामान पहुँचाना।” बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छा। इसका अर्थ है कि तुम्हें महल के लगभग हर कमरे का रास्ता मालूम है।” सेवक ने कहा, “जी।” बीरबल ने अगला प्रश्न किया, “क्या तुम्हें पुराने पुस्तकालय के पीछे बने गुप्त रास्तों के बारे में भी जानकारी है?” सेवक एक पल के लिए चुप हो गया। फिर बोला, “नहीं।” बीरबल ने तुरंत उसकी आँखों में देखा और कहा, “यही तुम्हारी पहली गलती है।”

दरबार में बैठे सभी लोग उसकी ओर देखने लगे। बीरबल ने कहा, “कल रात जब हम गुप्त सुरंग में गए थे, वहाँ एक दीपक जल रहा था। वह दीपक नया नहीं था, लेकिन उसमें ताजा तेल डाला गया था। उस सुरंग में बाहर से कोई सामान्य व्यक्ति नहीं जा सकता, क्योंकि उसके प्रवेश का रास्ता बहुत छिपा हुआ है। लेकिन महल में दीपक और तेल की व्यवस्था कौन करता है? वही लोग जिन्हें महल के हर हिस्से की जानकारी होती है।” सेवक ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन बीरबल ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। उन्होंने कहा, “और एक बात। जिस कमरे में हमें बंद किया गया था, वहाँ मेज पर दीपक रखा था। उसके नीचे वह नक्शा छिपाया गया था। किसी ऐसे व्यक्ति ने वह सब तैयार किया था जो जानता था कि हम वहाँ पहुँचेंगे। इसका अर्थ है कि षड्यंत्रकारी केवल हमारी गतिविधियों पर नजर नहीं रख रहा था, बल्कि हमारे कदमों का अनुमान भी लगा रहा था।”

अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि सेवक की तलाशी ली जाए। सैनिकों ने उसके कपड़ों की जाँच की। पहले तो कुछ नहीं मिला, लेकिन उसकी कमर के भीतर कपड़े की एक तह में एक बहुत छोटी धातु की चाबी मिली। बीरबल ने चाबी देखते ही उसे पहचान लिया। यह वही चाबी थी जिसके बारे में कई दिनों से रहस्य बना हुआ था। अकबर ने कहा, “तो आखिरकार चाबी इसके पास थी!” सेवक ने घबराकर कहा, “नहीं जहाँपनाह, यह मेरी नहीं है। किसी ने मेरे कपड़ों में रख दी होगी।” बीरबल मुस्कुराए और बोले, “यदि किसी ने तुम्हें फँसाने के लिए यह चाबी रखी होती तो वह इसे तुम्हारे कपड़ों के अंदर इतनी सावधानी से क्यों छिपाता? वह तो चाहता कि चाबी तुरंत मिल जाए। लेकिन इसे ऐसे स्थान पर रखा गया जहाँ केवल वही व्यक्ति इसे जान सकता था जो इसे स्वयं छिपा रहा था।”

सेवक का चेहरा बदलने लगा। अकबर ने कठोर आवाज में पूछा, “सच बताओ। तुम कौन हो?” कुछ क्षण तक वह चुप रहा। फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में अब वह मासूमियत नहीं थी। उसने कहा, “आप मुझे पहचान नहीं पाए, जहाँपनाह, लेकिन मेरे परिवार को आप बहुत अच्छी तरह जानते थे।” अकबर चौंक गए। “मेरे परिवार को?” सेवक ने कहा, “हाँ। मेरे पिता कभी आपके राज्य के सैनिक थे। उन्होंने सीमा पर कई वर्षों तक आपकी सेवा की। लेकिन एक युद्ध के बाद उन्हें गद्दार कहकर जेल में डाल दिया गया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों तक कहा कि वह निर्दोष थे। किसी ने उनकी बात नहीं मानी। मैंने उसी दिन निर्णय लिया था कि एक दिन मैं उस अन्याय का बदला लूँगा।”

अकबर ने गंभीर होकर पूछा, “तुम्हारे पिता का नाम क्या था?” सेवक ने नाम बताया। अकबर कुछ क्षण चुप रहे। उन्हें पुरानी घटना याद आ गई। उन्होंने कहा, “तुम्हारे पिता पर गद्दारी का आरोप उस समय के राजकीय अभिलेखों के आधार पर लगाया गया था।” सेवक कड़वाहट से हँसा और बोला, “यही तो समस्या थी, जहाँपनाह। वे अभिलेख झूठे थे। मेरे पिता निर्दोष थे। लेकिन असली दोषी लोगों ने दस्तावेज बदल दिए और उन्हें अपराधी बना दिया। आपने सत्य समझकर झूठ पर विश्वास किया।”

बीरबल ने तुरंत कहा, “और यही कारण है कि तुम्हारा पूरा षड्यंत्र पुराने दस्तावेजों के आसपास घूम रहा है।” सेवक ने बीरबल की ओर देखा। “हाँ। तुमने समझ लिया।” अकबर ने पूछा, “लेकिन तुमने इतने वर्षों तक महल में सेवा क्यों की?” उसने उत्तर दिया, “क्योंकि मुझे पता था कि यदि मैं महल के अंदर रहूँगा तो एक दिन मुझे उन लोगों तक पहुँच मिलेगी जिन्होंने मेरे परिवार को बर्बाद किया था। मैंने वर्षों तक इंतजार किया। फिर मुझे ऐसे लोग मिले जो उसी पुराने षड्यंत्र को आगे बढ़ाना चाहते थे। उन्होंने मुझे धन दिया, सुरक्षा का वादा किया और कहा कि यदि मैं उनकी सहायता करूँ तो मुझे अपने पिता का बदला लेने का अवसर मिलेगा।”

बीरबल ने पूछा, “और मीर कासिम?” सेवक ने कहा, “वह लालची था। उसे धन चाहिए था। हमने उसकी कमजोरी का उपयोग किया। उसे पूरी योजना नहीं बताई गई थी। उसे केवल इतना पता था कि कुछ दस्तावेज हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए जब तुमने उस पर संदेह किया तो उसने वही बातें बताईं जो उसे बताई गई थीं।” मीर कासिम ने शर्म से सिर झुका लिया। “मैंने गलती की,” उसने कहा। बीरबल ने उसकी ओर देखा और कहा, “गलती और विश्वासघात के बीच अंतर होता है। लेकिन दोनों का परिणाम राज्य के लिए खतरनाक हो सकता है।”

अकबर ने सेवक से पूछा, “तुम्हारा अंतिम उद्देश्य क्या था?” सेवक ने उत्तर दिया, “मैं चाहता था कि राजकीय अभिलेखों में मौजूद पुराने समझौतों को नष्ट कर दिया जाए और उनकी जगह ऐसे दस्तावेज रख दिए जाएँ जिनसे कई राज्यों के बीच सीमा विवाद पैदा हो जाए। फिर युद्ध शुरू होता। उस युद्ध में हजारों लोग मरते। मैं चाहता था कि उस अफरा-तफरी में पुराने राजकीय अभिलेख भी नष्ट हो जाएँ और कोई कभी यह साबित न कर सके कि मेरे पिता निर्दोष थे।” अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, “तुमने अपने पिता के न्याय के लिए निर्दोष लोगों को मरने का रास्ता क्यों चुना?” सेवक कुछ नहीं बोला।

बीरबल ने धीरे से कहा, “यही बदले की सबसे बड़ी कमजोरी है। जब मनुष्य अन्याय का शिकार होता है तो उसे न्याय चाहिए। लेकिन यदि न्याय और बदला उसके मन में एक हो जाएँ, तो वह स्वयं वही अन्याय करने लगता है जिससे वह घृणा करता था।” सेवक ने बीरबल की ओर देखा। उसकी आँखों में पहली बार पछतावे की झलक दिखाई दी। लेकिन तभी दरबार के बाहर घोड़ों की तेज आवाज सुनाई दी। एक सैनिक भागता हुआ अंदर आया और बोला, “जहाँपनाह! राजकीय अभिलेखागार में आग लग गई है!”

अकबर तुरंत उठ खड़े हुए। “क्या?” सैनिक ने कहा, “आग तेजी से फैल रही है। हम उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं।” बीरबल ने तुरंत सेवक की ओर देखा। सेवक के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी। बीरबल समझ गए कि असली योजना अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने कहा, “तुम्हारे साथियों ने आग लगाई है?” सेवक चुप रहा। बीरबल ने पूछा, “कहाँ रखे हैं असली दस्तावेज?” सेवक ने कहा, “अब आपको कभी नहीं मिलेंगे।”

बीरबल ने बिना समय गँवाए अकबर से कहा, “जहाँपनाह, हमें अभी अभिलेखागार जाना होगा।” अकबर और बीरबल सैनिकों के साथ तेजी से वहाँ पहुँचे। आग की लपटें ऊँची उठ रही थीं। सैनिक पानी डाल रहे थे, लेकिन पुराने कागजों और लकड़ी की अलमारियों के कारण आग तेजी से फैल रही थी। बीरबल ने आग के बीच चारों ओर देखा। उन्होंने देखा कि एक विशेष कमरे में आग सबसे अधिक थी, जबकि उसके पास की अलमारियों को लगभग छुआ भी नहीं गया था। उन्होंने तुरंत कहा, “आग वहाँ से शुरू नहीं हुई जहाँ हमें दिख रही है। किसी ने जानबूझकर एक रास्ता बनाया है।”

सैनिकों ने बीरबल के निर्देश पर पीछे की दीवार हटाई। वहाँ एक संकरा रास्ता मिला। बीरबल बोले, “वे असली दस्तावेज जलाना नहीं चाहते। वे उन्हें चोरी करके ले जाना चाहते हैं।” अकबर ने पूछा, “तो फिर आग क्यों?” बीरबल ने कहा, “ताकि हम आग बुझाने में व्यस्त रहें और कोई व्यक्ति दस्तावेज लेकर भाग जाए।” कुछ सैनिकों को तुरंत पीछे की ओर भेजा गया।

थोड़ी देर बाद एक सैनिक ने आवाज लगाई, “वहाँ कोई भाग रहा है!” बीरबल और अकबर उस दिशा में दौड़े। उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति कपड़े में कुछ भारी वस्तु लपेटकर भाग रहा था। सैनिकों ने उसका पीछा किया। वह व्यक्ति गुप्त मार्ग से बाहर निकलकर महल की पिछली पहाड़ी की ओर भागा, लेकिन वहाँ पहले से सैनिक तैनात थे। कुछ ही देर में उसे पकड़ लिया गया।

जब उसके हाथ से कपड़ा हटाया गया तो उसमें पुराने राजकीय दस्तावेजों का बंडल था। अकबर ने राहत की साँस ली। लेकिन बीरबल ने दस्तावेजों को देखते ही कहा, “जहाँपनाह, यह पूरा बंडल भी असली नहीं है।”

अकबर ने हैरानी से पूछा, “फिर असली दस्तावेज कहाँ हैं?”

बीरबल ने बंदी की ओर देखा। “यही तो हमें उससे पूछना होगा।”

बंदी चुप रहा।

बीरबल उसके पास गए और बोले, “तुम्हें लगता है कि तुमने हमारी आखिरी उम्मीद भी खत्म कर दी है। लेकिन तुमने एक गलती की है।”

बंदी ने पूछा, “क्या?”

बीरबल ने कहा, “तुमने दस्तावेजों का बंडल तो चुरा लिया, लेकिन उस कमरे से निकलते समय तुम्हारे जूतों पर लगी राख हमें बता रही है कि तुम किस रास्ते से आए। और उस रास्ते के अंत में केवल एक जगह है जहाँ कोई दस्तावेज छिपा सकता है।”

बंदी के चेहरे का रंग उड़ गया।

बीरबल ने सैनिकों को एक पुराने कुएँ के पास जाने का आदेश दिया। कुएँ के किनारे एक पत्थर के नीचे उन्हें लकड़ी का छोटा संदूक मिला। संदूक खोलने पर उसमें असली राजकीय दस्तावेज सुरक्षित रखे हुए थे।

अकबर ने उन्हें अपने हाथों में लिया और कहा, “आज मेरा राज्य बच गया।”

बीरबल ने उत्तर दिया, “नहीं जहाँपनाह। आज केवल राज्य के दस्तावेज नहीं बचे हैं। आज एक और चीज बची है—सत्य।”

अकबर ने कहा, “और तुम्हारी बात भी सिद्ध हो गई, बीरबल। ज्ञान और सत्य को जितना छिपाया जाए, अंततः उन्हें सामने आना ही पड़ता है।”

बीरबल मुस्कुराए। “सत्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है, जहाँपनाह। झूठ को हमेशा किसी न किसी चीज की रक्षा करनी पड़ती है—नकली दस्तावेज, झूठे संदेश, गुप्त रास्ते और डर। लेकिन सत्य को केवल समय चाहिए।”

अकबर ने अपने सामने खड़े सेवक, मीर कासिम और पकड़े गए षड्यंत्रकारियों को देखा। फिर उन्होंने आदेश दिया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच की जाए और जिन लोगों ने वर्षों पहले गलत दस्तावेजों के कारण निर्दोष लोगों को अपराधी बनाया था, उनके बारे में भी पुराने अभिलेखों की जाँच की जाए।

रहमान आगे आया और बोला, “जहाँपनाह, मेरे पिता के साथ जो हुआ, उसका सच आज सामने आ गया। मैं आपसे बदला नहीं चाहता। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि उनके नाम पर लगा झूठा कलंक मिटा दिया जाए।”

अकबर ने गंभीरता से कहा, “तुम्हारे पिता के नाम की सच्चाई पूरे दरबार के सामने घोषित की जाएगी।”

रहमान ने सिर झुका दिया।

बीरबल कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, इस पूरी घटना ने एक बात साबित कर दी है। सबसे बड़ा खजाना सोना या चाँदी नहीं होता। सबसे बड़ा खजाना वह ज्ञान है जो हमें सत्य और झूठ में अंतर करना सिखाता है।”

अकबर मुस्कुराए और बोले, “और इसलिए तुम्हारा कल का उत्तर सही था।”

बीरबल ने कहा, “कौन-सा उत्तर?”

अकबर हँस पड़े। “ज्ञान बाँटने से बढ़ता है।”

दरबार में भी मुस्कान फैल गई।

लेकिन उसी समय एक सैनिक दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक छोटा पत्र था। उसने वह पत्र अकबर को दिया। पत्र खोलते ही बादशाह का चेहरा गंभीर हो गया। उसमें लिखा था कि पकड़े गए षड्यंत्रकारियों के पीछे अभी एक और व्यक्ति है, जिसने पूरे षड्यंत्र को शुरू किया था। वह व्यक्ति न तो पड़ोसी राज्य में था, न महल के भीतर। वह राजधानी से बहुत दूर बैठकर सबको नियंत्रित कर रहा था।

पत्र की अंतिम पंक्ति पढ़कर बीरबल की आँखें सिकुड़ गईं।

उसमें लिखा था—

जिसे तुमने आज पकड़ा है, वह केवल कहानी का एक पन्ना था। असली लेखक अभी सामने नहीं आया।”

बीरबल ने पत्र मोड़ा और अकबर की ओर देखा।

अकबर ने पूछा, “अब क्या?”

बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “अब हमें उस लेखक को ढूँढ़ना होगा।”

और इस बार बीरबल के सामने केवल एक पहेली नहीं थी। सामने एक ऐसा दुश्मन था जो दूर बैठकर लोगों के मन, लालच और डर को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा था।

लेकिन बीरबल ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह उस व्यक्ति तक पहुँचकर रहेगा।

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही बादशाह अकबर ने विशेष दरबार बुलाया। पिछली रात की घटनाओं ने पूरे महल को हिला दिया था। षड्यंत्र के कई लोग पकड़े जा चुके थे, पुराने राजकीय दस्तावेज सुरक्षित कर लिए गए थे और वर्षों पहले हुए अन्याय का सच भी सामने आ चुका था, लेकिन बीरबल के मन में एक बात लगातार घूम रही थी। वह व्यक्ति कौन था जिसने इतने लंबे समय तक दूर बैठकर इतने लोगों को नियंत्रित किया? वह कौन था जिसे महल की गतिविधियों, पुराने दस्तावेजों और राजकीय रहस्यों की इतनी गहरी जानकारी थी? और सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि वह व्यक्ति अभी तक पकड़ा क्यों नहीं गया था?

अकबर सिंहासन पर बैठे और उन्होंने दरबारियों की ओर देखा। फिर बोले, “कल हमने समझा था कि षड्यंत्र समाप्त हो गया है, लेकिन रात को मिले पत्र ने हमारी आँखें फिर खोल दीं। हमारे सामने अब एक ऐसा शत्रु है जिसे हमने देखा तक नहीं है। बीरबल, तुम्हारा क्या विचार है?” बीरबल कुछ क्षण शांत रहे और फिर बोले, “जहाँपनाह, मेरा विचार है कि हमें उस व्यक्ति को खोजने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हमें उसे स्वयं हमारे पास आने के लिए मजबूर करना चाहिए।” अकबर ने पूछा, “लेकिन वह इतना चतुर है कि सामने क्यों आएगा?” बीरबल मुस्कुराए और बोले, “क्योंकि हर बुद्धिमान व्यक्ति की एक कमजोरी होती है—उसे अपनी बुद्धि पर भरोसा होता है। यदि हम उसे विश्वास दिला दें कि वह जीत रहा है, तो वह अपनी जीत देखने के लिए स्वयं सामने आएगा।”

अकबर ने कहा, “तुम्हारी योजना क्या है?” बीरबल ने उत्तर दिया, “हम यह खबर फैलाएँगे कि हमारे पास वह पुस्तक नहीं रही जिसमें षड्यंत्रकारियों के नाम लिखे थे। हम कहेंगे कि वह पुस्तक आग में जल गई। साथ ही यह खबर भी फैलाएँगे कि असली राजकीय दस्तावेजों में एक महत्वपूर्ण नाम छिपा हुआ है, लेकिन उसे पढ़ने के लिए एक विशेष मुहर की आवश्यकता है।” अकबर समझ गए कि बीरबल फिर से कोई जाल बिछाने वाले हैं। उन्होंने पूछा, “और यदि वह व्यक्ति इस खबर पर विश्वास कर ले?” बीरबल बोले, “तो वह उस मुहर को पाने की कोशिश करेगा।”

बीरबल ने फिर दरबार के केवल तीन विश्वसनीय लोगों को बुलाया। उनमें से किसी को पूरी योजना नहीं बताई गई। एक को कहा गया कि वह बाजार में यह खबर फैलाए कि पुस्तक नष्ट हो चुकी है। दूसरे को कहा गया कि वह सरायों में यह बात फैलाए कि असली दस्तावेजों में किसी बड़े अधिकारी का नाम है। तीसरे को आदेश दिया गया कि वह गुप्त रूप से यह खबर फैलाए कि विशेष मुहर केवल राजधानी से बाहर स्थित पुराने शाही विश्रामगृह में रखी है। बीरबल जानते थे कि ये तीनों खबरें अलग-अलग रास्तों से जाएँगी, लेकिन अंततः उसी व्यक्ति तक पहुँचेंगी जिसे वह खोज रहे थे।

कुछ दिनों तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। महल में सब कुछ सामान्य दिखाई देता रहा। अकबर ने कई बार बीरबल से पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि उनकी योजना सफल होगी। बीरबल हर बार यही कहते, “जहाँपनाह, जाल डालने के बाद मछली को पानी से निकलने का समय देना पड़ता है।” चौथे दिन एक सैनिक ने सूचना दी कि पुराने शाही विश्रामगृह के आसपास रात में किसी संदिग्ध व्यक्ति को देखा गया है। बीरबल ने तुरंत सैनिकों से कहा कि किसी को पकड़ने की कोशिश न करें। उन्होंने केवल उसका पीछा करने का आदेश दिया।

रात गहरी होने पर एक घुड़सवार विश्रामगृह के पास पहुँचा। उसने चारों ओर देखा और फिर पुराने भवन की दीवार के पास जाकर एक पत्थर हटाया। उसके अंदर एक छोटा-सा स्थान था। घुड़सवार ने उसमें हाथ डाला और कुछ खोजने लगा। तभी पीछे से आवाज आई, “क्या ढूँढ़ रहे हो?” घुड़सवार अचानक पलटा। सामने बीरबल खड़े थे। उनके साथ केवल दो सैनिक थे। घुड़सवार ने तलवार निकालने की कोशिश की, लेकिन सैनिकों ने उसे रोक लिया। बीरबल ने उसका चेहरा देखा और तुरंत पहचान लिया कि वह राजकीय अभिलेखपाल का पुराना सहायक था, जिसे कुछ दिन पहले गायब घोषित किया गया था।

बीरबल ने पूछा, “तुम्हें किसने भेजा?” वह चुप रहा। बीरबल ने कहा, “तुम्हें लगता है कि तुम्हें चुप रहकर अपने मालिक की रक्षा करनी चाहिए। लेकिन सोचो, यदि वह व्यक्ति इतना शक्तिशाली है तो उसने तुम्हें अकेले यहाँ क्यों भेजा?” आदमी ने कोई उत्तर नहीं दिया। बीरबल ने आगे कहा, “क्योंकि उसके लिए तुम केवल एक मोहरा हो। यदि तुम पकड़े गए तो वह तुम्हें भूल जाएगा। यदि तुम भाग गए तो भी उसे फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन यदि तुम मुझे उसका नाम बता दो तो शायद तुम्हें अपने अपराधों का पूरा दंड न मिले।” यह सुनकर आदमी की आँखों में डर दिखाई दिया।

कुछ देर बाद उसने कहा, “मुझे उसका नाम नहीं पता।” बीरबल ने पूछा, “तुम्हें किस नाम से आदेश मिलता था?” उसने कहा, “हमें केवल एक संकेत दिया जाता था—‘छाया’।” बीरबल ने कहा, “छाया कोई नाम नहीं है।” आदमी बोला, “हमने उसे कभी सामने नहीं देखा। संदेश हमेशा किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से आते थे।” बीरबल ने पूछा, “और संदेश कहाँ से आते थे?” उसने उत्तर दिया, “एक पुराने डाक मार्ग से।”

कहाँ का डाक मार्ग?”

पूर्व की पहाड़ियों से।”

बीरबल ने तुरंत समझ लिया कि यह मामला राजधानी से बहुत दूर तक फैला हुआ था। उन्होंने उस व्यक्ति को हिरासत में लेने का आदेश दिया और अगले दिन अकबर को पूरी बात बताई। अकबर ने कहा, “पूर्व की पहाड़ियों में हमारे कई छोटे किले और चौकियाँ हैं। यदि वह व्यक्ति वहाँ छिपा है तो उसे पकड़ना आसान नहीं होगा।” बीरबल ने कहा, “उसे पकड़ने की जरूरत नहीं है, जहाँपनाह। हमें पहले यह जानना होगा कि वह वहाँ क्यों है।”

अकबर ने पूछा, “क्यों?”

बीरबल ने कहा, “क्योंकि जो व्यक्ति इतने वर्षों से लोगों को नियंत्रित कर रहा है, उसका उद्देश्य केवल बदला या धन नहीं हो सकता। उसे राज्य की किसी ऐसी चीज में रुचि है जो उसे लंबे समय तक शक्ति दे सके।”

अकबर ने पूछा, “क्या हो सकता है?”

बीरबल ने कहा, “राज्य की जनता का विश्वास।”

अकबर कुछ क्षण चुप रहे।

बीरबल ने समझाया, “जहाँपनाह, पिछले कुछ दिनों में उन्होंने आग लगाई, नकली दस्तावेज बनाए, पुराने आरोपों को हवा दी और लोगों के बीच अविश्वास फैलाया। यदि उनका उद्देश्य केवल धन होता तो वे खजाना लूट सकते थे। यदि उद्देश्य केवल बदला होता तो वे किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाते। लेकिन उनका उद्देश्य उससे बड़ा है। वे चाहते हैं कि लोग अपने राज्य और शासन पर विश्वास करना छोड़ दें। जब जनता को शासन पर विश्वास नहीं रहता, तब कोई बाहरी शक्ति बिना बड़ी सेना के भी राज्य को कमजोर कर सकती है।”

अकबर ने गंभीरता से कहा, “तो हमें जनता के बीच फैल रही बातों पर भी नजर रखनी होगी।”

बीरबल ने कहा, “जी।”

अगले कुछ दिनों में बीरबल ने राजधानी के बाजारों, सरायों और गाँवों में लोगों की बातें सुनने के लिए अपने विश्वसनीय लोगों को भेजा। लौटकर उन्होंने बताया कि शहर में कई तरह की अफवाहें फैल रही हैं। कोई कह रहा था कि बादशाह ने पुराने कर बढ़ाने का निर्णय लिया है। कोई कह रहा था कि पड़ोसी राज्य युद्ध की तैयारी कर रहा है। किसी ने यह अफवाह फैलाई थी कि राजकीय खजाना खाली हो चुका है। सबसे खतरनाक अफवाह यह थी कि बादशाह अपने ही मंत्रियों पर भरोसा नहीं करते और जल्द ही कई निर्दोष लोगों को जेल में डाल दिया जाएगा।

बीरबल ने सारी बातें सुनीं और कहा, “यही असली युद्ध है।”

अकबर ने पूछा, “कौन-सा युद्ध?”

लोगों के मन का युद्ध।”

अकबर ने कहा, “तो इसे कैसे जीता जाए?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “सत्य से।”

अकबर ने पूछा, “लेकिन इतनी सारी अफवाहों के बीच सत्य लोगों तक कैसे पहुँचेगा?”

बीरबल बोले, “यदि हम हर अफवाह का जवाब देंगे तो अफवाहें और बढ़ेंगी। हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें लोग स्वयं सही जानकारी प्राप्त कर सकें।”

अकबर ने आदेश दिया कि राजधानी के मुख्य चौक में हर सप्ताह राजकीय अधिकारियों द्वारा जनता के प्रश्नों का खुला उत्तर दिया जाए। कर, व्यापार, सुरक्षा और प्रशासन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से बताई जाए। जिन मामलों में जाँच चल रही थी, उनके बारे में भी जितना संभव हो उतना सत्य बताया जाए। बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, जब लोगों को सत्य जानने का रास्ता मिल जाता है, तब झूठ की दुकान धीरे-धीरे बंद होने लगती है।”

इसका प्रभाव कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगा। कई अफवाहें अपने आप खत्म होने लगीं। लेकिन इससे षड्यंत्रकारी को भी समझ आ गया कि उसकी योजना कमजोर पड़ रही है।

एक रात बीरबल के पास एक गुप्त संदेश पहुँचा। उसमें लिखा था, “यदि तुम सच में छाया को पकड़ना चाहते हो तो अमावस्या की रात पूर्वी पहाड़ियों में स्थित पुराने किले में आओ। अकेले आना।”

अकबर ने पत्र पढ़ा और कहा, “यह स्पष्ट जाल है।”

बीरबल ने कहा, “हाँ।”

तो तुम वहाँ नहीं जाओगे?”

बीरबल मुस्कुराए। “मैं अवश्य जाऊँगा।”

अकबर ने कहा, “लेकिन अकेले नहीं।”

बीरबल बोले, “मैं अकेला ही जाऊँगा।”

अकबर ने तुरंत मना किया, लेकिन बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, यदि वह व्यक्ति वास्तव में मुझे अपने पास बुला रहा है तो उसके सामने सैनिकों के साथ पहुँचना उसे सतर्क कर देगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं सचमुच अकेला रहूँगा।”

अकबर समझ गए कि बीरबल ने फिर कोई योजना बनाई है।

अमावस्या की रात बीरबल साधारण यात्री के वेश में पूर्वी पहाड़ियों की ओर निकल पड़े। उनके साथ दूर-दूर से कुछ गुप्त सैनिक चल रहे थे, लेकिन वे किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे। बीरबल पुराने किले के पास पहुँचे। किला वर्षों से वीरान था। उसकी टूटी दीवारों के बीच हवा सीटी बजा रही थी। बीरबल अंदर गए और एक बड़े कक्ष में पहुँचे।

वहाँ एक दीपक जल रहा था।

बीरबल ने कहा, “मैं आ गया।”

कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं आया।

फिर अंधेरे से एक आवाज आई, “तुम हमेशा की तरह समय पर आए हो, बीरबल।”

बीरबल रुक गए।

उन्होंने पूछा, “तुम मुझे जानते हो?”

आवाज आई, “मैं तुम्हें बहुत पहले से जानता हूँ।”

तो सामने आओ।”

अंधेरे से एक व्यक्ति धीरे-धीरे बाहर आया। उसका चेहरा आधा ढका हुआ था। वह उम्रदराज था और उसकी चाल में अजीब आत्मविश्वास था।

बीरबल ने उसे देखते ही कहा, “तो तुम हो छाया।”

वह व्यक्ति हँसा।

नाम से क्या फर्क पड़ता है?”

बीरबल बोले, “नाम से नहीं, उद्देश्य से फर्क पड़ता है।”

उस व्यक्ति ने कहा, “तुम्हारी बुद्धि की बहुत प्रशंसा सुनी है। आज देखता हूँ कि तुम सच में कितने बुद्धिमान हो।”

बीरबल शांत रहे।

उस व्यक्ति ने कहा, “तुमने पुराने दस्तावेज बचा लिए, मेरे कई लोगों को पकड़ लिया, जनता में फैलती अफवाहें रोक दीं और मेरे जाल को समझ लिया। लेकिन तुम एक बात भूल रहे हो।”

क्या?”

राजा को हराने के लिए राजा को मारना जरूरी नहीं होता।”

बीरबल ने कहा, “मुझे पता है।”

वह व्यक्ति चौंका।

बीरबल ने आगे कहा, “राजा को हराने के लिए उसके लोगों का विश्वास तोड़ना होता है।”

कुछ क्षण के लिए वह व्यक्ति चुप रहा।

बीरबल मुस्कुराए।

लेकिन तुम्हारी दूसरी गलती यह है कि तुमने यह मान लिया कि लोग हमेशा झूठ पर विश्वास करेंगे।”

उस व्यक्ति ने कहा, “और तुम्हें लगता है कि सत्य हमेशा जीतता है?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “नहीं। सत्य हमेशा तुरंत नहीं जीतता। लेकिन झूठ को हर दिन नई कहानी बनानी पड़ती है, जबकि सत्य को केवल एक बार सामने आना होता है।”

वह व्यक्ति धीरे-धीरे ताली बजाने लगा।

बहुत सुंदर, बीरबल। लेकिन क्या तुम जानते हो कि मैं यहाँ तुम्हें क्यों बुलाया?”

बीरबल ने कहा, “तुम मुझे एक प्रस्ताव देने वाले हो।”

वह व्यक्ति मुस्कुराया।

तुम्हें मेरे साथ आना होगा।”

क्यों?”

क्योंकि मैं तुम्हारी बुद्धि का उपयोग करना चाहता हूँ।”

बीरबल ने उसकी आँखों में देखा।

और यदि मैं मना कर दूँ?”

उस व्यक्ति ने कहा, “तो यह किला तुम्हारा आखिरी स्थान होगा।”

बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “तुमने तीसरी गलती भी कर दी।”

कौन-सी?”

तुमने मुझे यहाँ बुलाकर मुझे अपनी पूरी योजना बताने का अवसर दिया।”

वह व्यक्ति अचानक पीछे हट गया।

उसी क्षण किले की चारों दिशाओं से मशालें जल उठीं।

गुप्त सैनिक बाहर आ गए।

वह व्यक्ति घिर चुका था।

लेकिन वह हँसने लगा।

तुम मुझे पकड़ सकते हो, बीरबल। लेकिन तुम मेरी पूरी योजना नहीं रोक सकते।”

बीरबल ने पूछा, “क्यों?”

उसने कहा, “क्योंकि असली खेल अभी शुरू हुआ है।”

फिर उसने अपनी मुट्ठी खोली।

उसके हाथ में एक छोटी मुहर थी।

बीरबल ने उसे देखते ही पहचान लिया।

वह वही राजकीय मुहर थी जो कई दिनों से रहस्य का केंद्र बनी हुई थी।

बीरबल ने कहा, “तो यही तुम्हारी आखिरी चाल है।”

वह व्यक्ति मुस्कुराया।

नहीं बीरबल। यही वह चाबी है जिससे तुम्हारे राज्य का सबसे बड़ा रहस्य खुलेगा।”

और उसी क्षण किले की जमीन के नीचे से भारी आवाज सुनाई दी।

पत्थर हिलने लगे।

किले के फर्श में एक विशाल दरार दिखाई दी।

बीरबल ने नीचे देखा।

वहाँ एक विशाल भूमिगत कक्ष था।

और उस कक्ष में सैकड़ों पुराने संदूक रखे थे।

बीरबल की आँखें फैल गईं।

उन संदूकों पर अलग-अलग राज्यों की मुहरें लगी थीं।

उन्हें देखते ही बीरबल समझ गए कि यह षड्यंत्र केवल अकबर के राज्य के विरुद्ध नहीं था।

यह कई राज्यों से जुड़ा हुआ था।

और उन संदूकों में ऐसा रहस्य छिपा था जो पूरे हिंदुस्तान की राजनीति बदल सकता था।

पूर्वी पहाड़ियों के उस पुराने किले के नीचे बने विशाल तहखाने को देखकर बीरबल कुछ क्षणों तक बिल्कुल शांत खड़े रहे। उनके सामने पत्थर के लंबे गलियारे के दोनों ओर सैकड़ों संदूक रखे थे और प्रत्येक संदूक पर अलग-अलग राज्यों की मुहर लगी हुई थी। कुछ मुहरें उन राज्यों की थीं जिनसे बादशाह अकबर के अच्छे संबंध थे, कुछ उन राज्यों की थीं जिनके साथ व्यापारिक समझौते चल रहे थे और कुछ ऐसी थीं जिन्हें देखकर बीरबल भी तुरंत पहचान नहीं पाए। सबसे विचित्र बात यह थी कि सभी संदूक बहुत व्यवस्थित ढंग से रखे गए थे, जैसे कोई वर्षों से उन्हें एकत्र करके किसी विशेष उद्देश्य से सुरक्षित रख रहा हो। किले में पकड़ा गया रहस्यमयी व्यक्ति अब भी शांत खड़ा था। उसके चेहरे पर डर का कोई निशान नहीं था। उसने बीरबल की ओर देखकर कहा, “अब समझे, बीरबल? तुम जिस षड्यंत्र को कुछ दिनों से खोज रहे थे, वह किसी एक दरबार या किसी एक राज्य का मामला नहीं है। यह उससे बहुत बड़ा है।”

बीरबल ने उसकी ओर देखा और बोले, “बड़ा है, लेकिन अजेय नहीं।” वह व्यक्ति हल्का-सा हँसा। “तुम्हें अभी भी अपनी बुद्धि पर बहुत भरोसा है।” बीरबल ने कहा, “और तुम्हें अपनी योजना पर। अंतर इतना है कि मेरी बुद्धि मुझे प्रश्न पूछना सिखाती है, जबकि तुम्हारी योजना तुम्हें यह विश्वास दिलाती है कि तुम सबके उत्तर जानते हो।” उस व्यक्ति ने कुछ नहीं कहा। बीरबल धीरे-धीरे पहले संदूक के पास गए और उसकी मुहर को ध्यान से देखने लगे। फिर उन्होंने दूसरे संदूक की मुहर देखी। उसके बाद तीसरे की। उनके चेहरे पर चिंता की हल्की रेखा दिखाई दी। उन्होंने अकबर के विश्वसनीय सैनिकों से कहा कि कोई भी संदूक अभी न खोला जाए। सैनिकों ने आदेश का पालन किया।

उसी समय एक सैनिक ने पूछा, “लेकिन हुजूर, यदि इन संदूकों में राज्य के विरुद्ध कोई महत्वपूर्ण सामग्री है तो हमें इन्हें खोलना चाहिए।” बीरबल ने उत्तर दिया, “जल्दबाजी में खोला गया संदूक कभी-कभी अपने अंदर रखे सामान से अधिक खतरनाक होता है।” सैनिक ने आश्चर्य से पूछा, “कैसे?” बीरबल ने कहा, “क्योंकि हमें अभी नहीं पता कि इन संदूकों में केवल दस्तावेज हैं या कोई ऐसा जाल भी है जिसे खोलते ही संदेश बाहर चला जाए।” रहस्यमयी व्यक्ति ने बीरबल की बात सुनकर मुस्कुराया। बीरबल ने उसकी ओर देखा और कहा, “तुम्हें यह सुनकर आश्चर्य हो रहा है कि मैंने यह समझ लिया?” वह बोला, “मैं केवल यह देख रहा हूँ कि तुम कितनी देर तक अनुमान लगाते रहोगे।” बीरबल ने उत्तर दिया, “मैं अनुमान नहीं लगा रहा। मैं तुम्हारी पिछली गलतियों से सीख रहा हूँ।”

बीरबल ने तहखाने की दीवारों का निरीक्षण शुरू किया। कुछ स्थानों पर पत्थरों के बीच छोटे-छोटे छेद बने थे। उन्होंने एक सैनिक से मशाल माँगी और दीवार के पास ले जाकर देखा। हवा बहुत हल्की गति से उन छेदों से अंदर-बाहर हो रही थी। बीरबल ने कहा, “यह तहखाना पूरी तरह बंद नहीं है। इसका अर्थ है कि यहाँ दूसरा रास्ता भी है।” रहस्यमयी व्यक्ति ने पहली बार थोड़ा असहज होकर उनकी ओर देखा। बीरबल ने उसकी आँखों की दिशा पर ध्यान दिया और तुरंत समझ गए कि वह किस दीवार की ओर नहीं देखना चाहता। उन्होंने उसी दीवार की ओर इशारा किया। “उधर।” सैनिक आगे बढ़े। एक बड़े पत्थर को हटाया गया तो उसके पीछे एक संकरा मार्ग दिखाई दिया।

रहस्यमयी व्यक्ति ने अचानक कहा, “उस रास्ते में मत जाना।” बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “अब तो अवश्य जाऊँगा।” वह व्यक्ति बोला, “वहाँ कुछ नहीं है।” बीरबल ने उत्तर दिया, “तुम्हारी घबराहट कह रही है कि वहाँ बहुत कुछ है।” दो सैनिक मशाल लेकर सुरंग में आगे बढ़े। कुछ ही दूर जाने पर उन्हें एक छोटा कमरा मिला। कमरे में एक लकड़ी की मेज, कुछ पुराने कागज और दीवार पर टंगा एक नक्शा था। सैनिकों ने नक्शा उतारकर बीरबल के सामने रखा। वह नक्शा देखकर बीरबल लंबे समय तक कुछ नहीं बोले। उस पर केवल एक राज्य की सीमाएँ नहीं थीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के कई राज्यों के बीच व्यापारिक मार्ग, सैन्य चौकियाँ, नदियाँ, पहाड़ी रास्ते और महत्वपूर्ण नगर चिह्नित थे।

अकबर, जो अब तक किले में पहुँच चुके थे, ने नक्शा देखा और पूछा, “बीरबल, यह क्या है?” बीरबल ने कहा, “यह युद्ध का नक्शा नहीं है, जहाँपनाह। यह नियंत्रण का नक्शा है।” अकबर ने पूछा, “अंतर?” बीरबल बोले, “युद्ध में सेनाएँ दिखाई देती हैं। नियंत्रण में रास्ते दिखाई देते हैं। जिसने रास्तों को नियंत्रित कर लिया, वह बिना युद्ध किए भी किसी राज्य की शक्ति को कमजोर कर सकता है।” अकबर ने नक्शे को फिर देखा। कई प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर लाल निशान बने थे। बीरबल ने कहा, “यदि इन रास्तों पर अचानक व्यापार बंद हो जाए, यदि अनाज की आवाजाही रुक जाए, यदि संदेशवाहकों के रास्ते बदल दिए जाएँ और अलग-अलग राज्यों के बीच झूठे संदेश पहुँचाए जाएँ, तो कुछ ही महीनों में राज्यों के बीच अविश्वास पैदा हो सकता है।”

अकबर का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने रहस्यमयी व्यक्ति की ओर देखा और पूछा, “तुम यह सब कर रहे थे?” वह व्यक्ति कुछ क्षण चुप रहा और फिर बोला, “मैं अकेला नहीं था।” बीरबल ने तुरंत पूछा, “कितने लोग?” उसने उत्तर नहीं दिया। अकबर ने सैनिकों को आगे बढ़ने का संकेत दिया। तब वह बोला, “संख्या जानकर क्या करोगे? हर राज्य में कुछ लोग ऐसे हैं जो धन, पद या बदले के लिए अपने ही राज्य के विरुद्ध काम करने को तैयार रहते हैं।” बीरबल ने कहा, “यही तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति है और तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी भी।” वह व्यक्ति बोला, “कैसे?” बीरबल ने कहा, “तुम लोगों की कमजोरियों पर निर्भर हो। इसका अर्थ है कि यदि उनकी कमजोरियाँ बदल जाएँ तो तुम्हारी पूरी योजना टूट जाएगी।”

रहस्यमयी व्यक्ति ने व्यंग्य से कहा, “तुम लोगों को बदल दोगे?” बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “लोगों को बदलना कठिन है, लेकिन उन्हें यह समझाना आसान है कि कोई उनका उपयोग कर रहा है।” यह सुनकर वह व्यक्ति चुप हो गया। अकबर ने बीरबल से कहा, “अब इन संदूकों को खोलना चाहिए।” बीरबल ने सिर हिलाया। पहला संदूक खोला गया। उसमें पुराने पत्र थे। दूसरे में व्यापारिक समझौते। तीसरे में सैनिकों की आवाजाही से संबंधित दस्तावेज। चौथे में अलग-अलग राज्यों के अधिकारियों के नाम और उनके बारे में लिखी गई जानकारी थी। बीरबल एक-एक दस्तावेज देखते गए। धीरे-धीरे उनके चेहरे पर चिंता बढ़ती गई।

एक संदूक में उन्हें कुछ पत्र मिले जिन पर पड़ोसी राज्य की मुहर लगी थी। पत्रों में लिखा था कि कुछ अधिकारियों को गुप्त रूप से धन दिया गया है। दूसरे पत्र में व्यापारियों को एक विशेष मार्ग से माल भेजने के लिए कहा गया था। तीसरे पत्र में एक राजकीय अधिकारी को झूठी खबर फैलाने का आदेश था। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इन पत्रों में कई ऐसे नाम थे जिन्हें बीरबल व्यक्तिगत रूप से जानते थे। उन्होंने अकबर की ओर देखा। “जहाँपनाह, हमें बहुत सावधानी से काम लेना होगा।” अकबर ने पूछा, “क्यों?” बीरबल ने कहा, “क्योंकि यदि हमने केवल नाम देखकर किसी को दोषी मान लिया तो हम उसी जाल में फँस जाएँगे जिसे इन लोगों ने हमारे लिए बनाया है।”

अकबर ने पूछा, “क्या तुम्हें लगता है कि ये सभी पत्र झूठे हो सकते हैं?” बीरबल ने कहा, “कुछ असली हैं, कुछ नकली और कुछ आधे सच। यही इस योजना की असली चाल है।” अकबर ने हैरानी से पूछा, “आधे सच?” बीरबल बोले, “हाँ। यदि किसी अधिकारी ने वास्तव में किसी व्यापारी से मुलाकात की हो और उसे संदिग्ध दिखाने के लिए उसके साथ किसी षड्यंत्रकारी की बातचीत जोड़ दी जाए, तो पूरा दस्तावेज देखने में असली लगेगा। लेकिन उसका अर्थ बदल जाएगा। हमें हर नाम के पीछे की पूरी कहानी जाननी होगी।”

रहस्यमयी व्यक्ति ने कहा, “तुम चाहे जितनी जाँच कर लो, विश्वास टूट चुका है।” बीरबल ने उसकी ओर देखा और कहा, “तुम यही चाहते हो।” वह व्यक्ति बोला, “हाँ।” बीरबल ने कहा, “लेकिन तुम भूल रहे हो कि विश्वास केवल राजाओं और अधिकारियों के बीच नहीं होता। दो साधारण किसान भी एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। दो व्यापारी वर्षों तक साथ व्यापार करते हैं। एक सैनिक अपने साथी पर भरोसा करता है। तुम्हारा जाल बहुत बड़ा है, लेकिन मनुष्य का विश्वास उससे भी बड़ा है।”

अकबर ने कहा, “बीरबल, अब हमें इस व्यक्ति से उसके साथियों के बारे में जानना होगा।” बीरबल ने उत्तर दिया, “वह सब नहीं बताएगा।” अकबर ने पूछा, “तो फिर?” बीरबल ने कहा, “हम उससे उसके बारे में पूछेंगे।” अकबर ने आश्चर्य से कहा, “उससे उसके बारे में?” बीरबल मुस्कुराए। “जहाँपनाह, हर षड्यंत्रकारी अपनी कहानी में स्वयं को नायक मानता है। यदि उसे बोलने दिया जाए तो वह अपनी योजना के बारे में स्वयं बहुत कुछ बता देता है।”

बीरबल उसके सामने जाकर बैठ गए। उन्होंने कहा, “मैं तुम्हारा नाम जानना चाहता हूँ।” वह व्यक्ति चुप रहा। बीरबल ने कहा, “तुम्हें लोग छाया कहते हैं, लेकिन यह तुम्हारा असली नाम नहीं है।” वह कुछ नहीं बोला। बीरबल ने फिर कहा, “तुम किसी बड़े घराने से नहीं हो। यदि होते तो तुम्हारे पास अपने नाम से काम करने की शक्ति होती। तुमने गुप्त रास्ते इसलिए चुने क्योंकि तुम्हारे पास खुले दरबार की शक्ति नहीं थी। तुमने धन और दस्तावेजों का उपयोग इसलिए किया क्योंकि तुम्हारे पास सेना नहीं थी। तुमने लोगों की कमजोरियों का उपयोग इसलिए किया क्योंकि तुम्हारे पास अपना विश्वास बनाने की क्षमता नहीं थी।” उस व्यक्ति ने पहली बार गुस्से से बीरबल की ओर देखा।

बीरबल समझ गए कि वह सही दिशा में हैं। उन्होंने कहा, “तुम्हारा सबसे बड़ा दुःख यह नहीं है कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ। तुम्हारा दुःख यह है कि तुम्हें कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी तुमने इच्छा की थी।” वह व्यक्ति चिल्लाया, “चुप रहो!” बीरबल शांत रहे। “मैं सही कह रहा हूँ।” वह व्यक्ति कुछ देर तक बीरबल को घूरता रहा। फिर उसने कहा, “तुम कुछ नहीं जानते।” बीरबल बोले, “तो मुझे बताओ।” कुछ क्षण बाद वह व्यक्ति बोलने लगा।

उसने बताया कि उसका असली नाम नसीर था। उसके पिता कभी एक छोटे राज्य के मंत्री थे। वर्षों पहले उस राज्य में सत्ता संघर्ष हुआ और उसके पिता को एक झूठे मामले में पद से हटा दिया गया। परिवार गरीबी में चला गया। नसीर ने बचपन से देखा कि जिन लोगों के पास शक्ति थी, वे कानून और सत्य को अपने हिसाब से बदलते थे। धीरे-धीरे उसके मन में यह विश्वास पैदा हुआ कि राज्य और शासन जैसी संस्थाएँ केवल शक्तिशाली लोगों का खेल हैं। उसने वर्षों तक अलग-अलग दरबारों में छोटे पदों पर काम किया, लोगों के व्यवहार को समझा और उनकी कमजोरियाँ नोट कीं। फिर उसने एक योजना बनाई। उसका उद्देश्य केवल किसी एक बादशाह को हटाना नहीं था। वह चाहता था कि कई राज्यों के बीच इतना अविश्वास पैदा हो जाए कि हर राजा अपने पड़ोसी को दुश्मन समझे और हर अधिकारी अपने साथी पर शक करे।

बीरबल ने पूछा, “और तब तुम स्वयं सत्ता में आना चाहते थे?” नसीर ने उत्तर दिया, “सत्ता मेरे लिए अंतिम उद्देश्य नहीं थी। मैं चाहता था कि कोई भी राजा यह दावा न कर सके कि उसका राज्य न्याय पर चलता है।” बीरबल ने कहा, “तो तुमने न्याय के नाम पर अन्याय चुना।” नसीर चुप हो गया। बीरबल ने आगे कहा, “तुम्हारे पिता के साथ अन्याय हुआ। तुम्हारा दुःख वास्तविक है। लेकिन तुमने उस दुःख को इतना बड़ा बना दिया कि उसमें दूसरों का दुःख दिखाई देना बंद हो गया।”

अकबर ने यह सब सुना और कुछ देर बाद बोले, “यदि तुम्हारे पिता के साथ सचमुच अन्याय हुआ था तो तुम्हें न्याय माँगने का अधिकार था।” नसीर ने कटु स्वर में कहा, “न्याय? किससे माँगता? उन्हीं लोगों से जिन्होंने अन्याय किया था?” अकबर ने कहा, “मुझसे।” नसीर ने उनकी ओर देखा। अकबर ने आगे कहा, “हो सकता है कि वर्षों पहले मुझे पूरी सच्चाई न पता हो। लेकिन यदि तुम उस समय मेरे सामने आते तो शायद मैं जाँच करवाता। तुमने अपनी पीड़ा को बदले में बदल दिया और फिर उसी रास्ते पर चल पड़े जिससे तुम्हें घृणा थी।”

नसीर कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है।” बीरबल ने पूछा, “क्यों?” नसीर ने कहा, “क्योंकि मेरे लोग अलग-अलग राज्यों में फैल चुके हैं। मैंने उन्हें ऐसे संदेश दिए हैं जो निश्चित समय पर पहुँचने वाले हैं। यदि वे संदेश रद्द नहीं हुए तो आने वाले दिनों में कई जगह संघर्ष शुरू हो जाएगा।” अकबर ने तुरंत पूछा, “कितने स्थान?” नसीर ने कहा, “मुझे नहीं पता।” बीरबल ने पूछा, “झूठ।” नसीर मुस्कुराया। “तुम्हें कैसे पता?” बीरबल बोले, “क्योंकि जिसने इतनी बड़ी योजना बनाई है, वह कम से कम मुख्य बिंदुओं की जानकारी रखता होगा।”

नसीर ने कुछ नहीं कहा। बीरबल ने फिर संदूकों की ओर देखा। उनमें रखे पत्रों को ध्यान से देखने लगे। अचानक उनकी नजर एक ही तरह के कागज पर पड़ी। सभी महत्वपूर्ण संदेश एक विशेष प्रकार के कागज पर लिखे गए थे। कागज के किनारे पर बहुत हल्का-सा निशान था। बीरबल ने कहा, “यह निशान केवल पहचान के लिए है।” उन्होंने कई पत्रों को एक साथ रखा। निशान अलग-अलग स्थानों पर था। उन्होंने क्रम मिलाया तो उन निशानों से एक पैटर्न बन गया। वह पैटर्न किसी नक्शे जैसा था।

बीरबल ने तुरंत कहा, “ये संदेश अलग-अलग स्थानों के लिए नहीं हैं। इनके निशान एक रास्ता बना रहे हैं।” अकबर ने पूछा, “कहाँ का रास्ता?” बीरबल ने सभी कागजों को क्रम से लगाया। नक्शा धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा। वह राजधानी से शुरू होकर पश्चिम की ओर जाता था और अंत में एक बड़े व्यापारिक नगर पर समाप्त होता था।

नसीर के चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

बीरबल ने उसे देखा और कहा, “यही है अगला स्थान।”

नसीर चुप रहा।

अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि तुरंत उस व्यापारिक नगर के लिए संदेश भेजा जाए। लेकिन बीरबल ने उन्हें रोकते हुए कहा, “नहीं। यदि हमने अभी संदेश भेजा तो वहाँ मौजूद लोग सावधान हो जाएँगे। हमें यह दिखाना होगा कि हमें कुछ पता नहीं चला।”

अकबर ने पूछा, “फिर क्या करें?”

बीरबल ने कहा, “हम एक नकली संदेश भेजेंगे।”

नसीर अचानक चौंक गया।

बीरबल मुस्कुराए।

और उस संदेश में हम वही लिखेंगे जिसका इंतजार तुम्हारे लोग कर रहे हैं।”

नसीर ने पहली बार घबराकर कहा, “तुम ऐसा नहीं कर सकते।”

बीरबल ने उत्तर दिया, “क्यों नहीं?”

नसीर बोला, “यदि तुमने गलत संदेश भेजा तो निर्दोष लोग फँस सकते हैं।”

बीरबल ने कहा, “इसीलिए संदेश ऐसा होगा कि कोई निर्दोष व्यक्ति उससे प्रभावित न हो, लेकिन तुम्हारे लोग उसे देखकर अपनी अगली चाल चलने पर मजबूर हो जाएँ।”

अकबर ने बीरबल की योजना सुनी और सहमति दी। उसी रात एक गुप्त संदेश तैयार किया गया। उसमें लिखा था कि राजकीय दस्तावेज सुरक्षित कर लिए गए हैं और अब उन्हें एक विशेष स्थान पर भेजा जाएगा। संदेश जानबूझकर ऐसे रास्ते से भेजा गया जिसे नसीर के लोग अवश्य पकड़ते। बीरबल जानते थे कि असली उद्देश्य संदेश पहुँचाना नहीं, बल्कि यह देखना है कि उसे कौन प्राप्त करता है।

तीन दिन बाद खबर आई कि संदेश एक व्यापारी के हाथ लगा था। व्यापारी को गिरफ्तार नहीं किया गया। उसकी गतिविधियों पर नजर रखी गई। वह एक सराय में गया, वहाँ उसने एक व्यक्ति से मुलाकात की और उसे एक छोटी पर्ची दी। वह व्यक्ति आगे एक अन्य व्यापारी से मिला। इस तरह संदेश तीन हाथों से होकर एक पुराने डाक मार्ग तक पहुँचा।

बीरबल ने कहा, “अब हमें अंतिम कड़ी मिल गई।”

लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना हुई। रात में महल के भीतर से खबर आई कि रहमान गायब हो गया है।

अकबर चिंतित हो उठे। “वह कहाँ गया?”

सैनिकों ने बताया कि रहमान अपने कमरे से स्वयं बाहर निकला था। उसे किसी ने जबरन नहीं ले जाया। उसके कमरे में केवल एक पत्र मिला था।

बीरबल ने पत्र खोला।

उसमें लिखा था—

जिस सत्य की तुम तलाश कर रहे हो, उसका अंतिम हिस्सा मेरे पास है। यदि तुम्हें अपने पिता के बारे में पूरी सच्चाई जाननी है तो अकेले पुराने पुल पर आओ।”

अकबर ने कहा, “यह नसीर का काम है।”

बीरबल ने पत्र को ध्यान से देखा। फिर बोले, “नहीं।”

अकबर ने पूछा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

बीरबल ने कहा, “क्योंकि नसीर चाहता है कि हम उसे पकड़ने जाएँ। यह पत्र हमें किसी और दिशा में ले जा रहा है।”

अकबर ने पूछा, “तो रहमान को किसने बुलाया?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “शायद वही व्यक्ति जिसने वर्षों पहले उसके पिता के साथ विश्वासघात किया था।”

अकबर स्तब्ध रह गए।

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, हमें लगा था कि नसीर इस कहानी का अंतिम अपराधी है। लेकिन अब मुझे लगता है कि वह स्वयं भी किसी पुराने खेल का मोहरा रहा है।”

अकबर ने गंभीर स्वर में पूछा, “तो असली लेखक कौन है?”

बीरबल ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उन्होंने केवल वह पुरानी पुस्तक खोली, जिसके अंतिम पन्ने पर लिखा था कि असली लेखक अभी सामने नहीं आया।

उस पन्ने को उन्होंने फिर से देखा।

और इस बार उन्हें एक बहुत छोटा-सा निशान दिखाई दिया जो पहले उनकी नजर से छूट गया था।

बीरबल ने निशान को देखते ही कहा, “अब समझ आया।”

अकबर ने पूछा, “क्या?”

बीरबल ने धीमे स्वर में कहा, “नसीर ने हमें जितना दिखाया, वह केवल आधी कहानी थी। असली कहानी उससे भी बहुत पहले शुरू हुई थी।”

उसी समय महल के बाहर घोड़े की तेज आवाज सुनाई दी।

एक सैनिक दौड़ता हुआ अंदर आया और बोला, “जहाँपनाह! पुराने पुल के पास रहमान मिला है।”

अकबर ने पूछा, “जीवित है?”

सैनिक ने सिर झुकाकर कहा, “जी, लेकिन वह अकेला नहीं था।”

बीरबल ने तुरंत पूछा, “उसके साथ कौन था?”

सैनिक कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने कहा—

एक बूढ़ा आदमी।”

बीरबल ने पूछा, “उसने अपना नाम बताया?”

सैनिक ने कहा—

जी। उसने कहा कि वह रहमान के पिता का पुराना मित्र है।”

बीरबल की आँखों में गंभीरता उतर आई।

क्योंकि जिस नाम का उल्लेख सैनिक ने अगली पंक्ति में किया, वह नाम पच्चीस वर्ष पुराने उसी राजकीय षड्यंत्र से जुड़ा था जिसे बीरबल अब तक मृत मान रहे थे।

और तभी बीरबल समझ गए कि असली खेल अब शुरू हुआ था।

पुराने पुल के पास खड़े उस बूढ़े व्यक्ति को देखकर बीरबल कुछ क्षण तक शांत रहे। रहमान उसके पास खड़ा था और उसके चेहरे पर वर्षों की पीड़ा के साथ-साथ एक अजीब-सी राहत भी दिखाई दे रही थी। अकबर भी सैनिकों के साथ वहाँ पहुँच चुके थे। बूढ़े व्यक्ति ने बादशाह को देखा तो उसने झुककर प्रणाम किया। उसके चेहरे पर उम्र की गहरी रेखाएँ थीं, लेकिन आँखों में असाधारण आत्मविश्वास था। अकबर ने उसे ध्यान से देखा और अचानक उनकी आँखों में पहचान की चमक उभरी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “तुम... क्या यह संभव है?” बूढ़े व्यक्ति ने उत्तर दिया, “हाँ, जहाँपनाह। मैं वही हूँ जिसे आप पच्चीस वर्ष पहले अपना मित्र समझते थे और फिर मृत मान बैठे थे।”

रहमान ने आश्चर्य से बूढ़े व्यक्ति की ओर देखा। “आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया कि आप जीवित हैं?” बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “क्योंकि तुम्हें मेरी जरूरत नहीं थी, रहमान। तुम्हें अपने पिता का सच चाहिए था, और उस सच तक पहुँचने के लिए तुम्हें पहले अपने भीतर के बदले को खत्म करना था।” बीरबल ने तुरंत पूछा, “तुम्हारा नाम?” बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरा नाम देवदत्त है।” अकबर ने गहरी साँस ली। उन्हें वर्षों पुरानी घटनाएँ याद आने लगीं। देवदत्त कभी राजकीय सलाहकारों में से एक थे और उन्हें बेहद बुद्धिमान माना जाता था। लेकिन एक दिन अचानक उनकी मृत्यु की खबर आई थी। उनके शरीर की पहचान भी कराई गई थी, इसलिए किसी ने कभी संदेह नहीं किया कि वे जीवित हो सकते हैं।

बीरबल ने पूछा, “तुमने अपनी मृत्यु का नाटक क्यों किया?” देवदत्त ने कहा, “क्योंकि जिस षड्यंत्र की शुरुआत मैंने देखी थी, उसमें कई ऐसे लोग शामिल थे जिनकी शक्ति दरबार से बाहर तक फैली हुई थी। यदि मैं जीवित रहता तो मुझे मार दिया जाता और मेरे साथ वे प्रमाण भी नष्ट हो जाते जो मेरे पास थे। इसलिए मैंने अपनी मृत्यु का नाटक किया और वर्षों तक छिपकर उन लोगों की गतिविधियों पर नजर रखता रहा।” अकबर ने कठोर स्वर में पूछा, “तो क्या नसीर तुम्हारा आदमी था?” देवदत्त ने सिर हिलाया। “हाँ और नहीं। मैंने उसे बचपन में देखा था। उसके पिता के साथ हुए अन्याय को भी जानता था। लेकिन बाद में नसीर अपने बदले में इतना डूब गया कि वह स्वयं एक खतरनाक व्यक्ति बन गया। मैंने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन तब तक वह अपने चारों ओर ऐसे लोगों का जाल बना चुका था जिनका उद्देश्य केवल सत्ता और धन था।”

बीरबल ने कहा, “तो तुमने हमें यह सब पहले क्यों नहीं बताया?” देवदत्त ने उत्तर दिया, “क्योंकि यदि मैं सामने आता तो मेरे पीछे छिपे लोग भी सामने नहीं आते। मुझे ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उनकी योजना को समझ सके, लेकिन स्वयं उनके जाल का हिस्सा न बने। तभी मैंने तुम्हारे बारे में सुना, बीरबल। मैंने देखा कि तुम लोगों के शब्दों से अधिक उनके व्यवहार को पढ़ते हो। इसलिए मैंने तुम्हें संकेत दिए।” बीरबल कुछ क्षण उसे देखते रहे और बोले, “तो रहस्यमयी संदूक, नक्शा, नकली दस्तावेज और वह पुस्तक—इन सबके पीछे तुम थे?” देवदत्त ने कहा, “कुछ के पीछे मैं था, लेकिन सबके पीछे नहीं। नसीर ने अपनी योजना खुद बनाई थी। मैं केवल इतना चाहता था कि उसकी योजना तुम्हारे सामने धीरे-धीरे खुलती जाए।”

अकबर ने पूछा, “लेकिन तुम्हारे पास मेरे पुराने मित्र के बारे में प्रमाण था?” देवदत्त ने कहा, “हाँ। आपके पुराने मित्र पर लगाया गया आरोप झूठा था। असली दस्तावेज मेरे पास थे। मैंने वर्षों तक उन्हें सुरक्षित रखा। लेकिन उन्हें सामने लाने का सही समय नहीं आया था।” रहमान की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा, “तो मेरे पिता सचमुच निर्दोष थे?” देवदत्त ने कहा, “हाँ। तुम्हारे पिता ने राज्य से विश्वासघात नहीं किया था। उन्होंने जिस षड्यंत्र को रोकने की कोशिश की थी, उसी के कारण उन्हें फँसाया गया।”

रहमान घुटनों के बल बैठ गया। वर्षों से उसके मन में जमा हुआ बोझ जैसे अचानक टूट गया। उसने आकाश की ओर देखा और कहा, “अब मैं अपने पिता को अपराधी समझकर नहीं जिऊँगा।” बीरबल ने उसकी ओर देखा और कहा, “यही तुम्हारे पिता के लिए सबसे बड़ा न्याय है।” अकबर भी कुछ देर तक मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “रहमान, तुम्हारे पिता के साथ जो हुआ वह मेरे शासन की एक भूल थी। मैं उसे बदल नहीं सकता, लेकिन उनके नाम पर लगा कलंक अवश्य मिटा सकता हूँ।”

तभी देवदत्त ने बीरबल की ओर एक छोटा लकड़ी का संदूक बढ़ाया। उसने कहा, “इसमें वह आखिरी प्रमाण है जिसे मैंने इतने वर्षों तक छिपाकर रखा।” बीरबल ने संदूक खोला। उसमें एक पुराना पत्र था, जिस पर वही शाही मुहर लगी थी जिसे लेकर पूरा रहस्य शुरू हुआ था। बीरबल ने पत्र पढ़ा और कुछ देर तक उसे ध्यान से देखते रहे। फिर उन्होंने कहा, “यह वही दस्तावेज है जिसने पच्चीस वर्ष पहले पूरी घटना की दिशा बदल दी थी।” अकबर ने पत्र लिया और पढ़ा। उसमें स्पष्ट लिखा था कि उस समय के कुछ उच्च अधिकारियों ने मिलकर एक निर्दोष व्यक्ति को गद्दार साबित करने के लिए दस्तावेज बदले थे। सबसे नीचे उन लोगों के नाम थे जिन्होंने उस योजना में भाग लिया था।

अकबर ने नाम पढ़े तो उनके चेहरे पर गंभीरता छा गई। उनमें से अधिकांश लोग अब जीवित नहीं थे, लेकिन एक नाम ऐसा था जिसे देखकर वे अचानक रुक गए। वह नाम एक ऐसे परिवार से जुड़ा था जो आज भी राज्य के सबसे सम्मानित परिवारों में गिना जाता था। अकबर ने कहा, “यह व्यक्ति तो आज भी हमारे दरबार में सम्मानित है।” बीरबल ने तुरंत कहा, “जहाँपनाह, यहीं सबसे बड़ा खतरा है। हो सकता है कि वह स्वयं दोषी न हो। हमें केवल नाम देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए।” देवदत्त ने कहा, “यही कारण है कि मैंने वर्षों तक यह प्रमाण छिपाकर रखा। इस नाम के पीछे एक और कहानी है।”

बीरबल ने पूछा, “कौन-सी?” देवदत्त ने बताया कि उस व्यक्ति के पिता ने षड्यंत्र में हिस्सा लिया था, लेकिन बाद में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रमाण इकट्ठे किए थे और उन्हें एक गुप्त स्थान पर रख दिया था। लेकिन उन प्रमाणों तक पहुँचने के लिए एक विशेष संकेत की आवश्यकता थी। वही संकेत उस पुस्तक में छिपा था जिसे बीरबल ने संदूक से पाया था। बीरबल ने पुस्तक फिर से खोली। उसने अंतिम पृष्ठ को ध्यान से देखा और वह छोटा निशान खोजा जो पहले उनकी नजर से बच गया था। उन्होंने निशान को उँगली से छुआ और कहा, “यह कोई सजावट नहीं है। यह स्थान का संकेत है।”

देवदत्त ने मुस्कुराकर कहा, “अब तुम समझ गए।” बीरबल ने कहा, “पुराने शाही महल के पीछे वह बंद मंदिर।” देवदत्त ने सिर हिलाया। “वहीं।” अकबर ने तुरंत सैनिकों को तैयार होने का आदेश दिया। लेकिन बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, हमें बड़ी सेना लेकर नहीं जाना चाहिए। यदि वहाँ कोई व्यक्ति अभी भी निगरानी कर रहा है तो उसे खबर हो जाएगी।” अकबर ने कहा, “तो कितने लोग?” बीरबल ने उत्तर दिया, “केवल हम, कुछ विश्वसनीय सैनिक और रहमान।”

कुछ समय बाद वे पुराने मंदिर के पास पहुँचे। मंदिर वर्षों से बंद था। उसके चारों ओर झाड़ियाँ उगी थीं और पत्थरों पर काई जम चुकी थी। बीरबल ने पुस्तक में बने संकेत को मंदिर की दीवार से मिलाया। एक पत्थर पर वही निशान दिखाई दिया। उन्होंने पत्थर दबाया तो दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुल गया। अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं। अकबर ने मशाल जलाई और सभी लोग नीचे उतरने लगे।

सीढ़ियाँ उन्हें एक छोटे भूमिगत कक्ष में ले गईं। वहाँ पत्थर की दीवार के सामने लोहे का एक संदूक रखा था। संदूक पर कोई ताला नहीं था। बीरबल ने उसे खोला। उसमें कई पुराने पत्र, राजकीय मुहरों की प्रतियाँ, व्यापारिक खातों के विवरण और कुछ ऐसे प्रमाण थे जो वर्षों पुराने षड्यंत्र की पूरी कहानी बताते थे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चीज एक डायरी थी। डायरी उसी व्यक्ति की थी जिसने मूल षड्यंत्र की योजना बनाई थी।

बीरबल ने पहला पन्ना पढ़ा और धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि पच्चीस वर्ष पहले क्या हुआ था। उस समय कुछ शक्तिशाली व्यापारी और अधिकारी चाहते थे कि विभिन्न राज्यों के बीच व्यापारिक मार्गों पर उनका नियंत्रण हो। उन्होंने राजकीय अधिकारियों को रिश्वत दी, झूठे दस्तावेज बनाए और एक ईमानदार अधिकारी पर गद्दारी का आरोप लगवा दिया। बाद में उन्होंने उसकी प्रतिष्ठा का उपयोग करके उसके परिवार को भी कमजोर किया। नसीर के पिता उसी षड्यंत्र का शिकार बने थे। वर्षों बाद नसीर ने इस अन्याय का बदला लेने के लिए उसी जाल को और बड़ा बना दिया। वह नहीं जानता था कि जिस व्यवस्था से वह बदला लेना चाहता है, उसके भीतर कुछ लोग पहले ही उस षड्यंत्र का सच खोजने में लगे हुए थे।

अकबर ने डायरी पढ़कर कहा, “तो यह सब लालच से शुरू हुआ था।” बीरबल ने कहा, “हाँ। बदला बाद में जुड़ा। पहले लालच था, फिर डर आया, फिर झूठ और अंत में बदला।” देवदत्त ने कहा, “और यही हर बड़े षड्यंत्र की कहानी होती है। शुरुआत छोटी होती है, लेकिन जब लोग अपनी गलतियों को छिपाने लगते हैं तो उन्हें बचाने के लिए नई गलतियाँ करनी पड़ती हैं।”

अचानक ऊपर से घोड़े की आवाज सुनाई दी। सभी सतर्क हो गए। किसी ने मंदिर का दरवाजा खोला था। बीरबल ने सैनिकों को संकेत किया कि मशालें बुझा दें। कुछ ही क्षण बाद नीचे कदमों की आवाज आने लगी। कोई सीढ़ियों से उतर रहा था। एक व्यक्ति धीरे-धीरे कक्ष में आया। उसके हाथ में तलवार थी। वह चारों ओर देखने लगा। फिर उसकी नजर खुले हुए संदूक पर पड़ी। उसने तुरंत तलवार उठा ली।

बीरबल ने अंधेरे से कहा, “तुम देर से आए।”

वह व्यक्ति चौंक गया। सैनिकों ने उसे घेर लिया। उसने भागने की कोशिश की लेकिन पकड़ा गया। जब उसके चेहरे से कपड़ा हटाया गया तो अकबर उसे पहचान गए। वह दरबार का एक वरिष्ठ अधिकारी था, जिस पर कभी किसी ने संदेह नहीं किया था। उसने कहा, “मुझे मजबूर किया गया था।” बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “यह वही वाक्य है जो हर अपराधी पहली बार पकड़े जाने पर कहता है।” अधिकारी ने कहा, “तुम नहीं समझते। यदि मैं उनकी बात नहीं मानता तो मेरा परिवार खतरे में पड़ जाता।” बीरबल ने कहा, “शायद। लेकिन तुमने वर्षों तक उनके लिए काम किया। एक दिन का डर और वर्षों की लालच में अंतर होता है।”

अधिकारी चुप हो गया। उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे। उसने स्वीकार किया कि वह नसीर के नेटवर्क का हिस्सा था और उसे आदेश दिया गया था कि यदि पुराने प्रमाण मिल जाएँ तो उन्हें नष्ट कर दे। उसने यह भी बताया कि नसीर के कई साथी अलग-अलग राज्यों में छिपे थे, लेकिन अब उनके पास कोई स्पष्ट आदेश नहीं था। नसीर की गिरफ्तारी के बाद उनका पूरा नेटवर्क कमजोर हो चुका था।

कुछ सप्ताह बाद अकबर ने विशेष दरबार बुलाया। उस दरबार में पुराने मामले की पूरी जाँच का परिणाम प्रस्तुत किया गया। जिन लोगों पर वर्षों पहले झूठे आरोप लगाए गए थे, उनके नाम सार्वजनिक रूप से साफ किए गए। रहमान के पिता का नाम भी सम्मान के साथ पुनः राजकीय अभिलेखों में दर्ज किया गया। अकबर ने घोषणा की कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति को केवल एक दस्तावेज या किसी एक अधिकारी की गवाही के आधार पर देशद्रोही घोषित नहीं किया जाएगा। किसी भी गंभीर आरोप की स्वतंत्र जाँच होगी।

रहमान ने दरबार के सामने कहा, “आज मेरे पिता का सम्मान लौट आया। लेकिन मैं यह भी समझ गया हूँ कि बदला किसी मृत व्यक्ति को वापस नहीं ला सकता। यदि मैंने अपनी योजना पूरी कर दी होती तो न जाने कितने निर्दोष लोग मारे जाते। मैं अपने पिता की याद में अब न्याय के लिए काम करना चाहता हूँ, बदले के लिए नहीं।” बीरबल ने उसकी बात सुनकर मुस्कुराया।

अकबर ने बीरबल की ओर देखा और कहा, “इस पूरी घटना में सबसे बड़ी जीत किसकी हुई?” बीरबल ने कहा, “न तो मेरी, न आपकी।” अकबर ने पूछा, “तो किसकी?” बीरबल ने उत्तर दिया, “सत्य की। क्योंकि हमने देखा कि झूठ ने कितने रास्ते बनाए, कितने लोगों को अपने साथ जोड़ा, कितने दस्तावेज बदले और कितने वर्षों तक स्वयं को छिपाया। लेकिन अंत में उसे अपने ही बनाए जाल में फँसना पड़ा।”

अकबर मुस्कुराए और बोले, “और सबसे बड़ा खजाना?” बीरबल ने कहा, “वही जो हमने शुरुआत में खोजा था।” अकबर ने पूछा, “सोना?” बीरबल हँसे। “नहीं जहाँपनाह। ज्ञान।” अकबर ने कहा, “और ज्ञान का सबसे बड़ा उपयोग?” बीरबल ने उत्तर दिया, “सही समय पर सही प्रश्न पूछना।”

दरबार में बैठे सभी लोग मुस्कुराने लगे। लेकिन बीरबल ने अपनी बात आगे बढ़ाई और कहा, “जहाँपनाह, इस पूरी घटना से एक और शिक्षा मिलती है। किसी राज्य की ताकत उसकी सेना, खजाने या ऊँची दीवारों में ही नहीं होती। असली ताकत उसके लोगों के विश्वास में होती है। यदि शासक अपने लोगों की बात सुनता है, यदि न्याय निष्पक्ष होता है और यदि सत्य को छिपाया नहीं जाता, तो कोई भी षड्यंत्र लंबे समय तक सफल नहीं हो सकता।”

अकबर ने सिर हिलाया। “तुम सही कहते हो, बीरबल। राजा का सबसे बड़ा हथियार तलवार नहीं, विश्वास है।”

बीरबल मुस्कुराए। “और उस विश्वास की रक्षा करने के लिए राजा को सबसे पहले स्वयं सत्य के सामने झुकना पड़ता है।”

उस दिन के बाद पुराने राजकीय अभिलेखों की व्यवस्था बदल दी गई। महत्वपूर्ण दस्तावेजों की कई प्रतियाँ बनाई गईं, अलग-अलग अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई और किसी एक व्यक्ति को इतनी शक्ति नहीं दी गई कि वह अकेले इतिहास बदल सके। मीर कासिम को उसके अपराधों के अनुसार दंड मिला, लेकिन उसकी स्वीकारोक्ति और सहयोग को भी ध्यान में रखा गया। रहमान को अपने पिता की प्रतिष्ठा लौटने के बाद दरबार में एक जिम्मेदारी दी गई, जहाँ वह पुराने मामलों की जाँच में सहायता करने लगा। देवदत्त ने वर्षों की गुमनामी के बाद अपने जीवन के अंतिम दिन शांति से बिताने का निर्णय लिया। नसीर को कठोर दंड मिला, लेकिन अकबर ने उसके पिता के मामले की भी स्वतंत्र जाँच करवाकर यह सुनिश्चित किया कि नसीर का दुख वास्तविक था, भले ही उसके द्वारा चुना गया रास्ता गलत था।

एक शाम अकबर और बीरबल महल की छत पर बैठे सूर्यास्त देख रहे थे। अकबर ने कहा, “बीरबल, यदि उस दिन तुमने संदूक को खोलने में जल्दबाजी की होती तो शायद हम इस रहस्य तक कभी नहीं पहुँचते।” बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “और यदि आपने मुझ पर भरोसा न किया होता तो शायद मैं भी कुछ नहीं कर पाता।” अकबर ने हँसते हुए कहा, “तो इस बार जीत हमारी साझी हुई।” बीरबल ने उत्तर दिया, “नहीं जहाँपनाह, इस बार जीत उन सभी लोगों की हुई जिन्होंने झूठ के बजाय सत्य पर विश्वास किया।”

सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे छिप रहा था। महल की दीवारों पर सुनहरी रोशनी पड़ रही थी। दूर शहर में लोग अपने घरों को लौट रहे थे। किसी को शायद पता भी नहीं था कि पिछले कई सप्ताहों में उनके राज्य पर कितना बड़ा संकट मंडरा रहा था। लेकिन अब वह संकट समाप्त हो चुका था। एक पुराना षड्यंत्र उजागर हो चुका था, निर्दोष लोगों का सम्मान लौट चुका था और कई राज्यों के बीच युद्ध भड़काने की योजना विफल हो चुकी थी।

अकबर ने आखिरी बार बीरबल से पूछा, “तो बताओ, इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक क्या है?”

बीरबल ने कुछ क्षण आकाश की ओर देखा और कहा, “जहाँपनाह, सबसे बड़ा सबक यह है कि बुद्धि केवल कठिन प्रश्न का उत्तर देने का नाम नहीं है। बुद्धि यह पहचानने का नाम है कि सही प्रश्न कौन-सा है। और न्याय केवल अपराधी को दंड देने का नाम नहीं है। न्याय उस सत्य को खोजने का नाम है जो वर्षों से झूठ के नीचे दबा हुआ हो।

अकबर ने संतोष से सिर हिलाया।

उस दिन के बाद दरबार में जब भी कोई कठिन मामला आता, अकबर अक्सर मुस्कुराकर कहते, “बीरबल को बुलाओ।”

और बीरबल हमेशा की तरह शांत होकर दरबार में आते, समस्या को ध्यान से सुनते और फिर कहते, “जहाँपनाह, उत्तर देने से पहले यह देखना होगा कि असली प्रश्न क्या है।”

यही उनकी बुद्धि की असली पहचान थी।

और इसी कारण अकबर-बीरबल की यह कहानी वर्षों तक लोगों के बीच सुनाई जाती रही—एक ऐसी कहानी जिसमें तलवार से अधिक ताकत बुद्धि की थी, बदले से अधिक ताकत न्याय की थी और सबसे बड़े षड्यंत्र के सामने भी अंततः सत्य की जीत हुई।

कई महीने बीत चुके थे, लेकिन उस बड़े षड्यंत्र की याद अभी भी अकबर के दरबार में ताजा थी। राज्य में शांति लौट आई थी, व्यापारिक मार्ग फिर से खुल गए थे और जिन अधिकारियों पर झूठे आरोप लगे थे, उनके मामलों की दोबारा जाँच चल रही थी। रहमान अब राजकीय अभिलेखों की देखरेख में बीरबल की सहायता करता था। उसने अपने जीवन में पहली बार महसूस किया था कि बदले के बिना भी मनुष्य अपने अतीत का सामना कर सकता है। देवदत्त महल से दूर एक शांत स्थान पर रहने लगे थे। नसीर को उसके अपराधों के लिए दंड दिया गया था, लेकिन उसके पिता के मामले की सच्चाई भी राजकीय अभिलेखों में दर्ज कर दी गई थी। ऐसा लग रहा था कि सब कुछ समाप्त हो चुका है।

लेकिन एक सुबह अकबर के दरबार में एक अजीब घटना हुई। दरबार शुरू होने से कुछ समय पहले महल के मुख्य द्वार पर एक बूढ़ा फकीर आया। उसके हाथ में लकड़ी की एक छोटी पेटी थी। पहरेदारों ने उसे रोककर पूछा कि वह किससे मिलना चाहता है। फकीर ने कहा, “मैं बादशाह अकबर से मिलना चाहता हूँ।” पहरेदारों ने पूछा, “किस काम से?” फकीर ने उत्तर दिया, “मैं उनके लिए एक ऐसी चीज लाया हूँ जिसे देखकर शायद उन्हें अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री पर भी संदेह हो जाए।” यह बात सुनकर पहरेदारों ने उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। लेकिन फकीर ने पेटी जमीन पर रख दी और कहा, “इसे बादशाह तक पहुँचा देना। वह स्वयं समझ जाएँगे कि इसे किसने भेजा है।”

पेटी दरबार में पहुँची। अकबर ने उसे देखा और बीरबल को बुलाया। बीरबल ने पेटी को ध्यान से देखा। उस पर कोई ताला नहीं था, लेकिन ढक्कन पर एक छोटा-सा निशान बना था। बीरबल उस निशान को देखते ही गंभीर हो गए। उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, यह निशान मैंने पहले भी देखा है।” अकबर ने पूछा, “कहाँ?” बीरबल बोले, “देवदत्त की पुरानी डायरी में।” अकबर ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि देवदत्त को बुलाया जाए।

कुछ समय बाद देवदत्त दरबार में आए। उन्होंने पेटी को देखा और उनके चेहरे का रंग बदल गया। अकबर ने पूछा, “तुम इसे पहचानते हो?” देवदत्त ने कहा, “हाँ।” अकबर ने कहा, “किसका है?” देवदत्त ने उत्तर दिया, “यह उस व्यक्ति की निशानी है जिसके बारे में मैंने आपको कभी नहीं बताया।” दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर ने पूछा, “कौन व्यक्ति?” देवदत्त ने कहा, “वह व्यक्ति जिसने पच्चीस वर्ष पहले पूरे षड्यंत्र की पहली योजना बनाई थी।”

बीरबल ने तुरंत कहा, “लेकिन तुमने कहा था कि उस व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है।” देवदत्त ने धीरे से उत्तर दिया, “मैंने कहा था कि वह मर चुका है। लेकिन मैंने यह नहीं कहा था कि मुझे उसकी मृत्यु अपनी आँखों से देखने का अवसर मिला था।”

अकबर ने पेटी की ओर देखा। बीरबल ने कहा, “हमें इसे खोलना होगा।” देवदत्त ने उन्हें रोकते हुए कहा, “सावधानी से। इसमें जो है वह केवल कोई दस्तावेज नहीं है।” बीरबल ने पूछा, “तो क्या है?” देवदत्त ने कहा, “एक परीक्षा।”

बीरबल ने पेटी खोली। उसमें केवल एक कागज रखा था। कागज पर लिखा था, “यदि तुम इस पत्र को पढ़ रहे हो तो समझो कि मैंने तुम्हें अपनी सबसे कठिन पहेली दे दी है। इस पहेली का उत्तर तुम्हारे सामने नहीं, तुम्हारे आसपास है। यदि तुमने गलत व्यक्ति पर विश्वास किया तो राज्य को भारी नुकसान होगा। यदि तुमने सही व्यक्ति पर संदेह किया तो भी नुकसान होगा। तुम्हारे पास केवल एक दिन है।”

अकबर ने पत्र पढ़कर कहा, “यह कौन-सी पहेली है?” बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, असली पहेली पत्र में नहीं है। असली पहेली यह है कि जिसने यह पत्र भेजा है, वह चाहता क्या है।”

अकबर ने पूछा, “क्या तुम्हें किसी पर संदेह है?” बीरबल ने कहा, “अभी नहीं।” अकबर ने कहा, “लेकिन पत्र में साफ लिखा है कि हमारे आसपास कोई व्यक्ति है।” बीरबल ने उत्तर दिया, “इसीलिए मैं अभी किसी पर संदेह नहीं करूँगा।”

उसी दिन बीरबल ने महल में किसी प्रकार की अतिरिक्त सुरक्षा नहीं लगवाई। उन्होंने किसी अधिकारी को गिरफ्तार नहीं किया और न ही किसी से पूछताछ की। इसके बजाय उन्होंने दरबार की सामान्य व्यवस्था जारी रखी। लेकिन उन्होंने एक छोटा परिवर्तन किया। उन्होंने सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने का आदेश दिया, जबकि वास्तविक दस्तावेज सुरक्षित स्थान पर ही रखे गए। फिर उन्होंने तीन अलग-अलग लोगों को तीन अलग-अलग झूठी सूचनाएँ दीं। पहले व्यक्ति से कहा गया कि राजकीय खजाने का निरीक्षण अगले दिन होगा। दूसरे से कहा गया कि पुराने युद्ध संबंधी दस्तावेज नए अभिलेखागार में रखे जाएँगे। तीसरे से कहा गया कि बादशाह अगले सप्ताह राजधानी से बाहर जाने वाले हैं।

बीरबल जानते थे कि यदि महल में कोई गुप्त व्यक्ति है तो वह इनमें से किसी न किसी सूचना का उपयोग करेगा। शाम तक कुछ भी असामान्य नहीं हुआ। रात हुई। फिर भी कोई घटना नहीं हुई। अकबर ने पूछा, “क्या तुम्हारी योजना असफल रही?” बीरबल ने कहा, “नहीं। कभी-कभी सबसे महत्वपूर्ण बात वह होती है जो नहीं होती।”

आधी रात के बाद एक सैनिक ने खबर दी कि महल के पुराने अभिलेखागार के पास एक दीपक जलता हुआ मिला है। बीरबल तुरंत वहाँ पहुँचे। दीपक के पास जमीन पर एक छोटा कपड़े का टुकड़ा पड़ा था। बीरबल ने उसे उठाया और देखा कि उस पर वही निशान बना था जो पेटी पर था। उन्होंने कहा, “अब हमें रास्ता मिल गया।”

उन्होंने सैनिकों से कहा कि किसी को गिरफ्तार न किया जाए। फिर वह अकेले अभिलेखागार के पीछे बने छोटे कमरे में गए। वहाँ उन्हें एक आदमी मिला। वह महल का पुराना रसोइया था। बीरबल ने उसे देखकर कहा, “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” रसोइया घबरा गया और बोला, “मैं... मैं बस दीपक देखने आया था।” बीरबल ने कहा, “रात के इस समय?” वह चुप हो गया।

बीरबल ने उससे कोई कठोर प्रश्न नहीं पूछा। उन्होंने केवल कहा, “तुम्हें जिसने भेजा है, उसने तुम्हें क्या वादा किया?” रसोइया अचानक रोने लगा। उसने कहा, “मेरी बेटी बीमार है। मुझे बहुत धन चाहिए था। एक व्यक्ति ने कहा कि यदि मैं महल से कुछ कागज बाहर पहुँचा दूँ तो वह मेरी मदद करेगा।” बीरबल ने पूछा, “वह व्यक्ति कौन था?” रसोइया बोला, “मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। वह हमेशा चेहरा ढककर आता था।”

बीरबल ने पूछा, “और आज उसने तुम्हें क्या लेने को कहा था?” रसोइए ने एक छोटा पत्र निकाला। बीरबल ने उसे पढ़ा और मुस्कुराए। पत्र में लिखा था कि राजकीय खजाने का निरीक्षण अगले दिन होगा और उससे पहले कुछ दस्तावेज बाहर निकालने हैं।

बीरबल ने कहा, “तो पहली सूचना गलत नहीं थी। लेकिन यह सूचना मैंने केवल तुम्हें दी थी।”

रसोइया घबरा गया।

बीरबल ने कहा, “इसका अर्थ है कि तुम उस व्यक्ति तक सीधे संदेश पहुँचाते हो।”

रसोइया ने सिर झुका लिया।

बीरबल ने उसे दंड देने के बजाय कहा, “यदि तुम सच बताओगे तो तुम्हारी बेटी की सहायता की जाएगी। लेकिन यदि तुम झूठ बोलोगे तो तुम्हें यह अवसर नहीं मिलेगा।”

रसोइया रोते हुए बोला, “मैं सच बताऊँगा।”

उसने बताया कि वह व्यक्ति पिछले कई महीनों से महल में अलग-अलग लोगों को धन देकर छोटी-छोटी सूचनाएँ प्राप्त करता था। वह कभी स्वयं महल के पास नहीं आता था। उसके संदेश एक विशेष स्थान पर रखे जाते थे और वहाँ से अलग-अलग लोग उन्हें लेकर जाते थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि संदेश हमेशा एक ही भाषा में नहीं लिखे जाते थे। कभी वे व्यापारिक आदेश की तरह होते, कभी धार्मिक संदेश की तरह और कभी सामान्य निजी पत्र की तरह।

बीरबल ने पूछा, “तुम उसे कहाँ संदेश देते थे?”

रसोइए ने कहा, “पुराने कुएँ के पास।”

बीरबल तुरंत समझ गए कि वही पुराना कुआँ इस पूरे नेटवर्क की अंतिम कड़ी हो सकता है।

अगली सुबह बीरबल ने वहाँ जाल बिछाया। लेकिन इस बार उन्होंने कोई सैनिक दिखाई देने वाली जगह पर नहीं रखा। वे स्वयं साधारण व्यापारी के वेश में वहाँ बैठ गए। कुछ घंटे बाद एक आदमी आया। उसने कुएँ के पास एक कपड़े की छोटी थैली रखी और वापस जाने लगा। बीरबल ने उसका पीछा किया। वह आदमी सीधे बाजार नहीं गया। वह एक पुराने मकान में पहुँचा।

बीरबल कुछ दूरी पर रुक गए।

कुछ समय बाद मकान से एक और व्यक्ति बाहर आया।

बीरबल ने उसे देखते ही पहचान लिया।

वह कोई अजनबी नहीं था।

वह अकबर के दरबार का एक ऐसा व्यक्ति था जिस पर वर्षों से पूर्ण विश्वास किया जाता था।

बीरबल ने मन ही मन कहा, “तो असली खेल अभी समाप्त नहीं हुआ।”

लेकिन इस बार उन्होंने तुरंत उसे पकड़ने का आदेश नहीं दिया।

क्योंकि उन्हें पता था कि यदि यह व्यक्ति केवल संदेशवाहक है तो असली व्यक्ति अभी भी बाहर है।

बीरबल ने अकबर को गुप्त संदेश भेजा कि दरबार में सामान्य व्यवहार जारी रखा जाए। फिर उन्होंने उस व्यक्ति पर कई दिनों तक नजर रखी। धीरे-धीरे पता चला कि वह व्यक्ति हर तीसरे दिन एक विशेष व्यापारी से मिलता था। व्यापारी का संबंध दूर के एक राज्य से था। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि व्यापारी हर बार उसी बूढ़े फकीर से मिलता था जो पेटी लेकर महल आया था।

बीरबल समझ गए कि फकीर केवल संदेश लेकर आने वाला व्यक्ति नहीं था।

वह स्वयं इस खेल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

लेकिन जब सैनिकों ने फकीर को खोजने की कोशिश की तो वह गायब हो चुका था।

उसकी कोई पहचान नहीं मिली।

उसके कपड़े, उसका सामान और यहाँ तक कि वह घोड़ा भी गायब था जिस पर वह आया था।

बीरबल ने कहा, “वह हमें अपने पीछे दौड़ाना चाहता है।”

अकबर ने पूछा, “तो क्या हम उसका पीछा न करें?”

बीरबल मुस्कुराए।

नहीं जहाँपनाह। हम वहीं रहेंगे जहाँ वह हमें छोड़कर गया है।”

अकबर ने पूछा, “और वह जगह कौन-सी है?”

बीरबल ने कहा, “दरबार।”

अकबर समझ गए।

अगले दिन बीरबल ने दरबार में घोषणा की कि राजकीय दस्तावेजों की एक बहुत महत्वपूर्ण पेटी राजधानी से बाहर भेजी जाएगी। यह खबर जानबूझकर सार्वजनिक की गई। उसी रात महल के बाहर कुछ संदिग्ध लोग दिखाई दिए। सैनिकों ने उनका पीछा किया। वे एक पुराने मकान में पहुँचे जहाँ कई लोग इकट्ठा थे।

अचानक वहाँ से एक संदेशवाहक बाहर निकला और तेजी से भागा।

सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

उसके पास एक पत्र था।

पत्र में केवल एक वाक्य लिखा था—

बीरबल ने जाल बिछाया है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि जाल के भीतर वह स्वयं भी है।”

बीरबल ने पत्र पढ़ा और मुस्कुराए।

अकबर ने पूछा, “इसका क्या अर्थ है?”

बीरबल ने कहा, “इसका अर्थ है कि हमारा दुश्मन बहुत करीब है।”

कितना करीब?”

बीरबल ने दरबार में बैठे लोगों की ओर देखा।

फिर उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

इतना करीब कि शायद वह अभी हमारे सामने बैठा है।”

दरबार में सन्नाटा छा गया।

हर व्यक्ति दूसरे को शक की नजर से देखने लगा।

अकबर ने पूछा, “बीरबल, क्या तुम्हें पता है वह कौन है?”

बीरबल ने कहा, “हाँ।”

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “कौन?”

बीरबल ने उत्तर देने के बजाय अपनी मुट्ठी में रखा वह छोटा निशान सबको दिखाया।

फिर बोले—

लेकिन मैं उसका नाम अभी नहीं बताऊँगा।”

अकबर ने पूछा, “क्यों?”

बीरबल ने कहा—

क्योंकि यदि मैंने अभी नाम बता दिया, तो असली अपराधी भाग जाएगा।”

और उसी क्षण दरबार के पीछे से एक धीमी हँसी सुनाई दी।

सब लोग पलटकर देखने लगे।

वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन जमीन पर एक छोटा कागज पड़ा था।

बीरबल ने उसे उठाया।

उस पर केवल इतना लिखा था—

अगली चाल मेरी होगी।”

बीरबल ने कागज मोड़ा और मुस्कुराए।

अब देखते हैं,” उन्होंने कहा, “किसकी बुद्धि पहले हारती है।”

दरबार में उस समय ऐसा सन्नाटा था कि किसी को अपनी साँसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी। बीरबल के हाथ में वह छोटा-सा कागज था, जिस पर लिखा था—“अगली चाल मेरी होगी।” दरबार में बैठे सभी लोग एक-दूसरे को शक की नजर से देख रहे थे। अकबर ने बीरबल की ओर देखा और पूछा, “क्या तुम्हें सच में पता है कि हमारे बीच बैठा वह व्यक्ति कौन है?” बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “हाँ, जहाँपनाह, लेकिन अभी उसका नाम लेना उचित नहीं होगा।” अकबर ने हैरानी से पूछा, “यदि तुम्हें पता है तो उसे पकड़ क्यों नहीं लेते?” बीरबल मुस्कुराए और बोले, “क्योंकि मुझे व्यक्ति से अधिक उसके पीछे छिपे जाल को पकड़ना है। यदि हमने अभी केवल एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया तो उसके साथी गायब हो जाएँगे और असली योजना फिर अंधेरे में चली जाएगी।”

अकबर ने दरबारियों की ओर देखा। किसी के चेहरे पर घबराहट थी, किसी के चेहरे पर क्रोध और कुछ लोग पूरी तरह शांत दिखाई दे रहे थे। बीरबल ने सबको ध्यान से देखा। फिर उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, आज से महल में कोई भी व्यक्ति अकेले किसी महत्वपूर्ण कक्ष में प्रवेश नहीं करेगा। राजकीय दस्तावेजों की आवाजाही भी बदल दी जाएगी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम यह आदेश केवल दरबार में बताएँगे। बाहर किसी को इसकी जानकारी नहीं होगी।” अकबर ने पूछा, “और यदि हमारे बीच बैठा व्यक्ति यह खबर बाहर पहुँचा दे?” बीरबल ने कहा, “तब हमें पता चल जाएगा कि वह कौन है।”

अगले दिन महल में सब कुछ सामान्य दिखाई दिया। लेकिन बीरबल ने तीन अलग-अलग लोगों को तीन अलग-अलग गुप्त सूचनाएँ दीं। एक को बताया गया कि राजकीय मुहर नए खजाने वाले कक्ष में रखी जाएगी। दूसरे को कहा गया कि पुराने दस्तावेज शाम को पश्चिमी महल में ले जाए जाएँगे। तीसरे को बताया गया कि अकबर अगले दिन शिकार के लिए राजधानी से बाहर जाने वाले हैं। इन तीनों में से केवल एक सूचना सच थी, बाकी दोनों पूरी तरह झूठी थीं। बीरबल जानते थे कि यदि कोई व्यक्ति दरबार से खबर बाहर पहुँचा रहा है तो अगले कुछ घंटों में उसके संकेत मिल जाएँगे।

शाम होते-होते एक सैनिक दौड़ता हुआ बीरबल के पास आया और बोला, “हुजूर, पश्चिमी महल के पीछे दो संदिग्ध लोग पकड़े गए हैं। उनके पास नकली राजकीय आदेश हैं।” बीरबल ने पूछा, “उन्होंने क्या कहा?” सैनिक ने बताया कि वे लोग राजकीय दस्तावेज लेने आए थे। बीरबल ने तुरंत समझ लिया कि सूचना बाहर पहुँच चुकी है। लेकिन उन्होंने यह भी देखा कि दस्तावेजों वाली सूचना केवल एक व्यक्ति को दी गई थी। अब उनके संदेह को दिशा मिल चुकी थी।

बीरबल ने उस व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया। उन्होंने उसके व्यवहार पर नजर रखने का आदेश दिया। वह व्यक्ति दरबार का एक वरिष्ठ अधिकारी था, जिसका नाम हरिदास था। वह वर्षों से राजकीय सेवा में था और अकबर का विश्वासपात्र माना जाता था। वह हमेशा शांत रहता, कम बोलता और हर आदेश का पालन करता। यदि कोई बीरबल से पूछता कि दरबार में सबसे भरोसेमंद लोगों में कौन है, तो बीरबल शायद हरिदास का नाम भी लेते। लेकिन अब उन्हें संदेह था कि वही व्यक्ति गुप्त संदेशों को बाहर पहुँचा रहा है।

रात को बीरबल ने हरिदास का पीछा करवाया। हरिदास महल से निकला और शहर की एक शांत गली में पहुँचा। वहाँ उसने एक साधारण कपड़े पहने व्यक्ति से मुलाकात की। दोनों ने कुछ देर बातचीत की और फिर अलग-अलग दिशाओं में चले गए। सैनिक उस व्यक्ति को पकड़ने ही वाले थे कि बीरबल ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने कहा, “उसे जाने दो।” सैनिक ने आश्चर्य से पूछा, “लेकिन हुजूर, यही तो अवसर है।” बीरबल ने कहा, “नहीं। यदि हमने उसे पकड़ लिया तो हरिदास सावधान हो जाएगा। हमें देखना है कि संदेश कहाँ तक पहुँचता है।”

अगली सुबह बीरबल ने अकबर को सब बताया। अकबर ने कहा, “क्या तुम निश्चित हो?” बीरबल बोले, “अभी पूरी तरह नहीं। संदेह और प्रमाण में अंतर होता है।” अकबर ने पूछा, “तो प्रमाण कैसे मिलेगा?” बीरबल ने कहा, “हम उसे ऐसा काम देंगे जिसे केवल वही कर सकता है, लेकिन वह काम असली नहीं होगा।”

उस दिन दरबार में बीरबल ने घोषणा की कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार हुआ है। दस्तावेज में लिखा था कि पड़ोसी राज्य के साथ एक नया गुप्त समझौता होने वाला है। यह खबर जानबूझकर केवल हरिदास के सामने कही गई। बाकी दरबारियों से इस विषय पर कुछ नहीं कहा गया। शाम को बीरबल ने देखा कि हरिदास असामान्य रूप से बेचैन है। वह बार-बार दरबार से बाहर जाता और लौटता रहा।

रात में एक संदेशवाहक पकड़ा गया। उसके पास वही झूठा समझौता था। बीरबल ने दस्तावेज देखा और मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “अब हमारे पास प्रमाण है।” अकबर ने पूछा, “हरिदास?” बीरबल ने कहा, “हाँ, लेकिन अभी भी एक प्रश्न बाकी है—हरिदास किसके लिए काम करता है?”

हरिदास को अगले दिन दरबार में बुलाया गया। अकबर ने उससे पूछा, “क्या तुमने राजकीय जानकारी बाहर पहुँचाई?” हरिदास ने तुरंत इनकार किया। उसने कहा, “जहाँपनाह, मैं वर्षों से आपकी सेवा कर रहा हूँ। आप मुझ पर ऐसा संदेह कैसे कर सकते हैं?” बीरबल ने कहा, “सवाल यह नहीं है कि तुमने कितने वर्षों तक सेवा की। सवाल यह है कि कल की सूचना बाहर कैसे पहुँची।” हरिदास चुप रहा।

बीरबल ने उसके सामने वह झूठा दस्तावेज रखा और कहा, “यह दस्तावेज केवल एक व्यक्ति ने सुना था।” हरिदास ने तुरंत कहा, “लेकिन यह तो सच में तैयार किया गया था।” बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं। यही तो तुम्हारी गलती है। यह दस्तावेज कभी अस्तित्व में था ही नहीं। हमने इसे केवल तुम्हारी परीक्षा के लिए बनाया था।”

हरिदास का चेहरा सफेद पड़ गया।

अकबर ने कठोर आवाज में पूछा, “सच बोलो!”

हरिदास कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने सिर झुका दिया। “हाँ, मैंने सूचना पहुँचाई थी।”

दरबार में हलचल मच गई।

अकबर ने पूछा, “किसके लिए?”

हरिदास ने उत्तर दिया, “मैं उसका नाम नहीं जानता।”

बीरबल ने कहा, “यह झूठ है।”

हरिदास ने कहा, “मैं सच कह रहा हूँ।”

बीरबल उसके पास गए और बोले, “तुम्हें उसका नाम पता है। लेकिन तुम उससे डरते हो।”

हरिदास की आँखों में भय दिखाई दिया।

बीरबल ने कहा, “तुम्हें धन मिला?”

हाँ।”

कितना?”

हरिदास ने रकम बताई।

और बदले में क्या करना था?”

केवल छोटी-छोटी राजकीय सूचनाएँ देना।”

क्या तुम्हें पता था कि उन सूचनाओं का उपयोग किसलिए किया जा रहा है?”

हरिदास ने सिर हिलाया। “नहीं।”

बीरबल ने कहा, “यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलती थी। तुमने यह सोचे बिना जानकारी दी कि उसका परिणाम क्या होगा।”

हरिदास रो पड़ा। उसने बताया कि संदेश उसे एक व्यापारी के माध्यम से मिलते थे। व्यापारी हर बार अलग नाम से आता था। लेकिन एक बात हमेशा समान रहती थी—हर संदेश के साथ एक काला धागा बँधा होता था।

बीरबल ने यह बात सुनते ही कहा, “काला धागा!”

अकबर ने पूछा, “क्या हुआ?”

बीरबल बोले, “हमें वह निशान पहले भी मिला था। लेकिन हमने उसे केवल संकेत समझा। वह असल में पहचान का तरीका था।”

बीरबल ने तुरंत पुराने संदेश मँगवाए। उनमें से कई संदेशों में काले धागे के छोटे टुकड़े मिले। उन्होंने उन्हें एक साथ रखा। फिर उन्होंने देखा कि हर धागे की गाँठ अलग थी। किसी में एक गाँठ, किसी में दो, किसी में तीन और कुछ में चार। बीरबल ने कहा, “ये संख्या नहीं हैं। ये मार्ग हैं।”

उन्होंने धागों को क्रम में रखा। धीरे-धीरे एक नक्शा बन गया।

नक्शा शहर के एक पुराने हिस्से तक जा रहा था।

अकबर ने पूछा, “यह जगह कौन-सी है?”

बीरबल ने कहा, “पुराना अनाज मंडी।”

अगले दिन बीरबल और कुछ सैनिक साधारण व्यापारियों के वेश में अनाज मंडी पहुँचे। वहाँ सैकड़ों व्यापारी, मजदूर और गाड़ियाँ थीं। किसी एक व्यक्ति को पहचानना आसान नहीं था। बीरबल ने हरिदास से मिली जानकारी के आधार पर उस व्यापारी को ढूँढ़ना शुरू किया जो संदेश पहुँचाता था।

काफी देर बाद उन्हें एक बूढ़ा व्यापारी दिखाई दिया। वह बहुत सामान्य लग रहा था। उसके पास अनाज की बोरियाँ थीं और वह मजदूरों से बात कर रहा था। लेकिन उसकी कमर में बँधे कपड़े से एक काला धागा लटक रहा था।

बीरबल ने सैनिकों को संकेत किया।

व्यापारी को पकड़ लिया गया।

लेकिन उसकी तलाशी लेने पर कुछ नहीं मिला। न कोई संदेश, न कोई हथियार, न कोई राजकीय मुहर।

बीरबल ने पूछा, “तुम्हारा नाम?”

उसने नाम बताया।

तुम यहाँ कितने वर्षों से व्यापार करते हो?”

बीस साल।”

किसके लिए काम करते हो?”

अपने लिए।”

बीरबल मुस्कुराए। “अच्छा। तो यह बताओ कि तुम्हारी बोरी के अंदर अनाज की जगह खाली कागज क्यों है?”

व्यापारी के चेहरे का रंग बदल गया।

सैनिकों ने बोरी खोली। उसमें सचमुच सैकड़ों खाली कागज थे।

बीरबल ने एक कागज उठाया और कहा, “खाली कागज कभी खाली नहीं होते। कभी-कभी उन पर ऐसी स्याही लिखी जाती है जिसे सामान्य आँखें नहीं देख सकतीं।”

उन्होंने कागज को गर्म दीपक के पास रखा। कुछ ही क्षण में उस पर अक्षर उभरने लगे।

उस पर लिखा था—

महल के भीतर का रास्ता खुल चुका है। अगला लक्ष्य स्वयं बादशाह है।”

अकबर ने यह पढ़कर तुरंत सैनिकों को सतर्क किया।

लेकिन बीरबल ने कागज को फिर देखा।

यह संदेश पुराना है।”

अकबर ने पूछा, “कितना?”

बीरबल बोले, “कम से कम तीन दिन पुराना।”

अकबर ने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी बीरबल का चेहरा गंभीर हो गया।

उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि जिस योजना से हम डर रहे हैं, वह पहले ही बदल चुकी है।”

अकबर ने पूछा, “तो अब उनका लक्ष्य क्या है?”

बीरबल ने व्यापारी की ओर देखा।

व्यापारी चुप था।

बीरबल ने कहा, “तुम्हें लगता है कि हम तुम्हें पकड़कर सब कुछ जान लेंगे। लेकिन तुम भी केवल एक मोहरा हो।”

व्यापारी ने पहली बार मुस्कुराकर कहा, “मोहरा होना बुरा नहीं है, बीरबल। कभी-कभी मोहरा ही राजा को मात देता है।”

बीरबल ने पूछा, “तुम्हारा राजा कौन है?”

व्यापारी ने उत्तर नहीं दिया।

तभी बाहर अचानक शोर मच गया।

लोग चिल्लाने लगे कि बाजार में आग लग गई है।

सैनिक बाहर दौड़े।

बीरबल ने तुरंत कहा, “किसी को बाहर मत जाने देना!”

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

आग बाजार के उस हिस्से में लगी थी जहाँ घोड़ों और गाड़ियों की भीड़ थी। लोग इधर-उधर भागने लगे। अफरा-तफरी में व्यापारी गायब हो गया।

सैनिकों ने उसे खोजने की कोशिश की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला।

बीरबल ने चारों ओर देखा।

फिर उनकी नजर जमीन पर पड़ी।

वहाँ एक काला धागा पड़ा था।

उसमें इस बार पाँच गाँठें थीं।

बीरबल ने धागा उठाया और धीरे से कहा—

यह पाँचवाँ रास्ता है।”

अकबर ने पूछा, “कहाँ जाता है?”

बीरबल ने धागे को ध्यान से देखा।

फिर उन्होंने अचानक कहा—

महल।”

अकबर चौंक गए।

बीरबल ने आगे कहा, “लेकिन इस बार बाहर से कोई महल में प्रवेश नहीं करेगा। दुश्मन पहले से महल के अंदर है।”

अकबर ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि महल के सभी द्वार बंद कर दिए जाएँ।

लेकिन उसी समय महल के भीतर से एक जोरदार आवाज आई।

राजकीय घंटी बज उठी।

वह घंटी केवल तब बजती थी जब बादशाह स्वयं खतरे में हों।

अकबर और बीरबल एक-दूसरे को देखने लगे।

बीरबल ने कहा, “अब हमें दौड़ना होगा।”

दोनों तेजी से उस कक्ष की ओर भागे जहाँ अकबर का निजी राजकीय संदूक रखा था।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही वे रुक गए।

कमरे का दरवाजा खुला था।

अंदर कोई नहीं था।

और राजकीय संदूक भी गायब था।

बीरबल ने फर्श पर पड़े एक कागज को उठाया।

उस पर लिखा था—

तुमने मुझे ढूँढ़ने में बहुत समय लगा दिया, बीरबल। अब तुम्हें मुझे रोकने के लिए केवल एक घंटा मिला है।”

बीरबल ने कागज मोड़ा।

उनकी आँखों में पहली बार चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

अकबर ने पूछा, “उस संदूक में क्या था?”

बीरबल ने धीरे से उत्तर दिया—

वही चीज जिसके कारण यह पूरा षड्यंत्र शुरू हुआ था।”

अकबर ने कहा, “क्या?”

बीरबल ने उनकी ओर देखा और बोले—

राज्य की सबसे पुरानी संधि।”

और तभी महल के बाहर से युद्ध का शंख बजा।

महल के बाहर युद्ध का शंख बजते ही सैनिकों में हलचल मच गई। अकबर ने तुरंत खिड़की से बाहर देखा तो महल के मुख्य द्वार के पास सैनिकों की भीड़ दिखाई दी। कुछ घुड़सवार तेजी से राजधानी की ओर आ रहे थे। लेकिन बीरबल की नजर उन पर नहीं थी। वह अभी भी उस खाली कमरे को देख रहे थे जहाँ से राजकीय संदूक गायब हुआ था। अकबर ने बेचैनी से पूछा, “बीरबल, अब क्या करना होगा?” बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि दुश्मन चाहता क्या है। यदि वह केवल संदूक चुराना चाहता तो इसे लेकर भाग जाता। लेकिन उसने इसे महल के भीतर से उठाया है और हमें संदेश भी छोड़ा है। इसका अर्थ है कि वह चाहता है कि हम उसका पीछा करें।”

अकबर ने पूछा, “लेकिन उस संदूक में ऐसी क्या चीज है जिसे लेकर वह इतना बड़ा जोखिम उठा रहा है?” बीरबल ने उत्तर दिया, “राज्य की सबसे पुरानी संधि।” अकबर कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, “लेकिन वह संधि तो केवल एक पुराना दस्तावेज है।” बीरबल ने कहा, “नहीं जहाँपनाह। वह केवल कागज नहीं है। उसमें ऐसे अधिकार लिखे हैं जिनका संबंध कई राज्यों की सीमाओं, व्यापारिक मार्गों और राजकीय संपत्ति से है। यदि कोई उस संधि के शब्दों को बदलकर या उसका झूठा अर्थ फैलाकर प्रस्तुत करे तो कई राज्य एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं।”

अकबर ने गंभीर होकर कहा, “तो यह पूरा षड्यंत्र उसी संधि के कारण था?” बीरबल ने कहा, “संभव है। वर्षों पहले जिन लोगों ने व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण पाने की कोशिश की थी, उन्हें पता था कि इस संधि में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिनका उपयोग करके वे अपने अधिकार का दावा कर सकते थे। लेकिन उन्हें मूल संधि नहीं मिली। अब किसी ने उसे खोज लिया है।”

बीरबल ने कमरे का फिर से निरीक्षण किया। संदूक जिस स्थान पर रखा था वहाँ धूल में एक हल्का निशान था। उन्होंने घुटनों के बल बैठकर उसे देखा। वहाँ जूते के निशान थे। एक निशान दूसरे से थोड़ा अलग था। बीरबल ने कहा, “यह व्यक्ति अकेला नहीं था। कम से कम तीन लोग यहाँ आए थे।” अकबर ने पूछा, “तुम्हें कैसे पता?” बीरबल ने कहा, “क्योंकि तीन अलग-अलग प्रकार के जूते हैं। एक सैनिक का, एक व्यापारी का और तीसरा किसी दरबारी का।”

अकबर ने तुरंत कहा, “तो महल के भीतर कोई दरबारी उनका साथ दे रहा था।” बीरबल ने सिर हिलाया। “हाँ, लेकिन वह हरिदास नहीं है।” अकबर चौंके। “तुमने अभी तक तो उसी पर संदेह किया था।” बीरबल बोले, “हरिदास दोषी था, लेकिन वह केवल संदेशवाहक था। उसके पीछे कोई और है। वह इतना बड़ा खेल अकेले नहीं खेल सकता।”

अचानक बाहर से एक सैनिक आया और उसने बताया कि महल के पश्चिमी द्वार के पास एक संदिग्ध गाड़ी मिली है। गाड़ी पर राजकीय चिह्न था, लेकिन उसमें कोई सामान नहीं था। बीरबल ने पूछा, “गाड़ी किसकी है?” सैनिक ने बताया कि वह दरबार के अभिलेख विभाग के नाम पर दर्ज है। बीरबल की आँखें चमक उठीं। उन्होंने कहा, “अब हमें रास्ता मिल गया।”

वह तुरंत अभिलेख विभाग पहुँचे। वहाँ सभी कर्मचारी मौजूद थे। बीरबल ने पूछा, “आज कौन-कौन लोग यहाँ से बाहर गए?” अधिकारी ने सूची दी। बीरबल ने सूची पढ़ी और अचानक एक नाम पर उँगली रोक दी। “यह व्यक्ति कहाँ है?” अधिकारी ने कहा, “वह सुबह से दिखाई नहीं दिया।” बीरबल ने पूछा, “नाम?” अधिकारी ने कहा, “गोविंददास।”

अकबर ने पूछा, “क्या यह वही व्यक्ति है जिसने वर्षों पहले पुराने दस्तावेजों की व्यवस्था की थी?” अधिकारी ने सिर हिलाया। “जी।”

बीरबल ने कहा, “तो संभव है कि वह संधि के बारे में सबसे अधिक जानता हो।”

गोविंददास का कमरा खोला गया। वहाँ सब कुछ व्यवस्थित था। मेज पर कागज, स्याही और पुराने दस्तावेज रखे थे। पहली नजर में कुछ भी असामान्य नहीं लगा। लेकिन बीरबल ने एक छोटी दराज खोली तो उसमें पाँच काले धागे रखे मिले। हर धागे में अलग-अलग गाँठें थीं।

अकबर ने कहा, “यही वही निशान है।”

बीरबल ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन गोविंददास स्वयं इस जाल का मालिक नहीं है। वह केवल रास्तों को जानता था।”

अचानक बीरबल की नजर दीवार पर लगे पुराने नक्शे पर गई। नक्शे में राजकीय अभिलेखागार से बाहर जाने वाला एक गुप्त रास्ता बना था। वह रास्ता महल के पीछे से निकलकर पुराने किले तक जाता था। बीरबल ने कहा, “वह संदूक इसी रास्ते से बाहर ले जाया गया होगा।”

अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि तुरंत पुराने किले की ओर चलें।

कुछ ही देर में वे पुराने किले पहुँचे। वहाँ चारों ओर सन्नाटा था। बीरबल ने जमीन पर गाड़ी के पहियों के निशान देखे। वे एक टूटे हुए भवन तक जा रहे थे। भीतर पहुँचने पर उन्हें एक कमरा मिला। कमरे के बीचोंबीच वही राजकीय संदूक रखा था।

अकबर ने राहत की साँस ली।

लेकिन बीरबल ने उन्हें रोक दिया।

इसे मत छूइए।”

अकबर ने पूछा, “क्यों?”

बीरबल बोले, “क्योंकि यह वही संदूक नहीं है जो महल से चोरी हुआ था।”

सभी लोग चौंक गए।

बीरबल ने संदूक को ध्यान से देखा। “असली संदूक की लकड़ी पर एक बहुत छोटा निशान था। यहाँ वह नहीं है। यह नकली है।”

अकबर ने कहा, “तो असली संदूक कहाँ है?”

तभी कमरे के दूसरे छोर से आवाज आई।

तुम्हारे पीछे।”

सभी सैनिक पलटे।

वहाँ एक व्यक्ति खड़ा था।

उसके हाथ में असली संदूक था।

वह गोविंददास था।

लेकिन उसके साथ एक और व्यक्ति था।

बीरबल ने उसे देखते ही पहचान लिया।

वह वही बूढ़ा फकीर था जो कुछ दिन पहले महल में आया था।

अकबर ने कहा, “तो आखिर तुम सामने आ ही गए।”

फकीर मुस्कुराया। उसने अपनी नकली दाढ़ी और कपड़ा उतार दिया।

दरबार के सामने एक नया चेहरा आया।

बीरबल कुछ क्षण उसे देखते रहे।

फिर उन्होंने कहा, “तुम्हें मैं पहले से जानता हूँ।”

वह व्यक्ति बोला, “नहीं बीरबल। तुमने मुझे देखा जरूर है, लेकिन कभी पहचाना नहीं।”

अकबर ने पूछा, “तुम कौन हो?”

उसने उत्तर दिया, “मैं उस व्यक्ति का पुत्र हूँ जिसे पच्चीस वर्ष पहले इस पूरे खेल का असली लाभ मिला था।”

देवदत्त की कही बातें बीरबल को याद आईं।

उन्होंने कहा, “तो तुम्हारा परिवार ही इस षड्यंत्र की जड़ था।”

वह व्यक्ति हँसा। “तुमने बहुत देर से समझा।”

बीरबल ने कहा, “नहीं। मैंने तुम्हें बहुत पहले समझ लिया था। मुझे केवल तुम्हें स्वयं सामने आने देना था।”

वह व्यक्ति चौंका।

बीरबल ने आगे कहा, “तुमने मुझे कई संकेत दिए। काला धागा, नकली संदूक, झूठे संदेश और वह पत्र। तुम चाहते थे कि मैं हर बार एक कदम तुम्हारे पीछे चलूँ। लेकिन तुम एक बात भूल गए।”

क्या?”

मैं तुम्हारे पीछे नहीं चल रहा था। मैं तुम्हें आगे जाने दे रहा था।”

उस व्यक्ति के चेहरे पर पहली बार चिंता दिखाई दी।

बीरबल ने सैनिकों को संकेत किया।

सैनिकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

लेकिन वह अचानक हँस पड़ा।

तुमने मुझे पकड़ लिया, बीरबल। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह जीत नहीं है?”

बीरबल ने पूछा, “क्यों?”

उसने कहा, “क्योंकि असली संधि मेरे पास नहीं है।”

बीरबल ने असली संदूक की ओर देखा।

तो फिर इसमें क्या है?”

वह व्यक्ति बोला, “एक खाली कागज।”

बीरबल ने संदूक खोला।

वास्तव में उसमें कोई संधि नहीं थी।

केवल एक सफेद कागज था।

अकबर ने चिंता से बीरबल की ओर देखा।

लेकिन बीरबल मुस्कुरा रहे थे।

उन्होंने कहा, “यही तो मैं चाहता था।”

वह व्यक्ति चौंका।

बीरबल ने सफेद कागज को उठाकर कहा, “तुमने सोचा कि हमें असली संधि चाहिए। लेकिन हमें तुम्हारी जरूरत थी।”

मेरी?”

हाँ। तुमने अभी स्वयं स्वीकार किया कि तुम्हें पता है कि असली संधि कहाँ नहीं है। इसका मतलब है कि तुम्हें पता है कि असली संधि कहाँ है।”

वह व्यक्ति चुप हो गया।

बीरबल ने कहा, “और अब तुम्हें पता है कि हमें यह भी पता चल गया है।”

कुछ क्षण तक वह व्यक्ति बीरबल को घूरता रहा।

फिर उसने अचानक हँसते हुए कहा, “तुम सचमुच खतरनाक हो।”

बीरबल ने कहा, “नहीं। मैं केवल सवाल पूछता हूँ।”

अकबर ने आदेश दिया कि उसे गिरफ्तार कर लिया जाए।

लेकिन उसी समय बाहर घोड़ों की तेज आवाज सुनाई दी।

एक सैनिक दौड़ता हुआ अंदर आया और बोला, “जहाँपनाह! सीमा से संदेश आया है। पड़ोसी राज्य ने अपनी सेना हमारी सीमा की ओर भेज दी है।”

अकबर ने बीरबल की ओर देखा।

बीरबल ने तुरंत कहा, “यही उनकी असली चाल है।”

लेकिन क्यों?”

क्योंकि वे चाहते हैं कि हम संधि के नाम पर युद्ध में उलझ जाएँ।”

अकबर ने कहा, “तो हमें क्या करना चाहिए?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “युद्ध नहीं। सत्य की घोषणा।”

उन्होंने तुरंत पड़ोसी राज्य के राजा को संदेश भेजा। उसमें लिखा था कि पुराने दस्तावेजों की चोरी और नकली संदेशों की जाँच हो चुकी है और दोनों राज्यों को युद्ध से पहले एक-दूसरे के सामने सभी प्रमाण रखने चाहिए।

कुछ समय बाद उत्तर आया।

पड़ोसी राजा ने युद्ध रोकने पर सहमति जताई।

अकबर ने राहत की साँस ली।

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, कभी-कभी युद्ध रोकने के लिए सेना नहीं, विश्वास चाहिए।”

उस दिन शाम तक असली संधि भी मिल गई। वह देवदत्त के पास सुरक्षित थी। उन्होंने उसे वर्षों पहले एक गुप्त स्थान पर रखा था ताकि कोई भी उसे चुराकर राज्यों के बीच युद्ध न करा सके।

अकबर ने संधि को राजकीय अभिलेखागार में सुरक्षित रखने का आदेश दिया।

सारा षड्यंत्र धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

लेकिन बीरबल जानते थे कि इस कहानी की सबसे बड़ी शिक्षा अभी बाकी थी।

उन्होंने दरबार में कहा, “झूठ कभी अकेला नहीं आता। उसके साथ डर, लालच, बदला और अविश्वास भी आते हैं। लेकिन सत्य को केवल एक चीज की जरूरत होती है—धैर्य।”

अकबर ने मुस्कुराकर कहा, “और बुद्धि?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “बुद्धि सत्य तक पहुँचने का रास्ता दिखाती है, जहाँपनाह।”

दरबार तालियों और प्रशंसा से गूँज उठा।

लेकिन कहानी का अंतिम रहस्य अभी बाकी था।

क्योंकि जिस व्यक्ति ने इस पूरे षड्यंत्र को चलाया था, उसने जाते-जाते बीरबल से केवल एक बात कही थी—

तुमने मेरा खेल तो जीत लिया, बीरबल... लेकिन क्या तुम बता सकते हो कि मैंने तुम्हें यह खेल खेलने पर मजबूर क्यों किया?”

बीरबल ने उसकी ओर देखा।

और कुछ क्षण बाद उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

अब समझा,” उन्होंने कहा।

तुम्हारा लक्ष्य संधि नहीं थी।”

तुम्हारा लक्ष्य मैं था।”

बीरबल के यह कहते ही कि “तुम्हारा लक्ष्य संधि नहीं, मैं था,” उस व्यक्ति के चेहरे पर पहली बार पूरी तरह गंभीरता दिखाई दी। अकबर ने भी आश्चर्य से बीरबल की ओर देखा। उन्होंने पूछा, “बीरबल, इसका क्या अर्थ है?” बीरबल ने धीरे-धीरे उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा, “जहाँपनाह, पिछले कई दिनों से वह हमें अलग-अलग रास्तों पर भेज रहा था। कभी काले धागे का संकेत, कभी नकली दस्तावेज, कभी संदूक, कभी फकीर का वेश। उसका उद्देश्य केवल राजकीय जानकारी चुराना नहीं था। वह चाहता था कि मैं अपनी बुद्धि का उपयोग करके उसके हर संकेत का पीछा करूँ। वह मुझे एक ऐसी जगह तक ले जाना चाहता था जहाँ वह मुझे नियंत्रित कर सके।”

उस व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा, “आखिर तुमने समझ ही लिया।” बीरबल ने कहा, “हाँ। और अब मैं समझ गया हूँ कि तुम्हारी सबसे बड़ी गलती कहाँ हुई।” वह व्यक्ति बोला, “कहाँ?” बीरबल ने उत्तर दिया, “तुमने यह मान लिया कि मैं तुम्हारे बनाए हुए खेल के नियमों के अनुसार खेलूँगा।” वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला। बीरबल आगे बोले, “तुमने हर बार मुझे कोई संकेत दिया और मैं उस संकेत के पीछे गया। लेकिन हर बार मैंने तुम्हारे संकेत से अधिक तुम्हारी प्रतिक्रिया को देखा। तुमने जिस बात पर घबराहट दिखाई, जहाँ तुम्हारी नजर गई, जिस शब्द पर तुम चुप हुए—वहीं से तुम्हारी योजना का अगला हिस्सा खुलता गया।”

अकबर मुस्कुराए। “तो तुम पहले से ही उसकी चाल समझ रहे थे?” बीरबल ने कहा, “पूरी तरह नहीं। लेकिन मैं इतना जरूर समझ गया था कि वह हमें सत्य की ओर नहीं, अपनी बनाई हुई कहानी की ओर ले जा रहा है। इसलिए मैंने उसकी कहानी को ही उसके विरुद्ध इस्तेमाल किया।”

वह व्यक्ति अचानक बोला, “लेकिन तुम अभी भी यह नहीं जानते कि मेरा अंतिम उद्देश्य क्या था।”

बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “जानता हूँ।”

तो बताओ।”

बीरबल ने कहा, “तुम चाहते थे कि बादशाह को लगे कि उनके सबसे विश्वसनीय लोगों में कोई गद्दार है। तुम चाहते थे कि मैं हर व्यक्ति पर संदेह करूँ। फिर तुम चाहते थे कि मेरी किसी एक गलती के कारण अकबर का मुझ पर विश्वास टूट जाए। यदि मैं किसी निर्दोष को अपराधी घोषित कर देता तो तुम जीत जाते। यदि मैं किसी गलत व्यक्ति को पकड़वा देता तो भी तुम जीत जाते। तुम्हारी योजना का सबसे खतरनाक हिस्सा यही था—तुम चाहते थे कि मैं जल्दबाजी करूँ।”

अकबर ने ध्यान से बीरबल की बात सुनी। वह व्यक्ति चुप था।

बीरबल ने आगे कहा, “लेकिन तुमने यह नहीं समझा कि मेरे लिए सबसे बड़ा प्रमाण किसी व्यक्ति का दोषी दिखाई देना नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध प्रमाणों की पूरी श्रृंखला है। मैंने किसी को केवल शक के आधार पर गिरफ्तार नहीं किया। मैंने हर कदम पर सत्य की पुष्टि की। इसलिए तुम्हारा जाल मेरे सामने कमजोर पड़ता गया।”

उस व्यक्ति ने कहा, “लेकिन अगर मैं तुम्हें सीधे समाप्त करना चाहता तो?” बीरबल मुस्कुराए। “तो तुम मुझे इतना समय क्यों देते? तुम्हारे पास कई अवसर थे। तुमने मुझे हमेशा एक कदम आगे बढ़ने दिया। इसका मतलब था कि तुम चाहते थे कि मैं तुम्हारी पहेली हल करूँ। तुम चाहते थे कि मैं अंत तक पहुँचूँ। तुम मुझे हराने से अधिक मुझे प्रभावित करना चाहते थे।”

यह सुनकर वह व्यक्ति बिल्कुल शांत हो गया।

अकबर ने पूछा, “तो आखिर तुम कौन हो?”

उसने कुछ देर बाद उत्तर दिया, “मेरा नाम विक्रम है। मेरे पिता उन लोगों में से थे जिन्होंने वर्षों पहले व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण पाने का षड्यंत्र रचा था। लेकिन मेरे पिता की मृत्यु से पहले उन्होंने मुझे एक बात सिखाई—‘जिसे तलवार से नहीं जीता जा सकता, उसे बुद्धि से हराओ।’ मैंने उनकी बात को गलत समझ लिया। मैंने सोचा कि बुद्धि का अर्थ दूसरों को भ्रमित करना है। इसलिए मैंने वर्षों तक इस योजना को बनाया।”

बीरबल ने कहा, “तुम्हारे पिता की एक बात सही थी, लेकिन तुमने उसका अर्थ गलत समझा। बुद्धि का उद्देश्य दूसरों को हराना नहीं, सत्य को पहचानना है।”

विक्रम ने कहा, “तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी बुद्धि मेरी बुद्धि से बेहतर है?”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं। मुझे लगता है कि हमारी बुद्धि अलग-अलग दिशा में चली। तुम्हारी बुद्धि ने तुम्हें लोगों की कमजोरियाँ दिखाईं। मेरी बुद्धि ने मुझे उनकी कमजोरियों के पीछे छिपी सच्चाई देखने की कोशिश करना सिखाया। फर्क केवल इतना है।”

अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि विक्रम को ले जाया जाए। लेकिन जाने से पहले विक्रम ने बीरबल से कहा, “एक बात बताओ। यदि तुम्हें मेरे जाल का पहले से अंदाजा था तो तुमने मुझे इतनी दूर तक क्यों आने दिया?”

बीरबल ने कहा, “क्योंकि कभी-कभी सबसे सुरक्षित तरीका यह होता है कि अपराधी को स्वयं अपनी कहानी पूरी करने दी जाए।”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

उसके जाने के बाद अकबर कुछ देर तक मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “बीरबल, आज मुझे एक बात समझ आई।”

क्या जहाँपनाह?”

राज्य की रक्षा केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं करनी होती। कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा हमारे अपने मन में पैदा होने वाला संदेह होता है।”

बीरबल ने कहा, “बिल्कुल। यदि हम हर व्यक्ति पर शक करने लगें तो दुश्मन को कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। हम स्वयं अपने संबंधों को कमजोर कर देंगे।”

अकबर ने कहा, “और यदि हम किसी पर आँख बंद करके विश्वास करें?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “तो भी खतरा है। इसलिए विश्वास के साथ विवेक जरूरी है।”

कुछ दिनों बाद राज्य में एक विशेष सभा बुलाई गई। वहाँ पुराने षड्यंत्र के सभी दस्तावेज सामने रखे गए। जिन लोगों ने अपराध स्वीकार किया था, उनके अपराधों के अनुसार दंड तय किया गया। जिन लोगों पर झूठे आरोप लगाए गए थे, उनके नाम साफ किए गए। व्यापारिक मार्गों की नई व्यवस्था बनाई गई ताकि किसी एक समूह के हाथ में अत्यधिक नियंत्रण न रहे। राजकीय दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए नई व्यवस्था लागू हुई और यह तय किया गया कि कोई भी महत्वपूर्ण दस्तावेज केवल एक व्यक्ति के भरोसे नहीं रहेगा।

रहमान ने सभा में कहा, “मैंने इस पूरी घटना से सीखा है कि अपने साथ हुए अन्याय को भूलना कठिन हो सकता है, लेकिन उसे दूसरों के साथ अन्याय करने का कारण बना देना उससे भी बड़ी भूल है।” उसकी बात सुनकर अकबर ने उसे सम्मान दिया। उन्होंने कहा, “तुमने अपने पिता का सम्मान केवल उनका नाम साफ करवाकर नहीं लौटाया। तुमने बदले को छोड़कर उनकी सबसे बड़ी शिक्षा को जीवित रखा।”

देवदत्त भी सभा में उपस्थित थे। उन्होंने कहा, “मैंने जीवन में बहुत षड्यंत्र देखे। हर षड्यंत्र की शुरुआत मुझे एक जैसी लगती है—कोई व्यक्ति सोचता है कि वह दूसरों से अधिक बुद्धिमान है। फिर वह दूसरों को मोहरे समझने लगता है। अंत में वही सोच उसकी हार का कारण बनती है।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि मनुष्य मोहरे नहीं होते। हर व्यक्ति के पास अपनी बुद्धि, अपना विवेक और अपनी इच्छा होती है।”

अकबर ने बीरबल की ओर देखकर कहा, “तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत क्या है, बीरबल?”

बीरबल ने कुछ क्षण सोचा और कहा, “शायद प्रश्न पूछना।”

अकबर हँसे। “तुम हमेशा प्रश्न ही क्यों पूछते रहते हो?”

बीरबल ने कहा, “क्योंकि जहाँपनाह, गलत उत्तर से अधिक खतरनाक गलत प्रश्न होता है। यदि प्रश्न ही गलत हो तो बुद्धिमान व्यक्ति भी गलत रास्ते पर चला जाता है।”

दरबार में बैठे सभी लोग उनकी बात ध्यान से सुन रहे थे।

बीरबल ने आगे कहा, “और इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है—जब कोई आपको भ्रमित करने की कोशिश करे तो तुरंत उत्तर मत खोजिए। पहले यह पूछिए कि वह आपसे कौन-सा प्रश्न पूछवाना चाहता है। जब कोई आपको किसी व्यक्ति पर संदेह करने के लिए मजबूर करे तो यह देखिए कि उसे आपके संदेह से क्या लाभ होगा। जब कोई बहुत आसानी से कोई प्रमाण आपके सामने रख दे तो यह भी सोचिए कि क्या वह प्रमाण आपको दिखाने के लिए ही बनाया गया है।”

अकबर ने कहा, “तो बुद्धि का अर्थ केवल चतुर होना नहीं?”

नहीं जहाँपनाह,” बीरबल बोले, “बुद्धि का अर्थ धैर्य, विवेक और सत्य की खोज है।”

समय बीतता गया। राज्य में फिर से शांति स्थापित हो गई। पुराने किले को बंद कर दिया गया और वहाँ रखे सभी संदूकों को राजकीय अभिलेखागार में सुरक्षित कर दिया गया। काले धागों और नकली संदेशों की पूरी कहानी धीरे-धीरे लोककथा बन गई। लोग कहते थे कि बीरबल ने एक ऐसे दुश्मन को हराया था जिसने पूरे राज्य के लोगों को मोहरा बना दिया था। लेकिन बीरबल स्वयं हमेशा कहते थे कि यह केवल उनकी जीत नहीं थी। यह उन सभी लोगों की जीत थी जिन्होंने डर के बावजूद सच बोलने का साहस किया।

एक दिन अकबर ने मजाक में बीरबल से पूछा, “यदि विक्रम फिर कभी तुम्हें चुनौती दे तो क्या करोगे?”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “पहले उससे चाय पिलाऊँगा।”

अकबर हँस पड़े। “चाय क्यों?”

बीरबल ने कहा, “क्योंकि जो व्यक्ति लंबी योजना बनाकर आता है, उसे पहले आराम से बैठने देना चाहिए। जल्दी में बैठा आदमी अपनी योजना भूल सकता है।”

दरबार हँसी से गूँज उठा।

फिर अकबर ने कहा, “और यदि वह फिर कोई पहेली दे?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “तो मैं उससे कहूँगा कि पहले वह मुझे पहेली के नियम बताए।”

अकबर ने पूछा, “और यदि वह नियम भी बदल दे?”

बीरबल बोले, “तो मैं खेलना ही छोड़ दूँगा।”

अकबर ने हँसते हुए कहा, “यही तुम्हारी असली चाल है।”

बीरबल ने सिर झुकाकर कहा, “जहाँपनाह, कभी-कभी सबसे बड़ी जीत यही होती है कि हम किसी और के बनाए खेल को अपना भाग्य न बनने दें।”

सूर्यास्त के समय अकबर और बीरबल महल की छत पर खड़े थे। दूर शहर में दीपक जलने लगे थे। हवा में शांति थी। कई महीनों तक चला षड्यंत्र समाप्त हो चुका था। सत्य सामने आ चुका था और राज्य एक बार फिर अपने सामान्य जीवन की ओर लौट रहा था।

अकबर ने कहा, “बीरबल, यदि इस कहानी को लोग आने वाली पीढ़ियों को सुनाएँ तो उन्हें क्या बताया जाए?”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “उन्हें यह मत बताइए कि बीरबल बहुत बुद्धिमान था। उन्हें यह बताइए कि उसने जल्दबाजी नहीं की।”

अकबर ने पूछा, “बस इतना?”

नहीं,” बीरबल बोले, “उन्हें यह भी बताइए कि किसी की गलती का बदला निर्दोषों से नहीं लेना चाहिए। झूठ चाहे कितना भी बड़ा जाल क्यों न बना ले, वह अंततः अपने ही विरोधाभासों में फँसता है। और सबसे जरूरी बात—सच्चा धन सोना, चाँदी या खजाना नहीं है।”

अकबर ने मुस्कुराकर पूछा, “तो सच्चा धन क्या है?”

बीरबल ने सामने चमकते शहर को देखते हुए कहा—

सच्चा धन बुद्धि है, लेकिन उससे भी बड़ा धन विवेक है; क्योंकि बुद्धि हमें जीतना सिखा सकती है, जबकि विवेक हमें यह सिखाता है कि किस लड़ाई को जीतना जरूरी है।”

अकबर ने संतोष से सिर हिलाया।

उस दिन के बाद जब भी दरबार में कोई कठिन मामला आता, अकबर पहले बीरबल की ओर देखते। बीरबल शांत रहते, समस्या सुनते और कुछ क्षण सोचकर केवल एक प्रश्न पूछते।

और अक्सर वही एक प्रश्न पूरी समस्या का रास्ता खोल देता।

इसीलिए लोगों ने कहा कि अकबर के पास विशाल सेना थी, अपार धन था और शक्तिशाली साम्राज्य था, लेकिन उनकी सबसे अनमोल संपत्ति थी—बीरबल की बुद्धि और वह विश्वास जो दोनों के बीच था।

और यही इस पूरी कहानी की अंतिम सीख बनी—

जिसके पास धन हो वह कुछ समय के लिए शक्तिशाली हो सकता है, जिसके पास शक्ति हो वह कुछ समय तक लोगों को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन जिसके पास सच्ची बुद्धि, धैर्य और विवेक हो, वह बिना तलवार उठाए भी सबसे बड़ी जीत हासिल कर सकता है।”

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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