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संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

एक किसान की आखिरी कोशिश

 



 

सुबह का सूरज अभी पूरी तरह आसमान पर नहीं चढ़ा था। गाँव के किनारे फैले खेतों पर हल्की-सी धुंध तैर रही थी। कभी इन खेतों में हरियाली इतनी घनी होती थी कि दूर से देखने पर लगता था जैसे धरती ने हरे रंग की चादर ओढ़ रखी हो। लेकिन आज वही खेत सूखे पड़े थे। मिट्टी में गहरी दरारें थीं, कुएँ का पानी लगभग खत्म हो चुका था और हवा में उड़ती धूल हर चीज को अपने रंग में रंग रही थी। गाँव का नाम था रामपुर और उसी गाँव के आखिरी छोर पर मिट्टी और खपरैल से बना एक छोटा-सा घर था। उस घर में रहता था एक किसान—रघुनाथ। उम्र करीब पचपन साल, चेहरा धूप से झुलसा हुआ, हाथ मेहनत से कठोर और आँखों में जिंदगी के संघर्षों की अनगिनत कहानियाँ थीं। रघुनाथ के पास कुल सात बीघा जमीन थी। यही जमीन उसके पिता ने उसे विरासत में दी थी और यही उसकी दुनिया थी। उसने बचपन से अपने पिता को इसी मिट्टी में पसीना बहाते देखा था। उसके पिता हमेशा कहा करते थे, “बेटा, जमीन कभी किसी को धोखा नहीं देती। बस उसे समय, मेहनत और भरोसा चाहिए।” रघुनाथ ने पिता की बात को जीवन का नियम मान लिया था। उसने कभी शहर जाने की नहीं सोची, कभी कोई दूसरा काम तलाशने की कोशिश नहीं की। उसके लिए किसान होना सिर्फ पेशा नहीं था, बल्कि उसकी पहचान थी।

लेकिन पिछले तीन सालों से बारिश ने जैसे रामपुर से अपना रिश्ता ही तोड़ दिया था। पहले साल बारिश कम हुई तो फसल आधी रह गई। दूसरे साल बेमौसम बारिश ने तैयार फसल बर्बाद कर दी। तीसरे साल बारिश आई ही नहीं। रघुनाथ ने पहले साल बैंक से कर्ज लिया था। दूसरे साल साहूकार से पैसे उधार लिए। तीसरे साल उसने अपनी पत्नी सीता के गहने तक बेच दिए। हर बार वह खुद से कहता, “अगली फसल अच्छी होगी।” लेकिन हर अगली फसल उसके लिए एक नया संघर्ष लेकर आती। अब उसके ऊपर इतना कर्ज हो चुका था कि रात को सोते समय उसे ब्याज की रकम तक याद आती थी। उसका बड़ा बेटा मोहन शहर में मजदूरी करता था। छोटी बेटी गुड़िया की शादी की उम्र हो चुकी थी। घर में बूढ़ी माँ थी, जिसकी दवाइयों का खर्च भी बढ़ता जा रहा था। सीता अक्सर घर के खर्च का हिसाब लगाते-लगाते चुप हो जाती थी, क्योंकि हिसाब हमेशा खर्च से कम और चिंता से ज्यादा होता था।

एक शाम रघुनाथ खेत से वापस आया तो उसकी चाल में पहले जैसी मजबूती नहीं थी। उसने अपनी पुरानी धोती झाड़ी, चारपाई पर बैठ गया और लंबे समय तक जमीन को देखता रहा। सीता ने उसके सामने पानी का गिलास रखा और धीरे से पूछा, “क्या हुआ?” रघुनाथ ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद उसने कहा, “सीता, लगता है अब खेत छोड़ना पड़ेगा।” सीता का हाथ वहीं रुक गया। उसने पति की तरफ देखा और पूछा, “खेत छोड़ दोगे?” रघुनाथ ने सिर झुका लिया। “और क्या करूँ? बीज खरीदने के पैसे नहीं हैं। खाद के पैसे नहीं हैं। कुएँ में पानी नहीं है। ऊपर से साहूकार कल फिर आया था। कह रहा था कि इस बार पैसे नहीं दिए तो जमीन का कागज उसके पास रख देना।” सीता कुछ देर शांत रही। फिर उसने धीमे स्वर में कहा, “लेकिन यही तो हमारी आखिरी उम्मीद है।” रघुनाथ हँसा, मगर उसकी हँसी में दर्द था। “उम्मीद? सीता, उम्मीद से पेट नहीं भरता।” सीता ने जवाब नहीं दिया। उस रात दोनों देर तक जागते रहे। बाहर हवा चल रही थी और खपरैल की छत से आती आवाजें उस घर की खामोशी को और गहरा बना रही थीं।

अगली सुबह गाँव में पंचायत लगी। साहूकार हरिराम ने कई किसानों को बुलाया था। उसके पास गाँव के लगभग आधे किसानों की जमीन के कागज गिरवी रखे थे। उसने रघुनाथ को देखकर कहा, “रघुनाथ, अब क्या सोच रहे हो? तुम्हारा पुराना हिसाब बढ़ता ही जा रहा है।” रघुनाथ ने कहा, “थोड़ा समय दे दो हरिराम।” हरिराम हँस पड़ा। “समय? मैंने तुम्हें तीन साल से समय दिया है। अब या तो पैसे दो या जमीन मेरे नाम कर दो।” आसपास बैठे लोग चुप थे। किसी में हरिराम का विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। रघुनाथ ने अपनी मुट्ठी बाँधी और कहा, “जमीन नहीं दूँगा।” हरिराम ने व्यंग्य से कहा, “तो फिर क्या करोगे? आसमान से पानी गिराओगे?” कुछ लोग हँस पड़े। रघुनाथ चुपचाप वहाँ से चला गया। उसके कानों में हरिराम की आवाज गूँजती रही—“आसमान से पानी गिराओगे?” उस दिन पहली बार उसे अपनी मेहनत बेकार लगने लगी।

घर लौटकर उसने अपनी पुरानी संदूकची खोली। उसमें उसके पिता की एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर के पीछे उसके पिता ने एक वाक्य लिखा था—“जब रास्ते बंद हो जाएँ, तो रास्ता बनाना।” रघुनाथ तस्वीर को देर तक देखता रहा। उसे अपने पिता की आवाज सुनाई देने लगी। उसे याद आया कि बचपन में जब खेत में पानी नहीं होता था, उसके पिता दूर नदी से पानी लाकर फसल बचाते थे। जब बैल बीमार हो जाते थे, वे खुद हल खींचने की कोशिश करते थे। जब फसल खराब होती थी, वे अगले मौसम की तैयारी शुरू कर देते थे। उसके पिता ने कभी हार मानना नहीं सीखा था। रघुनाथ ने तस्वीर को माथे से लगाया और पहली बार कई महीनों बाद उसकी आँखों में आँसू के साथ एक छोटी-सी चमक दिखाई दी।

उस रात उसने पूरे परिवार को बुलाया। मोहन भी कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गाँव आया हुआ था। रघुनाथ ने कहा, “मैंने फैसला किया है कि हम आखिरी बार खेती करेंगे।” मोहन ने तुरंत कहा, “बाबा, पैसे कहाँ से आएँगे?” रघुनाथ ने कहा, “पैसे कम हैं, लेकिन हमारे पास हाथ हैं।” मोहन ने निराश होकर कहा, “बाबा, हाथों से पानी तो नहीं निकल सकता।” रघुनाथ ने उसकी तरफ देखा और कहा, “निकल सकता है, अगर हाथ मिट्टी खोदना सीख लें।” सब उसकी तरफ देखने लगे। रघुनाथ ने बताया कि उसने तय किया है कि खेत के नीचे से गुजरने वाली पुरानी छोटी नहर को साफ करेगा। बरसों पहले गाँव के बुजुर्गों ने उस नहर से खेतों तक पानी पहुँचाया था, लेकिन अब वह मिट्टी और पत्थरों से पूरी तरह बंद हो चुकी थी। रघुनाथ का मानना था कि अगर नहर का रास्ता खुल जाए और पहाड़ी के पीछे जमा बारिश का पानी उसमें आ जाए, तो खेतों में सिंचाई हो सकती है। मोहन ने कहा, “लेकिन इसे अकेले कैसे करोगे?” रघुनाथ बोला, “अकेला नहीं करूँगा। जिसे साथ आना होगा, वह आएगा।”

अगली सुबह रघुनाथ फावड़ा लेकर खेत से आगे उस पुरानी नहर के पास पहुँचा। उसने मिट्टी हटानी शुरू की। पहली चोट में ही फावड़ा पत्थर से टकराया। उसने पत्थर हटाया। फिर मिट्टी खोदी। सूरज ऊपर चढ़ता गया, पसीना बहता गया, मगर वह रुकता नहीं था। दोपहर तक उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए। शाम को वह घर लौटा तो सीता ने उसके हाथ देखे। उसने चिंतित होकर पूछा, “ये क्या कर लिया?” रघुनाथ ने मुस्कुराकर कहा, “शायद पानी की तलाश में मेरे हाथों ने खुद को खोलना शुरू किया है।” सीता ने उसके हाथों पर तेल लगाया। उस रात रघुनाथ दर्द के कारण ठीक से सो नहीं पाया, लेकिन अगले दिन फिर फावड़ा लेकर निकल गया।

तीन दिन तक वह अकेला नहर खोदता रहा। गाँव के लोग दूर से उसे देखते और आपस में बातें करते। कोई कहता, “बूढ़ा पागल हो गया है।” कोई कहता, “इतने सालों से बंद नहर अब क्या पानी देगी?” कोई मजाक उड़ाता, “रघुनाथ अब पहाड़ काटेगा।” लेकिन रघुनाथ किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। चौथे दिन उसका बेटा मोहन भी उसके साथ आ गया। उसने फावड़ा उठाते हुए कहा, “बाबा, अगर आखिरी कोशिश है तो मैं भी साथ हूँ।” रघुनाथ ने उसकी ओर देखा और कुछ नहीं कहा। बस उसके कंधे पर हाथ रख दिया। दोनों पिता-पुत्र सुबह से शाम तक मिट्टी हटाते रहे।

धीरे-धीरे गाँव के दो और किसान उनके साथ जुड़ गए। फिर तीन और। कुछ लोग सिर्फ देखने आते थे, लेकिन उनमें से कुछ वापस फावड़ा लेकर लौटने लगे। रघुनाथ ने किसी से मदद नहीं माँगी थी, फिर भी उसकी मेहनत लोगों को अपने आप खींच रही थी। उसे देखकर लोगों को लगने लगा था कि शायद रास्ता सचमुच बनाया जा सकता है। दसवें दिन नहर का लगभग सौ मीटर हिस्सा साफ हो चुका था। लेकिन तभी एक बड़ी चट्टान सामने आ गई। वह इतनी विशाल थी कि उसे सामान्य औजारों से हटाना मुश्किल था। सभी किसान थककर बैठ गए। मोहन ने कहा, “बाबा, शायद अब नहीं होगा।” रघुनाथ ने चट्टान को देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में हार नहीं थी। उसने कहा, “अगर रास्ते में चट्टान है तो इसका मतलब यह नहीं कि रास्ता खत्म हो गया। इसका मतलब है कि अब हमें चट्टान से बड़ा इरादा चाहिए।”

अगले दिन रघुनाथ ने गाँव के लोहार से लोहे की छड़ें बनवाईं। उसने चट्टान के आसपास मिट्टी हटाई। कई घंटों की मेहनत के बाद उसने चट्टान में छोटे-छोटे छेद किए। फिर लोहे की छड़ों की मदद से उसे कमजोर करने की कोशिश की। काम कठिन था। कई दिन लग गए। आखिर एक सुबह चट्टान में दरार आई। सब लोग उत्साह से चिल्लाए। रघुनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखा, पत्थर भी थकता है।” चट्टान धीरे-धीरे टूट गई। उसके पीछे पुरानी नहर का रास्ता और साफ दिखाई देने लगा। लेकिन खुशी ज्यादा देर नहीं रही। आगे नहर पूरी तरह धँसी हुई थी। मिट्टी और पत्थरों का ढेर देखकर एक किसान ने कहा, “इतना सब फिर से साफ करना पड़ेगा?” रघुनाथ ने कहा, “हाँ।” वह किसान बोला, “कब तक?” रघुनाथ ने फावड़ा उठाते हुए कहा, “जब तक पानी नहीं आता।”

दिन बीतते गए। अब गाँव के बच्चे भी शाम को वहाँ पहुँच जाते और मिट्टी हटाने में छोटे-छोटे हाथों से मदद करते। महिलाएँ मजदूरों के लिए पानी और खाना लेकर आने लगीं। सीता रोज सुबह रोटियाँ बाँधकर देती। मोहन ने शहर वापस जाने का फैसला टाल दिया। रघुनाथ का छोटा खेत अब सिर्फ उसका खेत नहीं रहा था। वह पूरे गाँव की उम्मीद बन गया था। लेकिन इस उम्मीद के साथ खतरे भी बढ़ रहे थे। साहूकार हरिराम को यह सब पसंद नहीं था। उसे डर था कि अगर गाँव के किसान एकजुट हो गए तो उसका दबदबा खत्म हो जाएगा। एक शाम उसने रघुनाथ को रोककर कहा, “ये सब बंद कर दो। तुम्हारी जमीन तो वैसे भी बचने वाली नहीं।” रघुनाथ ने शांत स्वर में कहा, “जमीन बची या नहीं, यह बाद की बात है। लेकिन कोशिश करना मेरे हाथ में है।” हरिराम ने धमकी दी, “बहुत पछताओगे।” रघुनाथ ने कहा, “पछतावा कोशिश करने से नहीं, कोशिश छोड़ देने से होता है।”

कुछ ही दिनों बाद रघुनाथ के खेत में एक और समस्या खड़ी हो गई। बीज खरीदने के लिए उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। बैंक से नया कर्ज नहीं मिल सकता था। साहूकार ने साफ मना कर दिया। रघुनाथ घर लौटकर चुप बैठ गया। सीता ने पूछा, “अब क्या सोच रहे हो?” उसने कहा, “नहर का रास्ता लगभग तैयार है, लेकिन खेत में बोने के लिए बीज नहीं हैं।” सीता कुछ देर कमरे में गई और एक छोटी कपड़े की पोटली लेकर आई। उसमें उसकी माँ की दी हुई चाँदी की पायल थी। उसने पायल रघुनाथ के हाथ में रख दी और बोली, “इसे बेच दो।” रघुनाथ ने तुरंत मना कर दिया। “नहीं, यह तुम्हारी आखिरी निशानी है।” सीता मुस्कुराई और बोली, “निशानी पैरों में नहीं, दिल में रहती है। अगर ये पायल हमारी फसल बचा सकती है तो इससे अच्छी जगह इनके लिए क्या होगी?” रघुनाथ की आँखें भर आईं। उसने पायल बेच दी और बीज खरीदे।

अगले दिन खेत में बुवाई शुरू हुई। हर बीज के साथ रघुनाथ जैसे अपनी एक उम्मीद मिट्टी में बो रहा था। मोहन उसके साथ था। गाँव के दूसरे किसान भी अपने खेतों में बीज डालने लगे। आसमान अब भी साफ था। बादल कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। सब जानते थे कि नहर में पानी तभी आएगा जब पहाड़ी के पीछे जमा जलधारा का रास्ता खुलेगा। कई दिनों तक कोई पानी नहीं आया। खेतों में बीज पड़े थे, मगर मिट्टी सूख रही थी। रघुनाथ हर सुबह नहर के मुहाने तक जाता, उसे देखता और वापस लौट आता। धीरे-धीरे गाँव वालों का उत्साह कम होने लगा। कुछ लोग कहने लगे, “शायद हमने गलती की।” मोहन भी एक दिन निराश होकर बोला, “बाबा, अगर पानी नहीं आया तो?” रघुनाथ ने कहा, “तो हम फिर सोचेंगे।” मोहन बोला, “और अगर फिर भी नहीं आया?” रघुनाथ ने कहा, “तो फिर एक और रास्ता बनाएँगे।”

एक रात तेज हवा चली। आसमान में बादल आए, लेकिन बारिश नहीं हुई। रघुनाथ घर से बाहर निकला और आसमान की तरफ देखने लगा। उसके भीतर निराशा की एक लहर उठी। उसने पहली बार सोचा कि शायद सच में वह हार गया है। उम्र, कर्ज, सूखा, परिवार की चिंता—सब एक साथ उसके सामने खड़े थे। वह धीरे-धीरे खेत की मेड़ पर जाकर बैठ गया। उसके हाथ में पिता की पुरानी तस्वीर थी। उसने तस्वीर को देखते हुए कहा, “बाबा, मैंने पूरी कोशिश की। लेकिन शायद अब मेरी ताकत खत्म हो गई है।” कुछ देर बाद उसे लगा जैसे भीतर से कोई आवाज आई—“आखिरी कोशिश का मतलब यह नहीं कि आखिरी बार कोशिश करो। इसका मतलब है कि जब तक सांस है, कोशिश खत्म मत मानो।” रघुनाथ ने आँखें बंद कीं। फिर उसने तस्वीर जेब में रखी और उठ खड़ा हुआ।

अगली सुबह उसने गाँव के लोगों को बुलाया और कहा कि नहर का रास्ता पूरी तरह साफ करने के बाद भी एक जगह पानी रुक रहा है। उसने पहाड़ी के ऊपर जाने का फैसला किया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि वर्षों की मिट्टी और झाड़ियों ने पानी के पुराने स्रोत को पूरी तरह बंद कर दिया था। अगर उस जगह छोटा बाँध बनाकर पानी को सही दिशा दी जाए तो नहर में पानी आ सकता था। काम और कठिन था। लेकिन अब पूरा गाँव उसके साथ था। पुरुषों ने मिट्टी काटी, महिलाएँ पत्थर लाईं, बच्चों ने छोटी टोकरी में मिट्टी ढोई। कई दिनों की मेहनत के बाद एक छोटा-सा जलसंचय बाँध तैयार हुआ। सभी लोग चुपचाप आसमान की ओर देखते रहे। उन्हें बारिश का इंतजार था।

फिर एक दिन दोपहर के समय हवा बदली। दूर आसमान पर काले बादल दिखाई दिए। गाँव के बच्चों ने चिल्लाकर कहा, “बादल आ गए!” लोग घरों से बाहर निकल आए। कुछ ही देर में बिजली चमकी। रघुनाथ ने आसमान की ओर देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। पहली बूंद उसके माथे पर गिरी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। देखते ही देखते बारिश तेज हो गई। लोग खुशी से नाचने लगे। पहाड़ी पर पानी जमा होने लगा। नया बनाया बाँध पानी को रोक रहा था और पानी धीरे-धीरे नहर की ओर बढ़ने लगा। रघुनाथ, मोहन और गाँव के लोग नहर के किनारे दौड़ते हुए पहुँचे। पहले थोड़ी-सी धारा दिखाई दी। फिर पानी तेज हुआ। कुछ ही मिनटों में नहर में पानी बहने लगा।

रघुनाथ घुटनों के बल मिट्टी पर बैठ गया। उसने दोनों हथेलियाँ पानी में डुबोईं। उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। मोहन ने पिता को गले लगा लिया। रघुनाथ ने कहा, “पानी आया है बेटा।” मोहन रोते हुए बोला, “हाँ बाबा, पानी आया है।” आसपास खड़े किसानों की आँखें भी नम थीं। किसी ने कहा, “रघुनाथ, तुमने हमें बचा लिया।” रघुनाथ ने सिर हिलाया और कहा, “मैंने नहीं। हमने बचाया है।” उस दिन पूरे गाँव ने महसूस किया कि कभी-कभी सबसे बड़ी ताकत किसी एक इंसान में नहीं, बल्कि कई लोगों की एकजुट कोशिश में होती है।

बारिश लगातार कई दिनों तक होती रही। नहर के पानी से खेतों में सिंचाई होने लगी। कुछ ही हफ्तों में सूखी धरती पर हरे पौधे दिखाई देने लगे। जिस जमीन पर दरारें थीं, वहाँ अब हरियाली फैलने लगी। रघुनाथ हर सुबह खेत में जाता और पौधों को देखता। उसे लगता जैसे उसके बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो रहे हों। लेकिन संघर्ष अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। फसल को तैयार होने में समय था। कर्ज अभी भी था। साहूकार का दबाव अभी भी था। मगर अब गाँव के किसान अकेले नहीं थे। उन्होंने मिलकर एक किसान समूह बनाया। बीज सामूहिक रूप से खरीदने लगे, पानी बाँटने का नियम बनाया और फसल बेचने के लिए सीधे मंडी तक जाने की योजना बनाई।

हरिराम साहूकार को यह देखकर गुस्सा आने लगा। पहले किसान जरूरत के समय उसी के पास जाते थे। अब वे मिलकर काम कर रहे थे। उसने रघुनाथ को फिर धमकाया। “तुमने गाँव को मेरे खिलाफ कर दिया।” रघुनाथ ने शांत स्वर में कहा, “मैंने किसी को तुम्हारे खिलाफ नहीं किया। हमने सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।” हरिराम ने कहा, “तुम्हारा कर्ज अभी बाकी है।” रघुनाथ ने कहा, “हाँ, और मैं उसे चुका दूँगा। लेकिन अपनी जमीन बेचकर नहीं, अपनी मेहनत से।” यह बात सुनकर पहली बार हरिराम के चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

कुछ महीनों बाद फसल तैयार हो गई। गेहूँ की बालियाँ हवा में झूम रही थीं। खेतों का दृश्य इतना सुंदर था कि रघुनाथ को अपने पिता की याद आ गई। उसने खेत की मिट्टी उठाकर माथे से लगाई। कटाई के दिन पूरा गाँव एक साथ खेतों में उतर आया। महिलाओं ने गीत गाए, बच्चे खुश होकर दौड़ते रहे और किसान फसल काटते रहे। उस साल रघुनाथ की फसल सिर्फ अच्छी नहीं हुई थी, बल्कि पिछले कई वर्षों की तुलना में सबसे बेहतर हुई थी। उसने फसल का एक हिस्सा घर के लिए रखा, बाकी मंडी में बेच दिया। पैसे मिले तो सबसे पहले उसने साहूकार का कुछ कर्ज चुकाया। फिर माँ की दवाइयाँ खरीदीं। बेटी गुड़िया की शादी के लिए थोड़ा पैसा अलग रखा। और सबसे अंत में उसने सीता के लिए नई पायल खरीदी।

जब उसने पायल सीता के हाथ में रखी तो सीता की आँखें भर आईं। उसने कहा, “मैंने तो सोचा था वह पायल हमेशा के लिए चली गई।” रघुनाथ मुस्कुराया और बोला, “वह गई नहीं थी। उसने रास्ता बनाया था।” सीता ने पायल पहन ली। रघुनाथ कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “उस दिन तुमने जो दिया था, वह सिर्फ चाँदी नहीं थी। वह भरोसा था।” सीता ने कहा, “और तुम्हारी कोशिश ने उस भरोसे को सच कर दिया।”

कुछ समय बाद गाँव में पंचायत हुई। इस बार लोग रघुनाथ को बुलाने नहीं, उसका सम्मान करने के लिए इकट्ठा हुए थे। गाँव के बुजुर्ग ने कहा, “रघुनाथ ने हमें सिखाया कि सूखा जमीन में आता है, अगर आदमी के मन में आ जाए तो असली नुकसान तब होता है।” सभी तालियाँ बजाने लगे। रघुनाथ खड़ा हुआ और बोला, “मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूँ। मैं बस किसान हूँ। मैंने वही किया जो मेरे पिता मुझे सिखाकर गए थे—मुश्किल आने पर रास्ता ढूँढ़ना। लेकिन मैं आप सबसे एक बात कहना चाहता हूँ। जिंदगी में कई बार ऐसा लगेगा कि हमारे पास कुछ नहीं बचा। पैसा नहीं होगा, साधन नहीं होंगे, लोग साथ नहीं देंगे और रास्ता बंद दिखाई देगा। उस समय हमें अपनी आखिरी कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि कई बार सफलता हमारी आखिरी कोशिश के ठीक पीछे खड़ी होती है।”

मोहन ने पिता की ओर देखा। उसे अब समझ आ चुका था कि खेती सिर्फ खेत में बीज डालने का नाम नहीं है। खेती भरोसे की भी होती है। जिस तरह किसान मिट्टी में एक छोटा-सा बीज डालकर महीनों तक उसका इंतजार करता है, उसी तरह जिंदगी में भी इंसान को अपनी मेहनत के बीज बोने पड़ते हैं। हर बीज तुरंत पेड़ नहीं बनता। कुछ बीज सूख जाते हैं, कुछ बारिश में बह जाते हैं, कुछ को कीड़े खा जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसान बीज डालना छोड़ देता है। वह अगली ऋतु में फिर खेत तैयार करता है, फिर बीज डालता है और फिर उम्मीद करता है।

समय बीतता गया। रघुनाथ का गाँव धीरे-धीरे बदलने लगा। पुरानी नहर अब पूरे क्षेत्र के लिए जीवनरेखा बन गई। गाँव वालों ने कई छोटे जलसंचय केंद्र बनाए। उन्होंने बारिश के पानी को बचाना सीखा। फसल बदल-बदलकर बोने लगे। कुछ किसानों ने सब्जियाँ उगानी शुरू कीं। कुछ ने पशुपालन शुरू किया। गाँव में पहली बार लोगों ने समझा कि गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं होती, कभी-कभी जानकारी और एकता की कमी भी गरीबी पैदा करती है। रघुनाथ ने अपनी कहानी किसी किताब में नहीं लिखी थी, लेकिन उसकी मेहनत गाँव की मिट्टी में लिखी जा चुकी थी।

एक शाम रघुनाथ उसी नहर के किनारे बैठा था जहाँ उसने वर्षों पहले पहली बार फावड़ा चलाया था। अब वहाँ पानी बह रहा था। सूरज ढल रहा था और आसमान नारंगी रंग में रंगा हुआ था। मोहन उसके पास आकर बैठ गया। उसने पूछा, “बाबा, उस दिन जब सब लोग कह रहे थे कि कुछ नहीं होगा, तब आपको डर नहीं लगा था?” रघुनाथ हँसा और बोला, “बहुत डर लगा था।” मोहन ने आश्चर्य से पूछा, “फिर आपने कोशिश कैसे जारी रखी?” रघुनाथ ने कुछ देर पानी को देखा और कहा, “बहादुर वह नहीं होता जिसे डर नहीं लगता। बहादुर वह होता है जो डर लगने के बाद भी सही दिशा में एक कदम आगे बढ़ाता है।” मोहन चुप रहा। रघुनाथ ने आगे कहा, “और याद रखना, बेटा, जिंदगी में आखिरी कोशिश जैसी कोई चीज नहीं होती। जब तक सांस है, तब तक अगली कोशिश की संभावना रहती है।”

मोहन ने पूछा, “अगर उस दिन बारिश नहीं होती तो?” रघुनाथ ने मुस्कुराकर कहा, “तो हम पानी का कोई और रास्ता ढूँढ़ते।” मोहन बोला, “और अगर वह भी नहीं मिलता?” रघुनाथ ने कहा, “तो तीसरा रास्ता ढूँढ़ते।” मोहन ने हँसते हुए कहा, “और अगर तीसरा भी नहीं मिलता?” रघुनाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “तब रास्ता बनाते।” दोनों हँस पड़े।

उस रात रघुनाथ घर लौटा। उसने पिता की पुरानी तस्वीर फिर से संदूकची में रखी। तस्वीर के पीछे वही वाक्य लिखा था—“जब रास्ते बंद हो जाएँ, तो रास्ता बनाना।” अब वह वाक्य उसके लिए सिर्फ शब्द नहीं था। वह उसके जीवन का सच बन चुका था। उसने महसूस किया कि उसकी असली जीत सिर्फ फसल की नहीं थी। उसकी असली जीत उस दिन हुई थी जब उसने हार मानने से इनकार कर दिया था। फसल तो बाद में आई थी। पानी भी बाद में आया था। पैसे भी बाद में आए थे। लेकिन सबसे पहले उसके भीतर उम्मीद वापस आई थी।

और शायद यही जिंदगी का सबसे बड़ा सच है। जब हालात हमारे खिलाफ हों, जब लोग हमारा मजाक उड़ाएँ, जब मेहनत का परिणाम दिखाई न दे, जब बार-बार असफलता मिले और जब हमें लगे कि अब कुछ भी नहीं बचा, तब अक्सर हमारी कहानी खत्म नहीं हो रही होती—वहीं से हमारी असली कहानी शुरू हो रही होती है। सफलता हमेशा बड़े अवसर के रूप में नहीं आती। कभी वह एक छोटे से फावड़े की चोट में छिपी होती है। कभी वह किसी परिवार के भरोसे में छिपी होती है। कभी वह दोस्तों और पड़ोसियों के साथ में होती है। और कभी वह सिर्फ इस फैसले में होती है कि “मैं एक बार और कोशिश करूँगा।”

रघुनाथ ने उस साल बहुत कुछ खोया था—पैसा, आराम, नींद और वर्षों की निश्चितता। लेकिन उसने एक चीज पा ली थी जो इन सब से बड़ी थी—अपने ऊपर विश्वास। उसने जाना कि इंसान की असली ताकत उसके पास मौजूद साधनों में नहीं, बल्कि उन साधनों के खत्म हो जाने के बाद भी आगे बढ़ने की इच्छा में होती है। जिस किसान को लोग पागल कह रहे थे, उसी किसान की कोशिश ने पूरे गाँव की जिंदगी बदल दी थी।

इसलिए जब भी जिंदगी आपको किसी सूखे खेत के सामने खड़ा कर दे, जब आपको लगे कि आपकी मेहनत का कोई परिणाम नहीं मिल रहा, जब हर दरवाजा बंद दिखाई दे और कोई यह कहे कि “अब कुछ नहीं हो सकता”, तब रघुनाथ को याद करना। फावड़ा उठाना। पहला कदम बढ़ाना। हो सकता है रास्ते में पत्थर मिले। हो सकता है चट्टान मिले। हो सकता है कई बार आपको पीछे लौटना पड़े। लेकिन कोशिश मत छोड़ना। क्योंकि शायद जिस जगह आपको अंत दिखाई दे रहा है, उसी जगह सफलता की पहली बूंद आपका इंतजार कर रही हो।

रघुनाथ की कहानी हमें यही सिखाती है कि इंसान तब नहीं हारता जब वह गिर जाता है। इंसान तब हारता है जब वह दोबारा उठने से इनकार कर देता है। परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन हों, अगर उम्मीद जिंदा है तो रास्ता बनाया जा सकता है। और कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत उसी कोशिश के बाद मिलती है, जिसे हम अपनी “आखिरी कोशिश” समझकर शुरू करते हैं।

इसलिए हार मत मानिए। आज नहीं हुआ तो कल कोशिश कीजिए। कल नहीं हुआ तो फिर कोशिश कीजिए। रास्ता नहीं मिला तो रास्ता बनाइए। क्योंकि आपकी कहानी का सबसे खूबसूरत अध्याय शायद अभी लिखा ही नहीं गया है। और याद रखिए—आखिरी कोशिश अक्सर आखिरी नहीं होती, वही कोशिश एक नई शुरुआत बन जाती है।

 

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मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

शेरू: एक वफ़ादार आत्मा

गाँव के बाहर पीपल के एक पुराने पेड़ के नीचे एक छोटा-सा कुत्ता अक्सर बैठा दिखाई देता था। उसकी आँखें भूरी थीं , लेकिन उनमें एक अजीब-सी चमक थी , जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो , बहुत कुछ सहा हो। गाँव वाले उसे “शेरू” कहकर बुलाते थे , हालाँकि कोई नहीं जानता था कि उसका असली नाम क्या है , या कभी कोई नाम था भी या नहीं। शेरू जन्म से आवारा नहीं था , लेकिन परिस्थितियों ने उसे आवारा बना दिया था। वह कभी किसी के घर का प्यारा पालतू रहा होगा , यह उसकी आदतों से साफ झलकता था—वह इंसानों से डरता नहीं था , बच्चों के पास जाते समय पूँछ हिलाता था , और किसी के बुलाने पर तुरंत ध्यान देता था। शेरू को सबसे ज़्यादा पसंद था सुबह का समय। जब सूरज धीरे-धीरे खेतों के पीछे से निकलता और हवा में ठंडक घुली रहती , तब वह पूरे गाँव का चक्कर लगाता। कहीं कोई रोटी का टुकड़ा मिल जाए , कहीं कोई दुलार कर दे , तो उसका दिन बन जाता। लेकिन गाँव के ज़्यादातर लोग उसे बस एक आवारा कुत्ता ही समझते थे—कोई पत्थर मार देता , कोई डाँट देता , और कोई अनदेखा कर देता। फिर भी शेरू का भरोसा इंसानों से कभी पूरी तरह टूटा नहीं। गाँव में एक छोटा-सा घर था , जह...