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संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

पहाड़ चढ़ने वाला लड़का

 


 

हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों के बीच एक छोटा-सा गाँव बसा था, जिसका नाम था देवगढ़। गाँव इतना सुंदर था कि सुबह सूरज की पहली किरण जब बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर पड़ती, तो ऐसा लगता जैसे आसमान ने धरती पर सोना बिखेर दिया हो। चारों तरफ देवदार और चीड़ के पेड़ थे, पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेत थे और दूर तक फैली घाटी के बीच एक छोटी-सी नदी बहती थी। लेकिन इस गाँव की सबसे खास पहचान था गाँव के उत्तर में खड़ा एक विशाल पहाड़, जिसका नाम था कालागिरि। उसकी चोटी हमेशा बादलों से ढकी रहती थी और साल के अधिकतर महीनों में वहाँ बर्फ जमी रहती थी। गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि कालागिरि सिर्फ एक पहाड़ नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी परीक्षा थी जिसे हर इंसान अपने तरीके से देता था। कई लोगों ने उसकी चोटी तक पहुँचने की कोशिश की थी, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ था। कुछ लोग रास्ते से लौट आए, कुछ घायल हुए और कुछ हमेशा के लिए उस पहाड़ की गोद में खो गए। इसी गाँव में पंद्रह साल का एक लड़का रहता था, जिसका नाम आरव था। आरव की आँखों में हमेशा एक अजीब-सी चमक रहती थी। वह दूसरे बच्चों की तरह केवल खेलना या नदी में तैरना पसंद नहीं करता था। उसे दूर खड़े कालागिरि को देखना अच्छा लगता था। सुबह स्कूल जाते समय वह कुछ देर रुककर उसकी चोटी को देखता और सोचता कि आखिर बादलों के ऊपर क्या होगा। शाम को जब बाकी बच्चे घर लौट जाते, तब भी आरव नदी के किनारे बैठकर पहाड़ को निहारता रहता। उसकी माँ सुनीता कई बार उसे आवाज देकर घर बुलाती, लेकिन आरव की नजरें कालागिरि से हटती ही नहीं थीं।

 

आरव के पिता रघुवीर भी कभी पहाड़ों से बहुत प्यार करते थे। वह गाँव के सबसे साहसी लोगों में गिने जाते थे और यात्रियों तथा पर्वतारोहियों को पहाड़ी रास्तों से सामान पहुँचाने का काम करते थे। उन्हें मौसम की पहचान थी, चट्टानों की भाषा समझ आती थी और वह दूर से देखकर बता सकते थे कि कौन-सा रास्ता सुरक्षित है और कौन-सा नहीं। लेकिन जब आरव केवल सात साल का था, तब एक दिन रघुवीर पहाड़ की एक दूसरी ढलान पर सामान लेकर गए और अचानक चट्टान खिसकने की दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। उस दिन के बाद सुनीता ने अपने बेटे को कभी पहाड़ों के करीब नहीं जाने दिया। आरव के पिता की मौत उसके लिए केवल पति को खोना नहीं था, बल्कि उसके जीवन का एक हिस्सा टूट जाना था। वह अक्सर रात में अकेले बैठकर अपने पति की पुरानी तस्वीर देखती और सोचती कि अगर उस दिन उन्होंने पहाड़ पर जाने से मना कर दिया होता तो शायद आज वह उनके साथ होतीं। आरव बड़ा होता गया और जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ी, वैसे-वैसे पहाड़ों के प्रति उसका आकर्षण भी बढ़ता गया। वह पिता की पुरानी चीजों को बड़े ध्यान से देखता। उनके पुराने जूते, रस्सियाँ, कंपास और नक्शे उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। एक दिन उसने माँ से पूछा, “माँ, पिताजी इतने बहादुर थे तो क्या वह कभी कालागिरि पर भी गए थे?” सुनीता कुछ क्षण के लिए चुप रही और फिर बोली, “तुम्हें उन बातों से दूर रहना चाहिए, आरव।” आरव ने फिर पूछा, “लेकिन क्या वह गए थे?” सुनीता ने उसकी तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “कुछ बातें जानना जरूरी नहीं होता।” इतना कहकर वह वहाँ से चली गई। आरव समझ गया कि उसकी माँ उससे कुछ छिपा रही है।

 

आरव का सबसे अच्छा दोस्त मोहन था। मोहन उससे एक साल छोटा था और स्वभाव से बिल्कुल अलग था। वह हमेशा मजाक करता रहता था, छोटी-छोटी बातों पर हँसता था और खतरा देखते ही पीछे हट जाता था। लेकिन दोस्ती के मामले में वह बहुत सच्चा था। एक दिन आरव ने उसे बताया कि वह कालागिरि की निचली चढ़ाई तक जाना चाहता है। मोहन ने तुरंत कहा, “तू पागल हो गया है क्या? वहाँ जाने की बात भी मत कर।” आरव हँसते हुए बोला, “मैंने कहा है कि चोटी पर नहीं जा रहा, सिर्फ रास्ता देखने जा रहा हूँ।” मोहन ने कहा, “पहाड़ को क्या पता कि तू सिर्फ रास्ता देखने आया है? वह तुझे पकड़कर ऊपर ले जाएगा।” आरव हँस पड़ा। उसने कहा, “अगर मुझे डर लगा तो वापस आ जाऊँगा।” मोहन ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “मुझे तो अभी से डर लग रहा है।” दोनों खूब हँसे, लेकिन कुछ दिनों बाद मोहन सच में आरव के साथ चल पड़ा। दोनों सुबह-सुबह घर से निकले और जंगल की ओर बढ़ गए। उनके पास पानी, सूखे फल, एक छोटी रस्सी, प्राथमिक उपचार का सामान और एक पुराना नक्शा था, जो आरव को अपने पिता की चीजों में मिला था। शुरुआत में रास्ता आसान था। वे जंगल के बीच से चलते रहे। कुछ दूर जाने पर रास्ता चढ़ाई में बदल गया। हवा ठंडी होने लगी और पेड़ घने हो गए। अचानक मोहन ने एक पत्थर पर कुछ निशान देखे और बोला, “आरव, यह देख।” आरव ने झुककर निशान देखा। वह किसी पुराने पर्वतारोही का बनाया हुआ संकेत था। उसके पास जंग लगी रस्सी का टुकड़ा पड़ा था। आरव ने उसे उठाकर ध्यान से देखा और उसके मन में एक अजीब-सी भावना पैदा हुई। उसे लगा कि इस रास्ते पर उसके पिता भी कभी चले होंगे।

 

दोनों कुछ और आगे बढ़े तो अचानक आकाश में बादल घिर आए। हवा तेज होने लगी। देवदार के पेड़ जोर-जोर से हिलने लगे। मोहन ने कहा, “हमें वापस चलना चाहिए।” आरव ने भी मौसम देखकर फैसला किया कि वापस लौटना ही बेहतर होगा। लेकिन इससे पहले कि वे नीचे उतरते, बारिश शुरू हो गई। पहाड़ों की बारिश कुछ ही मिनटों में रास्तों को नदियों में बदल देती है। दोनों फिसलते हुए नीचे उतरने लगे। तभी मोहन का पैर एक गीली चट्टान पर पड़ा और वह संतुलन खोकर ढलान की तरफ खिसकने लगा। उसने घबराकर आरव का हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हाथ छूट गया। आरव ने तुरंत अपनी रस्सी निकाली और उसे मोहन की तरफ फेंकते हुए चिल्लाया, “इसे पकड़!” मोहन ने किसी तरह रस्सी पकड़ ली और आरव ने पूरी ताकत लगाकर उसे ऊपर खींच लिया। दोनों कुछ देर तक वहीं बैठे रहे। मोहन का चेहरा डर से सफेद पड़ चुका था। उसने काँपते हुए कहा, “अगर तू वहाँ नहीं होता तो मैं नीचे चला जाता।” आरव ने उसकी तरफ देखा और कहा, “इसीलिए पहाड़ पर अकेले नहीं जाना चाहिए।” दोनों ने एक चट्टान के नीचे रात बिताई और सुबह मौसम साफ होने के बाद गाँव लौट आए। लेकिन गाँव पहुँचते ही सुनीता को सब पता चल गया। उसने आरव को देखते ही उसे गले लगा लिया और फिर गुस्से में बोली, “मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि कालागिरि से दूर रहो?” आरव चुप रहा। सुनीता की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “मैंने तुम्हारे पिता को खोया है, तुम्हें नहीं खो सकती।” यह सुनकर आरव का सिर झुक गया। उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि उसका सपना केवल उसका अपना नहीं था। उसकी माँ का डर भी उससे जुड़ा था।

 

कुछ दिनों तक आरव ने कालागिरि के बारे में कोई बात नहीं की। वह स्कूल जाता, पढ़ाई करता और माँ के काम में मदद करता। लेकिन उसके मन में पहाड़ की छवि लगातार बनी रहती। एक दिन सुनीता घर की सफाई कर रही थी। उसने पुराने संदूक को बाहर निकाला, जिसमें रघुवीर की चीजें रखी थीं। आरव वहाँ आया तो उसने देखा कि संदूक के नीचे एक छोटी-सी पुरानी डायरी पड़ी थी। उसने डायरी उठाई और माँ से पूछा, “यह क्या है?” सुनीता ने उसे देखते ही कहा, “इसे रहने दो।” लेकिन आरव ने डायरी खोल ली। शुरुआती पन्नों पर पहाड़ों के नक्शे थे। फिर उसे कुछ ऐसे शब्द दिखाई दिए जिनसे उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। वहाँ लिखा था कि कालागिरि की चोटी तक पहुँचने का मुख्य रास्ता पश्चिमी दीवार से नहीं, बल्कि उत्तरी रिज से होकर जाता है। अगले पन्ने पर कुछ चिह्न बने थे। एक जगह लाल निशान था और उसके नीचे लिखा था, “पुरानी बर्फीली गुफा।” एक और पन्ने पर लिखा था, “राघव शायद यहीं से ऊपर गया था।” आरव ने पूछा, “राघव कौन था?” सुनीता कुछ बोल नहीं पाई। उसी समय गाँव के बुजुर्ग दीनानाथ बाबा वहाँ आ गए। उन्होंने डायरी देखी और गहरी साँस लेकर कहा, “अब शायद तुम्हें सच जानना ही चाहिए।” उन्होंने बताया कि राघव कई साल पहले कालागिरि की चोटी पर पहुँचने की कोशिश करने वाला सबसे अनुभवी पर्वतारोही था। वह चोटी के बहुत करीब पहुँच गया था, लेकिन उसके बाद गायब हो गया। किसी को उसका शव नहीं मिला। रघुवीर ने उसकी तलाश की थी और शायद उसी दौरान उन्होंने कालागिरि के बारे में बहुत कुछ जाना था। आरव ने पूछा, “क्या पिताजी भी कालागिरि की चोटी पर पहुँचना चाहते थे?” बाबा ने कहा, “हाँ, लेकिन वह जानते थे कि पहाड़ को जीतना संभव नहीं। वह सिर्फ उसका रास्ता समझना चाहते थे।”

 

उस रात आरव ने पिता की डायरी कई बार पढ़ी। एक पन्ने पर उसे एक वाक्य मिला, जिसे पढ़कर उसकी आँखें नम हो गईं। लिखा था, “अगर कभी मेरा बेटा इस डायरी को पढ़े, तो वह याद रखे कि पहाड़ पर साहस से ज्यादा जरूरी समझदारी है। चोटी तक पहुँचना सफलता नहीं, सुरक्षित लौटना सफलता है।” आरव देर तक उस पन्ने को देखता रहा। उसे लगा जैसे उसके पिता उससे बात कर रहे हों। अगले दिन वह अपने शिक्षक देवेंद्र सर के पास गया और पूरी बात बताई। देवेंद्र सर ने डायरी ध्यान से पढ़ी और कहा, “तुम्हारे पिता बहुत समझदार थे।” आरव ने पूछा, “क्या मैं कालागिरि पर जा सकता हूँ?” सर ने कुछ देर सोचकर कहा, “अकेले नहीं।” आरव ने पूछा, “तो क्या आप मेरे साथ चलेंगे?” देवेंद्र सर ने मुस्कुराकर कहा, “अगर तुम्हारी माँ अनुमति दे और तुम पूरी तैयारी करो, तो मैं चलूँगा।” यह सुनकर आरव के चेहरे पर खुशी आ गई। लेकिन देवेंद्र सर ने उसे साफ चेतावनी दी कि यह कोई रोमांचक खेल नहीं होगा। मौसम, रास्ता, ऊँचाई और बर्फ सबका सम्मान करना होगा। उन्होंने गाँव के दो अनुभवी पहाड़ी लोगों, करण और भीम, को भी साथ लेने का फैसला किया। कई सप्ताह तक तैयारी चली। आरव सुबह दौड़ता, भारी बैग लेकर चढ़ाई करता, रस्सियों की गाँठें सीखता, प्राथमिक उपचार का अभ्यास करता और नक्शे पढ़ता। देवेंद्र सर उसे बार-बार समझाते कि पहाड़ पर एक छोटी गलती भी जानलेवा हो सकती है। आरव ने हर बात ध्यान से सीखी।

 

जब यात्रा का दिन आया, तो सुनीता बहुत देर तक चुप रही। उसने आरव के बैग में खाना रखा, गर्म कपड़े रखे और अंत में अपनी अलमारी से एक लाल धागा निकाला। उसने वह धागा आरव की कलाई पर बाँधते हुए कहा, “यह तुम्हारे पिता ने मुझे दिया था।” आरव ने माँ का हाथ पकड़ लिया। सुनीता ने कहा, “एक बात का वादा करो।” आरव ने पूछा, “क्या?” उसने कहा, “अगर तुम्हें लगे कि खतरा बहुत ज्यादा है, तो वापस आ जाना। चाहे तुम चोटी से कुछ ही कदम दूर क्यों न हो।” आरव ने उसकी आँखों में देखा और कहा, “मैं वादा करता हूँ।” अगले दिन चारों लोग कालागिरि की ओर निकल पड़े। पहला दिन आसान था। वे जंगल पार करके एक पुराने शिविर तक पहुँचे। रात में देवेंद्र सर ने नक्शा फैलाकर अगले दिन का रास्ता समझाया। दूसरे दिन चढ़ाई कठिन होने लगी। जमीन पर बर्फ की पतली परत थी और हवा लगातार ठंडी होती जा रही थी। उन्हें कई जगह रस्सियों का सहारा लेना पड़ा। तीसरे दिन वे उस क्षेत्र में पहुँचे जहाँ से कालागिरि की असली परीक्षा शुरू होती थी। सामने एक विशाल बर्फीली ढलान थी। नीचे गहरी खाई और ऊपर सफेद चट्टानें। देवेंद्र सर ने कहा, “अब हर कदम सोचकर रखना।” सभी ने अपने उपकरण जाँचे और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

 

कुछ घंटों बाद उन्हें बर्फ में एक गहरी दरार दिखाई दी। करण ने तुरंत सबको रोक दिया। अगर वे कुछ कदम और बढ़ते तो शायद कोई उसमें गिर जाता। उन्होंने रास्ता बदला और दूसरी दिशा से आगे बढ़े। अचानक ऊपर से छोटे-छोटे पत्थर गिरने लगे। भीम ने चिल्लाकर कहा, “चट्टान खिसक रही है!” सभी ने पास की सुरक्षित जगह पर शरण ली। कुछ ही सेकंड में पत्थरों का बड़ा ढेर नीचे आ गिरा। आरव का दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने पहली बार महसूस किया कि पहाड़ पर खतरा हमेशा दिखाई नहीं देता। थोड़ी देर बाद रास्ता साफ हुआ और वे आगे बढ़े। शाम तक वे एक ऊँची चट्टान के पास पहुँचे। रात उन्होंने वहीं शिविर लगाकर बिताई। बाहर बर्फीली हवा चल रही थी। आरव ने सोने से पहले अपनी कलाई पर बँधा लाल धागा देखा। उसे माँ का चेहरा याद आया। उसने आँखें बंद करके मन ही मन कहा, “मैं वापस आऊँगा।”

 

अगली सुबह मौसम साफ था, लेकिन रास्ता और भी कठिन था। उन्हें एक संकरी चट्टानी धार पार करनी थी। नीचे इतनी गहरी खाई थी कि उसका तल दिखाई नहीं देता था। एक-एक करके सभी आगे बढ़े। जब आरव की बारी आई तो उसने अपने पैर को मजबूती से जमाया और धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अचानक बर्फ का एक हिस्सा टूट गया और उसका पैर फिसल गया। वह नीचे की तरफ झूल गया। उसके मुँह से चीख निकल गई। रस्सी ने उसे रोक लिया। देवेंद्र सर ने तुरंत रस्सी खींची और करण ने उसे ऊपर आने में मदद की। कुछ क्षण बाद आरव सुरक्षित था, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। देवेंद्र सर ने कहा, “डरना ठीक है, लेकिन डर में गलत फैसला मत लेना।” आरव ने गहरी साँस ली और सिर हिलाया। उसी दिन शाम को उन्हें एक चट्टान के नीचे छोटा-सा रास्ता दिखाई दिया। नक्शे से मिलाने पर पता चला कि यही वह बर्फीली गुफा हो सकती थी जिसका जिक्र रघुवीर की डायरी में था। वे अंदर गए। गुफा के भीतर बर्फ की दीवारों पर पुराने निशान थे। एक जगह पत्थर पर नाम खुदा था—राघव। आरव उस नाम को देखकर कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया। उसे लगा जैसे कई साल पुराना रहस्य उसके सामने खड़ा है। गुफा में उन्हें एक पुराना बैग, टूटे हुए उपकरण और कुछ कागज मिले। एक कागज पर लिखा था कि राघव चोटी के बहुत करीब पहुँच चुका था, लेकिन मौसम अचानक खराब होने के कारण उसे वापस लौटना पड़ा। दूसरे कागज पर लिखा था कि पहाड़ इंसान की जिद से नहीं, उसकी समझदारी से रास्ता देता है।

 

गुफा में एक और चीज मिली—एक पुराना धातु का डिब्बा। उसके अंदर कुछ सूखे कागज और एक छोटी तस्वीर थी। तस्वीर में राघव के साथ आरव के पिता रघुवीर खड़े थे। आरव तस्वीर देखते ही भावुक हो गया। इसका मतलब था कि उसके पिता और राघव एक साथ कालागिरि की यात्रा पर आए थे। तभी देवेंद्र सर को गुफा की दीवार में एक छोटा-सा छेद दिखाई दिया। उन्होंने उसे साफ किया तो पीछे एक संकरी सुरंग दिखाई दी। वह सुरंग शायद पुराने समय में पर्वतारोहियों द्वारा इस्तेमाल की गई थी। नक्शे से मिलाने पर पता चला कि यह रास्ता उत्तरी रिज की ओर जाता था। आरव को लगा कि अब वह अपने पिता के अधूरे रास्ते के बिल्कुल करीब है। लेकिन देवेंद्र सर ने कहा, “हमें सावधान रहना होगा। रास्ता पुराना है और बर्फ कभी भी टूट सकती है।” सभी ने उपकरण लगाए और धीरे-धीरे सुरंग पार की। दूसरी ओर निकलते ही उनके सामने एक विशाल बर्फीला मैदान था। उसके आगे कालागिरि की चोटी साफ दिखाई दे रही थी। आरव की आँखों में चमक आ गई। लेकिन उसी समय दूर आसमान में काले बादल दिखाई देने लगे। भीम ने कहा, “मौसम बदल रहा है।” देवेंद्र सर ने मौसम का निरीक्षण किया और कहा, “हमारे पास बहुत कम समय है।”

 

वे तेजी से आगे बढ़े, लेकिन पहाड़ की ऊँचाई बढ़ने के साथ उनकी साँसें भारी होने लगीं। हर कदम उठाना मुश्किल हो रहा था। आरव के सिर में हल्का दर्द होने लगा। देवेंद्र सर ने उसे पानी पिलाया और कहा, “अपने शरीर की बात सुनो।” कुछ देर आराम करने के बाद वे आगे बढ़े। तभी बर्फीला तूफान शुरू हो गया। हवा इतनी तेज थी कि खड़ा रहना मुश्किल हो गया। दृश्यता कुछ मीटर तक रह गई। करण ने चिल्लाकर कहा, “हमें लौटना चाहिए!” देवेंद्र सर ने तुरंत निर्णय लिया कि कुछ देर सुरक्षित स्थान पर रुकना होगा। सभी एक चट्टान के पीछे बैठ गए। आरव बार-बार चोटी की दिशा में देख रहा था, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसके मन में एक तरफ सपना था और दूसरी तरफ माँ का वादा। उसने अपनी कलाई पर बँधा लाल धागा छुआ। उसे माँ की आवाज याद आई—“खतरा ज्यादा हो तो लौट आना।” उसने देवेंद्र सर से कहा, “सर, अगर मौसम नहीं सुधरा तो हम वापस लौटेंगे।” सर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “यही सही फैसला है।”

 

कुछ घंटे बाद तूफान कमजोर पड़ा। आसमान थोड़ा साफ हुआ और चोटी फिर दिखाई देने लगी। अब वे चोटी से बहुत ज्यादा दूर नहीं थे। देवेंद्र सर ने मौसम को ध्यान से देखा और कहा, “हमारे पास एक छोटा-सा मौका है।” सबने अपनी पूरी ताकत लगाई। बर्फीली दीवार के आखिरी हिस्से तक पहुँचकर उन्होंने रस्सियाँ लगाईं। आरव आगे था। उसके हाथ ठंड से सुन्न हो रहे थे, लेकिन वह लगातार ऊपर बढ़ता गया। एक कदम, फिर दूसरा, फिर तीसरा। नीचे देखने पर उसे गहरी खाई दिखाई देती थी, लेकिन उसने नजरें ऊपर रखीं। अचानक उसके हाथ की पकड़ ढीली हुई, लेकिन उसने तुरंत दूसरी पकड़ पकड़ ली। देवेंद्र सर पीछे से चिल्लाए, “बहुत अच्छा, धीरे-धीरे!” कुछ और मिनटों के बाद आरव ने अपना हाथ चोटी के किनारे पर रखा। उसने पूरी ताकत लगाकर खुद को ऊपर खींचा और अचानक वह कालागिरि की चोटी पर खड़ा था। कुछ क्षण तक उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वह सच में वहाँ पहुँच गया है। उसके सामने बादलों का समुद्र था। नीचे देवगढ़ इतना छोटा दिखाई दे रहा था जैसे किसी ने खिलौनों से गाँव बनाया हो। दूर-दूर तक पहाड़ों की कतारें थीं और ऊपर नीला आसमान। आरव की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपनी कलाई पर बँधे लाल धागे को चूमा और कहा, “माँ, मैं पहुँच गया।”

 

देवेंद्र सर और बाकी लोग भी कुछ देर बाद चोटी पर पहुँच गए। लेकिन वहाँ पहुँचकर आरव ने कोई झंडा नहीं लगाया, कोई पत्थर नहीं तोड़ा और न ही पहाड़ से कोई निशानी ली। उसने केवल कुछ क्षण आँखें बंद करके खड़ा रहना चुना। उसे पिता की डायरी का वाक्य याद आया—“पहाड़ को जीतना नहीं, उसका सम्मान करना।” उसने धीरे से कहा, “पिताजी, मैं आपकी मंजिल पूरी करने नहीं आया था। मैं अपना रास्ता खोजने आया था।” उसी समय हवा का एक तेज झोंका आया और उसके चेहरे से बर्फ की हल्की परत हट गई। उसे ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य हाथ उसके सिर पर आशीर्वाद दे रहा हो। लेकिन खुशी ज्यादा देर नहीं टिक सकी। देवेंद्र सर ने कहा, “अब नीचे जाना है।” आसमान फिर बदलने लगा था। चोटी पर पहुँच जाना यात्रा का आधा हिस्सा ही था। असली परीक्षा वापस लौटने की थी। वे धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे। रास्ते में एक जगह करण का पैर फिसला, लेकिन रस्सी ने उसे रोक लिया। भीम ने उसे ऊपर खींच लिया। सभी थक चुके थे। आरव भी बेहद कमजोर महसूस कर रहा था, लेकिन वह लगातार आगे बढ़ता रहा। कई घंटे बाद वे बर्फीली गुफा तक पहुँचे और वहाँ कुछ देर आराम किया। रात में आरव ने गुफा की दीवार पर राघव का नाम देखा। उसे लगा कि शायद राघव की आत्मा भी यही चाहती थी कि कोई उसकी कहानी को समझे, न कि सिर्फ उसकी मंजिल को।

 

अगली सुबह वे गाँव की ओर उतरने लगे। जैसे-जैसे ऊँचाई कम होती गई, हवा गर्म होती गई। पेड़ फिर दिखाई देने लगे। आरव को लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से वापस आ रहा हो। गाँव से कुछ दूर पहुँचते ही उसे लोग दिखाई दिए। सुनीता सबसे आगे खड़ी थी। आरव ने माँ को देखते ही अपनी चाल तेज कर दी। सुनीता दौड़कर उसके पास आई और उसे कसकर गले लगा लिया। कुछ देर तक दोनों कुछ नहीं बोले। फिर सुनीता ने रोते हुए पूछा, “तुम ठीक हो?” आरव ने कहा, “हाँ माँ।” उसने पूछा, “चोटी पर गए थे?” आरव ने सिर हिलाया। सुनीता ने उसकी कलाई का लाल धागा देखा और कहा, “तुमने वादा निभाया।” आरव मुस्कुराया और बोला, “मैंने कहा था न कि खतरा ज्यादा हुआ तो लौट आऊँगा।” सुनीता ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “मुझे तुम पर गर्व है।” उस दिन पूरा गाँव आरव को देखने के लिए इकट्ठा हुआ। लोग उसकी कहानी सुनना चाहते थे। लेकिन आरव ने कहा, “मैंने अकेले कुछ नहीं किया। देवेंद्र सर, करण चाचा और भीम चाचा मेरे साथ थे। और सबसे बड़ी बात, मुझे मेरी माँ की आवाज याद थी।” गाँव के बुजुर्ग दीनानाथ बाबा ने कहा, “अब तुम समझ गए हो कि कालागिरि की असली परीक्षा क्या है।” आरव ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या?” बाबा ने कहा, “पहाड़ की चोटी नहीं, अपने भीतर की चोटी।”

 

कुछ दिनों बाद आरव ने अपने पिता की डायरी गाँव के स्कूल के पुस्तकालय को दे दी। उसने कहा कि इसे सुरक्षित रखा जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे पढ़ सकें। उसने राघव के बारे में भी पूरी जानकारी गाँव वालों को दी और उसके परिवार को वह तस्वीर सौंप दी जो गुफा से मिली थी। राघव के परिवार ने वर्षों से उसके बारे में कोई निशानी नहीं देखी थी। तस्वीर देखकर उसकी बूढ़ी माँ की आँखों में आँसू आ गए। उसने आरव से कहा, “तुमने मेरे बेटे को वापस तो नहीं लाया, लेकिन उसकी याद वापस ला दी।” आरव कुछ नहीं बोल पाया। उसने केवल उनका हाथ पकड़ लिया। उस घटना के बाद आरव के मन में पर्वतारोहण को लेकर एक नया विचार पैदा हुआ। वह केवल पहाड़ों पर चढ़ना नहीं चाहता था। वह लोगों को सुरक्षित पर्वतारोहण सिखाना चाहता था। उसने आगे की पढ़ाई की और पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लिया। कई साल बाद वह एक प्रशिक्षित पर्वतारोही बन गया। उसने कई ऊँची चोटियों पर चढ़ाई की, लेकिन कालागिरि उसके जीवन का सबसे खास पहाड़ बना रहा।

 

समय बीतता गया। आरव बड़ा हो गया, लेकिन हर साल वह देवगढ़ लौटता और बच्चों को पहाड़ों की कहानी सुनाता। वह उन्हें बताता कि साहस का मतलब खतरे में कूदना नहीं है। वह कहता कि डर होना कमजोरी नहीं, बल्कि शरीर और मन का चेतावनी संकेत है। एक दिन एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला, “आरव भैया, मैं भी कालागिरि की चोटी पर जाना चाहता हूँ।” आरव ने मुस्कुराकर पूछा, “क्यों?” बच्चे ने कहा, “क्योंकि मैं सबसे बहादुर बनना चाहता हूँ।” आरव ने कहा, “अगर बहादुर बनना है तो पहले सीखो कि कब आगे बढ़ना है और कब वापस लौटना है।” बच्चा बोला, “लेकिन अगर मैं वापस आ गया तो लोग कहेंगे कि मैं डर गया।” आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर पहाड़ पर मत चढ़ना। अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी समझकर चढ़ना। याद रखना, कभी-कभी वापस लौटने वाला इंसान उस व्यक्ति से ज्यादा बहादुर होता है जो बिना सोचे आगे बढ़ता रहता है।”

 

एक रात आरव अपने घर की छत पर बैठा था। सामने कालागिरि चाँदनी में चमक रहा था। हवा में देवदार की खुशबू थी और दूर नदी की आवाज सुनाई दे रही थी। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी। उसने आखिरी पन्ना फिर से खोला। वहाँ एक छोटा-सा वाक्य लिखा था, जो उसने पहले कभी ध्यान से नहीं पढ़ा था। लिखा था, “अगर मेरा बेटा कभी मेरी डायरी पढ़े, तो मैं चाहता हूँ कि वह मेरी मंजिल नहीं, अपना रास्ता चुने।” आरव की आँखों में आँसू आ गए। उसे अब समझ आया कि उसके पिता उसे अपनी अधूरी यात्रा पूरी करने के लिए नहीं छोड़ गए थे। उन्होंने उसे यह सिखाने के लिए याद छोड़ी थी कि जिंदगी में हर इंसान को अपनी मंजिल खुद चुननी चाहिए। आरव ने डायरी बंद की और दूर कालागिरि की तरफ देखा। उसे अब उस पहाड़ से कोई डर नहीं लगता था, लेकिन उसके मन में हमेशा सम्मान बना रहता था। उसने धीरे से कहा, “तुमने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।” हवा चली और देवदार के पेड़ झूमने लगे। उसे ऐसा लगा जैसे पहाड़ ने उसकी बात सुन ली हो।

 

कई साल बाद जब आरव एक प्रसिद्ध पर्वतारोही और प्रशिक्षक बन चुका था, तब एक दिन उसे खबर मिली कि कुछ युवा पर्वतारोही बिना पर्याप्त तैयारी के कालागिरि पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनमें से कुछ रास्ता भटक गए थे। आरव तुरंत एक बचाव दल के साथ निकल पड़ा। उसने वही रास्ता अपनाया जिसे उसने वर्षों पहले अपने पिता की डायरी में देखा था। बर्फीली गुफा के पास उसे उन युवाओं के निशान मिले। वह उन्हें खोजते हुए आगे बढ़ा। आखिरकार उसे एक घायल युवक दिखाई दिया जो एक चट्टान के नीचे फँसा हुआ था। आरव ने उसे सुरक्षित बाहर निकाला। युवक ने काँपते हुए पूछा, “आप कौन हैं?” आरव ने कहा, “एक ऐसा आदमी जिसने बहुत साल पहले यही गलती लगभग की थी।” युवक ने पूछा, “क्या आप इस पहाड़ पर चढ़ चुके हैं?” आरव ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ।” युवक ने पूछा, “चोटी तक?” आरव ने सिर हिलाया, लेकिन फिर कहा, “लेकिन मेरी सबसे बड़ी जीत चोटी तक पहुँचना नहीं थी। मेरी सबसे बड़ी जीत यह थी कि मैं सही समय पर सही फैसला लेना सीख गया।” उन युवाओं को सुरक्षित गाँव तक पहुँचाने के बाद आरव ने महसूस किया कि उसके पिता की सीख अब केवल उसकी नहीं रही थी। वह दूसरों की जिंदगी बचाने का माध्यम बन गई थी।

 

उस दिन रात को गाँव में आग के पास बैठे आरव ने बच्चों को अपनी पूरी कहानी सुनाई। उसने बताया कि कैसे वह बचपन में कालागिरि को देखकर सोचता था कि चोटी पर पहुँचते ही वह सबसे महान बन जाएगा। उसने बताया कि कैसे एक हादसे ने उसे डर का अर्थ समझाया, कैसे पिता की डायरी ने उसे जिम्मेदारी सिखाई और कैसे उसकी माँ का प्यार उसके हर कदम के साथ रहा। बच्चे मंत्रमुग्ध होकर उसकी बातें सुन रहे थे। अंत में एक बच्चे ने पूछा, “भैया, क्या आपको कभी फिर से कालागिरि पर जाने का मन करता है?” आरव कुछ देर चुप रहा और फिर मुस्कुराकर बोला, “हाँ, लेकिन अब मैं वहाँ जीतने नहीं जाता। मैं वहाँ सीखने जाता हूँ।” बच्चे ने पूछा, “क्या सीखने?” आरव ने कालागिरि की तरफ देखते हुए कहा, “कि इंसान कितना भी मजबूत क्यों न हो, प्रकृति उससे बड़ी है। कि सपने जरूरी हैं, लेकिन जिंदगी उनसे भी ज्यादा जरूरी है। कि डर से भागना नहीं चाहिए, लेकिन डर को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए। और सबसे जरूरी बात, अगर रास्ता गलत हो तो वापस लौटने में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए।”

 

उस रात जब सब लोग सो गए, आरव अकेला नदी के किनारे गया। चाँद पानी में चमक रहा था। उसने अपनी जेब से पिता की डायरी का वह छोटा-सा पन्ना निकाला और उसे ध्यान से देखा। फिर उसने उसे वापस सुरक्षित रख लिया। उसने महसूस किया कि उसके पिता कहीं गए नहीं थे। वह उसके हर सही निर्णय में मौजूद थे, उसकी हर सावधानी में मौजूद थे, उसकी माँ की हर चिंता में मौजूद थे और उस पहाड़ की हर हवा में मौजूद थे। आरव ने आसमान की ओर देखा और कहा, “पिताजी, मैंने आपकी मंजिल नहीं चुनी। मैंने अपना रास्ता चुना। लेकिन उस रास्ते पर आपने मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ा।” दूर कालागिरि की चोटी बादलों से निकलकर चाँदनी में चमक रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे विशाल पहाड़ शांत खड़ा होकर उस लड़के को देख रहा हो, जो कभी उसकी ऊँचाई को चुनौती देना चाहता था और अब उसकी महानता को समझ चुका था।

 

आरव की कहानी वर्षों तक देवगढ़ में सुनाई जाती रही। लोग उसे उस लड़के के रूप में याद करते थे जो कालागिरि की चोटी तक पहुँचा था, लेकिन आरव खुद अपनी कहानी को अलग तरह से देखता था। उसके लिए वह कहानी एक पहाड़ की नहीं, बल्कि एक बच्चे के बड़े होने की कहानी थी। वह बच्चा जो पहले सोचता था कि बहादुरी का मतलब डर को खत्म करना है, लेकिन बाद में समझा कि बहादुरी का मतलब डर को पहचानकर भी सही कदम उठाना है। वह बच्चा जो सोचता था कि मंजिल तक पहुँचना ही जीत है, लेकिन बाद में समझा कि कभी-कभी सुरक्षित लौटना सबसे बड़ी जीत होती है। वह बच्चा जो अपने पिता की अधूरी कहानी पूरी करना चाहता था, लेकिन अंत में उसने अपनी खुद की कहानी लिखी। और जब भी कोई उससे पूछता कि उसके जीवन का सबसे कठिन पहाड़ कौन-सा था, तो वह मुस्कुराकर कहता, “कालागिरि नहीं। सबसे कठिन पहाड़ मेरे भीतर था। उस पहाड़ पर डर, जिद, अहंकार और अधीरता रहती थी। मैंने उसे हराया नहीं, मैंने उसे समझना सीखा।” फिर वह बच्चों से कहता, “अगर तुम्हारे सामने भी कोई बड़ा पहाड़ हो, चाहे वह असली पहाड़ हो या जिंदगी की कोई मुश्किल, उससे डरकर रुकना मत। तैयारी करो, सीखो, कोशिश करो और आगे बढ़ो। लेकिन अगर कभी तुम्हें लगे कि रास्ता तुम्हारी जिंदगी से बड़ा हो गया है, तो वापस लौट आना। क्योंकि जिंदगी में कुछ चोटियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें जीतने से ज्यादा जरूरी है उन्हें सम्मान देना।”

 

और इस तरह कालागिरि की चोटी पर पहुँचा वह लड़का धीरे-धीरे एक ऐसी कहानी बन गया जिसे देवगढ़ के लोग अपने बच्चों को सुनाते थे। कहानी उस लड़के की जिसने पहाड़ पर चढ़ना सीखा, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी अपने भीतर उतरना सीखा। कहानी उस माँ की जिसने डर के बावजूद अपने बेटे के सपने को समझा। कहानी उस पिता की जिसने अपनी डायरी के कुछ शब्दों में आने वाली पीढ़ी के लिए पूरी जिंदगी की सीख छोड़ दी। कहानी उस शिक्षक की जिसने साहस के साथ जिम्मेदारी सिखाई। और कहानी उस पहाड़ की जिसने किसी इंसान को अपना मालिक नहीं बनने दिया, बल्कि उसे विनम्र होना सिखाया। हर सुबह जब सूरज कालागिरि की चोटी पर चमकता, देवगढ़ के बच्चे उसकी तरफ देखते और उन्हें आरव की कहानी याद आती। उन्हें याद आता कि ऊँचाई केवल पैरों से नहीं नापी जाती, बल्कि हिम्मत, समझदारी और दिल की मजबूती से भी नापी जाती है। कालागिरि आज भी वहीं खड़ा था, विशाल, शांत और रहस्यमय। लेकिन अब गाँव के लोग उससे केवल डरते नहीं थे। वे उसका सम्मान करते थे। और जब कभी कोई बच्चा दूर खड़े उस पहाड़ को देखकर कहता, “मैं एक दिन वहाँ जाऊँगा,” तो गाँव के बुजुर्ग मुस्कुराकर कहते, “जरूर जाना, लेकिन याद रखना, पहाड़ की चोटी तक पहुँचने से पहले अपने भीतर की चोटी तक पहुँचना। क्योंकि असली पर्वत वहीं है, और असली जीत भी वहीं मिलती है।”

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