बहुत समय पहले की बात है। दिल्ली के शानदार किले में मुगल बादशाह अकबर का भव्य
दरबार लगा करता था। बादशाह अकबर अपनी बहादुरी, न्यायप्रियता और बुद्धिमानी
के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में अनेक विद्वान, सेनापति,
व्यापारी और
कलाकार आते थे, लेकिन उन सभी में बीरबल का स्थान सबसे विशेष था। बीरबल केवल
अकबर के मंत्री ही नहीं थे, बल्कि उनके विश्वासपात्र मित्र भी थे। जब भी दरबार में कोई
कठिन समस्या आती, अकबर अक्सर बीरबल की ओर देखते और बीरबल अपनी बुद्धि,
सूझ-बूझ और
चतुराई से ऐसी समस्या का समाधान निकाल देते, जिसे सुनकर सभी दरबारी
हैरान रह जाते।
एक सुबह बादशाह अकबर अपने महल के निजी कक्ष में बैठे कुछ महत्वपूर्ण कागजात
देख रहे थे। महल के बाहर बगीचे में रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे और फव्वारों से
गिरता पानी सूरज की रोशनी में मोतियों की तरह चमक रहा था। तभी एक सैनिक तेजी से
अंदर आया और झुककर बोला, “जहाँपनाह, महल के मुख्य द्वार पर तीन यात्री आए हैं। वे दूर प्रदेश से
आने की बात कहते हैं और आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलने की इच्छा रखते हैं।” अकबर ने
कागजों से नजर उठाकर पूछा, “क्या उन्होंने अपना परिचय दिया?” सैनिक ने उत्तर दिया,
“जी हुजूर,
लेकिन उनकी
बातें कुछ अजीब हैं। तीनों अपने आपको अलग-अलग व्यक्ति बताते हैं, फिर भी कहते
हैं कि वे एक ही उद्देश्य से यहाँ आए हैं।” यह सुनकर अकबर की उत्सुकता बढ़ गई।
उन्होंने आदेश दिया, “उन्हें दरबार में लाया जाए।”
कुछ ही देर बाद दरबार में तीन अनजान व्यक्ति प्रवेश कर गए। पहला व्यक्ति लगभग
पचास वर्ष का था। उसने साधारण लेकिन साफ कपड़े पहन रखे थे और उसके हाथ में एक लंबी
लकड़ी की छड़ी थी। दूसरा व्यक्ति उम्र में उससे छोटा था। उसके कपड़े किसी व्यापारी
जैसे दिखाई दे रहे थे और उसकी कमर पर चमड़े की एक छोटी थैली बँधी हुई थी। तीसरा
व्यक्ति सबसे अलग दिखाई देता था। वह बहुत शांत था और उसकी आँखें लगातार पूरे दरबार
का निरीक्षण कर रही थीं। उसने गहरे नीले रंग का लंबा वस्त्र पहन रखा था। तीनों ने
बादशाह के सामने झुककर सलाम किया। अकबर ने गंभीर स्वर में पूछा, “आप तीनों कहाँ
से आए हैं और हमारे दरबार में किस उद्देश्य से उपस्थित हुए हैं?”
पहले व्यक्ति ने कहा, “जहाँपनाह, मेरा नाम रहमान है। मैं पहाड़ों के उस पार बसे एक छोटे से
राज्य से आया हूँ।” दूसरे व्यक्ति ने कहा, “मेरा नाम माधव है। मैं एक
व्यापारी हूँ और कई वर्षों से अलग-अलग राज्यों की यात्रा करता रहा हूँ।” तीसरे
व्यक्ति ने शांत स्वर में कहा, “और मेरा नाम देवदत्त है। मैं एक यात्री हूँ।” अकबर ने तीनों
को ध्यान से देखा और पूछा, “जब तुम तीनों अलग-अलग स्थानों और अलग-अलग काम से जुड़े हो,
तो एक साथ यहाँ
क्यों आए हो?” यह प्रश्न सुनकर तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कुछ क्षण तक
कोई कुछ नहीं बोला। फिर रहमान ने कहा, “जहाँपनाह, हमारी मंजिल एक ही है।”
अकबर ने तुरंत पूछा, “और वह मंजिल क्या है?” इस बार भी तीनों चुप रहे।
अंत में देवदत्त ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “वही बात हम आपके सामने
बताने आए हैं।”
अकबर को उनकी बातें रहस्यमय लगीं। उन्होंने कहा, “हमारे दरबार में पहेलियों
के लिए कोई स्थान नहीं है। यदि तुम किसी उद्देश्य से आए हो तो साफ-साफ बताओ।” तभी
देवदत्त ने अपनी कमर से एक छोटी-सी मुहर निकाली और दोनों हाथों से उसे उठाकर अकबर
की ओर बढ़ा दिया। उसने कहा, “जहाँपनाह, यह मुहर आपको हमारी यात्रा का कारण समझने में सहायता कर
सकती है।” अकबर ने सैनिक को संकेत किया। सैनिक ने मुहर लेकर बादशाह के हाथ में दे
दी। अकबर ने उसे ध्यान से देखा। मुहर पर एक अजीब निशान बना था। एक गोल वृत्त के
बीच में तीन छोटे-छोटे बिंदु बने हुए थे। अकबर ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा,
“यह निशान हमने
पहले कभी नहीं देखा।”
बीरबल अब तक शांत बैठे तीनों मेहमानों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने कहा,
“जहाँपनाह,
यदि आपकी
अनुमति हो तो मैं इस मुहर को देखना चाहूँगा।” अकबर ने मुहर बीरबल को दे दी। बीरबल
ने उसे हाथ में लेकर चारों ओर से देखा। उन्होंने मुहर पर बने निशान को बहुत ध्यान
से परखा और फिर तीनों मेहमानों के चेहरों की ओर देखा। कुछ क्षण बाद उन्होंने कहा,
“दिलचस्प।” अकबर
ने पूछा, “क्या दिलचस्प है, बीरबल?” बीरबल ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, इस मुहर पर बना
निशान जितना साधारण दिखाई देता है, वास्तव में उतना साधारण नहीं है।” रहमान का चेहरा अचानक
गंभीर हो गया। माधव ने अपनी चमड़े की थैली पर हाथ रख लिया और देवदत्त की आँखों में
भी चिंता की हल्की झलक दिखाई दी। बीरबल ने यह परिवर्तन तुरंत देख लिया।
बीरबल ने मुहर अकबर को वापस करते हुए कहा, “मेरा अनुमान है कि इन तीनों
मेहमानों की कहानी अभी पूरी तरह हमारे सामने नहीं आई है।” अकबर ने तीनों की ओर
देखा और पूछा, “क्या तुम लोगों ने हमसे कुछ छिपाया है?” तीनों शांत
रहे। अकबर ने फिर कठोर स्वर में कहा, “मैंने प्रश्न किया है।” इस बार माधव आगे आया और
बोला, “जहाँपनाह, हम आपसे झूठ नहीं बोलना चाहते, लेकिन जो बात हम बताने आए
हैं, उसे सुनने के बाद शायद आपको विश्वास करना कठिन लगे।” अकबर मुस्कुराए और बोले,
“हमने अपने जीवन
में ऐसी बहुत-सी बातें सुनी हैं जिन पर विश्वास करना आसान नहीं था। तुम निःसंकोच
अपनी बात कहो।”
माधव ने गहरी साँस ली और कहा, “जहाँपनाह, हम तीनों में से केवल एक व्यक्ति ऐसा है जो अपने वास्तविक
नाम से आपके सामने खड़ा है।” यह सुनते ही पूरे दरबार में हलचल मच गई। कुछ दरबारी
एक-दूसरे की ओर देखने लगे और सेनापति ने तुरंत अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रख लिया।
अकबर ने हाथ उठाकर सबको शांत रहने का संकेत दिया। उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा,
“तुम्हारा क्या
मतलब है?” माधव ने कहा, “हम तीनों में से दो व्यक्ति झूठी पहचान लेकर आपके दरबार में
आए हैं।” अकबर की आँखें सिकुड़ गईं। उन्होंने पूछा, “यदि यह सच है तो बताओ कि
कौन झूठ बोल रहा है?”
माधव इस प्रश्न पर चुप हो गया। रहमान ने जमीन की ओर देखा, जबकि देवदत्त
के चेहरे पर एक रहस्यमय मुस्कान दिखाई दी। देवदत्त ने कहा, “यही तो हमारी यात्रा का
असली उद्देश्य है, बादशाह सलामत।” अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “क्या तुम यहाँ
इसलिए आए हो कि हम तुम्हारे बीच छिपे झूठे लोगों को पहचानें?” देवदत्त ने सिर
झुकाकर कहा, “जी, जहाँपनाह।” अकबर ने पूछा, “और यदि हम पहचान न सके?” देवदत्त ने उत्तर दिया,
“तो हम तीनों
उसी तरह चले जाएँगे जैसे आए थे।”
अकबर ने बीरबल की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, “तो फिर बीरबल, तुम्हारे लिए
एक नई परीक्षा है।” बीरबल ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “जहाँपनाह, परीक्षा चाहे
कितनी भी कठिन क्यों न हो, कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं।” अकबर ने तीनों मेहमानों को
आदेश दिया कि वे उस रात महल में मेहमान बनकर रहें। उन्हें अलग-अलग कमरों में
ठहराया जाए और अगले दिन सुबह बीरबल उनके बारे में अपना फैसला सुनाएँ। तीनों ने सिर
झुकाकर आदेश स्वीकार किया।
लेकिन जैसे ही सैनिक उन्हें बाहर ले जाने लगे, बीरबल अचानक अपनी जगह से
उठे और बोले, “एक क्षण!” तीनों रुक गए। बीरबल धीरे-धीरे उनके पास गए।
उन्होंने पहले रहमान के जूते देखे, फिर माधव की चमड़े की थैली और अंत में देवदत्त के हाथों को
ध्यान से देखा। इसके बाद उन्होंने तीनों से केवल एक-एक सवाल पूछा। उन्होंने रहमान
से पूछा, “आपने पिछली रात कहाँ बिताई थी?” रहमान ने तुरंत उत्तर दिया, “एक सराय में।”
बीरबल ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया। फिर उन्होंने माधव से पूछा, “आपने कल शाम
क्या खाया था?” माधव ने तुरंत कहा, “रोटी, दाल और
थोड़ा-सा दूध।” बीरबल ने उसकी आँखों में देखा। अंत में उन्होंने देवदत्त से पूछा,
“आप दिल्ली में
पहली बार आए हैं?” देवदत्त ने मुस्कुराकर कहा, “जी, पहली बार।”
बीरबल ने इसके बाद कोई प्रश्न नहीं किया और अपनी जगह पर वापस आकर बैठ गए। अकबर
ने आश्चर्य से पूछा, “बस? तुमने केवल इतने ही प्रश्न पूछे?” बीरबल मुस्कुराकर बोले,
“जी, जहाँपनाह।”
अकबर ने पूछा, “और इन प्रश्नों से तुम्हें कुछ पता चला?” बीरबल ने उत्तर
दिया, “अभी पूरी सच्चाई तो नहीं, लेकिन इन तीनों ने अपने उत्तरों से कम और अपने व्यवहार से
अधिक बातें बता दी हैं।” अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “तो तुम्हारा अनुमान क्या है?”
बीरबल ने कहा,
“मेरा अनुमान है
कि इनमें से एक व्यक्ति बहुत बड़ा झूठ बोल रहा है। लेकिन बाकी दो भी पूरी तरह सच
नहीं बोल रहे।” यह सुनकर दरबार में फिर फुसफुसाहट होने लगी।
उस रात तीनों मेहमानों को महल के अलग-अलग कमरों में ठहराया गया। महल के
पहरेदारों को विशेष सावधानी बरतने का आदेश दिया गया। बादशाह अकबर अपने कक्ष में
चले गए, लेकिन उनके मन में बार-बार वही सवाल घूम रहा था—आखिर इन तीनों में असली कौन है?
और सबसे बड़ा
सवाल यह था कि यदि दो लोग झूठी पहचान लेकर आए हैं, तो वे बादशाह अकबर के दरबार
तक पहुँचे ही क्यों?
उधर बीरबल अपने कमरे में बैठे उस अजीब मुहर का चित्र बना रहे थे। उन्होंने
मुहर पर बने तीन बिंदुओं को ध्यान से देखा। उन्हें लगा कि उन्होंने यह निशान कहीं
पहले देखा है। उन्होंने अपनी पुरानी पुस्तकों में से एक पुस्तक निकाली, जिसमें
दूर-दराज के राज्यों और पुराने राजचिह्नों का वर्णन था। बीरबल धीरे-धीरे उसके
पन्ने पलटने लगे। कुछ देर बाद उनकी उँगली एक पुराने चित्र पर जाकर रुक गई। उनकी
आँखें आश्चर्य से फैल गईं। चित्र में बिल्कुल वही निशान बना था—एक वृत्त और उसके
बीच तीन बिंदु। बीरबल ने धीरे से कहा, “तो यह केवल कोई साधारण मुहर नहीं है। यह तो कई
वर्ष पहले समाप्त हो चुके एक राज्य का राजचिह्न है।”
अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही शाही महल में हलचल शुरू हो गई थी। तीनों
मेहमानों को फिर दरबार में लाया गया। अकबर ने कहा, “आज तुम्हारी पहेली का उत्तर
जानना चाहते हैं। तुमने स्वयं कहा था कि तुममें से केवल एक व्यक्ति अपनी असली
पहचान के साथ हमारे सामने खड़ा है। इसलिए आज सच सामने आना चाहिए।” बीरबल अपनी जगह
से उठे और सबसे पहले रहमान को सामने बुलाया। उन्होंने पूछा, “तुमने बताया था
कि तुम पहाड़ों के पार स्थित एक छोटे राज्य से आए हो। उस राज्य का नाम क्या है?”
रहमान ने उत्तर
दिया, “नूरगढ़।”
बीरबल ने पूछा, “और वहाँ का शासक कौन है?” रहमान कुछ क्षण चुप रहा और
बोला, “वहाँ अब कोई शासक नहीं है।” बीरबल ने फिर पूछा, “क्यों?” रहमान ने उत्तर
दिया, “क्योंकि वह राज्य कई वर्ष पहले नष्ट हो चुका है।” दरबार में सन्नाटा छा गया।
बीरबल ने पूछा, “तुम्हें नूरगढ़ के बारे में इतनी जानकारी कैसे है?” रहमान ने कहा,
“क्योंकि मैं
वहीं पैदा हुआ था।” बीरबल ने कहा, “यदि तुम वहाँ पैदा हुए थे, तो तुम्हारे पास उस राज्य
की कोई निशानी अवश्य होगी।” रहमान ने अपनी कमर से एक पुरानी धातु की अंगूठी
निकाली। अंगूठी पर वही निशान बना था जो पिछली रात मिली मुहर पर था।
अकबर ने आश्चर्य से कहा, “बीरबल, क्या यह वही निशान नहीं है?” बीरबल ने सिर हिलाया। “जी,
जहाँपनाह। यह
नूरगढ़ के राजघराने का चिह्न है।” अकबर ने रहमान से पूछा, “यदि तुम नूरगढ़ के रहने
वाले हो, तो तुमने हमें केवल एक छोटे राज्य का यात्री क्यों बताया?” रहमान ने सिर
झुकाकर कहा, “क्योंकि नूरगढ़ के साथ जो हुआ, उसके बाद उस राज्य का नाम लेना मेरे लिए खतरनाक था।”
रहमान ने बताया कि लगभग पंद्रह वर्ष पहले नूरगढ़ पर हमला हुआ था। राज्य को लूट
लिया गया, महल जला दिया गया और राजपरिवार के अधिकांश लोगों को मार दिया गया। कुछ लोग
भागकर अपनी जान बचाने में सफल हुए। रहमान उन्हीं में से एक था। अकबर ने उसकी बात
ध्यान से सुनी, लेकिन बीरबल ने कहा, “तुम्हारी कहानी सच हो सकती
है, लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ कि तुम वही व्यक्ति हो जो तुम अपने आपको बताते
हो।”
इसके बाद बीरबल ने माधव को सामने बुलाया। उन्होंने पूछा, “तुमने स्वयं को
व्यापारी बताया है। तुम किस वस्तु का व्यापार करते हो?” माधव ने कहा, “कीमती कपड़े,
मसाले और धातु
की वस्तुओं का।” बीरबल ने पूछा, “क्या तुम कभी नूरगढ़ गए हो?” माधव ने तुरंत कहा,
“नहीं।” बीरबल
ने उसकी आँखों में देखा और कहा, “झूठ।”
माधव घबरा गया। बीरबल ने उसकी चमड़े की थैली की ओर संकेत किया और कहा,
“इसे खोलो।”
माधव ने थैली को कसकर पकड़ लिया। अकबर ने आदेश दिया कि थैली खोली जाए। थैली में
कुछ सिक्के, कपड़े के नमूने, मसालों की पुड़िया और एक पुरानी चाबी थी। बीरबल की नजर
तुरंत उस चाबी पर पड़ी। चाबी पर भी वही तीन बिंदुओं वाला निशान बना था।
अकबर ने पूछा, “यह चाबी किसकी है?” माधव चुप रहा। बीरबल ने कहा, “अब तुम्हें सच
बोलना ही होगा।” माधव ने स्वीकार किया कि वह नूरगढ़ गया था। उसने कहा कि वह वहाँ
व्यापारी बनकर गया था और उसे उस राज्य के बारे में जानकारी इकट्ठी करनी थी। जब
बीरबल ने पूछा कि किसके लिए, तो माधव चुप हो गया। आखिर उसने कहा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति
के लिए काम कर रहा था जिसका नाम वह नहीं बता सकता।
अब बीरबल ने देवदत्त को सामने बुलाया। उन्होंने पूछा, “तुमने कहा था कि तुम पहली
बार दिल्ली आए हो। तो फिर तुम शाही महल के पुराने गलियारों को इतनी अच्छी तरह कैसे
जानते हो?” देवदत्त का चेहरा बदल गया। बीरबल ने बताया कि रात में एक पहरेदार ने उत्तरी
गलियारे में किसी व्यक्ति को चलते देखा था। उस रास्ते पर पिछले सप्ताह विशेष
मरम्मत हुई थी और वहाँ लाल मिट्टी लगी थी। देवदत्त के जूतों पर वही मिट्टी लगी हुई
थी। इससे साफ था कि वह रात में वहाँ गया था।
अकबर ने देवदत्त से पूछा, “क्या तुम वही व्यक्ति थे?” देवदत्त चुप रहा। तभी बीरबल
ने कहा, “तुम्हारे पास जो पर्ची है, उसे भी हमें दिखाना होगा।” देवदत्त चौंक गया। अकबर ने पूछा,
“कौन-सी पर्ची?”
देवदत्त ने
घबराकर कहा, “मैंने वह पर्ची नहीं लिखी थी।” बीरबल मुस्कुराए और बोले, “मैंने तो अभी
किसी पर्ची का उल्लेख ही नहीं किया था।”
देवदत्त समझ गया कि उससे गलती हो चुकी है। उसने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें वही
पर्ची थी जिस पर लिखा था, “कल बीरबल को सच्चाई मत बताना, वरना हम सबका अंत हो
जाएगा।” अकबर ने पर्ची बीरबल को दी। बीरबल ने उसे पढ़कर पूछा, “यह पर्ची
तुम्हें किसने दी?” देवदत्त ने कहा, “मुझे नहीं पता।” बीरबल ने कहा, “लेकिन इसे
लिखने वाला व्यक्ति महल के भीतर था।”
अकबर ने देवदत्त से पूछा, “क्या तुम्हें किसी से खतरा है?” देवदत्त ने धीरे से कहा,
“जी।” “किससे?”
अकबर ने पूछा।
देवदत्त ने रहमान और माधव की ओर देखा और कहा, “इन दोनों से नहीं।” अकबर ने
फिर पूछा, “तो किससे?” देवदत्त ने धीमी आवाज में कहा, “उस व्यक्ति से जिसने नूरगढ़
को नष्ट किया था।”
यह सुनकर रहमान का चेहरा पीला पड़ गया और माधव ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
बीरबल ने तुरंत पूछा, “क्या वह व्यक्ति अभी जीवित है?” देवदत्त ने सिर हिलाया।
“क्या वह दिल्ली में है?” इस बार भी देवदत्त चुप रहा। अकबर ने कठोर स्वर में कहा,
“सच बोलो।”
देवदत्त ने आखिर कहा, “जी, जहाँपनाह। वह दिल्ली में है।”
अकबर ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि महल के सभी द्वार बंद कर दिए जाएँ और
किसी भी अनजान व्यक्ति को बाहर न जाने दिया जाए। बीरबल अब समझ चुके थे कि यह केवल
तीन यात्रियों की पहचान का मामला नहीं था। इसके पीछे एक पुरानी दुश्मनी, एक उजड़ा हुआ
राज्य और कोई ऐसा रहस्य था जिसके लिए आज भी किसी की जान खतरे में थी।
बीरबल ने तीनों को देखते हुए कहा, “तुम तीनों अलग-अलग कहानी सुना रहे हो, लेकिन तुम्हारे
रास्ते बार-बार एक ही जगह जाकर मिलते हैं—नूरगढ़। तुम तीनों किसी ऐसी वस्तु की
तलाश में हो जो नूरगढ़ से जुड़ी है।” अकबर ने पूछा, “कौन-सी वस्तु?” तभी रहमान ने
कहा, “वह वस्तु कोई साधारण चीज नहीं है।” अकबर ने उसकी ओर देखा। रहमान ने धीरे से
कहा, “नूरगढ़ का राजमुकुट।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर ने पूछा, “और वह राजमुकुट कहाँ है?”
रहमान ने उत्तर
दिया, “वह नूरगढ़ में नहीं है। वह इसी महल में है।”
अकबर अपनी जगह से उठ खड़े हुए। “क्या कहा तुमने?” रहमान ने कहा, “जहाँपनाह,
नूरगढ़ का खोया
हुआ राजमुकुट पिछले पंद्रह वर्षों से आपके महल में छिपा हुआ है।”
यह सुनकर सभी दरबारी स्तब्ध रह गए। बीरबल ने तुरंत पूछा, “तुम्हें यह
कैसे पता?” रहमान ने कहा, “क्योंकि मेरे पिता नूरगढ़ के राजा के विश्वासपात्र सैनिक
थे। राज्य पर हमला होने से पहले उन्होंने राजमुकुट को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया
था। लेकिन वह सुरक्षित स्थान कभी किसी को नहीं बताया गया। मेरे पिता ने मरने से
पहले मुझे केवल इतना बताया था कि राजमुकुट ऐसी जगह छिपाया गया है जहाँ कोई उसे
दुश्मन से बचा सके। उन्होंने मुझे तीन बिंदुओं वाला यह निशान और एक अधूरी पहेली दी
थी।”
रहमान ने अपनी जेब से एक पुराना कपड़ा निकाला। उस पर कुछ शब्द लिखे थे। बीरबल
ने उसे पढ़ा, “जहाँ पत्थर बोलते हैं, जहाँ पानी बिना नदी के बहता
है, जहाँ राजा बैठता है लेकिन सिंहासन खाली रहता है, वहीं तीनों रास्ते
मिलेंगे।”
बीरबल कुछ क्षण सोचते रहे। फिर उन्होंने कहा, “यह महल की ओर संकेत करता
है।”
अकबर ने पूछा, “लेकिन महल बहुत बड़ा है। राजमुकुट कहाँ खोजा जाए?”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति इतने वर्षों तक
राजमुकुट को छिपाकर रख सकता है, उसने उसके लिए ऐसा स्थान चुना होगा जहाँ रोज लोग आते-जाते
हों, लेकिन किसी को शक न हो।”
उन्होंने तीनों मेहमानों को अलग-अलग खड़ा किया और कहा, “अब मैं तुम तीनों की अंतिम
परीक्षा लूँगा। तुममें से जो व्यक्ति सच बोल रहा है, वह मेरी बात सुनकर शांत
रहेगा। जो झूठ बोल रहा है, वह अपने व्यवहार से स्वयं को प्रकट करेगा।”
बीरबल ने महल के पुराने हिस्से का नक्शा मंगवाया। उन्होंने नक्शे पर कई
स्थानों को ध्यान से देखा। फिर बोले, “नूरगढ़ का राजमुकुट शायद उस जगह है जहाँ तीन
रास्ते मिलते हैं।”
रहमान ने तुरंत कहा, “जी, यही संकेत है।”
बीरबल ने उसकी ओर देखा। “तुम्हें कैसे पता कि तीन रास्ते कहाँ मिलते हैं?”
रहमान चुप हो गया।
माधव ने अचानक कहा, “पुराने महल के पीछे एक भूमिगत मार्ग है।”
बीरबल ने उसकी ओर देखा। “तुम्हें उसके बारे में कैसे पता?”
माधव ने उत्तर नहीं दिया।
देवदत्त ने कहा, “वहाँ जाना खतरनाक है।”
बीरबल मुस्कुराए। “और तुम्हें कैसे पता कि वह खतरनाक है?”
अब तीनों एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
अकबर ने कहा, “बीरबल, अब मुझे भी लग रहा है कि इन तीनों को राजमुकुट के बारे में
हमसे कहीं अधिक जानकारी है।”
बीरबल ने उत्तर दिया, “जी, जहाँपनाह। लेकिन अभी एक बात बाकी है। हमें यह पता लगाना
होगा कि इन तीनों में से कौन राजमुकुट चाहता है और कौन उसे सुरक्षित रखना चाहता
है।”
उसी शाम बीरबल ने एक योजना बनाई। उन्होंने महल के पुराने हिस्से में एक सैनिक
को भेजकर खबर फैलवा दी कि राजमुकुट की खोज बंद कर दी गई है और तीनों मेहमानों को
अगले दिन सुबह महल से जाने की अनुमति दे दी जाएगी। यह खबर जानबूझकर बहुत धीरे-धीरे
पूरे महल में फैलाई गई।
रात होते-होते रहमान अपने कमरे में बैठा रहा। माधव बेचैनी से इधर-उधर घूमता
रहा। देवदत्त खिड़की के पास खड़ा रहा। लेकिन आधी रात के करीब माधव अपने कमरे से
बाहर निकला। वह धीरे-धीरे पुराने गलियारे की ओर बढ़ने लगा। उसे यह पता नहीं था कि
उसके पीछे बीरबल के दो विश्वसनीय सैनिक छिपे हुए थे।
माधव पुराने महल के एक बंद दरवाजे के सामने पहुँचा। उसने अपनी थैली से वही
पुरानी चाबी निकाली और दरवाजे में डाल दी। ताला खुल गया। तभी पीछे से बीरबल की
आवाज आई, “बहुत अच्छी चाबी है, माधव। लेकिन यह दरवाजा खोलने के लिए तुम्हें इतनी जल्दी
करने की क्या जरूरत थी?”
माधव पलटकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
बीरबल ने कहा, “मैं जानता था कि तुम इस दरवाजे तक जरूर आओगे। तुम्हारी थैली
में मिली चाबी इसी दरवाजे की है।”
माधव ने सिर झुका लिया। उसने कहा, “मैं राजमुकुट चुराने नहीं आया था।”
बीरबल ने पूछा, “तो किसलिए?”
माधव ने कहा, “मैं उसे बचाने आया था।”
बीरबल कुछ क्षण शांत रहे। फिर उन्होंने पूछा, “किससे?”
माधव ने उत्तर दिया, “उस व्यक्ति से जिसने नूरगढ़ को नष्ट किया था।”
बीरबल ने गंभीर स्वर में पूछा, “उसका नाम?”
माधव ने कहा, “सुल्तान मिर्जा।”
बीरबल ने यह नाम पहले कभी नहीं सुना था। माधव ने बताया कि मिर्जा कभी नूरगढ़
के राजा का सेनापति था। उसने लालच में आकर पड़ोसी राज्य के शासक से हाथ मिला लिया
था। उसने नूरगढ़ के गुप्त रास्तों की जानकारी दुश्मनों को दी और राजमहल पर हमला
करवाया। लेकिन राजमुकुट उसके हाथ नहीं लगा। उसे विश्वास था कि राजमुकुट में नूरगढ़
के शाही खजाने का रहस्य छिपा है। वर्षों से वह उस मुकुट की तलाश कर रहा था।
माधव ने कहा, “मुझे मिर्जा के लोगों ने राजमुकुट खोजने के लिए भेजा था,
लेकिन मैं बाद
में समझ गया कि उसका उद्देश्य केवल मुकुट पाना नहीं था। वह नूरगढ़ के बचे हुए
लोगों को भी खत्म करना चाहता था। इसलिए मैंने उसका साथ छोड़ दिया।”
बीरबल ने पूछा, “तो फिर रहमान और देवदत्त?”
माधव ने कहा, “रहमान नूरगढ़ के राजपरिवार का आखिरी जीवित सदस्य है।
देवदत्त उस समय नूरगढ़ का एक छोटा सैनिक था। हम तीनों अलग-अलग रास्तों से बचकर
निकले थे। वर्षों बाद हमें पता चला कि राजमुकुट दिल्ली में है। इसलिए हम यहाँ आए।”
बीरबल ने पूछा, “लेकिन तुम तीनों एक-दूसरे पर भरोसा क्यों नहीं करते?”
माधव ने कहा, “क्योंकि हममें से कोई न कोई मिर्जा के आदमियों के संपर्क
में था। हमें डर था कि हमारे बीच कोई गद्दार हो सकता है।”
तभी पीछे से आवाज आई, “और वह गद्दार कौन है?”
सभी चौंक गए।
दरवाजे के पास देवदत्त खड़ा था।
बीरबल ने उसे देखा और कहा, “तुम्हारा यहाँ आना भी हमारी योजना का हिस्सा था।”
देवदत्त ने कहा, “मैं गद्दार नहीं हूँ। लेकिन मुझे मिर्जा के लोगों ने कई
वर्षों तक खोजा था। मुझे डर था कि वे मेरे पीछे-पीछे यहाँ तक पहुँच जाएँगे।”
तभी अचानक दूर से तलवारों की आवाज सुनाई दी। महल के पहरेदार दौड़ते हुए आए और
बोले, “जहाँपनाह को खबर दीजिए! महल के पिछले द्वार से कुछ हथियारबंद लोग अंदर घुस आए
हैं।”
बीरबल समझ गए कि उनका अनुमान सही था। मिर्जा के लोग वास्तव में दिल्ली पहुँच
चुके थे।
बीरबल ने तुरंत कहा, “अब हमारे पास समय बहुत कम है। राजमुकुट को खोजने से पहले
हमें महल की रक्षा करनी होगी।”
अकबर को सूचना दी गई। उन्होंने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया कि महल के सभी
प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाएँ। थोड़ी देर में महल के भीतर संघर्ष शुरू हो गया।
सैनिकों ने घुसपैठियों को चारों ओर से घेर लिया। लेकिन दुश्मनों की संख्या अधिक
थी।
रहमान ने पहली बार अपनी छड़ी को जमीन पर जोर से मारा और उसके भीतर छिपी छोटी
तलवार बाहर निकाल ली। अकबर ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। रहमान ने कहा, “जहाँपनाह,
मैं केवल
यात्री नहीं हूँ। मैं नूरगढ़ के राजपरिवार का अंतिम रक्षक हूँ।”
माधव ने भी अपनी थैली से एक छोटी तलवार निकाल ली। देवदत्त ने महल के गुप्त
मार्ग की ओर इशारा करते हुए कहा, “मुझे रास्ता पता है। हम दुश्मनों को पीछे से घेर सकते हैं।”
बीरबल ने तुरंत योजना बनाई। अकबर के सैनिकों ने सामने से हमला किया और देवदत्त
उन्हें गुप्त मार्ग से पीछे ले गया। कुछ ही देर में घुसपैठिए चारों ओर से घिर गए।
उनका नेता भागने लगा, लेकिन रहमान ने उसे पकड़ लिया।
पूछताछ में पता चला कि वही व्यक्ति मिर्जा का खास आदमी था और उसके पास महल की
जानकारी पहुँचाने वाला कोई अंदरूनी व्यक्ति भी था। बीरबल ने उसकी पहचान पूछी। उसने
डरते हुए बताया कि महल का एक छोटा अधिकारी लालच में आकर मिर्जा को जानकारी देता
था। उस अधिकारी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
अब महल सुरक्षित था, लेकिन राजमुकुट का रहस्य अभी भी बाकी था।
बीरबल ने तीनों को साथ लेकर उस पुराने भूमिगत रास्ते में प्रवेश किया। रास्ता
बहुत संकरा था। दीवारों पर पुराने चित्र बने थे। कई जगह पत्थरों पर वही तीन
बिंदुओं वाला निशान दिखाई दे रहा था। कुछ दूर जाने के बाद रास्ता एक बड़े कक्ष में
जाकर समाप्त हुआ।
कक्ष के बीच में एक पुराना पत्थर का सिंहासन था। सिंहासन खाली था। उसके पीछे
दीवार पर तीन वृत्त बने हुए थे। बीरबल ने रहमान से पूछा, “क्या यही वह स्थान है?”
रहमान ने कहा, “मेरे पिता की पहेली में यही संकेत था।”
बीरबल ने दीवार को ध्यान से देखा। उन्होंने तीन बिंदुओं वाले निशान को दबाया।
कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने दूसरा निशान दबाया। फिर भी कुछ नहीं हुआ। अंत में
उन्होंने तीसरे निशान को दबाया। अचानक दीवार के भीतर से पत्थर खिसकने की आवाज आई
और एक छोटा गुप्त कक्ष खुल गया।
उस कक्ष के भीतर एक सुंदर कपड़े में लिपटा हुआ राजमुकुट रखा था। मुकुट सोने का
था और उसमें लाल तथा नीले रंग के कीमती पत्थर जड़े हुए थे। उसके बीच में वही तीन
बिंदुओं वाला राजचिह्न बना था।
रहमान की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीरे से कहा, “यही है नूरगढ़ का
राजमुकुट।”
अकबर ने मुकुट को देखा और कहा, “यह केवल सोने और रत्नों का मुकुट नहीं है। यह एक
राज्य की स्मृति है।”
बीरबल ने कहा, “और इसी कारण इसे पाने के लिए इतने वर्षों से लोग संघर्ष कर
रहे थे।”
रहमान ने अकबर के सामने सिर झुकाकर कहा, “जहाँपनाह, मैं इसे वापस
लेना चाहता था, लेकिन अब समझ गया हूँ कि इसे सुरक्षित रखना अधिक महत्वपूर्ण
है।”
अकबर ने कहा, “नूरगढ़ अब भले ही एक स्वतंत्र राज्य न हो, लेकिन उसके
लोगों की स्मृति और सम्मान जीवित रहना चाहिए।”
उन्होंने घोषणा की कि राजमुकुट को शाही संग्रह में सुरक्षित रखा जाएगा और
नूरगढ़ के बचे हुए लोगों को सम्मान और सहायता दी जाएगी। रहमान को महल में सम्मानित
स्थान दिया गया। माधव को उसके साहस और सच्चाई के लिए क्षमा कर दिया गया और देवदत्त
को शाही सुरक्षा में रहने की अनुमति दी गई।
लेकिन अकबर ने बीरबल से पूछा, “तुमने आखिर कैसे समझ लिया था कि इन तीनों की कहानी में इतना
बड़ा रहस्य छिपा है?”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “जहाँपनाह, झूठ बोलने वाला व्यक्ति केवल शब्दों से झूठ बोलता है,
लेकिन उसका
शरीर अक्सर सच बोल देता है। रहमान के जूतों से पता चला कि वह लंबी यात्रा करके आया
था, लेकिन उसके हाथों की पकड़ सैनिक जैसी थी। माधव व्यापारी था, लेकिन उसकी
चाबी किसी पुराने किले के दरवाजे की थी। देवदत्त ने कहा कि वह पहली बार दिल्ली आया
है, लेकिन उसे महल के रास्तों की जानकारी थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि जब मैंने
नूरगढ़ का नाम लिया, तो तीनों के चेहरे बदल गए। इससे मुझे यकीन हो गया कि उनकी
कहानी का केंद्र नूरगढ़ ही है।”
अकबर हँस पड़े और बोले, “बीरबल, तुमने फिर साबित कर दिया कि आँखों से दिखाई देने वाली चीजों
से अधिक महत्वपूर्ण वह होता है जो आदमी छिपाने की कोशिश करता है।”
बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, बुद्धिमानी का अर्थ केवल कठिन प्रश्नों का उत्तर देना नहीं
है। असली बुद्धिमानी यह समझना है कि सामने वाला व्यक्ति क्या नहीं कह रहा है।”
रहमान ने बीरबल को धन्यवाद दिया। उसने कहा, “यदि आप हमारी बात पर
विश्वास नहीं करते, तो राजमुकुट हमेशा के लिए छिपा रहता और मिर्जा के लोग हमें
कभी चैन से नहीं जीने देते।”
माधव ने भी कहा, “मैंने जीवन में बहुत-से बुद्धिमान लोगों को देखा है,
लेकिन आपकी तरह
किसी को लोगों के व्यवहार से सच्चाई समझते नहीं देखा।”
देवदत्त ने कहा, “मैंने कल रात जो पर्ची पाई थी, उससे मैं बहुत डर गया था।
मुझे लगा था कि हमारा अंत निश्चित है। लेकिन आपने बिना किसी जल्दबाजी के सबको बचा
लिया।”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “डर अक्सर इंसान को गलत निर्णय लेने पर मजबूर करता है। यदि
हम डर के बजाय बुद्धि से काम लें, तो सबसे कठिन रास्ता भी आसान हो जाता है।”
उस दिन के बाद तीनों मेहमानों की कहानी पूरे दरबार में प्रसिद्ध हो गई। अकबर
ने आदेश दिया कि नूरगढ़ के राजमुकुट की रक्षा विशेष रूप से की जाए। रहमान को राज्य
की ओर से सम्मान मिला। माधव ने अपना जीवन ईमानदार व्यापार में लगा दिया और देवदत्त
शाही सुरक्षा दल में शामिल हो गया। समय बीतता गया, लेकिन उस घटना को अकबर और
बीरबल कभी नहीं भूले।
कुछ दिनों बाद अकबर ने मुस्कुराते हुए बीरबल से कहा, “बीरबल, उस दिन तीन
मेहमान हमारे दरबार में आए थे। उनमें से दो झूठ बोल रहे थे और एक सच बोल रहा था।
लेकिन अंत में पता चला कि तीनों के भीतर अपना-अपना दर्द और अपना-अपना रहस्य छिपा
था।”
बीरबल ने कहा, “जी जहाँपनाह। कभी-कभी किसी व्यक्ति का झूठ भी उसके डर से
पैदा होता है, लालच से नहीं। इसलिए न्याय करने से पहले कारण को समझना भी
जरूरी है।”
अकबर ने कहा, “यही कारण है कि तुम्हारे फैसले मुझे हमेशा पसंद आते हैं।”
बीरबल ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “और यही कारण है कि मैं हमेशा पहले सवाल पूछता
हूँ और बाद में फैसला करता हूँ।”
दोनों हँस पड़े।
इस घटना के बाद अकबर के दरबार में एक कहावत प्रसिद्ध हो गई कि “सच्चाई को चाहे
कितने ही पर्दों के पीछे छिपा दिया जाए, एक दिन वह सामने जरूर आती है।” तीनों मेहमानों
की कहानी ने सभी को यह भी सिखाया कि किसी व्यक्ति को केवल उसके शब्दों से नहीं
परखा जा सकता। उसके कर्म, उसका व्यवहार और कठिन परिस्थिति में उसका निर्णय ही उसके
वास्तविक चरित्र को सामने लाते हैं।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बुद्धि और
धैर्य से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है। जल्दबाजी में लिया गया
निर्णय अक्सर गलत होता है, लेकिन ध्यान से देखना, सही प्रश्न पूछना और सच्चाई
तक पहुँचने की कोशिश करना हमेशा बेहतर होता है। साथ ही, किसी व्यक्ति
की गलती के पीछे छिपे कारण को समझना भी न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस तरह अकबर के दरबार में आए तीन रहस्यमय मेहमानों का रहस्य सुलझ गया। नूरगढ़
का राजमुकुट सुरक्षित हो गया, उसके पुराने दुश्मनों का अंत हुआ और तीनों यात्रियों को एक
नया जीवन मिला। लेकिन इस पूरी घटना में सबसे अधिक चर्चा जिस व्यक्ति की हुई,
वह हमेशा की
तरह बीरबल ही थे, जिन्होंने तलवार के बल पर नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि और
सूझ-बूझ से एक पुराने रहस्य को सुलझाया और बादशाह अकबर को यह साबित कर दिया कि
सच्चाई कितनी भी गहराई में छिपी हो, बुद्धिमान व्यक्ति उसके निशान जरूर खोज लेता है।
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