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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

छोटा कदम, बड़ी मंज़िल

 


 

एक छोटे-से गाँव के किनारे मिट्टी और खपरैल से बना एक घर था। घर इतना छोटा था कि बरसात के दिनों में परिवार के सभी लोगों को एक ही कमरे में बैठकर रात गुजारनी पड़ती थी। घर की दीवारों पर जगह-जगह दरारें थीं और छत से पानी टपकना तो जैसे उस घर की पुरानी आदत थी। उसी घर में सत्रह वर्ष का एक लड़का रहता था—उसका नाम था आरव। आरव की आँखों में एक ऐसा सपना था, जो उसके छोटे-से घर से कहीं बड़ा था। वह पढ़-लिखकर अपने गाँव का पहला ऐसा युवक बनना चाहता था, जो शहर जाकर बड़ा अधिकारी बने और फिर अपने गाँव के बच्चों के लिए एक अच्छी पाठशाला बनाए। लेकिन सपना देखना आसान था और उसे पूरा करने की राह बहुत कठिन।

आरव के पिता रामदास गाँव में खेतों में मजदूरी करते थे। कभी काम मिलता, कभी नहीं मिलता। माँ सीता घरों में सिलाई करके थोड़े-बहुत पैसे कमा लेती थीं। परिवार में आरव के अलावा उसकी छोटी बहन गौरी भी थी। घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि कई बार महीने के आखिरी दिनों में चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो जाता था। फिर भी आरव के माता-पिता ने अपने बच्चों की पढ़ाई बंद नहीं होने दी। पिता अक्सर कहते, “बेटा, हमारे पास तुम्हें देने के लिए जमीन-जायदाद नहीं है, लेकिन अगर तुम पढ़ाई कर लो तो तुम्हारी मेहनत ही तुम्हारी सबसे बड़ी संपत्ति होगी।”

आरव को पिता की यह बात हमेशा याद रहती थी। वह जानता था कि उसके पास महँगी किताबें नहीं हैं, अच्छा स्कूल नहीं है, पढ़ने के लिए अलग कमरा नहीं है और न ही परीक्षा की तैयारी कराने वाला कोई शिक्षक। लेकिन उसके पास एक चीज थी—हार न मानने का फैसला। वह अक्सर गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ता था। वहीं से स्कूल लगभग दो किलोमीटर दूर था। सुबह वह पैदल स्कूल जाता और दोपहर में लौटकर पिता के साथ खेतों में हाथ बँटाता। शाम को माँ के लिए सिलाई का सामान लाता और फिर रात में मिट्टी के दीये की रोशनी में पढ़ाई करता।

एक दिन स्कूल में शिक्षक ने सभी बच्चों से पूछा, “तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?” किसी ने कहा डॉक्टर, किसी ने इंजीनियर, किसी ने पुलिस अधिकारी। आरव चुप बैठा रहा। शिक्षक ने उसकी ओर देखकर पूछा, “और तुम, आरव?” आरव ने धीरे से कहा, “मैं ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ, जो अपने गाँव के बच्चों की जिंदगी बदल सके।” पूरी कक्षा कुछ पल के लिए शांत हो गई। कुछ बच्चों ने हँसते हुए कहा, “पहले अपने घर की हालत तो बदल लो, फिर गाँव बदलना।” आरव को उन शब्दों से दुख हुआ, लेकिन उसने जवाब नहीं दिया। उस दिन उसने मन ही मन तय किया कि वह लोगों को अपने शब्दों से नहीं, अपनी मेहनत के परिणाम से जवाब देगा।

 

कुछ दिनों बाद जिला स्तर की छात्रवृत्ति परीक्षा की घोषणा हुई। शिक्षक ने आरव को परीक्षा देने के लिए कहा। छात्रवृत्ति मिल जाती तो उसकी आगे की पढ़ाई का खर्च काफी हद तक निकल सकता था। आरव ने परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन समस्या यह थी कि उसके पास पाठ्यक्रम की पूरी किताबें नहीं थीं। स्कूल के बाद वह अपने सहपाठियों से किताबें माँगकर उनके अध्यायों की नकल अपनी पुरानी कॉपी में करता। कभी-कभी उसे एक ही किताब रातभर के लिए मिलती और सुबह उसे वापस करनी पड़ती। वह देर रात तक लिखता रहता।

एक रात माँ ने उसे दीये के सामने झुके हुए देखा। उसकी आँखें लाल थीं। माँ ने कहा, “बेटा, अब सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है।” आरव ने मुस्कुराकर कहा, “बस माँ, यह अध्याय पूरा कर लूँ।” माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं, “तुम इतना क्यों करते हो?” आरव ने कहा, “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि हमारी गरीबी मेरे सपनों की सीमा तय करे।” माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस उसके पास बैठकर थोड़ी देर तक उसे पढ़ते हुए देखती रहीं।

परीक्षा का दिन आया। आरव सुबह चार बजे उठा। घर में खाने के लिए केवल थोड़ा-सा सूखा चूड़ा था। उसने वही खाया और पैदल परीक्षा केंद्र की ओर चल पड़ा। रास्ते में तेज बारिश शुरू हो गई। उसके पास छाता नहीं था। वह एक पेड़ के नीचे कुछ देर खड़ा रहा, फिर परीक्षा के समय का ध्यान करके दौड़ने लगा। जब वह केंद्र पर पहुँचा तो उसके कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे। उसके पास बैठने वाले कुछ छात्रों ने उसे देखकर हँसी उड़ाई। आरव ने किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। उसने अपनी कॉपी और पेन निकाला और परीक्षा शुरू कर दी।

तीन घंटे की परीक्षा खत्म हुई। आरव बाहर आया तो उसके मन में संतोष था। उसे नहीं पता था कि परिणाम क्या होगा, लेकिन वह जानता था कि उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। घर लौटते समय उसने आसमान की ओर देखा और मन में कहा, “अब परिणाम जो भी हो, मैं रुकूँगा नहीं।”

कुछ सप्ताह बाद परिणाम आया। आरव का चयन नहीं हुआ था।

वह कागज हाथ में लेकर बहुत देर तक स्कूल के पीछे बैठा रहा। उसे पहली बार लगा कि शायद उसके सपने सच में उससे बहुत दूर हैं। जिन बच्चों के पास अच्छे स्कूल थे, किताबें थीं, कोचिंग थी, उनके मुकाबले वह कहाँ खड़ा था? उसे लगा कि उसने इतनी मेहनत की और फिर भी हार गया। उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।

 

तभी उसके शिक्षक वहाँ पहुँचे। उन्होंने आरव को उदास देखा तो पूछा, “क्या हुआ?” आरव ने परिणाम दिखाते हुए कहा, “मैं हार गया, गुरुजी।” शिक्षक कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने कहा, “नहीं, तुम परीक्षा में असफल हुए हो, लेकिन तुम हारे नहीं हो। हार तब होगी जब तुम अगली बार कोशिश करने से मना कर दोगे।”

आरव ने सिर उठाकर उनकी ओर देखा।

शिक्षक ने जमीन से एक छोटा-सा पत्थर उठाया और कहा, “देखो इसे। अगर कोई आदमी इसे एक बार ठोकर मारकर कहे कि यह नहीं हिला, तो क्या वह इसे पहाड़ समझ ले? नहीं। सफलता भी ऐसी ही है। एक कोशिश में रास्ता न खुले तो कदम रोकने नहीं चाहिए। छोटा कदम भी कदम होता है।”

उस दिन आरव घर लौटा तो उसके भीतर कुछ बदल चुका था। उसने अपनी असफलता को अंतिम फैसला मानने के बजाय उसे एक सबक माना। उसने एक कॉपी निकाली और उसके पहले पन्ने पर लिखा—“मैं गिर सकता हूँ, लेकिन रुकूँगा नहीं।”

अगले दिन से उसने अपनी तैयारी फिर शुरू कर दी। इस बार उसने केवल ज्यादा पढ़ने का फैसला नहीं किया, बल्कि बेहतर तरीके से पढ़ने का फैसला किया। उसने अपने कमजोर विषयों की सूची बनाई। गणित में उसकी पकड़ कमजोर थी, इसलिए उसने रोज केवल दस सवाल हल करने का लक्ष्य रखा। पहले दिन दस में से चार गलत हुए। दूसरे दिन तीन। तीसरे दिन दो। कई दिनों बाद वह आठ-दस सवाल सही करने लगा। उसने महसूस किया कि बड़ी सफलता एक दिन में नहीं आती। वह रोज किए गए छोटे-छोटे प्रयासों से बनती है।

उसने अंग्रेजी के लिए भी एक नया तरीका अपनाया। गाँव में अंग्रेजी बोलने वाला कोई नहीं था। इसलिए वह रोज पाँच नए शब्द सीखता और उन शब्दों से छोटे-छोटे वाक्य बनाता। शुरुआत में उसे अजीब लगता। वह खुद से अंग्रेजी बोलता और कई बार गलतियाँ करता। गाँव के कुछ लड़के उसका मजाक उड़ाते। लेकिन आरव ने तय किया कि मजाक से बचने के लिए वह सीखना बंद नहीं करेगा।

एक दिन उसने आईने के सामने खड़े होकर अंग्रेजी में अपना परिचय देने की कोशिश की। पहली बार वह केवल दो वाक्य बोल पाया। दूसरी बार चार। एक महीने बाद वह बिना रुके कई मिनट बोलने लगा। उसने सीखा कि आत्मविश्वास भी अभ्यास से पैदा होता है।

समय बीतता गया। आरव की जिंदगी में कोई चमत्कार नहीं हुआ। गरीबी वहीं थी। घर की छत अब भी बरसात में टपकती थी। पिता अब भी मजदूरी करते थे। माँ अब भी सिलाई करती थीं। लेकिन आरव बदल रहा था। उसकी सोच बदल रही थी। वह समस्याओं को देखकर डरने के बजाय उनके बीच रास्ता खोजने लगा था।

एक शाम पिता खेत से लौटे तो उनके हाथ में एक छोटा-सा लिफाफा था। उन्होंने कहा, “आज मालिक ने मजदूरी के पैसे दिए हैं। लेकिन घर का राशन खरीदने के बाद ज्यादा नहीं बचेगा।” आरव ने पिता की ओर देखा और बोला, “बाबा, मेरी फीस की चिंता मत करना। मैं स्कूल के बाद बच्चों को पढ़ा दूँगा। जो पैसे मिलेंगे, उनसे अपनी किताबें खरीद लूँगा।”

पिता ने कहा, “तुम खुद पढ़ते हो, फिर दूसरों को कैसे पढ़ाओगे?”

आरव मुस्कुराया, “जो मुझे आता है, वही उन्हें सिखाऊँगा। इससे मेरी पढ़ाई भी मजबूत होगी।”

अगले सप्ताह से आरव ने गाँव के पाँच छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। वह उनसे बहुत कम पैसे लेता था। कई बच्चे पैसे नहीं दे पाते तो भी वह उन्हें पढ़ाता। उसे इससे दो फायदे हुए। पहला, उसे थोड़ी आय होने लगी। दूसरा, किसी और को पढ़ाते समय उसका अपना ज्ञान मजबूत होने लगा।

धीरे-धीरे पाँच बच्चों की संख्या दस हो गई। फिर पंद्रह। अब शाम को पीपल के पेड़ के नीचे बच्चों का छोटा-सा समूह बैठता और आरव उन्हें पढ़ाता। किसी के पास किताब नहीं होती तो वह अपनी कॉपी से पढ़ाता। किसी को गणित समझ नहीं आता तो वह मिट्टी पर रेखाएँ खींचकर समझाता। किसी को कहानी पसंद होती तो वह कहानी के माध्यम से पाठ समझाता।

गाँव के बुजुर्ग उसे देखकर कहते, “यह लड़का कुछ अलग है।”

लेकिन हर कोई खुश नहीं था। कुछ लोग कहते, “इतना पढ़कर क्या करेगा? आखिर नौकरी तो शहर में ही करनी पड़ेगी।” कोई कहता, “गरीब आदमी के बच्चे बड़े सपने देखें तो यही होता है—आखिर में निराशा।” आरव अब ऐसी बातों से प्रभावित नहीं होता था। उसने समझ लिया था कि जब कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करता है तो लोग अक्सर पहले उसकी कोशिश पर हँसते हैं और बाद में उसकी सफलता पर तालियाँ बजाते हैं।

 

एक साल बाद वही छात्रवृत्ति परीक्षा फिर आई। आरव ने इस बार पूरी तैयारी की। परीक्षा के दिन उसे पिछले साल की बारिश याद आई। उसे अपनी असफलता याद आई। उसे शिक्षक की बात याद आई—“तुम असफल हुए हो, हारे नहीं।”

उसने परीक्षा दी।

परिणाम आया तो इस बार आरव का चयन हो गया।

उसके घर में पहली बार ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा त्योहार आया हो। पिता ने पड़ोसी से थोड़ी मिठाई उधार ली और घर लेकर आए। माँ ने आरव को गले लगा लिया। छोटी बहन गौरी खुशी से उछलने लगी। आरव ने छात्रवृत्ति का प्रमाणपत्र हाथ में लेकर कहा, “यह सिर्फ मेरी जीत नहीं है। यह हमारी मेहनत की जीत है।”

लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी।

छात्रवृत्ति से उसे शहर के एक अच्छे विद्यालय में पढ़ने का अवसर मिला। गाँव छोड़कर शहर जाना उसके लिए आसान नहीं था। पहली बार उसने इतनी बड़ी इमारतें देखीं, इतनी तेज रफ्तार से चलती गाड़ियाँ देखीं और इतने अलग-अलग तरह के लोगों के बीच खुद को पाया। वहाँ के कई छात्र अंग्रेजी में आसानी से बातचीत करते थे। उनके पास महँगे बैग, लैपटॉप और निजी कोचिंग थी। आरव के पास एक पुराना बैग और कुछ किताबें थीं।

पहले कुछ दिनों तक वह बहुत असहज रहा। कक्षा में शिक्षक सवाल पूछते तो उसे उत्तर पता होने के बावजूद हाथ उठाने में झिझक होती। उसे डर था कि कहीं उसका उच्चारण सुनकर कोई उसका मजाक न बना दे।

एक दिन विज्ञान की कक्षा में शिक्षक ने एक कठिन सवाल पूछा। पूरी कक्षा शांत थी। आरव को उत्तर पता था। उसने धीरे-धीरे हाथ उठाया। शिक्षक ने उसे उत्तर देने के लिए कहा। उसने जवाब दिया। उत्तर सही था। शिक्षक ने उसकी प्रशंसा की।

 

उस दिन आरव ने एक महत्वपूर्ण बात समझी—दूसरों से तुलना करने से आत्मविश्वास कम होता है, लेकिन अपनी प्रगति पर ध्यान देने से आत्मविश्वास बढ़ता है।

उसने शहर में भी अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ीं। वह रोज थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ता। सुबह जल्दी उठता। पिछले दिन की गलतियाँ लिखता। जो नहीं समझ आता, उसे शिक्षक से पूछता। पुस्तकालय में घंटों बैठता। वह अपनी जिंदगी में बड़े बदलाव करने के बजाय छोटे-छोटे नियम बनाकर चलता था।

उसकी कॉपी के आखिरी पन्ने पर अब भी एक वाक्य लिखा था—“आज कल से एक कदम आगे।”

समय गुजरता गया। दसवीं की परीक्षा आई। आरव ने अच्छे अंक प्राप्त किए। बारहवीं में उसने जिला स्तर पर सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। उसे आगे की पढ़ाई के लिए प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश मिला।

कॉलेज का समय उसके लिए नई चुनौतियाँ लेकर आया। अब पढ़ाई कठिन थी। प्रतियोगिता ज्यादा थी। कुछ विषय ऐसे थे जिन्हें समझने में उसे कई दिन लग जाते। एक समय ऐसा आया जब लगातार कई परीक्षाओं में उसके अंक कम आने लगे। उसे लगा कि वह फिर पीछे जा रहा है।

उसने अपने पुराने शिक्षक को फोन किया।

गुरुजी, मुझे लग रहा है कि मैं यह सब नहीं कर पाऊँगा।”

शिक्षक ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, मंजिल कितनी दूर है?”

आरव ने कहा, “बहुत दूर।”

शिक्षक हँसे और बोले, “तो फिर एक बार में पूरी दूरी तय करने की कोशिश क्यों कर रहे हो? आज जितना रास्ता चल सकते हो, उतना चलो। कल फिर चलना। मंजिल पर नजर रखो, लेकिन हर दिन केवल अगला कदम उठाओ।”

आरव को फिर वही बात समझ आई—छोटा कदम।

उसने अपनी पढ़ाई को छोटे हिस्सों में बाँट दिया। उसने रोज के लक्ष्य बनाए। सुबह दो घंटे एक विषय, दोपहर में अभ्यास, शाम को पुनरावृत्ति। हर रविवार वह पूरे सप्ताह की गलतियों को देखता। धीरे-धीरे उसके अंक सुधरने लगे।

कॉलेज खत्म होने तक आरव को एक बड़ी कंपनी में नौकरी का प्रस्ताव मिला। परिवार के लिए यह बहुत बड़ी खुशी थी। उसकी पहली तनख्वाह आई तो उसने सबसे पहले घर की टूटी छत ठीक करवाई। माँ के लिए नई सिलाई मशीन खरीदी। पिता के लिए आरामदायक जूते और कपड़े लाया। बहन की पढ़ाई का खर्च उठाया।

उस रात परिवार चारपाई पर बैठा था। पिता ने कहा, “बेटा, अब तुम्हारी मंजिल पूरी हो गई।”

आरव कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, “नहीं बाबा। मेरी अपनी मंजिल शायद पूरी हुई है, लेकिन जो सपना मैंने पीपल के पेड़ के नीचे देखा था, वह अभी बाकी है।”

पिता ने पूछा, “कौन-सा सपना?”

आरव ने कहा, “गाँव में बच्चों के लिए अच्छी पाठशाला बनाना।”

अगले कुछ वर्षों में आरव ने नौकरी करते हुए पैसे बचाए। वह हर महीने अपनी आय का एक हिस्सा अलग रखता। छुट्टियों में गाँव जाता और बच्चों को पढ़ाता। उसने गाँव के युवाओं को भी साथ जोड़ना शुरू किया।

एक दिन उसने गाँव के मुखिया से कहा, “हमारे पास खाली पड़ी पंचायत की जमीन का एक हिस्सा है। अगर अनुमति मिले तो वहाँ एक छोटा अध्ययन केंद्र बनाया जा सकता है।”

मुखिया ने कहा, “पैसे कहाँ से आएँगे?”

आरव ने कहा, “जितना मेरे पास है, उससे शुरुआत करेंगे। बाकी लोग धीरे-धीरे जुड़ेंगे।”

कुछ लोगों ने फिर हँसकर कहा, “एक कमरे से स्कूल बन जाएगा क्या?”

आरव ने मुस्कुराकर कहा, “एक ईंट से भी तो दीवार बनती है।”

उसने अपनी बचत से पहला कमरा बनवाया। पुराने फर्नीचर जुटाए। शहर से किताबें मँगाईं। कुछ दोस्तों ने कंप्यूटर दिए। गाँव के युवाओं ने श्रमदान किया। बच्चों के लिए शाम की कक्षाएँ शुरू हुईं।

शुरुआत में केवल बारह बच्चे आए।

आरव ने किसी से शिकायत नहीं की। उसने कहा, “बारह बच्चे भी बारह भविष्य हैं।”

कुछ महीनों में संख्या तीस हुई। फिर पचास। फिर सौ।

गाँव में पहली बार बच्चों के लिए ऐसा स्थान बना जहाँ वे सिर्फ किताबें नहीं पढ़ते थे, बल्कि सपने देखना भी सीखते थे। वहाँ दीवार पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“तुम्हारी परिस्थितियाँ तुम्हारी पहचान नहीं हैं।”

एक दिन उसी अध्ययन केंद्र में एक छोटा लड़का आया। उसका नाम मोहन था। उसके पिता रिक्शा चलाते थे। मोहन पढ़ाई में कमजोर था और अक्सर कहता, “मुझसे नहीं होगा।”

आरव ने उसे गणित का एक सवाल दिया। मोहन ने कोशिश की और गलत कर दिया।

आरव ने कहा, “कोई बात नहीं। फिर से करो।”

दूसरी बार भी गलत।

आरव ने कहा, “फिर से।”

तीसरी बार गलत।

आरव ने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हें पता है, आज तुम्हारे पास कितनी जीत हैं?”

मोहन ने आश्चर्य से पूछा, “कितनी?”

आरव ने कहा, “तुमने तीन बार हार मानने से इनकार किया। यही जीत है।”

मोहन ने चौथी बार सवाल हल किया।

इस बार उत्तर सही था।

मोहन के चेहरे पर जो खुशी थी, उसे देखकर आरव को अपने बचपन का वह दिन याद आ गया जब उसने पहली बार किसी कठिन सवाल का उत्तर खुद निकाला था।

वर्षों बाद वही मोहन एक बड़ी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने लगा। गाँव के लोग अब आरव को केवल सफल युवक नहीं मानते थे। वे उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते थे जिसने अपनी सफलता को अपने तक सीमित नहीं रखा।

एक दिन जिला अधिकारी गाँव आए। उन्होंने अध्ययन केंद्र देखा और आरव से पूछा, “तुमने यह सब कैसे किया?”

आरव ने कहा, “एक साथ नहीं किया। रोज थोड़ा-थोड़ा किया।”

अधिकारी ने पूछा, “तुम्हारे पास शुरुआत में कितना पैसा था?”

आरव मुस्कुराया, “पैसा कम था, लेकिन शुरुआत करने की इच्छा ज्यादा थी।”

अधिकारी ने अध्ययन केंद्र की गतिविधियों को देखकर जिला प्रशासन से सहायता देने की घोषणा की। अब वहाँ पुस्तकालय बड़ा हुआ। कंप्यूटर की संख्या बढ़ी। लड़कियों के लिए अलग अध्ययन कक्ष बना। गाँव के आसपास के बच्चों के लिए भी कक्षाएँ शुरू हुईं।

आरव का सपना अब धीरे-धीरे वास्तविकता में बदल रहा था।

लेकिन जीवन में चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई थीं।

एक वर्ष गाँव में भयंकर बाढ़ आई। अध्ययन केंद्र का एक हिस्सा पानी में डूब गया। कई किताबें खराब हो गईं। फर्नीचर टूट गया। बच्चों की पढ़ाई रुक गई। कुछ लोगों ने कहा, “अब इसे छोड़ दो। हर बार नई समस्या आती है।”

आरव ने पानी में खड़े होकर टूटे कमरे को देखा। कुछ पल के लिए उसकी आँखों में निराशा आई। लेकिन फिर उसने अपनी कॉपी खोली और पुराने वाक्य को देखा—“मैं गिर सकता हूँ, लेकिन रुकूँगा नहीं।”

अगले दिन उसने गाँव के युवाओं को बुलाया।

हम फिर से शुरू करेंगे,” उसने कहा।

एक युवक बोला, “लेकिन सब कुछ तो टूट गया।”

आरव ने कहा, “सब कुछ नहीं। हमारी इच्छा अभी भी बची है।”

उन्होंने सफाई शुरू की। किसी ने ईंट दी, किसी ने सीमेंट। किसी ने किताबें दीं। शहर के आरव के दोस्तों ने ऑनलाइन मदद जुटाई। कुछ ही महीनों में अध्ययन केंद्र पहले से बेहतर बनकर तैयार हो गया।

उस घटना ने आरव को एक और सबक दिया—मंजिल तक पहुँचने वाले रास्ते में केवल चढ़ाई नहीं होती। कभी बारिश होती है, कभी तूफान आता है, कभी रास्ता बंद हो जाता है। लेकिन जो व्यक्ति रास्ता बदल सकता है, गति धीमी कर सकता है, फिर भी चलना नहीं छोड़ता, वही अंततः मंजिल तक पहुँचता है।

समय बीतता गया। आरव ने नौकरी भी जारी रखी और गाँव का शिक्षा केंद्र भी चलाया। कुछ वर्षों बाद उसने अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह शिक्षा के काम में लगने का निर्णय लिया। परिवार ने उसका साथ दिया।

अब उसके पास एक बड़ा सपना था—ऐसे कई गाँवों में अध्ययन केंद्र बनाना जहाँ गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए शहरों पर निर्भर न रहना पड़े।

लोगों ने कहा, “यह बहुत बड़ा काम है।”

आरव ने कहा, “बड़ा काम भी छोटे कदम से शुरू होता है।”

उसने पहला नया केंद्र पड़ोसी गाँव में शुरू किया। वहाँ केवल बीस बच्चे थे। फिर दूसरा केंद्र दूसरे गाँव में। फिर तीसरा। धीरे-धीरे कई गाँवों के शिक्षक उससे जुड़ते गए।

दस साल पहले जो लड़का मिट्टी के दीये की रोशनी में पढ़ता था, अब हजारों बच्चों के लिए रोशनी का कारण बन चुका था।

एक दिन आरव उसी पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था। उसकी उम्र अब लगभग चालीस वर्ष हो चुकी थी। वह पेड़ अभी भी वहीं था। पेड़ के नीचे अब एक पत्थर की बेंच बनी हुई थी। सामने वही रास्ता था जिस पर वह कभी स्कूल जाया करता था।

उसने आँखें बंद कीं तो उसे अपना बचपन दिखाई दिया—फटे जूते, पुराना बैग, बारिश में भीगता हुआ शरीर, परीक्षा में असफल होने के बाद बहते आँसू, शिक्षक की आवाज, माँ का हाथ, पिता की मेहनत और वह छोटा-सा सपना।

तभी एक बच्चा उसके पास आया।

सर, आप यहाँ अकेले क्यों बैठे हैं?”

आरव ने मुस्कुराकर कहा, “बस पुराने दिनों को याद कर रहा हूँ।”

बच्चे ने पूछा, “आप बचपन में क्या बनना चाहते थे?”

आरव ने कहा, “मैं ऐसा इंसान बनना चाहता था जो दूसरों के लिए रास्ता आसान कर सके।”

बच्चा बोला, “और आप बन गए?”

आरव ने कुछ पल सोचा और कहा, “मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

बच्चे ने पूछा, “क्या आपकी मंजिल अभी भी दूर है?”

आरव ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ। क्योंकि असली मंजिल केवल खुद सफल होना नहीं है। असली मंजिल तब मिलती है जब आपकी सफलता किसी और की जिंदगी में उम्मीद पैदा करे।”

बच्चा कुछ समझा, कुछ नहीं समझा। लेकिन उसने जाते-जाते पूछा, “सर, मैं भी बड़ा सपना देख सकता हूँ?”

आरव ने कहा, “तुम्हें सपना देखने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है।”

बच्चा मुस्कुराकर चला गया।

आरव ने उसे जाते हुए देखा और मन ही मन कहा, “यही तो मेरी मंजिल है।”

कुछ वर्षों बाद उसी गाँव में एक बड़ा शिक्षा संस्थान बना, जिसका नाम रखा गया—“छोटा कदम शिक्षा केंद्र।” उसके मुख्य द्वार पर आरव के शिक्षक के शब्द लिखे थे—“एक छोटा कदम भी आपको मंजिल के करीब ले जाता है।”

उद्घाटन के दिन आरव के वृद्ध शिक्षक भी वहाँ आए। उनकी उम्र काफी हो चुकी थी। आरव ने उनके पैर छुए। शिक्षक ने कहा, “मुझे याद है, तुम कभी मेरे सामने बैठकर कहते थे कि तुम हार गए हो।”

आरव हँसा, “और आपने कहा था कि मैं हारा नहीं हूँ।”

शिक्षक ने कहा, “आज बताओ, सही कौन था?”

आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप।”

शिक्षक ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “नहीं, सही तुम थे। क्योंकि तुमने उस दिन मेरी बात पर विश्वास किया था।”

दोनों कुछ देर चुप रहे।

आरव ने संस्थान की ओर देखा। वहाँ सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे थे। किसी के हाथ में किताब थी, किसी के हाथ में कॉपी। किसी के चेहरे पर सवाल था, किसी की आँखों में सपना।

आरव की आँखें नम हो गईं।

उसे लगा जैसे उसका पूरा जीवन एक लंबी यात्रा था, जिसमें हर दिन केवल एक छोटा कदम उठाया गया था। वह नहीं जानता था कि कौन-सा कदम उसे सबसे ज्यादा आगे ले जाएगा। उसने बस चलते रहने का फैसला किया था।

उसने समझ लिया था कि सफलता कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। सफलता सुबह की पहली किरण की तरह धीरे-धीरे आती है। वह उस किसान की तरह है जो रोज मिट्टी में बीज डालता है, पानी देता है और इंतजार करता है। वह जानता है कि आज बीज बोने से कल पेड़ नहीं बनेगा। लेकिन अगर वह आज बीज नहीं बोएगा, तो भविष्य में छाया भी नहीं मिलेगी।

आरव की कहानी का सबसे बड़ा सबक यही था कि बड़ी मंजिल के सामने खड़े होकर अक्सर इंसान डर जाता है। उसे रास्ता बहुत लंबा दिखाई देता है। उसे लगता है कि उसके पास संसाधन कम हैं, समय कम है, अवसर कम हैं। लेकिन मंजिल की पूरी दूरी एक साथ तय करने की जरूरत नहीं होती। केवल अगला कदम उठाना होता है।

अगर पढ़ाई कठिन है, तो आज एक अध्याय पढ़िए। अगर परीक्षा मुश्किल है, तो आज दस सवाल हल कीजिए। अगर कोई सपना बहुत बड़ा है, तो उसका पहला छोटा काम कीजिए। अगर रास्ता बंद है, तो दूसरा रास्ता खोजिए। अगर गिर गए हैं, तो उठिए। अगर लोग हँस रहे हैं, तो अपनी मेहनत जारी रखिए। अगर परिणाम देर से मिल रहा है, तो धैर्य रखिए।

क्योंकि छोटी कोशिशें कभी छोटी नहीं होतीं।

एक बूंद पानी छोटी होती है, लेकिन बूंद-बूंद से नदी बनती है। एक ईंट छोटी होती है, लेकिन ईंट-ईंट से घर बनता है। एक शब्द छोटा होता है, लेकिन शब्द-शब्द से किताब बनती है। एक दिन छोटा होता है, लेकिन दिन-दिन से जीवन बनता है। और एक कदम छोटा होता है, लेकिन कदम-कदम से मंजिल मिलती है।

कई लोग जिंदगी में इसलिए पीछे नहीं रह जाते कि उनमें क्षमता नहीं होती, बल्कि इसलिए कि वे शुरुआत करने से डरते हैं। वे सोचते रहते हैं कि जब परिस्थितियाँ अच्छी होंगी तब शुरुआत करेंगे। जब पैसे होंगे तब पढ़ेंगे। जब समय मिलेगा तब मेहनत करेंगे। जब कोई मदद करेगा तब सपना पूरा करेंगे। लेकिन सही समय अक्सर इंतजार करने से नहीं आता। सही समय वही होता है जब हम पहला कदम उठाते हैं।

आरव के पास भी शुरुआत में कुछ नहीं था। न पैसा, न साधन, न सुविधा। लेकिन उसने जो था, उसी से शुरुआत की। उसके पास एक पुरानी किताब थी तो उसने उसे पढ़ा। एक शिक्षक था तो उससे सीखा। एक पेड़ था तो उसके नीचे पढ़ा। एक कॉपी थी तो उसमें सपने लिखे। एक मौका मिला तो उसने पूरी मेहनत की। और जब मौका नहीं मिला, तो उसने अगला मौका बनाने की कोशिश की।

यही अंतर था सपने देखने वाले और सपने को जीने वाले इंसान में।

सपना देखने वाला कहता है, “काश मैं सफल हो जाऊँ।”

लेकिन सपना जीने वाला कहता है, “आज मैं क्या कर सकता हूँ?”

पहला व्यक्ति मंजिल के बारे में सोचता रहता है। दूसरा व्यक्ति रास्ते पर कदम रख देता है।

और जिंदगी में अक्सर जीत उसी की होती है जो पहला कदम उठाने का साहस करता है।

कभी-कभी हमारा पहला कदम बहुत छोटा होगा। शायद किसी को दिखाई भी न दे। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि बीज बोते समय पेड़ दिखाई नहीं देता। मेहनत करते समय सफलता दिखाई नहीं देती। पढ़ते समय भविष्य की उपलब्धियाँ दिखाई नहीं देतीं। लेकिन हर ईमानदार प्रयास हमारे भविष्य की नींव में एक ईंट जोड़ता है।

इसलिए अगर आज आपकी जिंदगी कठिन है, तो खुद को कमजोर मत समझिए। अगर आपकी शुरुआत छोटी है, तो अपनी मंजिल छोटी मत कीजिए। अगर आज आपके पास कम है, तो यह मत मानिए कि कल भी कम ही रहेगा। परिस्थितियाँ बदलती हैं। लोग बदलते हैं। अवसर आते हैं। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव तब शुरू होता है जब इंसान खुद से कहता है—“मैं कोशिश करूँगा।”

हो सकता है पहली कोशिश असफल हो।

फिर दूसरी कीजिए।

हो सकता है दूसरी भी असफल हो।

फिर तीसरी कीजिए।

हर असफलता से कुछ सीखिए और अगला कदम पहले से बेहतर उठाइए।

एक दिन पीछे मुड़कर देखेंगे तो पाएँगे कि जिस मंजिल को कभी असंभव समझते थे, वहाँ तक पहुँचने का रास्ता हजारों छोटे कदमों से बना था।

आरव की तरह अपनी जिंदगी की कॉपी के पहले पन्ने पर एक वाक्य लिखिए—“मैं रुकूँगा नहीं।”

फिर आज एक छोटा कदम उठाइए।

कल दूसरा।

फिर तीसरा।

और जब कभी थक जाएँ तो अपनी मंजिल को याद कीजिए, लेकिन पूरी यात्रा का बोझ अपने सिर पर मत रखिए। केवल अगले कदम पर ध्यान दीजिए।

क्योंकि पहाड़ की चोटी पर पहुँचने वाला व्यक्ति हर कदम पर पूरी चोटी नहीं उठाता। वह बस एक कदम आगे बढ़ाता है।

और यही जीवन का सबसे सुंदर सत्य है—

छोटा कदम कभी छोटा नहीं होता।

हर कदम आपकी मंजिल को थोड़ा और करीब लाता है।

बस चलते रहिए।

क्योंकि एक दिन वही छोटे-छोटे कदम मिलकर आपकी सबसे बड़ी कहानी लिखेंगे।

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