Skip to main content

संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

बीरबल और लोभी साहूकार

 



 

बहुत समय पहले की बात है। दिल्ली में मुगल बादशाह अकबर का शासन था। बादशाह अकबर अपनी बहादुरी, न्यायप्रियता और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्वान, कवि, सैनिक, व्यापारी और साधारण लोग अपनी समस्याएँ लेकर आया करते थे। अकबर ध्यान से उनकी बातें सुनते और उचित न्याय करने का प्रयास करते थे। उनके दरबार के सबसे बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति थे बीरबल। बीरबल केवल अपनी हाजिरजवाबी के लिए ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि वे कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान अपनी सूझ-बूझ और शांत दिमाग से निकाल लेते थे। जब भी कोई ऐसा मामला दरबार में आता जिसका फैसला करना कठिन होता, बादशाह अक्सर बीरबल की ओर देखते। बीरबल बिना जल्दबाजी किए पूरी बात सुनते, परिस्थिति को समझते और फिर ऐसा न्याय करते कि दोषी व्यक्ति के पास बहाना बनाने का कोई रास्ता नहीं बचता।

उसी समय दिल्ली से कुछ दूर एक छोटा-सा गाँव था। गाँव के लोग मेहनती और सीधे-सादे थे। कोई खेतों में गेहूँ उगाता था, कोई सब्जियाँ बेचता था, तो कोई पशुपालन करके अपना जीवन चलाता था। गाँव में रहने वाला हर व्यक्ति एक-दूसरे को जानता था और जरूरत के समय एक-दूसरे की सहायता करता था। लेकिन उस गाँव में एक ऐसा व्यक्ति भी रहता था जिसके कारण अधिकांश लोग परेशान रहते थे। उसका नाम था धनराज साहूकार। धनराज के पास बहुत धन था। गाँव में सबसे बड़ा मकान उसी का था। उसके घर के बाहर हमेशा दो-तीन नौकर खड़े रहते थे। उसके पास अनाज के कई गोदाम, बैलगाड़ियाँ और सोने-चाँदी के आभूषण थे। देखने में वह बहुत धनवान था, लेकिन उसके स्वभाव में दया और संतोष नाम की कोई चीज नहीं थी। वह अत्यंत लोभी था। किसी गरीब किसान को यदि थोड़े पैसे की आवश्यकता पड़ती, तो धनराज उसे पैसे तो दे देता, लेकिन बदले में इतना अधिक ब्याज माँगता कि गरीब आदमी वर्षों तक उसका कर्ज नहीं चुका पाता।

धनराज का मानना था कि पैसा ही दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। वह अक्सर अपने नौकरों से कहा करता था कि गरीब आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी मजबूरी होती है और समझदार वही है जो दूसरों की मजबूरी से लाभ उठाए। उसके नौकर उसकी बात सुनकर चुप रहते, क्योंकि वे जानते थे कि धनराज से बहस करना आसान नहीं है। गाँव के लोग उससे डरते थे। किसी के घर में शादी हो, किसी की फसल खराब हो जाए, किसी की गाय बीमार पड़ जाए या किसी के बच्चे की पढ़ाई के लिए पैसे चाहिए हों, लोग मजबूरी में धनराज के पास जाते। वह उन्हें पैसे देता और कागज पर ऐसी शर्तें लिखवा लेता जिनका अर्थ गरीब लोग ठीक से समझ भी नहीं पाते थे। समय पर पैसे न चुका पाने पर वह ब्याज बढ़ाता जाता और कभी-कभी खेत या घर तक अपने नाम करवाने की धमकी देता।

उसी गाँव में हरिया नाम का एक गरीब किसान रहता था। हरिया बहुत मेहनती था। उसके पास थोड़ी-सी जमीन थी, जिस पर वह गेहूँ, चना और सरसों उगाता था। उसकी पत्नी गौरी घर संभालती थी और उनके दो छोटे बच्चे थे—मोहन और राधा। हरिया के परिवार के पास धन अधिक नहीं था, लेकिन वे मेहनत और ईमानदारी से अपना जीवन बिताते थे। हरिया का सपना था कि उसके बच्चे बड़े होकर पढ़-लिखकर अच्छे इंसान बनें और उसे गरीबी का सामना न करना पड़े। वह हमेशा अपने बच्चों से कहता था कि मेहनत से कमाया हुआ थोड़ा धन भी उस धन से अच्छा होता है जो किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर कमाया जाए।

एक वर्ष गाँव में मौसम बहुत खराब रहा। पहले बारिश देर से हुई और फिर जब बारिश आई तो इतनी तेज हुई कि खेतों में पानी भर गया। कई किसानों की फसल बर्बाद हो गई। हरिया की भी लगभग आधी फसल नष्ट हो गई। घर में रखा अनाज धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। उसके पास अगले मौसम की बुआई के लिए बीज खरीदने तक के पैसे नहीं बचे। उसने अपने पड़ोसियों से मदद माँगी, लेकिन उस वर्ष लगभग सभी किसान स्वयं परेशानी में थे। हरिया बहुत चिंतित था। एक शाम वह घर के बाहर बैठा अपनी सूखी हुई जमीन को देख रहा था। गौरी उसके पास आई और बोली, “आप इतने परेशान क्यों हैं? कुछ न कुछ रास्ता जरूर निकलेगा।”

हरिया ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “रास्ता तो है, लेकिन मुझे धनराज साहूकार के पास जाना पड़ेगा। अगले मौसम के लिए बीज और बैल के चारे की जरूरत है। अगर अभी पैसे नहीं मिले तो खेत खाली रह जाएगा। लेकिन मैं जानता हूँ कि धनराज से कर्ज लेना आसान नहीं है।”

गौरी कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, “अगर कोई दूसरा उपाय नहीं है तो जितने पैसे जरूरी हों उतने ही लेना। और कागज पढ़े बिना उस पर हस्ताक्षर मत करना।”

हरिया ने सिर हिलाया। अगले दिन वह साहूकार की दुकान पर पहुँचा। धनराज अपनी बड़ी-सी गद्दी पर बैठा पैसे गिन रहा था। हरिया ने हाथ जोड़कर कहा, “सेठ जी, मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए। बारिश के कारण मेरी फसल खराब हो गई है। अगर मुझे बीज मिल जाएँ तो अगले मौसम में अच्छी फसल हो सकती है। फसल कटते ही मैं आपका पैसा लौटा दूँगा।”

धनराज ने ऊपर से नीचे तक हरिया को देखा और पूछा, “कितने पैसे चाहिए?”

सौ रुपये,” हरिया ने विनम्रता से कहा।

धनराज मुस्कुराया। उसने कहा, “सौ रुपये तो मैं दे दूँगा, लेकिन मेरी शर्तें माननी होंगी।”

हरिया ने पूछा, “कैसी शर्तें?”

धनराज ने कहा, “साल के अंत में तुम्हें दो सौ रुपये लौटाने होंगे। अगर समय पर नहीं लौटाए तो ब्याज अलग से बढ़ेगा।”

हरिया यह सुनकर चौंक गया। “सेठ जी, दो सौ रुपये? मैंने तो सिर्फ सौ रुपये माँगे हैं।”

धनराज ने कठोर आवाज में कहा, “अगर मेरी शर्त मंजूर नहीं है तो किसी और से ले लो।”

हरिया जानता था कि गाँव में इस समय कोई और उसे पैसे नहीं दे सकता। मजबूरी में उसने शर्त स्वीकार कर ली। धनराज ने एक कागज निकाला और उस पर कुछ लिखा। हरिया पढ़ा-लिखा नहीं था। उसने कागज पर अंगूठा लगा दिया और सौ रुपये लेकर घर लौट आया।

उस पैसे से उसने बीज खरीदे, बैल के लिए चारा लिया और अगले मौसम की तैयारी शुरू कर दी। इस बार मौसम ने साथ दिया। बारिश समय पर हुई और खेतों में फसल लहलहाने लगी। हरिया ने दिन-रात मेहनत की। कुछ महीनों बाद खेतों में सुनहरी फसल तैयार हो गई। हरिया बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि अब वह साहूकार का कर्ज चुका देगा और उसके परिवार की परेशानी खत्म हो जाएगी।

फसल बेचने के बाद हरिया के पास पर्याप्त पैसे आए। उसने सबसे पहले धनराज के सौ रुपये लौटाने की तैयारी की। लेकिन उसे याद था कि धनराज ने दो सौ रुपये माँगे थे। इसलिए उसने दो सौ रुपये अलग रखे और साहूकार की दुकान पर पहुँच गया। उसने कहा, “सेठ जी, यह आपके पैसे हैं। मैंने आपका कर्ज चुका दिया।”

धनराज ने पैसे गिने और फिर ठंडी आवाज में कहा, “इतने ही?”

हरिया ने आश्चर्य से पूछा, “जी? आपने तो दो सौ रुपये माँगे थे। ये पूरे दो सौ रुपये हैं।”

धनराज ने अपनी बड़ी-सी बही खोली और बोला, “तुम्हें लगता है कि हिसाब इतना आसान है? तुम्हारे सौ रुपये पूरे एक साल मेरे पास नहीं थे। बल्कि मेरे सौ रुपये तुम्हारे पास पूरे साल रहे। उस दौरान मैं उन पैसों से कमाई कर सकता था। अब तुम्हें उसका भी भुगतान करना होगा।”

हरिया परेशान हो गया। “सेठ जी, लेकिन मैंने तो आपके पैसे लिए थे। फिर मैं आपको इस बात का भुगतान क्यों करूँ कि वे मेरे पास रहे?”

धनराज ने कहा, “क्योंकि मेरे पैसे तुम्हारे पास रहे। यही मेरा नियम है।”

हरिया ने हाथ जोड़कर कहा, “मैं गरीब आदमी हूँ। मैंने आपका मूलधन और आपकी बताई रकम चुका दी है। अब मेरे पास और पैसे नहीं हैं।”

धनराज ने बही बंद करते हुए कहा, “अगर पैसे नहीं हैं तो अपनी जमीन का एक हिस्सा मेरे नाम कर दो।”

यह सुनकर हरिया के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने कहा, “सेठ जी, यह अन्याय है। मैंने आपकी सारी रकम चुका दी है।”

धनराज हँसकर बोला, “अन्याय? तुम्हारे अंगूठे का निशान उस कागज पर है। जो लिखा है, वही सच है। अगर तुम्हें अपनी बात पर भरोसा है तो बादशाह अकबर के दरबार में जाकर शिकायत कर दो।”

हरिया के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। वह उदास होकर घर लौटा। गौरी ने उसके चेहरे पर चिंता देखी तो पूछा, “क्या हुआ?”

हरिया ने सारी बात बता दी। गौरी भी घबरा गई। उसने कहा, “हमने तो सोचा था कि कर्ज चुकाने के बाद हमारी परेशानी खत्म हो जाएगी। अब यह हमारी जमीन भी लेना चाहता है।”

हरिया बोला, “मैं बादशाह अकबर के दरबार में जाऊँगा। अगर दिल्ली में न्याय मिलता है तो मैं अपनी जमीन नहीं जाने दूँगा।”

अगली सुबह हरिया पैदल ही दिल्ली की ओर चल पड़ा। रास्ता लंबा था। उसके पैरों में दर्द हो रहा था, लेकिन उसके मन में उम्मीद थी। वह कई घंटे चलने के बाद दिल्ली पहुँचा। बहुत पूछताछ करने के बाद उसे बादशाह अकबर के दरबार का रास्ता मिला। दरबार में उस दिन बहुत से लोग उपस्थित थे। कोई अपनी जमीन के विवाद के लिए आया था, कोई व्यापार के मामले में न्याय माँग रहा था और कोई अपने पड़ोसी से हुए झगड़े की शिकायत लेकर आया था।

हरिया ने दरबार के सैनिकों से अपनी शिकायत बताई। उसकी बारी आने पर वह बादशाह अकबर के सामने पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला, “जहाँपनाह, मैं गरीब किसान हूँ। मेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है। मैंने साहूकार से सौ रुपये उधार लिए थे। उसकी माँग के अनुसार दो सौ रुपये वापस कर दिए, लेकिन अब वह मेरी जमीन माँग रहा है। उसका कहना है कि उसके पैसे एक वर्ष तक मेरे पास रहे, इसलिए मुझे और धन देना होगा।”

अकबर ने ध्यान से उसकी बात सुनी। उन्होंने पूछा, “क्या तुम्हारे पास कोई प्रमाण है कि तुमने पैसे लौटा दिए?”

हरिया ने कहा, “जहाँपनाह, मैंने उसे दो सौ रुपये दिए थे। उस समय उसकी दुकान पर दो लोग और मौजूद थे। लेकिन उसने मुझे कोई रसीद नहीं दी।”

अकबर ने दरबार के एक अधिकारी से कहा कि धनराज साहूकार को तुरंत दरबार में बुलाया जाए। कुछ समय बाद धनराज भी दरबार में पहुँच गया। उसने शाही दरबार में प्रवेश करते ही सिर झुकाया और बोला, “जहाँपनाह, मैंने कोई गलत काम नहीं किया। किसान ने स्वयं मेरी शर्तों पर अंगूठा लगाया था।”

अकबर ने पूछा, “तुमने इसे कितने रुपये दिए थे?”

सौ रुपये।”

और इसने कितने लौटाए?”

धनराज ने कहा, “दो सौ रुपये।”

अकबर ने भौंहें सिकोड़कर पूछा, “तो फिर तुम और पैसे क्यों माँग रहे हो?”

धनराज ने कहा, “जहाँपनाह, मेरे सौ रुपये पूरे एक वर्ष तक इसके पास रहे। इसलिए उस समय का अतिरिक्त शुल्क भी बनता है।”

दरबार में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। कुछ लोगों को धनराज की बात अजीब लगी, लेकिन धनराज आत्मविश्वास से खड़ा था। अकबर कुछ क्षण सोचते रहे। तभी उन्होंने बीरबल की ओर देखा।

बीरबल शांत बैठे पूरी बातचीत सुन रहे थे। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। अकबर ने पूछा, “बीरबल, तुम क्या कहते हो?”

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, यह मामला जितना सरल दिखाई दे रहा है, उतना है नहीं। मुझे साहूकार से कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति दीजिए।”

अकबर ने अनुमति दे दी।

बीरबल ने धनराज से पूछा, “क्या तुमने किसान को सौ रुपये दिए थे?”

जी हाँ।”

क्या किसान ने तुम्हें दो सौ रुपये वापस किए?”

जी हाँ।”

क्या तुमने वे दो सौ रुपये स्वीकार किए?”

धनराज ने कहा, “हाँ, लेकिन मेरा हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ।”

बीरबल ने पूछा, “तुम्हारे अनुसार तुम्हारे पैसे एक वर्ष तक किसान के पास रहे, इसलिए तुम्हें अतिरिक्त धन चाहिए?”

जी।”

बीरबल ने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छा। अब मुझे यह बताओ कि जब तुम्हारे पैसे किसान के पास थे, तब उनकी देखभाल कौन कर रहा था?”

धनराज कुछ समझा नहीं। उसने कहा, “किसान ही कर रहा होगा।”

बीरबल ने पूछा, “तो क्या किसान ने तुम्हारे पैसे को कहीं खो दिया?”

नहीं।”

क्या किसान ने तुम्हारे पैसे जला दिए?”

नहीं।”

क्या उसने तुम्हारे पैसे चुरा लिए?”

नहीं।”

तो उसने तुम्हारे पैसे सुरक्षित रखे?”

धनराज ने अनमने ढंग से कहा, “हाँ।”

बीरबल ने कहा, “तो फिर तुम्हें किसान को भी उस समय का शुल्क देना चाहिए, क्योंकि उसने पूरे वर्ष तुम्हारे धन की सुरक्षा की।”

धनराज का चेहरा उतर गया। दरबार में हल्की हँसी गूँज उठी।

धनराज बोला, “यह कैसी बात है? मेरे पैसे उसके पास थे। उसने उनका इस्तेमाल किया होगा।”

बीरबल ने तुरंत कहा, “अगर उसने तुम्हारे पैसे इस्तेमाल किए, तो तुमने यह साबित करना होगा कि उसने कितने समय तक और किस प्रकार उनका उपयोग किया। लेकिन यदि तुम केवल इस आधार पर अतिरिक्त धन माँग रहे हो कि पैसा उसके पास रहा, तो यही नियम तुम्हारे ऊपर भी लागू होगा। किसान ने तुम्हारा पैसा सुरक्षित रखा। तुम्हें उसकी सेवा का भुगतान करना चाहिए।”

धनराज चुप हो गया।

बीरबल ने आगे कहा, “लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि तुम्हारी बही में क्या लिखा है।”

धनराज ने अपनी बही आगे कर दी। बीरबल ने बही के पन्ने पलटे। उसमें कई किसानों के नाम लिखे थे। कई नामों के सामने मूलधन से कई गुना अधिक रकम लिखी हुई थी। बीरबल ने देखा कि बहुत से किसानों के नाम के सामने ब्याज पर ब्याज जोड़कर रकम बढ़ाई गई थी।

बीरबल ने अकबर से कहा, “जहाँपनाह, मुझे लगता है कि केवल हरिया का मामला नहीं है। यहाँ कई किसानों से इसी प्रकार अतिरिक्त धन माँगा गया है।”

अकबर ने गंभीर होकर धनराज से पूछा, “क्या यह सच है?”

धनराज ने कहा, “जहाँपनाह, यह मेरा व्यापार है। मैं जो शर्त रखता हूँ, वही माननी पड़ती है।”

अकबर ने कहा, “व्यापार और शोषण में अंतर होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर ऐसी शर्तें लगाए जिन्हें वह समझ भी न सके, तो वह न्यायपूर्ण व्यापार नहीं है।”

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, एक और बात महत्वपूर्ण है। हरिया ने अपनी ओर से साहूकार की माँगी हुई रकम लौटा दी है। अब साहूकार को यह प्रमाणित करना होगा कि उसके पास और कितनी रकम वास्तव में बकाया है। केवल अपनी बही में कोई संख्या लिख देना पर्याप्त नहीं है।”

अकबर ने धनराज से पूछा, “क्या तुम्हारे पास ऐसा कोई प्रमाण है जिससे यह साबित हो कि हरिया पर दो सौ रुपये से अधिक की रकम बकाया है?”

धनराज चुप रहा। उसने बही की ओर देखा, लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया।

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, यदि अनुमति हो तो मैं एक छोटी-सी परीक्षा लेना चाहता हूँ।”

अकबर ने मुस्कुराकर कहा, “बीरबल, तुम्हें अनुमति है।”

बीरबल ने एक थैली मँगवाई और उसमें सौ सिक्के रखवाए। फिर उन्होंने धनराज से कहा, “मान लो कि ये तुम्हारे सौ रुपये हैं और मैं इन्हें हरिया को देता हूँ। अब हरिया एक वर्ष बाद तुम्हें ये सौ रुपये लौटा देता है। क्या इसके बाद भी वह तुम्हें पैसे देता रहेगा?”

धनराज ने तुरंत कहा, “अगर शर्त हो तो हाँ।”

बीरबल ने पूछा, “और यदि हरिया तुम्हें दो सौ रुपये लौटा दे तो?”

तब भी अगर ब्याज बाकी हो तो उसे देना होगा।”

बीरबल ने सिर हिलाया और कहा, “अच्छा। अब मान लो कि हरिया तुम्हें चार सौ रुपये दे देता है। क्या तब भी तुम कहोगे कि और पैसे बाकी हैं?”

धनराज ने कुछ सोचकर कहा, “अगर हिसाब में बाकी हो तो।”

बीरबल ने दरबार की ओर देखते हुए कहा, “यही तो समस्या है। ऐसा हिसाब जिसमें रकम कभी खत्म ही न हो, न्याय का हिसाब नहीं, लालच का जाल है।”

अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, “बीरबल, तुम्हारी बात सही है।”

बीरबल ने आगे कहा, “जहाँपनाह, धनराज ने स्वयं स्वीकार किया है कि हरिया ने दो सौ रुपये लौटा दिए। अब यदि वह अतिरिक्त धन माँगता है तो उसे प्रमाण देना होगा। और यदि उसकी शर्तें अनुचित थीं, तो उन्हें न्याय के आधार पर देखा जाना चाहिए।”

अकबर ने दरबार के लेखाकारों को आदेश दिया कि धनराज की बही की जाँच की जाए। जाँच में पता चला कि कई किसानों से ऐसी रकम माँगी गई थी जो उनके मूल कर्ज से बहुत अधिक थी। कुछ किसानों ने तो अपने खेतों का हिस्सा खो दिया था। धनराज की संपत्ति बढ़ती जा रही थी, जबकि गाँव के गरीब लोग कर्ज के बोझ में दबते जा रहे थे।

अकबर ने धनराज को कठोरता से कहा, “तुमने धन कमाया, इसमें कोई दोष नहीं है। लेकिन दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाकर धन कमाना गलत है। तुम्हें गरीबों की सहायता करनी चाहिए थी, न कि उन्हें अपने कर्ज के जाल में फँसाना चाहिए था।”

धनराज का सिर झुक गया। पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसकी लालच ने उसे कितना कठोर बना दिया था। वह बोला, “जहाँपनाह, मुझसे गलती हुई है। मैं लालच में इतना अंधा हो गया कि मुझे किसी की परेशानी दिखाई ही नहीं दी।”

अकबर ने कहा, “गलती स्वीकार करना अच्छी बात है, लेकिन केवल माफी माँगना पर्याप्त नहीं। जिन लोगों से तुमने अनुचित धन लिया है, उनका हिसाब ठीक करना होगा।”

बीरबल ने सुझाव दिया कि हर किसान के कर्ज का सही हिसाब लगाया जाए। जितना वास्तविक मूलधन और उचित राशि बनती हो, उतना ही लिया जाए। जो अतिरिक्त धन जबरन लिया गया है, उसे किसानों को वापस किया जाए या उनके कर्ज में समायोजित किया जाए। जिन किसानों की जमीन अनुचित तरीके से ली गई है, उनके मामलों की भी जाँच की जाए।

अकबर ने बीरबल की सलाह स्वीकार कर ली।

हरिया को दरबार में बुलाकर अकबर ने कहा, “तुम्हारी जमीन तुम्हारे पास रहेगी। तुमने जो उचित रकम चुकाई है, उसके बाद साहूकार तुम्हें परेशान नहीं करेगा।”

हरिया की आँखों में आँसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, आपने मेरे जैसे गरीब किसान को न्याय दिया। मैं जीवन भर आपका आभारी रहूँगा।”

अकबर ने कहा, “न्याय किसी अमीर या गरीब के लिए अलग नहीं होता। राज्य तभी मजबूत होता है जब उसकी प्रजा को विश्वास हो कि उसके साथ अन्याय होने पर उसे न्याय मिलेगा।”

हरिया ने बीरबल की ओर देखा और कहा, “बीरबल जी, अगर आप मेरी सहायता न करते तो पता नहीं मेरा क्या होता।”

बीरबल मुस्कुराकर बोले, “मैंने केवल तुम्हारी बात सुनी है। न्याय तुम्हारे सच के कारण हुआ है। हमेशा सच बोलना और अपनी मेहनत पर विश्वास रखना।”

हरिया अपने गाँव लौट गया। रास्ते भर उसके मन में खुशी थी। जब वह घर पहुँचा तो गौरी और बच्चे उसकी राह देख रहे थे। हरिया ने उन्हें सारी बात बताई। गौरी की आँखों में भी खुशी के आँसू आ गए। उसने कहा, “आज सच में न्याय की जीत हुई।”

कुछ दिनों बाद गाँव में खबर पहुँची कि बादशाह के आदेश से धनराज की बही की जाँच की जा रही है। गाँव के कई लोग दरबार में बुलाए गए। उनसे पूछा गया कि उन्होंने धनराज से कितना पैसा लिया था और कितना लौटाया। धीरे-धीरे साहूकार की सारी चालाकियाँ सामने आने लगीं। जिन लोगों से उसने अनुचित रकम ली थी, उनके हिसाब ठीक किए गए। कुछ लोगों को उनकी जमीन वापस मिली और कुछ लोगों का कर्ज समाप्त कर दिया गया।

धनराज के लिए यह सब बहुत बड़ा परिवर्तन था। पहले वह सोचता था कि पैसा ही सब कुछ है। अब उसे समझ आया कि धन से बड़ा विश्वास होता है। उसने देखा कि गाँव के लोग अब उससे डरते नहीं थे। कुछ लोग तो उससे बात तक नहीं करना चाहते थे। उसे महसूस हुआ कि उसने बहुत धन कमाया, लेकिन लोगों का सम्मान खो दिया।

एक दिन धनराज अकेला अपनी दुकान पर बैठा था। उसकी नजर सामने रखी तिजोरी पर पड़ी। तिजोरी सोने और चाँदी से भरी थी, लेकिन उसका मन खाली था। तभी उसका पुराना नौकर रामू वहाँ आया। धनराज ने पूछा, “रामू, क्या तुम्हें लगता है कि मैंने जीवन में बहुत बड़ी गलती की?”

रामू ने कुछ देर सोचकर कहा, “सेठ जी, गलती तो हुई है। लेकिन अगर आपको अपनी गलती समझ आ गई है तो उसे सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए।”

धनराज ने पूछा, “क्या लोग मुझे फिर से भरोसे के योग्य समझेंगे?”

रामू ने कहा, “भरोसा माँगने से नहीं मिलता, कमाना पड़ता है।”

धनराज ने उस दिन एक निर्णय लिया। उसने अपनी बही खोली और उन सभी लोगों की सूची बनाई जिनसे उसने अनुचित धन लिया था। उसने एक-एक करके लोगों को बुलाना शुरू किया। जहाँ अतिरिक्त धन लिया था, वहाँ उसे वापस किया। जहाँ कर्ज का हिसाब गलत था, उसे ठीक किया। कुछ लोगों ने उसे तुरंत माफ नहीं किया, लेकिन धनराज ने शिकायत नहीं की। उसने समझ लिया था कि वर्षों की लालच से खोया विश्वास एक दिन में वापस नहीं आएगा।

धीरे-धीरे गाँव के लोग उसके व्यवहार में बदलाव देखने लगे। अब यदि कोई गरीब किसान उसके पास पैसे माँगने आता तो धनराज उचित शर्तों पर सहायता करता। वह लोगों को कागज पढ़कर सुनाता और समझाता कि उन्हें कितना पैसा लौटाना होगा। वह कहता, “जिस बात को तुम समझते नहीं हो, उस पर अंगूठा मत लगाओ।”

एक दिन हरिया भी उसके पास आया। धनराज ने उसे देखकर कहा, “हरिया, उस दिन मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया था। मुझे क्षमा कर दो।”

हरिया ने कहा, “गलती बड़ी थी, लेकिन अगर आपने उसे स्वीकार करके सुधारना शुरू कर दिया है तो यह अच्छी बात है।”

धनराज ने कहा, “तुमने मुझे एक बात सिखाई है—गरीब होना कमजोरी नहीं है और अमीर होना महानता की निशानी नहीं। इंसान की महानता उसके व्यवहार से होती है।”

हरिया मुस्कुराया और बोला, “यह बात मैंने नहीं, बीरबल ने आपको समझाई है।”

दोनों हँस पड़े।

कुछ समय बाद अकबर को गाँव के लोगों से समाचार मिला कि धनराज ने अपना व्यवहार बदल लिया है। अकबर ने बीरबल से कहा, “देखो बीरबल, तुम्हारे न्याय ने केवल एक किसान की जमीन नहीं बचाई, बल्कि एक लोभी व्यक्ति को भी अपनी गलती समझने का अवसर दिया।”

बीरबल ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, सच्चा न्याय वही है जिसमें केवल दोषी को दंड न मिले, बल्कि उसे अपनी गलती सुधारने का अवसर भी मिले। यदि कोई व्यक्ति अपनी भूल समझकर बदल जाए तो समाज के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?”

अकबर मुस्कुराए और बोले, “तुम्हारी बुद्धि की यही खासियत है, बीरबल। तुम समस्या को केवल ऊपर से नहीं देखते, बल्कि उसकी जड़ तक पहुँचते हो।”

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, लालच भी ऐसी ही समस्या है। जब मनुष्य को आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा हो जाती है, तो वह धीरे-धीरे यह भूल जाता है कि सामने वाला भी इंसान है। वह धन को लक्ष्य बना लेता है और इंसानियत को भूल जाता है।”

अकबर ने कहा, “और इसलिए राज्य में न्याय और दया दोनों आवश्यक हैं।”

समय बीतता गया। हरिया की खेती अच्छी होने लगी। उसके बच्चे बड़े होकर पढ़ने लगे। मोहन को पढ़ाई में बहुत रुचि थी और राधा भी पढ़-लिखकर गाँव के बच्चों को शिक्षा देने लगी। हरिया जब भी अपने खेत में खड़ा होकर अपनी फसल देखता, उसे वह दिन याद आता जब वह चिंता में डूबा हुआ साहूकार के पास गया था। उसे याद आता कि कैसे एक छोटे से कर्ज ने उसकी पूरी जमीन खतरे में डाल दी थी और कैसे बीरबल की बुद्धिमानी ने उसे न्याय दिलाया था।

वह अपने बच्चों से अक्सर कहता, “बेटा, जीवन में कभी किसी की मजबूरी का फायदा मत उठाना। यदि तुम्हारे पास धन है तो जरूरतमंद की मदद करना, लेकिन उसकी परेशानी को अपना लाभ कमाने का साधन मत बनाना।”

मोहन पूछता, “पिताजी, क्या धनराज अब भी लालची है?”

हरिया मुस्कुराकर कहता, “नहीं, उसने अपनी गलती से बहुत कुछ सीखा है। लेकिन याद रखना, लालच कभी अचानक पैदा नहीं होता। छोटी-सी लालच धीरे-धीरे बड़ी आदत बन जाती है। इसलिए मन में लालच आने लगे तो उसी समय उसे रोक देना चाहिए।”

राधा पूछती, “और अगर कोई हमारे साथ अन्याय करे तो?”

हरिया कहता, “पहले सच बोलना, फिर उचित रास्ता अपनाना और जरूरत पड़े तो न्याय माँगना। अन्याय के सामने चुप रहना भी ठीक नहीं है।”

इस कहानी की चर्चा धीरे-धीरे आसपास के गाँवों में भी होने लगी। लोग कहते कि दिल्ली के दरबार में एक ऐसा मंत्री है जो केवल राजा को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई का साथ देने के लिए जाना जाता है। बीरबल की बुद्धिमानी की यह कहानी बच्चों और बड़ों के बीच लोकप्रिय हो गई।

कहानी से सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि लालच इंसान की बुद्धि को ढक देता है। धनराज के पास पहले से बहुत धन था, फिर भी वह गरीब किसानों से और अधिक धन लेना चाहता था। उसके पास इतना था कि वह कई परिवारों की सहायता कर सकता था, लेकिन उसका मन संतुष्ट नहीं था। वह जितना पाता, उतना ही अधिक चाहता। अंत में उसकी लालच ने उसे ऐसा काम करने पर मजबूर किया जिससे उसका सम्मान और लोगों का विश्वास दोनों खो गए।

दूसरी सीख यह है कि किसी भी समझौते या कर्ज के मामले में बिना समझे किसी कागज पर हस्ताक्षर या अंगूठा नहीं लगाना चाहिए। हरिया पढ़ा-लिखा नहीं था, इसलिए वह साहूकार की शर्तों को ठीक से समझ नहीं पाया। उसकी मजबूरी ने उसे जोखिम उठाने के लिए मजबूर किया। इसलिए हमें हमेशा सावधान रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सलाह लेनी चाहिए।

तीसरी सीख यह है कि बुद्धि का उपयोग दूसरों को हराने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की रक्षा के लिए करना चाहिए। बीरबल ने साहूकार को केवल गुस्से से नहीं हराया। उन्होंने उसके ही तर्क को उसके सामने रख दिया। साहूकार कह रहा था कि उसके पैसे किसान के पास रहे, इसलिए उसे अतिरिक्त धन मिलना चाहिए। बीरबल ने उसी तर्क को पलटकर पूछा कि यदि किसान ने पूरे वर्ष उसके धन की सुरक्षा की, तो उसे भी उसका मूल्य मिलना चाहिए। इस प्रकार बीरबल ने बिना किसी झगड़े के साहूकार की चालाकी उजागर कर दी।

चौथी सीख यह है कि न्याय करते समय केवल ताकतवर व्यक्ति की बात नहीं सुनी जानी चाहिए। गरीब व्यक्ति की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बादशाह अकबर ने हरिया की बात धैर्य से सुनी और साहूकार को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया। फिर बीरबल ने प्रमाण और तर्क के आधार पर सच्चाई सामने रखी। यही निष्पक्ष न्याय की पहचान है।

पाँचवीं और सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि गलती करने वाला व्यक्ति यदि अपनी गलती स्वीकार कर ले और उसे सुधारने का प्रयास करे तो उसके भीतर परिवर्तन संभव है। धनराज ने पहले अपने लालच को सही समझा, लेकिन जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने अपने व्यवहार में बदलाव किया। उसने किसानों के साथ न्याय करना शुरू किया और धीरे-धीरे अपना खोया हुआ विश्वास वापस पाने की कोशिश की।

इस प्रकार “बीरबल और लोभी साहूकार” की यह कहानी हमें बताती है कि धन से अधिक मूल्यवान ईमानदारी है, चालाकी से अधिक शक्तिशाली बुद्धि है और लालच से अधिक महान संतोष है। जो व्यक्ति दूसरों को धोखा देकर धन कमाता है, वह कुछ समय के लिए सफल दिखाई दे सकता है, लेकिन अंततः उसकी सच्चाई सामने आ जाती है। वहीं जो व्यक्ति ईमानदारी और न्याय का रास्ता अपनाता है, उसे देर से सही, लेकिन सम्मान और विश्वास अवश्य मिलता है। बीरबल की बुद्धिमानी और अकबर के न्याय ने न केवल हरिया की जमीन बचाई, बल्कि पूरे गाँव को यह संदेश दिया कि किसी भी व्यक्ति को उसकी गरीबी के कारण कमजोर समझना गलत है। सच्ची ताकत धन में नहीं, बल्कि न्याय, दया, बुद्धि और इंसानियत में होती है।

 

Comments

Popular posts from this blog

मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

शेरू: एक वफ़ादार आत्मा

गाँव के बाहर पीपल के एक पुराने पेड़ के नीचे एक छोटा-सा कुत्ता अक्सर बैठा दिखाई देता था। उसकी आँखें भूरी थीं , लेकिन उनमें एक अजीब-सी चमक थी , जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो , बहुत कुछ सहा हो। गाँव वाले उसे “शेरू” कहकर बुलाते थे , हालाँकि कोई नहीं जानता था कि उसका असली नाम क्या है , या कभी कोई नाम था भी या नहीं। शेरू जन्म से आवारा नहीं था , लेकिन परिस्थितियों ने उसे आवारा बना दिया था। वह कभी किसी के घर का प्यारा पालतू रहा होगा , यह उसकी आदतों से साफ झलकता था—वह इंसानों से डरता नहीं था , बच्चों के पास जाते समय पूँछ हिलाता था , और किसी के बुलाने पर तुरंत ध्यान देता था। शेरू को सबसे ज़्यादा पसंद था सुबह का समय। जब सूरज धीरे-धीरे खेतों के पीछे से निकलता और हवा में ठंडक घुली रहती , तब वह पूरे गाँव का चक्कर लगाता। कहीं कोई रोटी का टुकड़ा मिल जाए , कहीं कोई दुलार कर दे , तो उसका दिन बन जाता। लेकिन गाँव के ज़्यादातर लोग उसे बस एक आवारा कुत्ता ही समझते थे—कोई पत्थर मार देता , कोई डाँट देता , और कोई अनदेखा कर देता। फिर भी शेरू का भरोसा इंसानों से कभी पूरी तरह टूटा नहीं। गाँव में एक छोटा-सा घर था , जह...